Seemma Valluvar May 15, 2022

*आपके घर में जब तक कोई पुण्य शाली व्यक्ति रहता है, तब तक आपके घर में कोई नुकसान नहीं कर सकता................ *👌जब तक विभीषणजी लंका में रहते थे , तब तक रावण ने कितना भी पाप किया, परंतु विभीषणजी के पुण्य के कारण रावण सुखी रहा। *परंतु जब विभीषणजी जैसे भगवत वत्सल भक्त को लात मारी और लंका से निकल जाने के लिए कहा, तब से रावण का विनाश होना शुरू हो गया। *अंत में रावण की सोने की लंका का दहन हो गया और रावण के पीछे कोई रोने वाला भी नहीं बचा। *👌ठीक इसी तरह हस्तिनापुर में जब तक विदुरजी जैसे भक्त रहते थे , तब तक कौरवों को सुख ही सुख मिला। *परंतु जैसे ही कौरवों ने विदुरजी का अपमान करके राज्यसभा से चले जाने के लिए कहा और विदुर जी का अपमान किया, तब भगवान श्री कृष्ण जी ने विदुरजी से कहा कि काका आप अभी तीर्थ यात्रा के लिए प्रस्थान करिए और भगवान के तीर्थ स्थानों पर यात्रा करिए। *और भगवान श्री कृष्णजी ने विदुरजी को तीर्थ यात्रा के लिए भेज दिया ,और जैसे ही विदुर जी ने हस्तिनापुर को छोड़ा , कौरवों का पतन होना चालू हो गया और अंत में राज भी गया और कौरवों के पीछे कोई कौरवों का वंश भी नहीं बचा। *👌इसी तरह हमारे परिवार में भी जब तक कोई भक्त और पुण्य शाली आत्मा होती है, तब तक हमारे घर में आनंद ही आनंद रहता है। *इसलिए भगवान के भक्तजनों का अपमान कभी न करें। *और हां ,हम जो कमाई खाते हैं वह पता नहीं किसके पुण्य के द्वारा मिल रही है। इसलिए हमेशा आनंद में रहें ,और कोई भक्त ,परिवार में भक्ति करता हो तो उसका अपमान ना करें, उसका सम्मान करें, और उसके मार्गदर्शन मे चलने की कोशिश करें । पता नहीं संसार की गाड़ी किस के पुण्य से चलती है। *ईश्वर, शास्त्र , गुरु के प्रति समर्पित रहें। धर्म की जड़ जहाँ होगी वहाँ अशुभ कर्म आने से डरेंगे। *👌माता-पिता , बड़े बुजुर्गों और अतिथि का हमेशा सम्मान करें। 🙏🌹 ॐ सूर्याय नमः 🙏🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🚩

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Seemma Valluvar May 14, 2022

मैंने सुना है, एक सम्राट अपने बेटे के पास बैठा है। उसका बेटा मरने के करीब है। और एक ही बेटा है। आठ रातें हो गई हैं, और वह न तो बचाया जा सकता है, न मृत्यु आ रही है, बहुत मुश्किल हो गयी है। अब यह खुद ही सोचने लगा है कि इतनी पीड़ा है कि मर ही जाए। मन कहता है कि बच जाए, लेकिन एक मन कहता है कि इतना दुख, इतनी पीड़ा है कि मर ही जाए तो भी ठीक है। आठ रात से सम्राट सोया नहीं है। कोई चार बजे होंगे रात के और सम्राट को झपकी लग गई है। और उस झपकी में वह सपना देखने लगता’ है। और सपने अक्सर हम वही देखते हैं, जो जिंदगी में कमी रह जाती है। एक ही बेटा था और वह भी मरने के करीब पहुंच रहा है। तो उसने सपना देखा है कि उसके बारह बेटे हैं। और वे बड़े सुंदर हैं, उनकी स्वर्ण जैसी काया है, बड़े —बड़े महल हैं, बड़ा साम्राज्य है, सारी पृथ्वी का वह मालिक है और बड़े आनंद में है। और वह यह सपना देख ही रहा था …. क्योंकि सपना देखने में बहुत देर नहीं लगती है। सपने का टाइमिंग जो है वह हमारी जिंदगी के समय की धारा से बिलकुल भिन्न है। तो हम क्षण में वर्षों का सपना देख सकते हैं। एक क्षण झपकी लगे, आप इतना बड़ा सपना देख सकते हैं कि वर्षों तक फैल जाए और जागकर आपको मुश्किल मालूम पड़े कि इन कुछ क्षणों में वर्षों का सपना कैसे देख लिया! असल में समय की गति सपने में बहुत तीव्र है। कहीं एक क्षण में वर्षों पार किए जा सकते हैं। तो उस एक क्षण में उसने सपना देख लिया है, बारह लड़के हैं, उनकी सुंदर स्त्रियां हैं, बड़े सुंदर भवन