🌹 *श्री राधे राधे जी* 👏 . जय श्री खाटू वाले श्याम की🙏🌹🙏🌹 *पुत्रदा (पौष शुक्ल) एकादशी"* पुत्रदा एकादशी व्रत हिंदूधर्म में मनाए जाने वालें महत्वपूर्ण व्रतों में से एक है। इस व्रत को पूरे भारत देश में बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। पुत्रदा एकादशी व्रत हिंदूपंचांग के अनुसार पौषमाह में मनाया जाता है। पश्चिमी पंचांग के अनुसार यह माह हर वर्ष जनवरी में पड़ता है। कहा जाता है कि इस व्रत में भगवान विष्णु की उपासना की जाती है और उनकी आस्था में ही व्रत भी रखा जाता है। यह व्रत पुत्र प्राप्ति के उद्देश्य से किया जाता है। व्रत कथा महाराज युधिष्ठिर ने पूछा–"हे भगवन् ! कृपा करके यह बतलाइए कि पौष शुक्ल एकादशी का क्या नाम है उसकी विधि क्या है और उसमें कौन-से देवता का पूजन किया जाता है।" भगवान श्रीकृष्ण बोले–"हे राजन ! इस एकादशी का नाम पुत्रदा एकादशी है। इसमें भी नारायण भगवान की पूजा की जाती है। इस चर और अचर संसार में पुत्रदा एकादशी के व्रत के समान दूसरा कोई व्रत नहीं है। इसके पुण्य से मनुष्य तपस्वी, विद्वान और लक्ष्मीवान होता है। इसकी मैं एक कथा कहता हूँ सो तुम ध्यानपूर्वक सुनो।" भद्रावती नामक नगरी में सुकेतुमान नाम का एक राजा राज्य करता था। उसके कोई पुत्र नहीं था। उसकी स्त्री का नाम शैव्या था। वह निपुत्री होने के कारण सदैव चिंतित रहा करती थी। राजा के पितर भी रो-रोकर पिंड लिया करते थे और सोचा करते थे कि इसके बाद हमको कौन पिंड देगा। राजा को भाई, बांधव, धन, हाथी, घोड़े, राज्य और मंत्री इन सबमें से किसी से भी संतोष नहीं होता था। वह सदैव यही विचार करता था कि मेरे मरने के बाद मुझको कौन पिंडदान करेगा। बिना पुत्र के पितरों और देवताओं का ऋण मैं कैसे चुका सकूँगा जिस घर में पुत्र न हो उस घर में सदैव अंधेरा ही रहता है। इसलिए पुत्र उत्पत्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए। जिस मनुष्य ने पुत्र का मुख देखा है, वह धन्य है। उसको इस लोक में यश और परलोक में शांति मिलती है अर्थात उनके दोनों लोक सुधर जाते हैं। पूर्व जन्म के कर्म से ही इस जन्म में पुत्र, धन आदि प्राप्त होते हैं। राजा इसी प्रकार रात-दिन चिंता में लगा रहता था। एक समय तो राजा ने अपने शरीर को त्याग देने का निश्चय किया परंतु आत्मघात को महान पाप समझकर उसने ऐसा नहीं किया। एक दिन राजा ऐसा ही विचार करता हुआ अपने घोड़े पर चढ़कर वन को चल दिया तथा पक्षियों और वृक्षों को देखने लगा। उसने देखा कि वन में मृग, व्याघ्र, सूअर, सिंह, बंदर, सर्प आदि सब भ्रमण कर रहे हैं। हाथी अपने बच्चों और हथिनियों के बीच घूम रहा है। इस वन में कहीं तो गीदड़ अपने कर्कश स्वर में बोल रहे हैं, कहीं उल्लू ध्वनि कर रहे हैं। वन के दृश्यों को देखकर राजा सोच-विचार में लग गया। इसी प्रकार आधा दिन बीत गया। वह सोचने लगा कि मैंने कई यज्ञ किए, ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन से