Seemma Valluvar Dec 2, 2021

गीता पहली बार पढ़ने पर समझ नहीं आती। गीता दूसरी बार पढ़ने पर कुछ कुछ समझ आती है। गीता तीसरी बार पढ़ने पर समझ आने लगती है। गीता चौथी बार पढ़ने पर पूरी समझ आने लगती है। गीता पांचवी बार पढने पर ज्ञान देने लगती है। गीता छठी बार पढ़ने पर कर्म के महत्व को समझाती है। गीता सातवीं बार पड़ने पर घर के सारे क्लेश दूर कर देती है। गीता आठवीं बार पढ़ने पर सारे विघ्न दूर कर देती है। गीता नौवीं बार पढ़ने पर पूरे घर को समृद्ध बना देती है। गीता दसवीं बार पढ़ने पर आपको पूर्ण ज्ञानी बना देती है। गीता 11 बार पढ़ने पर आपको बहुत बड़ा व्यवसायी बना देती है। गीता 12वीं बार पढने पर आपको कृष्ण के समान चतुर बना देती है। गीता 13वीं बार पढ़ने पर आपको एक कुशल वक्ता बना देती है। गीता 14वीं बार पढ़ने पर आपको ब्राह्मण शूद्र और वैश्य और छत्रिय से ऊपर उठा देती है। गीता 15 वीं बार पढ़नें पर आपको कृष्ण बना देती है। गीता 16 वीं बार पढ़ने पर संसार रूपी महाभारत में युद्ध करना सिखा देती है। गीता 17 वीं बार पढ़ें पर मोक्ष की और प्रवृत कर देती है। गीता 18 वीं बार पढ़ने पर जन्म मरण के बंधन से मुक्त कर देती है। गीता के जितने अध्याय हैं उतनी बार भागवत गीता को पढ़िए तब जाकर आप कृष्ण की तरह एक योद्धा भी बनेंगे एक रणनीतिकार भी बनेंगे और एक कुशल वक्ता भी बनेंगे। 🇮🇳 जय माँ भारती, वन्दे मातरम् ऊंच-नीच की करो विदाई हिंदू हिंदू भाई भाई🚩