हैं, बड़ा राज्य है। और तभी उसका वह बाहर का लड़का मर गया। पत्नी चीख मारकर चिल्लायी है तो सम्राट की नींद खुल गयी। नींद टूटी तो वह एकदम से चौंका हुआ उठा। पत्नी ने समझा कि शायद वह घबरा गया है। उसने पूछा, इतने घबरा क्यों गये हो, आंखों में आंसू भी नहीं हैं! कुछ बोलते भी नहीं हो! सम्राट ने कहा, नहीं, मैं घबरा नहीं गया हूं, बड़ी मुश्किल में पड गया हूं। मैं यह सोचता हूं कि मैं किसके लिए रोऊं। अभी बारह लड़के थे, वे खो गये, उनके लिए रोऊं। या एक लड़का यह खो गया है, इसके लिए रोऊं! मैं इस चिंता में पड गया हूं कि कौन मरा है। और मजा यह है कि जब मैं उन बारह लड़कों के बीच में था, तो इस लड़के का मुझे कोई पता नहीं था, यह था ही नहीं। यह खो गया था, तू खो गई थी, यह महल खो गया था। अब यह महल है, तू है, यह लड़का है; लेकिन वे महल खो गए, वे लड़के खो गए। कौन सत्य है? यह सत्य है या वह? और मैं बड़ी मुश्किल में पड़ गया हूं। अगर एक बार पिछले जन्मों का स्मरण आ जाए, तो आप बड़ी मुश्किल में पड़ जाएंगे कि जो अभी देख रहा हूं, वह सत्य है? क्योंकि ऐसा तो बहुत बार देखा है, लेकिन सब मिट गया है, सब खो गया है। तो एक सवाल उठ जाएगा कि जो हम देख रहे हैं वह, वह भी उतना ही सच है जितना वह था। वह भी एक सपने की तरह दौड़ जाएगा और मिट जाएगा। और जैसे सब सपने अंत तक पहुंच गए, वैसे ही यह सपना भी अंत तक पहुंच जायेगा। श्री कृष्ण शरणं मम 🙏🌺🌺🌺🌺🚩

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Seemma Valluvar May 13, 2022

*तारा रानी की कथा*🌺🌺👏 माता के जगराते में महारानी तारा देवी की कथा कहने व सुनने की परम्‍परा प्राचीन काल से चली आई है। बिना इस कथा के जागरण को सम्‍पूर्ण नहीं माना जाता है, यद्यपि पुराणों या ऐतिहासिक पुस्‍तकों में कोई उल्‍लेख नहीं है – तथापि माता के प्रत्‍येक जागरण में इसको सम्मिलित करने का परम्‍परागत विधान है। कथा इस प्रकार है राजा स्‍पर्श मां भगवती का पुजारी था, दिन रात महामाई की पूजा करता था । मां ने भी उसे राजपाट, धन-दौलत, ऐशो-आराम के सभी साधन दिये था, कमी थी तो सिर्फ यह कि उसके घर में कोई संतान न थी, यही गम उसे दिन-रात सताता, वो मां से यही प्रार्थना करता रहता था कि मां मुझे एक लाल बख्‍श दो, ताकि मैं भी संतान का सुख भोग सकूं, मेरे पीछे भी मेरा नाम लेने वाला हो, मेरा वंश भी चलता रहे, मां ने उसकी पुकार सुन ली, एक दिन मां ने आकर राजा को स्‍वप्‍न में दर्शन दिये और कहा है, हे राजन, मैं तेरी भक्ति से बहुत प्रसन्‍न हूं, और तुझे वरदान देती हूं कि तेरे घर में दो कन्‍याएं जन्‍म लेंगी। कुछ समय के बाद राजा के घर में एक कन्‍या ने जन्‍म लिया, राजा ने अपने राज दरबारियों को बुलाया, पण्डितों व ज्‍योतिषों को बुलाया और बच्‍ची की जन्‍म कुण्‍डली तैयार करने का हुक्‍म दिया। पण्डित तथा ज्‍योतिषियों ने उस बच्‍ची की जन्‍म कुण्‍डली तैयार की और कहा हे राजन, यह कन्‍या तो साक्षात देवी है। यह कन्‍या जहां भी कदम रखेगी, वहां खुशियां ही खुशियां होंगी। यह कन्‍या भी भगवती की पुजारिन होगी, उस कन्‍या का नाम तारा रखा गया, थोड़े समय बाद राजा के घर वरदान के अनुसार एक और कन्‍या ने जन्‍म लिया। मंगलवार का दिन था, पण्डितों और ज्‍योतिषियों ने जब जन्‍म कुण्‍डली तैयार की तो उदास हो गये, राजा ने उदासी का करण पूछा तो वे कहने लगे, महाराज यह कन्‍या आपके लिये शुभ नहीं है, राजा ने उदास होकर ज्‍योतिषियों से पूछा कि मैने ऐसे कौन से बुरे कर्म किये हैं जो कि इस कन्‍या ने मेरे घर में जन्‍म लिया है, उस समय ज्‍योतिषियों ने अपनी ज्‍योतिष लगाकर बताया, कहने लगे कि ये दोनो कन्‍याएं जिन्‍होंने आपके घर