Sarla Rana Dec 3, 2021

. "सती अनुसूईया" सती अनुसूईया महर्षि अत्री की पत्नी थीं। जो अपने पतिव्रता धर्म के कारण सुविख्यात थीं। एक दिन देव ऋषि नारद जी बारी-बारी से विष्णुजी, शिव जी और ब्रह्मा जी की अनुपस्थिति में विष्णु लोक, शिवलोक तथा ब्रह्मलोक पहुँचे। वहाँ जाकर उन्होंने लक्ष्मी जी, पार्वती जी और सावित्री जी के सामने अनुसुइया के पतिव्रत धर्म की बढ़ चढ़ के प्रशंसा की तथा कहा की समस्त सृष्टि में उससे बढ़ कर कोई पतिव्रता नहीं है। नारद जी की बातें सुनकर तीनो देवियाँ सोचने लगीं कि आखिर अनुसुइया के पतिव्रत धर्म में ऐसी क्या बात है जो उसकी चर्चा स्वर्गलोक तक हो रही है ? तीनों देवीयों को अनुसुइया से ईर्ष्या होने लगी। नारद जी के वहाँ से चले जाने के बाद सावित्री, लक्ष्मी तथा पार्वती एक जगह इक्ट्ठी हुई तथा अनुसूईया के पतिव्रत धर्म को खंडित कराने के बारे में सोचने लगी। उन्होंने निश्चय किया कि हम अपने पतियों को वहाँ भेज कर अनुसूईया का पतिव्रत धर्म खंडित कराएंगे। ब्रह्मा, विष्णु और शिव जब अपने अपने स्थान पर पहुँचे तो तीनों देवियों ने उनसे अनुसूईया का पतिव्रत धर्म खंडित कराने की जिद्द की। तीनों देवों ने बहुत समझाया कि यह पाप हमसे मत करवाओ। परन्तु तीनों देवियों ने उनकी एक ना सुनी और अंत में तीनों देवो को इसके लिए राजी होना पड़ा। तीनों देवों ने साधु वेश धारण किया तथा अत्रि ऋषि के आश्रम पर पहुँचे। उस समय अनुसूईया जी आश्रम पर अकेली थीं। साधुवेश में तीन अतिथियों को द्वार पर देख कर अनुसूईया ने भोजन ग्रहण करने का आग्रह किया। तीनों साधुओं ने कहा कि हम आपका भोजन अवश्य ग्रहण करेंगे। परन्तु एक शर्त पर कि आप हमें निवस्त्र होकर भोजन कराओगी। 'श्रीजी की चरण सेवा' की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज से जुड़े रहें। अनुसूईया ने साधुओं के शाप के भय से तथा अतिथि सेवा से वंचित रहने के पाप के भय से परमात्मा से प्रार्थना की कि हे परमेश्वर ! इन तीनों को छः-छः महीनें के बच्चे की आयु के शिशु बनाओ। जिससे मेरा पतिव्रत धर्म भी खण्डित न हो तथा साधुओं को आहार भी प्राप्त हो व अतिथि सेवा न करने का पाप भी न लगे। परमेश्वर की कृपा से तीनों देवता छः-छः महीने के बच्चे बन गए तथा अनुसूईया ने तीनों को निःवस्त्र होकर दूध पिलाया तथा पालने में लेटा दिया। जब तीनों देव अपने स्थान पर नहीं लौटे तो देवियाँ व्याकुल हो गईं। तब नारद ने वहाँ आकर सारी बात बताई की तीनों देवों को तो अनुसुइया ने अपने सतीत्व से बालक बना दिया है। यह सुनकर तीनों देवियों ने अत्रि ऋषि के आश्रम पर पहुँचकर माता अनुसुइया से माफ़ी माँगी और कहा कि हमसे ईर्ष्यावश यह गलती हुई है। इनके लाख मना करने पर भी हमने इन्हें यह घृणित कार्य करने भेजा। कृप्या आप इन्हें पुनः उसी अवस्था में कीजिए। आपकी हम आभारी होंगी। इतना सुनकर अत्री ऋषि की पत्नी अनुसूईया ने तीनों बालक को वापस उनके वास्तविक रूप में ला दिया। अत्री ऋषि व अनुसूईया से तीनों भगवानों ने वर मांगने को कहा। तब अनुसूईया ने कहा कि आप तीनों हमारे घर बालक बन कर पुत्र रूप में आएँ। हम निःसंतान हैं। तीनों भगवानों ने तथास्तु कहा तथा अपनी-अपनी पत्नियों के साथ अपने-अपने लोक को प्रस्थान कर गए। कालान्तर में दतात्रोय रूप में भगवान विष्णु का, चन्द्रमा के रूप में ब्रह्मा का, तथा दुर्वासा के रूप में भगवान शिव का जन्म अनुसूईया के गर्भ से हुआ। ० ० ० "जय जय श्री राधे" *********************************************** (श्रीजी की चरण सेवा" की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज से जुड़े रहें) तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें👇 https://www.facebook.com/श्रीजी-की-चरण-सेवा-724535391217853/

