sn vyas Dec 6, 2021

सुप्रभात भेतव्यं नृपतेस्ततः सचिवतो राज्ञस्ततो वल्लभात्, अनयेभ्यश्च वसन्ति येsस्य भवने लब्धप्रसादा विटा:। दैन्यादुन्मुखदर्शनापलपनै:पिण्डार्थमायास्यत:, सेवां लाघवकारिणीम् कृतधियः स्थाने श्ववृत्तिं विदुः।। (मुद्राराक्षस ३/१४) अर्थात 👉 सेवा वृत्ति (नौकरी) में सर्वप्रथम राजा से भीति रखनी चाहिए, पुनः मन्त्री से, अनन्तर राजा के मित्र से, पुनः राजमहल में रहनेवाले राजा के कृपापात्र विट (धूर्त, चापलूस) आदि से। दीनता से मुँह ऊपर उठाकर देखना तथा वार्तालाप आदि कार्यों से उदरपूर्ति करने के लिए कष्ट सहन करनेवाले पुरुष में हीनता का भाव उत्पन्न करनेवाली सेवावृत्ति को विचारी पुरूष कुत्ते की जीविका के समान मानते है।

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sn vyas Dec 5, 2021

आचार्य डॉ0 विजय शंकर मिश्र (प्रशासनिक सेवा) *************************************** -----------------:आकाशचारिणी:----------------- ****************************** भाग--07 ********* परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन चक्रपाणि ने बतलाया कि आज भी हिमालय की सुरम्य घाटियों, गिरि-गुफाओं और दुर्गम स्थानों में प्राचीन विद्याओं के गौरव से मंडित अनेक सिद्ध पुरुष निवास कर रहे हैं। सिद्ध पारद द्वारा उन्होंने शरीर को काल के बंधनों से मुक्त कर लिया है। आकाशगामिनी विद्या द्वारा वे यत्र-तत्र विचरण करते रहते हैं। सामान्यतया उन्हें देख पाना सम्भव नहीं है। किन्तु इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि कुछ पुण्यात्मा लोगों को उनके दर्शन हुए हैं। उन्होंने उन्हें प्रत्यक्ष आकाश में गमन करते हुए देखा है। यह सुनकर मैंने कहा-- 8-10 वर्ष पूर्व हॉलीवुड की अभिनेत्री शर्ल मैकमिलन भूटान आदि पर्वतोय देशों की यात्रा पर गयी थीं। उन्होंने अपनी यात्रा के संस्मरणों में लिखा है कि आकाश में पीत वस्त्रधारी एक लामा को उन्होंने उड़ते हुये देखा था। उस आश्चर्यजनक दृश्य को देखकर उनके मुख से निकल पड़ा--काश ! आज न्यूटन और आइंस्टीन यहां होते और यह आश्चर्यजनक दृश्य देखते तो शायद वे अपने गुरुत्वाकर्षण से सम्बंधित लम्बे-चौड़े शोध-ग्रन्थों को फाड़कर फेंक देते। यह एक सशक्त प्रमाण है कि आकाशगामिनी विद्या आज भी जीवित है। चक्रपाणि महाशय निस्संदेह विद्वान थे। आकाशगामिनी विद्या का ऐतिहासिक विवरण और सांस्कृतिक स्वरूप का वर्णन जो उनसे सुनने को मिला, वह निश्चय ही मेरे लिए अति मूल्यवान था। मेरे यह पूछने पर कि आकाशगमन गुटिका क्या है तो चक्रपाणि ने कहा कि बारहवीं और चौदहवीं शताब्दी के बीच चिकित्सा शास्त्र पर कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी गयीं। उन पुस्तकों में पारद से इस प्रकार की गुटिका के निर्माण की विधियां भी लिखी गयी हैं जिससे आकाशगमन की सिद्धि मिल जाती है। वास्तव में ये तमाम पुस्तकें प्राचीन विद्याओं की स्मृति मात्र हैं जिन्हें संकलित करना रचनाकारों ने अपना कर्तव्य समझा। कुछ प्राचीन विधियां अभी भी ज्ञात हैं। यदि उन्हें सही ढंग से सिद्ध कर लिया जाये तो आकाश में उड़ने की शक्ति प्राप्त हो सकती है। ऐसी ही एक विधि आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य जी के गुरु द्वारा 'रस हृदय तंत्र'( अध्याय 19 ) में लिखी गयी है जो इस प्रकार है : सर्वप्रथम पारद को धूमबन्दी बनाएं। हीरा, माणिक, नीलम, मोती और मरकत--इन पांच रत्नों का उनमें क्रमशः जारण और मारण करें। फिर सुवर्ण बीज युक्त पारद के साथ अभ्रक सत्व, स्वर्ण माक्षिक सत्व तथा कान्त पाषाण सत्व मिलाकर गुटिका बनाएं। इसे खेचरी गुटिका कहते हैं। मुख में धारण करते ही वह गुटिका अपना प्रभाव दिखलाती है। वह व्यक्ति सुर, असुर, मनुष्य और सिद्धगण आदि सभी के लिए पूज्य हो जाता है। यह क्रिया कठिन अवश्य है क्योंकि खेचरी गुटिका बनाने की विधि ग्रन्थ में सूत्र रूप में है। गुरु के बिना इसे सफलतापूर्वक कर पाना शायद ही सम्भव हो सके। पारद को धूमबन्दी बना पाना भी साधारण बात नहीं है। फिर सत्वों के जारण-मारण की क्रियाएं भी कोई नहीं जानता। यदि पुस्तकों की मदद से ये क्रियाएं की भी जाएं तब भी मार्गदर्शक और अनुभवसिद्ध गुरु की आवश्यकता बनी रहेगी। यह सब सुनकर मुझे ऐसा लगा कि चक्रपाणि महाशय ऐसी ही कोई-न-कोई गुटिका के निर्माण की विधि अवश्य जानते हैं। इस विषय में पूछने पर उन्होंने बतलाया कि खेचरी गुटिका के निर्माण की एक और विधि है : काले धतूरे के बीजों के 8 तोले, तेल में 3 टंक शुद्ध पारे को 7 दिन तक लगातार घोटें। जब पारा जोंक के आकार का हो जाये तो उडद के चूरे को गीला करके उसमें पारे को भलीभाँति बन्द कर दें। ऊपर से धागे से बांधकर धूप में सुखायें। उसके बाद सरसों के लगभग दस सेर तेल में उसे पकायें। जब तेल जल जाये तो उसे छाया में रख दें। इसके बाद उसे लेकर दूध से भरे घड़े में रख दें। जब वह गुटिका घड़े के सारे दूध को सोख ले तब घड़े से निकालकर उसे बकरे के मुख में रख दें। बकरे के हृदय में भयंकर जलन शुरू हो जाएगी और अति व्याकुल होकर वह कहीं भी शांति का अनुभव नहीं करेगा। जब गुटिका बकरे के पेट में चली जाती है तो वह मर जाता है। फिर गुटिका को पेट से बाहर निकाल लें और उसे ठीक से साफ कर अपने मुख में धारण करें। यह गुटिका अनेक रोगों में रामबाण सिद्ध होती है। मुख-रोग, कैंसर, यौनरोग आदि को तुरन्त नष्ट कर देती है। गुटिका के प्रभाव से मनुष्य 100 योजन तक बिना किसी रुकावट के कहीं भी आ-जा सकता है। यदि बकरे के स्थान पर मुर्गे का प्रयोग किया जाये तो गुटिका के प्रभाव से मनुष्य अंतर्ध्यान भी हो सकता है। अपने यौवन को अक्षुण्ण बनाये रख सकता है। यदि इसी प्रकार बकरे और मुर्गे के स्थान पर तीतर का प्रयोग किया जाये तो मनुष्य आकाश-मार्ग से गमन करने वाले सिद्ध योगियों, गन्धर्वो, किन्नरों तथा दिव्य शरीरधारी महापुरुषों को प्रत्यक्ष देख सकता है। लेकिन यह कार्य योग्य गुरु की देखरेख में ही करना चाहिए। यह विधि थोड़ी कम जटिल है। जिस पुस्तक से यह विधि ली गयी है, वह प्रामाणिक पुस्तक है। इसलिए इस खेचरी गुटिका की सत्यता में सन्देह नहीं करना चाहिए। योग में एक खेचरी मुद्रा भी है। जिन्हें खेचरी मुद्रा सिद्ध रहती है, वे भी आकाशगमन कर सकते हैं। हिमालय स्थित सांगरीला घाटी में एक आश्रम है जिसे ज्ञानगंज मठ या आश्रम कहते हैं। उस योगाश्रम में निवास करने वाले योगियों को खेचरी मुद्रा सिद्ध है। वे इच्छानुसार आकाशभ्रमण करते हैं। उनके के लिए किसी प्रकार की कोई सीमा नहीं है।