में जन्‍म लिया है, पिछले जन्‍म में राजा इन्‍द्र की अप्‍सराएं थीं, इन्‍होंने सोचा कि हम भी मृत्‍युलोक में भ्रमण करें तथा देखें कि मृत्‍युलोक पर लोग किस तरह रहते हैं, दोनो ने मृत्‍युलोक पर आ एकादशी का व्रत रखा, बड़ी बहन का नाम तारा था, छोटी बहन का नाम रूक्‍मन, बड़ी बहन तारा ने अपनी छोटी बहन से कहा कि रूक्‍मन आज एकादशी का व्रत है, हम लोगों ने आज भोजन नहीं खाना, तू बाजार जाकर फल ले आ, रूक्‍मन बाजार फल लेने के लिये गई, वहां उसने मछली के पकोड़े बनते देखे। उसने अपने पैसों के तो पकोड़े खा लिये तथा तारा के लिये फल लेकर वापस आ गई, फल उसने तारा को दे दिये, तारा ने पूछा कि तू अपने लिये फल क्‍यों नहीं लाई, तो रूक्‍मन ने बताया कि उसने मछली के पकोड़े खा लिये हैं। उसी वक्‍त तारा ने शाप दिया, जा नीच, तूने एकादशी के दिन मांस खाया है, नीचों का कर्म किया है, जा मैं तुझे शाप देती हूं, तू नीचों की जून पाये। छिपकली बनकर सारी उम्र मांस ही ‘कीड़े-मकोड़े’ खाती रहे, उसी शहर में एक ऋषि गुरू गोरख अपने शिष्‍यों के साथ रहते थे, उनके शिष्‍यों में एक चेला तेज स्‍वभाव का तथा घमण्‍डी था, एक दिन वो घमण्‍डी शिष्‍य पानी का कमण्‍डल भरकर खुले स्‍थान में, एकान्‍त में, जाकर तपस्‍या पर बैठ गया, वो अपनी तपस्‍या में लीन था, उसी समय उधर से एक प्‍यासी कपिला गाय आ गई, उस ऋषि के पास पड़े कमण्‍डल में पानी पीने के लिए उसने मुंह डाला और सारा पानी पी गई, जब कपिता गाय ने मुंह बाहर निकाला तो खाली कमण्‍डल की आवाज सुनकर उस ऋषि की समाधि टूटी। उसने देखा कि गाय ने सारा पानी पी लिया था, ऋषि ने गुस्‍से में आ उस कपिला गाय को बहुत बुरी तरह चिमटे से मारा, वह गाय लहुलुहान हो गई, यह खबर गुरू गोरख को मिली, उन्‍होंने जब कपिला गाय की हालत देखी तो उस ऋषि को बहुत बुरा-भला कहा और उसी वक्‍त आश्रम से निकाल दिया, गुरू गोरख ने गाय माता पर किये गये पाप से छुटकारा पाने के लिए कुछ समय बाद एक यज्ञ रचाया, इस यज्ञ का पता उस शिष्‍य को भी चल गया, जिसने कपिला गाय को मारा था, उसने सोचा कि वह अपने अपमान का बदला जरूर लेगा, यज्ञ शुरू हो गया, उस चेले ने एक पक्षी का रूप धारण किया और चोंच में सर्प लेकर भण्‍डारे में फेंक दिया, जिसका किसी को पता न चला, एक छिपकली ‘जो पिछले जन्‍म में तारा देवी की छोटी बहन थी, तथा बहन के शाप को स्‍वीकार कर छिपकली बनी थी’ सर्प का भण्‍डारे में गिरना देख रही थी, उसे त्‍याग व परोपकार की शिक्षा अब तक याद थी, वह भण्‍डारा होने तक घर की दीवार पर चिपकी समय की प्रतीक्षा करती रही, कई लोगो के प्राण बचाने हेतु उसने अपने प्राण न्‍योछावर कर लेने का मन ही मन निश्‍चय किया, अब खीर भण्‍डारे में दी जाने वाली थी, बांटने वालों की आंखों के सामने वह छिपकली दीवार से कूदकर कढ़ाई में जा गिरी, नादान लोग छिपकली को बुरा-भला कहते हुये खीर की कढ़ाई को खाली करने लगे, उन्‍होंने उसमें मरे हुये सांप को देखा, तब सबको मालूम हुआ कि छिपकली ने अपने प्राण देकर उन सबके प्राणों की रखा की है, उपस्थित सभी सज्‍जनों और देवताओं ने उस छिपकली के लिए प्रार्थना की कि उसे सब योनियों में उत्‍तम मनुष्‍य जन्‍म प्राप्‍त हो तथा अन्‍त में वह मोक्ष को प्राप्‍त करे, तीसरे जन्‍म में वह छिपकली राजा स्‍पर्श के घर कन्‍या जन्‍मी, दूसरी बहन ‘तारा देवी’ ने फिर मनुष्‍य जन्‍म लेकर तारामती नाम से अयोध्‍या के प्रतापी राजा हरिश्‍चन्‍द्र के साथ विवाह किया। राजा स्‍पर्श ने ज्‍योतिषियों से कन्‍या की कुण्‍डली बनवाई ज्‍योतिषियों ने राजा को बताया कि कन्‍या आपके लिये हानिकारक सिद्ध होगी, शकुन ठीक नहीं है, अत: आप इसे मरवा दीजिए, राजा बोले लड़की