
Srikumar महाराज🇮🇳☸️
88 days ago
श्री जगन्नाथ मंदिर की कथा भगवान् का दारु-विग्रह और रथयात्रा की उत्पत्ति बहुत समय पहले की बात है, उत्कल (ओडिशा) के राजा इंद्रद्युम्न भगवान् विष्णु के अनन्य भक्त थे और उनकी एक परम-मनमोहक प्रतिमा के दर्शन के लिए व्याकुल थे। राजा निराश हुए, लेकिन भगवान् ने उन्हें समुद्र से एक विशेष दारु (लकड़ी) प्राप्त करने का निर्देश दिया। एक रहस्यमयी बूढ़े शिल्पकार (स्वयं विश्वकर्मा) ने 21 दिनों में प्रतिमा बनाने का काम लिया, इस शर्त पर कि काम पूरा होने तक कोई भी अंदर न आए। अधीर राजा ने दरवाजा पहले ही खोल दिया, जिससे शिल्पकार अंतर्ध्यान हो गया और प्रतिमाएँ अधूरी रह गई। तब भगवान् ने उन्हें इन्हीं रूपों में स्थापित करने का निर्देश दिया। राजा इंद्रद्युम्न ने एक विशाल मंदिर का निर्माण करवाया और इन्हीं अनोखे, अपूर्ण दारु-विग्रहों को वहाँ स्थापित किया, जहाँ वे आज भी पूजे जाते हैं। संघ उन्होंने अपने प्रधान मंत्री विद्यापति को नीलाचल पर्वत पर भगवान् विष्णु के नीलमाधव रूप की खोज के लिए भेजा। विद्यापति ने शबर (आदिवासी) जाति के मुखिया की बेटी से विवाह और उसकी सहायता से गुप्त रूप से नीलमाधव के दर्शन किए। लेकिन राजा के पहुँचने से पहले ही भगवान् नीलमाधव अंतर्ध्यान हो गए। यह मंदिर अपनी अनूठी परंपराओं और भव्य रथयात्रा के लिए क्श्वि प्रसिद्ध है, जिसमें भगवान् स्वयं भक्तों के बीच बाहर आते हैं। यह उनकी अमरता का प्रमाण है। रथयात्रा की उत्पत्ति का एक कारण यह भी माना जाता है कि भगवान् ने अपने अधूरी-निर्मित रूपों को भक्तों को बाहर दिखाने का वचन दिया था। संघ

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