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🌿 श्रीकृष्ण जन्मोत्सव विशेष: जानिए व्रत, नियम और पौराणिक महत्व! 🦚 भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र का संयोग भगवान श्रीकृष्ण के प्रकटोत्सव को अत्यंत खास बनाता है। इस वर्ष 04 सितंबर को यह पावन पर्व स्मार्त, वैष्णव और निम्बार्क—सभी संप्रदायों द्वारा श्रद्धापूर्वक मनाया जा रहा है। 🙏 ✨ जन्मोत्सव से जुड़ी खास बातें: मोहरात्रि: जन्माष्टमी की रात को 'मोहरात्रि' कहा जाता है। इस रात योगेश्वर का ध्यान करने से संसार की मोह-माया से आसक्ति हटती है। व्रतराज: इस व्रत को सभी व्रतों में उत्तम माना गया है, जिसके सविधि पालन से समस्त कार्य सिद्ध होते हैं। नंद-महोत्सव (दधिकांदौ): जन्मोत्सव के अगले दिन ब्रजमंडल में हल्दी, दही, घी और मक्खन के साथ नंदोत्सव हर्षोल्लास से मनाया जाता है। 📜 निर्णय सिंधु और पुराणों के अनुसार नियम: स्कन्द पुराण और ब्रह्मपुराण के अनुसार, कलियुग में अट्ठाइसवें युग में देवकी नंदन श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ था। यदि अष्टमी तिथि में रोहिणी नक्षत्र का योग हो, तो इसे 'जयंती' योग कहा जाता है, जिसमें उपवास का विशेष पुण्य मिलता है। 🕒 मुहूर्त एवं समय: निशिथ (रात्रि) पूजा का समय: रात 11:55 से 12:41 बजे तक दही हांडी: 05 सितंबर आइए, इस पावन पर्व पर भगवान श्री बांकेबिहारी का स्मरण करें और अपने जीवन को भक्तिमय बनाएं। 🌺

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