जय जय श्री खाटू वाले श्याम की 🙏🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏 शुभ संध्या वंदन मनको शान्त नहीं किया जा सकता है लेकिन मनपर दृष्टि अवश्य ही रखी जा सकती है और यह भी जाना जा सकता है कि यह मन हमें कुमार्गका रास्ता दिखा रहा है अथवा सन्मार्ग का, जैसे कि राजा जनकजी अपने विवेकके आश्रय से ही मनपर दृष्टि रखते थे - भए सब सुखी देखि दोउ भ्राता। बारि बिलोचन पुलकित गाता।। मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी।। दोनों भाइयोंको देखकर सभी सुखी हुए। सबके नेत्रोंमें जल भर आया (आनन्द और प्रेमके आँसू उमड़ पड़े) और शरीर रोमाञ्चित हो उठे। रामजीकी मधुर मनोहर मूर्तिको देखकर विदेह (जनक) विशेषरूपसे विदेह (देहकी सुध-बुधसे रहित) हो गये।। दो० - प्रेम मगन मनु जानि नृपु करि बिबेक धरि धीर। बोलेउ मुनि पद नाइ सिरु गदगद गिरा गभीर।। मनको प्रेममें मग्न जान राजा जनकने विवेकका आश्रय लेकर धीरज धारण किया और मुनिके चरणोंमें सिर नवाकर गद्गद (प्रेमभरी) गम्भीर वाणीसे कहा - ।। कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक। मुनिकुल तिलक कि नृपकुल पालक।। ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा। उभय बेष धरि की सोइ आवा।। हे नाथ! कहिये, ये दोनों सुन्दर बालक मुनिकुलके आभूषण हैं या किसी राजवंशके पालक? अथवा जिसका वेदोंने 'नेति' कहकर गान किया है कहीं वह ब्रह्म तो युगलरूप धरकर नहीं आया है?।। सहज बिरागरूप मन मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा।। ताते प्रभु पूछउँ सतिभाऊ। कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ।। मेरा मन जो स्वभावसे ही वैराग्यरूप [बना हुआ] है, [इन्हें देखकर] इस तरह मुग्ध हो रहा है जैसे चन्द्रमाको देखकर चकोर। हे प्रभो! इसलिये मैं आपसे सत्य (निश्छल) भावसे पूछता हूँ। हे नाथ! बताइये, छिपाव न कीजिये।। इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा।। इनको देखते ही अत्यन्त प्रेमके वश होकर मेरे मनने जबर्दस्ती ब्रह्मसुखको त्याग दिया है। ठीक इसी प्रकारसे भगवान् श्रीरामजी भी अपने मनपर दृष्टि रखते थे और अपने मनकी स्थितिको लक्ष्मणजी से कहते भी हैं - जासु बिलोकि अलौकिक सोभा। सहज पुनीत मोर मनु छोभा।। सो सबु कारन जान बिधाता। फरकहिं सुभद अंग सुनु भ्राता।। जिसकी अलौकिक सुन्दरता देखकर स्वभावसे ही पवित्र मेरा मन क्षुब्ध हो गया है। वह सब कारण (अथवा उसका सब कारण) तो विधाता जानें। किन्तु हे भाई! सुनो, मेरे मङ्गलदायक (दाहिने) अंग फड़क रहे हैं।। रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ। मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ।। मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी। जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी।। रघुवंशियोंका यह सहज (जन्मगत) स्वभाव है कि उनका मन कभी कुमार्गपर पैर नहीं रखता है। मुझे तो अपने मनका अत्यन्त ही विश्वास है कि जिसने [जाग्रत्की कौन कहे] स्वप्नमें भी परायी स्त्रीपर दृष्टि नहीं डाली है।।

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🌹🙏 जय बाबा श्याम की🙏🌹 🔱🌾🔱🌾🔱🌾🔱🌾🔱 शुभ प्रभात वंदन धर्मानुबन्धनम् ~~~ भगवान् का प्रत्येक अवतार सामान्य-धर्म का उद्धार करने के लिए होता है , किन्तु इन्ही अवतारों में भी कहीं-कहीं सामान्य-धर्म के विरुद्ध विशेष-धर्म का भी आश्रय लेते हैं , जो सामान्य-धर्म के विपरीत दिखाई देता है । वह विशेष-धर्म सामान्य धर्मशास्त्र की दृष्टि से पाप होने पर भी धर्मानुबन्धित होने से उसे धर्म ही कहना चाहिये , क्योंकि उस धर्म के पथ का अनुसरण करने से जीव का कल्याण होता है । जैसे भगवान् राम ने गौ-ब्राह्मण-देवता-सन्त की रक्षा के लिए अवतार लिया , यह संस्कृत तथा भाषा की अनेक रामायणों से सिद्ध होता है । किन्तु उसी ब्राह्मण धर्म के विपरीत कर्म करने वाले सोमयाजी वेद के महाविद्वान् महाब्राह्मण रावण की परिवार सहित हत्या करके अनेकों ऋषियों के धर्म की रक्षा की । जैसे भगवान् श्रीकृष्ण ने युद्ध में शस्त्र न धारण करने की प्रतिज्ञा करके भी अपने भक्त अर्जुन की रक्षा के लिए तथा भीष्म के प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर भी सुदर्शन चक्र धारण कर लिया । सामान्य-धर्म किसी पतिव्रता स्त्री के धर्म को नष्ट करने को महापाप मानता है , किन्तु जब उसी महासती के पतिव्रत-धर्म के प्रभाव से भगवान् शंकर के हाथों से भी उसका पति नहीं मारा जा सका , और वह इसीके प्रभाव से प्रतिदिन हजारों स्त्रियों का शीलभंग करता था । तब शिवजी की प्रार्थना से महाविष्णु ने करोड़ों सतियों के सतीत्व की रक्षा के लिए सामान्य-धर्म के विरुद्ध माया से उसके पति जलन्धर का रूप धारण करके तुलसी का शीलभंग किया व करोड़ों सतियों के सतीत्व की रक्षा की । अतः भगवान् के द्वारा अधर्म के समान भासमान होने पर भी धर्मानुबन्धित होने से यह विशेष-धर्म है , क्योंकि यह धर्म मात्र की रक्षा के उद्देश्य से किया । धर्मानुबन्धित = धर्म से सम्बन्धित सर्वसाधारण की दृष्टि में अधर्म होने पर भी जो धर्म हो । "अर्थमर्थानुबन्धं च कामं कमानुबन्धनम् । धर्म धर्मानुबन्धं च व्यवस्यति स बुद्धिमान् ।।" धन वही है जो धन से सम्बन्धित हो , काम वही है जो काम से सम्बन्धित हो , धर्म वही है जो धर्म से सम्बन्धित हो --- जो ऐसा मानता है वही बुद्धिमान है ।

