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Rama Devi Sahu

14 days ago

*🌞~ वैदिक हिन्दू पंचांग ~🌞* *⛅दिनांक - 16 अगस्त 2026* *⛅दिन - रविवार* *⛅विक्रम संवत् - 2083* *⛅अयन - दक्षिणायण* *⛅ऋतु - वर्षा* *⛅मास - श्रावण* *⛅पक्ष - शुक्ल* *⛅तिथि - चतुर्थी शाम 04:52 तक तत्पश्चात् पंचमी* *⛅नक्षत्र -‌ हस्त प्रातः 03:50 अगस्त 17 तक तत्पश्चात् चित्रा* *⛅योग - साध्य प्रातः 04:08 अगस्त 17 तक तत्पश्चात् शुभ* *⛅राहुकाल - शाम 05:22 से शाम 06:59 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)* *⛅सूर्योदय - 06:03* *⛅सूर्यास्त - 06:59 (सूर्योदय एवं सूर्यास्त उज्जैन मानक समयानुसार)* *⛅दिशा शूल - पश्चिम दिशा में* *⛅ब्रह्ममुहूर्त - प्रातः 04:35 से प्रातः 05:19 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)* *⛅अभिजीत मुहूर्त - दोपहर 12:05 से दोपहर 12:57 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)* *⛅निशिता मुहूर्त - मध्यरात्रि 12:09 से मध्यरात्रि 12:53 तक (उज्जैन मानक समयानुसार)* *🌥️व्रत पर्व विवरण - विनायक चतुर्थी, सर्वार्थसिद्धि योग, अमृतसिद्धि योग (प्रातः 06:03 से प्रातः 03:50 अगस्त 17 तक)* *🌥️विशेष - चतुर्थी को मूली खाने से धन का नाश होता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)* *🕉️ ब्रह्मप्रतिपादन 2, सर्ग 269 📜* *🔴 रामजी🙏 ने पूछा, हे भगवन्! निद्रा💤 का कितना प्रमाण है और कितने काल⏳ पर्यन्त रहती है? सूक्ष्म अणु⚛️ में सृष्टि🌱 कैसी फुरी है और कैसे स्थित है? अणु में उसकी क्यों संज्ञा है और अनन्त♾️ क्योंकर है? जो देवता असुरादिक👹 रूप को चित्त🧠 प्राप्त हुआ है वह क्या है?* *🔴 वशिष्ठजी बोले हे रामजी! अज्ञान निद्रा अपने काल में तो अनादि है और नहीं जानी जाती कि कबकी हुई है और अन्त भी नहीं जाना जाता कि कबतक रहेगा | अज्ञान काल में तो इसका आदि अन्त प्रमाण कुछ नहीं भासता और बोध💡 में इसका अत्यन्ता भाव दीखता👁️ है |* *🔴 चित्तसत्ता की जो अनन्तता पूछो तो वह तो अद्वैत🕊️ चिन्मात्र आत्म समुद्र🌊 है और उसमें सूक्ष्मभाव अहमस्मि जो संवित् फुरती है उसका नाम चित्त है | उस चित्त में आगे जगत्🌍 होता है | शुद्ध💧 चिन्मात्र में संवेदन चित्त फुरता है उसमें जगत् है, वही चिद्सत्ता देवता, असुर और जंगमरूप हो भासती है और नाग🐍,पिशाच👻, कीटादिक स्थावर-जंगमरूप हो भासती है |* *🔴 वास्तव में चैतन्यसत्ता✨ ही है उससे भिन्न कुछ नहीं और सब चिदाकासरूप☁️ है फुरने से नाना प्रकार है |* *🔴 हे रामजी! परम शुद्ध चिद्अणु से मिलकर चित्त अनेक ब्रह्माण्ड🌌 धारता है और उस सूक्ष्म अणु में अनन्त ब्रह्माण्ड फुरते हैं परन्तु उससे भिन्न नहीं | जैसे एक पुरुष👤 शयन🛌 करता है तो उसको स्वप्ने💭 में अनेक जीव भासि आते हैं और उन जीवों में अपने अपने स्वप्ने की सृष्टि फुरती है सो अनेक सृष्टि हो जाती है तैसे ही सूक्ष्म चिद्अणु में अनन्त सृष्टि फुरती है परन्तु आत्मसत्ता से भिन्न कुछ नहीं बना |* *🔴 जैसे सूर्य☀️ की किरणों में अनन्त सूक्ष्म त्रसरेणु होती हैं, तैसे ही परमात्मसूर्य के चिद्अणु सूक्ष्म हैं | इन त्रस रेणु से भी सूक्ष्म चिद्अणु में अनन्त सृष्टि अपनी-अपनी फुरती हैं |* *🔴 हे रामजी! जब तक चित्त फुरता रहता है तबतक सृष्टि का अन्त नहीं आता | असंख्य जगत् भ्रम🌀 आगे देखे हैं और असंख्य ही आगे देखेंगे | जब चित्त फुरने से रहित होता है तब जगत् कल्पना मिट जाती है | जैसे स्वप्न में सृष्टि भासती है और बड़े व्यवहार होते हैं पर जब जाग🌅 उठता है तब स्वप्ने की सृष्टि व्यवहार की कल्पना💭 मिट जाती है और अद्वैत अपना आपही भासता है, तैसे ही चित्त के ठहरने से सब भ्रम मिट जाता है |* *🔴 हे रामजी! सूक्ष्म चिद्अणु की संज्ञा तब हुई है जब इसको चित्त का सम्बन्ध हुआ है जब चित्त को अपने स्वभाव में स्थित करोगे तब द्वैतकल्पना और सूक्ष्म स्थूल भाव मिट जावेंगे | इस की सूक्ष्म संज्ञा अविद्यकभाव से है जो इन्द्रियों👁️ का विषय नहीं है इससे अणुता है, सूक्ष्म अणु में भी व्यापार हुआ है इससे सूक्ष्म अणु कहता और अनन्तता इस कारण है कि सब को धार रहा है |* *🔴 हे रामजी! यह जगत् अभावमात्र है | जैसे मरुस्थल🏜️ में जलाभास💧 होता है, तैसे ही आत्मा में जगत् भासता है | यह जगत् ही नहीं है तो इसका कारण किसे कहिये? आदि सृष्टि अकारण फुरी है और फिर उसमें कारण⚙️-कार्य भासने लगे हैं सो आभास🪞 की दृढ़ता से है |* *🔴 जैसे स्वप्ने में आदि सृष्टि अकारण बीज🌱, वृक्ष🌳, कुलाल, मिट्टी और घट इकट्ठे फुर आते हैं | जब उस स्वप्ने की दृढ़ता हो जाती है तब कारण कार्य भासते हैं परन्तु जो सोया पड़ा है उसको दृढ़ भासते हैं, तैसे ही अज्ञानी🤷‍♂️ को जगत् कार्य कारण दृढ़ भासता है और ज्

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