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sn vyas Dec 5, 2021

🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩 *की प्रस्तुति* 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘ *परमात्मा ने सुंदर सृष्टि का निर्माण किया और इस समस्त सृष्टि को ज्ञान से परिपूर्ण कर दिया | उस ज्ञान को कण कण में पहुंचाने के लिए प्रकृति में अनेकों उदाहरण भी भर दिए | फिर मनुष्य की रचना करके इस धरती पर अनेकों महापुरुष तो भेजे ही साथ ही समय-समय पर स्वयं अवतार लेकर के उस ज्ञान का प्रसार मानव मात्र में करने का प्रयास किया | इतना सब होने के बाद भी मनुष्य कहीं ना कहीं से ज्ञान प्राप्त करने से चूक गया | यदि किसी को भी कुछ प्राप्त नहीं हो रहा है या फिर कोई परीक्षार्थी परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो रहा है तो यह मान लेना चाहिए कि उसने तैयारी ठीक से नहीं की है , उसने अध्ययन एवं पठन नहीं किया है , तभी वह परीक्षा में अनुत्तीर्ण हुआ | ज्ञान का प्रकाश चारों ओर फैला हुआ है परंतु जब तक अज्ञान का दीपक हृदय से नहीं बुझेगा तब तक ज्ञान हृदय में प्रवेश नहीं कर सकता | अज्ञान क्या है ? मनुष्य का अहंकार , मनुष्य की थोथी विद्वता | यह ऐसा अज्ञान का दीपक है जो मनुष्य के हृदय में जलता रहता है जिसके कारण ज्ञान हृदय में प्रवेश नहीं कर पाता | जिस प्रकार एक छोटे से कमरे में मनुष्य दीपक जला कर बैठता है तो उसे पूर्णिमा के चंद्रमा का प्रकाश नहीं दिखाई पड़ता है और जब वह अपने कमरे के दीपक को बुझाता है उसी के थोड़ी देर बाद पूर्णिमा का पूर्ण प्रकाश उसके कमरे में फैल जाता है , उसी प्रकार मनुष्य के हृदय में जब तक अज्ञान रूपी छोटा दीपक जल रहा है अब तक ज्ञान रूपी पूर्णिमा का प्रकाश उसके हृदय में कदापि नहीं प्रवेश कर सकता | जिस दिन अहंकार , अज्ञान रूपी दीपक मनुष्य अपने हृदय से बुझा देता है उसी दिन उसके हृदय में ज्ञान रूपी प्रकाश प्रसारित होने लगता है | मैं ही श्रेष्ठ हूं , जो मुझे आता है वह और किसी को नहीं आता यह भाव जब तक मनुष्य के हृदय में रहेगा तब तक उसे ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता क्योंकि उसके मन का भाव बन जाता है कि मेरे जैसा ज्ञानी कोई दूसरा है ही नहीं | ऐसे मनुष्य जीवन के अंधकार में अपने दिन व्यतीत करके सब कुछ जानते हुए भी कुछ नहीं जान पाते और इस धरा धाम से जाने का समय आ जाता है | इसलिए प्रत्येक मनुष्य को सर्वप्रथम अपने ह्रदय अर्थात छोटे कमरे के अज्ञानता रूपी दीपक को बुझाना पड़ेगा तभी उसे बाहर फैले हुए ज्ञान का प्रकाश प्राप्त हो पाएगा |* *आज के युग में पहले की अपेक्षा ज्ञान का प्रसार हो रहा है | संचार माध्यम इसका सशक्त स्रोत बन गया है | मनुष्य अपने पुराणों का अध्ययन न करके सब कुछ संचार माध्यम से ही प्राप्त कर लेना चाहता है और जिस दिन वो थोड़ा बहुत जान जाता है उस दिन उसे ऐसा प्रतीत होता है कि मेरे हृदय में अर्थात छोटे से कमरे में जो प्रकाश है वही हमारे लिए पर्याप्त