
Rama Devi Sahu
4 days ago
एक लाख श्लोकों का महाभारत अधूरा न रह जाए, इसके लिए भगवान गणेश ने अपने ही शरीर के किस अंग की बलि देकर उसे स्याही में डुबो दिया था? महर्षि कृष्ण द्वैपायन (वेदव्यास) ने अपने तपोबल और दिव्य ज्ञान से संपूर्ण ब्रह्मांड के रहस्यों, धर्म, नीति और कुरुवंश के महायुद्ध को समेटे हुए एक विशाल महाकाव्य—'जय' (महाभारत) की रचना अपने मन में कर ली थी परंतु समस्या यह थी कि यह ग्रंथ इतना विशाल (एक लाख श्लोकों वाला) और गूढ़ था कि पृथ्वी पर ऐसा कोई साधारण मनुष्य या विद्वान नहीं था, जो महर्षि के मुख से निकलते श्लोकों की गति के साथ उसे लिपिबद्ध (लिख) सके। व्यास जी ने ब्रह्मा जी से प्रार्थना की। ब्रह्मा जी ने कहा: महर्षि! संपूर्ण चराचर जगत में केवल बुद्धि के अधिपति भगवान श्री गणेश ही ऐसे हैं, जिनकी बुद्धि की गति आपके विचारों से भी तीव्र है। आप उन्हीं से इस महाकाव्य को लिखने का निवेदन कीजिए व्यास जी ने भगवान गणेश का ध्यान किया। गजानन प्रकट हुए। महर्षि ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की:हे विघ्नहर्ता! मैंने धर्म की रक्षा के लिए एक महाग्रंथ की रचना की है। कृपा करके आप मेरे इस काव्य के लेखक बनिए बाल गणेश मुस्कुराए, परंतु उन्होंने व्यास जी के सामने एक अत्यंत कठिन शर्त रख दी: महर्षि, मुझे लिखना स्वीकार है। परंतु मेरी एक शर्त है—मेरी लेखनी (कलम) एक बार चलना शुरू करेगी, तो वह बीच में एक क्षण के लिए भी नहीं रुकनी चाहिए। यदि आप श्लोक बोलते समय एक पल के लिए भी रुके या थके, तो मैं उसी क्षण लिखना छोड़कर सदा के लिए चला जाऊँगा! व्यास जी जानते थे कि लगातार एक लाख श्लोक बिना रुके बोलना असंभव है। उन्हें बीच में सोचने और विश्राम का समय चाहिए था। अतः महर्षि ने भी गणेश जी की बुद्धि को परखते हुए एक चतुर प्रति-शर्त रखी:हे गजानन! मुझे आपकी शर्त स्वीकार है। परंतु मेरी भी एक प्रार्थना है—मैं जो भी श्लोक बोलूँगा, आप उसका गूढ़ अर्थ पूरी तरह समझे बिना उसे अपने पन्नों पर नहीं लिखेंगे। जब आप अर्थ समझ जाएँ, तभी उसे लिपिबद्ध करेंगे। गणेश जी ने हंसकर सहमति दे दी। इस प्रकार जब भी व्यास जी को विश्राम चाहिए होता, वे एक अत्यंत गूढ़, कूट (जटिल) श्लोक बोल देते। जब तक गणेश जी उस श्लोक के गहरे आध्यात्मिक अर्थ का विश्लेषण करते, तब तक व्यास जी अगले सौ श्लोकों की रचना अपने मन में कर लेते थे। हिमालय की शांत कंदरा में लेखन का महायज्ञ प्रारंभ हुआ व्यास जी तीव्र गति से श्लोक बोलते जा रहे थे और गणेश जी बिजली की कौंध की तरह अपनी मोरपंख और नरकट की लेखनी (कलम) से भोजपत्रों पर लिखते जा रहे थे हफ्तों बीत गए। लेखन की गति इतनी प्रचंड थी कि अचानक एक दिन घर्षण और तीव्र दबाव के कारण गणेश जी की वह दिव्य लेखनी बीच में से चटककर टूट गई चारों ओर सन्नाटा छा गया व्यास जी का श्लोक हवा में तैर रहा था। गणेश जी की स्वयं की शर्त थी कि कलम रुकनी नहीं चाहिए—यदि कलम रुकी, तो ग्रंथ अधूरा रह जाता और महाकाव्य का संकल्प खंडित हो जाता नयी लेखनी लाने या बनाने का समय नहीं था; एक सेकंड का विलंब भी शर्त को तोड़ सकता था उसी क्षण गणेश जी ने वह किया जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी: उन्होंने बिना एक क्षण गंवाए, अपने बाएं हाथ से अपने मुख का दाहिना हाथी-दांत पकड़ा, और पूरी शक्ति से उसे उखाड़कर अपने मुख से अलग कर दिया गणेश जी के मुख से रक्त की बूंदें छलकीं, परंतु उनके चेहरे पर दर्द का एक शिकन तक न आया। उन्होंने उस टूटे हुए नुकीले दांत को तुरंत स्याही में डुबोया और उसी गति से भोजपत्र पर लिखना जारी रखा! व्यास जी ने जब गणेश जी के इस अलौकिक त्याग और ज्ञान के प्रति निष्ठा को देखा, तो वे नतमस्तक हो गए। उन्होंने अश्रुपूर्ण नेत्रों से गणेश जी की स्तुति की गणेश जी ने अपने टूटे हुए दांत से पूरे महाभारत ग्रंथ के अंतिम श्लोक तक की रचना को लिपिबद्ध किया। उस दिन के बाद से संपूर्ण ब्रह्मांड में भगवान गणेश का एक दांत आधा रह गया, और वे सदैव के लिए 'एकदंत' (एक दांत वाले) के पावन नाम से विख्यात हो गए। !! जय श्री #गणेश!! !! जय श्री #कृष्णा!!
Comments (2)

Rama Devi Sahu
Sep 16, 2026
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा माता तेरी पार्वती पिता महादेवा ॐ गं गणपतए नमः 🙏🌹 आप को शुभ रात्रि वंदन 🌹🌹

Rakesh Kumar
Sep 16, 2026
good night ji 🙏
