Preeti Jain Nov 25, 2021

🙋‍♂️ *एक कर्नल साहब कुएं में गिर गये!!* *सिपाही कुंए में रस्सा फेंकते, जैसे ही कर्नल साहब ऊपर आते, सिपाही रस्सी छोड़ कर कर्नल साहिब को सलूट करते, तो कर्नल कुएं में गिर जाते। एक अनुभवी सैनिक ने सलाह दी कि एक ब्रिगेडियर साहब को तकलीफ देते हैं ताकि उन्हें सैल्यूट ना करना पड़े। एक ब्रिगेडियर को बुलाया गया। ब्रिगेडियर साहब ने रस्सी फेंकी। कर्नल साहब ने रस्सी पकड़ी और ब्रिगेडियर साहब खींचने लगे। कर्नल साहब जैसे ही किनारे पर पहुंचे, उनकी नज़र ब्रिगेडियर साहब पर पड़ी, कर्नल साहब ने रस्सा छोडकर ब्रिगेडियर साहब को सलाम किया और फिर कुएं में गिर गए। यह बार बार हुआ।🙄🤔🙄🤔* *आख़िरकार कर्नल साहब की आवाज़ कुएं से आई।🗣️* *"'कमबख्तों, किसी दोस्त को बुलाओ'🧐'* *Moral of the story:- 🎯🎯👌* *दोस्त बहुत जरूरी है दुनिया में आपको बचाने के लिए......😁😁😁* *Dedicated To All The Friends😊😇*

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Preeti Jain Nov 23, 2021

2️⃣1️⃣❗1️⃣1️⃣❗2️⃣0️⃣2️⃣1️⃣ *(((( संसार में सबसे बड़ा कौन ))))* . एक बार नारद जी के मन में एक विचित्र सा कौतूहल पैदा हुआ। . उन्हें यह जानने की धुन सवार हुई कि ब्रह्मांड में सबसे बड़ा और महान कौन है? . नारद जी ने अपनी जिज्ञासा भगवान विष्णु के सामने ही रख दी। भगवान विष्णु मुस्कुराने लगे। . फिर बोले, नारद जी सब पृथ्वी पर टिका है। इसलिए पृथ्वी को बड़ा कह सकते हैं। और बोले परंतु नारद जी यहां भी एक शंका है। . नारद जी का कौतूहल शांत होने की बजाय और बढ़ गया। नारद जी ने पूछा स्वयं आप सशंकित हैं फिर तो विषय गंभीर है। कैसी शंका है प्रभु? . विष्णु जी बोले, समुद्र ने पृथ्वी को घेर रखा है। इसलिए समुद्र उससे भी बड़ा है। . अब नारद जी बोले, प्रभु आप कहते हैं तो मान लेता हूं कि समुद्र सबसे बड़ा है। . यह सुनकर विष्णु जी ने एक बात और छेड़ दी, परंतु नारद जी समुद्र को अगस्त्य मुनि ने पी लिया था। इसलिए समुद्र कैसे बड़ा हो सकता है? बड़े तो फिर अगस्त्य मुनि ही हुए। . नारद जी के माथे पर बल पड़ गया। फिर भी उन्होंने कहा, प्रभु आप कहते हैं तो अब अगस्त्य मुनि को ही बड़ा मान लेता हूं। . नारद जी अभी इस बात को स्वीकारने के लिए तैयार हुए ही थे कि विष्णु ने नई बात कहकर उनके मन को चंचल कर दिया। . श्री विष्णु जी बोले, नारद जी पर ये भी तो सोचिए वह रहते कहां हैं। . आकाशमंडल में एक सूई की नोक बराबर स्थान पर जुगनू की तरह दिखते हैं। फिर वह कैसे बड़े, बड़ा तो आकाश को होना चाहिए। . नारद जी बोले, हां प्रभु आप यह बात तो सही कर रहे हैं। आकाश के सामने अगस्त्य ऋषि का तो अस्तित्व ही विलीन हो जाता है। . आकाश ने ही तो सारी सृष्टि को घेर आच्छादित कर रखा है। आकाश ही श्रेष्ठ और सबसे बड़ा है। . भगवान विष्णु जी ने नारद जी को थोड़ा और भ्रमित करने की सोची। . श्रीहरि बोल पड़े, पर नारदजी आप एक बात भूल रहे हैं। वामन