
प्रशांत कुमार मिश्रा
17 hours ago
#भूख से तड़पते सात #ऋषि-पुत्रों ने अपने ही गुरु की गाय मारकर श्राद्ध कर दिया! इस पाप और पितृ-भक्ति के प्रभाव से उन्हें पाँच जन्म क्यों लेने पड़े? और एक चींटा-चींटी की गुप्त प्रेम-वार्ता सुनकर राजा क्यों दंग रह गया? जानिए मत्स्य पुराण की यह अलौकिक गाथा ऋषियों ने पूछा — सूतजी! महर्षि कौशिक के वे पुत्र किस प्रकार उत्तम योग को प्राप्त हुए तथा पाँच ही बार जन्म ग्रहण करने से उनके अशुभ कर्मों का विनाश कैसे हुआ? सूतजी कहते हैं — ऋषियो! कुरुक्षेत्र में कौशिक नामक एक धर्मात्मा महर्षि थे। उनके सात पुत्र थे। उन पुत्रों के वृत्तान्त नाम एवं कर्मानुसार बतला रहा हूँ, सुनिये। उनके स्वसृप, क्रोधन, हिंस्र, पिशुन, कवि, वाग्दुष्ट और पितृवर्ती — ये नाम थे। पिता की मृत्यु के पश्चात् वे सभी महर्षि गर्ग के शिष्य हुए। उस समय समस्त लोकों को भयभीत करने वाली महती अनावृष्टि हुई, जिसके कारण भीषण अकाल पड़ गया। इसी बीच वे सभी तपस्वी अपने गुरु गर्गाचार्य की आज्ञा से उनकी सेवा में लग गये। वहाँ वन में वे सभी भूख से अत्यन्त पीड़ित हो गये। जब क्षुधा-शान्ति का कोई अन्य उपाय न सूझा, तब छोटे भाई पितृवर्ती ने श्राद्ध-कर्म करने की सम्मति दी। बड़े भाइयों द्वारा 'अच्छा, ऐसा ही करो' — ऐसी आज्ञा पाकर पितृवर्ती ने समाहित-चित्त होकर श्राद्ध का उपक्रम आरम्भ किया। उस समय उसने छोटे-बड़े के क्रम से दो भाइयों को देव-कार्य में, तीन को पितृकार्य में और एक को अतिथि रूप में नियुक्त किया तथा स्वयं श्राद्धकर्ता बन गया। इस प्रकार पितृपरायण पितृवर्ती ने पितरों का स्मरण करते हुए मन्त्रोच्चारणपूर्वक श्राद्धकार्य सम्पन्न किया। कालक्रमानुसार मृत्यु के उपरान्त श्राद्धवैगुण्यरूप कर्मदोष से वे सभी दाशपुर यानी मन्दसौर नामक नगर में बहेलिया होकर उत्पन्न हुए, किंतु पितृ-स्नेह अर्थात श्राद्धकृत्य से भावित होने के कारण उन्हें पूर्वजन्म के वृत्तान्तों का स्मरण बना रहा। पूर्वजन्म के कर्मों के परिणाम-स्वरूप वे क्रूरकर्मी बहेलियों के घर में पैदा तो हुए, परंतु पितरों के ही माहात्म्य से वे सभी जातिस्मर यानी पूर्वजन्म के वृत्तान्तों के ज्ञाता बने ही रहे। पुनः श्राद्ध-कर्म के फल से वैराग्य उत्पन्न हो जाने के कारण उन सभी ने अनशन करके अपने-अपने उस शरीर का त्याग कर दिया। तदनन्तर वे सातों कालञ्जर पर्वत पर भगवान् नीलकण्ठ के समक्ष मृग-योनि में उत्पन्न हुए। वहाँ भी पितरों के स्नेह से अनुभावित होने के कारण वे जातिस्मर बने ही रहे। उस योनि में भी ज्ञान और वैराग्य उत्पन्न हो जाने के कारण उन लोगों ने तीर्थ-स्थान में अनशन करके लोगों के देखते-देखते धर्मपूर्वक प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। तत्पश्चात् उन सातों योगाभ्यासी जनों ने मानसरोवर में चक्रवाक की योनि में जन्म धारण किया। द्विजवरो! अब आप लोग नाम एवं कर्मानुसार उन सभी का वृत्तान्त श्रवण कीजिये। इस योनि में उनके नाम हैं — सुमना, कुमुद, शुद्ध, छिद्रदर्शी, सुनेत्रक, सुनेत्र और अंशुमान्। ये सातों योग के पारदर्शी थे। इनमें से अल्पबुद्धि वाले तीन तो योग से भ्रष्ट हो गये और इधर-उधर भ्रमण करने लगे। उसी समय एक पाञ्चालवंशी नरेश, जो महान् बल और पराक्रम से सम्पन्न था तथा जिसके पास अधिक-से-अधिक सेना और वाहन थे, अपने क्रीडोद्यान में स्त्रियों के साथ अनेकविध हाव-भावों से क्रीडा कर रहा था। उस शोभाशाली राजा को देखकर उन जलपक्षियों में से एक को, जो पितृभक्त श्राद्धकर्ता पितृवर्ती नामक ब्राह्मण था, राज्य-प्राप्ति की आकाङ्क्षा उत्पन्न हो गयी। इसी प्रकार दूसरे दोनों ने राजा के दो मन्त्रियों को प्रचुर सेना और वाहनों से युक्त देखकर इस मृत्युलोक में मन्त्रि-पद प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। द्विजवरो! उनमें जो चार निष्काम थे, वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। उन तीनों में से पहला राजा विभ्राजक के पुत्र रूप में ब्रह्मदत्त नाम से विख्यात हुआ तथा अन्य दो कण्डरीक और सुबालक नाम से मन्त्री के पुत्र हुए। राजा विभ्राजक की मृत्यु के उपरान्त विद्वान् पुरोहित ने ब्रह्मदत्त को राज्य पर अभिषिक्त कर दिया। वह पाञ्चाल-नरेश ब्रह्मदत्त प्रबल पराक्रमी, सभी शास्त्रों में प्रवीण, योगज्ञ और सभी जन्तुओं की बोली का ज्ञाता था। देवल की सुन्दरी कन्या, जो संनति नाम से विख्यात थी, राजा ब्रह्मदत्त की पत्नी हुई। वह ब्रह्मवादिनी थी। उस पत्नी क

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