+67 प्रतिक्रिया 18 कॉमेंट्स • 3 शेयर
Seemma Valluvar Dec 2, 2021

*महाभारत का एक सार्थक प्रसंग जो अंतर्मन को छूता है .... !!* महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था. युद्धभूमि में यत्र-तत्र योद्धाओं के फटे वस्त्र, मुकुट, टूटे शस्त्र, टूटे रथों के चक्के, छज्जे आदि बिखरे हुए थे और वायुमण्डल में पसरी हुई थी घोर उदासी .... ! गिद्ध , कुत्ते , सियारों की उदास और डरावनी आवाजों के बीच उस निर्जन हो चुकी उस भूमि में *द्वापर का सबसे महान योद्धा* "देवव्रत" (भीष्म पितामह) शरशय्या पर पड़ा सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहा था -- अकेला .... ! तभी उनके कानों में एक परिचित ध्वनि शहद घोलती हुई पहुँची , "प्रणाम पितामह" .... !! भीष्म के सूख चुके अधरों पर एक मरी हुई मुस्कुराहट तैर उठी, बोले "आओ देवकीनंदन ! स्वागत है तुम्हारा !! " "मैं बहुत देर से तुम्हारा ही स्मरण कर रहा था" .... !! कृष्ण बोले , "क्या कहूँ पितामह ! अब तो यह भी नहीं पूछ सकता कि कैसे हैं आप" .... ! भीष्म चुप रहे, कुछ क्षण बाद बोले, "पुत्र युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करा चुके केशव ... ? उनका ध्यान रखना , परिवार के बुजुर्गों से रिक्त हो चुके राजप्रासाद में उन्हें अब सबसे अधिक तुम्हारी ही आवश्यकता है" .... ! कृष्ण चुप रहे .... ! भीष्म ने पुनः कहा , "कुछ पूछूँ केशव" बड़े अच्छे समय से आये हो .... ! सम्भवतः धरा छोड़ने के पूर्व मेरे अनेक भ्रम समाप्त हो जाँय " .... !! कृष्ण बोले - कहिये न पितामह ....! एक बात बताओ प्रभु ! तुम तो ईश्वर हो न .... ? कृष्ण ने बीच में ही टोका, "नहीं पितामह ! मैं ईश्वर नहीं ... मैं तो आपका पौत्र हूँ पितामह ... ईश्वर नहीं ...." भीष्म उस घोर पीड़ा में भी ठठा के हँस पड़े .... ! बोले , "अपने जीवन का स्वयं कभी आकलन नहीं कर पाया कृष्ण, सो नहीं जानता कि अच्छा रहा या बुरा, पर अब तो इस धरा से जा रहा हूँ कन्हैया, अब तो ठगना छोड़ दे रे .... !! " कृष्ण जाने क्यों भीष्म के पास सरक आये और उनका हाथ पकड़ कर बोले .... " कहिये पितामह .... !" भीष्म बोले , "एक बात बताओ कन्हैया ! इस युद्ध में जो हुआ वो ठीक था क्या .... ?" "किसकी ओर से पितामह .... ? पांडवों की ओर से .... ?" "कौरवों के कृत्यों पर चर्चा का तो अब कोई अर्थ ही नहीं कन्हैया ! पर क्या पांडवों की ओर से जो हुआ वो सही था .... ? "आचार्य द्रोण का वध, दुर्योधन की जंघा के नीचे प्रहार, दुःशासन की छाती का चीरा जाना, जयद्रथ के साथ हुआ छल, निहत्थे कर्ण का वध, सब ठीक था क्या .... ? यह सब उचित था क्या .... ?" इसका उत्तर मैं कैसे दे सकता हूँ पितामह .... ! इसका उत्तर तो उन्हें देना चाहिए जिन्होंने यह किया ..... !! उत्तर दें दुर्योधन का वध करने वाले भीम , उत्तर दें कर्ण और जयद्रथ का वध करने वाले अर्जुन .... !! मैं तो इस युद्ध में कहीं था ही नहीं पितामह .... !! "अभी भी छलना नहीं छोड़ोगे कृष्ण .... ? अरे विश्व भले कहता रहे कि महाभारत को अर्जुन और भीम ने जीता है, पर मैं जानता हूँ कन्हैया कि यह तुम्हारी और केवल तुम्हारी विजय है .... ! मैं तो उत्तर तुम्ही से पूछूंगा कृष्ण ....!" "तो सुनिए पितामह .... ! "कुछ बुरा नहीं हुआ , कुछ अनैतिक नहीं हुआ .... ! वही हुआ जो हो होना चाहिए .... !" "यह तुम कह रहे हो केशव .... ? मर्यादा पुरुषोत्तम राम का अवतार कृष्ण कह रहा है ....? यह छल तो किसी युग में हमारे सनातन संस्कारों का अंग नहीं रहा, फिर यह उचित कैसे गया ..... ? " "इतिहास से शिक्षा ली जाती है पितामह, पर निर्णय वर्तमान की परिस्थितियों के आधार पर लेना पड़ता है .... ! हर युग अपने तर्कों और अपनी आवश्यकता के आधार पर अपना नायक चुनता है .... !! राम त्रेता युग के नायक थे , मेरे भाग में द्वापर आया था .... ! हम दोनों का निर्णय एक सा नहीं हो सकता पितामह .... !!" "नहीं समझ पाया कृष्ण ! तनिक समझाओ तो .... !" "राम और कृष्ण की परिस्थितियों में बहुत अंतर है पितामह .... ! राम के युग में खलनायक भी 'रावण ' जैसा शिवभक्त होता था .... !! तब रावण जैसी नकारात्मक शक्ति के परिवार में भी विभीषण जैसे सन्त हुआ करते थे ..... ! तब बाली जैसे खलनायक के परिवार में भी तारा जैसी विदुषी स्त्रियाँ और अंगद जैसे सज्जन पुत्र होते थे .... ! उस युग में खलनायक भी धर्म का ज्ञान रखता था .... !! इसलिए राम ने उनके साथ कहीं छल नहीं किया .... ! किंतु मेरे युग के भाग में में कंस, जरासन्ध, दुर्योधन, दुःशासन, शकुनी, जयद्रथ जैसे घोर पापी आये हैं .... !! उनकी समाप्ति के लिए हर छल उचित है पितामह .... ! पाप का अंत आवश्यक है पितामह , वह चाहे जिस विधि से हो .... !!" "तो क्या तुम्हारे इन निर्णयों से गलत परम्पराएं नहीं प्रारम्भ होंगी केशव .... ? क्या भविष्य तुम्हारे इन छलों का अनुशरण नहीं करेगा .... ? और यदि करेगा तो क्या यह उचित होगा ..... ??" *"भविष्य तो इससे भी अधिक नकारात्मक आ रहा है पितामह .... !* कलियुग में तो इतने से भी काम नहीं चलेगा .... ! वहाँ मनुष्य को कृष्ण से भी अधिक कठोर होना होगा .... नहीं तो धर्म समाप्त हो जाएगा .... ! *जब क्रूर और अनैतिक शक्तियाँ सत्य एवं धर्म का समूल नाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता अर्थहीन हो जाती है पितामह* .... ! तब महत्वपूर्ण होती है विजय, केवल विजय .... ! भविष्य को यह सीखना ही होगा पितामह* ..... !!" "क्या धर्म का भी नाश हो सकता है केशव .... ? और यदि धर्म का नाश होना ही है, तो क्या मनुष्य इसे रोक सकता है ..... ?" *"सबकुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ कर बैठना मूर्खता होती है पितामह ....!* ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करता ..... !केवल मार्ग दर्शन करता है सब मनुष्य को ही स्वयं करना पड़ता है .... ! आप मुझे भी ईश्वर कहते हैं न .... ! तो बताइए न पितामह, मैंने स्वयं इस युद्घ में कुछ किया क्या ..... ? सब पांडवों को ही करना पड़ा न .... ? यही प्रकृति का संविधान है .... ! युद्ध के प्रथम दिन यही तो कहा था मैंने अर्जुन से .... ! यही परम सत्य है ..... !!" भीष्म अब सन्तुष्ट लग रहे थे .... ! उनकी आँखें धीरे-धीरे बन्द होने लगीं थी .... ! उन्होंने कहा - चलो कृष्ण ! यह इस धरा पर अंतिम रात्रि है .... कल सम्भवतः चले जाना हो ... अपने इस अभागे भक्त पर कृपा करना कृष्ण ...! कृष्ण ने मन मे ही कुछ कहा और भीष्म को प्रणाम कर लौट चले, पर युद्धभूमि के उस डरावने अंधकार में भविष्य को जीवन का सबसे बड़ा सूत्र मिल चुका था.... ! *जब अनैतिक और क्रूर शक्तियाँ सत्य और धर्म का विनाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता का पाठ आत्मघाती होता है ....।।* *धर्मों रक्षति रक्षितः* जय श्री राधे 🙏🌺🚩