को मारने का पाप बहुत बड़ा है, मैं उस पाप का भार नहीं बन सकता। तब ज्‍योतिषियों ने विचार करके राय दी, हे राजन । आप एक लकड़ी के सन्‍दूक में ऊपर से सोना-चांदी आदि जड़वा दें, फिर उस सन्‍दूक के भीतर लड़की को बन्‍द करके नदी में प्रवाहित कर दीजिए, सोने चांदी से जड़ा हुआ सन्‍दूक अवश्‍य ही कोई लालच से निकाल लेगा, और आपकी हत्‍या कन्‍या को भी पाल लेगा, आपको किसी प्रकार का पाप न लगेगा, ऐसा ही किया गया और नदी में बहता हुआ सन्‍दूक काशी के समीप एक भंगी को दिखाई दिया वह सन्‍दूक को नदी से बाहर निकाल लाया। उसने जब सन्‍दूक खोला तो सोने-चांदी के अतिरिक्‍त अत्‍यन्‍त रूपवान कन्‍या दिखाई दी, उस भंगी के कोई संतान नहीं थी, उसने अपनी पत्‍नी को वह कन्‍या लाकर दी तो पत्‍नी की प्रसन्‍नता का ठिकाना न रहा, उसने अपनी संतान के समान ही बच्‍ची को छाती से लगा लिया, भगवती की कृपा से उसके स्‍तनो में दूध उतर आया, पति-पत्‍नी दोनो ने प्रेम से कन्‍या का नाम ‘रूक्‍को’ रख दिया, रूक्‍को बड़ी हुई उसका विवाह हुआ। रूक्‍को की सास महाराजा हरिश्‍चन्‍द्र के घर सफाई आदि का काम करने जाया करती थी, एक दिन वह बीमार पड़ गई, रूक्‍को महाराजा हरिश्‍चन्‍द्र के घर काम करने के लिये पहुंच गई, महाराज की पत्‍नी तारामती ने जब रूक्‍को को देखा तो वह अपने पूर्व जन्‍म के पुण्‍य से उसे पहचान गई, तारामती ने रूक्‍को से कहा – हे बहन, तुम मेरे यहां निकट आकर बैठो, महारानी की बात सुनकर रूक्‍को बोली- रानी जी, मैं नीच जाति की भंगिन हूं, भला मैं आपके पास कैसे बैठ सकती हूं । तब तारामती ने कहा – बहन, पूर्व जन्‍म में तुम मेरी सगी बहन थी, एकादशी का व्रत खंडित करने के कारण तुम्‍हें छिपकली की योनि में जाना पड़ा जो होना था सो हो चुका, अ‍ब तुम अपने इस जन्‍म को सुधारने का उपाय करो तथा भगवती वैष्‍णों माता की सेवा करके अपना जन्‍म सफल बनाओ, यह सुनकर रूक्‍को को बड़ी प्रसन्‍नता हुई और उसने उपाय पूछा, रानी ने बताया कि वैष्‍णों माता सब मनोरथों को पूरा करने वाली हैं, जो लोग श्रद्धापूर्वक माता का पूजन व जागरण करते हैं, उनकी सब मनोकाना पूर्ण होती है । रूक्‍को ने प्रसन्‍न होकर माता की मनौती करते हुये कहा – हे माता, यदि आपकी कृपा से मुझे एक पुत्र प्राप्‍त हो गया तो मैं भी आपका पूजन व जागरण करवाऊंगी । माता ने प्रार्थना को स्‍वीकार कर लिया, फलस्‍वरूप दसवें महीने उसके गर्भ से एक अत्‍यन्‍त सुन्‍दर बालक ने जन्‍म लिया, परन्‍तु दुर्भाग्‍यवश रूक्‍को को माता का पूजन-जागरण कराने का ध्‍यान न रहा। जब वह बालक पांच वर्ष का हुआ तो एक दिन उसे माता (चेचक) निकल आई । रूक्‍को दु:खी होकर अपने पूर्वजन्‍म की बहन तारामती के पास आई और बच्‍चे की बीमारी का सब वृतान्‍त कह सुनाया। तब तारामती ने कहा – तू जरा ध्‍यान करके देख कि तुझसे माता के पूजन में कोई भूल तो नहीं हुई । इस पर रूक्‍को को छह वर्ष पहले की बात याद आ गई। उसने अपराध स्‍वीकार कर लिया, उसने फिर मन में निश्‍चय किया कि बच्‍चे को आराम आने पर जागरण अवश्‍य करवायेगी । भगवती की कृपा से बच्‍चा दूसरे दिन ही ठीक हो गया। तब रूक्‍को ने देवी के मन्दिर में ही जाकर पंडित से कहा कि मुझे अपने घर माता का जागरण करना है, अत: आप मंगलवार को मेरे घर पधार कर कृतार्थ करें। पंडित जी बोले – अरी रूक्‍को, तू यहीं पांच रूपये दे जा हम तेरे नाम से मन्दिर में ही जागरण करवा देंगे तू नीच जाति की स्‍त्री है, इसलिए हम तेरे घर में जाकर देवी का जागरण नहीं कर सकते। रूक्‍को ने कहा – हे पंडित जी, माता के दरबार में तो ऊंच- नीच का कोई विचार नहीं होता, वे तो सब भक्‍तों पर समान रूप से कृपा करती हैं। अत: आपको कोई