
Rama Devi Sahu
127 days ago
रामचरितमानस के अयोध्या कांड की यह कथा भक्ति और प्रेम की पराकाष्ठा है। जब भगवान श्री राम, लक्ष्मण और माता सीता वनवास के लिए निकले, तो वे गंगा तट पर पहुँचे। भगवान राम ने गंगा पार करने के लिए केवट से नाव मांगी। लेकिन केवट ने एक अनोखी शर्त रख दी। उसने कहा कि उसने सुना है कि श्री राम के चरणों की धूल में कोई ऐसा 'जड़ी-बूटी' जैसा प्रभाव है जिसने एक पत्थर (अहिल्या) को स्त्री बना दिया। "पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं।" केवट ने तर्क दिया: मेरी नाव काठ (लकड़ी) की है। यदि आपके चरणों की धूल से मेरी नाव भी कोई सुंदर स्त्री बन गई, तो मेरा क्या होगा? मैं गरीब हूँ और यही नाव मेरी जीविका का एकमात्र साधन है। उसने स्पष्ट कह दिया कि जब तक वह श्री राम के चरणों को धोकर उनकी धूल नहीं झाड़ लेता, वह उन्हें नाव पर नहीं बिठाएगा। भगवान राम केवट के निश्छल प्रेम को देखकर मुस्कुराए और उसे अनुमति दे दी। केवट ने बड़े प्रेम से एक कठौते में जल लिया और भगवान के चरणों को धोया। चरणों को धोने के बाद उस जल को उसने अपने पितरों और स्वयं को धन्य करने के लिए पिया। इसके बाद, केवट ने सम्मानपूर्वक राम, लक्ष्मण और सीता जी को नाव में बैठाया और गंगा के पार उतारा गंगा पार करने के बाद, श्री राम को संकोच हुआ कि उन्होंने केवट को कुछ भी नहीं दिया। माता सीता ने श्री राम के मन की बात समझ ली और अपनी रत्नों से जड़ित मुद्रिका (अंगूठी) उतारकर केवट को देने की कोशिश की। परंतु केवट ने उसे लेने से मना कर दिया। उसने बड़ी विनम्रता और अधिकार के साथ कहा: "हे प्रभु! एक ही व्यवसाय वाले आपस में मजदूरी नहीं लेते। मैं इस पार से उस पार उतारता हूँ, और आप भवसागर से पार उतारते हैं। जब मैं आपके द्वार आऊँ, तब आप मुझे पार उतार दीजिएगा, वही मेरी असली उतराई होगी।" भगवान राम केवट की इस नि:स्वार्थ भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने केवट को गले लगाया और उसे विदा किया। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि ईश्वर को धन या वैभव से नहीं, बल्कि केवल शुद्ध प्रेम और समर्पण से प्राप्त किया जा सकता है। 🙏🌺जय सियाराम🌺🙏

Comments (2)

Rama Devi Sahu
Apr 25, 2026
Bhagwan ke Upar Aastha or Vishwas Hona Chahiye tho Jarur Paar laga Denge....,...!

Bajra Singh Chouhah Bajra Singh Chouhah
Apr 25, 2026
हे प्रभु हमरो नैया पार लगा दो 🙏🏻🙏🏻🙏🏻
