Seemma Valluvar Sep 30, 2022

इक्यावन शक्तिपीठों में प्रमुख देवी विंध्यवासिनी माता कौन थीं, जानिए छह रहस्य!!!!!!!! भारत में मां विंध्यवासिनी की पूजा और साधना का प्रचलन है। देवी विंध्यवासिनी माता कौन थीं? कहां है उनका मुख्य शक्तिपीठ और क्या है उनका रहस्य जानिए महत्वपूर्ण 6 रहस्य। 1. भगवान श्री कृष्ण की माता का नाम देवकी था। जब मथुरा के कारागार में देवकी के गर्भ से अष्टम पुत्र के रूप में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ तो उसी दौरान गोकुल में यशोदा मैया के यहां एक पुत्री का जन्म हुआ। वसुदेवजी बालकृष्ण को लेकर कारागार से निकलकर यमुना पार कर गोकुल पहुंचे और उन्होंने उसी रात को बालकृष्ण को यशोदा मैया के पास सुला दिया और वे उनकी पुत्री को उठाकर ले आए। यह कार्य भगवान की माया से हुआ। गर्गपुराण के अनुसार भगवान कृष्ण की मां देवकी के सातवें गर्भ को योगमाया ने ही बदलकर कर रोहिणी के गर्भ में पहुंचाया था, जिससे बलराम का जन्म हुआ। बाद में योगमाया ने यशोदा के गर्भ से जन्म लिया था। 2. भगवान विष्णु की आज्ञा से माता योगमाया ने ही यशोदा मैया के यहां पुत्री रूप में जन्म लिया था। इसका बाद में नाम एकानंशा रखा गया था। कंस से बालकृष्ण को बचाने के लिए ही योगमाया ने जन्म लिया था। श्रीमद्भागवत पुराण की कथा अनुसार देवकी के आठवें गर्भ से जन्में श्रीकृष्ण को वसुदेवजी ने कंस से बचाने के लिए रातोंरात यमुना नदी को पार गोकुल में नन्दजी के घर पहुंचा दिया था तथा वहां यशोदा के गर्भ से पुत्री के रूप में जन्मीं भगवान की शक्ति योगमाया को चुपचाप वे मथुरा के जेल में ले आए थे। कहते हैं कि योगमाया ने यशोदा के गर्भ से जन्म लिया था। इनके जन्म के समय यशोदा गहरी निद्रा में थीं और उन्होंने इस बालिका को देखा नहीं था। जब आंख खुली तो उन्होंने अपने पास पुत्र को पाया जो कि कृष्ण थे। 3. बाद में जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म का समाचार मिला तो वह कारागार में पहुंचा। उसे यह सुनकर आश्चर्य हुआ कि पुत्र की जगन कन्या का जन्म कैसे हुआ? आकाशवाणी में तो देवकी के आठवें पुत्र द्वारा मेरे वध की बात कही गई थी फिर यह पुत्री कैसे हो गई? कंस ने सोचा यह विष्णु का छल हो सकता है इसलिए उसने उस नवजात कन्या को पत्थर पर पटककर जैसे ही मारना चाहा, वह कन्या अचानक कंस के हाथों से छूटकर आकाश में पहुंच गई और उसने अपना दिव्य योगमाया स्वरूप प्रदर्शित कर कंस से कहा रे मूर्ख तेरा वध करने के लिए देवकी की आठवीं संतान को कभी की जन्म ले चुकी है। मुझे मारने से क्या होगा। 4. बाद में देवताओं ने योगमाया से कहा कि हे देवी आपका इस धरती पर कार्य पूर्ण हो चुका है तो अत: अब आप देवलोक चलकर हमें कृतघ्न करें। तब देवी ने कहा कि नहीं अब मैं धरती पर ही भिन्न भिन्न रूप में रहूंगी। जो भक्त मेरा जैसा ध्यान करेगा मैं उसे उस रूप में दर्शन दूंगा। अत: मेरी पहले स्थान की आप विंध्यांचल में स्थापना करें। तब देवताओं ने देवी का विंध्याचल में एक शक्तिपीठ बनाकर उनकी स्तुति की और देवी वहीं विराजमान हो गई। श्रीमद्भागवत पुरा में देवी योगमाया को ही विंध्यवासिनी कहा गया है जबकि शिवपुराण में उन्हें सती का अंश बताया गया है। शिव पुराण अनुसार मां विंध्यवासिनी को सती माना गया है। सती होने के कारण उन्हें वनदुर्गा कहा जाता है। कहते हैं कि आदिशक्ति देवी कहीं भी पूर्णरूप में विराजमान नहीं हैं, लेकिन विंध्याचल ही ऐसा स्थान है जहां देवी के पूरे विग्रह के दर्शन होते हैं। शास्त्रों के अनुसार, अन्य शक्तिपीठों में देवी के अलग-अलग अंगों की प्रतीक रूप में पूजा होती है। मान्यता अनुसार सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी इस क्षेत्र का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं हो सकता। यहां लोग सिद्धि प्राप्त करने के लिए साधना करने आते हैं जहां संकल्प मात्र से साधकों को सिद्धि प्राप्त होती है। मार्कण्डेय पुराण श्री दुर्गा सप्तशती की कथा अनुसार ब्रह्मा, विष्णु व महेश भी भगवती की मातृभाव से साधना और उपासना करते हैं, तभी वे सृष्टि की व्यवस्था करने में समर्थ होते हैं। 5. श्रीमद्भागवत में उन्हें ही नंदजा देवी कहा गया है इसीलिए उनका अन्य नाम कृष्णानुजा है। इसका अर्थ यह की वे भगवान श्रीकृष्ण की बहन थीं। इस बहन ने श्रीकृष्ण की जीवनभर रक्षा की थी। इन्हीं योगमाया ने कृष्ण के साथ योगविद्या और महाविद्या बनकर कंस, चाणूर और मुष्टिक आदि शक्तिशाली असुरों का संहार कराया, जो कंस के प्रमुख मल्ल माने जाते थे। 6. भारत में विंध्यवासिनी देवी का चमत्कारिक मंदिर विंध्याचल की पहाड़ी श्रृंखला के मध्य (मिर्जापुर, उत्तर) पतित पावनी गंगा के कंठ पर बसा हुआ है। प्रयाग एवं काशी के मध्य विंध्याचल नामक तीर्थ है जहां मां विंध्यवासिनी निवास करती हैं। यह तीर्थ भारत के उन 51 शक्तिपीठों में प्रथम और अंतिम शक्तिपीठ है जो गंगा तट पर स्थित है। यहां तीन किलोमीटर के दायरे में अन्य दो प्रमुख देवियां भी विराजमान हैं। निकट ही कालीखोह पहाड़ी पर महाकाली तथा अष्टभुजा पहाड़ी पर अष्टभुजी देवी विराजमान हैं। हालांकि कुछ विद्वान इस 51 शक्तिपीठों में शामिल नहीं करते हैं लेकिन 108 शक्तिपीठों में जरूर इनका नाम मिलता है।