+187 प्रतिक्रिया 66 कॉमेंट्स • 82 शेयर
Seemma Valluvar Dec 1, 2021

कुछ महत्वपूर्ण बातें!!!!! [1] मुख्य द्वार के पास कभी भी कूड़ादान ना रखें इससे पड़ोसी शत्रु हो जायेंगे | [२] सूर्यास्त के समय किसी को भी दूध,दही या प्याज माँगने पर ना दें इससे घर की बरक्कत समाप्त हो जाती है | [३] छत पर कभी भी अनाज या बिस्तर ना धोएं..हाँ सुखा सकते है इससे ससुराल से सम्बन्ध खराब होने लगते हैं | [४] फल खूब खाओ स्वास्थ्य के लिए अच्छे है लेकिन उसके छिलके कूडादान में ना डालें वल्कि बाहर फेंकें इससे मित्रों से लाभ होगा | [५] माह में एक बार किसी भी दिन घर में मिश्री युक्त खीर जरुर बनाकर परिवार सहित एक साथ खाएं अर्थात जब पूरा परिवार घर में इकट्ठा हो उसी समय खीर खाएं तो माँ लक्ष्मी की जल्दी कृपा होती है | [६] माह में एक बार अपने कार्यालय में भी कुछ मिष्ठान जरुर ले जाएँ उसे अपने साथियों के साथ या अपने अधीन नौकरों के साथ मिलकर खाए तो धन लाभ होगा | [७] रात्री में सोने से पहले रसोई में बाल्टी भरकर रखें इससे क़र्ज़ से शीघ्र मुक्ति मिलती है और यदि बाथरूम में बाल्टी भरकर रखेंगे तो जीवन में उन्नति के मार्ग में बाधा नही आवेगी | [८] वृहस्पतिवार के दिन घर में कोई भी पीली वस्तु अवश्य खाएं हरी वस्तु ना खाएं तथा बुधवार के दिन हरी वस्तु खाएं लेकिन पीली वस्तु बिलकुल ना खाएं इससे सुख समृद्धि बड़ेगी | [९] रात्रि को झूठे बर्तन कदापि ना रखें इसे पानी से निकाल कर रख सकते है हानि से बचोगें | [१०] स्नान के बाद गीले या एक दिन पहले के प्रयोग किये गये तौलिये का प्रयोग ना करें इससे संतान हठी व परिवार से अलग होने लगती है अपनी बात मनवाने लगती है अतः रोज़ साफ़ सुथरा और सूखा तौलिया ही प्रयोग करें | [११] कभी भी यात्रा में पूरा परिवार एक साथ घर से ना निकलें आगे पीछे जाएँ इससे यश की वृद्धि होगी | ऐसे ही अनेक अपशकुन है जिनका हम ध्यान रखें तो जीवन में किसी भी समस्या का सामना नही करना पड़ेगा तथा सुख समृद्धि बड़ेगी | कुछ अन्य उपयोगी बातें!!!!!!! १. घर में सुबह सुबह कुछ देर के लिए भजन अवशय लगाएं । २. घर में कभी भी झाड़ू को खड़ा करके नहीं रखें, उसे पैर नहीं लगाएं, न ही उसके ऊपर से गुजरे अन्यथा घर में बरकत की कमी हो जाती है। झाड़ू हमेशा छुपा कर रखें | ३. बिस्तर पर बैठ कर कभी खाना न खाएं, ऐसा करने से धन की हानी होती हैं। लक्ष्मी घर से निकल जाती है1 घर मे अशांति होती है1 ४. घर में जूते-चप्पल इधर-उधर बिखेर कर या उल्टे सीधे करके नहीं रखने चाहिए इससे घर में अशांति उत्पन्न होती है। ५. पूजा सुबह 6 से 8 बजे के बीच भूमि पर आसन बिछा कर पूर्व या उत्तर की ओर मुंह करके बैठ कर करनी चाहिए । पूजा का आसन जुट अथवा कुश का हो तो उत्तम होता है | ६. पहली रोटी गाय के लिए निकालें। इससे देवता भी खुश होते हैं और पितरों को भी शांति मिलती है | ७.पूजा घर में सदैव जल का एक कलश भरकर रखें जो जितना संभव हो ईशान कोण के हिस्से में हो | ८. आरती, दीप, पूजा अग्नि जैसे पवित्रता के प्रतीक साधनों को मुंह से फूंक मारकर नहीं बुझाएं। ९. मंदिर में धूप, अगरबत्ती व हवन कुंड की सामग्री दक्षिण पूर्व में रखें अर्थात आग्नेय कोण में | १०. घर के मुख्य द्वार पर दायीं तरफ स्वास्तिक बनाएं | ११. घर में कभी भी जाले न लगने दें, वरना भाग्य और कर्म पर जाले लगने लगते हैं और बाधा आती है | १२. सप्ताह में एक बार जरुर समुद्री नमक अथवा सेंधा नमक से घर में पोछा लगाएं | इससे नकारात्मक ऊर्जा हटती है | १३. कोशिश करें की सुबह के प्रकाश की किरणें आपके पूजा घर में जरुर पहुचें सबसे पहले | १४. पूजा घर में अगर कोई प्रतिष्ठित मूर्ती है तो उसकी पूजा हर रोज निश्चित रूप से हो, ऐसी व्यवस्था करे | "पानी पीने का सही वक़्त". (1) 3 गिलास सुबह उठने के बाद, .....अंदरूनी उर्जा को Activate करता है... (2) 1 गिलास नहाने के बाद, ......ब्लड प्रेशर का खात्मा करता है... (3) 2 गिलास खाने से 30 Minute पहले, ........हाजमे को दुरुस्त रखता है.. (4) आधा गिलास सोने से पहले, ......हार्ट अटैक से बचाता है.