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Sarla Rana Nov 30, 2021

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा (30 नवम्बर 2021मंगलवार ) सूतजी कहने लगे- हे ऋषियों! इस व्रत का वृत्तांत और उत्पत्ति प्राचीनकाल में भगवान कृष्ण ने अपने परम भक्त युधिष्ठिर से कही थी। वही मैं तुमसे कहता हूँ। युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवन! आपने हजारों यज्ञ और लाख गौदान को भी एकादशी व्रत के बराबर नहीं बताया। सो यह तिथि सब तिथियों से उत्तम कैसे हुई, बताइए। भगवन कहने लगे- हे युधिष्ठिर! सतयुग में मुर नाम का दैत्य उत्पन्न हुआ। वह बड़ा बलवान और भयानक था। उस प्रचंड दैत्य ने इंद्र, आदित्य, वसु, वायु, अग्नि आदि सभी देवताओं को पराजित करके भगा दिया। तब इंद्र सहित सभी देवताओं ने भयभीत होकर भगवान शिव से सारा वृत्तांत कहा और बोले हे कैलाशपति! मुर दैत्य से भयभीत होकर सब देवता मृत्यु लोक में फिर रहे हैं। तब भगवान शिव ने कहा- हे देवताओं! तीनों लोकों के स्वामी, भक्तों के दु:खों का नाश करने वाले भगवान विष्णु की शरण में जाओ। वे ही तुम्हारे दु:खों को दूर कर सकते हैं। शिवजी के ऐसे वचन सुनकर सभी देवता क्षीरसागर में पहुँचे। वहाँ भगवान को शयन करते देख हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे‍कि हे देवताओं द्वारा स्तुति करने योग्य प्रभो! आपको बारम्बार नमस्कार है, देवताओं की रक्षा करने वाले मधुसूदन! आपको नमस्कार है। आप हमारी रक्षा करें। दैत्यों से भयभीत होकर हम सब आपकी शरण में आए हैं। आप इस संसार के कर्ता, माता-पिता, उत्पत्ति और पालनकर्ता और संहार करने वाले हैं। सबको शांति प्रदान करने वाले हैं। आकाश और पाताल भी आप ही हैं। सबके पितामह ब्रह्मा, सूर्य, चंद्र, अग्नि, सामग्री, होम, आहुति, मंत्र, तंत्र, जप, यजमान, यज्ञ, कर्म, कर्ता, भोक्ता भी आप ही हैं। आप सर्वव्यापक हैं। आपके सिवा तीनों लोकों में चर तथा अचर कुछ भी नहीं है। हे भगवन्! दैत्यों ने हमको जीतकर स्वर्ग से भ्रष्ट कर दिया है और हम सब देवता इधर-उधर भागे-भागे फिर रहे हैं, आप उन दैत्यों से हम सबकी रक्षा करें। इंद्र के ऐसे वचन सुनकर भगवान विष्णु कहने लगे कि हे इंद्र! ऐसा मायावी दैत्य कौन है जिसने सब देवताअओं को जीत लिया है, उसका नाम क्या है, उसमें कितना बल है और किसके आश्रय में है तथा उसका स्थान कहाँ है? यह सब मुझसे कहो। भगवान के ऐसे वचन सुनकर इंद्र बोले- भगवन! प्राचीन समय में एक नाड़ीजंघ नामक राक्षस थ उसके महापराक्रमी और लोकविख्यात मुर नाम का एक पुत्र हुआ। उसकी चंद्रावती नाम की नगरी है। उसी ने सब देवताअओं को स्वर्ग से निकालकर वहाँ अपना अधिकार जमा लिया है। उसने इंद्र, अग्नि, वरुण, यम, वायु, ईश, चंद्रमा, नैऋत आदि सबके स्थान पर अधिकार कर लिया है। सूर्य बनकर स्वयं ही प्रकाश करता है। स्वयं ही मेघ बन बैठा है और सबसे अजेय है। हे असुर निकंदन! उस दुष्ट को मारकर देवताओं को अजेय बनाइए। इन्द्र देव के ऎसे वचन सुनकर भगवान श्री विष्णु बोले -देवताओं मै तुम्हारे शत्रुओं का शीघ्र ही संकार करूंगा. अब आप सभी चन्द्रावती नगरी को चलिए. इस प्रकार भगवान विष्णु देवताओं के साथ चल रहा था. उस समय दैत्यपति मुर अनेकों दैत्यों के साथ युद्ध भूमि में गरज रहा था. दैत्य ने देवताओं को देखा तो उसने देवताओं से भी युद्ध प्रारम्भ कर दिया. जब दैत्यों ने भगवान श्री विष्णु जी को युद्ध भूमि में देखा तो उन पर अस्त्रों-शस्त्रों का प्रहार करने लगे. भगवान श्री विष्णु मुर को मारने के लिये जिन-जिन शास्त्रों का प्रयोग करते वे सभी उसके तेज से नष्ट होकर उस पर पुष्पों के समान गिरने लगे़ भगवान श्री विष्णु उस दैत्य के साथ सहस्त्र वर्षों तक युद्ध करते रहे़ परन्तु उस दैत्य को न जीत सके. मुर की शक्ति क समक्ष श्री हरि के अस्त्र शस्त्र निष्फल हो जाते। अस्त्र शस्त्र असफल होने पर विष्णु तब मुर के साथ बाहु युद्ध करने लगे। कई वर्षों तक जब कोई निर्णय नहीं हो सका तब भगवान विश्राम की इच्छा से हेमवती नामक गुफा में आकर योगनिद्रा की गोद में सो गये। असुर मुर भगवान का पीछा करते हुए इस गुफा में प्रवेश कर गया वहां विष्णु को सोया हुआ जानकर मुर जैसे ही उन्हें मारने को तत्पर हुआ श्री हरि के शरीर से उज्जवल, कांतिमय रूप वाली देवी प्रकट हुई। उस देवी ने मुर को ललकार कर युद्ध किया और उसे तत्काल मार गिराया। श्री हरि जब नींद की गोद से उठे तो सब बातों को जानकर उस देवी से कहा कि आपका जन्म एकादशी के दिन हुआ है अत: आप उत्पन्ना एकादशी के नाम से पूजित होंगी। आपके भक्त वही होंगे जो मेरे भक्त हैं। उत्पन्ना एकादशी महात्म्य। उत्पन्ना एकादशी का व्रत जो जन करता है, वही सभी सुखों को भोगकर अंत में श्री विष्णु जी की शरण में चला जाता है. एकादशी की सुबह संकल्प नियम के अनुसार कार्य करना चाहिए. दोपहर को संकल्प पूर्वक स्नान करना चाहिए. स्नान करने से पहले शरीर पर मिट्टी का लेप करना चाहिए. चंदन और लेप लगाते समय निम्न मंत्र का जाप करना चाहिए. अश्व क्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुकान्ते वसुन्धरे उवृ्तापि बराहेण कृ्ष्णे न सताबाहुना । मृ्तिके हरमें पाप तन्मया पूर्वक संचितम त्वयाहतेन पापेन गच्छामि परमागतिम ।। स्नान करने के बाद धूप, दीप, नैवेद्ध से भगवान का पूजन करना चाहिए. रात को दीपदान करना चाहिए. ये सतकर्म भक्ति पूर्वक करने चाहिए. उस रात को नींद का त्याग करना चाहिए. एकादशी को दिन और रात्रि में भजन सत्संग आदि शुभ कर्म करने चाहिए. उस दिन श्रद्वापूर्वक ब्राह्माणों को दक्षिणा देनी चाहिए. और उनसे अपनी गलतियों की क्षमा मांगनी चाहिए. और अगर संभव हों, तो इस मास के दोनों पक्षों की एकादशी के व्रतों को करना चाहिए. इस विधि के अनुसार जो व्यक्ति व्रत करता है, उनको तीर्थ और दर्शन करने से जो पुन्य़ मिलता है. वह एकादशी व्रत के पुन्य के सोलहवें, भाग के बराबर भी नही़ है. इसके अतिरिक्त व्यतीपात योग, संक्रान्ति में तथा चन्द्र-सूर्य ग्रहण में दान देने से और कुरुक्षेत्र में स्नान करने से जो पुन्य मिलता है. वही पुन्य मनुष्य को एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है. दश श्रेष्ठ ब्राह्माणों को भोजन कराने से जो पुन्य मिलता है. वह पुन्य एकादशी के पुन्य के दशवें भाग के बराबर होता है. निर्जल व्रत करने का आधा फल एक बार भोजन करने के बराबर होता है. एकादशी का व्रत करने से ही यज्ञ, दान, तप आदि मिलते है. अन्यथा नही, अत: एकादशी को अवश्य ही करना चाहिए. इस व्रत में शंख से जल नहीं पीना चाहिए. एकादशी व्रत का फल हजार यज्ञों से भी अधिक है. #हरि_बोल सौजन्य: www.facebook.com/GauHamariMataHai/