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Seemma Valluvar Sep 30, 2022

__मैं एक नारी हूं, हर हाल में जीना जानती हूं l बेटी बनूं तो पिता की शान बन जाती हूं, बहन बनूं तो भाई का अभिमान बन जाती हूं l बीवी बनूं तो पति का भाग्य बन जाती हूं, मां बनूं तो बच्चों की ढाल बन जाती हूं l मैं एक नारी हूं, हर हाल में जीना जानती हूं l होए जो पैसा पहन के गहने मैं बहुत इठलाती हूं, हालात ना हो तो दो जोड़ी कपड़े में ही अपना जीवन बिताती हूं l कभी तो अपनी हर बात में मनवा जाती हूं, तो कभी चुप घड़ी औरों की बात सुन जाती हूं l मैं एक नारी हूं, हर हाल में जीना जानती हूं l कभी बनकर की लाडली मैं खूब खिलखिलाती हूं, तो कभी दरिंदों से अपना दामन बचाती हूं l कभी रख फूलों पर अपने कदम महारानी बन जाती हूं, तो कभी दे अग्नि परीक्षा अपना अस्तित्व बचा जाती हूं l मैं एक नारी हूं, हर हाल में जीना जानती हूं l आए मौका खुशी का तो फूलों से नाजुक बन जाती हूं, आए जो दुखों का तूफान तो चट्टान बन अपनों को बचाती हूं l मिले जो मौका हर क्षेत्र पर अपना हुनर दिखलाती हूं, जो ना मिले मौका तो चारदीवारी में ही अपना जीवन बिताती हूं l मैं एक नारी हूं, हर हाल में जीना जानती हूं l उड़ान भर्ती हूं तो चांद तक पहुंच जाती हूं, मौके पड़ने पर बेटों का फर्ज भी निभा जाती हूं l करके नौकरी पिता का हाथ बताती हूं, दे कांधा उन्हें श्मशान भी पहुंचाती हूं l मैं एक नारी हूं, हर हाल में जीना जानती हूं l आए जो भी चुनौती उसका डट के सामना कर जाती हूं, मिले जो प्यार तो घर को स्वर्ग सा सजाती हूं, हुए जो अत्याचार तो बन काली सर्वनाश कर जाती हूं l मैं कोई बोझ नहीं यह हर बार साबित कर जाती हूं l मैं एक नारी हूं, हर हाल में जीना जानती हूं l 🙏🙏

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Seemma Valluvar Sep 28, 2022