अवतार ने इस आकाश को एक ही पग में नाप लिया था फिर आकाश से विराट तो वामन हुए। . नारदजी ने श्रीहरि के चरण पकड़ लिए और बोले भगवन आप ही तो वामन अवतार में थे। . फिर अपने सोलह कलाएं भी धारण कीं और वामन से बड़े स्वरूप में भी आए। इसलिए यह तो निश्चय हो गया कि सबसे बड़े आप ही हैं। . भगवान विष्णु ने कहा, नारद, मैं विराट स्वरूप धारण करने के उपरांत भी, अपने भक्तों के छोटे हृदय में विराजमान हूं। . वहीं निवास करता हूं। जहां मुझे स्थान मिल जाए वह स्थान सबसे बड़ा हुआ न। . इसलिए सर्वोपरि और सबसे महान तो मेरे वे भक्त हैं जो शुद्ध हृदय से मेरी उपासना करके मुझे अपने हृदय में धारण कर लेते हैं। . उनसे विस्तृत और कौन हो सकता है। तुम भी मेरे सच्चे भक्त हो इसलिए वास्तव में तुम सबसे बड़े और महान हो। . श्रीहरि की बात सुनकर नारद जी के नेत्र भर आए। उन्हें संसार को नचाने वाले भगवान के हृदय की विशालता को देखकर आनंद भी हुआ और अपनी बुद्धि के लिए खेद भी। . नारद जी ने कहा, प्रभु संसार को धारण करने वाले आप स्वयं खुद को भक्तों से छोटा मानते हैं। फिर भक्तगण क्यों यह छोटे-बड़े का भेद करते हैं। . मुझे अपनी अज्ञानता पर दुख है। मैं आगे से कभी भी छोटे-बड़े के फेर में नहीं पड़ूंगा। . यदि परमात्मा के प्रति हमारी पूर्ण श्रद्धा, समर्पण और भक्ति है तो हम सदैव परमात्मा से परोक्ष रूप से जुड़ जाते हैं। . भगवान भक्त के वश में हैं भक्त अपनी निष्काम भक्ति से भगवान को वश में कर लेता है। . हमारे मन मे सदैव यही भाव होना चाहिए कि हे प्रभू, हे त्रिलोक के स्वामी इस संसार मे मेरा कुछ नही, यहां तक कि यह शरीर और श्वांसे भी मेरी नही है, फिर मैं आपको क्या समर्पण करूँ। . फिर भी जो कुछ भी तेरा है वह तुम्हे सौंपता हूँ। आप ही सर्वेश्वर है, आप ही नियंता है, आप ही सृजन हार और आप ही संहारक है..!! *🙏🏾🙏🏻🙏🏿जय जय श्री राधे*🙏🏼🙏🏽🙏

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Preeti Jain Nov 22, 2021

गर्मियों की छुट्टियों में 15 दिन के लिए मायके जाने के लिए पत्नी ज्योति और दोनों बच्चों को रेलवे स्टेशन छोड़ने गया तो मैडमजी ने सख्त हिदायत दी। माँजी-बाबूजी का ठीक से ध्यान रखना और समय-समय पर उन्हें दवाई और खाना खाने को कहियेगा। हाँ.. हाँ..ठीक है..जाओ तुम आराम से, 15 दिन क्या एक महीने बाद आना, माँ-बाबूजी और मैं मज़े से रहेंगे..और रही उनके ख्याल की बात तो... मैं भी आखिर बेटा हूँ उनका, (मैंने भी बड़ी अकड़ में कहा) ज्योति मुस्कुराते हुए ट्रैन में बैठ गई, कुछ देर में ही ट्रेन चल दी.. उन्हें छोड़कर घर लौटते वक्त सुबह के 08.10 ही हुए थे तो सोचा बाहर से ही कचोरी-समोसा ले चलूं ताकि माँ को नाश्ता ना बनाना पडे। घर पहुंचा तो माँ ने कहा... ° तुझे नहीं पता क्या..? हमने तला-गला खाना पिछले आठ महीनों से बंद कर दिया है.. वैसे तुझे पता भी कैसे होगा, तू कौन सा घर में रहता है। आखिरकार दोनों ने फिर दूध ब्रेड