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Sarla Rana Nov 27, 2021

🌹☀️।।ज्ञान वाणी।।☀️🌹 ************************* एक बार की बात है एक निर्धन ब्राह्मण अपितु महान भक्त था, वह मंदिर की पूजा में बहुत शानदार सेवा पेश करना चाहता था, लेकिन उसके पास धन नहीं था । एक दिन की बात है वह एक भागवत पाठ में बैठा हुआ था और उसने सुना कि नारायण मन में भी पूजे जा सकते हैं । उसने इस अवसर का लाभ उठाया क्योंकि वह एक लंबे समय से सोच रहा था कि कैसे बहुत शान से नारायण की पूजा करूं, लेकिन उसके पास धन नहीं था । जब वह यह समझ गया, कि मन के भीतर नारायण की पूजा कर सकते हैं, तो गोदावरी नदी में स्नान करने के बाद, वह एक पेड़ के नीचे बैठा हुआ था। अपने मन के भीतर वह बहुत खूबसूरत सिंहासन का निर्माण कर रहा था, गहनों के साथ लदी और सिंहासन पर भगवान की मूर्ति को रखते हुए... वह भगवान का गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, कावेरी नदी के जल के साथ अभिषेक कर रहा था। फिर बहुत अच्छी तरह से भगवान का श्रृंगार कर रहा था, और फूल, माला के साथ पूजा कर रहा था । वह बहुत अच्छी तरह से भोजन पका रहा था, और वह मीठे चावल पका रहा था। वह परखना चाहता था, क्या वह बहुत गरम थे। क्योंकि भोजन बहुत गर्म नहीं लिया जाता है। तो उसने भोजन में अपनी उंगली डाली और उसकी उंगली जल गई । तब उसका ध्यान टूटा क्योंकि वहाँ कुछ भी नहीं था। केवल अपने मन के भीतर वह सब कुछ कर रहा था । लेकिन उसने अपनी उंगली जली हुइ देखी। तो वह चकित रह गया । इधर, वैकुन्ठ में नारायण, मुस्कुरा रहे थे ! देवी लक्ष्मीजी ने पूछा - आप क्यों मुस्कुरा रहे हैं ? "मेरा एक भक्त अतिप्रभावी मानस पूजन कर रहा है। मेरे अन्य धनिक भक्त सब उच्च साधनो से सामग्रियों से मेरी अर्चना करते है। लेकिन मन भटकता रहता है । इस समर्पित भक्त का वास वैकुंठ मे होना चाहिए अतः मेरे दूतों को तुरंत भेजो उसे वैकुंठ लाने के लिए। भक्ति-योग इतना अच्छा है कि भले ही आपके पास भगवान की भव्य पूजा के लिए साधन न हो, आप मन के भीतर यह कर सकते हो । यह भी संभव है !! 🚩🙏जय श्री गुरुवे नमः 🙏🚩 🌹जय श्री कृष्ण 🌹 🙏🌹 जय सियाराम जी 🌹🙏