तृप्त किया फिर क्यों मुझे दुख प्राप्त हुआ ? राजा प्यास के मारे अत्यंत दुखी हो गया और पानी की तलाश में इधर-उधर फिरने लगा। थोड़ी दूरी पर राजा ने एक सरोवर देखा। उस सरोवर में कमल खिले थे तथा सारस, हंस, मगरमच्छ आदि विहार कर रहे थे। उस सरोवर के चारों तरफ मुनियों के आश्रम बने हुए थे। उसी समय राजा के दाहिने अंग फड़कने लगे। राजा शुभ शकुन समझकर घोड़े से उतरकर मुनियों को दंडवत प्रणाम करके बैठ गया। राजा को देखकर मुनियों ने कहा- हे राजन! हम तुमसे अत्यंत प्रसन्न हैं। तुम्हारी क्या इच्छा है, सो कहो। राजा ने पूछा- महाराज आप कौन हैं, और किसलिए यहां आए हैं। कृपा करके बताइए। मुनि कहने लगे कि हे राजन! आज संतान देने वाली पुत्रदा एकादशी है, हम लोग विश्वदेव हैं और इस सरोवर में स्नान करने के लिए आए हैं। यह सुनकर राजा कहने लगा कि महाराज मेरे भी कोई संतान नहीं है, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो एक पुत्र का वरदान दीजिए। मुनि बोले- हे राजन! आज पुत्रदा एकादशी है। आप अवश्य ही इसका व्रत करें, भगवान की कृपा से अवश्य ही आपके घर में पुत्र होगा। मुनि के वचनों को सुनकर राजा ने उसी दिन एकादशी का व्रत किया और द्वादशी को उसका पारण किया। इसके पश्चात मुनियों को प्रणाम करके महल में वापस आ गया। कुछ समय बीतने के बाद रानी ने गर्भ धारण किया और नौ महीने के पश्चात उनके एक पुत्र हुआ। वह राजकुमार अत्यंत शूरवीर, यशस्वी और प्रजापालक हुआ। श्रीकृष्ण बोले- "हे राजन ! पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रदा एकादशी का व्रत करना चाहिए। जो मनुष्य इस माहात्म्य को पढ़ता या सुनता है उसे अंत में स्वर्ग की प्राप्ति होती है।" पुत्रदा एकादशी व्रत विधि पुत्र प्राप्ति की इच्छा से जो व्रत रखना चाहते हैं, उन्हें दशमी को एक बार भोजन करना चाहिए। एकादशी के दिन स्नानादि के पश्चात गंगा जल, तुलसी दल, तिल, फूल पंचामृत से भगवान नारायण की पूजा करनी चाहिए। इस व्रत में व्रत रखने वाले बिना जल के रहना चाहिए। अगर व्रती चाहें तो संध्या काल में दीपदान के पश्चात फलाहार कर सकते हैं। द्वादशी तिथि को यजमान को भोजन करवाकर उचित दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद लें तत्पश्चात भोजन करें। ध्यान देने वाली बात यह है कि पुत्र प्राप्ति की इच्छा से जो यह एकादशी का व्रत रख रहे हैं उन्हें अपने जीवनसाथी के साथ इस व्रत का अनुष्ठान करना चाहिए इससे अधिक पुण्य प्राप्त होता है। एकादशी व्रत के नियम व्रत-उपवास करने का महत्व सभी धर्मों में बहुत होता है। साथ ही सभी धर्मों के नियम भी अलग-अलग होते हैं। खास कर हिंदू धर्म के अनुसार एकादशी व्रत करने की इच्छा रखने वाले मनुष्य को दशमी के दिन से ही कुछ अनिवार्य नियमों का पालन करना चाहिए। 01. दशमी के दिन मांस, लहसुन, प्याज, मसूर की दाल आदि निषेध वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए। 