
Rama Devi Sahu
35 days ago
जब भगवान जगन्नाथ के पेट में दर्द हुआ और राजा को खुद माँगनी पड़ी एक बूढ़ी माँ से माफी! मंदिर में सुगंध ऐसी फैल रही थी जैसे पूरा जगन्नाथ धाम प्रेम से महक उठा हो। ढोल-नगाड़ों की गूंज, हवा में उठती तुलसी-घी की महक और भक्तों की जय-जयकार… सब कुछ दिव्य था। ✨ पर इस भीड़ के बीच खड़ी एक बूढ़ी माँ का दिल अजीब सी बेचैनी से भरा था। वह रोज़ मंदिर आती थी और भगवान जगन्नाथ को अपने साक्षात बेटे की तरह देखती थी—एक माँ का स्नेह, एक माँ की चिंता। उसके मन में बार-बार एक ही बात घूम रही थी— “मेरे लाल को रोज़ इतना छप्पन भोग खिलाया जाता है… कहीं मेरे बच्चे का कोमल पेट खराब न हो जाए।” 🥺 🌿 माँ की ममता और नीम का चूर्ण उस दिन शाम ढलते ही उसने अपने झोपड़े में बैठकर नीम की पत्तियाँ सुखाईं, पीसीं और बड़ी ममता से एक चूर्ण बनाया—बिल्कुल वैसे, जैसे कोई माँ अपने बीमार बच्चे की दवा तैयार करती है। रात में वह मंदिर पहुँची, ताकि भीड़ कम हो और वह शांति से अपने 'बेटे' को दवा दे सके। 🛑 द्वारपाल का अहंकार और माँ के आँसू लेकिन मंदिर के द्वार पर पहरा दे रहे द्वारपाल ने उसे कठोर आवाज़ में रोका— "रात में प्रवेश वर्जित है!" इससे पहले कि बूढ़ी माँ कुछ समझा पाती, द्वारपाल ने उसके हाथ से नीम का चूर्ण छीनकर ज़मीन पर फेंक दिया। नीम का पाउडर हवा में उड़ा… और बूढ़ी माँ की आँखों से आँसू बरस पड़े। वह पत्थर की सीढ़ियों पर बैठकर सिसकने लगी— "मेरे जगन्नाथ को दवा कौन देगा? कौन देखेगा मेरा बेटा रात को?" 😭 उसकी सिसकियाँ मंदिर की दीवारों से टकराकर सीधे आसमान तक पहुँच गईं। 👑 राजा का सपना और भगवान की पीड़ा उस रात पुरी के महाराजा भी सो नहीं सके। अचानक उन्हें एक विचित्र और डरावना सपना आया। सपने में भगवान जगन्नाथ स्वयं उनके सामने थे—चेहरे पर दर्द, आँखों में करुणा। प्रभु ने राजा से कहा— "राजन! आज मेरा पेट दुख रहा है। मेरी माँ मेरे लिए दवा लेकर आई थी, लेकिन तुम्हारे द्वारपाल ने उसे अपमानित कर लौटा दिया। क्या एक बेटे का दर्द तुम नहीं समझ सके?" राजा पसीने से भीगे हुए, भय से काँपते हुए उठे। उन्हें लगा जैसे सच में भगवान पीड़ा से तड़प रहे हों। 🏃♂️ क्षमा याचना और नई परंपरा का जन्म सुबह होते ही राजा बिना किसी की प्रतीक्षा किए घोड़े पर सवार होकर उसी बूढ़ी माँ की झोपड़ी की ओर भागे। माँ चूल्हे के पास बैठी सूखी आँखों से राख कुरेद रही थी। राजा ने पहुँचते ही उस गरीब माँ के चरणों में गिरकर कहा— "माँ, मेरा अपराध क्षमा करो! भगवान ने स्वयं मुझे आदेश दिया है। तुम्हारा नीम चूर्ण मेरे प्रभु को अभी चाहिए।" बूढ़ी माँ स्तब्ध रह गई। जिस माँ की बात रात में किसी ने नहीं सुनी, उसके आँसू अब मानो भगवान ने खुद पोंछ दिए थे। 💖 राजा ने उससे नया नीम चूर्ण बनवाया। माँ ने उतनी ही ममता से फिर से पत्तियाँ पीसीं। जब वह चूर्ण मंदिर पहुँचा, तो पुजारियों ने पहली बार छप्पन भोग के बाद जगन्नाथ जी को वह औषधि अर्पित की। मंदिर में जैसे एक दिव्य महक फैल गई—एक माँ के प्रेम की, उसकी पीड़ा की, उसकी पूजा की। 🌺 ✨ कहते हैं, उसी दिन से पुरी के मंदिर में भगवान जगन्नाथ को हर रोज़ छप्पन भोग के बाद नीम का चूर्ण खिलाने की परंपरा शुरू हो गई। क्योंकि दुनिया के लिए वो भले ही ब्रह्मांड के नायक हों, लेकिन एक माँ के लिए वो सदैव उसके छोटे से बच्चे ही रहते हैं। ❤️ 🙏 जय श्री राधे कृष्णा 🚩 🌺 जय जगन्नाथ 🌺 🙏🌹⭕‼️⭕🌹🙏

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