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Rohit Patel

334 days ago

🚩हनुमानकृतं श्रीदेवी स्तोत्रम् 🚩 🔱( हिन्दी अर्थ सहित)🔱 🌹 श्लोक १ अम्ब प्रसीद वरदा भव दुःखहन्त्री कामान् ममाशु परिपूरय कामधेनो । अद्यैव मे रिपुगणा विलयं प्रयान्तु वीर्यं जयं च विपुलं च यशः प्रदेहि ॥१॥ अर्थ – हे अंबे! कृपामयी! वर देनेवाली! दुःखों का नाश करनेवाली! आप मेरी मनोकामनाओं को कामधेनु के समान पूर्ण करें। आज ही मेरे शत्रु नष्ट हों। मुझे बल, विजय और अपार यश प्रदान करें। 🌹 श्लोक २ अंब प्रसीद महतीं श्रियमत्र लोके सर्वाधिकां वितरतीमितरानपेक्षम्। संपत्करीं सुखकरीं भवतीमुपास्ते यस्तस्य दुर्लभमिह त्रिदिवेऽपि नास्ति ॥२॥ अर्थ – हे अंबे! प्रसन्न हों। आप समस्त लोकों में श्रेष्ठ, महालक्ष्मीस्वरूपिणी हैं, जो बिना किसी अपेक्षा के सुख और संपत्ति प्रदान करती हैं। जो आपका भजन करता है, उसके लिए इस लोक और स्वर्ग – कहीं भी कोई वस्तु दुर्लभ नहीं रहती। 🌹 श्लोक ३ अंब प्रसीद शतकोटिधरादिदेव-सम्भावितांघ्रियुगले सकलेष्टदात्री । यस्मिन् प्रसीदति मनाग्भवती भवानी धन्यः स एव जगतां च स एव सेव्यः ॥३॥ अर्थ – हे अंबे! आपके चरणों की पूजा शतकोटि इन्द्रादि देवगण करते हैं। आप सब प्रकार की इच्छाओं को पूर्ण करनेवाली हैं। जिस मनुष्य पर आप तनिक भी प्रसन्न हो जाती हैं, वही सच्चा धन्य और पूज्य हो जाता है। 🌹 श्लोक ४ अंब प्रसीद सकृदंबुजनाभवक्षः-क्रीडागृहे कमलवासिनि हेमवर्णे। संपत्तिकल्पलतिके त्वदपांगरेखां ब्रह्मादयोऽपि परिगृह्य भवन्ति धन्याः ॥४॥ अर्थ – हे अंबे! स्वर्णवर्णी! कमल पर विराजमान! जो विष्णु के वक्षःस्थल में क्रीड़ा भवन में निवास करती हैं! आप समृद्धि की कल्पलता हैं। आपकी दृष्टि रेखा जिस पर पड़ जाती है, ब्रह्मादि देवता भी उसे धन्य मानते हैं। 🌹 श्लोक ५ अंब प्रसीद शशिखण्डविभूषणांग-भागस्थिते भवनिहन्त्रि मनोन्मनि त्वम्। या भाति विश्वविलयस्थितिसृष्टिदात्री विश्वंभरादिमहदादिविचित्ररूपा ॥५॥ अर्थ – हे अंबे! चन्द्रमणि से भूषित अंगवाली! संसाररूपिणी! आप ही सृष्टि, स्थिति और प्रलय की दात्री हैं। आप ही विश्वंभर (विष्णु) आदि महापुरुषों को विचित्र रूपों से युक्त करती हैं। 🌹 श्लोक ६ अंब प्रसीद चतुराननवक्त्रपद्म-राजीविहारपरिशीलनराजहंसि। दृष्टस्त्वया सदयमत्र भवेत् स मर्त्यः मूकोऽपि पण्डिततमः स जडोऽपि धीरः॥६॥ अर्थ – हे अंबे! ब्रह्मा के कमलासन रूपी सरोवर में विहार करनेवाली राजहंसी! जिस मनुष्य को आप दयाभाव से देख लें, वह मूक भी महान पण्डित बन जाता है, और मूर्ख भी धीर और विद्वान हो जाता है। 🌹 श्लोक ७ अंब प्रसीद शतमन्युमुखामरात्म-शक्ते त्वदंघ्रिशरणस्य गृहाङ्गणेषु । खेलन्ति सुन्दरदृशो विचरन्ति विप्राः सीदन्ति भूमिपतयोऽवसरप्रतीक्षाः ॥७॥ अर्थ – हे अंबे! इन्द्र आदि देवताओं की आत्मशक्ति! आपके चरणशरण में रहनेवालों के घरों में सुन्दर स्त्रियाँ खेलती हैं, विद्वान ब्राह्मण विचरते हैं, और राजगण भी कृपा पाने के लिए प्रतीक्षा करते हैं। 🌹 श्लोक ८ से आगे पढ़ने के लिए कमेंट बॉक्स मे पढ़े जी... धन्यवाद जी 💐🤝💞💞💞