एतराज नहीं होना चाहिए। इस पर पंडित ने आपस में विचार करके कहा कि यदि महारानी तुम्‍हारे जागरण में पधारें तब तो हम भी स्‍वीकार कर लेंगे। यह सुनकर रूक्‍को महारानी के पास गई और सब वृतान्‍त कर सुनाया, तारामती ने जागरण में सम्मिलित होना सहर्ष स्‍वीकार कर लिया, जिस समय रूक्‍को पंडितो से यह कहने के लिये गई महारानी जी जागरण में आवेंगी, उस समय सेन नाई वहां था, उसने सब सुन लिया और महाराजा हरिश्‍चन्‍द्र को जाकर सूचना दी । राजा को सेन नाई की बात पर विश्‍वास नहीं हुआ, महारानी भंगियों के घर जागरण में नहीं जा सकती, फिर भी परीक्षा लेने के लिये उसने रात को अपनी उंगली पर थोड़ा सा चीरा लगा लिया जिससे नींद न आए । रानी तारामती ने जब देखा कि जागरण का समय हो रहा है, परन्‍तु महाराज को नींद नहीं आ रही तो उसने माता वैष्‍णों देवी से मन ही मन प्रार्थना की कि हे माता, आप किसी उपाय से राजा को सुला दें ताकि मैं जागरण में सम्मिलित हो सकूं । राजा को नींद आ गई, तारामती रोशनदान से रस्‍सा बांधकर महल से उतरीं और रूक्‍को के घर जा पहुंची। उस समय जल्‍दी के कारण रानी के हांथ से रेशमी रूमाल तथा पांव का एक कंगन रास्‍ते में ही गिर पड़ा, उधर थोड़ी देर बाद राजा हरिश्‍चन्‍द्र की नींद खुल गई। वह भी रानी का पता लगाने निकल पड़ा। उसने मार्ग में कंगन व रूमाल देखा, राजा ने दोनो चीजें रास्‍ते से उठाकर अपने पास रख लीं और जहां जागरण हो रहा था, वहां जा पहुंचा वह एक कोने में चुपचाप बैठकर दृश्‍य देखने लगा। जब जागरण समाप्‍त हुआ तो सबने माता की अरदास की, उसके बाद प्रसाद बांटा गया, रानी तारामती को जब प्रसाद मिला तो उसने झोली में रख लिया। यह देख लोगों ने पूछा आपने प्रसाद क्‍यों नहीं खाया ? यदि आप न खाएंगी तो कोई भी प्रसाद नहीं खाएगा, रानी बोली- तुमने प्रसाद दिया, वह मैने महाराज के लिए रख लिया, अब मुझे मेरा प्रसाद दे दें, अबकी बार प्रसाद ले तारा ने खा लिया, इसके बाद सब भक्‍तों ने मां का प्रसाद खाया, इस प्रकार जागरण समाप्‍त करके, प्रसाद खाने के पश्‍चात् रानी तारामती महल की तरफ चलीं। तब राजा ने आगे बढ़कर रास्‍ता रोक लिया, और कहा- तूने नीचों के घर का प्रसाद खा अपना धर्म भ्रष्‍ट कर लिया, अब मैं तुझे अपने घर कैसे रखूं ? तूने तो कुल की मर्यादा व प्रतिष्‍ठा का भी ध्‍यान नहीं रखा, जो प्रसाद तू अपनी झोली में मेरे लिये लाई है, उसे खिला मुझे भी तू अपवित्र करना चाहती है। ऐसा कहते हुऐ जब राजा ने झोली की ओर देखा तो भगवती की कृपा से प्रसाद के स्‍थान पर उसमें चम्‍पा, गुलाब, गेंदे के फूल, कच्‍चे चावल और सुपारियां दिखाई दीं यह चमत्‍कार देख राजा आश्‍चर्यचकित रह गया, राजा हरिश्‍चन्‍द्र रानी तारा को साथ ले महल लौट आए, वहीं रानी ने ज्‍वाला मैया की शक्ति से बिना माचिस या चकमक पत्‍थर की सहायता के राजा को अग्नि प्रज्‍वलित करके दिखाई, जिसे देखकर राजा का आश्‍चर्य और बढ़ गया। रानी बोली – प्रत्‍यक्ष दर्शन पाने के लिऐ बहुत बड़ा त्‍याग होना चाहिए, यदि आप अपने पुत्र रोहिताश्‍व की बलि दे सकें तो आपको दुर्गा देवी के प्रत्‍यक्ष दर्शन हो जाएंगे। राजा के मन में तो देवी के दर्शन की लगन हो गई थी, राजा ने पुत्र मोह त्‍याग‍कर रोहिताश्‍व का सिर देवी को अर्पण कर दिया, ऐसी सच्‍ची श्रद्धा एवं विश्‍वास देख दुर्गा माता, सिंह पर सवार हो उसी समय प्रकट को गईं और राजा हरिश्‍चन्‍द्र दर्शन करके कृतार्थ हो गए, मरा हुआ पुत्र भी जीवित हो गया। चमत्‍कार देख राजा हरिश्‍चन्‍द्र गदगद हो गये, उन्‍होंने विधिपूर्वक माता का पूजन करके अपराधों की क्षमा मांगी। इसके बाद सुखी रहने का आशीर्वाद दे माता अन्‍तर्ध्‍यान हो गईं। राजा ने तारा