
Rama Devi Sahu
298 days ago
🌕 देव दिवाली की पौराणिक कथा, आख़िर कार्तिक पूर्णिमा को ही क्यों मनाई जाती है देव दिवाली 🌕 देव दिवाली, जिसे देवों की दिवाली कहा जाता है, कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। यह दीपावली के पंद्रह दिन बाद आती है। इस दिन का धार्मिक और पौराणिक महत्व अत्यंत गहरा है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किया था, जिससे तीनों लोकों में शांति स्थापित हुई। त्रिपुरासुर नामक तीन दानव—तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली—ने ब्रह्मा जी से तीन नगरों का वरदान पाया था। ये नगर सोने, चांदी और लोहे के बने थे और आकाश में विचरण करते थे। उन्हें कोई भी देवता नहीं हरा सकता था, क्योंकि वे तभी नष्ट हो सकते थे जब कोई एक बाण से तीनों नगरों को एक साथ भेद दे। इन दैत्यों के अत्याचार से देवता, ऋषि-मुनि और मनुष्य सभी परेशान हो उठे। तब सभी देवता भगवान शिव के शरण में गए। भगवान शिव ने सभी देवताओं को आश्वासन दिया कि वे इस संकट का अंत करेंगे। भगवान विष्णु उनके सारथी बने, ब्रह्मा जी ने रथ तैयार किया, सूर्य और चंद्रमा पहिए बने। जब तीनों नगर एक सीध में आए, तब भगवान शिव ने अपने पिनाक धनुष से एक ही बाण चलाया, जिससे तीनों नगर नष्ट हो गए और त्रिपुरासुर का अंत हो गया। इस विजय के उपलक्ष्य में देवताओं ने आकाश में दीप प्रज्वलित कर उत्सव मनाया। उसी दिन से यह पर्व “देव दिवाली” कहलाया। यह पर्व भगवान शिव की विजय, धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश का प्रतीक है। वाराणसी (काशी) में इस दिन विशेष रूप से दीपदान किया जाता है। माना जाता है कि इस दिन गंगा जी स्वयं देवताओं के साथ उतरकर काशी में आती हैं। हर घाट दीपों से जगमगाता है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है जैसे स्वयं स्वर्ग पृथ्वी पर उतर आया हो। इस प्रकार, देव दिवाली केवल उत्सव नहीं बल्कि प्रकाश, विजय और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाला पर्व है।

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