+138 प्रतिक्रिया 47 कॉमेंट्स • 106 शेयर
Seemma Valluvar Nov 30, 2021

मित्रो आज उत्पन्ना एकादशी है, आपको आपके परिवार को आज के पावन दिवस की बहुत बहुत शुभकामनाएं!!!!!!! एकदाशी का व्रत सभी व्रतों में महत्वपूर्ण है। मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को उत्पन्ना एकादशी का व्रत पूरे विधि विधान से किया जाता है। पुराणों के अनुसार, एकादशी एक देवी है, जिनका जन्म भगवान विष्णु के अंशा से हुआ था। मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को देवी एकादशी प्रकट हुई थीं इसलिए इस एकादशी का नाम उत्पन्ना एकादशी हुआ। पद्मपुराण के अनुसार इस एकादशी के व्रत से धन-धान्य का लाभ और मोक्ष की प्राप्ति होती है। एकादशी व्रत के महत्‍व के बारे में तो सभी लोग जानते हैं कि लेकिन आप जानते हैं कि एकादशी व्रत की शुरुआत कैसे हुई, इसके पीछे क्या कथा है। आइए जानते हैं किस तरह एकादशी प्रकट हुईं…. शास्त्रों के अनुसार, भगवान विष्‍णु और मुर नामक राक्षस का युद्ध चल रहा था। राक्षस से युद्ध करते-करते भगवान विष्णु थक गए थे, इसलिए वह बद्रीकाश्रम में गुफा में जाकर विश्राम करने चले लगे। मुर राक्षस भगवान विष्णु का पीछा करता हुए बद्रीकाश्रम पहुंच गया था। गुफा में भगवान विष्णु को निद्रा लग गई। निद्रा में लीन भगवान को मुर ने मारना चाहा तभी विष्णु भगवान के शरीर से एक देवी प्रकट‍ हुईं और उन्‍होंने मुर नामक राक्षस का तुरंत वध कर दिया। देवी के कार्य से विष्णु भगवान बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि देवी आपका जन्म कृष्ण पक्ष की एकादशी को हुआ है इसलिए आपका नाम एकादशी होगा। सभी व्रतों में तुम्हारा व्रत श्रेष्ठ होगा। आज से हर एकादशी को मेरे साथ तुम्हारी भी पूजा होगी। जो भक्त एकादशी का व्रत रखेगा वह पापों से मुक्त हो जाएगा। उत्पन्ना एकादशी का व्रत रखने वालों को व्रत से पहले वाली रात यानी दशमी की रात में भोजन नहीं करना चाहिए। एकादशी के दिन ब्रह्मवेला में ही उठकर सुबह उठकर व्रत का संकल्‍प करना चाहिए और फिर स्‍नान करना चाहिए। इसके भगवान को पुष्प, अक्षत और दीप, नैवेद्य आदि सोलह सामग्री से विधि विधान के साथ पूजा करके भगवान कृष्ण की आरती करनी चाहिए। इस व्रत में केवल फलों का ही भोग लगाया जाता है। पूरा दिन भजन कीर्तन करते हुए भगवान का ध्‍यान करना चाहिए। संध्‍या में दीपदान करने के पश्‍चात फलाहार ग्रहण करें। उसके बाद अगले दिन सुबह भगवान श्रीकृष्‍ण की पूजा करके ब्राह्मण भोज कराना चाहिए। भोजन के बाद ब्राह्मण देवता को क्षमता के अनुसार दान देकर विदा करें। उत्पन्ना एकादशी का महत्व!!!!!!!! शास्त्रों के अनुसार, जो मनुष्‍य उत्‍पन्‍ना एकादशी का व्रत पूरे विधि विधान के साथ पूरा करते हैं, उसे सभी तीर्थों का फल प्राप्‍त होता है। व्रत रखने वाला व्‍यक्ति मोहमाया से मुक्‍त हो जाता है। अपने पुण्‍य के प्रभाव से उसे विष्‍णु लोक में स्‍थान मिलता है। व्रत रखने वाले के सभी पापों का अंत हो जाता है। पुराणों में यह भी बताया गया है कि जितना पुण्य कन्यादान, हजारों वर्षों की तपस्या और उससे अधिक पुण्य एकमात्र उत्पन्ना एकादशी व्रत करने से मिलता है। एकादशी के दिन क्या करें और क्या ना करें? पुराणों के अनुसार, जो व्रत करता है और उसके घरवाले एकादशी के दिन सदाचार का पालन करना चाहिए और चावल नहीं खाने चाहिए। इस दिन भक्‍तों को परनिंदा छल-कपट, लालच, काम भाव, भोग विलास और द्वेष की भावनाओं से दूर रहना चाहिए। व्रत के दौरान कांसे के बर्तन में भोजन नहीं करना चाहिए । ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🙏🌺🌺🌺🌺🚩