02. रात्रि को पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए तथा भोग-विलास से दूर रहना चाहिए। 03. एकादशी के दिन प्रात: लकड़ी का दातुन न करें, नींबू, जामुन या आम के पत्ते लेकर चबा लें और अंगुली से कंठ साफ कर लें, वृक्ष से पत्ता तोड़ना भी ‍वर्जित है। अत: स्वयं गिरा हुआ पत्ता लेकर सेवन करें। 04. यदि यह संभव न हो तो पानी से बारह बार कुल्ले कर लें। फिर स्नानादि कर मंदिर में जाकर गीता पाठ करें या पुरोहितजी से गीता पाठ का श्रवण करें। 05. फिर प्रभु के सामने इस प्रकार प्रण करना चाहिए कि 'आज मैं चोर, पाखंडी़ और दुराचारी मनुष्यों से बात नहीं करूंगा और न ही किसी का दिल दुखाऊंगा। रात्रि को जागरण कर कीर्तन करूंगा।' 06. तत्पश्चात 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' इस द्वादश मंत्र का जाप करें। राम, कृष्ण, नारायण आदि विष्णु के सहस्रनाम को कंठ का भूषण बनाएं। 07. भगवान विष्णु का स्मरण कर प्रार्थना करें और कहे कि- हे त्रिलोकीनाथ! मेरी लाज आपके हाथ है, अत: मुझे इस प्रण को पूरा करने की शक्ति प्रदान करना। 08. यदि भूलवश किसी निंदक से बात कर भी ली तो भगवान सूर्यनारायण के दर्शन कर धूप-दीप से श्री‍हरि की पूजा कर क्षमा मांग लेना चाहिए। 09. एकादशी के दिन घर में झाड़ू नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि चींटी आदि सूक्ष्म जीवों की मृत्यु का भय रहता है। इस दिन बाल नहीं कटवाना चाहिए। न नही अधिक बोलना चाहिए। अधिक बोलने से मुख से न बोलने वाले शब्द भी निकल जाते हैं। 10.इस दिन यथा शक्ति दान करना चाहिए। किंतु स्वयं किसी का दिया हुआ अन्न आदि कदापि ग्रहण न करें। दशमी के साथ मिली हुई एकादशी वृद्ध मानी जाती है। 11. वैष्णवों को योग्य द्वादशी मिली हुई एकादशी का व्रत करना चाहिए। त्रयोदशी आने से पूर्व व्रत का पारण करें। 12. एकादशी (ग्यारस) के दिन व्रतधारी व्यक्ति को गाजर, शलजम, गोभी, पालक, इत्यादि का सेवन नहीं करना चाहिए। 13. केला, आम, अंगूर, बादाम, पिस्ता इत्यादि अमृत फलों का सेवन करें। 14. प्रत्येक वस्तु प्रभु को भोग लगाकर तथा तुलसीदल छोड़कर ग्रहण करना चाहिए। 15. द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को मिष्ठान्न, दक्षिणा देना चाहिए। 16. क्रोध नहीं करते हुए मधुर वचन बोलना चाहिए। इस व्रत को करने वाला दिव्य फल प्राप्त करता है और उसके जीवन के सारे कष्ट समाप्त हो जाते हैं। "जय जय श्री हरि" **********************

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🌹🙏ओम नमो भगवते वासुदेवाय नमः 🙏🌹 ❣️💐❣️💐❣️💐❣️💐❣️💐❣️💐❣️ शुभ प्रभात वंदन आपका दिन शुभ और मंगलमय हो आप और आपके पूरे परिवार को पुत्रदा एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🌹🙏🌹 एक कथा जिसके अनुसार सरोवर से निकली मोहनी के बालों से राजा बलि का जन्म हुआ था तथा गले से राजा सुग्रीव का आइए जानते हैं यह पूरी कथा। पौराणिक कथाओं के अनुसार सुमेरु पर्वत पर ब्रह्मा जी का कोट