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Comments (5)

Rohit  Patel

Rohit Patel

Sep 30, 2025

जी राधे जी...ॐ जय अंबे च 🔱🚩🌺📿🙏 धन्यवाद जी 💐🤝💞💞💞

Rohit  Patel

Rohit Patel

Sep 30, 2025

जी रमा जी नमस्कार जी ॐ दूं दुर्गाए नमः 🔱🌺📿🙏 जय वीर बजरंगी 🌺📿🙏 शुभ रात्रि वंदन जी 🌹🙏💞💞💞

Radhe ...💕

Radhe ...💕

Sep 30, 2025

अभिनन्दन 🙏 //जय मां अम्बे//🙏

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Sep 30, 2025

Shri Ram Bhakt Hanuman Ji ki Jai Ho 🙏 Subha Sandhya Vandan 🙏 Jai Siya Ram Ji ki 🌹🙏🌹

Rohit  Patel

Rohit Patel

Sep 30, 2025

🚩हनुमानकृतं श्रीदेवी स्तोत्रम् 🚩 🔱( हिन्दी अर्थ सहित)🔱 🌹 श्लोक १ अम्ब प्रसीद वरदा भव दुःखहन्त्री कामान् ममाशु परिपूरय कामधेनो । अद्यैव मे रिपुगणा विलयं प्रयान्तु वीर्यं जयं च विपुलं च यशः प्रदेहि ॥१॥ अर्थ – हे अंबे! कृपामयी! वर देनेवाली! दुःखों का नाश करनेवाली! आप मेरी मनोकामनाओं को कामधेनु के समान पूर्ण करें। आज ही मेरे शत्रु नष्ट हों। मुझे बल, विजय और अपार यश प्रदान करें। 🌹 श्लोक २ अंब प्रसीद महतीं श्रियमत्र लोके सर्वाधिकां वितरतीमितरानपेक्षम्। संपत्करीं सुखकरीं भवतीमुपास्ते यस्तस्य दुर्लभमिह त्रिदिवेऽपि नास्ति ॥२॥ अर्थ – हे अंबे! प्रसन्न हों। आप समस्त लोकों में श्रेष्ठ, महालक्ष्मीस्वरूपिणी हैं, जो बिना किसी अपेक्षा के सुख और संपत्ति प्रदान करती हैं। जो आपका भजन करता है, उसके लिए इस लोक और स्वर्ग – कहीं भी कोई वस्तु दुर्लभ नहीं रहती। 🌹 श्लोक ३ अंब प्रसीद शतकोटिधरादिदेव-सम्भावितांघ्रियुगले सकलेष्टदात्री । यस्मिन् प्रसीदति मनाग्भवती भवानी धन्यः स एव जगतां च स एव सेव्यः ॥३॥ अर्थ – हे अंबे! आपके चरणों की पूजा शतकोटि इन्द्रादि देवगण करते हैं। आप सब प्रकार की इच्छाओं को पूर्ण करनेवाली हैं। जिस मनुष्य पर आप तनिक भी प्रसन्न हो जाती हैं, वही सच्चा धन्य और पूज्य हो जाता है। 🌹 श्लोक ४ अंब प्रसीद सकृदंबुजनाभवक्षः-क्रीडागृहे कमलवासिनि हेमवर्णे। संपत्तिकल्पलतिके त्वदपांगरेखां ब्रह्मादयोऽपि परिगृह्य भवन्ति धन्याः ॥४॥ अर्थ – हे अंबे! स्वर्णवर्णी! कमल पर विराजमान! जो विष्णु के वक्षःस्थल में क्रीड़ा भवन में निवास करती हैं! आप समृद्धि की कल्पलता हैं। आपकी दृष्टि रेखा जिस पर पड़ जाती है, ब्रह्मादि देवता भी उसे धन्य मानते हैं। 🌹 श्लोक ५ अंब प्रसीद शशिखण्डविभूषणांग-भागस्थिते भवनिहन्त्रि मनोन्मनि त्वम्। या भाति विश्वविलयस्थितिसृष्टिदात्री विश्वंभरादिमहदादिविचित्ररूपा ॥५॥ अर्थ – हे अंबे! चन्द्रमणि से भूषित अंगवाली! संसाररूपिणी! आप ही सृष्टि, स्थिति और प्रलय की दात्री हैं। आप ही विश्वंभर (विष्णु) आदि महापुरुषों को विचित्र रूपों से युक्त करती हैं। 