+84 प्रतिक्रिया 18 कॉमेंट्स • 3 शेयर
Seemma Valluvar Nov 29, 2021

हनुमान जी को चोला चढ़ाने की विधि और लाभ 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ हनुमान जी को चोला चढ़ाने के लाभ 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ श्री हनुमान जी को चोला चढाने से साधक को श्री हनुमान जी कृपा प्राप्त होती हैं ! ऐसा करने से श्री हनुमान जी प्रसन्न होते हैं ! हनुमान जी को चोला चढ़ाने से जातक के उपाय चल रही शनि की साढ़े साती, ढैया, दशा या अंतरदशा या राहू या केतु की दशा या अंतरदशा में हो रहे कष्ट समाप्त हो जाते हैं। साथ ही साधक के संकट और रोग दूर हो जाते हैं ! जातक की दीर्घायु होती है। यह तो आप सब जानते है की भगवान श्री हनुमान जी भगवान शिव के ग्यारहवें रूद्र अवतार हैं ! हमारे हिन्दू धर्म में सिंदूर का महत्व बताया गया हैं ! ऐसे ही हमारे हिन्दू धर्म में की भी मान्यता हैं ! साधक श्री हनुमान जी को ख़ास कर सिंदूर का चोला चढाने से श्री राम जी की भी कृपा प्राप्त होती हैं यह आपको रामायण में वर्णित मिल जायेगा। इस लेख को पढ़ने के बाद आप हनुमान जी चोला चढ़ाने में आगे से कोई भी गलती नही होगी। हनुमान जी को चोला चढ़ाने की सामग्री 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ हनुमान जी को चोला चढ़ाने के लिए श्री हनुमान जी वाला सिंदूर, गाय का घी या चमेली का तेल, शुद्ध गंगाजल मिश्रित जल, चांदी या सोने का वर्क या माली पन्ना (चमकीला कागज), धुप व् दीप , श्री हनुमान चालीसा। चोला चढ़ाने की विधि 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ हनुमान जी को चोला चढ़ाने से पहले पुराना चोला उतारकर साफ़ गंगाजल से मिश्रित जल से स्नान करना चाहिये। स्नान के बाद प्रतिमा को साफ कपड़े से पोछने के बाद सिंदूर में घी या चमेली का तेल मिलाकर गाढ़ा लेप बना ले इसके बाद सीधे हाथ से हनुमान जी के सर से आरम्भ करके सम्पूर्ण शरीर पर लेपन करें। सावधानियां 〰️〰️〰️〰️ श्री हनुमान जी को चोला मंगलवार, शनिवार या विशेष पर्व जैसे की श्री हनुमान जंयती, रामनवमी, दीपवाली, व् होली के दिन चढ़ा सकते है ! इसके अलावा अन्य दिन चढ़ाना निषेध माना गया हैं ! श्री हनुमान जी के लिए लगाने वाला सिंदूर सवा के हिसाब से लगाना चाहिए ! जैसे की सवा पाव ,सवा किलो आदि । सिंदूर में मंगलवार के दिन देसी गाय का घी एवं शनिवार के दिन केवल चमेली के तेल का ही प्रयोग करना चाहिए। हनुमान जी को चोला चढ़ाने के समय साधक को पवित्र यानी साफ़ लाल या पीले रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए ! श्री हनुमान जी चोला चढाते समय सिंदूर में गाय का घी या चमेली का तेल ही मिलाना चाहिए ! हनुमान जी को चोला चढ़ाने से पहले पुराने छोले को उतारा जरुर चाहिए और उसके बाद उस चोले को बहते हुए जल में बहा देना चाहिए ! श्री हनुमान जी की प्रतिमा पर चोला का लेपन अच्‍छी तरह मलकर, रगड़कर चढ़ाना चाहिए उसके बाद चांदी या सोने का वर्क चढ़ाना चाहिए ! चोला चढ़ाते समय दिए गये मंत्र का जाप करते रहना चाहिए ! हनुमान जी को चोला चढ़ाने का मन्त्र 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ सिन्दूरं रक्तवर्णं च सिन्दूरतिलकप्रिये । भक्तयां दत्तं मया देव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम ।। श्री हनुमान जी को स्त्री द्वारा चोला नही चढ़ाना चाहिए और ना ही चोला चढ़ाते समय स्त्री मंदिर में होनी चाहिए ! हनुमान जी को चोला चढ़ाने के समय साधक की श्वास प्रतिमा पर नही लगनी चाहिए ! श्री हनुमान जी को चोला सृष्टि क्रम ( पैरों से मस्तक तक चढ़ाने में देवता सौम्य रहते हैं ) में चढ़ाना चाहिए ! संहार क्रम ( मस्तक से पैरों तक चढ़ाने में देवता उग्र हो जाते हैं ) ! यदि आपको कोई मनोकामना पूरी करनी है तो पहले उग्र क्रम से चढ़ाये मनोकामना पूरी होने के बाद सोम्य क्रम में चढ़ाये ! चोला चढ़ाने के बाद हनुमान जी को लड्डू का भोग लगाकर नीचे दिए क्रम से धूप दीप के बाद क्षमा याचना करें। धूप-दीप : 〰️〰️〰️ अब इस मंत्र के साथ हनुमानजी को धूप-दीप दिखाएं - साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया। दीपं गृहाण देवेश त्रैलोक्यतिमिरापहम्।। भक्त्या दीपं प्रयच्छामि देवाय परमात्मने।। त्राहि मां निरयाद् घोराद् दीपज्योतिर्नमोस्तु ते।। ऊँ हनुमते नम:, दीपं दर्शयामि।। पूजन वंदन : 〰️〰️〰️〰️ इसके पश्चात एक थाली में कर्पूर एवं घी का दीपक जलाकर 11 बार श्री हनुमान चालीसा का पाठ करे व अंत में श्री हनुमानजी की आरती करें। इस प्रकार पूजन करने से हनुमानजी अति प्रसन्न होते हैं तथा साधक की हर मनोकामना पूरी करते हैं। क्षमा याचना : 〰️〰️〰️〰️ श्री हनुमानजी पूजन के पश्चात अज्ञानतावश पूजन में कुछ कमी रह जाने या गलतियों के लिए भगवान् श्री हनुमानजी के सामने हाथ जोड़कर निम्नलिखित मंत्र का जप करते हुए क्षमा याचना करे। मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरं l यत पूजितं मया देव, परिपूर्ण तदस्त्वैमेव ल आवाहनं न जानामि, न जानामि विसर्जनं l पूजा चैव न जानामि, क्षमस्व परमेश्वरं l 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ जय श्री राम 🙏🌺🚩