का ही नाश्ता कर लिया..!! नाश्ते के बाद मैंने दवाई का डिब्बा उनके सामने रख दिया और दवा लेने को कहा तो माँ बोली। ° हमें क्या पता कौन सी दवा लेनी है रोज तो बहू निकालकर ही देती है। मैंने ज्योति को फोन लगाकर दवाई पूछी हें निकालकर खिलाई। इसी तरह ज्योति के जाने के बाद मुझे उसे अनगिनत बार फोन लगाना पड़ा, कौन सी चीज कहाँ रखी है, माँ-बाबूजी को क्या पसन्द है क्या नहीं, कब कौन सी दवाई देनी है, रोज माँ-बाबूजी को बहू-बच्चों से दिन में 2 या 3 बार बात करवाना, गिन-गिन कर दिन काट रहे थे दोनों, सच कहूँ तो माँ-बाबूजी के चेहरे मुरझा गए थे, जैसे उनके बुढ़ापे की लाठी किसी ने छीन ली हो। बात-बात पर झुंझलाना और चिढ़-चिढ़ापन बढ़ गया था उनका, मैं खुद अपने आप को बेबस महसूस करने लगा, मुझसे उन दोनों का अकेलापन देखा नहीं जा रहा था। आखिरकार अपनी सारी अकड़ और एक बेटा होने के अहम को ताक पर रखकर एक सप्ताह बाद ही ज्योति को फोन करके बुलाना पड़ा। और जब ज्योति और बच्चे वापस घर आये तो दोनों के चेहरे की मुस्कुराहट और खुशी देखने लायक थी, जैसे पतझड़ के बाद किसी सूख चुके वृक्ष की शाख पर हरी पत्तियां खिल चुकी हो। और ऐसा हो भी क्यों नही... आखिर उनके परिवार को अपने कर्मों से रोशन करने वाली उनकी ज्योति जो आ गई थी। मुझे भी इन दिनों में एक बात बखूबी समझ आ गई थी और वो यह कि...!! वृद्ध माता-पिता के बुढ़ापे में असली सहारा एक अच्छी बहू ही होती है... ना कि बेटा आपको ये कहानी कैसी लगी हमें कमेंट बॉक्स में बताये और शेयर करना ना भूलें !🙏🙏🌹🌹

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Preeti Jain Nov 21, 2021

बहुत ही खूबसूरत पोस्ट लिखी है और बड़े दिल से लिखी है एक बार जरूर नमन कीजिए *जीवन में 45 पार का मर्द........* *कैसा होता है ?* थोड़ी सी सफेदी कनपटियों के पास, खुल रहा हो जैसे आसमां बारिश के बाद, जिम्मेदारियों के बोझ से झुकते हुए कंधे, जिंदगी की भट्टी में खुद को गलाता हुआ, अनुभव की पूंजी हाथ में लिए, परिवार को वो सब देने की जद्दोजहद में, जो उसे नहीं मिल पाया था, बस बहे जा रहा है समय की धारा में, *बीवी और प्यारे से बच्चों में* पूरा दिन दुनिया से लड़ कर थका हारा, रात को घर आता है, सुकून की तलाश में, लेकिन क्या मिल पाता है सुकून उसे ? दरवाजे पर ही तैयार हैं बच्चे, पापा से ये मंगाया था, वो मंगाया था, नहीं लाए तो क्यों नहीं लाए, लाए तो ये क्यों लाए वो क्यों नहीं लाए, अब वो क्या कहे बच्चों से, कि जेब में पैसे थोड़े कम थे, कभी प्यार से, कभी डांट कर, समझा देता है उनको, एक बूंद आंसू की जमी रह जाती है, आँख के कोने में, लेकिन दिखती नहीं बच्चों को, उस दिन दिखेगी उन्हें, जब वो खुद, बन जाएंगे माँ बाप अपने बच्चों के, खाने की थाली में दो रोटी के साथ, परोस दी हैं पत्नी ने दस चिंताएं, *कभी,* तुम्हीं नें बच्चों को सर चढ़ा रखा है, कुछ कहते ही नहीं, *कभी,* हर वक्त डांटते ही रहते