
प्रशांत कुमार मिश्रा
2 days ago
(द्वितीय प्रसारण/१७८५) ********************************** 🙏 *श्रीराम–जय राम–जय जय राम*🙏 ********************************** 🌞 *श्रीरामचरितमानस* 🌞 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 *पंचम सोपान* *सुन्दरकाण्ड* *दोहा संख्या ०६* *(अर्धाली सं० ७, ८ एवं दोहा)* *विभीषणजी श्रीहनुमानजी से पूछते हैं कि*– *की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई ।* *मोरें हृदय प्रीति अति होई ॥७॥* *की तुम्ह रामु दीन अनुरागी ।* *आयहु मोहि करन बड़भागी ॥८॥* अर्थ– क्या आप हरिभक्तों में से कोई हैं क्योंकि आपको देखकर मेरे हृदय में अत्यन्त प्रेम उमड़ रहा है अथवा क्या आप दीनों से प्रेम करने वाले स्वयं श्रीरामजी ही हैं जो मुझे बड़भागी बनाने (घर-बैठे दर्शन देकर कृतार्थ करने) आये हैं? ।। दोहा ।। *तब हनुमंत कही सब, राम कथा निज नाम ।* *सुनत जुगल तन पुलक मन, मगन सुमिरि गुन ग्राम ॥६॥* अर्थ– तब हनुमान्जी ने श्रीरामचन्द्रजी की सारी कथा कहकर अपना नाम बताया। सुनते ही दोनों के शरीर पुलकित हो गये और श्रीरामजी के गुण समूहों का स्मरण करके दोनों के मन (प्रेम और आनन्द में) मग्न हो गये। 🌺🌺 *व्याख्या*🌺🌺 👉 _*'की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई ।...'*_– (क) लंका में किसी ब्राह्मण का सकुशल प्रवेश करना असम्भव प्रतीत कर और उनको ब्राह्मणवेष में देखकर संशयात्मक प्रश्न करते हैं। *'हरिदासन्ह महुँ कोई'* का भाव यह है कि हरिदास नारदादि समर्थ हैं और सर्वत्र विचरते रहते हैं, अतएव हो सकता है कि आप उन्हीं में से कोई हो, जो वेष बदलकर यहाँ दर्शन देने आये हैं। (ख) *'मोरे हृदय प्रीति अति होई'*– यह हरिदास समझने का कारण बताया। जिसे देखकर हृदय में स्वतः स्वाभाविक सात्विक प्रीति उत्पन्न हो, उसे हरिदास जानना चाहिये। जो उत्तम हरिदास होते हैं उनके दर्शन से उनके प्रति अत्यन्त प्रीति स्वतः हो जाती है। 👉 _*की तुम्ह रामु दीन अनुरागी ।*_– जिस भाँति रूप बदलने पर खल नहीं छिपते, उसी भाँति रूप बदलने पर साधु भी नहीं छिपते। यथा– *'किएहु कुबेष साधु सनमानू । जिमि जग जामवंत हनुमानू ॥'* यद्यपि हनुमानजी ने विप्र रूप धारण किया है, फिर भी उनकी महिमा परम भागवत विभीषणजी से छिपी नहीं रही। वे प्रश्न करते हैं कि या तो आप हरिदास हैं या स्वयं हरि हैं प्रमाण में विभीषणजी अपने अंतःकरण प्रवृत्ति को ही देते हैं कि *'मोरे हृदय प्रीति अति होई' ।* भाव यह है कि जैसी प्रीति मुझे आप पर हो रही है, वैसी सिवाय हरिदास या हरि के और कहीं नहीं होती। भावार्थ यह है कि विभीषणजी ने श्रीहनुमानजी को आनन्द में भीगे हुए तीन रूपों में देखा। प्रारम्भ में विप्र रूप में देखा अतः पूछा– *'विप्र कहहु निज कथा बुझाई'*, मध्य में सन्त जानकर पूछा कि– *'की तुम्ह हरिदासन्ह महुँ कोई'* और अन्त में अपना स्वामी राम जानकर पूछा कि– *की तुम्ह राम..'*। 👉 _*तब हनुमंत कही सब राम कथा...'*_ – विभीषणजी ने तो इनसे इनकी कथा पूछी थी और इन्होंने राम कथा कही, अपनी कथा क्यों नहीं कही? उत्तर– क्योंकि राम कथा के भीतर इनकी कथा भी है। रामकथा के कहते समय कथा के सम्बन्ध आने पर अपना परिचय, यहाँ आने का उद्देश्य आदि कहा। 🙏🙏 रामचरित के कथन और श्रवण से पुलकित और आनन्दित होना रामचरण अनुरागियों का लक्षण है। जिनको ऐसा होता है वे सुकृती माने गये हैं और जिनको नहीं होता उनका जन्म व्यर्थ माना जाता है। *श्रीहनुमानजी एवं विभीषणजी की भेंट* ********************************* मानस-हंस— श्रीहनुमानजी एवं विभीषणजी की मुलाकात के विषय में मतभेद हैं। अध्यात्म रामायण एवं वाल्मीकीय रामायण दोनों में इनकी मुलाकात का कोई वर्णन नहीं है। इस मुलाकात के विषय में दो प्रश्न होते हैं– (१) मुलाकात का प्रमाण और (२) उसका प्रयोजन। (१) प्रमाण– (क) *'विभीषणगृहं त्यक्त्वा सर्वं भस्मीकृतं पुरम्'* (अ० रा० ५/४/४४) और *'वर्जयित्वा महातेजा विभीषणगृहं प्रति'* (वाल्मी० ५/५४/१६), इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि हनुमानजी को विभीषण का महल परिचित था। (ख) आगे चलकर यह उल्लेख मिलता है– *'राज्यं प्रार्थयमानस्तु बुद्धिपूर्वमिहागतः । एतावत्तु पुरस्कृत्य युज्यते तस्य संग्रहः ॥'* (वाल्मी० ६/१७/६७), ध्यान में रहे यह उल्लेख उस समय का है जबकि विभीषणजी रामजी की शरण में आये थे और उनको स्वीकार करने के लिये श्रीराम-लक्ष्मणजी के अतिरिक्त बाकी सब प्रतिकूल थे और केवल एक हनुमानजी ही उनकी सिफारिश जोरों से कर रहे थे। इससे स्पष्ट होता है कि विभीषणजी का हृदगत उन्हें पूरा-पूरा विदित था। यह कोई कह नहीं सकता कि दूसरे से पूछताछ करने पर उन्हें वह मालूम हुआ था, क्योंकि एक तो यह कि हनुमानजी गुप्त दूत थे; इस कारण उनके लिये वैसा करना बिल्कुल ही असम्भव था और दूसरी बात यह है कि इ

Comments (2)

सविता
Sep 12, 2026
jai shree ram ji ki 🙏🌹

Rama Devi Sahu
Sep 12, 2026
नेत्र बंद कर ध्यान धर, छोड़ सकल अभिमान। राम भाव में जो ढला, वही हुआ गुणवान॥ #Ram #shriram 🙏🏹 Jai Shree Ram 🙏🏹