+115 प्रतिक्रिया 38 कॉमेंट्स • 37 शेयर
Seemma Valluvar Nov 28, 2021

(((( स्त्री का सम्मान )))) ================== सप्तऋषियों में एक ऋषि भृगु थे, वो स्त्रियों को तुच्छ समझते थे। . वो शिवजी को गुरुतुल्य मानते थे, किन्तु माँ पार्वती को वो अनदेखा करते थे। एक तरह से वो माँ को भी आम स्त्रियों की तरह साधारण और तुच्छ ही समझते थे। . महादेव भृगु के इस स्वभाव से चिंतित और खिन्न थे। . एक दिन शिव जी ने माता से कहा, आज ज्ञान सभा में आप भी चले। माँ शिव जी के इस प्रस्ताव को स्वीकार की और ज्ञान सभा में शिव जी के साथ विराजमान हो गई। . सभी ऋषिगण और देवताओ ने माँ और परमपिता को नमन किया और उनकी प्रदक्षिणा की और अपना अपना स्थान ग्रहण किया.. . किन्तु भृगु माँ और शिव जी को साथ देख कर थोड़े चिंतित थे, उन्हें समझ नही आ रहा था कि वो शिव जी की प्रदक्षिणा कैसे करे। . बहुत विचारने के बाद भृगु ने महादेव जी से कहा कि वो पृथक खड़े हो जाये। . शिव जी जानते थे भृगु के मन की बात। . वो माँ को देखे, माता उनके मन की बात पढ़ ली और वो शिव जी के आधे अंग से जुड़ गई और अर्धनारीश्वर रूप में विराजमान हो गई। . अब तो भृगु और परेशान, कुछ पल सोचने के बाद भृगु ने एक राह निकाली। . भवरें का रूप लेकर शिवजी के जटा की परिक्रमा की और अपने स्थान पर खड़े हो गए। . माता को भृगु के ओछी सोच पे क्रोध आ गया। उन्होंने भृगु से कहा- भृगु तुम्हे स्त्रियों से इतना ही परहेज है तो क्यूँ न तुम्हारे में से स्त्री शक्ति को पृथक कर दिया जाये.. . और माँ ने भृगु से स्त्रीत्व को अलग कर दिया। . अब भृगु न तो जीवितों में थे न मृत थे। उन्हें आपार पीड़ा हो रही थी.. . वो माँ से क्षमा याचना करने लगे.. . तब शिव जी ने माँ से भृगु को क्षमा करने को कहा। . माँ ने उन्हें क्षमा किया और बोली - संसार में स्त्री शक्ति के बिना कुछ भी नही। बिना स्त्री के प्रकृति भी नही पुरुष भी नही। . दोनों का होना अनिवार्य है और जो स्त्रियों को सम्मान नही देता वो जीने का अधिकारी नही। . आज संसार में अनेकों ऐसे सोच वाले लोग हैं। उन्हें इस प्रसंग से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। . वो स्त्रियों से उनका सम्मान न छीने। खुद जिए और स्त्रियों के लिए भी सुखद संसार की व्यवस्था बनाए रखने में योगदान दें। ====================================== हर हर महादेव 🙏🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🚩