है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" ऐसे सभी लोगों से यही निवेदन करना चाहूंगा कि हृदय के अहंकार एवं स्वयं को ज्ञानी समझने वाले अज्ञानता रूपी दीपक को बुझा कर इससे बाहर निकल कर देखिए समस्त सृष्टि में ज्ञान का प्रकाश फैला हुआ है | परंतु कुछ लोग अपनी इस अज्ञानता से बाहर नहीं निकल पाते हैं जिसका परिणाम यह होता है कि उन्हें ज्ञान रूपी पूर्णिमा के चंद्रमा का प्रकाश जीवन भर नहीं मिल पाता और वे कूप मंडूक ही बने रह जाते हैं | आज विद्वानों की पूरी सेना संचार माध्यमों पर दिखाई पड़ती है , इंटरनेट के माध्यम व्हाट्सएप एवं अन्य कई स्थानों पर सत्संग चर्चाएं भी खूब जोर शोर से हो रही है परंतु यहां भी अध्ययन का अभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है , क्योंकि हृदय में जो अज्ञानता रूपी दीपक प्रकाशित हो रहा है वह बाहरी प्रकाश को भीतर आने ही नहीं दे रहा है | यही कारण है कि प्राय: इन संचार माध्यमों पर सत्संग विवाद का कारण बनता जा रहा है | "एको$हम द्वितीयोनास्ति" की भावना मनुष्य को अज्ञानता के अंधकार की ओर ले जा रही है | इस संसार में परमात्मा के सिवाय कोई भी पूर्ण नहीं है परंतु स्वयं को पूर्ण दिखाने का प्रयास करने वाला मनुष्य अपने स्वभाव से विवश होकर के ऐसे कृत्य कर रहा है , जिसके कारण ना तो उसे कुछ प्राप्त हो पा रहा है और ना ही कोई अन्य उसके ज्ञान का लाभ ले पा रहा है | आवश्यकता है कि ज्ञान के प्रकाश को और फैलाया जाए जिससे कि अज्ञानता रूपी दीपक स्वत: बुझ जाय | और यह तभी होगा जब हम स्वाध्याय की प्रवृत्ति अपनायेंगे , क्योंकि यह अकाट्य सत्य है कि हमें सब कुछ संचार माध्यम एवं इंटरनेट से नहीं प्राप्त हो सकता | जिस प्रकार कुएं में पड़े हुए मेंढक को ऐसा प्रतीत होता है कि जितना आसमान दिख रहा है वह सब मैंने देख लिया है उसी प्रकार कुछ लोग अज्ञानता का दीपक जलाकर यह समझ लेते हैं कि जितना ज्ञान है हमने सब प्राप्त कर लिया है | ऐसे लोगों से यही कहना है कि अज्ञानता रूपी कुँयें से बाहर निकल कर देखो ज्ञान का आसमान बहुत ही विस्तृत है |* *जब तक अज्ञानता का दीपक नहीं बुझाया जाएगा तब तक ज्ञान रूपी प्रकाश अपना प्रभाव नहीं दिखा पाएगा और अज्ञानता का दीपक बुझाने के लिए सद्गुरु की शरण में जाकर उनके द्वारा दिए गए निर्देश को मानना ही सुगम एवं सरल मार्ग है |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳 सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵️ *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟

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sn vyas Dec 4, 2021

*संस्कृत एक अत्यंत समृद्ध भाषा है।* ================== *संस्कृत के इस श्लोक को पढिये -* *क:खगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोSटौठीडढणः।* *तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोSरिल्वाशिषां सह।।