
Rama Devi Sahu
137 days ago
जय जगन्नाथ प्रभु 🙏 🙏 यह प्रसंग जगन्नाथ पुरी की परम भक्त माता करमाबाई का है। वे भगवान जगन्नाथ को अपना आराध्य ही नहीं, बल्कि अपना पुत्र मानती थीं। वे रोज़ सुबह उठकर बिना स्नान किए, सबसे पहले अपने हाथों से बाजरे का 'खिचड़ा' बनाती थीं और प्रभु को बड़े लाड़ से खिलाती थीं। जब मंदिर के पंडितों ने उन्हें टोकना चाहा कि भगवान को बिना नहाए भोग लगाना अपराध है, तब स्वयं जगन्नाथ जी ने हस्तक्षेप कर अपनी इस भक्त की ममता का मान बढ़ाया। विधि निषेध सब हारिया: शास्त्रों में भगवान को भोग लगाने के कड़े नियम (विधि-निषेध) हैं—जैसे शुद्धता, स्नान और मंत्रोच्चार। लेकिन माता करमाबाई की ममता के सामने ये सभी बाहरी नियम हार गए। प्रभु के लिए करमा का 'भाव' शुद्धि के किसी भी नियम से ऊपर था। माँ का प्रेम अपार: करमाबाई भगवान को साक्षात बालक मानती थीं। जैसे एक माँ अपने बच्चे को भूख लगने पर स्नान का इंतज़ार नहीं कराती, वैसे ही करमाबाई भी प्रभु को तुरंत भोजन कराती थीं। उनके इसी अपार प्रेम ने प्रभु को बांध लिया था। बिना नहाए लाड़ सों: भगवान भाव के भूखे हैं। उन्होंने करमाबाई के हाथों से बिना नहाए, बिना किसी औपचारिकता के, केवल 'लाड़' (स्नेह) के वश होकर वह साधारण खिचड़ा ग्रहण किया। जीमे सिरजनहार: 'जीमे' का अर्थ है भोजन करना। जो 'सिरजनहार' (सृष्टि का रचयिता) पूरी दुनिया को पालता है और जिसे भोग लगाने के लिए छप्पन भोग कम पड़ जाते हैं, वह एक वृद्धा के प्रेम में वशीभूत होकर उसके घर की खिचड़ी खा रहा है।

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