🙏🏼💐🌹नवरात्रि के पावन अवसर पर माता वैष्णोदेवी कीअमर कथा 💐🙏🏼✨ वैष्णो_देवी उत्तरी भारत के सबसे पूजनीय और पवित्र स्थलों में से एक है। यह मंदिर पहाड़ पर स्थित होने के कारण अपनी भव्यता व सुंदरता के कारण भी प्रसिद्ध है। वैष्णो देवी भी ऐसे ही स्थानों में एक है जिसे माता का निवास स्थान माना जाता है। मंदिर, 5,200 फीट की ऊंचाई और कटरा से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हर साल लाखों तीर्थ यात्री मंदिर के दर्शन करते हैं।यह भारत में तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर के बाद दूसरा सर्वाधिक देखा जाने वाला धार्मिक तीर्थस्थल है। वैसे तो माता वैष्णो देवी के सम्बन्ध में कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं लेकिन मुख्य 2 कथाएँ अधिक प्रचलित हैं। माता वैष्णो देवी की प्रथम कथा मान्यतानुसार एक बार पहाड़ों वाली माता ने अपने एक परम भक्तपंडित श्रीधर की भक्ति से प्रसन्न होकर उसकी लाज बचाई और पूरे सृष्टि को अपने अस्तित्व का प्रमाण दिया। वर्तमान कटरा कस्बे से 2 कि.मी. की दूरी पर स्थित हंसाली गांव में मां वैष्णवी के परम भक्त श्रीधर रहते थे। वह नि:संतान होने से दु:खी रहते थे। एक दिन उन्होंने नवरात्रि पूजन के लिए कुँवारी कन्याओं को बुलवाया। माँ वैष्णो कन्या वेश में उन्हीं के बीच आ बैठीं। पूजन के बाद सभी कन्याएं तो चली गई पर माँ वैष्णो देवी वहीं रहीं और श्रीधर से बोलीं- ‘सबको अपने घर भंडारे का निमंत्रण दे आओ।’ श्रीधर ने उस दिव्य कन्या की बात मान ली और आस – पास के गाँवों में भंडारे का संदेश पहुँचा दिया। वहाँ से लौटकर आते समय गुरु गोरखनाथ व उनके शिष्य बाबा भैरवनाथ जी के साथ उनके दूसरे शिष्यों को भी भोजन का निमंत्रण दिया। भोजन का निमंत्रण पाकर सभी गांववासी अचंभित थे कि वह कौन सी कन्या है जो इतने सारे लोगों को भोजन करवाना चाहती है? इसके बाद श्रीधर के घर में अनेक गांववासी आकर भोजन के लिए एकत्रित हुए। तब कन्या रुपी माँ वैष्णो देवी ने एक विचित्र पात्र से सभी को भोजन परोसना शुरू किया। भोजन परोसते हुए जब वह कन्या भैरवनाथ के पास गई। तब उसने कहा कि मैं तो खीर – पूड़ी की जगह मांस भक्षण और मदिरापान करुंगा। तब कन्या रुपी माँ ने उसे समझाया कि यह ब्राह्मण के यहां का भोजन है, इसमें मांसाहार नहीं किया जाता। किंतु भैरवनाथ ने जान – बुझकर अपनी बात पर अड़ा रहा। जब भैरवनाथ ने उस कन्या को पकडऩा चाहा, तब माँ ने उसके कपट को जान लिया। माँ ने वायु रूप में बदलकरत्रिकूट पर्वत की ओर उड़ चली। भैरवनाथ भी उनके पीछे गया। माना जाता है कि माँ की रक्षा के लिए पवनपुत्र हनुमान भी थे। मान्यता के अनुसार उस वक़्त भी हनुमानजी माता की रक्षा के लिए उनके साथ ही थे। हनुमानजी को प्यास लगने पर माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर एक जलधारा निकाला और उस जल में अपने केश धोए। आज यह पवित्र जलधारा बाणगंगा के नाम से जानी जाती है, जिसके पवित्र जल का पान करने या इससे स्नान करने से श्रद्धालुओं की सारी थकावट और तकलीफें