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Sarla Rana Oct 19, 2021

. "शरद पूर्णिमा" आश्विन माह के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है। शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात चन्द्रमा 16 कलाओं से परिपूर्ण होकर अमृत की बरसात करता है। इसलिए इस रात में खीर को खुले आसमान में रखा जाता है और सुबह उसे प्रसाद मानकर खाया जाता है। दिलचस्प बात है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा पृथ्वी के सबसे पास होता है। शास्त्रों के मुताबिक इस दिन अगर अनुष्ठान किया जाए तो ये सफल होता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ महारास रचा था। वहीं शास्त्रों के अनुसार देवी लक्ष्मी का जन्म शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था। माना जाता है कि इस दिन देवी लक्ष्मी अपनी सवारी उल्लू पर बैठकर भगवान विष्णु के साथ पृथ्वी का भ्रमण करने आती हैं। इसलिए आसमान पर चंद्रमा भी सोलह कलाओं से चमकता है। शरद पूर्णिमा की धवल चांदनी रात में जो भक्त भगवान विष्णु सहित देवी लक्ष्मी और उनके वाहन की पूजा करते हैं। ऐसा विश्वास है कि इस दिन चंद्रमा की किरणों में अमृत भर जाता है और ये किरणें हमारे लिए बहुत लाभदायक होती हैं। इन दिन सुबह के समय घर में माँ लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए। विधि इस दिन प्रातः काल स्नान करके आराध्य देव को सुंदर वस्त्राभूषणों से सुशोभित करके आवाहन, आसान, आचमन, वस्त्र, गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, सुपारी, दक्षिणा आदि से उनका पूजन करना चाहिए। रात्रि के समय गौदुग्ध (गाय के दूध) से बनी खीर में घी तथा चीनी मिलाकर अर्द्धरात्रि के समय भगवान को अर्पण (भोग लगाना) करना चाहिए। पूर्ण चंद्रमा के आकाश के मध्य स्थित होने पर उनका पूजन करें। खीर का नैवेद्य अर्पण करके, रात को खीर से भरा बर्तन खुली चांदनी में रखकर दूसरे दिन उसका भोजन करें। सबको उसका प्रसाद दें। पूर्णिमा का व्रत करके कथा सुनानी चाहिए। कथा सुनने से पहले एक लोटे में जल तथा गिलास में गेहूं, पत्ते के दोनों में रोली तथा चावल रखकर कलश की वंदना करके दक्षिणा चढ़ाए। फिर तिलक करने के बाद गेहूं के 13 दाने हाथ में लेकर कथा सुनें। फिर गेहूं के गिलास पर हाथ फेरकर मिश्राणी के पांव स्पर्श करके गेहूँ का गिलास उन्हें दे दें। लोटे के जल का रात को चंद्रमा को अर्ध्य दें। . कथा एक साहुकार के दो पुत्रियाँ थी। दोनो पुत्रियाँ पूर्णिमा का व्रत रखती थी। परन्तु बडी पुत्री पूरा व्रत करती थी और छोटी पुत्री अधुरा व्रत करती थी। परिणाम यह हुआ कि छोटी पुत्री की सन्तान पैदा ही मर जाती थी। उसने पंडितो से इसका कारण पूछा तो उन्होने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी जिसके कारण तुम्हारी सन्तान पैदा होते ही मर जाती है। पूर्णिमा का पूरा विधिपुर्वक करने से तुम्हारी सन्तान जीवित रह सकती है। उसने पंडितों की सलाह पर पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक किया। उसके लडका हुआ परन्तु शीघ्र ही मर गया। उसने लडके को पीढे पर लिटाकर ऊपर से पकडा ढक दिया। फिर बडी बहन को बुलाकर लाई और बैठने के लिए वही पीढा दे दिया। बडी बहन जब पीढे पर बैठने लगी जो उसका घाघरा बच्चे का छू गया। बच्चा घाघरा छुते ही रोने लगा। बडी बहन बोली- ”तु मुझे कलंक लगाना चाहती थी। मेरे बैठने से यह मर जाता।“ तब छोटी बहन बोली, ”यह तो पहले से मरा हुआ था। तेरे ही भाग्य से यह जीवित हो गया है। तेरे पुण्य से ही यह जीवित हुआ है।“ उसके बाद नगर में उसने पूर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया। ---------------::×::-------------- "जय जय श्री राधे" ******************************************* "श्रीजी की चरण सेवा" की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज से जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें👇 https://www.facebook.com/श्रीजी-की-चरण-सेवा-724535391217853/

