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महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ से लौटने के उपरांत दुर्योधन ईर्ष्या से व्याकुल हो उठा था। अपने मातुल शकुनि के साथ दुर्योधन ने अपने पिता महाराज धृतराष्ट्र को चिकनी चुपड़ी बातो में फंसा राजाज्ञा प्राप्त की कि हस्तिनापुर से महामंत्री विदुर द्यूत का निमंत्रण ले इंद्रप्रस्थ जाएँ । यदपि विदुर ने लाख समझाया किन्तु पुत्र मोह में जकड़े वृद्ध नेत्रहीन राजा की बुद्धि में नहीं आया। इंद्रप्रस्थ में महाराज युधिष्ठिर ने दूत विदुर का स्वागत आदि करने के उपरांत उनके आने का उद्देश्य पूछा। विदुर ने बतलाया कि उनके ताऊ ने नई क्रीड़ाशाला का निर्माण करवाया है और आप सभी भाइयो को वहां अमोद प्रमोद हेतु बुलाया है। महाराज युधिष्ठिर द्यूत निमन्त्रणः सुन सकते में आ गए , बोले - हे काकाश्री , द्यूत खेलने से तो कलह हो जाती है। कौन ऐसा बुद्धिमान है जो इसे पसंद करेगा। आप ही हमें सलाह दें क्या करना चाहिए ? विदुर ने हामी भरते हुए कहा - द्यूत अवश्य अनर्थ का मूल है , मैंने भी महाराज धृतराष्ट्र को बहुत समझाया किन्तु उनका हठ है कि तुम अपने समस्त भाइयो और पांचाली समेत वहां अवश्य आओ। अब जो तुम्हे कल्याणकारी लगें तुम करो। महाराज युधिष्ठिर उवाच - हे काकाश्री , वहां सुबल पुत्र शकुनि के अतिरिक्त कौन कौन जुआरी होंगे ? जुए में किस किस वस्तु को दाव पर लगा खेलने का प्रावधान है। विदुर - वहां शकुनि के आलावा चित्रसेन , विम्बिशाति , सत्यव्रत , पुरुमित्र और जय जैसे कुशल जुआरी खेल में भाग लेंगे। विधाता ने कर्मो के अधीन ये संसार बनाया है - जो होना है वो होगा ही। महाराज युधिष्ठिर - मैं निमन्त्रणः अस्वीकार कर नहीं सकता। वहां द्यूत खेलना नहीं चाहता और न खेलूंगा किन्तु यदि उस जुआरी शकुनि ने मुझे ललकारा तो पीछे हट नहीं सकता - क्षत्रिय मर्यादा के अनुसार रण या द्यूत में यदि ललकारा जाएँ तो पीछे हटना श्रेस्कर नहीं होगा। इसलिए कल हम सब हस्तिनापुर चलेंगे। अगले दिन महाराज युधिष्ठिर का सम्पूर्ण लाव लश्कर हस्तिनापुर चला । कौरवो ने उनका भव्य स्वागत किया। अगले दिन क्रीड़ाशाला में शकुनि ने जब महाराज युधिष्ठिर को द्यूत के लिए न्योता दिया तब धर्मराज बोले - जुआ छल और पाप है। ये कोई ध्रुव नीति नहीं। युद्ध से जय प्राप्त करना अधिक श्रेयकर है। आर्य पुरुष मलेच्छ कर्मो से दूर रहते है। इसलिए हे मातुल , इस से हमें दूर रखिए। किन्तु वाक्पटु शकुनि ने शब्दों का ऐसा लच्छेदार जाल फेंका कि धर्मराज के सब तर्क धरे रह गए। अंत में अपने नियमों से बँधे धर्मराज बोले - यदि कोई चुनौती दे तो उस आव्हान से पीछे लौटना मर्यादा नहीं । इसलिए अब इस स्थान पर बैठ ये खेल खेलना ही होगा । दैव बलवान है। दैव वाक़ई में सर्वबलशाली होता है!

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