दूर हो जाती हैं। इस दौरान माता ने एक गुफा में प्रवेश कर नौ माह तक तपस्या की। भैरवनाथ भी उनके पीछे वहां तक आ गया। तब एक साधु ने भैरवनाथ से कहा कि तू जिसे एक कन्या समझ रहा है, वह आदिशक्ति जगदम्बा है। इसलिए उस महाशक्ति का पीछा छोड़ दे। भैरवनाथ साधु की बात नहीं मानी। तब माता गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं। यह गुफा आज भी अर्धकुमारी या आदिकुमारी या गर्भजून के नाम से प्रसिद्ध है। अर्धक्वाँरी के पहले माता की चरण पादुका भी है। यह वह स्थान है, जहाँ माता ने भागते – भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था। गुफा से बाहर निकल कर कन्या ने देवी का रूप धारण किया। माता ने भैरवनाथ को चेताया और वापस जाने को कहा। फिर भी वह नहीं माना। माता गुफा के भीतर चली गई। तब माता की रक्षा के लिए हनुमानजी ने गुफा के बाहर भैरव से युद्ध किया। भैरव ने फिर भी हार नहीं मानी जब वीर हनुमान निढाल होने लगे, तब माता वैष्णवी ने महाकाली का रूप लेकर भैरवनाथ का संहार कर दिया। भैरवनाथ का सिर कटकर भवन से 8 किमी दूर त्रिकूट पर्वत की भैरव घाटी में गिरा। उस स्थान को भैरोनाथ के मंदिर के नाम से जाना जाता है। जिस स्थान पर माँ वैष्णो देवी ने हठी भैरवनाथ का वध किया, वह स्थान पवित्र गुफा’ अथवा ‘भवन के नाम से प्रसिद्ध है। इसी स्थान पर माँ काली (दाएँ), माँ सरस्वती (मध्य) और माँ लक्ष्मी (बाएँ) पिंडी के रूप में गुफा में विराजित हैं। इन तीनों के सम्मिलत रूप को ही माँ वैष्णो देवी का रूप कहा जाता है। इन तीन भव्य पिण्डियों के साथ कुछ श्रद्धालु भक्तों एव जम्मू कश्मीर के भूतपूर्व नरेशों द्वारा स्थापित मूर्तियाँ एवं यन्त्र इत्यादी है। कहा जाता है कि अपने वध के बाद भैरवनाथ को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ और उसने माँ से क्षमादान की भीख माँगी। माता वैष्णो देवी जानती थीं कि उन पर हमला करने के पीछे भैरव की प्रमुख मंशा मोक्ष प्राप्त करने की थी, उन्होंने न केवल भैरव को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति प्रदान की, बल्कि उसे वरदान देते हुए कहा कि मेरे दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाएँगे, जब तक कोई भक्त मेरे बाद तुम्हारे दर्शन नहीं करेगा। उसी मान्यता के अनुसार आज भी भक्त माता वैष्णो देवी के दर्शन करने के बाद 8 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़कर भैरवनाथ के दर्शन करने को जाते हैं। इस बीच वैष्णो देवी ने तीन पिंड (सिर) सहित एक चट्टान का आकार ग्रहण किया और सदा के लिए ध्यानमग्न हो गईं। इस बीच पंडित श्रीधर अधीर हो गए। वे त्रिकुटा पर्वत की ओर उसी रास्ते आगे बढ़े, जो उन्होंने सपने में देखा था, अंततः वे गुफ़ा के द्वार पर पहुंचे, उन्होंने कई विधियों से ‘पिंडों’ की पूजा को अपनी दिनचर्या बना ली, देवी उनकी पूजा से प्रसन्न हुईं, वे उनके सामने प्रकट हुईं और उन्हें आशीर्वाद दिया। तब से, श्रीधर और उनके वंशज देवी मां वैष्णो देवी की पूजा करते आ रहे हैं। !! जय माता दी !!

