
Rama Devi Sahu
79 days ago
भागवत महापुराण के दशम स्कंध में वर्णित यह लीला अत्यन्त गूढ़ और आध्यात्मिक है। इसका उद्देश्य किसी का उपहास करना नहीं, बल्कि गोपियों के पूर्ण आत्मसमर्पण और श्रीकृष्ण के प्रति निष्काम प्रेम को प्रकट करना है। जब हेमन्त ऋतु का प्रथम मास आया, तब व्रज की कुमारिका गोपियाँ श्रीकृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने की इच्छा से कात्यायनी-व्रत करने लगीं। वे प्रतिदिन प्रातःकाल यमुना में स्नान करतीं और देवी कात्यायनी की पूजा करती थीं। कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि। नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः॥ (भागवत 10.22.4) हे महामाया! हे महायोगिनियों की अधीश्वरी देवी कात्यायनी! नन्दनन्दन श्रीकृष्ण को मेरे पति के रूप में स्वीकार करने की कृपा कीजिए। एक दिन सभी गोपियाँ यमुना में स्नान कर रही थीं। उन्होंने अपने वस्त्र तट पर रख दिए थे। उसी समय सर्वान्तर्यामी श्रीकृष्ण अपने सखा बालकों के साथ वहाँ पहुँचे। उन्होंने गोपियों के वस्त्र उठा लिए और समीप स्थित एक विशाल कदंब वृक्ष पर चढ़कर बैठ गए। मुरलीधर श्रीकृष्ण कदंब की शाखा पर विराजमान थे। उनके अधरों पर मधुर वंशी सुशोभित थी। यमुना का तट, मंद-मंद बहती वायु, वृन्दावन की शोभा और श्रीकृष्ण की मोहिनी मुस्कान सम्पूर्ण वातावरण को दिव्य बना रही थी। गोपियाँ जल में खड़ी होकर बोलीं— “हे नन्दनन्दन! आप हमारे वस्त्र लौटा दीजिए। यह कैसी शरारत है?” श्रीकृष्ण हँसकर बोले— “यदि तुम अपने वस्त्र चाहती हो तो जल से बाहर आकर उन्हें ग्रहण करो।” गोपियाँ अत्यन्त लज्जित थीं, परन्तु वे जानती थीं कि श्रीकृष्ण की आज्ञा सर्वोपरि है। अन्ततः उन्होंने भगवान की आज्ञा का पालन किया। तब भगवान ने उन्हें उपदेश देते हुए कहा कि व्रत करते समय पूर्ण मर्यादा का पालन करना चाहिए। साथ ही उन्होंने उनके निष्कपट प्रेम और समर्पण को स्वीकार किया। भागवत में श्रीकृष्ण का यह वचन आता है— न मय्यावेशितधियां कामः कामाय कल्पते। भर्जिताः क्वथिता धाना प्रायो बीजाय नेष्यते॥ (भागवत 10.22.26) जिनका मन पूर्ण रूप से मुझमें स्थित हो गया है, उनका लौकिक कामभाव उन्हें बाँध नहीं सकता; जैसे भुना हुआ बीज पुनः अंकुरित नहीं होता। भगवान ने आगे गोपियों को आश्वासन दिया कि उनका व्रत सफल हुआ है और भविष्य में उन्हें उनके साथ दिव्य रास-विलास का सौभाग्य प्राप्त होगा। इस लीला का आध्यात्मिक रहस्य यह है कि भगवान के समक्ष जीव को अपने सभी अहंकार, आडम्बर, उपाधियाँ और सांसारिक आवरण त्यागकर पूर्ण समर्पण करना पड़ता है। गोपियों के वस्त्र जीव के बाह्य आवरणों के प्रतीक हैं, और श्रीकृष्ण का उन्हें हर लेना पूर्ण आत्मनिवेदन का संकेत है। अन्ततः गोपियाँ अपने वस्त्र प्राप्त कर परम आनन्द से भर गईं और उनके हृदय में श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम और भी अधिक प्रगाढ़ हो गया। यमुना तट पर कदंब वृक्ष के ऊपर विराजमान वंशीधर श्रीकृष्ण की यह लीला आज भी भक्तों के हृदय में प्रेम, समर्पण और भक्ति का अमृत प्रवाहित करती है। जय श्री राधे! जय श्रीकृष्ण! 🙏🏻🌸

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