था जो 100 योजन विस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ था एक बार की बात है वहां तपस्या करते हुए अचानक से ब्रह्मा जी की आंख से आंसू की दो बूंदे गिर गई तो ब्रह्मा जी ने उन्हें हादसे पहुंच दिया। तब एक बार धरती पर गिर गई जिससे एक वानर का जन्म हुआ। तब उन्होंने कहा तुम इस पहाड़ी की चोटी पर रहोगे। इस पर वानर वहीं रहकर नियमित रूप से ब्रह्मा जी को पुष्प अर्पित करने लगा। कई दिन बीत जाने के बाद एक दिन रीछ राज वहां से गुजरे उन्हें बहुत तेज प्यास लगी तो उन्होंने तलाब में झुक कर पानी पीने का प्रयास किया। इस दौरान वहां उन्हें परछाई दिखाई दी जिस पर उन्हें लगा कि कोई दुश्मन उन्हें मारने के लिए आ रहा है तो वह तालाब में कूद गए परंतु जब तालाब से बाहर निकले तो वह एक सुंदर खूबसूरत युवती में बदल चुके थे। इसी दौरान इंद्र और सूर्यदेव वहां से गुजर रहे थे जिनकी नजर इस सुंदर इतनी पर पड़ी तो वे दोनों मोहित हो गए। इस दौरान इंद्र देव की मणि सुंदरी के पास जा गिरी जिससे एक वानर का जन्म हुआ। क्योंकि वानर का जन्म युवती के बालों से हुआ था इसलिए इसका नाम बाली पड़ा। जबकि इसी युवती के गले पर सूर्य की मणि जा गिरी जिससे एक और वानर का जन्म हुआ जो आगे चलकर सुग्रीव के नाम से जाना गया। हालांकि यह दोनों एक जैसे ही दिखते थे। यही वजह थी कि वध के समय श्री राम को सुग्रीव को पहचानने में मुश्किल हुई थी और उन्हों उसके गले में माला डालनी पड़ी थी। कथाओं के अनुसार इंद्र ने बाली को एक सोने का हार दिया जबकि सूर्यदेव ने सुग्रीव को हनुमान जी के रूप में एक सच्चा मित्र और रक्षक भेंट किया। कहा जाता इन दोनों वानरों की उतपत्ति के बाद युवती दोबारा रीछराज में बदल गई। इसलिए कहा जाता है रीछराज ही बाली और सुग्रीव की मां और पिता है।

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🙏🌹🌼जय श्री गणेश जी की 🌼🌹🙏 💞💐💞💐💞💐💞💐💞💐💞💐💞 शुभ रात्रि विश्राम 🙏🌹🙏🌹 वस्त्रावतार,प्रभु का एकादश अवतार, अद्भुत,रहस्यात्मक। बिनु काज,आज बृजराज,लाज गइ मोरी। दुख हरो द्वारिका नाथ शरण मैं तोरी।। धृतराष्ट्र के द्यूत क्रीड़ा के आदेश को धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा धर्म मान लेने के कारण ही महाभारत के महान संघर्ष की सृष्टि हुयी। द्यूत खेलते हुए ,एक जुवारी की ही भाँति,जब युधिष्ठिर दाँव पर दाँव हारते गये,तब भी उन्हें अपनी मर्यादा,अपनी सीमा का विवेक नहीं रहा।जड़ संपत्ति को हारना,इतना महत्त्वपूर्ण नहीं था,जितनी वह पराजय, जिससे पाँचों पांडवों(सद्गुणों के प्रतीक)को दासत्व स्वीकार करना पड़ा।क्या बिडंबना है कि सद्गुण,दुर्गुणों के सेवक बन गये। बात यहीं समाप्त नहीं हुई।अबिवेक की चरम सीमा तब सामने आती है,जब शकुनि के छेड़ने पर,आवेश में उन्होंने द्रोपदी को भी दाँव पर लगा दिया। द्रोपदी को युधिष्ठिर ने पत्नी के रूप में, उसे अपनी संपत्ति मान लिया था। किन्तु द्रोपदी का परिचय मात्र यही तो नहीं था।