Rajput Indra Nov 26, 2021

Gopa Austami भगवान ने अब छठे वर्ष में प्रवेश किया। एक दिन भगवान मैया से बोले – ‘मैया...अब हम बड़े हो गये हैं। मैया ने कहा- अच्छा लाला...तुम बड़े हो गये तो बताओ क्या करे? भगवान ने कहा - मैया अब हम बछड़े नहीं चरायेगे, अब हम गाये चरायेगे। मैया ने कहा - ठीक है। बाबा से पूँछ लेना...झट से भगवान बाबा से पूंछने गये। बाबा ने कहा – लाला..., तुम अभी बहुत छोटे हो, अभी बछड़े ही चराओ। भगवान बोले- बाबा मै तो गाये ही चराऊँगा। जब लाला नहीं माने तो बाबा ने कहा -ठीक है लाला,.. जाओ पंडित जी को बुला लाओ, वे गौ-चारण का मुहूर्त देखकर बता देगे। भगवान झट से पंडितजी के पास गए और बोले पंडितजी.... बाबा ने बुलाया है। गौचारण का मुहूर्त देखना है आप आज ही का मुहूर्त निकल दीजियेगा, यदि आप ऐसा करोगे तो मैं आप को बहुत सारा माखन दूँगा। पंडितजी घर आ गए पंचाग खोल कर बार-बार अंगुलियों पर गिनते,.. बाबा ने पूँछा -पंडित जी क्या बात है? आप बार-बार क्या गिन रहे है ? पंडित जी ने कहा – क्या बताये,..नंदबाबाजी, केवल आज ही का मुहूर्त निकल रहा है इसके बाद तो एक वर्ष तक कोई मुहूर्त है ही नहीं। बाबा ने गौ चारण की स्वीकृति दे दी। भगवान जिस समय, जो काम करे, वही मुहूर्त बन जाता है। उसी दिन भगवान ने गौचारण शुरू किया वह शुभ दिन कार्तिक-माह का “गोपा-अष्टमी” का दिन था। माता यशोदा जी ने लाला का श्रृंगार कर दिया और जैसे ही पैरों में जूतियाँ पहनाने लगी तो बाल कृष्ण ने मना कर दिया और कहने लगे मैया ! यदि मेरी गौ जूते नही पहनती तो मै कैसे पहन सकता हूँ। यदि पहना सकती हो तो सारी गौओं को जूतियाँ पहना दो। फिर मैं भी पहन लूंगा और भगवान जब तक वृंदावन में रहे कभी भगवान ने पैरों में जूतियाँ नहीं पहनी। अब भगवान अपने सखाओं के साथ गौए चराते हुए वृन्दावन में जाते और अपने चरणों से वृन्दावन को अत्यंत पावन करते। यह वन गौओ के लिए हरी हरी घास से युक्त एवं रंग- बिरंगे पुष्पों की खान हो रहा था, आगे आगे गौएँ उनके पीछे-पीछे बाँसुरी बजाते हुए श्यामसुन्दर तदन्तर बलराम और फिर श्रीकृष्ण के यश का गान करते हुए ग्वालबाल। इस प्रकार विहार करने के लिए उन्होंने उस वन में प्रवेश किया। तब से भगवान गौ चरण लीला करने लगे। है गोपाल !

