Rameshannd Guruji Nov 26, 2021

भैरव की उत्पत्ति । 🌹🙏जय श्री काल भैरवनाथ संकलित : ----रमेशानंद गुरुजी ब्रह्मा और विष्णु में एक समय विवाद छिड़ा कि परम तत्व कौन है ?उस समय वेदों से दोनों ने पूछा : - क्योंकि वेद ही प्रमाण माने जाते हैं ।वेदों ने कहा कि सबसे श्रेष्ठ शंकर हैं ।ब्रह्मा जी के पहले पाँच मस्तक थे ।उनके पाँचवें मस्तक ने शिव का उपहास करते हुए , क्रोधित होते हुए कहा कि रुद्र तो मेरे भाल स्थल से प्रकट हुए थे , इसलिए मैंने उनका नाम " रुद्र ' रखा है । अपने सामने शंकर को प्रकट हुए देख उस मस्तक ने कहा कि हे बेटा !तुम मेरी शरण में आओ , मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा । ( स्कंद पुराण , काशी खण्ड अध्याय ३० ) भैरव का नामकरण इस प्रकार गर्व युक्त ब्रह्मा जी की बातें सुनकर भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो उठे और अपने अंश से भैरवाकृति को प्रकट किया ।शिव ने उससे कहा कि " काल भैरव ' ! तुम इस पर शासन करो । साथ ही उन्होंने कहा कि तुम साक्षात " काल ' के भी कालराज हो ।तुम विश्व का भरण करने में समर्थ होंगे , अतः तुम्हारा नाम " भैरव ' भी होगा । तुमसे काल भी डरेगा , इसलिए तुम्हें “ काल भैरव ' भी कहा जाएगा । दुष्टात्माओं का तुम नाश करोगे , अतः तुम्हें “ आमर्दक ' नाम से भी लोग जानेंगे ।हमारे और अपने भक्तों के पापों का तुम तत्क्षण भक्षण करोगे , फलतः तुम्हारा एक नाम " पापभक्षण ' भी होगा । श्री तत्वनिधि नाम तंत्र - मंत्र में भैरव शब्द के तीन अक्षरों के ध्यान के उनके त्रिगुणात्मक स्वरूप को सुस्पष्ट परिचय मिलता है , क्योंकि ये तीनों शक्तियां उनके समाविष्ट हैं ' भ ' अक्षरवाली जो भैरव मूर्ति है वह श्यामला है , भद्रासन पर विराजमान है तथा उदय कालिकसूर्य के समान सिंदूरवर्णी उसकी कांति है ।वह एक मुखी विग्रह अपने चारों हाथों में धनुष , बाण वर तथा अभय धारण किए हुए हैं ।' र ' अक्षरवाली भैरव मूर्ति श्याम वर्ण हैं ।उनके वस्त्र लाल हैं ।सिंह पर आरूढ़ वह पंचमुखी देवी अपने आठ हाथों में खड्ग , खेट ।( मूसल ) , अंकुश , गदा , पाश , शूल , वर तथा अभय धारण किए हुए ' व ' अक्षरवाली भैरवी शक्ति के आभूषण और नरवरफाटक सामान श्वेत हैं ।वह देवी समस्त लोकों का एकमात्र आश्रय है ।विकसित कमल पुष्प उनका आसन है ।वे चारों हाथों में क्रमशः दो कमल , वर एवं अभय धारण करती हैं । स्कंदपुराण के काशी - खंड के 31वें अध्याय में उनके प्राकट्य की कथा है ।गर्व से उन्मत ब्रह्माजी के पांचवें मस्तक को अपने बाएं हाथ के नखाग्र से काट देने पर जब भैरव ब्रह्म हत्या के भागी हो गए , तबसे भगवान शिव की प्रिय पुरी ' काशी ' में आकर दोष मुक्त हुए ।ब्रह्मवैवत पुराण के प्रकृति खंडान्तर्गत दुर्गोपाख्यान में आठ पूज्य निर्दिष्ट हैं - महाभैरव , संहार भैरव , असितांग भैरव , रूरू भैरव , काल भैरव , क्रोध भैरव , ताम्रचूड भैरव , चंद्रचूड भैरव ।लेकिन इसी पुराण के गणपति - खंड के 41वें अध्याय में अष्टभैरव के नामों में सात और आठ क्रमांक पर क्रमशः कपालभैरव तथा रूद्र भैरव का नामोल्लेख मिलता है ।तंत्रसार में वर्णित आठ भैरव असितांग , रूरू , चंड , क्रोध , उन्मत्त , कपाली , भीषण संहार नाम वाले हैं ।भैरव कलियुग के जागृत देवता हैं ।शिव पुराण में भैरव को महादेव शंकर का पूर्ण रूप बताया गया है ।इनकी आराधना में कठोर नियमों का विधान भी नहीं है ।ऐसे परम कृपालु एवं शीघ्र फल देने वाले भैरवनाथ की शरण में जाने पर जीव का निश्चय ही उद्धार हो जाता है । 🌹🙏जय श्री काल भैरवनाथ🌹🙏 🌹🙏रमेशानन्द गुरूजी

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