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Sarla Rana Oct 18, 2021

. "प्रेम का उपहार" एक व्यक्ति था, जो बहुत ही गरीब था, उसे अपने रोज के दो वक्त की रोटी की व्यवस्था करने के लिये भी बहुत परेशानी का सामना करना पड़ता था, अर्थात जिस दिन वह काम करता था उस दिन खाना खाता था और जिस दिन नही करता उस दिन भूखे ही रहना पड़ता था। लेकिन वह नियम से ठाकुर जी सेवा करता। वह स्वयं भूखे रह जाता परन्तु ठाकुर जी को भोग अवश्य लगाता था। एक बार उसके एक मित्र के बहन की शादी का न्यौता आया, यह सोच में पड़ गया कि मेरे पास तो स्वयं के खाने के लिये नही हो पाती है, अब इस न्यौता के लिये उपहार कहाँ से लेकर आऊँ और जाना भी जरूरी है क्योकि मित्र की बहन की शादी का न्यौता है, बहुत देर सोचने के बाद वह फैसला करता है कि मैं जो भी रोज कमा कर लाऊँगा उसमे से एक वक्त का भोजन करूँगा और दूसरे वक्त का बचाकर उपहार के लिये पैसे इकट्ठा करूँगा। इस प्रकार सोचते भगवान का ध्यान करते हुए सो जाता है। और अगले ही दिन से वह रोज एक वक्त भोजन करके एक समय भूखे रहकर पैसे इकट्ठा करता है, देखते-देखते शादी की दिन करीब आ जाती है, वह देखता है कि पैसे ज्यादा इकट्ठे नही हो पाये है, अब वह सोच में पड़ जाता है कि कैसे करूँ अगर पैसे नहीं होगे तो उपहार नहीं लेकर जा पाऊँगा और यदि नहीं लेकर गया तो मेरे दोस्त को अच्छा नहीं लगेगा। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे, फिर वो ठाकुर जी याद करने लगता है। "श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेवाय।" हे ठाकुरजी ! मैं क्या करूँ मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है कृपा करें मुझे राह दिखाये इस प्रकार वह भगवान को स्मरण करते करते सो जाता है, और जब वह सुबह उठता है तो देखता है उसके घर पर नये-नये कीमती उपहार रखे हुए हैं। पहले तो उसे कुछ समझ नहीं आता कि ये सब यहाँ आया कहाँ से फिर उसे लगता है हो ना हो अवश्य ही किसी का किया हुआ है, वह तुरन्त उठ कर ठाकुर जी के पास जाता है और भगवान का ध्यान करने लगता तब भगवान उससे कहते हैं, मैं तुम्हारे सेवा से अत्यंत प्रसन्न हूँ, जिस प्रकार तुम स्वयं भूखे रह कर भी मुझे नित्य भोग लगाते थे, मेरी सेवा करते थे, इससे मै अत्यंत प्रसन्न हूँ। यह सुन उसके आँखों से झर-झर कर आँसू बहने लगते हैं, और ठाकुर जी को प्रणाम कर कहने लगता है प्रभु मैं गरीब अवश्य हूँ लेकिन आपकी सेवा में मैने अपने पूरे मन से की है। इसलिये आज मुझे आपके दर्शन पाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, इतना कहते ही ठाकुर जी अंतर्ध्यान हो जाते हैं। यदि निस्वार्थ मन से भक्ति एवं सेवा की जाये तो इसका फल अवश्य मिलता है। इसलिए सभी को निस्वार्थ मन से भक्ति और ठाकुर जी की सेवा करनी चाहिये। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" ******************************************** "श्रीजी की चरण सेवा" की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज से जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें👇 https://www.facebook.com/श्रीजी-की-चरण-सेवा-724535391217853/