* अर्थात: पक्षियों का प्रेम, शुद्ध बुद्धि का, दूसरे का बल अपहरण करने में पारंगत, शत्रु-संहारकों में अग्रणी, मन से निश्चल तथा निडर और महासागर का सर्जन करनार कौन? राजा मय! जिसको शत्रुओं के भी आशीर्वाद मिले हैं। श्लोक को ध्यान से पढ़ने पर आप पाते हैं की संस्कृत वर्णमाला के सभी 33 व्यंजन इस श्लोक में दिखाये दे रहे हैं वो भी क्रमानुसार। यह खूबसूरती केवल और केवल संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा में ही देखने को मिल सकती है! पूरे विश्व में केवल एक संस्कृत ही ऐसी भाषा है जिसमें केवल एक अक्षर से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है, किरातार्जुनीयम् काव्य संग्रह में केवल “न” व्यंजन से अद्भुत श्लोक बनाया है और गजब का कौशल्य प्रयोग करके भारवि नामक महाकवि ने थोड़े में बहुत कहा है : *न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नानानना ननु।* *नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्ननुत्॥* अर्थात: जो मनुष्य युद्ध में अपने से दुर्बल मनुष्य के हाथों घायल हुआ है वह सच्चा मनुष्य नहीं है। ऐसे ही अपने से दुर्बल को घायल करता है वो भी मनुष्य नहीं है। घायल मनुष्य का स्वामी यदि घायल न हुआ हो तो ऐसे मनुष्य को घायल नहीं कहते और घायल मनुष्य को घायल करें वो भी मनुष्य नहीं है। वंदेसंस्कृतम्! एक और उदहारण है : *दाददो दुद्द्दुद्दादि दादादो दुददीददोः।* *दुद्दादं दददे दुद्दे ददादददोऽददः।।* अर्थात: दान देने वाले, खलों को उपताप देने वाले, शुद्धि देने वाले, दुष्ट्मर्दक भुजाओं वाले, दानी तथा अदानी दोनों को दान देने वाले, राक्षसों का खण्डन करने वाले ने, शत्रु के विरुद्ध शस्त्र को उठाया। है ना खूबसूरत? इतना ही नहीं, क्या किसी भाषा में केवल 2 अक्षर से पूरा वाक्य लिखा जा सकता है? संस्कृत भाषा के अलावा किसी और भाषा में ये करना असम्भव है। माघ कवि ने शिशुपालवधम् महाकाव्य में केवल “भ” और “र ” दो ही अक्षरों से एक श्लोक बनाया है। देखिये – *भूरिभिर्भारिभिर्भीराभूभारैरभिरेभिरे।* *भेरीरे भिभिरभ्राभैरभीरुभिरिभैरिभा:।।* अर्थात- निर्भय हाथी जो की भूमि पर भार स्वरूप लगता है, अपने वजन के चलते, जिसकी आवाज नगाड़े की तरह है और जो काले बादलों सा है, वह दूसरे दुश्मन हाथी पर आक्रमण कर रहा है। एक और उदाहरण- *क्रोरारिकारी कोरेककारक कारिकाकर।* *कोरकाकारकरक: करीर कर्करोऽकर्रुक॥* अर्थात- क्रूर शत्रुओं को नष्ट करने वाला, भूमि का एक कर्ता, दुष्टों को यातना देने वाला, कमलमुकुलवत, रमणीय हाथ वाला, हाथियों को फेंकने वाला, रण में कर्कश, सूर्य के समान तेजस्वी। 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️

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sn vyas Dec 4, 2021

आचार्य डॉ0 विजय शंकर मिश्र (प्रशासनिक सेवा) *************************************** ---------------:आकाशचारिणी:--------------- ****************************** भाग--06 ********* परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन क्या आपने कापालिक सर्वेश्वरानंद को देखा है ?