
Srikumar महाराज🇮🇳☸️
76 days ago
।। चारों युगों का विस्तृत वर्णन।। युग का अर्थ होता है एक निर्धारित संख्या के वर्षों की काल-अवधि। उदाहरणः कलियुग, द्वापर, सत्ययुग, त्रेतायुग आदि। युग वर्णन का अर्थ होता है कि उस युग में किस प्रकार से व्यक्ति का जीवन, आयु, ऊँचाई होती है एवं उनमें होने वाले अवतारों के बारे में सत्ययुग पूर्ण आयु - १७,२८,००० मनुष्य की आयु - १,००,००० लम्बाई - ३२ फिट (लगभग) [ २१ हाथ ] तीर्थ - पुष्कर पाप - ० विश्वा पुण्य - २० विश्वा अवतार – मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह ( सभी अमानवीय अवतार हुए ) कारण – शंखासुर का वध एंव वेदों का उद्धार, पृथ्वी का भार हरण, हरिण्याक्ष दैत्य का वध, हिरण्यकश्यपु का वध एवं प्रह्लाद को सुख देने के लिए। मुद्रा – रत्नमय पात्र – स्वर्ण का त्रेतायुग पूर्ण आयु - १२,९६,००० मनुष्य की आयु - १०,००० लम्बाई - २१ फिट (लगभग) [ १४ हाथ ] तीर्थ - नैमिषारण्य पाप - ५ विश्वा पुण्य - १५ विश्वा अवतार – वामन, परशुराम, राम (राजा दशरथ के घर) कारण – बलि का उद्धार कर पाताल भेजा, मदान्ध क्षत्रियों का संहार, रावण-वध एवं देवों को बन्धनमुक्त करने के लिए। मुद्रा – स्वर्ण पात्र – चाँदी का द्वापरयुग पूर्ण आयु - ८,६४,००० मनुष्य की आयु - १,००० लम्बाई - ११ फिट (लगभग) [ ७ हाथ ] तीर्थ - कुरुक्षेत्र पाप - १० पुण्य - १० अवतार – कृष्ण, (देवकी के गर्भ से एंव नंद के घर पालन-पोषण)। कारण – कंसादि दुष्टो का संहार एंव गोपों की भलाई, दैत्यो को मोहित करने के लिए। मुद्रा – चाँदी पात्र – ताम्र का कलियुग पूर्ण आयु - ४,३२,००० मनुष्य की आयु - १०० लम्बाई - ५.५ फिट (लगभग) [३.५० हाथ] तीर्थ - गंगा पाप - १५ पुण्य - ५ अवतार – कल्कि (ब्राह्मण विष्णु यश के घर)। कारण – मनुष्य जाति के उद्धार अधर्मियों का विनाश एंव धर्म कि रक्षा के लिए। मुद्रा – लोहा पात्र – मिट्टी का चौरासी लाख योनियों की व्यवस्था ८४ लाख योनि व्यवस्था कुछ इस प्रकार है जलचर जीव - ९ लाख वृक्ष - २७ लाख कीट (क्षुद्रजीव) - ११ लाख पक्षी - १० लाख जंगली पशु - २३ लाख मनुष्य - ४ लाख ।। जय महामाई।।

Comments (3)

Srikumar महाराज🇮🇳☸️
Jun 15, 2026
आपकी सामान्य जानकारी से मैं बहुत प्रभावित हूँ, यह बहुत अच्छी है। साझा करने के लिए धन्यवाद प्रिय। 🙏

Rama Devi Sahu
Jun 15, 2026
यह पंक्ति भगवान विष्णु के दिव्य स्वरूप और उनकी करुणा का वर्णन करती है। अर्थ: “गरुड़ चढ़े नारायण, पीताम्बर सोहे गात” का मतलब है कि भगवान नारायण गरुड़ पर विराजमान हैं और उनके शरीर पर पीले वस्त्र (पीताम्बर) अत्यंत शोभा दे रहे हैं। “दीनबन्धु दुख भंजना, जन के हैं पितु मात” का अर्थ है कि भगवान विष्णु दीन-दुखियों के सच्चे मित्र हैं, उनके कष्टों को दूर करने वाले हैं और अपने भक्तों के लिए माता-पिता के समान स्नेह एवं संरक्षण देने वाले हैं। सरल शब्दों में: भगवान विष्णु अपने भक्तों पर अपार करुणा बरसाते हैं। वे दुखों को दूर करके उनका पालन-पोषण और संरक्षण माता-पिता की तरह करते हैं। 🙏🕉️✨जय श्री नारायण✨🕉️🙏