🌹 श्लोक ६ अंब प्रसीद चतुराननवक्त्रपद्म-राजीविहारपरिशीलनराजहंसि। दृष्टस्त्वया सदयमत्र भवेत् स मर्त्यः मूकोऽपि पण्डिततमः स जडोऽपि धीरः॥६॥ अर्थ – हे अंबे! ब्रह्मा के कमलासन रूपी सरोवर में विहार करनेवाली राजहंसी! जिस मनुष्य को आप दयाभाव से देख लें, वह मूक भी महान पण्डित बन जाता है, और मूर्ख भी धीर और विद्वान हो जाता है। 🌹 श्लोक ७ अंब प्रसीद शतमन्युमुखामरात्म-शक्ते त्वदंघ्रिशरणस्य गृहाङ्गणेषु । खेलन्ति सुन्दरदृशो विचरन्ति विप्राः सीदन्ति भूमिपतयोऽवसरप्रतीक्षाः ॥७॥ अर्थ – हे अंबे! इन्द्र आदि देवताओं की आत्मशक्ति! आपके चरणशरण में रहनेवालों के घरों में सुन्दर स्त्रियाँ खेलती हैं, विद्वान ब्राह्मण विचरते हैं, और राजगण भी कृपा पाने के लिए प्रतीक्षा करते हैं। 🌹 श्लोक ८ अंब प्रसीद चतुरंगबलावलेप-दूरीकृतारिनिवहो भवतीप्रसादात्। दीनोप्यनन्यसुलभान् सकलांश्च कामान् लब्ध्वा चिरम् विजयते हि सदारपुत्रः ॥८॥ अर्थ – हे अंबे! आपके प्रसाद से शत्रु दूर हो जाते हैं और चार प्रकार की सेना पर भी विजय मिलती है। आपके शरणागत दीन भक्त भी दुर्लभ सभी कामनाएँ प्राप्त करके सदैव अपने पुत्रों-पौत्रों सहित विजय एवं सुख प्राप्त करते हैं। 🌹 श्लोक ९ अंब प्रसीद सहसा मयि पक्षपातात् कष्टां दशां मम निरीक्ष्य परानपोह्याम्। नो चेत् गतिर्जगति नास्ति निरस्तखेदैः संसेव्यमानचरणांबुरुहे मुनीन्द्रैः ॥९॥ अर्थ – हे अंबे! मेरी दीन दशा देखकर कृपा करके मेरी ओर पक्षपात कीजिए और शत्रुओं का नाश कर दीजिए। यदि आप कृपा न करें, तो इस संसार में मेरे लिए कोई गति नहीं। आपके चरणकमल तो निराश्रय ऋषि-मुनियों का भी शरण हैं। 🌹 श्लोक १० अंब प्रसीद झटिति त्वमुपेक्षसे किं वत्सस्य वाग्विलसतः श्रवणातुरा चेत्। उत्संगसंगिनि शिशौ वचनप्रतीक्षा स्तन्यं निपीय मुदिते तु सुखाय मातुः ॥१०॥ अर्थ – हे अंबे! क्या आप अपने शिशु भक्त की बात सुनने को आतुर नहीं हैं? जैसे गोद में बैठा हुआ बच्चा माँ की ओर देखता है और स्तनपान करके सुखी होता है, वैसे ही मैं भी आपकी कृपा का आकांक्षी हूँ। 🌹 श्लोक ११ अंब प्रसीद दयया त्वरितं भवानी जानासि चेत् हृदयशल्यमिहाविषह्यम्। नो चेत् कथं नु भवती जगतां शरण्या भूयाच्चिराय भवतापसमाश्रितानाम् ॥११॥ अर्थ – हे भवानी! कृपा करके शीघ्र प्रसन्न होइए। आप भलीभाँति जानती हैं कि मेरे हृदय में असह्य पीड़ा है। यदि आप ही कृपा न करें, तो संसार की शरण देनेवाली माँ होकर दीर्घकाल से आपके शरणागत भक्तों की रक्षा कौन करेगा? 🌹 श्लोक १२ अंब प्रसीद जहि शत्रुगणानिमांस्त्वम् अद्यैव देवि परिवर्धय कौतुकं मे। कोऽयं विलंब इह सा क्व गता दया ते दीनावनव्रतमिदं तव किं समाप्तम् ॥१२॥ अर्थ – हे देवी! कृपा करके आज ही मेरे शत्रु-विनाश करो और मेरे हृदय का उल्लास बढ़ाओ। यह विलम्ब क्यों? आपकी दया कहाँ चली गई? क्या दीनों की रक्षा करने का आपका व्रत समाप्त हो गया है? 🌹 श्लोक १३ अंब प्रसीद यदि भृत्यविधेयतायाः साक्षात्भवानि भवतीह जनस्य लक्ष्यम्। कारुण्यपात्रमिममाकलयन्त्यजस्रं धन्यं विधातुमखिलस्य जनस्य मान्यम् ॥१३॥ अर्थ – हे अंबे! यदि आपके सेवक होने का यही लक्षण है कि आप स्वयं सबका लक्ष्य बनें, तो कृपया इस दीन भक्त को अपने करुणा-पात्र के रूप में स्वीकार करें। ताकि मैं भी धन्य और लोकमान्य हो सकूँ। 🌹 श्लोक १४ अंब प्रसीद नियतं क्रियतां भवत्या देवारिवर्गवनपावकतां दधत्या। अस्य प्रमादविवशस्य मनाक् प्रसादः सर्वात्मना यदगतिर्यदनन्यनाथः ॥१४॥ अर्थ – हे अंबे! निश्चित ही आप देवताओं के शत्रुओं का नाश करनेवाली अग्निरूपा हैं। मैं प्रमादवश दुर्बल और अनाथ हूँ। मुझ पर तनिक भी प्रसन्न हो जाइए, क्योंकि मेरे लिए आप ही सब कुछ हैं। 🌹 श्लोक १५ अंब प्रसीद मदनुग्रहसत्वरेण चित्तेन विग्रहवतेव दयाभरेण। आलक्ष्य माममृतशीतलया च दृष्ट्या क्षिप्रं विधेहि परिरंभितभूरिभाग्यम् ॥१५॥ अर्थ – हे अंबे! कृपा करके शीघ्र मेरे ऊपर अनुग्रह करें। आपका हृदय दयामयी है और अमृत के समान शीतल दृष्टि रखता है। मुझ पर दृष्टिपात करके मुझे शीघ्र ही महान सौभाग्य से आलिंगित कर दीजिए। 🌹 श्लोक १६ अंब प्रसीद किमनेन विलंबनेन कार्या त्वरा न हि विलंबमवेक्षते हि। यद्भागधेयमिह ते सुरलोभनीयं सर्वात्मना गिरिसुते त्वदधीन एव ॥१६॥ अर्थ – हे गिरिजे! अब विलंब किसलिए? कृपा करने में विलंब शोभा नहीं देता। क्योंकि भक्त का भाग्य और उसका जीवन-लाभ तो सब कुछ आपके अधीन ही है। और देवता भी उसी की प्राप्ति के लिए लालायित रहते हैं। 🌹 श्लोक १७ अंब प्रसीद परमेण समाधिना मां एकान्तभक्तमवधार्य च चण्डिके त्वं। सौभाग्यसंपदभिपूरमहालवालं उद्वेलवीर्यनिलयं कुरु भूरिभाग्यम् ॥१७॥ अर्थ – हे चण्डिके! आप परमेण समाधि में मुझे एकान्तभक्त मानकर कृपा कीजिए। मुझे ऐसा महान सौभाग्य और सम्पत्ति प्रदान करें जो अपार पराक्रम और शक्ति से पूर्ण हो। 🌹 श्लोक १८ स्तुतवति मारुतौ निहतचण्डमुण्डासुरा सुरासुरनरोरगाद्यखिललोकधात्री शिवा। महामहिषमर्दिनी समवलंब्य दिव्यं वपुः पुरः समभवत्तदा पुरुषमात्र साम्राज्यदा ॥१८॥ अर्थ – जब पवनपुत्र हनुमान ने इस प्रकार स्तुति की, तब चण्ड-मुण्ड का वध कर चुकी, देव–असुर–मनुष्य–नाग आदि सब लोकों की धात्री, महामहिषासुरमर्दिनी शिवा देवी ने दिव्य रूप धारण करके उनके सम्मुख प्रकट होकर उन्हें समस्त मानवों का साम्राज्य प्रदान किया। 🙏 इदम् नमः🙏 यह स्तोत्र पठन करने पर शत्रुनाश, सम्पत्ति, सौभाग्य, यश, और विजय प्राप्त होती है। 🔱🚩🔔🪔🌷🪷🌹🌺🥥📿🙏