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Seemma Valluvar Sep 27, 2022

🙏🌺🌹नवरात्र में देवी कवच (दुर्गा कवच) के पाठ का महत्व, विधि एवं चमत्कारिक लाभ--🌹🌺🙏 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 🍁अठारह प्रमुख पुराणों में से एक मार्कंडेय पुराण के अंदर देवी कवच (दुर्गा कवच) के श्लोक अंतर्भूत है और यह अद्भुत दुर्गा सप्तशती का हिस्सा है। देवी कवच को भगवान ब्रह्मा ने ऋषि मार्कंडेय को सुनाया और इसमें ४७ श्लोक शामिल है इसके बाद ९ श्लोकों में फलश्रुति लिखित है। फलश्रुति का मतलब है, इसको सुनने या पढ़ने से क्या फल प्राप्त होता है यह बताया गया है । इसमें भगवान ब्रह्मा देवी पार्वती माँ की नौ अलग-अलग दैवीय रूपों में प्रशंसा करते हैं। भगवान ब्रह्मा प्रत्येक को देवी कवच को पढ़ने और देवी माँ कासूस् आशीर्वाद मांगने के लिए अनुरोध करते हैं। जो भी इस कवचं का नित्य पाठ करता है वह माँ दुर्गा से आशीर्वाद प्राप्त करता है। 🚩देवी कवच का महत्त्व आपके चारों ओर नकारात्मकता को खत्म करने के लिए एक शक्तिशाली मंत्रो का संग्रह देवी कवच के रूप में है। यह किसी भी बुरी आत्माओं से रक्षा करने में एक कवच के रूप में कार्य करता है। 🍁मंत्रो में नकारात्मक, प्रतिकूल कंपन को अधिक सकारात्मक और आकर्षक कंपन में बदलने की क्षमता होती है। ऐसा कहा जाता है कि वह व्यक्ति जो ईमानदारी से भक्ति और सही उच्चारण के साथ नियमित रूप से देवी कवचम को पढ़ता है, वह सभी बुराइयों से संरक्षित रहता है। नवरात्रों के दिनों में देवी कवचं का पाठ करना बहोत शुभ माना जाता है। "देवी कवच, देवी के भिन्न नाम हैं, जो शरीर के अलग-अलग अंगों पर आधारित हैं। ये लगभग योगनिद्रा जैसा ही है, परंतु नामों से युक्त है। हर नाम में कोई न कोई गुण और कोई न कोई ऊर्जा निहित होती है और नाम एवं रूप (आकार) में घनिष्ठ संबंध होता है। 🚩देवी कवच का अर्थ ✨ कवच का अर्थ होता है रक्षा करने वाला, अपने चारों ओर एक प्रकार का आवरण बना देना। यह बहुत अच्छा / उत्तम है। देवी कवच के तहत हम देवी माँ के विभिन्न नामों का उच्चारण करते हैं, जो हमारे इर्द-गिर्द, हमारे शरीर के चारो ओर एक कवच का निर्माण कर देते हैं। इसका अनुष्ठान विशेष कर नवरात्रि के सभी नवों दिन में किया जाता है। यह हमारे लिए बहुत जरूरी है। बैठ कर इसे सुने। यूं तो हमारे चारो तरफ सुरक्षा कवच है ही, फिर भी इसे सुनने से और सकारात्मक प्रभाव पड़ता है - यह व्यक्ति की आत्मा को ऊर्ध्वगामी बनाता है।" 🍁देवी कवच/दुर्गा कवच के श्लोक 🍁 🚩🌺॥अथ श्री देव्याः कवचम्॥🌺🚩 ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः। 🚩🌺।।ॐ नमश्‍चण्डिकायै॥🌺🚩 मार्कण्डेय उवाच✨ 👉ॐ यद्‌गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्। यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥१॥ ब्रह्मोवाच✨ अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्। देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥२॥ प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥३॥ पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥४॥ नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः। उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥५॥ अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे। विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥६॥ न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे। नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥७॥ यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते। ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥८॥ प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना। ऐन्द्री गजसमारुढा वैष्णवी गरुडासना॥९॥ माहेश्‍वरी वृषारुढा कौमारी शिखिवाहना। लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥१०॥ श्‍वेतरुपधरा देवी ईश्‍वरी वृषवाहना। ब्राह्मी हंससमारुढा सर्वाभरणभूषिता॥११॥ इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः। नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥१२॥ दृश्यन्ते रथमारुढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः। शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥१३॥ खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च। कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥१४॥ दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च। धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥१५॥ नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे। महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥१६॥ त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि। प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥१७॥ दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी। प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥१८॥ उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी। ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥१९॥ एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना। जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥२०॥ अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता। शिखामुद्योतिनि रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥२१॥ मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी। त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥२२॥ शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी। कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी॥२३॥ नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका। अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥२४॥ दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका। घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके ॥२५॥ कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला। ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥२६॥ नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी। स्कन्धयोः खङ्‍गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी॥२७॥ हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च। नखाञ्छूलेश्‍वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्‍वरी॥२८॥ स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी। हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥२९॥ नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्‍वरी तथा। पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी ॥३०॥ कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी। जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ॥३१॥ गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी। पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥३२॥ नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्‍चैवोर्ध्वकेशिनी। रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्‍वरी तथा॥३३॥ रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती। अन्त्राणि कालरात्रिश्‍च पित्तं च मुकुटेश्‍वरी॥३४॥ पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा। ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु॥३५॥ शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्‍वरी तथा। अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥३६॥ प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्। वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥३७॥ रसे रुपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी। सत्त्वं रजस्तमश्‍चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥३८॥ आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी। यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥३९॥ गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके। पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥४०॥ पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा। राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥४१॥ रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु। तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥४२॥ पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः। कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥४३॥ तत्र तत्रार्थलाभश्‍च विजयः सार्वकामिकः। यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्‍चितम्। परमैश्‍वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥४४॥ निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः। त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्॥४५॥ इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम् । यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥४६॥ दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः। जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः। ४७॥ नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः। स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥४८॥ अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले। भूचराः खेचराश्‍चैव जलजाश्‍चोपदेशिकाः॥४९॥ सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा। अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्‍च महाबलाः॥५०॥ ग्रहभूतपिशाचाश्‍च यक्षगन्धर्वराक्षसाः। ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ॥५१॥ नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते। मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्॥५२॥ यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले। जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥५३॥ यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्। तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥५४॥ देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्। प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥५५॥ लभते परमं रुपं शिवेन सह मोदते॥ॐ॥५६॥ 🌼💢।। इति देव्याः कवचं सम्पूर्णम्।।🌼💢 💥।।शुभ मस्तु।।💥 🔯🔸🔯🔸🔯🔸🔯🔸🔯🔸🔯🔸🔯🔸🔯

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Seemma Valluvar Sep 25, 2022

