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सांसारिक ज्योतिष में ग्रहण का प्रभाव: ग्रहण की दृश्यता और राशि का नियम — 1. ग्रहण की दृश्यता — पहला और महत्वपूर्ण नियम जिस देश या क्षेत्र में ग्रहण दिखाई देता है, उसे प्राथमिक क्षेत्र माना जाता है लेकिन किसी जगह ग्रहण का दिखाई नहीं देने का अर्थ बिल्कुल ही प्रभावहीन होना नहीं है इसके लिए दूसरा नियम देखें। 2. ग्रहण की राशि और डिग्री — दूसरा महत्पूर्ण नियम ग्रहण जिस राशि और डिग्री पर होता है, उससे संबंधित देशों/क्षेत्रों को देखा जाता है। पारंपरिक ज्योतिष में राशियों और देशों के बीच sign-country correspondences का उपयोग किया जाता था। टॉलेमी ने इसी सिद्धांत से संबंधित देशों और शहरों को ग्रहण के प्रभाव-क्षेत्र में रखने की बात कही है। कोई भी ग्रहण जो मकर राशि में पड़ती है अपनी शक्ति अनुसार भारत को प्रभावित करेगी फिर चाहे भले ही ग्रहण भारत में दिखाई दे या ना दे क्योंकि सांसारिक ज्योतिष में भारत की राशि मकर मानी गई है, यह राशि किसी देश की स्वतंत्रता प्राप्त करने की तिथि के आधार पर निर्मित चार्ट में लग्न और राशि से भिन्न है। 3. ग्रहण की कुंडली के कोण — तीसरा नियम ग्रहण के समय ASC, MC, DSC और IC की स्थिति महत्वपूर्ण मानी जाती है। जिस स्थान की mundane chart में ग्रहण या उससे संबंधित ग्रह किसी किसी कोण पर आते हैं, उस स्थान को अधिक महत्व दिया जाता है। अर्थात एक ही ग्रहण अलग-अलग देशों में अलग strength से पढ़ा जा सकता है।

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