उनका वर्णन भगवान की माया के रूप में किया गया है।प्रभु के विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही वे पांडवों की अनुगामिनी के रूप में दिखाई देती हैं।उन्हें अपनी निज-संपत्ति मान लेना,यह युधिष्ठिर का अविवेक ही था।वे उसे भी दाँव पर हार गये। दुर्योधन तो पहले से ही बदले की आग में जल रहा था,उसे आज अपने पुराने अपमान का प्रत्यपकार का अवसर सुलभ हो गया।दुश्शासन, जिसका परिचय गोस्वामीजी ने “कुरुराज बंधु खल मार”के रूप में दिया है,दुर्योधन के आदेश पर भरी सभा में द्रोपदी को अपमानित करने की चेष्टा की। काम की बृत्ति तो नग्नता से जुड़ी हुई ही है।दुश्शासन द्रोपदी को भरी सभा में समादरणीय गुरुजनों के समक्ष नग्न करने की चेष्टा करता हुआ, अपने स्वरूप का ही परिचय दे रहा था।सत्य तो यह है कि वह काम-मर्यादा का भी अतिक्रमण कर रहा था।काम में भी मर्यादा के तहत ब्यक्ति नग्नता को एकान्तिक वस्तु के रूप में देखता है। किन्तु इस समय वह समस्त मर्यादाओं को तिलांजलि देता हुआ,अपनी पूज्या को भी नग्न करने को उद्यत था।विलाप करती हुई द्रोपदी की रक्षा करने के लिए उस समय कोई भी ब्यक्ति सामने नहीं आया।ऐसा लगता है कि वहाँ उपस्थित प्रत्येक ब्यक्ति”धर्म संमूढ़ चेता”हो गया था। भय और प्रलोभन की बृत्तियाँ उन्हें मौन रहने के लिए बाध्य कर रहीं थीं। तब द्रोपदी को अपने सर्व समर्थ सखाश्रीकृष्ण की याद आई।उसकी वेदनासिक्त वाणी से यह करुण पुकार(शीर्षक-उल्लिखित) निकली-- “गोविन्द द्वारिकावासिन् कृष्ण गोपिजनप्रिय। कौरवैः परिभूतां मां किं न जानसि केशव। हे नाथ हे रमानाथ ब्रजनाथार्तिनाशन। कौरवार्णवमग्नां मामुद्धरस्व जनार्दन।।”(महाभारत-समापर्व-अ.68-41,42) यद्यपि द्रोपदी ने उन्हें “द्वारिकावासी”कहा किन्तु द्वारिका के साथ उसे यदुवंशियों की याद नहीं आई,अपितु याद आई तो गोप गोपियों की।”कृष्ण गोपिजनप्रिय” की उपाधि का विशेष तात्पर्य था--यदुवंशी शरीर के नाते से भी श्रीकृष्ण से संबंधित थे।किन्तु गोप गोपियों का संबंध शुद्ध भावनात्मक था। द्रोपदी शारीरिक रूप से भले ही पांडवों की पत्नी थी,किन्तु भावनात्मक रूप से उसका नाता श्रीकृष्ण से ही था।इसलिए द्रोपदी ने उस नाते से जुड़े हुए श्रीकृष्ण का स्मरण किया।गोपियाँ भी तो ब्यावहारिक जगत में अन्य गोप गणों की पत्नियाँ हीं थीं,पर भावनात्मक रूप से वे श्रीकृष्ण को ही अपना स्वामी मानती थीं।श्रीकृष्ण ने भी उस संबंध को स्वीकृति दी थी। द्रोपदी का संकेत मानो यह था कि”भले ही लोकदृष्टि से”इन पाँचों पांडु-पुत्रों की मैं पत्नी हूँ,किन्तु आज मुझे संकट में देखकर भी वे मौन बैठे हैं।मुझे ज्ञात है कि इस सचराचर जगत में समस्त प्राणियों के वास्तविक पति तो एकमात्र आप ही हैं ,इसलिए हे नाथ!आप मुझे इस दुख-समुद्र से उबार लीजिए,मेरी रक्षा कीजिए,मेरी रक्षा कीजिए। कृष्णा की इस आर्त प्रार्थना ने श्रीकृष्ण को द्रवीभूत कर दिया और उस राजसभा में प्रभु का अवतार हो गया।