🕉️ नवरात्रि घट स्थापना मुहूर्त एवं देवी वाहन विचार🕉️ देवी भागवत पुराण अनुसार माता के नवरात्रि आगमन पर उनके वाहन के बारे में कुछ विचार किया गया है👇🏻 शशि सूर्य गजरुढा शनिभौमै तुरंगमे। गुरौशुक्रेच दोलायां बुधे नौकाप्रकीर्तिता॥ अगर नवरात्रि पर्व का शुभारंभ सोमवार या रविवार के दिन होता है तो माता हाथी पर बैठकर पृथ्वी लोक पर आती हैं। वहीं अगर नवरात्रि शनिवार या मंगलवार के दिन शुरू होती है तो माता की सवारी घोड़ा होता है। अगर शुक्रवार या गुरुवार के दिन नवरात्रि आरंभ होती है मां दु्र्गा डोली में सवार होकर आती हैं। बुधवार के दिन अगर नवरात्रि पर्व की शुरुआत होती है तो माता का वाहन नौका पर होता है। इस वर्ष 26 सितंबर 2022,सोमवार को शारदीय नवरात्रि शुरू हो रहे हैं ऐसे में माता हाथी पर सवार होकर आ रही हैं जो बहुत ही शुभ माना गया है। वैदिक पंचांग गणना के अनुसार 26 सितंबर को देवी आराधना पूजा एवं कलश स्थापना घटस्थापना मुहूर्त समय 26 सितंबर प्रातः 6:16 से 7:47 अमृतवेला फिर 7:46 से 9:17 बजे तक काल की बेला रहेगी जो नेष्ट है एवं द्वितीय मुहूर्त 9:17 से 10:47 मिनट तक शुभ वेला रहेगी जो श्रेष्ठ मुहूर्त है 10:47 से 11:54 तक रोग का खराब चौकड़िया रहेगा जो घट स्थापना में नेष्ट माना जाता है एवं तृतीय अभिजीत मुहूर्त में 11:54 से 12: 42 तक अत्यंत ही श्रेष्ठ एवं शुभ रहेगा एवं चतुर्थ एवं अंतिम मुहूर्त 12: 25 से 2:25 धनु लग्न तक सर्वश्रेष्ठ रहता है फिर घट स्थापना करना श्रेष्ठ नहीं रहता हे सूर्योदय से 4 लग्न तक तक ही देवी घट स्थापना स्थापना मुहूर्त श्रेष्ठ होता है चौथे लग्न के बाद देवी घट स्थापना नहीं करना चाहिए एवं हमेशा प्रतिपदा तिथि में ही करना देवी घाट ज्वारे स्थापना श्रेष्ठ होता है रात्रि में कभी भी देवी घट स्थापना नहीं करनी चाहिए अमावस्या के दिन भी घट स्थापना करना सर्वत्र वर्जित ही होता है परंतु बहुत से भाई लोग नवरात्रि कभी-कभी 8 दिन की नवरात्रि पर्व होने पर अमावस्या को देवी घट स्थापना कर लेते हैं परंतु यह ऐसा करना श्रेष्ठ नहीं है बहुत से स्थानों पर गांव में के मंदिरों पर अमावस्या के दिन ही देवी घट स्थापना ज्वारे बोए जाते हैं वह शास्त्र विधि से विपरीत ऐसा नहीं करना चाहिए चाहे स्थिति कैसी भी हो प्रतिपदा को ही देवी घट स्थापना करना सर्वश्रेष्ठ होता है इस बार नवरात्र प्रतिपदा के दिन चित्र नक्षत्र एवं वेधृति योग भी नहीं मिल रहा है चित्रा नक्षत्र एवं वैधृति योग नवरात्र के घट स्थापना में वर्जित माना जाता है मात्र इन योग एवं नक्षत्र में के मिलने पर अभिजीत मुहूर्त में ही घटस्थापना जवारे की स्थापना की जाती है परंतु इस वर्ष दोनों योग नहीं मिल रहे हैं इसलिए अपनी सुविधा अनुसार सही समय का चयन करके श्रेष्ठ मुहूर्त में ही देवी घट स्थापना एवं देवी को अपने घर में विराजमान करें और अखंड दीप एवं ज्वारे की स्थापना अपने कुल एवं रिति अनुसार अवश्य करें जय माता दी🙏🙏

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Seemma Valluvar Sep 25, 2022

