
Rama Devi Sahu
71 days ago
लेख सार : प्रभु तक पहुँचने का मार्ग प्रभु की कृपा होने पर बड़ा सुलभ है। प्रभु तक पहुँचने का रास्ता प्रभु की कृपा नहीं होने पर बहुत कठिन है,,पर यह कठिनाई तब दूर हो जाती है जब प्रभु कृपा करते हैं। प्रभु कृपा तब करते हैं जब जीव प्रभु तक पहुँचने हेतु मन बनाकर पहला कदम उठाता है। पहला कदम उठाते ही प्रभु कृपा बरसाते हैं और जीव प्रभु की कृपा की सीढ़ी चढ़ता हुआ प्रभु तक धीरे-धीरे पहुँच जाता है। प्रभु तक पहुँचने के रास्ते में माया आती है। माया हमें प्रभावित करती है और हम भटक जाते हैं। माया की चकाचौंध ऐसी होती है कि वह हमें अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। हमारे नेत्रों को प्रभु का रूप देखना चाहिए,, पर माया हमारे नेत्रों को सुन्दर सांसारिक दृश्य दिखाती है। हमारे कानों को प्रभु कथा और भजन सुनना चाहिए,, पर माया उन्हें आधुनिक संगीत और दुनियादारी की व्यर्थ बातें सुनाती है। माया इस तरह हमारे शरीर के प्रत्येक अंग को प्रभावित करती है और हमें प्रभु से दूर कर देती है। जीव धन कमाने में, परिवार पालने में अपना बहुमूल्य मानव जीवन लगा देता है। प्रभु के लिए उसके पास समय ही नहीं होता। इस तरह प्रभु तक पहुँचने का रास्ता उसके लिए बहुत कठिन बन जाता है। संसार में आसक्ति इतनी हो जाती है कि प्रभु तक पहुँचने के मार्ग में वह प्रगति ही नहीं कर पाता। फिर कोई श्रीग्रंथ, कोई सत्संग, कोई संत उसे जगाने का काम करते हैं। कभी-कभी जीवन में विपत्ति आती है जैसे व्यापार में नुकसान या किसी प्रिय का निधन इत्यादि जिससे वह संसार से निकलकर प्रभु की तरफ मुड़ता है। माया फिर भी उसे संसार में वापस खींचने का प्रयास करती है,, पर अगर वह जीव एक कदम प्रभु की तरफ उठा लेता है तो प्रभु हस्तक्षेप करते हैं और अपनी कृपा दृष्टि उस पर डालते हैं,,, फिर माया वैसे भागती है जैसे सूर्योदय के बाद कोहरा भागता है। प्रभु का हस्तक्षेप हुआ कि माया का प्रभाव सदा-सदा के लिए समाप्त हो जाता है। जीव प्रभु की तरफ एक कदम बढ़ाता है तो प्रभु अनेक श्रीकदम जीव की तरफ बढ़ाते हैं। प्रभु सदैव इस बात का इंतजार करते रहते हैं कि जीव प्रभु की तरफ कदम बढ़ाए, प्रभु के सानिध्य में आने का मानस बनाए। एक बार जीव मानस बनाता है तो प्रभु की कृपा उसे प्रभु तक पहुँचाने का कार्य करती है। जीव का सामर्थ्य नहीं कि वह अपने बल पर प्रभु तक पहुँच सके। उसे प्रभु की कृपा का आश्रय लेना ही पड़ता है तभी वह प्रभु तक पहुँच पाता है। प्रभु जीव पर कृपा करने के लिए तैयार बैठे हैं,, पर हम उस कृपा को पाने के लिए आगे नहीं बढ़ते। जैसे ही हम आगे बढ़ते हैं तो प्रभु की कृपा अपना काम करती है और हमें प्रभु तक पहुँचाने का साधन बन जाती है। इसलिए जीवन की किसी भी अवस्था में हम हो, हमें पहला कदम प्रभु की तरफ अविलम्ब बढ़ाना चाहिए। प्रभु तक पहुँचने का रास्ता बड़ा कठिन भी है और बड़ा आसान भी है। अगर हम माया में उलझ रहे हैं तो यह बड़ा कठिन है और अगर हमें प्रभु की कृपा मिल गई तो प्रभु तक पहुँचने का मार्ग बहुत आसान है।
Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!
