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*🚩हिंदू शास्त्रों में श्राद्ध के बारे में क्या कहा है- करना चाहिए या नही *🚩श्राद्धकर्म से देवता और पितर तृप्त होते हैं और श्राद्ध करनेवाले का अंतःकरण भी तृप्ति-संतुष्टि का अनुभव करता है। बूढ़े-बुजुर्गों ने हमारी उन्नति के लिए बहुत कुछ किया है तो उनकी सद्गति के लिए हम भी कुछ करेंगे तो हमारे हृदय में भी तृप्ति-संतुष्टि का अनुभव होगा।* *🚩औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहाँ को कैद कर दिया था तब शाहजहाँ ने अपने बेटे को लिख भेजाः "धन्य हैं हिन्दू जो अपने मृतक माता-पिता को भी खीर और हलुए-पूरी से तृप्त करते हैं और तू जिन्दे बाप को भी एक पानी की मटकी तक नहीं दे सकता? तुझसे तो वे हिन्दू अच्छे, जो मृतक माता-पिता की भी सेवा कर लेते हैं।"* *🚩गरुड़ पुराण में महिमा:* *कुर्वीत समये श्राद्धं कुले कश्चिन्न सीदति।* *आयुः पुत्रान् यशः स्वर्गं कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम्।।* *पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्।* *देवकार्यादपि सदा पितृकार्यं विशिष्यते।।* *देवताभ्यः पितृणां हि पूर्वमाप्यायनं शुभम्।* *🚩"समयानुसार श्राद्ध करने से कुल में कोई दुःखी नहीं रहता। पितरों की पूजा करके मनुष्य आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, पशु, सुख और धन-धान्य प्राप्त करता है। देवकार्य से भी पितृकार्य का विशेष महत्त्व है। देवताओं से पहले पितरों को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी है।"* (10.57-59) *🚩"अमावस्या के दिन पितृगण वायुरूप में घर के दरवाजे पर उपस्थित रहते हैं और अपने स्वजनों से श्राद्ध की अभिलाषा करते हैं। जब तक सूर्यास्त नहीं हो जाता, तब तक वे भूख-प्यास से व्याकुल होकर वहीं खड़े रहते हैं। सूर्यास्त हो जाने के पश्चात वे निराश होकर दुःखित मन से अपने-अपने लोकों को चले जाते हैं। अतः अमावस्या के दिन प्रयत्नपूर्वक श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। यदि पितृजनों के पुत्र तथा बन्धु-बान्धव उनका श्राद्ध करते हैं और गया-तीर्थ में जाकर इस कार्य में प्रवृत्त होते हैं तो वे उन्हीं पितरों के साथ ब्रह्मलोक में निवास करने का अधिकार प्राप्त करते हैं। उन्हें भूख-प्यास कभी नहीं लगती। इसीलिए विद्वान को प्रयत्नपूर्वक यथाविधि शाकपात से भी अपने पितरों के लिए श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।* *🚩भगवान विष्णु गरूड़ से कहते हैं- जो लोग अपने पितृगण, देवगण, ब्राह्मण तथा अग्नि की पूजा करते हैं, वे सभी प्राणियों की अन्तरात्मा में समाविष्ट मेरी ही पूजा करते हैं। शक्ति के अनुसार विधिपूर्वक श्राद्ध करके मनुष्य ब्रह्मपर्यंत समस्त चराचर जगत को प्रसन्न कर देता है।* *🚩हे आकाशचारिन् गरूड़ ! पिशाच योनि में उत्पन्न हुए पितर मनुष्यों के द्वारा श्राद्ध में पृथ्वी पर जो अन्न बिखेरा जाता है उससे संतृप्त होते हैं। श्राद्ध में स्नान करने से भीगे हुए वस्त्रों द्वारा जो जल पृथ्वी पर गिरता है, उससे वृक्ष योनि को प्राप्त हुए पितरों की संतुष्टि होती है। उस समय जो गन्ध तथा जल भूमि पर गिरता है, उससे देव योनि को प्राप्त पितरों को सुख प्राप्त होता है। जो पितर अपने कुल से बहिष्कृत हैं, क्रिया के योग्य नहीं हैं, संस्कारहीन और विपन्न हैं, वे सभी श्राद्ध में विकिरान्न और मार्जन के जल का भक्षण करते हैं। श्राद्ध में भोजन करने के बाद आचमन एवं जलपान करने के लिए ब्राह्मणों द्वारा जो जल ग्रहण किया जाता है, उस जल से पितरों को संतृप्ति प्राप्त होती है। जिन्हें पिशाच, कृमि और कीट की योनि मिली है तथा जिन पितरों को मनुष्य योनि प्राप्त हुई है, वे सभी पृथ्वी पर श्राद्ध में दिये गये पिण्डों में प्रयुक्त अन्न की अभिलाषा करते हैं, उसी से उन्हें संतृप्ति प्राप्त होती है।