कैसे प्राप्त होता है पितरो को श्राद्ध का भोजन =============================== .आजकल आधुनिक लोग यह लिखते फिर रहे है की जो आत्मा चली गयी तो उसको भोजन कैसे मिलती है हमारे द्वारा श्राद्ध देने पर इसका प्रमाणिक और शास्त्रोक्त उत्तर इस लेख के द्वारा दी जा रही है [मुक्ति मार्ग ] ..कहा जाता है की अन्न केवल इस शरीर का पोषण करता है ,देवताओं के पास तो भौतिक शरीर नहीं होता फिर उन्हें हम जो प्रसाद या नैवेद्य चढाते हैं वह कैसे मिलता है या उसे वह कैसे खाते हैं | इसी तरह हम जो दान ब्राहमण को देते हैं या जल प्रवाह करते हैं या दीं दुखी को देते हैं वह भगवान् तक कैसे पहुंचता है |ब्राह्मण भोजन कराने पर पुण्य हमें कैसे मिलता है ,ब्राह्मण भोजन से देवता कैसे तृप्त होते हैं इसी तरह पितरो के पास तो शरीर नहीं होता केवल आत्मा या वायवीय शरीर होता है तो यह जिज्ञासा स्वाभाविक है की आखिर उन्हें यहाँ दिया जाने वाला पिंड दान या श्राद्ध का भोजन कैसे प्राप्त होता है और वे कैसे तृप्त हो हमें आशीर्वाद देते है और व्यक्ति पित्र दोष के प्रभाव में कमी पाता है ,क्योकि विभिन्न कर्मो के अनुसार हमारे पित्र तो मृत्यु के बाद भिन्न -भिन्न गति को प्राप्त होते है ,कोई देवता बन जाता है ,कोई पित्र ,कोई प्रेत ,कोई हाथी ,कोई चिटी ,कोई चिनार का वृक्ष और कोई तृण ,,,,,,,श्राद्ध में दिए गए छोटे से पिंड से हाथी का पेट कैसे भर सकता है ,,इसी प्रकार चीटीं इतने बड़े पिंड को कैसे खा सकती है ,,देवता अमृत से तृप्त होते है पिंड से या प्रसाद से या दान से या ब्राहमण भोजन से उन्हें कैसे तृप्ति मिलेगी ,,,इन प्रश्नों का शास्त्रानुसार उत्तर यह है की जब श्राद्ध करने वाला संकल्प में अपने नाम ,गोत्र आदि का उच्चारण करता है और श्राद्ध करता है तो वह विश्वेदेव और अग्निश्वात आदि दिव्य पितरो द्वारा हव्य-कव्य को आपके पितरो तक पहुचा दिया जाता है ,यदि पित्र देव योनी को प्राप्त हो चुके है तो यह दिया गया अन्न उन्हें वहा अमृत होकर प्राप्त हो जाता है ,मनुष्य योनी में अन्न रूप में ,पशु योनी में तृण रूप में उन्हें इसकी प्राप्ति होती है ,,,जिस प्रकार गोशाला में भूली माता को बछड़ा किसी न किसी प्रकार ढूढ़ ही लेता है ,उसी प्रकार मंत्र तत्सद वस्तुजात को प्राणी या आत्मा के पास किसी न किसी प्रकार पहुचा ही देता है ,,,,नाम ,गोत्र ,ह्रदय की श्रद्धा और उचित संकल्प पूर्वक दिए हुए पदार्थो को भक्तिपूर्वक उच्चारित मंत्र उनके पास पहुचा देता है ,,जिससे पित्र तृप्त हो आशीर्वाद देते है और अतृप्त या दोष होने के कारण होने वाली बाधाए कम हो जाती है ,,इसी प्रकार देवताओं को दिया गया प्रसाद या दान या ब्राह्मण भोजन भी इन्ही विश्वदेव द्वारा परिवर्तित कर उनके पास पहुंचाया जाता है |, ऐसे ही एक विदेशी द्वारा प्रश्न किये जाने पर की दान या श्राद्ध में दिए अन्न कैसे देवता या पित्र तक पहुचते है ,,धर्मं सम्राट करपात्री जी ने उत्तर दिया की जैसे विदेश से आपके सम्बन्धी द्वारा आपके लिए भेजा धन आपके नाम पते के सहारे विशेषी मुद्रा से बदल कर भारतीय मुद्रा में आप तक पहुचा दिया जाता है ,उसी प्रकार यह अन्न भी स्वरुप परिवर्तित हो अपेक्षित रूप में इच्छित स्थान पर पहुच जाता है |आप तो वहां के बैंक में रुपये वहां की मुद्रा में डालते हैं ,बस आप यहाँ के एकाउंट का नम्बर ,बैंक नाम और व्यक्ति नाम देते हैं |पैसा यहाँ व्यक्ति को मिल जाता है |सोचिये जब आप मानव होकर इस तरह कुछ घंटों में पैसा स्थानांतरित कर सकते हैं जिससे यहाँ आप कुछ भी खरीद सकते हैं ,पका सकते हैं ,खा सकते हैं तो देवता ,पित्र आदि तो उस प्रकृति के अंग हैं जिसे ईश्वर से बनाया है तो वहां का विज्ञान कितना आगे होगा |,,,अतः व्यक्ति को श्राद्ध पितरो के लिए और दान देवताओं क लिए अवश्य करना चाहिए । ..............हर-हर महादेव

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Seemma Valluvar Sep 24, 2022

