MyMandirInstall
Profile

Rama Devi Sahu

65 days ago

रामायण के अरण्य कांड में जब भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी वनवास के दौरान महर्षि अत्रि के आश्रम में पहुँचते हैं, तब महर्षि अत्रि की परम तपस्वी पत्नी माता अनसूया ने सीता जी को गले लगाया और उन्हें पातिव्रत्य (पति-व्रत धर्म) का अत्यंत गूढ़ और कल्याणकारी उपदेश दिया। गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस और वाल्मीकि रामायण दोनों में इस प्रसंग का सुंदर वर्णन मिलता है। माता अनसूया ने सीता जी से कहा कि एक विवाहित स्त्री के लिए उसका पति ही उसका सबसे बड़ा गुरु, देवता और मार्गदर्शक है। "मातु पिता भ्राता हितकारी। मित प्रद सब सुनु राजकुमारी॥ अमित दानि भर्ता वैदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही॥" अर्थात माता, पिता, भाई सब एक सीमा तक ही सुख देने वाले हैं, लेकिन पति असीमित सुख और आश्रय देने वाला होता है। इसलिए जो स्त्री अपने पति की सेवा नहीं करती, वह श्रेष्ठ आचरण वाली नहीं मानी जाती। अनसूया जी ने स्पष्ट किया कि पति-व्रत धर्म केवल अच्छे दिनों के लिए नहीं है। उन्होंने चार विपरीत परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा वृद्ध (बुढ़ापा), रोगी, मूर्ख, निर्धन, अंधा, बहरा, क्रोधी या अत्यंत दीन परिस्थिति में भी जो स्त्री अपने पति का अपमान नहीं करती और उसका साथ निभाती है, वही सच्चे अर्थों में पति-व्रता है। पति अनुकूल हो या प्रतिकूल, उसका आदर करना स्त्री का परम धर्म है। सती अनसूया ने समाज में स्त्रियों के पातिव्रत्य को चार श्रेणियों में विभाजित करके समझाया 1. उत्तम (सर्वश्रेष्ठ): जो स्त्री स्वप्न में भी अपने पति के अलावा किसी अन्य पुरुष के बारे में नहीं सोचती। जिसके मन में केवल और केवल अपने पति का ही वास होता है। 2. मध्यम: जो दूसरे के पति को देखकर अपने मन में भाई, पिता या पुत्र के समान भाव रखती है (यानी पराए पुरुष को देखकर जिसके मन में कोई विकार नहीं आता)। 3. अधम (निम्न): जो धर्म और कुल की मर्यादा के डर से अथवा समाज के भय से अपने पति के प्रति निष्ठावान रहती है (मन से नहीं, बल्कि मजबूरी में)। 4. अधम से भी नीची (निकृष्ट): जो केवल अवसर न मिलने के कारण या डर के कारण बची रहती है, अन्यथा जिसका मन चंचल रहता है। ऐसी स्त्री को समाज में आदर नहीं मिलता। उन्होंने सीता जी को समझाया कि एक श्रेष्ठ स्त्री को कभी भी अपने पति से कटु वचन (कड़वे बोल) नहीं बोलने चाहिए। पति के क्रोधित होने पर भी शांत रहकर स्थिति को संभालना ही स्त्री की असली शक्ति और बुद्धिमत्ता है। माता अनसूया ने बताया कि जो स्त्री इस धर्म का निष्ठापूर्वक पालन करती है, उसे संसार में बिना किसी कठिन तपस्या या यज्ञ के ही सहज ही परम गति (मोक्ष) प्राप्त हो जाती है। उसका यश लोक-परलोक दोनों में फैलता है। माता अनसूया ने जब सीता जी को यह उपदेश दिया, तो उन्होंने यह भी कहा कि "हे सीते! तुम तो स्वयं साक्षात जगदम्बा हो, तुम्हें उपदेश देने की आवश्यकता नहीं है। परंतु मानव शरीर धारण करने के कारण और लोक-कल्याण की मर्यादा स्थापित करने के लिए मैं तुम्हें यह बातें याद दिला रही हूँ।" इस उपदेश के अंत में माता अनसूया ने सीता जी की पावनता से प्रसन्न होकर उन्हें दिव्य वस्त्र, आभूषण और अंगराग (उबटन) भेंट किए, जो कभी पुराने या मैले नहीं होते थे और वनवास के कठिन दिनों में भी सीता जी की कांति को बनाए रखते थे। जय सियाराम 🙏

Post media

Comments (0)

No comments yet. Be the first to comment!