--मैंने भोलाराम से पूछा। हाँ देखा है--भोलाराम ने कहा--कई बार देखा है। काफी लम्बी-चौड़ी कद-काठी का है वह भयंकर कापालिक। आयु कितनी होगी--यह तो मैं नहीं बतला सकता, लेकिन देखने में 40 से ज्यादा का नहीं लगता वह। घने बाल हैं जो कंधों तक झूलते रहते हैं। दाढ़ी-मूंछ भी घनी है। मस्तक पर श्मशान-भस्म और काला टीका लगाता है। काला चोंगा भी पहनता है। शराब के नशे के कारण हमेशा उसकी आंखें गूलर की तरह लाल रहती हैं। चेहरे पर हमेशा क्रूरता का भाव भी रहता है। कापालिक के विषय में यह विवरण सुनकर न जाने क्यों उसे देखने और उससे मिलने की लालसा जागृत हो गयी मेरे मन में। दो दिन बाद ही अमावस्या थी। दो दिन तक मैं श्मशान नहीं गया। बस माँ तारा के दर्शन कर वापस अपने कमरे में आ जाता था। सोचा था--अमावस्या की रात में श्मशान की ओर जाऊंगा और महाआसन पर बैठकर प्रतीक्षा करूँगा उस कापालिक की। लेकिन अमावस्या के प्रातःकाल मन्दिर में एक सज्जन से मेरा परिचय हो गया। वह माँ के दर्शन करने बहुत दूर से आये थे। नाम था--चक्रपाणि। हाँ, यही नाम बतलाया था उन्होंने। लेकिन उनका व्यक्तित्व काफी रहस्यमय लगा मुझे। लम्बा कद, बलिष्ठ काठी, काला रंग, शरीर पर लाल रंग की लुंगी और चादर, गले में मूंगे और रुद्राक्ष की मालाएं, सिर मुड़ा हुआ, दाढ़ी-मूंछ भी सफाचट, गोल-गोल आंखें, तोते की तरह नाक, कद्दू की तरह बेडौल चेहरा, नीचे का जबड़ा मोटा और नीचे की ओर लटका हुआ--कुल मिलाकर एक बदसूरत व्यक्तित्व। फिर भी न जाने कैसा आकर्षण था उनमें। मैं काशी से आया हूँ। आकाशगामिनी विद्या पर विस्तृत जानकारी चाहता हूँ और इसीलिए वकरेश्वर में एक आकाशचारिणी योगिनी से मिलने भी आया हूँ--आदि-आदि बातें न जाने कैसे जान गए वह महाशय। घोर आश्चर्य हुआ मुझे। यहां तक कि वह मेरा नाम भी जान गए थे। मैं उन्हें अपने कमरे पर ले आया। अब तक काफी प्रभावित हो चुका था मैं उनसे।मेरे आसन पर ही पसर कर बैठ गए महाशय। निश्चय ही कोई सिद्ध साधक थे वह--इसमें सन्देह नहीं। यदि न होते तो मेरे विषय में सारी बातें कैसे जान-समझ गए थे। कमरे में बैठने के बाद एक बार उन्होंने चारों ओर सिर घुमाकर देखा और उसके बाद अपने छोटे-से थैले से गांजा निकालकर सुलगाने लगे। गांजे का दो बार दम लगाने के बाद कुछ देर तक मौन रहे फिर भर्राए स्वर में बोले--योग-तन्त्र की 64 विद्याओं में से एक है-- आकाशगामिनी विद्या। यह प्राचीन विद्या है, एक विज्ञान है जिसे जानने वाला व्यक्ति आकाश-मार्ग से सर्वत्र विचरण कर सकता है--नदी, पर्वत, जंगल, समुद्र--कोई भी उसकी यात्रा में बाधक नहीं बन सकता। इस रहस्यमयी विद्या के अनेक उदाहरण हैं। प्राचीन साहित्य में इस विद्या के द्वारा लोग सम्पूर्ण जम्बू द्वीप की यात्रा करते थे। आपने पढ़ा होगा कि नारद भी तीनों लोकों में स्वच्छंद विचरण कर पाते थे। रावण को तो इस विद्या का आचार्य ही कहना उपयुक्त होगा। वह आकाशगामिनी विद्या के विज्ञान की सहायता से कहीं भी आ-जा सकता था और हेमवती विद्या द्वारा अथाह स्वर्ण बनाकर सम्पूर्ण लंका को ही स्वर्णमयी बना डाला था। यह सिद्धि प्राप्त करने के लिए रावण ने ऐसा पारद (पारा ) तैयार कर लिया था जिसे नाभि में धारण कर लेने से वह जरा-मरण के भय से मुक्त हो सकता था। ऐसे ही सिद्ध पारद को अमृत कहा गया है। रावण की मृत्यु तभी सम्भव हो सकी जब राम ने अपने 31वें बाण से उस पारद को नष्ट कर दिया था। दूसरी शताब्दी में भी पारद की विद्या के जीवित रहने के प्रमाण मिलते