हो बच्चों को, कभी प्यार से बात भी कर लिया करो, लड़की सयानी हो रही है, तुम्हें तो कुछ दिखाई ही नहीं देता, लड़का हाथ से निकला जा रहा है, तुम्हें तो कोई फिक्र ही नहीं है, पड़ोसियों के झगड़े, मुहल्ले की बातें, शिकवे शिकायतें दुनिया भर की, सबको पानी के घूंट के साथ, गले के नीचे उतार लेता है, जिसने एक बार हलाहल पान किया, वो सदियों नीलकंठ बन पूजा गया, यहाँ रोज़ थोड़ा थोड़ा विष पीना पड़ता है, जिंदा रहने की चाह में, फिर लेटते ही बिस्तर पर, मर जाता है एक रात के लिए, *क्योंकि* सुबह फिर जिंदा होना है, काम पर जाना है, कमा कर लाना है, ताकि घर चल सके,....ताकि घर चल सके.....ताकि घर चल सके।।।। *दिलसे सभी पिताओं को समर्पित,,,,,,,,,,,,,,,

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Preeti Jain Nov 3, 2021

मित्रों,आज का नरक चौदस का यह त्योहार नर्क चतुर्दशी या नर्का पूजा के नाम से भी जाना जाता है, दीपावली को एक दिन का पर्व कहना उचित नहीं होगा, इस पर्व का जो महत्व और महात्मय है उस दृष्टि से भी नर्क चतुर्दशी व दीपावली काफी महत्वपूर्ण हिन्दुओं का त्यौहार है, यह पांच पर्वों की श्रृंखला के मध्य में रहने वाला त्यौहार है,जैसे मंत्री समुदाय के बीच राजा। दीपावली से दो दिन पहले धनतेरस फिर नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली फिर दीपावली और गोधन पूजा एवम् भाईदूज, इसे छोटी दीपावली इसलिये कहा जाता है, क्योंकि दीपावली से एक दिन पहले रात के वक्त उसी प्रकार दीये की रोशनी से रात के तिमिर को प्रकाश पुंज से दूर भगा दिया जाता है, जैसे दीपावली की रात। आज की रात दीप जलाने की प्रथा के संदर्भ में कई पौराणिक कथायें और लोकमान्यतायें हैं, शास्त्रों के अनुसार प्रागज्योतिषपुर नगर का राजा नरकासुर नामक दैत्य था, उसने अपनी शक्ति से इंद्र, वरुण, अग्नि, वायु आदि सभी देवताओं को परेशान कर दिया, वह संतों को भी त्रास देने लगा, महिलाओं पर अत्याचार करने लगा, उसने राज कन्याओं की सोलह हजार कन्याओं को भी बंदी बना लिया। जब उसका अत्याचार बहुत बढ़ गया तो देवता व ऋषिमुनि भगवान् श्रीकृष्ण की शरण में गये, भगवान् श्रीकृष्ण ने उन्हें नराकासुर से मुक्ति दिलाने का आश्वसान दिया, लेकिन नरकासुर को स्त्री के हाथों मरने का श्राप था, इसलिये भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को सारथी बनाया, तथा उन्हीं की सहायता से नरकासुर का वध कर दिया। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को यानी आज ही के दिन नरकासुर का वध कर देवताओं व संतों को उसके आतंक से मुक्ति दिलायी, और सोलह हजार एक सौ कन्याओं को नरकासुर के बंदी गृह से मुक्त कर उन्हें सम्मान प्रदान किया था, इस उपलक्ष में दीयों की बारत सजायी जाती है, तभी से नरक चतुर्दशी का त्योहार मनाया जाने लगा। आज के दिन के व्रत और पूजा के संदर्भ में एक अन्य कथा यह है कि रन्तिदेव नामक एक पुण्यात्मा और