* *🚩इस प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्यों के द्वारा विधिपूर्वक श्राद्ध किये जाने पर जो शुद्ध या अशुद्ध अन्न, जल फेंका जाता है, उससे उन पितरों की तृप्ति होती है जिन्होंने अन्य जाति में जाकर जन्म लिया है। जो मनुष्य अन्यायपूर्वक अर्जित किये गये पदार्थों के श्राद्ध करते हैं, उस श्राद्ध से नीच योनियों में जन्म ग्रहण करने वाले चाण्डाल पितरों की तृप्ति होती है।* *🚩हे पक्षिन् ! इस संसार में श्राद्ध के निमित्त जो कुछ भी अन्न, धन आदि का दान अपने बन्धु-बान्धवों के द्वारा किया जाता है, वह सब पितरों को प्राप्त होता है। अन्न, जल और शाकपात आदि के द्वारा यथासामर्थ्य जो श्राद्ध किया जाता है, वह सब पितरों की तृप्ति का हेतु है। - गरूड़ पुराण* *🚩श्राद्घ नहीं कर सकते हैं तो...* *अगर पंडित से श्राद्ध नहीं करा पाते तो सूर्य नारायण के आगे अपने बगल खुले करके (दोनों हाथ ऊपर करके) बोलें :* *“हे सूर्य नारायण ! मेरे पिता (नाम), अमुक (नाम) का बेटा, अमुक जाति (नाम), अमुक गोत्र (अगर जाति, कुल, गोत्र नहीं याद तो ब्रह्म गोत्र बोल दें) को आप संतुष्ट/सुखी रखें। इस निमित्त मैं आपको अर्घ्य व भोजन कराता हूँ।” ऐसा करके आप सूर्य भगवान को अर्घ्य दें और भोग लगाएं।* *🚩श्राद्ध पक्ष में रोज भगवद्गीता के सातवें अध्याय का पाठ और 1 माला द्वादश मंत्र ”ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” और 1 माला "ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा" की करनी चाहिए और उस पाठ एवं माला का फल नित्य अपने पितृ को अर्पण करना चाहिए।*

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ऊँ नमः शिवाय 🌷🌹🙏 हर हर महादेव 🙏🌹🙏 शुभ प्रभात वंदन जी 😊🙏🌹🙏 🌞 ~ *आज का हिन्दू पंचांग* ~ 🌞 ⛅ *दिनांक 20 सितम्बर 2021* ⛅ *दिन - सोमवार* ⛅ *विक्रम संवत - 2078 (गुजरात - 2077)* ⛅ *शक संवत -1943* ⛅ *अयन - दक्षिणायन* ⛅ *ऋतु - शरद* ⛅ *मास - भाद्रपद* ⛅ *पक्ष - शुक्ल* ⛅ *तिथि - पूर्णिमा 21 सितम्बर प्रातः 05:24 तक तत्पश्चात प्रतिपदा* ⛅ *नक्षत्र - पूर्व भाद्रपद 21 सितम्बर प्रातः 04:02 तक तत्पश्चात उत्तर भाद्रपद* ⛅ *योग - शूल शाम 03:24 तक तत्पश्चात गण्ड* ⛅ *राहुकाल - सुबह 07:58 से सुबह 09:29 तक* ⛅ *सूर्योदय - 06:28* ⛅ *सूर्यास्त - 18:35* ⛅ *दिशाशूल - पूर्व दिशा में* ⛅ *व्रत पर्व विवरण - व्रत पूर्णिमा, प्रोष्ठपदी पूर्णिमा, पूर्णिमा का श्राद्ध, महालय श्राद्धारम्भ, संन्यासी चतुर्मास समाप्त, गोत्रिरात्री व्रत समाप्त* 💥 *विशेष - पूर्णिमा के दिन ब्रह्मचर्य का पालन तथा तिल का तेल खाना और लगाना निषिद्ध है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)* 🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌷 *श्राद्ध में पालने योग्य नियम* 🌷 ➡ *20 सितम्बर 2021 सोमवार से महालय श्राद्ध आरम्भ ।