रानी की भक्ति की प्रशंसा करते हुऐ कहा हे – तारा तुम्‍हारे आचरण से अति प्रसन्‍न हूं। मेरे धन्‍य भाग, जो तुम मुझे पत्‍नी रूप में प्राप्‍त हुई। आयुपर्यन्‍त सुख भोगने के पश्‍चात् राजा हरिश्‍चन्‍द्र, रानी तारा एवं रूक्‍मन भंगिन तीनों ही मनुष्‍य योनि से छूटकर देवलोक को प्राप्‍त हुये। माता के जागरण में तारा रानी की कथा को जो मनुष्‍य भक्तिपूर्वक पढ़ता या सुनता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, सुख-समृद्धि बढ़ती है, शत्रुओं का नाश होता है। इस कथा के बिना माता का जागरण पूरा नहीं माना जाता है। जय माता दी 🙏🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🚩

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Seemma Valluvar May 12, 2022

⚛️ पाप कहाँ - कहाँ तक जाता है ?⚛️ --------------------------------- बड़ी ही मजेदार कहानी,एक बार जरुर पढ़े --------------------------------- एक बार एक ऋषि ने सोचा कि लोग गंगा में पाप धोने जाते है, तो इसका मतलब यह हुआ कि सारे पाप गंगा में समा गए और गंगा भी पापी हो गयी । अब वह महर्षि यह जानने के लिए तपस्या करने लगे कि "आखिर पाप जाता कहाँ है ?" तपस्या करने के फलस्वरूप देवता प्रकट हुए । ऋषि ने पूछा कि " भगवन जो पाप गंगा में धोया जाता है वह पाप कहाँ जाता है ?" देवता ने कहा - "चलो गंगा से ही पूछते है और दोनों लोग गंगा के पास गए और बोले - "हे गंगे ! लोग आपके यहाँ आकर पाप धोते है, इसका मतलब आप भी पापी हुई । गंगा ने कहा - "मैं क्यों पापी हुई, मैं तो सारे पापों को ले जाकर समुद्र को अर्पित कर देती हूँ, उसके बाद उन पापों का वो क्या रहता है, मुझे नहीं पता !" अब वे लोग समुद्र के पास गए और बोले - "हे सागर ! गंगा अपना सारा पानी और पाप आपको अर्पित कर देती है तो इसका मतलब आप भी पापी हुए । समुद्र ने कहा - " मैं क्यों पापी हुआ, मैं तो सारे पापों को लेकर भाप बना कर बादल बना देता हूँ, जाकर बादल से पूछो !" अब वे लोग बादल के पास गए और बोले - " हे बादलो ! समुद्र जो पापों को भाप बनाकर बादल बना देते है , तो इसका मतलब आप पापी हुए ?" बादलों ने कहा - "हम क्यों पापी हुए , हम तो सारे पापों को वापस पानी बरसा कर धरती पर भेज देते है, जिससे अन्न उपजता है , जिसको मानव खाता है । उस अन्न को जिस मानसिक स्थिति से उगाया जाता है और जिस वृत्ति से प्राप्त किया जाता है , जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है , उसी अनुसार मानव की मानसिकता बनती है ।" शायद इसीलिये कहते हैं ..” जैसा खाए अन्न, वैसा बनता मन ” अन्न को जिस वृत्ति ( कमाई ) से प्राप्त किया जाता है और जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है । वैसे ही विचार मानव के बन जाते है। इसीलिये सदैव भोजन शांत अवस्था में पूर्ण रूचि के साथ करना चाहिए , और कम से कम अन्न जिस धन से खरीदा जाए वह धन भी श्रम का होना चाहिए। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🙏🌺🌺🌺🌺🚩 जय एकादशी मैया 🙏🌺🌺🌺🌺🚩

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Seemma Valluvar May 11, 2022