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Sarla Rana Oct 16, 2021

. कार्तिक स्नान का महत्व विधि आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में जो पापांकुशा एकादशी आती है, उसी दिन आलस्य छोड़कर कार्तिक के उत्तम व्रतों का नियम ग्रहण करें। व्रत करने वाला पुरुष पहर भर रात बाकी रहे तभी उठे और जल सहित लोटा लेकर गाँव से बाहर नैर्ऋत्यकोण की ओर जाय। दिन और सन्ध्या के समय उत्तर दिशा की ओर मुँह करके तथा रात हो तो दक्षिण की ओर मुँह करके मल-मूत्र का त्याग करे। पहले जनेऊ को दाहिने कान पर चढ़ा ले और भूमि को तिनके से ढककर अपने मस्तक को वस्त्र से आच्छादित कर ले। शौच के समय मुख को यत्न पूर्वक मूँदे रखे। न तो थूके और न मुँह से ऊपर को साँस ही खींचें। मलत्याग के पश्चात् गुदाभाग तथा हाथ को इस प्रकार धोये जिससे मल का लेप और दुर्गन्ध दूर हो जाय। इस कार्य में आलस्य नहीं करना चाहिये। पाँच बार गुदा में, दस बार बायें हाथ में तथा सात-सात बार दोनों हाथों में मिट्टी लगाकर धोये। फिर एक बार लिङ्ग में, तीन बार बायें हाथ में और दो-दो बार दोनों हाथों में मिट्टी लगाकर धोये। यह गृहस्थ के लिये शौच की विधि बतायी गयी। ब्रह्मचारी के लिये इससे दूना, वान प्रस्थ के लिये तिगुना और संन्यासी के लिये चौगुना करने का विधान है। रात को दिन की अपेक्षा आधे शौच (मिट्टी लगाकर धोने) का नियम है। रास्ता चलने वाले व्यक्ति के लिये, स्त्री के लिये तथा शूद्रों के लिये उससे भी आधे शौच का विधान है। शौच कर्म से हीन पुरुष की समस्त क्रियाएँ निष्फल होती हैं। जो अपने मुँह को अच्छी तरह साफ नहीं रखता, उसके उच्चारण किये हुए मन्त्र फलदायक नहीं होते; इसलिये प्रयत्नपूर्वक दाँत और जीभ की शुद्धि करनी चाहिये। गृहस्थ पुरुष किसी दूध वाले वृक्ष की बारह अंगुल की लकड़ी लेकर दाँतुन करे; किन्तु यदि घर में पिता की क्षयाह तिथि या व्रत हो तो दाँतुन न करे। दाँतुन करने के पहले वनस्पति देवता से इस प्रकार प्रार्थना करें– आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च। ब्रह्मप्रज्ञां च मेधां च त्वं नो देहि वनस्पते॥ (९४ ११) 'हे वनस्पते! आप मुझे आयु, बल, यश, तेज, संतति, पशु, धन, ब्रह्मज्ञान और स्मरणशक्ति प्रदान करें।' इस मन्त्र का उच्चारण करके दाँतुन से दाँत साफ करना चाहिये। प्रतिपदा, अमावास्या, नवमी, षष्ठी, रविवार तथा चन्द्रमा और सूर्य के ग्रहण के दिन दाँतुन नहीं करना चाहिये। व्रत और श्राद्ध के दिन भी लकड़ी की दाँतुन करना मना है, उन दिनों जल के बारह कुल्ले करके मुख शुद्ध करने का विधान है। काँटेदार वृक्ष, कपास, सिन्धुवार, ब्रह्मवृक्ष (पलाश), बरगद, एरण्ड (रेंड) और दुर्गन्धयुक्त वृक्षों की लकड़ी को दाँतुन के काम में नहीं लेना चाहिये। फिर स्नान करने के पश्चात् भक्तिपरायण एवं प्रसन्नचित्त होकर चन्दन, फूल और ताम्बूल आदि पूजा की सामग्री ले भगवान् विष्णु अथवा शिव के मन्दिर में जायें। वहाँ भगवान्‌ को पृथक्-पृथक् पाद्य-अर्घ्य आदि उपचार अर्पण करके स्तुति करे तथा पुनः नमस्कार करके गीत आदि माङ्गलिक उत्सव का प्रबन्ध करें। ताल, वेणु और मृदङ्ग आदि बाजों के साथ भगवान्‌ के सामने नृत्य और गान करने वाले लोगों का भी ताम्बूल आदि के द्वारा सत्कार करे। जो भगवान् के मन्दिर में गान करते हैं, वे साक्षात् विष्णुरूप हैं। कलियुग में किये हुए यज्ञ, दान और तप भक्ति से युक्त होने पर ही जगद्गुरु भगवान् को संतोष देने वाले होते हैं। शिरीष (सिरस), उन्मत्त (धतूरा), गिरिजा (मातुलुङ्गी), मल्लिका (मालती), सेमल, मदार और कनेर के फूलों से तथा अक्षतों के द्वारा श्रीविष्णु की पूजा नहीं करनी चाहिये। जवा, कुन्द, सिरस, जूही, मालती और केवड़े के फूलों से श्रीशंकरजी का पूजन नहीं करना चाहिये। लक्ष्मी प्राप्ति की इच्छा रखने वाला पुरुष तुलसीदल से गणेश का, दूर्वादल से दुर्गा का तथा अगस्त्य के फूलों से सूर्यदेव का पूजन न करे। इनके अतिरिक्त जो उत्तम पुष्प हैं, वे सदा सब देवताओं की पूजा के लिये प्रशस्त माने गये हैं। इस प्रकार पूजा विधि पूर्ण करके देवदेव-भगवान् से क्षमा प्रार्थना करें– मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर। यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥ (९४|३०) 'देवेश्वर ! देव! मेरे द्वारा किये गये आपके पूजन में जो मन्त्र, विधि तथा भक्ति की न्यूनता हुई हो, वह सब आपकी कृपा से पूर्ण हो जाय।' तदनन्तर प्रदक्षिणा करके दण्डवत् प्रणाम करें तथा पुनः भगवान् से त्रुटियों के लिये क्षमा याचना करते हुए गायन आदि समाप्त करे। जो इस कार्तिक की रात्रि में भगवान् विष्णु अथवा शिव की भलीभाँति पूजा करते हैं वे मनुष्य पापहीन हो अपने पूर्वजों के साथ श्रीविष्णु के धाम में जाते हैं। जब दो घड़ी रात बाकी रहे तब तिल, कुश, अक्षत, फूल और चन्दन आदि लेकर पवित्रता पूर्वक जलाशय के तटपर जाय। मनुष्यों का खुदवाया हुआ पोखरा हो अथवा कोई देवकुण्ड हो या नदी अथवा उसका संगम हो–इनमें उत्तरोत्तर दसगुने पुण्य की प्राप्ति होती है तथा यदि तीर्थ में स्नान करें तो उसका अनन्त फल माना गया है। तत्पश्चात् भगवान् विष्णु का स्मरण करके स्नान का संकल्प करें तथा तीर्थ आदि के देवताओं को क्रमश: अर्घ्य आदि निवेदन करें। फिर भगवान् विष्णु को अर्घ्य देते हुए निम्नांकित मन्त्र का पाठ करें– नमः कमलनाभाय नमस्ते जलशायिने। नमस्तेऽस्तु हृषीकेश गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥ × × × कार्त्तिकेऽहं करिष्यामि प्रातःस्नानं जनार्दन। प्रीत्यर्थं तव देवेश दामोदर मया सह॥ ध्यात्वाऽहं त्वां च देवेश जलेऽस्मिन् स्नातुमुद्यतः। तव प्रसादात्पापं मे दामोदर विनश्यतु॥ (९५। ४, ७, ८) 'भगवान् पद्मनाभ को नमस्कार है। जल में शयन करने वाले श्रीनारायण को नमस्कार है। हृषीकेश ! आपको बारम्बार नमस्कार है। यह अर्घ्य ग्रहण कीजिये। जनार्दन ! देवेश ! लक्ष्मी सहित दामोदर! मैं आपकी प्रसन्नता के लिये कार्तिक में प्रातः स्नान करूँगा। देवेश्वर! आपका ध्यान करके मैं इस जल में स्नान करने को उद्यत हूँ। दामोदर ! आपकी कृपा से मेरा पाप नष्ट हो जाय।' तत्पश्चात् राधा सहित भगवान् श्रीकृष्ण को निम्नांकित मन्त्र से अर्घ्य दे– नित्ये नैमित्तिक कृष्ण कार्त्तिके पापनाशने। गृहाणार्घ्यं मया दत्तं राधया सहितो हरे॥ (९५|९) श्रीराधा सहित भगवान् श्रीकृष्ण ! नित्य और नैमित्तिक कर्मरूप इस पापनाशक कार्त्तिक स्नान के व्रत के निमित्त मेरा दिया हुआ यह अर्घ्य स्वीकार करें।' इसके बाद व्रत करने वाला पुरुष भागीरथी, श्रीविष्णु, शिव और सूर्यका स्मरण करके नाभि के बराबर जल में खड़ा हो विधि पूर्वक स्नान करे। गृहस्थ पुरुष को तिल और आँवले का चूर्ण लगाकर स्नान करना चाहिये। वनवासी संन्यासी तुलसी के मूल की मिट्टी लगाकर स्नान करे। सप्तमी, अमावास्या, नवमी, द्वितीया, दशमी और त्रयोदशी को आँवले के फल और तिल के द्वारा स्नान करना निषिद्ध है। पहले मल-स्नान करे अर्थात् शरीर को खूब मल-मलकर उसकी मैल छुड़ाये। उसके बाद मन्त्र स्नान करे। स्त्री और शूद्रों को वेदोक्त मन्त्रों से स्नान नहीं करना चाहिये। उनके लिये पौराणिक मन्त्रों का उपयोग बताया गया है। व्रती पुरुष अपने हाथ में पवित्रक धारण करके निमांकित मन्त्रों का उच्चारण करते हुए स्नान करें– त्रिधाभूदेवकार्यार्थं यः पुरा भक्तिभावितः। स विष्णुः सर्वपापघ्नः पुनातु कृपयात्र माम्॥ विष्णोराज्ञामनुप्राप्य कार्तिकव्रतकारणात्। क्षमन्तु देवास्ते सर्वे मां पुनन्तु सवासवाः॥ वेदमन्त्रा: सबीजाश्च सरहस्या मखान्विताः। कश्यपाद्याश्च मुनयो मां पुनन्तु सदैव ते॥ गङ्गाद्याः सरितः सर्वास्तीर्थानि जलदा नदाः। ससप्तसागरा: सर्वे मां पुनन्तु सदैव ते॥ पतिव्रतास्त्वदित्याद्या यक्षाः सिद्धाः सपन्नगाः। ओषध्यः पर्वताश्चापि मां पुनन्तु त्रिलोकजाः॥ (९५।१४-१८) 'जो पूर्वकाल में भक्ति पूर्वक चिन्तन करने पर देवताओं के कार्य की सिद्धि के लिये तीन स्वरूपों में प्रकट हुए तथा जो समस्त पापों का नाश करने वाले हैं, वे भगवान् विष्णु यहाँ कृपा पूर्वक मुझे पवित्र करें। श्रीविष्णु की आज्ञा प्राप्त करके कार्तिक का व्रत करने के कारण यदि मुझसे कोई त्रुटि हो जाय तो उसके लिये समस्त देवता मुझे क्षमा करें तथा इन्द्र आदि देवता मुझे पवित्र करें। बीज, रहस्य और यज्ञों सहित वेदमन्त्र और कश्यप आदि मुनि मुझे सदा ही पवित्र करें। गङ्गा आदि सम्पूर्ण नदियाँ, तीर्थ, मेघ, नद और सात समुद्र–ये सभी मुझे सर्वदा पवित्र करें। अदिति आदि पतिव्रताएँ, यक्ष, सिद्ध, नाग तथा त्रिभुवन की ओषधि और पर्वत भी मुझे पवित्र करें।' स्नानके पश्चात् विधि पूर्वक देवता, ऋषि, मनुष्य (सनकादि) तथा पितरों का तर्पण करें। कार्तिक मास में पितृ तर्पण के समय जितने तिलों का उपयोग किया जाता है उतने ही वर्षों तक पितर स्वर्ग लोक में निवास करते हैं। तदनन्तर जल से बाहर निकलकर व्रती मनुष्य पवित्र वस्त्र धारण करे और प्रातःकालोचित नित्यकर्म पूरा करके श्रीहरि का पूजन करें। फिर भक्ति से भगवान्‌ में मन लगाकर तीर्थों और देवताओं का स्मरण करते हुए पुनः गन्ध, पुष्प और फल से युक्त अर्घ्य निवेदन करे। अर्घ्य का मन्त्र इस प्रकार है– व्रतिनः कार्त्तिके पासि स्नातस्य विधिवन्मम। गृहाणार्घ्यं मया दत्तं राधया सहितो हरे॥ (९५।२३) 'भगवन्! मैं कार्तिक मास में स्नान का व्रत लेकर विधि पूर्वक स्नान कर चुका हूँ। मेरे दिये हुए इस अर्घ्य को आप श्रीराधिकाजी के साथ स्वीकार करें।' इसके बाद वेदविद्या के पारंगत ब्राह्मणों का गन्ध, पुष्प और ताम्बूल के द्वारा भक्ति पूर्वक पूजन करें और बारम्बार उनके चरणों में मस्तक झुकावें। ब्राह्मण के दाहिने पैर में सम्पूर्ण तीर्थ, मुख में वेद और समस्त अङ्गों में देवता निवास करते हैं; अतः ब्राह्मण के पूजन करने से इन सबकी पूजा हो जाती है। इसके पश्चात् हरिप्रिया भगवती तुलसी की पूजा करें। प्रयाग में स्नान करने, काशी में मृत्यु होने और वेदों के स्वाध्याय करने से जो फल प्राप्त होता है; वह सब श्रीतुलसी के पूजन से मिल जाता है, अत: एकाग्रचित्त होकर निम्नांकित मन्त्र से तुलसी की प्रदक्षिणा और नमस्कार करें– देवैस्त्वं निर्मिता पूर्वमर्चिताऽसि मुनीश्वरैः। नमो नमस्ते तुलसि पापं हर हरिप्रिये॥ (९५।३०) 'हरिप्रिया तुलसीदेवी! पूर्वकाल में देवताओं ने तुम्हें उत्पन्न किया और मुनीश्वरों ने तुम्हारी पूजा की। तुम्हें बारम्बार नमस्कार है। मेरे सारे पाप हर लो।' तुलसी पूजन के पश्चात् व्रत करने वाला भक्तिमान् पुरुष चित्त को एकाग्र करके भगवान् विष्णु की पौराणिक कथा सुने तथा कथावाचक विद्वान् ब्राह्मण अथवा मुनि की पूजा करे। जो मनुष्य भक्तियुक्त होकर पूर्वोक्त सम्पूर्ण विधियों का भलीभाँति पालन करता है, वह अन्त में भगवान् नारायण के परमधाम में जाता है। संकलन– चन्द्र प्रकाश शर्मा (श्रीजी की चरण सेवा) ० ० ० "जय जय श्री राधे" *********************************************** "श्रीजी की चरण सेवा" की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज से जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें👇 https://www.facebook.com/श्रीजी-की-चरण-सेवा-724535391217853/