(((( तीन गांठें )))) . एक दिन भगवान बुद्ध जब प्रवचन सभा में पहुंचे, तो उनके हाथ में एक रस्सी थी। . बुद्ध ने आसन ग्रहण किया और बिना किसी से कुछ कहे वे रस्सी में गांठें लगाने लगे। वहां उपस्थित सभी लोग यह देख सोच रहे थे कि अब बुद्ध आगे क्या करेंगे.... . तभी बुद्ध ने सभी से एक प्रश्न किया, “ मैंने इस रस्सी में तीन गांठें लगा दी हैं। अब मैं आपसे ये जानना चाहता हूं कि क्या यह वही रस्सी है, जो गांठें लगाने से पूर्व थी?” . एक शिष्य ने कहा, गुरुजी, इसका उत्तर देना थोड़ा कठिन है। ये वास्तव में हमारे देखने के तरीके पर निर्भर है। . एक दृष्टिकोण से देखें, तो रस्सी वही है, इसमें कोई बदलाव नहीं आया है। दूसरी तरह से देखें, तो अब इसमें तीन गांठें लगी हुई हैं, जो पहले नहीं थीं। . अतः इसे बदला हुआ कह सकते हैं। . पर ये बात भी ध्यान देने वाली है कि बाहर से देखने में भले ही ये बदली हुई प्रतीत हो, पर अंदर से तो ये वही है जो पहले थी; इसका बुनियादी स्वरूप अपरिवर्तित है। . “सत्य है!” बुद्ध ने कहा, “अब मैं इन गांठों को खोल देता हूं।” . यह कहकर बुद्ध रस्सी के दोनों सिरों को एक-दूसरे से दूर खींचने लगे। . उन्होंने पूछा, “तुम्हें क्या लगता है, इस प्रकार इन्हें खींचने से क्या मैं इन गांठों को खोल सकता हूं?” . “नहीं-नहीं, ऐसा करने से ये गांठें तो और भी कस जाएंगी और इन्हें खोलना और मुश्किल हो जाएगा।” एक शिष्य ने शीघ्रता से उत्तर दिया। . बुद्ध ने कहा, “ठीक है। अब एक आखिरी प्रश्न का उत्तर दो। इन गांठों को खोलने के लिए हमें क्या करना होगा?” . शिष्य बोला, “इसके लिए हमें इन गांठों को गौर से देखना होगा, ताकि हम जान सकें कि इन्हें कैसे लगाया गया था और फिर हम इन्हें खोलने का प्रयास कर सकते हैं।” . मैं यही तो सुनना चाहता था। मूल प्रश्न यही है कि जिस समस्या में तुम फंसे हो, वास्तव में उसका कारण क्या है, बिना कारण जाने निवारण असंभव है। . मैं देखता हूं कि अधिकतर लोग बिना कारण जाने ही निवारण करना चाहते हैं। . कोई मुझसे ये नहीं पूछता कि मुझे क्रोध क्यों आता है, लोग पूछते हैं कि मैं अपने क्रोध का अंत कैसे करूं? . कोई यह प्रश्न नहीं करता कि मेरे अंदर अंहकार का बीज कहां से आया? लोग पूछते हैं कि मैं अपना अहंकार कैसे खत्म करूं? . प्रिय शिष्यों, जिस प्रकार रस्सी में गांठें लग जाने पर भी उसका बुनियादी स्वरूप नहीं बदलता, उसी प्रकार मनुष्य में भी कुछ विकार आ जाने से उसके अंदर से अच्छाई के बीज खत्म नहीं होते। . जैसे हम रस्सी की गांठें खोल सकते हैं, वैसे ही हम मनुष्य की समस्याएं भी हल कर सकते हैं। . इस बात को समझो कि जीवन है तो समस्याएं भी होंगी ही और समस्याएं हैं तो समाधान भी अवश्य होगा। . आवश्यकता है कि हम किसी भी समस्या के कारण को अच्छी तरह से जानें, निवारण स्वतः ही प्राप्त हो जाएगा। जय श्री राम 🙏🌺🌺🌺🌺🚩 जय हनुमान महाप्रभु जी 🙏🌺🌺🌺🌺🌺🚩 जय शनिदेव 🙏🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🚩

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Seemma Valluvar Sep 21, 2022

इंदिरा एकादशी पर इस बार शिव योग बन रहा है. धर्म ग्रंथों के अनुसार शिव योग में भगवान विष्णु के साथ भोलेनाथ की पूजा करने से सौभाग्य और समृद्धि में वृद्धि होती है. शिव योग - 21 सितंबर 2022, सुबर 09.13 - 22 सितंबर 2022, सुबह 09.45 इंदिरा एकादशी पूजा विधि इंदिरा एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व स्नान के बाद सर्व प्रथम सूर्य को अर्घ्य दें फिर व्रत का संकल्प लें। भगवान विष्णु की मूर्ति का पंचामृत(दूध,दही, घी, शहद, शक्कर) से अभिषेक करें और फिर गंगाजल से स्नान कराएं। अगर मूर्ति नहीं है तो पूजा की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर श्रीहरि की तस्वीर स्थापित करें। श्रीहरि को पीले वस्त्र, पीले फूल, केले, मिठाई अर्पित करें. साथ ही मां लक्ष्मी की भी पूजा करें। देवी को लाल फूल और श्रृंगारा का सामान अर्पित करें। पूजा में श्रीहरि का स्मरण कर इस मंत्र का जाप करते रहें. इससे विष्णु जी आपकी प्रार्थना स्वीकर करते हैं- ॐ नारायणाय विद्महे। वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णु प्रचोदयात् भोग में तुलसी का पत्र डालकर नारायण को को नेवैद्य लगाएं. धूप,दीप जलाक विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करें, फिर अंत में आरती कर दें। इस दिन जरूरतमंदो को दान देना न भूलें। दान से व्रत का प्रभाव दोगुना हो जाता है।

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