|| मृत्यु अहंकार की || मैंने एक सुंदर कथा सुनी है। एक बहुत बड़ा मूर्तिकार था, वह एक चित्रकार और साथ ही, एक महान कलाकार भी था। उसकी कला इतनी श्रेष्ठ थी कि जब वह किसी आदमी की प्रतिमा बनाता था, तो आदमी और प्रतिमा के बीच भेद करना कठिन होता था। वह प्रतिमा इतनी सजीव, इतनी जीवंत और ठीक वैसी ही होती थी जैसा आदमी हो। एक ज्योतिषी ने उसे बताया कि उसकी मृत्यु होने वाली है, शीघ्र ही उसकी मृत्यु हो जाएगी। स्वभावत:, वह तो बहुत ही घबरा गया, और एकदम डर गया—और जैसा कि प्रत्येक आदमी मृत्यु से बचना चाहता है, वह भी मृत्यु से बचना चाहता था। उसने इसे विषय पर खूब सोचा विचारा, ध्यान किया, और अंततः उसे एक सूत्र मिल ही गया। उसने अपनी ही ग्‍यारह प्रतिमाएं बना डाली। जब मृत्यु ने उसके द्वार पर दस्तक दी और मृत्यु का देवता भी आ गया तो वह अपनी ही बनाई हुई ग्यारह प्रतिमाओं के बीच छिपकर खड़ा हो गया। अपनी श्वास को रोककर वह उन ग्‍यारह प्रतिमाओं के बीच छिपकर खड़ा हो गया। मृत्यु का देवता भी थोड़ा सोच — विचार और उलझन में पड़ गया, उसे अपनी ही आंखों पर भरोसा नहीं आ रहा था। इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था, यह तो एकदम ही अजीब और अनहोनी घटना थी। परमात्मा तो कभी एक जैसे दो आदमी बनाता ही नहीं है, परमात्मा तो हमेशा एक तरह का एक ही आदमी बनाता है। उसका भरोसा एक ही जैसे दो आदमी बनाने में बिलकुल नहीं है। वह एक ही तरह का उत्पादन नहीं करता। परमात्मा कार्बन —कॉपी के बहुत खिलाफ है, वह तो केवल मौलिक का ही निर्माण करता है। फिर ऐसा कैसे हो गया? सभी बारह के बारह आदमी एक जैसे? बिलकुल एक जैसे? अब मृत्यु उनमें से किसे ले जाए? क्योंकि ले जाना तो केवल एक आदमी को ही था। अंतत: मृत्यु और मृत्यु का देवता कोई निर्णय न ले सके। वे तो उलझन में पड़ गए, और चिंतित, परेशान घबराकर वापस लौट गए। उन्होंने परमात्मा से पूछा, आपने यह क्या किया? बारह आदमी बिलकुल एक जैसे! और मुझे उन में से केवल एक आदमी को ही लाना है। बारह आदमियों में से मैं एक का चुनाव कैसे करूं? परमात्मा हंसा और परमात्मा ने मृत्यु के देवता को अपने निकट बुलाकर उसके कान में एक मंत्र फूंक दिया। और परमात्मा ने उसे सूत्र दिया कि सत्य और असत्य ‘के बीच कैसे भेद करना होता है। परमात्मा ने उसे मंत्र दिया और उससे कहा, बस अब जाकर इस मंत्र का उच्चारण उस कमरे में कर दो, जहां उस कलाकार ने स्वयं को अपनी ही प्रतिमाओं के बीच छिपाया हुआ है। मृत्यु के देवता ने परमात्मा से पूछा, ‘यह सूत्र कैसे काम करेगा?’ परमात्मा ने कहा, ‘चिंता मत करो। बस जाओ और जैसा मैंने कहा है, वैसा करो।’ मृत्यु का देवता आ गया। लेकिन उसे अभी भी भरोसा नहीं आ रहा था कि यह सूत्र कैसे काम करेगा। लेकिन जब परमात्मा ने कह दिया था, तो उसे वैसा करना ही था। वह उस कमरे में पहुंचा, उसने चारों ओर एक नजर घुमाई और बिना किसी को संबोधित करते हुए वह ऐसे ही बोला, ‘ श्रीमान, सभी कुछ ठीक है केवल एक बात को छोड्कर। आपने प्रतिमाएं तो बहुत ही सुंदर बनायी हैं, लेकिन आप एक बात चूक गए हैं। एक गलती उनमें रह गयी है। वह मूर्तिकार यह भूल ही गया कि वह स्वयं को छिपाए हुए है। वह फटाक से कूदकर सामने आ गया, और बोला— ‘कौन सी गलती?’ और मृत्यु का देवता हंस पड़ा। और उसने कहा, ‘तुम पकड़ में आ गए’ हो। यही है एकमात्र गलती तुम स्वयं को नहीं भुला सकते। अब आओ, मेरे साथ चलो।’ मृत्यु अहंकार की ही होती है। अगर अहंकार बना रहता है, तो मृत्यु भी बनी रहती है। जिस क्षण अहंकार विलीन हो जाता है, मृत्यु भी विलीन हो जाती है। स्मरण रहे, तुम नहीं मरोगे, लेकिन अगर तुम सोचते हो कि तुम हो, तो तुम्हारी मृत्यु भी होगी। अगर तुम सोचते हो कि तुम्हारा अपना अलग अस्तित्व है, अलग होना है, तो तुम्हारी मृत्यु होगी ही। अहंकार के इस झूठे रूप की मृत्यु होगी ही, लेकिन अगर तुमने स्वयं को अभौतिक, निर — अहंकार के रूप में जाना, तो फिर कहीं कोई मृत्यु नहीं है —फिर तुम अमृत को उपलब्ध हो जाते हो। तुम अमृत को उपलब्ध हो ही, अब तुम्हें इस सत्य का बोध हो जाता है। वह मूर्तिकार पकड़ में आ गया, क्योंकि वह अपने मूर्तिकार होने के अहंकार को छोड़ न सका। बुद्ध अपने धम्मपद में