+185 प्रतिक्रिया 73 कॉमेंट्स • 45 शेयर
Seemma Valluvar Nov 27, 2021

#दिव्य_दाम्पत्य मनु और शतरूपा ने जब अपनी पुत्री देवहूति का हाथ कर्दम ऋषि के हाथ में देने की इच्छा प्रकट की। तो कर्दम ने कहा-'मैं भोग-विलास के लिये नहीं, परंतु पत्नी के साथ नित्य सत्संग करके आत्मसुख प्राप्त करने के लिये ही विवाह करना चाहता हूँ। मुझे भोगपत्नी नहीं, धर्मपत्नी चाहिये। हमारा सम्बन्ध संसार का उपभोग करने के लिये नहीं, बल्कि नाव और नाविक की तरह संसार-सागर पार करने के लिये होगा। अत: एक पुत्र की प्राप्ति के बाद मैं संन्यास ले लूँगा। क्या आपको स्वीकार्य है?' मनु-शतरूपा बड़ी उलझन में पड़े, किंतु देवहूति ने तपस्वी की सेवा स्वीकार कर ली और वल्कल वस्त्र पहन लिये। विवाह के बाद दम्पती ने बारह वर्ष तक ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन किया और पत्नी ने पति-सेवा के व्रत का निर्वाह किया। सेवा से प्रसन्न होकर कर्दम ने पत्नी की इच्छा को पूर्ण करना चाहा तो पत्नी ने कहा, 'और दूसरी वस्तु क्या माँगूँ ? हाथ पकड़कर लाये हो तो हाथ पकड़कर प्रभु के दरबार में भी पहुँचा दीजिये।' ऐसे दिव्य दाम्पत्य के द्वार पर ही भगवान् कपिल पुत्ररूप में पधारे। विवाह के बारे में कैसी सुन्दर जीवन-दृष्टि है। जय श्री राधेकृष्णा 🙏🌺🌺🌺🌺🚩