धर्मात्मा राजा थे, उन्होंने अनजाने में भी कोई पाप नहीं किया था, लेकिन जब मृत्यु का समय आया तो उनके समक्ष यमदूत आ खड़े हुये, यमदूत को सामने देख राजा अचंभित हुए और बोले मैंने तो कभी कोई पाप कर्म नहीं किया फिर आप लोग मुझे लेने क्यों आए हो। क्योंकि आपके यहां आने का मतलब है कि मुझे नर्क जाना होगा, आप मुझ पर कृपा करें और बतायें कि मेरे किस अपराध के कारण मुझे नरक जाना पड़ रहा है? पुण्यात्मा राजा की अनुनय भरी वाणी सुनकर यमदूत ने कहा, हे राजन् एक बार आपके द्वार से एक ब्राह्मण भूखा लौट गया यह उसी पापकर्म का फल है। दूतों की इस प्रकार कहने पर राजा ने यमदूतों से कहा कि मैं आपसे विनती करता हूं कि मुझे एक वर्ष का समय और दे, यमदूतों ने राजा को एक वर्ष की मोहलत दे दी, राजा अपनी परेशानी लेकर ऋषियों के पास पहुंचा, और उन्हें सब वृतान्त कहकर उनसे पूछा कि कृपया इस पाप से मुक्ति का क्या उपाय है। ऋषि बोले हे राजन् आप कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करें, और ब्रह्मणों को भोजन करवा कर उनसे उनके प्रति हुये अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करें, राजा ने वैसा ही किया जैसा ऋषियों ने उन्हें बताया, इस प्रकार राजा पाप मुक्त हुये और उन्हें विष्णु लोक में स्थान प्राप्त हुआ। उस दिन से पाप और नर्क से मुक्ति हेतु भूलोक में कार्तिक चतुर्दशी के दिन का व्रत प्रचलित है, आज के विष्णु मंदिर और कृष्ण मंदिर में भगवान् का दर्शन करना अत्यंत पुण्यदायक कहा गया है, इससे पाप कटता है और रूप सौन्दर्य की प्राप्ति भी होती है, भाई-बहनों!आज नरक चतुर्दशी और कल दीपावली की बहुत बहुत हार्दिक बधाई, माँ लक्ष्मीजी एवं भगवान् श्री कृष्णजी आप सभी को आरोग्य और सौभाग्य प्रदान करें, आप सभी के मंगलमय जीवन की ढेरों शुभ कामनायें। जय श्री माँ लक्ष्मीजी! हरि ओऊम् तत्सत्

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Preeti Jain Oct 13, 2021

नवरात्रि के पावन अवसर पर पढ़ें,माता वैष्णो देवी की अमर कथा!!!!!!!! वैष्णो देवी उत्तरी भारत के सबसे पूजनीय और पवित्र स्थलों में से एक है। यह मंदिर पहाड़ पर स्थित होने के कारण अपनी भव्यता व सुंदरता के कारण भी प्रसिद्ध है। वैष्णो देवी भी ऐसे ही स्थानों में एक है जिसे माता का निवास स्थान माना जाता है। मंदिर, 5,200 फीट की ऊंचाई और कटरा से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हर साल लाखों तीर्थ यात्री मंदिर के दर्शन करते हैं।यह भारत में तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर के बाद दूसरा सर्वाधिक देखा जाने वाला धार्मिक तीर्थस्थल है। वैसे तो माता वैष्णो देवी के सम्बन्ध में कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं लेकिन मुख्य 2 कथाएँ अधिक प्रचलित हैं। माता वैष्णो देवी की प्रथम कथा!!!!! मान्यतानुसार एक बार पहाड़ों वाली माता ने अपने एक परम भक्तपंडित श्रीधर की भक्ति से प्रसन्न होकर उसकी लाज बचाई और पूरे सृष्टि को अपने अस्तित्व का प्रमाण दिया। वर्तमान कटरा कस्बे से 2 कि.