* 🙏🏻 *श्रद्धा और मंत्र के मेल से पितरों की तृप्ति के निमित्त जो विधि होती है उसे 'श्राद्ध' कहते हैं।* 🙏🏻 *हमारे जिन संबंधियों का देहावसान हो गया है, जिनको दूसरा शरीर नहीं मिला है वे पितृलोक में अथवा इधर-उधर विचरण करते हैं, उनके लिए पिण्डदान किया जाता है।* *बच्चों एवं संन्यासियों के लिए पिण्डदान नहीं किया जाता।* 🙏🏻 *विचारशील पुरुष को चाहिए कि जिस दिन श्राद्ध करना हो उससे एक दिन पूर्व ही संयमी, श्रेष्ठ ब्राह्मणों को निमंत्रण दे दे। परंतु श्राद्ध के दिन कोई अनिमंत्रित तपस्वी ब्राह्मण घर पर पधारें तो उन्हें भी भोजन कराना चाहिए।* 🙏🏻 *भोजन के लिए उपस्थित अन्न अत्यंत मधुर, भोजनकर्ता की इच्छा के अनुसार तथा अच्छी प्रकार सिद्ध किया हुआ होना चाहिए। पात्रों में भोजन रखकर श्राद्धकर्ता को अत्यंत सुंदर एवं मधुर वाणी से कहना चाहिए कि 'हे महानुभावो ! अब आप लोग अपनी इच्छा के अनुसार भोजन करें।'* 🙏🏻 *श्रद्धायुक्त व्यक्तियों द्वारा नाम और गोत्र का उच्चारण करके दिया हुआ अन्न पितृगण को वे जैसे आहार के योग्य होते हैं वैसा ही होकर मिलता है। (विष्णु पुराणः 3.16,16)* 🙏🏻 *श्राद्धकाल में शरीर, द्रव्य, स्त्री, भूमि, मन, मंत्र और ब्राह्मण-ये सात चीजें विशेष शुद्ध होनी चाहिए।* 🙏🏻 *श्राद्ध में तीन बातों को ध्यान में रखना चाहिएः शुद्धि, अक्रोध और अत्वरा (जल्दबाजी नही करना)।* *श्राद्ध में मंत्र का बड़ा महत्त्व है। श्राद्ध में आपके द्वारा दी गयी वस्तु कितनी भी मूल्यवान क्यों न हो, लेकिन आपके द्वारा यदि मंत्र का उच्चारण ठीक न हो तो काम अस्त-व्यस्त हो जाता है। मंत्रोच्चारण शुद्ध होना चाहिए और जिसके निमित्त श्राद्ध करते हों उसके नाम का उच्चारण भी शुद्ध करना चाहिए।* *जिनकी देहावसना-तिथि का पता नहीं है, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन करना चाहिए।* 🙏🏻 *हिन्दुओं में जब पत्नी संसार से जाती है तो पति को हाथ जोड़कर कहती हैः 'मुझसे कुछ अपराध हो गया हो तो क्षमा करना और मेरी सदगति के लिए आप प्रार्थना करना।' अगर पति जाता है तो हाथ जोड़ते हुए पत्नी से कहता हैः 'जाने-अनजाने में तेरे साथ मैंने कभी कठोर व्यवहार किया हो तो तू मुझे क्षमा कर देना और मेरी सदगति के लिए प्रार्थना करना।'* 🙏🏻 *हम एक दूसरे की सदगति के लिए जीते जी भी सोचते हैं, मरते समय भी सोचते हैं और मरने के बाद भी सोचते हैं।* 🙏🏻 *क्या करें क्या न करें पुस्तक से* 🌞 ~ *हिन्दू पंचांग* ~ 🌞 🌷 *श्राद्ध सम्बन्धी बातें* 🌷 ➡ *श्राद्ध कर्म करते समय जो श्राद्ध का भोजन कराया जाता है, तो ११.३६ से १२.२४ तक उत्तम काल होता है l* ➡ *गया, पुष्कर, प्रयाग और हरिद्वार में श्राद्ध करना श्रेष्ठ माना गया है l* ➡ *गौशाला में, देवालय में और नदी तट पर श्राद्ध करना श्रेष्ठ माना गया है l* ➡ *सोना, चांदी, तांबा और कांसे के बर्तन में अथवा पलाश के पत्तल में भोजन करना-कराना अति उत्तम माना गया है l लोहा, मिटटी आदि के बर्तन काम में नहीं लाने चाहिए l* ➡ *श्राद्ध के समय अक्रोध रहना, जल्दबाजी न करना और बड़े लोगों को या बहुत लोगों को श्राद्ध में सम्मिलित नहीं करना चाहिए, नहीं तो इधर-उधर ध्यान बंट जायेगा, तो जिनके प्रति श्राद्ध सद्भावना और सत उद्देश्य से जो श्राद्ध करना चाहिए, वो फिर दिखावे के उद्देश्य में सामान्य कर्म हो जाता है l* ➡ *सफ़ेद सुगन्धित पुष्प श्राद्ध कर्म में काम में लाने चाहिए l लाल, काले फूलों का त्याग करना चाहिए l अति मादक गंध वाले फूल अथवा सुगंध हीन फूल श्राद्ध कर्म में काम में नहीं लाये जाते हैं l* 🌞 ~ *हिन्दू पंचांग* ~ 🌞 🙏🏻🌷🌻🌹🍀🌺🌸🍁💐🙏🏻