पर प्रभु का यह अवतार विलक्षण था। दोहावली रामायण में गोस्वामीजी बड़े भावुक स्वर में कहते हैं कि हे प्रभु!आप के दसअवतार तो पहले से ही थे,किन्तु यहाँ श्रीकृष्ण का ग्यारहवाँ अवतार हो गया।सभा में श्रीकृष्ण ,प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं आए,परन्तु वस्त्रों की निस्सीमता ने ही उनके प्राकट्य का अनुबोध करा दिया।सभी सभासद आश्चर्य चकित हो गये। भक्तों ने हाथ जोड़कर प्रभु की कृपालुता की हृदय से सराहना की।मानो श्रीकृष्ण का यह वस्त्रावतार ही था जो द्रोपदी की नग्नता पर कवच बनकर उसकी रक्षा कर रहा था-- “सभा सभासद निरखि पट पकरि उठायो हाथ। तुलसी कियो इगारहों बसन बेस जदुनाथ।। त्राहि तीनि कह्यो द्रौपदी तुलसी राज समाज। प्रथम बढ़े पट बिय विकल चहत चकित निज काज।।”(दोहावली-168,169) श्रीकृष्ण ही वस्त्र बन गये और द्रोपदी की लज्जा सुरक्षित रही।वस्तुतः शरीर की नग्नता को समग् अर्थों में वस्त्र ही जानता है। वस्त्र के समक्ष तो सारा शरीर नग्न ही होता है,किन्तु वही वस्त्र दूसरों के समक्ष आवरण बनकर लज्जा को बचा लेता है। निराबृत जीव की वास्तविकता से तो एकमात्र वस्त्रावतार प्रभु ही पूरी तरह परिचित हैं।यदि वस्त्र के समक्ष नग्न होने से संकोच करे, तब तो वह ब्यक्ति कभी सुरक्षित रह ही नहीं सकता।इसलिए जीव को अपनी नग्नता प्रभु के समक्ष खोलकर रख देनी चाहिए। यही सत्य, वस्त्र-हरण और वस्त्रावतार के इन दोनों प्रसंगों में सामने आता है।जब वे गोपियों को वस्त्र उतार कर सामने आने के आदेश देते हैं और द्रौपदी को सभा में नग्न होने से बचा लेते हैं,तब वे मानो वस्त्र के इसी महान सत्य को प्रकट कर रहे थे। कुबेर-पुत्रों ने नग्नता का दुरुपयोग किया।इससे नारदजी को क्रोध आया।किन्तु यह संत की परम करुणा थी कि उन्होंने उनकी इस बृत्ति को मोड़ दिया तथा जिन प्रभु को नग्नता प्रिय है उनसे जोड़ दिया।संत ने मानो यह बता दिया कि नग्नता का दूषण भी भक्ति में भूषण बन सकता है। शप्त होकर ए दोनों भाई यमलार्जुन के बृक्ष के रूप में ब्रज में सैकडों वर्षों से विद्यमान थे।आज प्रेम-बंधन में बंधे हुए श्रीकृष्ण ने उन्हें बंधन मुक्त करने का संकल्प लिया।वे ऊखल सहित चल पड़े और उन दोनों बृक्षों के अंतराल में प्रविष्ट हो गये।आज मानो उनकी जड़ता भी वरदान बन गयी। चेतन को तो उन्हें पाने के लिए चलकर प्रभु के निकट जाना पड़ता है, पर वहाँ तो श्यामसुन्दर स्वयं चलकर ही उनके पास आ गये,उनके अन्तर्हृदय में प्रविष्ट हो गये और तब वे जड़ बृक्ष गिर पड़े। उनमें से चेतन धनद-पुत्र निकल कर प्रभु की स्तुति करने लगे।वे जड़ बृक्ष के रूप में मुक्ति प्राप्ति हेतु वे साधन भी क्या कर सकते थे?उन्हें तो स्वरूप की जो उपलब्धि हुयी,वह प्रभु के दर्शन और कृपा का ही परिणाम था। श्रीरामचरितमानस में भी प्रभु श्रीरामभद्र ने स्वयं अपने दर्शन का यही फल बताया है- “मम दरसन फल परम अनूपा।जीव पाव निज सहज सरूपा।।(अरण्य कांड-35/5) प्रसंग समाप्ति।