मी. की दूरी पर स्थित हंसाली गांव में मां वैष्णवी के परम भक्त श्रीधर रहते थे। वह नि:संतान होने से दु:खी रहते थे। एक दिन उन्होंने नवरात्रि पूजन के लिए कुँवारी कन्याओं को बुलवाया। माँ वैष्णो कन्या वेश में उन्हीं के बीच आ बैठीं। पूजन के बाद सभी कन्याएं तो चली गई पर माँ वैष्णो देवी वहीं रहीं और श्रीधर से बोलीं- ‘सबको अपने घर भंडारे का निमंत्रण दे आओ।’ श्रीधर ने उस दिव्य कन्या की बात मान ली और आस – पास के गाँवों में भंडारे का संदेश पहुँचा दिया। वहाँ से लौटकर आते समय गुरु गोरखनाथ व उनके शिष्य बाबा भैरवनाथ जी के साथ उनके दूसरे शिष्यों को भी भोजन का निमंत्रण दिया। भोजन का निमंत्रण पाकर सभी गांववासी अचंभित थे कि वह कौन सी कन्या है जो इतने सारे लोगों को भोजन करवाना चाहती है? इसके बाद श्रीधर के घर में अनेक गांववासी आकर भोजन के लिए एकत्रित हुए। तब कन्या रुपी माँ वैष्णो देवी ने एक विचित्र पात्र से सभी को भोजन परोसना शुरू किया। भोजन परोसते हुए जब वह कन्या भैरवनाथ के पास गई। तब उसने कहा कि मैं तो खीर – पूड़ी की जगह मांस भक्षण और मदिरापान करुंगा। तब कन्या रुपी माँ ने उसे समझाया कि यह ब्राह्मण के यहां का भोजन है, इसमें मांसाहार नहीं किया जाता। किंतु भैरवनाथ ने जान – बुझकर अपनी बात पर अड़ा रहा। जब भैरवनाथ ने उस कन्या को पकडऩा चाहा, तब माँ ने उसके कपट को जान लिया। माँ ने वायु रूप में बदलकरत्रिकूट पर्वत की ओर उड़ चली। भैरवनाथ भी उनके पीछे गया। माना जाता है कि माँ की रक्षा के लिए पवनपुत्र हनुमान भी थे। मान्यता के अनुसार उस वक़्त भी हनुमानजी माता की रक्षा के लिए उनके साथ ही थे। हनुमानजी को प्यास लगने पर माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर एक जलधारा निकाला और उस जल में अपने केश धोए। आज यह पवित्र जलधारा बाणगंगा के नाम से जानी जाती है, जिसके पवित्र जल का पान करने या इससे स्नान करने से श्रद्धालुओं की सारी थकावट और तकलीफें दूर हो जाती हैं। इस दौरान माता ने एक गुफा में प्रवेश कर नौ माह तक तपस्या की। भैरवनाथ भी उनके पीछे वहां तक आ गया। तब एक साधु ने भैरवनाथ से कहा कि तू जिसे एक कन्या समझ रहा है, वह आदिशक्ति जगदम्बा है। इसलिए उस महाशक्ति का पीछा छोड़ दे। भैरवनाथ साधु की बात नहीं मानी। तब माता गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं। यह गुफा आज भी अर्धकुमारी या आदिकुमारी या गर्भजून के नाम से प्रसिद्ध है। अर्धक्वाँरी के पहले माता की चरण पादुका भी है। यह वह स्थान है, जहाँ माता ने भागते – भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था। गुफा से बाहर निकल कर कन्या ने देवी का रूप धारण किया। माता ने भैरवनाथ को चेताया और वापस जाने को कहा। फिर भी वह नहीं माना। माता गुफा के भीतर चली गई। तब माता की रक्षा