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ॐ आध्यात्मिक दर्शन ॐ प्रश्नोपनिषद् प्रश्न 1 ॐ अथ कबन्धी कात्यायन उपेत्य पप्रच्छ! भगवन् कुतो हा वा इमा: प्रजा प्रजायन्त इति!! 3 !! महर्षि पिप्पलाद की आज्ञा पाकर वे लोग श्रद्धापूर्वक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वहीं तपश्चर्या करने लगे! महर्षि की देखरेख में संयमपूर्वक रहकर एक वर्ष तक वर्ष तक उन्होंने त्यागमय जीवन बिताया! उसके बाद वे सब पुनः पिप्पलाद ऋषि के गये तथा उनमेंसे सर्वप्रथम कत्य ऋषि के प्रपौत्र कबन्धी ने श्रद्धा और विनय पूर्वक पूछा - भगवन्! जिससे ये सम्पूर्ण चराचर जीव नाना रूपों में उत्पन्न होते हैं, जो इनका सुनिश्चित परम कारण है, वह कौन है! ' !! 3 !! शिवचरण परमार भुलवाना श्रीराधे जय श्री राधे राधे जी

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ॐ आध्यात्मिक दर्शन ॐ प्रश्नोपनिषद् प्रश्न 1 ॐ तान्ह स ऋषिरुवाच भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ यथाकामं प्रश्नान्पृच्छत यदि विज्ञास्याम: सर्व ह वो वक्ष्याम इति!! 2 !! उपर्युक्त छहों ऋषियों को परब्रह्मकी जिज्ञासा से अपने पास आया देखकर महर्षि पिप्पलाद ने उनसे कहा - तुमलोग तपस्वी हो, तुमने ब्रह्मचर्य के पालनपूर्वक साङ्गोपाङ्ग वेद पढ़े हैं; तथापि मेरे आश्रममें रहकर पुनः एक वर्ष तक श्रद्धापूर्वक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए तपश्चर्या करो! उसके बाद तुमलोग जो चाहो, मुझसे प्रश्न करना! यदि तुम्हारे पूछे हुए विषय का मुझे ज्ञान होगा तो निस्संदेह तुम्हें सब बातें भलीभाँति समझाकर बताऊंगा !! 2 !! धन्यवाद जी शिवचरण परमार भुलवाना श्रीराधे जय श्री राधे राधे जी

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shiv charan bhulwana Jul 31, 2022

ॐ आध्यात्मिक दर्शन ॐ श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 ॐ यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर: ! तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नुतिर्मतिर्मम!! 78 !! हे राजन्! जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव धनुषधारी अर्जुन हैं, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है- ऐसा मेरा मत है!! 78 !! साथियो श्रीमद्भगवद्गीता संपूर्ण होती है, जिसमें सात्त्विक, राजस एवं तामस का योगों सहित श्री अर्जुन को उपदेश श्री कृष्ण भगवान द्वारा किया गया है यहाँ से आगे उपनिषदों में श्रेष्ठ प्रश्नोपनिषद् का शुभारंभ किया जाता है ! ॐ आध्यात्मिक दर्शन ॐ प्रश्नोपनिषद् प्रश्न!1 ! ॐ ओंकिरस्वरूप सच्चिदानंदघन परमात्मा का स्मरण करके उपनिद्का आरम्भ किया जाता है! प्रसिद्ध है कि भारद्वाज के पुत्र सुकेशा, शिवकुमार सत्यकाम, गर्गगोत्र में उत्पन्न सौर्याणी, कोसलदेश निवासी आश्वलायन, विदर्भदेशीय भार्गव और कत्य के प्रपोत्र कबन्धी --- ये वेदाभ्यासके परायण और ब्रह्मनिष्ठ अर्थात श्रद्धापूर्वक वेदानुकूल आचलण करने वाले थे! एकबार ये छहों ऋषि परब्रह्म परमेश्वर की जिज्ञासा से एकसाथ बाहर निकले! ईन्होंने सुना था कि ' परब्रह्म के सम्बन्ध में हम जो कुछ जानना चाहते हैं; वह सब हमें बता देंगे ' ये लोग जिज्ञासु के बेशमॆ हाथमें समिधा लिये हुए महर्षि पिप्पलाद के पास गये!! 1 !! धन्यवाद जी शिवचरण परमार भुलवाना श्रीराधे जय श्री राधे राधे जी

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