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🙏🌹🙏 जय श्री महाकाल की 🙏🌹🙏 💕💐💕💐💕💐💕💐💕💐💕💐💕 केदारनाथ का भूमि-चयन २०१३ में केदारनाथ के प्रलयंकारी बाढ़ में पूरा नगर बह गया था तथा ५,००० से अधिक व्यक्तियों की मृत्यु हुई थी। किन्तु केदारनाथ का मन्दिर बचा रहा। उसके पीछे की भीम-शिला ने उसे बचा लिया। यह अद्भुत तथा उपयुक्त भूमि चयन जनमेजय शासन के २९वें वर्ष में हुआ था। उनके पिता राजा परीक्षित की हत्या तक्षशिला के नागवंशी राजा ने की थी जिसे तक्षक नाग कहा गया है। परीक्षित का शासन २५-८-३१०२ ईपू से आरम्भ हुआ जब सूर्य सिद्धान्त मत से जय संवत्सर आरम्भ हुआ, तथा पाण्डव अभ्युदय के लिए स्वर्गारोहिणी चोटी गये (यमुनोत्री के पश्चिम ओसला के निकट-पर्वतीय नार्वे शीतस्थान के लिए नोर्गे या नर्क है, वहां भी ओस्लो है)। अतः इसे जयाभ्युदय शक कहते हैं। इस शक में जनमेजय के वंशज ओड़िशा राजाओं के प्रायः ३०० दान-पत्र प्रकाशित हैं। वराहमिहिर ने कुतूहल मञ्जरी में भी अपनी जन्म तिथि इसी शक में दी है-युधिष्ठिर के जयाभ्युदय शक ३०४२ चैत्र शुक्ल अष्टमी, अर्थात् ६-३-९५ ईपू। परीक्षित की हत्या समय जनमेजय बालक थे। वयस्क होने पर तैयारी की तथा २८ वर्ष बाद नाग राज्य पर आक्रमण किया। जिस स्थान पर पहली बार पराजित किया वहां गुरु गोविन्द सिंह जी ने राम मन्दिर बनवाया था जिस पर लिखा था कि जनमेजय ने २ नगरों को श्मशान बना दिया था। इनके नाम ही श्मशान पर हो गये-(१) मोइन-जो-दरो = मृतकों का स्थान, (२) हड़प्पा = हड्डियों का ढेर। इसके बाद ऋषियों ने नर संहार बन्द कर प्रायश्चित करने के लिए कहा। २७-११-३०१४ ईपू, अर्थात् जयाभ्युदय शक ८९, पौष अमावास्या को जब सूर्य ग्रहण था तब इन्द्रप्रस्थ राजधानी से जनमेजय ने केदारनाथ में गोस्वामी आनन्द लिंग जंगम के शिष्य ज्ञानलिंग जंगम के उषा-मठ के लिए भूमिदान किया था। उसी दिन किष्किन्धा राजधानी से शृङ्गेरी निकट तुङ्गा नदी तट पर राम मन्दिर के लिए भी भूमिदान किया था। इस तिथि को ग्रहण की पुष्टि २००७ में अमेरिका के डलास में आयोजित सम्मेलन में हुयी थी जो २००८ में प्रकाशित इस पुस्तक में है- Astronomical Dating of Events & Select Vignettes from Indian History, Volume I, Edited and compiled by Kosla Vepa, Published by- Indic Studies Foundation, 948 Happy Valley Rd., Pleasanton, Ca 94566, USA इन २ दान पत्रों सहित जनमेजय के ५ दान पत्र मैसूर ऐण्टीकुअरी के जून १९०१ अंक में रिचर्ड टेम्पल द्वारा प्रकाशित हुए थे। इनमें तिथि-वार-नक्षत्र-योग-करण, मास तथा वर्ष बीच में दिए थे, अतः अंग्रेज इनकी तिथि नष्ट नहीं कर सके। अतः केवल ग्रहण गणना के आधार पर कोलब्रुक ने इनका समय ब्रिटेन के राजकीय ज्योतिषी जी बी ऐरी से ७-४-१५२१ निर्धारित कराया। ग्रहण चक्र १८ वर्ष १०.