के लिए हनुमानजी ने गुफा के बाहर भैरव से युद्ध किया। भैरव ने फिर भी हार नहीं मानी जब वीर हनुमान निढाल होने लगे, तब माता वैष्णवी ने महाकाली का रूप लेकर भैरवनाथ का संहार कर दिया। भैरवनाथ का सिर कटकर भवन से 8 किमी दूर त्रिकूट पर्वत की भैरव घाटी में गिरा। उस स्थान को भैरोनाथ के मंदिर के नाम से जाना जाता है। जिस स्थान पर माँ वैष्णो देवी ने हठी भैरवनाथ का वध किया, वह स्थान पवित्र गुफा’ अथवा ‘भवन के नाम से प्रसिद्ध है। इसी स्थान पर माँ काली (दाएँ), माँ सरस्वती (मध्य) और माँ लक्ष्मी (बाएँ) पिंडी के रूप में गुफा में विराजित हैं। इन तीनों के सम्मिलत रूप को ही माँ वैष्णो देवी का रूप कहा जाता है। इन तीन भव्य पिण्डियों के साथ कुछ श्रद्धालु भक्तों एव जम्मू कश्मीर के भूतपूर्व नरेशों द्वारा स्थापित मूर्तियाँ एवं यन्त्र इत्यादी है। कहा जाता है कि अपने वध के बाद भैरवनाथ को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ और उसने माँ से क्षमादान की भीख माँगी। माता वैष्णो देवी जानती थीं कि उन पर हमला करने के पीछे भैरव की प्रमुख मंशा मोक्ष प्राप्त करने की थी, उन्होंने न केवल भैरव को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति प्रदान की, बल्कि उसे वरदान देते हुए कहा कि मेरे दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाएँगे, जब तक कोई भक्त मेरे बाद तुम्हारे दर्शन नहीं करेगा। उसी मान्यता के अनुसार आज भी भक्त माता वैष्णो देवी के दर्शन करने के बाद 8 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़कर भैरवनाथ के दर्शन करने को जाते हैं। इस बीच वैष्णो देवी ने तीन पिंड (सिर) सहित एक चट्टान का आकार ग्रहण किया और सदा के लिए ध्यानमग्न हो गईं। इस बीच पंडित श्रीधर अधीर हो गए। वे त्रिकुटा पर्वत की ओर उसी रास्ते आगे बढ़े, जो उन्होंने सपने में देखा था, अंततः वे गुफ़ा के द्वार पर पहुंचे, उन्होंने कई विधियों से ‘पिंडों’ की पूजा को अपनी दिनचर्या बना ली, देवी उनकी पूजा से प्रसन्न हुईं, वे उनके सामने प्रकट हुईं और उन्हें आशीर्वाद दिया। तब से, श्रीधर और उनके वंशज देवी मां वैष्णो देवी की पूजा करते आ रहे हैं। माता वैष्णो देवी की अन्य कथा!!!!! हिन्दू पौराणिक मान्यताओं में जगत में धर्म की हानि होने और अधर्म की शक्तियों के बढऩे पर आदिशक्ति के सत, रज और तम तीन रूप महासरस्वती, महालक्ष्मी और महादुर्गा ने अपनी सामूहिक बल से धर्म की रक्षा के लिए एक कन्या प्रकट की। यह कन्या त्रेतायुग में भारत के दक्षिणी समुद्री तट रामेश्वर में पण्डित रत्नाकर की पुत्री के रूप में अवतरित हुई। कई सालों से संतानहीन रत्नाकर ने बच्ची को त्रिकुटा नाम दिया, परन्तु भगवान विष्णु के अंश रूप में प्रकट होने के कारण वैष्णवी नाम से विख्यात हुई। लगभग 9 वर्ष की होने पर उस कन्या को जब यह मालूम हुआ है भगवान विष्णु ने भी इस भू-लोक में भगवान श्रीराम के रूप में अवतार लिया