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Rama Devi Sahu

456 days ago

🙏‼️ Jai Shree Krishna ‼️🙏 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 ** MAHABHARAT KI KATHA** ************************** महाभारत की कहानी के अनुसार कर्ण पूर्वजन्म में दंभोद्भवा नाम के एक असुर थे। दंभोद्भवा को अपनी शक्तियों का बहुत अंहकार था। अंहकार के कारण दंभोद्भवा ने कई निर्दोष लोगों की छल से हत्या की थी। पूर्वजन्म में किया यही कर्म कर्ण की मृत्यु का कारण बना था। महाभारत कथा के अनुसार कई योद्धा ऐसे भी थे जिन्हें उनके पूर्वजन्मों के कारण हार का सामना करना पड़ा था। असल में उनके पूर्वजन्म में किए हुए ऐसे कर्म थे, जो किसी न किसी वजह से उनकी मृत्यु का कारण बने। इनमें से एक योद्धा का नाम कर्ण है। आपको जानकर हैरानी होगी कि कर्ण-अर्जुन का संबंध द्वापर युग से भी ज्यादा पुराना था। पूर्वजन्म ही नहीं बल्कि कई जन्मों से अर्जुन श्रीकृष्ण के साथ मिलकर कर्ण को मारने का प्रयास कर रहे थे लेकिन कर्ण किसी तरह बच ही निकलते थे। आइए, विस्तार से जानते हैं कर्ण की पूर्वजन्म की कहानी। कर्ण के पिछले जन्म में दंभोद्भवा नाम का एक असुर थ सूर्यदेव ने उसे 100 कुंडल और कवच दिए थे. सूर्यदेव ने उसे यह वरदान भी दिया था कि जो कोई भी उसके कुंडल और कवच को तोड़ेगा, उसकी मृत्यु हो जाएगी। दंभोद्भवा अपनी ताकत के नशे में चूर था। वह लोगों को परेशान करने लगा. इसलिए सब लोग नर-नारायण ऋषियों के पास गए. वे ही उसकी मदद कर सकते थे। नर-नारायण वास्तव में कृष्ण और अर्जुन के ही रूप थे। वे ही इस समस्या का समाधान निकाल सकते थे। कृष्ण और अर्जुन के अवतारों ने दंभोद्भवा को हर जन्म में मारने की कोशिश की दंभोद्भवा नाम के एक असुर को एक अनोखा वरदान मिला था। इस वरदान के अनुसार, उसे सिर्फ वही इंसान मार सकता था जिसने 1000 साल तक तपस्या की हो। नर और नारायण नाम के दो तपस्वी हजारों सालों से तपस्या कर रहे थे। कई लोग इन्हें देवताओं का अंश भी कहते थे। पहले नर ने दंभोद्भवा से लड़ाई की और उसका एक कवच तोड़ दिया लेकिन, नर की मृत्यु हो गई। फिर नारायण ने अपनी शक्ति से नर को फिर से जीवित कर दिया। इसके बाद नर 1000 साल की तपस्या करने चले गए। इस बीच, नारायण ने दंभोद्भवा से युद्ध जारी रखा। इसी तरह कई जन्मों तक नर और नारायण दंभोद्भवा से लड़ते रहे लेकिन उसे मारने में सफल न हो पाए। सूर्यदेव ने दंभोद्भवा को नर-नारायण से बचाया नारायण ने कवच तोड़ा, उनकी मृत्यु हुई, नर ने उन्हें जीवित किया। नर-नारायण दंभोद्भवा से बार-बार युद्ध करते और मर जाते, फिर जीवित हो जाते। यह क्रम चलता रहा, इस तरह दंभोद्भवा के 99 कवच टूट गए। दंभोद्भवा डर गया और सूर्यदेव की शरण में भागा। दंभोद्भवा सूर्यदेव का भक्त था और उन्हें अपने पिता की तरह मानता था इसलिए सूर्यदेव का वासल्य भी दंभोद्भवा पर छलक पड़ा और उन्होंने दंभोद्भवा को अपने पीछे छुपाकर बचा लिया। नर-नारायण सूर्यदेव का सम्मान करते हुए वहां से दंभोद्भवा को बिना मारे ही लौट आए लेकिन जाते-जाते नर-नारायण ने सूर्यदेव से कहा कि वे द्वापर युग में जन्म लेकर दंभोद्भवा को मारेंगे और उस युग में सूर्यदेव दंभोद्भवा की सहायता नहीं करेंगे। सूर्यदेव ने नर-नारायण को वचन दिया और इस तरह दंभोद्भवा के प्राण बच गए। द्वापर युग में अर्जुन और कृष्ण ने कर्ण को मार लिया पूर्वजन्म का प्रतिशोध द्वापर युग में दंभोद्भवा कर्ण के रूप में जन्मा। दंभोद्भवा का एक कवच कुंडल शेष रह गए थे इसलिए कर्ण ने सूर्यदेव के इन्हीं कवच-कुंडल के साथ जन्म लिया। श्रीकृष्ण को कर्ण की मृत्यु का रहस्य पता था इसलिए उन्होंने इंद्रदेव को कर्ण से उसके कुंडल और कवच मांगने के लिए भेजा था। द्वापर युग में नर-नारायण के रूप में जन्मे कृष्ण और अर्जुन ने कुरुक्षेत्र के रण में जन्मों से आ रही प्रतिज्ञा को पूरा किया। कृष्ण के मार्गदर्शन में अर्जुन ने कर्ण को निहत्था मारकर पूर्वजन्म की प्रतिज्ञा पूरी की। #mahabharat #karna #newpost

Comments (1)

Deepak  karki

Deepak karki

Jun 1, 2025

jai sita ram good morning ji