हैं। उत्तरी भारत के जिसे आर्यावर्त प्रान्त कहते थे, नागवंश के अनेक प्रतापी राजा हुए। इस अवधि में उन्होंने इस रहस्यमयी विद्या को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। इनमें अहिच्छत्र(वर्तमान में रुहेलखंड) के राजा बासुकी के असाधारण प्रतिभशाली पुत्र नागार्जुन का नाम प्रसिद्ध है। नागार्जुन के गुरु थे--पदलिप्त। उन्होंने नागार्जुन को आकाशगामिनी विद्या बतलायी थी। गुरु पदलिप्त नित्य ही आकाश-मार्ग से तीर्थयात्रा करते थे। नागार्जुन की भक्ति और सेवा से प्रसन्न होकर उन्हें आकाशगमन के सभी रहस्यों से परिचित करा दिया था। इसके पश्चात गुप्त काल (चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य) के काल में *व्याडि* नाम के एक रसायनशास्त्री ने काफी परिश्रम के बाद आकाशगामिनी विद्या प्राप्त की थी। उन्होंने इस विषय पर पुस्तक भी लिखी थी जो अब अप्राप्त है। इसके बाद आकाशगामिनी विद्या के विषय में कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। इसका कारण यह था कि इससे सम्बन्धित साहित्य नष्ट हो गया। हिंदुकुश पर्वत-श्रेणी को पार कर बर्बर, असभ्य आक्रमणकारी यहां आए। उन्होंने मन्दिरों, मठों के अकूत धन को लूटा, विश्वविद्यालय के अगाध ज्ञान को नष्ट किया, दुर्लभ पुस्तकों, गर्न्थो और पांडुलिपियों को जलाकर नष्ट कर डाला। सबसे अधिक क्षति का सामना नालंदा विश्वविद्यालय को करना पड़ा। पूर्व मध्यकाल में केवल एक यही विश्विद्यालय बचा था जहाँ अनेक प्रकार की प्राचीन विद्याएँ जीवित थीं। आचार्य गौणपाद, अनंग वज्र, गोरक्षनाथ (गोरखनाथ), चर्पटीनाथ, नागसेन आदि उस युग के सिद्ध, असाधारण प्रतिभाशाली विद्वान थे। बाणभट्ट कवि के अनुसार सिद्ध तपस्वियों का साधना-स्थल 'श्रीपर्वत' था जो वर्तमान में नागार्जुन क्रीड़ा-स्थल (आंधप्रदेश) के निकट नरहल्ल पर्वत है।

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sn vyas Dec 4, 2021

🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩 *की प्रस्तुति* 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘ *इस सृष्टि का निर्माण प्रकृति से हुआ है | प्रकृति में मुख्य रूप से पंचतत्व एवं उसके अनेकों अंग विद्यमान है जिसके कारण इस सृष्टि में जीवन संभव हुआ है | इसी सृष्टि में अनेक जीवो के मध्य मनुष्य का जन्म हुआ अन्य सभी प्राणियों के अपेक्षा सुख-दुख की अनुभूति मनुष्य को ही होती है जो कि वह समय-समय पर प्रदर्शित भी करता रहता है | दुखी मनुष्य को सदैव प्रकृति से शिक्षा लेने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि मनुष्य को दुख तभी होता है जब उसकी कोई कामना पूरी नहीं होती | सर्वप्रथम तो यह.जान लेना चाहिए परमात्मा समदर्शी है वह कि के भी साथ भेदभाव नहीं करता | उसके बाद यह भी देखें रि प्रकृति के समस्त अंग कुछ लेने की अपेक्षा सदैव देने का प्रयास करते हैं | सूर्य सदैव चमकता रहता है , उससे हमें प्रकाश मिलता रहता है | सदैव प्रकाश देने वाला सूर्य हमसे कभी कोई अपेक्षा नहीं रखता और ना ही हम उसको कुछ दे पाते हैं फिर भी वह चमकता रहता है | जिस पृथ्वी पर हम निवास करते हैं अनेक प्रकार से इसका उपयोग करते