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Sarla Rana Oct 15, 2021

. कल शनिवार दिनांक 16.10.2021 को आनेवाली है, संवत् २०७८ आश्विन मास के शुक्लपक्ष की 👇🏻 "पापांकुशा एकादशी" आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पापांकुशा एकादशी कहते हैं। इस एकादशी पर मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, जो मनुष्य कठिन तपस्याओं के द्वारा फल प्राप्त करते हैं, वही फल इस एकादशी पर शेषनाग पर शयन करने वाले श्रीविष्णु को नमस्कार करने से ही मिल जाते हैं और मनुष्य को यमलोक के दु:ख नहीं भोगने पड़ते हैं। यह एकादशी उपवासक (व्रत करने वाले) के मातृपक्ष के दस और पितृपक्ष के दस पितरों को विष्णु लोक लेकर जाती है। पापाकुंशा एकादशी हजार अश्वमेघ और सौ सूर्ययज्ञ करने के समान फल प्रदान करने वाली होती है। इस एकादशी व्रत के समान अन्य कोई व्रत नहीं है। इसके अतिरिक्त जो व्यक्ति इस एकादशी की रात्रि में जागरण करता है वह स्वर्ग का भागी बनता है। इस एकादशी के दिन दान करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है। श्रद्धालु भक्तों के लिए एकादशी के दिन व्रत करना प्रभु भक्ति के मार्ग में प्रगति करने का माध्यम बनता है। "व्रत विधि" इस व्रत का पालन दशमी तिथि के दिन से ही करना चाहिए। दशमी तिथि पर सात धान्य अर्थात गेहूं, उड़द, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर की दाल नहीं खानी चाहिए, क्योंकि इन सातों धान्यों की पूजा एकादशी के दिन की जाती है। जहां तक संभव हो दशमी तिथि और एकादशी तिथि दोनों ही दिनों में कम से कम बोलना चाहिए। दशमी तिथि को भोजन में तामसिक वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। एकादशी तिथि पर सुबह उठकर स्नान आदि करने के बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए। संकल्प अपनी शक्ति के अनुसार ही लेना चाहिए यानी एक समय फलाहार का या फिर बिना भोजन का। संकल्प लेने के बाद घट स्थापना की जाती है और उसके ऊपर श्रीविष्णुजी की मूर्ति रखी जाती है। इसके साथ भगवान विष्णु का स्मरण एवं उनकी कथा का श्रवण किया जाता है। इस व्रत को करने वाले को विष्णु के सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए। इस व्रत का समापन एकादशी तिथि में नहीं होता है, बल्कि द्वादशी तिथि की प्रात: में ब्राह्माणों को अन्न का दान और दक्षिणा देने के बाद ही यह व्रत समाप्त होता है। "कथा" प्राचीन समय में विंध्य पर्वत पर क्रोधन नामक एक बहेलिया रहता था। वह बड़ा क्रूर था। उसका सारा जीवन पाप कर्मों में बीता। जब उसका अंत समय आया तो वह मृत्यु के भय से कांपता हुआ महर्षि अंगिरा के आश्रम में पहुंचकर याचना करने लगा- हे ऋषिवर, मैंने जीवन भर पाप कर्म ही किए हैं। कृपा कर मुझे कोई ऐसा उपाय बताएं, जिससे मेरे सारे पाप मिट जाएं और मोक्ष की प्राप्ति हो जाए। उसके निवेदन पर महर्षि अंगिरा ने उसे पापांकुशा एकादशी का व्रत करके को कहा। महर्षि अंगिरा के कहे अनुसार उस बहेलिए ने पूर्ण श्रद्धा के साथ यह व्रत किया और किए गए सारे पापों से छुटकारा पा लिया। "महत्व" पापांकुशा एकादशी व्रत में यथासंभव दान व दक्षिणा देनी चाहिए। पूर्ण श्रद्धा के साथ यह व्रत करने से समस्त पापों से छुटकारा प्राप्त होता है। शास्त्रों में एकादशी के दिन की महत्ता को पूर्ण रुप से प्रतिपादित किया गया है। इस दिन उपवास रखने से पुण्य फलों की प्राप्ति होती है। जो लोग पूर्ण रूप से उपवास नहीं कर सकते उनके लिए मध्याह्न या संध्या काल में एक समय भोजन करके एकादशी व्रत करने की बात कही गई है। एकादशी जीवों के परम लक्ष्य, भगवद भक्ति, को प्राप्त करने में सहायक होती है। यह दिन प्रभु की पूर्ण श्रद्धा से सेवा करने के लिए अति शुभकारी एवं फलदायक माना गया है। इस दिन व्यक्ति इच्छाओं से मुक्त हो कर यदि शुद्ध मन से भगवान की भक्तिमयी सेवा करता है तो वह अवश्य ही प्रभु की कृपापात्र बनता है। ----------:::×:::---------- "जय जय श्रीहरि" ******************************************* "श्रीजी की चरण सेवा" की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज से जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें👇 https://www.facebook.com/श्रीजी-की-चरण-सेवा-724535391217853/

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Sarla Rana Oct 12, 2021

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