५ दिन का होता है (राहु-सूर्य की संयुक्त गति)। इसके अर्ध चक्र ३३३९ तिथि में भी ग्रहण उसी क्रम में पुनः होते हैं, अतः दीर्घकालीन गणना इससे सम्भव नहीं है। पर अंग्रेज इस प्रकार की जालसाजी करते रहते हैं। ग्रहण चक्र का उल्लेख ऋग्वेद (३/९/९) में है- त्रीणि शता त्री सहस्राण्यग्निं त्रिंशत् च देवाः नव चासपर्यन्। केदारनाथ दान-पत्र निम्नलिखित है। इसी शैली का अनुकरण ओड़िशा के सभी पाण्डुवंशी राजाओं ने किया था। स्वस्तिश्री जयाभ्युदये युधिष्ठिरशके प्लवङ्गाख्ये एकोननवतितम (८९) वत्सरे सहसि मासि अमावास्यायां सोम वासरे श्रीमन्महाराजाधिराज परमेश्वर वैयाघ्रपाद गोत्रज श्री जनमेजय भूपो इन्द्रप्रस्थ नगरी सिंहासनस्थः सकल वर्णाश्रम धर्म प्रतिपालको उत्तर हिमालये श्री केदारक्षेत्रं तत्रत्य मुनयः उषामठस्य श्रीगोस्वामि आनन्दलिंग जंगमाय श्रीमच्छिष्य ज्ञानलिंग जंगम द्वाराराधित श्रीकेदारनाथस्य पूजार्थं दत्तवन्तः चतुःसीमा परिमिति क्रमः॥ पूर्वभागे दक्षिण वाहिनी मन्दाकिनी । पश्चिम दक्षिण भागे क्षीर गङ्गा उत्तर पश्चिमे मधु गङ्गा, पूर्वोत्तर भागे स्वर्ग-द्वार नदी, दक्षिणे सरस्वती, मन्दाकिन्योः संगमः, एतन्मध्ये श्रीकेदारक्षेत्रं भवच्छिष्य परम्परया चन्द्रार्क पर्यन्तं निधि निक्षेप जल पाषाणा-गामि सिद्ध साध्य तेजः स्वाम्य सहितं स्वबुद्ध्याऽनुकूल्येनाऽ स्मन्मातृपितृणां शिवलोक प्राप्त्यर्थं श्रीकेदार सन्निधौ उपराग समये सहिरण्य मन्दाकिनी जलधारा पूर्वकं क्षेत्रमिदं हस्ते दत्तवानस्मि । एतद्धर्म साधनस्य साक्षिणः ॥ श्लो.- आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च । अहश्च रात्रिश्च उभे च सन्ध्ये धर्मश्च जानाति नरस्य वृत्तं॥२॥ दानपालनयोर्मध्ये दानाच्छ्रेयोऽनुपालनं। दानात्स्वर्गमवाप्नोति पालनाद्विगुणंफलं॥ स्वदत्ताद् द्विगुणं पुण्यं परदत्तानुपालने। परदत्तापहारेण स्वदत्तं निष्फलं भवेत्॥ मद्दत्ता पुत्रिका ज्ञेया पितृदत्ता सहोदरी। अन्यदत्ता तु जननी दत्तभूमिं परित्यजेत्॥ अन्यैस्तु छर्दितं छद्वे श्वभिश्च छर्दितं न तु। ततः कष्टो ततो नीचः स्वदत्तापहारकः॥ स्वदत्तां परदत्तां वा ब्रह्मवृत्तिं हरेत यः। षष्टिवर्षसहस्राणि विष्टायां जायते कृमिः॥ उपराग (अमावास्या को सूर्य ग्रहण), जल-पाषाण-अगामि (जल प्रवाह से पाषाण द्वारा सुरक्षित) उल्लेख है। यहां मन की प्रवृत्ति के १४ साक्षी कहे गये हैं-सूर्य, चन्द्र, वायु, अग्नि, आकाश, भूमि, जल, हृदय, यम, दिन, रात्रि, २ सन्ध्या, धर्म (आचार प्रभवः धर्मः)। शान्ति-पाठ में भी मन रूपी अग्नि की जिह्वा १४ (मनु = १४) कही गयी है। अग्नि-जिह्वा मनवः सूर-चक्षसो विश्वेनो देवा अवसा गमन्निह। (ऋग्वेद, १/९८/७, यजुर्वेद, २५/२०) काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्र-वर्णा। स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः॥ (मुण्डकोपनिषद्,१/२/४) वाल्मीकि रामायण, उत्तर काण्ड (९७/८-८) में भी सीता जी की शपथ के समय १४ प्रकार के साक्षी उपस्थित थे। आजकल इनको संक्षिप्त कर २ से काम चलाते हैं-यावत् चन्द्र दिवाकरौ।

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