
Rama Devi Sahu
293 days ago
*-------------------* ये जो चौथी कक्षा की बच्ची को आत्महत्या का ख्याल ला दिया है, सोचो हमने बच्चों के दिमाग को किस बोझ के नीचे दबा दिया है। बेहतर मार्क्स और बेहतर बनने की ऐसी होड़ मचाई है, कि बच्चों को समझदार होने से पहले ही मेच्योर बना दिया है।। *---------------*|| जय श्री राधा माधव ||* आज के समय में बच्चों पर बढ़ते मानसिक दबाव और शिक्षा-प्रतिस्पर्धा का उदाहरण है कि चौथी कक्षा की एक छोटी बच्ची द्वारा आत्महत्या जैसा भयावह विचार आना इस बात का संकेत है कि समाज, अभिभावक व शैक्षणिक संस्थान - अपेक्षाओं का बोझ बच्चों पर कुछ अधिक ही डाल रहे हैं। आज बच्चों से बचपन छीन लिया गया है। खेलकूद, शरारत और मासूमियत के समय में ही हम उन पर पढ़ाई और अंक लाने की इतनी अपेक्षाएँ लाद देते हैं कि वे मानसिक रूप से टूटने लगते हैं। *बेहतर अंक और “सबसे आगे” रहने की दौड़ ने बच्चों के मन में असफलता का डर बैठा दिया है। उनकी सोच इतनी जल्दी परिपक्व हो रही है कि वे अभी जीवन समझने लायक भी नहीं होते और तनाव की दुनिया में धकेल दिए जाते हैं।* समाज और माता-पिता की यह निरंतर अपेक्षा उन्हें यह विश्वास दिला देती है कि यदि वे “सर्वश्रेष्ठ” नहीं बने, तो उनका कोई मूल्य नहीं। यह *मानसिक बोझ कभी-कभी इतना बढ़ जाता है कि बच्चा स्वयं को निरर्थक मान बैठता है, और आत्महत्या जैसे विचार उसके मन में जन्म ले लेते हैं।* यही स्थिति सबसे अधिक दुखद और विचारणीय है। *बच्चों को अंक, उपलब्धि या पैसा कमाने की मशीन न बनाइए। उन्हें जीने दीजिए, खेलने दीजिए, असफलताओं से सीखने दीजिए, और यह विश्वास दीजिए कि उनके व्यक्तित्व का मूल्य उनके अंकपत्र से कहीं अधिक है। *समाज को चाहिए कि वह बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दे और उनके भीतर जीवन का आनंद, आत्मविश्वास और भावनात्मक संतुलन विकसित करे।* तभी उनका बचपन और भविष्य दोनों सुरक्षित रह पाएँगे। ➡ बचपन बोझ नहीं, आनंद का समय है। ➡ बच्चों का मूल्य अंक से नहीं, उनके व्यक्तित्व से है। ➡ प्रतिस्पर्धा सीमित हो; प्यार, समझ और सहारा अधिक हो। *|| श्री हरि शरणम् ||* ईश्वर सत्य है