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Rajput Indra Nov 25, 2021

Motivational Message Dialog of Ganesh ji And Shiv ji *🌳🦚आज की अमृत कथा🦚🌳* *एक मिनिट लगेगा जरा ध्यान से पढियेगा सिर्फ एक मिनिट* 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 *💐💐पिता श्री💐💐* पौराणिक कथाओं में कभी कभी ऐसे प्रसङ्ग सामने आते हैं जिसे पढ़ते हुए हृदय गदगद हो जाता है । *एक बार गणेश जी ने भगवान शिव जी से कहा,* पिता जी ! आप यह चिता भस्म लगा कर, मुण्डमाला धारण कर अच्छे नहीं लगते, मेरी माता गौरी अपूर्व सुन्दरी औऱ आप उनके साथ इस भयङ्कर रूप में ! पिता जी ! आप एक बार कृपा कर के अपने सुन्दर रूप में माता के सम्मुख आयें, जिससे हम आपका असली स्वरूप देख सकें ! *भगवान शिव जी मुस्कुराये औऱ* गणेश की बात मान ली ! कुछ समय बाद जब शिव जी स्नान कर के लौटे तो उनके शरीर पर भस्म नहीं थी, बिखरी जटाएँ सँवरी हुईं मुण्ड माला उतरी हुई थी ! सभी देवी-देवता, यक्ष, गन्धर्व, शिवगण उन्हें अपलक देखते रह गये, वो ऐसा रूप था कि *मोहिनी अवतार रूप भी फीका पड़ जाए !* भगवान शिव ने अपना यह रूप कभी प्रकट नहीं किया था ! शिव जी का ऐसा अतुलनीय रूप कि करोड़ों कामदेव को भी मलिन कर रहा था ! गणेश अपने पिता की इस मनमोहक छवि को देख कर स्तब्ध रह गये मस्तक झुका कर बोले मुझे क्षमा करें पिता जी ! परन्तु अब आप अपने पूर्व रूप को धारण कर लीजिए ! भगवान शिव मुस्कुराये औऱ पूछा, क्यों पुत्र अभी भी तुमने ही मुझे इस रूप में देखने की इच्छा प्रकट की थी, अब पुनः पूर्व स्वरूप में आने की बात क्यों ? गणेश जी मस्तक झुकाये हुए ही कहा, क्षमा करें पिता श्री ! मेरी माता से सुन्दर क़ोई औऱ दिखे मैं ऐसा कदापि नहीं चाहता ! औऱ शिव जी हँसे औऱ अपने पुराने स्वरूप में लौट आये ! *पौराणिक ऋषि इस प्रसङ्ग का सार ::--- आज भी ऐसा ही होता है पिता रुद्र रूप में रहता है क्योंकि उसके ऊपर परिवार की ज़िम्मेदारियाँ अपने परिवार का रक्षण उनके मान सम्मान का ख्याल रखना होता है तो थोड़ा कठोर रहता है... औऱ माँ सौम्य, प्यार, लाड़, स्नेह उनसे बातचीत कर के प्यार दे कर उस कठोरता का सन्तुलन बनाती हैं ।। इसलिए सुन्दर होता है माँ का स्वरुप ।। *पिता के ऊपर से भी* ज़िम्मेदारियों का बोझ हट जाए तो *वो भी बहुत सुन्दर दिखता है।* *सदैव प्रसन्न रहिये।* 🕉️🐚⚔️🚩🌞🇮🇳⚔️🌷🙏 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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Rajput Indra Nov 24, 2021