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राधे राधे जय श्री ‌राधेययय गोविन्द!🙏 🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉 *( अनुकूलता और प्रतिकूलता-दोनों में भगवान् की कृपा )* ---------:: ××× ::------ जब मनुष्य केवल संसार के अनुकूल भोग पदार्थों की प्राप्ति में भगवत कृपा मानता है, तब वह बड़ीभारी भूल करता है। भगवान की कृपा तो निरंतर है, सब पर है और सभी अवस्थाओं में हैं, किंतु जो यह अनुकूल भोगपदार्थ हैं,जिनमें अनु कूल बुद्धि रहती है यह सब तो मनुष्य को माया के मोहके बंधन में बांधने वाले होते हैं। माया के मोह में बांधकर जो भगवान से अलग कर देने वाली चीज है, उसकी प्राप्ति में भगवत्कृपा मानना ही गलती है। परन्तु होता यहहै कि जबमनुष्यभगवान का भजन करता है, भगवान के नाम का जप करता है, रामायण और गीता आदि का पाठ करता है और संसार के भोगों की प्राप्ति में जरा सी सफलता प्राप्त होती है,तब वह ऐसा मान लेता है कि मेरी यह कामना पूरी हो गई। मुझे यह लाभ हो गया है। ऐसे पत्र मेरे पास बहुत आते हैं और मैं उन्हें प्रोत्सा हित भी करता हूं, परंतु यह चीज बड़ी गलत है। जहां मनुष्य अनुकूल भोगों में भगवान की कृपा मानता है, वहां प्रतिकूलता होने पर वह उल्टी ही सोचेगा। वह कहेगा ---' भगवान बड़े निर्दयी हैं , भगवान की मुझ पर कृपा नहीं है।' अधिक क्षोभ होगा तो वह कह बैठेगा कि ' भगवान न्याय नहीं करते।' इससेभी अधिक और क्षोभ होगा तोवह यहां तक कह देगा कि ' भगवान है ही नहीं, यह सब कोरी कल्पना है।भगवान होते तो इतना भजन करने पर भी ऐसा क्यों होता।' यों कह कर वह भगवान को अस्वीकार कर देता है। इसलिए अमुक स्थिति की प्राप्ति में भगवत कृपा है, यह मानना ही भूल है। पहले पहले जब मनुष्य को सफलता मिलती है, तबतो उसमें वह भगवान की कृपा मानता है, पर आगे चलकर वह कृपा रुक जाती है , छुप जाती है , वह कृपा को भूल जाता है। फिर तो वह अपनी कृति को एवं अपने ही अहंकार को प्रधानता देता है । अमुक कार्य मैंने किया,अमुक सफलता मैंने प्राप्त की---- इस प्रकार वह अपनी बुद्धि का, अपने बलका,अपनी चतुराई का, अपने कला कौशल का घमंड करता है, अभिमान करता है। भगवानको भूल कर वह अपने अहंकार की पूजा करने लगता है। सफलता मैंने प्राप्त की है,इसलिए मेरी पूजा होनी चाहिए जगत में। 'मैंने धनोपार्जन किया, मैंने विजय प्राप्त किया, मैंने अमुक सेवाकी, मैंने राष्ट्र का निर्माण किया, मैंने राज्य देश तथा धर्म की रक्षाकी इसप्रकार सर्वत्र प्रत्येककर्मों में अपना 'अहम' लगाकर वह 'अहम'का पूजक तथा प्रचारक बन जाता है और जब इस'अहं' की 'मैं'की पूजा नहींहोती, उसमें किसी प्रकार का किंचित भी व्यव धान उपस्थित होता है, तब वह बौखला उठता है, दल बनाता है और परस्पर दल बंदी होती है । राग-द्वेष एवं शत्रुताका वायुमंडल बनता है, बढ़ता है। मनुष्य जब ऐसे किसी प्रवाह में बहने लगता है, तब भगवान दया करके ब्रेक लगाते हैं। उसे उस पतन के प्रवाह से लौटाने के लिए भगवान कृपा करते हैं। प्रभु शरणं प्रभु शरणं! न भूलें हम न भूलें हम!! राधे शरणं कृष्ण शरणं!!!राधेययय🙏

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