है। तब वह भगवान श्रीराम को पति मानकर उनको पाने के लिए कठोर तप करने लगी। जब श्रीराम सीता हरण के बाद सीता की खोज करते हुए रामेश्वर पहुंचे। तब समुद्र तट पर ध्यानमग्र कन्या को देखा। उस कन्या ने भगवान श्रीराम से उसे पत्नी के रूप में स्वीकार करने को कहा। भगवान श्रीराम ने उस कन्या से कहा कि उन्होंने इस जन्म में सीता से विवाह कर एक पत्नीव्रत का प्रण लिया है। किंतु कलियुग में मैं कल्कि अवतार लूंगा और तुम्हें अपनी पत्नी रूप में स्वीकार करुंगा। उस समय तक तुम हिमालय स्थित त्रिकूट पर्वत की श्रेणी में जाकर तप करो और भक्तों के कष्ट और दु:खों का नाश कर जगत कल्याण करती रहो। जब श्री राम ने रावण के विरुद्ध विजय प्राप्त किया तब मां ने नवरात्रमनाने का निर्णय लिया। इसलिए उक्त संदर्भ में लोग, नवरात्र के 9 दिनों की अवधि में रामायण का पाठ करते हैं। श्री राम ने वचन दिया था कि समस्त संसार द्वारा मां वैष्णो देवी की स्तुति गाई जाएगी, त्रिकुटा, वैष्णो देवी के रूप में प्रसिद्ध होंगी और सदा के लिए अमर हो जाएंगी।

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Preeti Jain Oct 12, 2021

🌹प्याज, लहसुन खाना " शास्त्रों " में क्यों मना किया गया है? विशेषकर नवरात्रि में🌹 🙏🌹Om Shanti🌹🙏 सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कथा यह है कि समुद्रमंथन से निकले अमृत को, " मोहिनी " रूप धरे "विष्णु "भगवान जब देवताओं में बाँट रहे थे ; तभी एक राक्षस ( दैत्य, दानव ) " राहू " भी वहीं आकर बैठ गया, भगवान ने उसे भी देवता समझकर अमृत दे दिया l लेकिन तभी उन्हें सूर्य व चन्द्रमा ने बताया कि ये राक्षस है l भगवान विष्णु ने तुरंत उसके सिर को धड़ से अलग कर दिए l लेकिन " राहू " के मुख में अमृत पहुँच चुका था इसीलिए उसका मुख अमर हो गया l पर भगवान द्वारा राहू का सिर काटे जाने पर उसके कटे सिर से अमृत की कुछ बूँदें जमीन पर गिर गईं जिनसे प्याज और लहसुन उपजे l चूँकि यह दोनों सब्जियां अमृत की बूँदों से उपजी हैं इसीलिए ये रोगों और रोगाणुओं को नष्ट करने में अमृत समान होती हैं पर क्योंकि ये राक्षस के मुख से होकर गिरी हैं इसीलिए इनमें तेज गंध है और ये अपवित्र जिन्हें कभी भगवान के भोग में इस्तेमाल नहीं किया जाता l कहा जाता है कि जो भी प्याज और लहसुन खाते हैं उनका शरीर राक्षसों के शरीर की भाँति मजबूत हो जाता है लेकिन साथ ही उनकी बुद्धि और सोच - विचार राक्षसों की तरह दूषित भी हो जाते हैं l इन दोनों सब्ज़ियों को मांस के समान माना जाता है जो लहसुन और प्याज खाता है उसका मन के साथ - साथ पूरा शरीर तामसिक स्वभाव का हो जाता है l ध्यान, भजन में मन नहीं लगता l कुल मिलाकर वैष्णव आचार, विचारों का पतन हो जाता है l इसीलिए सार्वजनिक भंडारों और खासकर नवरात्रि में प्याज और लहसुन खाना शास्त्रों में मना किया गया है l 🌹जय जय माँ🌹❤️🙏

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