कहते हैं अगर तुम मृत्यु को देख सको, तो मृत्यु तुम्हें नहीं देख सकेगी। अगर मृत्यु आने के पूर्व तुम मर जाओ, तो फिर कोई मृत्यु नहीं है, और फिर मूर्तियां बनाने की कोई जरूरत नहीं है। मूर्तियां बनाने से कुछ मदद मिलने नहीं वाली है। अपने स्वयं के भीतर की मूर्ति को तोड़ दो, तो फिर ग्यारह और प्रतिमाएं बनाने की कोई जरूरत नहीं रह जाती। हमको अहंकार की प्रतिमा को ही तोड़ देना है। फिर और अधिक प्रतिमाएं बनाने की, और अधिक प्रतिछवियां बनाने की कोई जरूरत नहीं रह जाती है। धर्म एक अर्थों में विध्वंसात्मक है। एक तरह से धर्म नकारात्मक है। धर्म तुम्हें मिटाता है —वह तुम्हें संपूर्ण और आत्यंतिक रूप से मिटा देता है। जय श्री गणेश 🙏🌺🌺🌺🌺🌺🚩

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Seemma Valluvar May 10, 2022

राम से बड़ा " राम " का नाम क्यों ? #रामदरबार में हनुमानजी महाराज राम की सेवा में इतने तन्मय हो गए कि, ऋषि विश्वामित्र के आने का उनको ध्यान ही नहीं रहा। सबने उठ कर उनका अभिवादन किया पर, हनुमानजी नहीं कर पाए। विश्वामित्र जी ने अपमान से क्रोधित हो राम से हनुमान के लिए मृत्युदंड माँगा वो भी राम के अमोघ बाण से जो अचूक शस्त्र था। राम ने कहा स्वीकार है। दरबार में राम ने घोषणा की कि, कल संध्याकाल में सरयु नदी के तट पर, हनुमानजी को मैं स्वयं अपने अमोघ बाण से मृत्यु दण्ड दूँगा। हनुमानजी के घर पहुँचने पर माता अंजनी ने हनुमान से उदासी का कारण पूछा तो हनुमान ने अनजाने में हुई अपनी गलती और अन्य सारा घटनाक्रम बताया। माता अंजनी को मालूम था कि, समस्त ब्रम्हाण्ड में हनुमान को कोई मार नहीं सकता और राम के अमोघ बाण से भी कोई बच नहीं सकता l माता अंजनी ने कहा---" मैंने भगवान शंकर से, "राम नाम" मंत्र प्राप्त किया था और तुम्हें यह नाम घुटी में पिलाया है। उस राम नाम के होते कोई तुम्हारा बाल भी बांका नहीं कर सकता। चाहे वे स्वयं राम ही क्यों ना हों। राम नाम की शक्ति के सामने खुद राम की शक्ति और राम के अमोघ शक्तिबाण की शक्तियाँ महत्वहीन हो जाएँगी। जाओ मेरे लाल, अभी से सरयु नदी के तट पर जाकर राम नाम का उच्चारण आरंभ कर दो। " माता का आशीष लेकर हनुमान सरयु तट पर पहुँचकर राम राम राम राम रटने लगे। शाम को सरयु तट पर सारा राम दरबार एकत्रित हो गया। राम ने हनुमान पर अमोघ बाण चलाया किन्तु कोई असर नहीं हुआ। राम ने बार - बार रामबाण, अपने महान शक्तिधारी, अमोघशक्ति बाण चलाये पर हनुमानजी के उपर उनका कोई असर नहीं हुआ तो, ऋषि विश्वामित्र जी ने शंका बतायी कि, " राम तुम अपनी पुर्ण निष्ठा से बाणों का प्रयोग कर रहे हो ? " राम ने कहा---" हाँ, गुरुवर। " " तो तुम्हारे बाण अपना कार्य क्यों नहीं कर रहे हैं ? " तब राम ने कहा---" गुरु देव, हनुमान, राम राम राम की अंखण्ड रट लगाए हुए है। मेरी शक्तियों का अस्तित्व राम नाम के प्रताप के समक्ष महत्वहीन हो रहा है। आप ही बताएँ गुरु देव ! मैं क्या करूँ ? " गुरु देव बोले---" हे राम ! आज से मैं तुम्हारा साथ, तुम्हारा दरबार, त्याग कर अपने आश्रम जा रहा हूँ। वहाँ मैं राम नाम का जप करूँगा। हे राम ! मैं जानकर, मानकर, यह घोषणा करता हूँ कि, स्वयं राम से, राम का नाम बड़ा है। महा अमोघशक्ति का सागर है और सारे मंत्रों की शक्तियाँ राम नाम के समक्ष न्यूनतर हैं। जो कोई राम नाम जपेगा, लिखेगा, मनन करेगा, उसकी समस्त अभिलाषाएँ पूरी होंगी। " तभी से राम से बडा राम का नाम माना जाता है। ।।श्री राम दया के सागर है।। ॥जय श्री राम॥ 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 🙏🙏🙏 जय हनुमान 🙏🙏🙏

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