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Rama Devi Sahu

23 days ago

सृष्टि की रचना के समय जब केवल सगुण-निर्गुण रूपी परब्रह्म (शिव और शक्ति) ही व्याप्त थे, तब जगत् के कल्याण और सृष्टि के सुचारु संचालन के लिए भगवान शिव ने अपने वामांग से साक्षात भगवान श्रीविष्णु को प्रकट होने को कहा: "हे जनार्दन! तुम इस सृष्टि का पालन और संरक्षण करो। परंतु सृष्टि की रचना और जीवों के कल्याण के लिए तुम्हें अति कठोर तपस्या करनी होगी, जिससे तुम्हें अलौकिक शक्ति और आनंद की प्राप्ति हो भगवान विष्णु ने अत्यंत नम्रतापूर्वक पूछा कि तपस्या के लिए इस संपूर्ण ब्रह्मांड में सबसे पवित्र और शांत स्थल कौन-सा है? तब महादेव ने अपनी प्रिय नगरी 'अविमुक्त क्षेत्र' (काशी) की ओर संकेत किया, जो उस समय भगवान शिव के त्रिशूल के अग्रभाग पर टिकी हुई थी और त्रिगुणों (सत्व, रज, तम) से परे थी। भगवान विष्णु काशी में पधारे। वहाँ चारों ओर अलौकिक शांति थी। तपस्या शुरू करने से पूर्व स्नान, आचमन और जल-तर्पण हेतु जल की आवश्यकता थी भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र को उठाया और भूमि पर प्रहार करके एक अत्यंत विशाल, गोल और सुंदर कुण्ड खोदा क्योंकि यह कुण्ड भगवान विष्णु के चक्र द्वारा निर्मित हुआ था, इसलिए इसका नाम 'चक्रपुष्करिणी' पड़ा इसके पश्चात भगवान विष्णु उस कुण्ड के तट पर पद्मासन लगाकर विराजमान हो गए और ५०,००० वर्षों तक बिना जल और अन्न के अत्यंत कठोर तपस्या में लीन हो गए। भगवान विष्णु की तपस्या इतनी उग्र और अलौकिक थी कि उनके दिव्य शरीर से अपार तेज और ऊर्जा निकलने लगी। उस अखंड तपस्या के प्रभाव से श्रीविष्णु के श्रीअंगों (शरीर) से अमृत तुल्य सुगंधित स्वेद (पसीना) की धाराएँ बहने लगीं। वह पसीना इतना अधिक था कि भगवान चक्रपाणि द्वारा खोदा गया पूरा चक्रपुष्करिणी कुण्ड उनके अपने ही पसीने के जल से लबालब भर गया उस जल में दिव्य कमल खिल उठे और संपूर्ण काशी क्षेत्र भगवान विष्णु के तपोबल की दिव्य सुगंध से महक उठा उस कुण्ड का जल साधारण जल नहीं, बल्कि साक्षात भगवान विष्णु के दिव्य तपोबल का रस (स्वेद) है। भगवान विष्णु के इस उग्र और निश्छल तप को देखकर साक्षात भगवान शिव और माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुए। वे अपने गणों के साथ चक्रपुष्करिणी कुण्ड के तट पर प्रकट हुए जब श्रीविष्णु ने अपने नेत्र खोले, तो सामने देवों के देव महादेव और जगज्जननी जगदम्बा को पाया। अत्यंत हर्षित होकर भगवान विष्णु ने मस्तक झुकाया और शिव जी की स्तुति की। विष्णु जी की भक्ति और तपस्या देखकर भगवान शिव अत्यंत आनंदित हुए। प्रसन्नता के अतिरेक में जब शिव जी ने प्रेम से अपना मस्तक हिलाया, तब उनके दाहिने कान में पहना हुआ रत्नजटित स्वर्ण कुण्डल (मणि और कान का गहना/कर्णिका) टूटकर भगवान विष्णु द्वारा बनाए गए उसी चक्रपुष्करिणी कुण्ड में जा गिरा। तब भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए कहा: "हे अच्युत! आपके तपस्या रूपी पसीने से भरा यह चक्रपुष्करिणी कुण्ड अत्यंत पवित्र है। आज इसमें मेरे कान का रत्नजटित आभूषण (मणि-कर्णिका) गिरा है, इसलिए आज से यह तीर्थ इस संसार में 'मणिकर्णिका' के नाम से विख्यात होगा। भगवान शिव ने उस समय चक्रपुष्करिणी (मणिकर्णिका) तीर्थ को तीन मुख्य वरदान दिए, जो नारद पुराण में वर्णित हैं: जो भी प्राणी मणिकर्णिका कुण्ड में स्नान करके भगवान विष्णु और शिव का पूजन करेगा, उसे कभी नरक का मुंह नहीं देखना पड़ेगा। मणिकर्णिका के तट पर पितरों के निमित्त किया गया पिण्डदान और तर्पण अक्षय (कभी न समाप्त होने वाला) फल प्रदान करेगा। जो भी मनुष्य मणिकर्णिका तट पर अपने प्राण त्यागेगा, साक्षात महादेव उसके कान में 'राम' नाम रूपी तारक-मंत्र का उपदेश देकर उसे जन्म-मरण के चक्र से सदा के लिए मुक्त (मोक्ष) कर देंगे। !! जय श्री कृष्णा!!

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