Story of Satyabhama And Krishna *"स्त्री" क्यों पूजनीय है ?* *==============* *एक बार सत्यभामाजी ने श्रीकृष्ण से पूछा, "मैं आप को कैसी लगती हूँ ?* *" श्रीकृष्ण ने कहा, "तुम मुझे नमक जैसी लगती हो ।"* *सत्यभामाजी इस तुलना को सुन कर क्रुद्ध हो गयी, तुलना भी की तो किस से । आपको इस संपूर्ण विश्व में मेरी तुलना करने के लिए और कोई पदार्थ नहीं मिला।* *श्रीकृष्ण ने उस वक़्त तो किसी तरह सत्यभामाजी को मना लिया और उनका गुस्सा शांत कर दिया ।* *कुछ दिन पश्चात श्रीकृष्ण ने अपने महल में एक भोज का आयोजन किया छप्पन भोग की व्यवस्था हुई।* *सर्वप्रथम सत्यभामाजी से भोजन प्रारम्भ करने का आग्रह किया श्रीकृष्ण ने ।* *सत्यभामाजी ने पहला कौर मुँह में डाला मगर यह क्या - सब्जी में नमक ही नहीं था । कौर को मुँह से निकाल दिया ।* *फिर दूसरा कौर मावा-मिश्री का मुँह में डाला और फिर उसे चबाते-चबाते बुरा सा मुँह बनाया और फिर पानी की सहायता से किसी तरह मुँह से उतारा ।* *अब तीसरा कौर फिर कचौरी का मुँह में डाला और फिर.. आक्..थू !* *तब तक सत्यभामाजी का पारा सातवें आसमान पर पहुँच चुका था । जोर से चीखीं.. किसने बनाई है यह रसोई ?* *सत्यभामाजी की आवाज सुन कर श्रीकृष्ण दौड़ते हुए सत्यभामाजी के पास आये और पूछा क्या हुआ देवी ? कुछ गड़बड़ हो गयी क्या ? इतनी क्रोधित क्यों हो ? तुम्हारा चेहरा इतना तमतमा क्यूँ रहा है ? क्या हो गया ?* *सत्यभामाजी ने कहा किसने कहा था आपको भोज का आयोजन करने को ?* *इस तरह बिना नमक की कोई रसोई बनती है ? किसी वस्तु में नमक नहीं है। मीठे में शक्कर नहीं है। एक कौर नहीं खाया गया।* *श्रीकृष्ण ने बड़े भोलेपन से पूछा, तो क्या हुआ बिना नमक के ही खा लेती ।* *सत्यभामाजी फिर क्रुद्ध होकर बोली कि लगता है दिमाग फिर गया है आपका ? बिना शक्कर के मिठाई तो फिर भी खायी जा सकती है मगर बिना नमक के कोई भी नमकीन वस्तु नहीं खायी जा सकती है ।* *तब श्रीकृष्ण ने कहा तब फिर उस दिन क्यों गुस्सा हो गयी थी जब मैंने तुम्हे यह कहा कि तुम मुझे नमक पर जितनी प्रिय हो ।* *अब सत्यभामाजी को सारी बात समझ में आ गयी की यह सारा वाकया उसे सबक सिखाने के लिए था और उनकी गर्दन झुक गयी ।* *कथा का मर्म :-* *~~~~~~~~~* *स्त्री जल की तरह होती है, जिसके साथ मिलती है उसका ही गुण अपना लेती है । स्त्री नमक की तरह होती है जो अपना अस्तित्व मिटा कर भी अपने प्रेम-प्यार तथा आदर-सत्कार से परिवार को ऐसा बना देती है ।* https://t.me/joinchat/SmGTSh65tZmEpnvs *माला तो आप सबने देखी होगी। तरह-तरह के फूल पिरोये हुवे पर शायद ही कभी किसी ने अच्छी से अच्छी माला में अदृश्य उस "सूत" को देखा होगा जिसने उन सुन्दर सुन्दर फूलों को एक साथ बाँध कर रखा है ।* *लोग तारीफ़ तो उस माला की करते हैं जो दिखाई देती है मगर तब उन्हें उस सूत की याद नहीं आती जो अगर टूट जाये तो सारे फूल इधर-उधर बिखर जाते है ।।* *स्त्री उस सूत की तरह होती है जो बिना किसी चाह के , बिना किसी कामना के , बिना किसी पहचान के , अपना सर्वस्व खो कर भी किसी के जान-पहचान की मोहताज नहीं होती है और शायद इसीलिए दुनिया श्रीराम के पहले सीताजी को और कान्हाजी के पहले श्री-राधे जी को याद करती है ।* *अपने को विलीन कर के पुरुषों को सम्पूर्ण करने की शक्ति भगवान् ने केवल स्त्रियों को ही दी है ।।* *सम्पूर्ण नारी शक्ति को नमन्*

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Rajput Indra Nov 21, 2021

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