हैं यहां तक कि मल मूत्र का त्याग भी इसी पृथ्वी पर करते हैं परंतु पृथ्वी का धैर्य कभी भी समाप्त नहीं होता है | बादल समय-समय पर बरसते रहते हैं , उनके बरसने से ही पृथ्वी हरी भरी होती है तथा जीवो को जीवन प्राप्त होता है परंतु विचार कीजिए क्या हमने उनको कभी कुछ दिया है या उन्होंने हमसे कुछ अपेक्षा की है | सबको समान रूप से सब कुछ बांटने वाले वृक्ष सदैव छाया एवं मीठे फल प्रदान करते रहते हैं उन्होंने कभी मनुष्य से या अन्य जीवो से कोई अपेक्षा नहीं की इसलिए सदैव लहराते रहते हैं | वहीं मनुष्य एक दूसरे के प्रति कुछ ना कुछ पाने की अपेक्षा किया करता है इसीलिए उसको दुख प्राप्त होता रहता है | जिस दिन हम प्रकृति की भांति सिर्फ देना सीख लेंगे उसी दिन हमारी यह दुख स्वत' समाप्त हो जायेंगे | जब देने की प्रवृत्ति हृदय में जागृत हो जाएगी तो किसी से कुछ मांगने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी क्योंकि तब बिना मांगे सब कुछ मिलने लगेगा |* *आज प्रत्येक मनुष्य दुखी दिखाई पड़ता था क्योंकि वह अपनी कामनाओं पर विराम नहीं लगा पा रहा है , देने की अपेक्षा पाने की कामना कुछ अधिक ही जागृत हो रही है | आज मनुष्य ने प्रकृति से शिक्षा लेना ही बंद कर दिया है | ऐसा प्रतीत होता है जैसे मनुष्य के हृदय में देने की भावना ही समाप्त हो गई है | यदि किसी को कुछ दे भी दिया है तो इस भावना से दिया जाता है कि हमें यह वापस मिलेगा | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" यही कहना चाहता हूं कि मनुष्य को देने की प्रवृत्ति अपनानी चाहिए और किसी को कुछ देने के बाद उसे पाने की अपेक्षा कदापि न की जाए क्योंकि यदि आपके देने का भाव सकारात्मक है तो आपको आप का दिया हुआ वापस अवश्य मिलेगा | जहाँ पाने की अपेक्षा की जाती है और वह पूरी नहीं होती तो मनुष्य दुखी हो जाता है | परंतु आज मनुष्य अपना धैर्य खो चुका है , सब कुछ तुरंत प्राप्त कर लेने की इच्छा रखने वाला मनुष्य जब कुछ भी नहीं प्राप्त कर पाता तो वह दुखी हो जाता है | जिस प्रकार प्रकृति के समस्त अंग निष्काम भाव से एक समान रूप से समस्त सृष्टि के लिए कार्य करते हैं उसी प्रकार निष्काम भावना से जिस दिन मनुष्य अपने सभी कार्य संपादित करने लगेगा उसी दिन उसके दुख समाप्त हो जायेंगे , परंतु जिस प्रकार का वातावरण इस समय दिखाई पड़ रहा है उस वातावरण में ऐसा होना कदापि संभव नहीं दिख रहा है | इस वातावरण को बदलने की आवश्यकता है और इसे बदलने के लिए मनुष्य को सत्संग की परम आवश्यकता है क्योंकि बिना सत्संग की यह प्राप्त हो पाना असंभव है |* *सूर्य , चंद्रमा , पृथ्वी , बादल , नदियां आदि अनेक उदाहरण हमको अपने आसपास देखने को मिल सकते हैं जो सदैव सृष्टि को देते रहते हैं और उसके बदले में कुछ भी पाने की अपेक्षा नहीं रखते | इसी प्रकार हमें भी अपनी मानसिकता बनानी पड़ेगी तभी दुख समाप्त हो सकता है |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳 सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵️ *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟

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