+136 प्रतिक्रिया 46 कॉमेंट्स • 30 शेयर
Seemma Valluvar Nov 27, 2021

*कलियुग के जागृत देवता काल भैरव* काशी में बाबा विश्वनाथ के बाद यदि किसी का महत्व है, तो वे हैं काशी के कोतवाल काल भैरव। बनारस के लोगों की मान्यता है कि काशी विश्वेश्वर के इस शहर में रहने के लिए बाबा काल भैरव की इजाजत जरूरी है क्योंकि दैवीय विधान के अनुसार वे इस शहर के प्रशासनिक अधिकारी हैं। श्रद्धालुओं में काशी के काल भैरव मंदिर विशेष मान्यता है। कहा जाता है कि बाबा विश्वनाथ के दर्शन के बाद जो भक्त इनके दर्शन नहीं करता है, उसको पूजा का पूरा फल नहीं मिलता। *काल भैरव को तंत्र का प्रमुख देवता माना जाता है।* भगवान शंकर के अवतारों में काल भैरव का विशिष्ट महत्व है। शिव पुराण में काल भैरव का देवाधिदेव महादेव शिवशंकर के अंशावतार रूप में विस्तृत वर्णन मिलता है। तंत्राचार्यों की मान्यता है कि जिस प्रकार अपौरुषेय वेदों में आदि पुरुष का चित्रण रुद्र रूप में किया गया है; तंत्र शास्त्र में वही मान्यता काल भैरव की है। तंत्र साधक इन्हें कलियुग का जागृत देवता मानते हैं। शास्त्रीय मान्यता के मुताबिक मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी को प्रदोष काल में भगवान शंकर के अंश से भैरव की उत्पत्ति हुई थी। इसलिए इस तिथि को भैरव जयंती के रूप में मनाया जाता है। तंत्रशास्त्र के विशेषज्ञ भैरव की उत्पत्ति शिव के रुधिर से हुई मानते हैं। शिवपुराण में वर्णित कथानक के मुताबिक अनुसार एक बार आदि योगी महादेव शिव ध्यान समाधि में लीन थे। उसी वक्त शक्तिमद के अहंकार में चूर महादैत्य आक्रमण कर उनकी समाधि तोड़ दी। ध्यान में इस अप्रत्याशित व्यवधान से भगवान शिव का क्रोध भड़क उठा और उनकी क्रोधाग्नि उत्पन्न काल भैरव ने तत्क्षण अंधकासुर का अंत कर डाला। वहीं स्कंदपुराण के काशी-खंड में कथानक है कि एक बार काशी में आयोजित धर्मसभा में सभी देवों व ऋषि मुनियों द्वारा सर्वसम्मति से महादेव की सर्वोच्चता स्वीकार करने से सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने रुष्ट होकर शिव तथा उनके गणों को अपमानजनक वचन कहे। इस पर भगवान शिव व महाकाली के शरीर से निकले तेजपुंज ने आपस में समाहित होकर प्रचंड काया का रूप धारण कर लिया। उस महाकाय आकृति को अपने पर आक्रमण को उद्यत देख ब्रह्मा जी अत्यंत भयभीत हो उठे। तब शिव ने मध्यस्थता कर किसी तरह उसको शांत कर ब्रह्मा जी को भयमुक्त किया। तब जाकर वह विकराल रूप वाला शिव अंश शांत हुआ और काल भैरव के नाम से लोक विख्यात हुआ। तदनंतर, भगवान शिव ने उसे काशी का द्वारपाल नियुक्त कर दिया। काशी में बाबा विश्वनाथ के बाद यदि किसी का महत्व है, तो वे हैं काशी के कोतवाल काल भैरव। बनारस के लोगों की मान्यता है कि काशी विश्वेश्वर के इस शहर में रहने के लिए बाबा काल भैरव की इजाजत जरूरी है क्योंकि दैवीय विधान के अनुसार वे इस शहर के प्रशासनिक अधिकारी हैं। श्रद्धालुओं में काशी के काल भैरव मंदिर विशेष मान्यता है। कहा जाता है कि बाबा विश्वनाथ के दर्शन के बाद जो भक्त इनके दर्शन नहीं करता है, उसको पूजा का पूरा फल नहीं मिलता। *काशी के कालभैरव की आठ चौकियां हैं- भीषण भैरव, संहार भैरव, उन्मत्त भैरव, क्रोधी भैरव, कपाल भैरव, असितंग भैरव, चंड भैरव और रौरव भैरव।* काशी की ही तरह महाकाल की नगरी उज्जैन में भी एक ऐसा मंदिर है जहां काल भैरव स्वयं अपनी उपस्थिति का अहसास कराते हैं। यहां हर दिन भगवान काल भैरव भक्तों की मदिरा रूपी बुराई को निगल लेते हैं और उनके हर कष्ट को सहज ही दूर कर देते हैं। ज्ञात हो कि काल भैरव के इस मंदिर में मुख्य रूप से मदिरा का ही प्रसाद चढ़ता है। मंदिर के पुजारी भक्तों के द्वारा चढ़ाए गए प्रसाद को एक तश्तरी में उड़ेल कर भगवान के मुख से लगा देते हैं और देखते -देखते ही भक्तों की आंखों के सामने जो घटता है वह चमत्कार जिसे देखकर भी यकीन करना एक बार को मुश्किल हो जाता है। बाबा काल भैरव के इस धाम एक और बड़ी दिलचस्प चीज है जो भक्तों का ध्यान बरबस अपनी ओर खींच लेती है और वह है मंदिर परिसर में मौजूद ये दीपस्तंभ। श्रद्धालुओं द्वारा दीपस्तंभ की इन दीपमालिकाओं को प्रज्ज्वलित करने से मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। नाथ सम्प्रदाय में काल भैरव की पूजा की विशेष महत्ता है। इस पंथ के अनुयायी मानते हैं कि भैरव देव की उपासना कल्पवृक्ष के समान फलदायी होती है। श्री तत्वनिधि नाम तंत्र शास्त्र में भैरव शब्द के तीन अक्षरों में उनके त्रिगुणात्मक स्वरूप का तत्वज्ञान वर्णित है। इसी तरह भैरव तंत्र में भैरव पद या भैरवी पद प्राप्त करने के लिए भगवान शिव ने देवी के समक्ष 112 विधियों का उल्लेख किया है जिनके माध्यम से उक्त अवस्था को प्राप्त हुआ जा सकता है। भैरव के सौम्य स्वरूप बटुक भैरव व आनंद भैरव कहते हैं। उक्त सौम्य स्वरूप की आराधना शीघ्र फलदायी मानी जाती है। तंत्र शास्त्र अनुसार शनि और राहु की बाधाओं से मुक्ति के लिए भैरव की पूजा अचूक होती है। *कहा जाता है कि काल भैरव की पूजा से घर में नकारात्मक ऊर्जा, जादू-टोने, भूत-प्रेत आदि काली शक्तियों का भय नहीं रहता। जन विश्वास है कि इनकी आराधना से शत्रु से मुक्ति, संकट, कोर्ट-कचहरी के मुकदमों में विजय की प्राप्ति होती है।* बताते चलें कि इन दिनों तंत्र शास्त्र में भैरव की कृपा पाने के लिए वाममार्गी कापालिक क्रियाओं का प्रयोग प्रचलन में अधिक है। मगर शास्त्रों में इस पद्धति का निषेध तथा भैरव की सौम्य उपासना पर बल दिया गया है। भैरव का भयावह चित्रण कर तथा घिनौनी तांत्रिक क्रियाएं कर लोगों में उनके प्रति एक डर और उपेक्षा का भाव भरने वाले तांत्रिकों और अन्य पूजकों को भगवान भैरव माफ करें। दरअसल भैरव वैसे नहीं है जैसा कि उनका चित्रण किया गया है। उनका चरित्र बहुत ही सौम्य, सात्विक और साहसिक है। भैरव साधकों को कुत्ते को कभी दुत्कारे नहीं चाहिए बल्कि उसे भरपेट भोजन कराएं। सात्विक आराधना करें। भैरव साधना में अपवित्रता वर्जित मानी गई है,,,✍

+97 प्रतिक्रिया 22 कॉमेंट्स • 3 शेयर