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🙏 हारे का सहारा बाबा श्याम हमारा 🙏 🚩💐🚩💐🚩💐🚩💐🚩💐🚩 शुभ प्रभात वंदन आज की महती आवश्यकता........ मनुष्य की काया संरचना और मस्तिष्कीय बुद्धि विचारणा का इतना बड़ा अनुदान हर किसी को मिला है कि वह अपना और संबद्ध परिजन का काम भली प्रकार चला सके। इस क्षमता से रहित कोई भी नहीं है। इतने पर भी व्यामोह का कुछ ऐसा कुचक्र चलता रहता है कि उपलब्धियों की न तो उपस्थिति का अनुभव होता है और न उससे किस प्रकार का क्या काम लिया जाना चाहिए?, इसका निर्धारण बन पड़ता है। ऐसी दशा में असमर्थता अनुभव करने वालों को समर्थों का मार्गदर्शन एवं सहयोग प्राप्त करना होता है। उसके अभाव में विद्यमान क्षमताएं प्रसुप्त अवस्था में पड़ी रहती हैं और उनके द्वारा जिस प्रयोजन की पूर्ति की जा सकती थी, वह नहीं हो पाती। कपड़े कोई भी धो सकता है पर अनभ्यास या आलस्य की स्थिति में धोबी का आश्रय लेना पड़ता है। पेट भरने योग्य भोजन बना लेने की आदत दो चार दिन में डाली जा सकती है पर देखा यह गया है कि आवश्यक वस्तुएँ घर में होते हुए भी रसोई बनाने का सरंजाम नहीं जुट पाता और भूखे रहने या बाजार से खाने की कठिनाई सामने आ खड़ी होती है। अनेक अपने हाथ से हजामत बनाते हैं पर कितनों ही का काम नाई का सहयोग लिए बिना चलता ही नहीं। अभ्यास से संगीत-संभाषण जैसे कौशल सहज ही सीखे जा सकते हैं, पर अपने से इस संदर्भ में कुछ करते धरते न बन पड़ने पर किसी दूसरे को बकौल प्रतिनिधि या माध्यम के खड़ा करना पड़ता है। इसे आलस्य, अनभ्यास भी कहा जा सकता है और अनुकूल सुविधा हस्तगत न होने का कुयोग भी। इस हेय स्थिति में से निकलने का सभी को प्रयत्न करना पड़ता है और किया जाना चाहिए। इस अवलम्बन का नाम है- मार्गदर्शन। उसे प्राप्त करने में किसी को अपनी छुटाई या अवमानना अनुभव नहीं करनी चाहिए। वरन् इस तलाश में रहना चाहिए कि जो अब तक उपलब्ध नहीं है, वह आगे उपलब्ध हो। तालाबों में निज का पानी कहाँ होता है? वे बादलों से ही उधार लेकर अपना भण्डार भरते हैं। जलवायु जैसे प्रकृति अनुदानों को हम कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार करते हैं, न इसमें अपनी हेठी मानते हैं और न अभावग्रस्तता। छोटे बच्चे अभिभावकों का सहयोग लेकर ही अपनी भ्रूण स्थिति को पार करते स्तनपान का लाभ लेते, आच्छादनों और सेवाओं का लाभ उठाते हैं। इतना बन पड़ने पर ही वे घुटनों के बल चलने या खड़ा होने की स्थिति में आते हैं। भाषा बोध भी उन्हें परिवार के सदस्यों का अनुकरण करते-करते ही हस्तगत होता है। जिन बालकों का पालन पशु समुदाय के बीच हुआ है, उन अपवादों में मनुष्य बालक भी पशु स्तर का आचरण करते और शब्द बोलते देखे गये हैं। यह है समर्थ मनुष्य की असमर्थता। मौलिक रूप से वह सृष्टा की दी हुई अनेकानेक विशेषताओं से सम्पन्न है, किन्तु इसे प्रकृति का व्यंग्य ही कहना चाहिए कि वह अपनी महत्वपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपने पैरों खड़ा नहीं हो पाता। उसे दूसरों के सहयोग, मार्गदर्शन या आश्रय की आवश्यकता पड़ती है, चाहे वह कितना ही न्यून क्यों न हो।

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