🙏🌹जय श्री गणेश जी महाराज की🌹🙏 ❣️🌾❣️🌾❣️🌾❣️🌾❣️🌾❣️🌾❣️ शुभ प्रभात वंदन आपका दिन शुभ और मंगलमय हो 🌼💕🌼💕🌼💕🌼💕🌼💕 गणेश जी का विवाह किस से और कैसे हुआ और उनके विवाह में क्या रुकावटें आई !!!!! भगवान शिव और देवी पार्वती के पुत्र गणेश जी की पूजा सभी भगवानों से पहले की जाती है| प्रत्येक शुभ कार्य करने से पहले इन्हे ही पूजा जाता है| गणेश जी को गणपति के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह गणों के देवता है और इनका वाहन एक मूषक होता है| ज्योतिषी विद्या में गणेश जी को केतु के देवता कहा गया है| गणेश जी के शरीर की रचना माता पार्वती द्वारा की गई थी| उस समय उनका मुख सामान्य था, बिल्कुल वैसा जैसा किसी मनुष्य का होता है| एक समय की बात है माता पार्वती ने गणेश को आदेश दिया कि उन्हें घर की पहरेदारी करनी होगी क्योंकि माता पार्वती स्नानघर जा रही थी| गणेश जी को आदेश मिला की जब तक पार्वती माता स्नान कर रही है घर के अंदर कोई न आए| तभी दरवाज़े पर भगवान शंकर आए और गणेश ने उन्हें अपने ही घर में प्रवेश करने से मना कर दिया, जिसके कारण शिव जी ने गणेश का सर धड़ से अलग कर दिया| गणेश को ऐसे देख माता पार्वती दुखी हो गई| तब शिव ने पार्वती के दुख को दूर करने के लिए गणेश को जीवित कर उनके धड़ पर हाथी का सिर लगा दिया और उन्हें प्रथम पूज्य का वरदान दिया| क्या आप जानते है गणेश जी का विवाह किस कारण नहीं हो पा रहा था: गणेश जी के दो दन्त भी थे जो उनके हाथी वाले सिर की सुंदरता बढ़ाते थे| किन्तु परशुराम के साथ युद्ध करने के कारण गणेशजी का एक दांत टूट गया था| तब से वे एकदंत कहलाए जाते है| दो कारणों की वजह से गणेश जी का विवाह नहीं हो पा रहा था| उनसे कोई भी सुशील कन्या विवाह के लिए तैयार नहीं होती थी| पहला कारण उनका सिर हाथी वाला था और दूसरा कारण उनका एक दन्त| इसी कारणवश गणेशजी नाराज रहते थे| अब जानिए गणेश जी का विवाह किस से और कैसे हुआ????? जब भी गणेश किसी अन्य देवता के विवाह में जाते थे तो उनके मन को बहुत ठेस पहुँचती थी| उन्हें ऐसा लगा कि अगर उनका विवाह नहीं हो पा रहा तो वे किसी और का विवाह कैसे होने दें सकते है| तो उन्होंने अन्य देवताओं के विवाह में बाधाएं डालना शुरू कर दिया| इस काम में गणेश जी की सहायता उनका वाहन मूषक करता था| वह मूषक गणेश जी के आदेश का पालन कर विवाह के मंडप को नष्ट कर देता था जिससे विवाह के कार्य में रूकावट आती थी| गणेश और चूहे की मिली भगत से सारे देवता परेशान हो गए और शिवजी को जाकर अपनी गाथा सुनाने लगे| परन्तु इस समस्या का हल शिवजी के पास भी नहीं था| तो शिव-पार्वती ने उन्हें बोला कि इस समस्या का निवारण ब्रह्मा जी कर सकते है| यह सुनकर सब देवतागण ब्रह्मा जी के पास गए, तब ब्रह्माजी योग में लीन थे| कुछ देर बाद देवताओं के समाधान के लिए योग से दो कन्याएं ऋद्धि और सिद्धि प्रकट हुई| दोनों ब्रह्माजी की मानस पुत्री थीं|दोनों पुत्रियों को लेकर ब्रह्माजी गणेशजी के पास पहुंचे और बोले की आपको इन्हे शिक्षा देनी है| गणेशजी शिक्षा देने के लिए तैयार हो गए| जब भी चूहे द्वारा गणेश जी के पास किसी के विवाह की सूचना अति थी तो ऋद्धि और सिद्धि उनका ध्यान भटकाने के लिए कोई न कोई प्रसंग छेड़ देतीं थी| ऐसा करने से हर विवाह बिना किसी बाधा के पूर्ण हो जाता था| परन्तु एक दिन गणेश जी को सारी बात समझ में आई जब चूहे ने उन्हें देवताओं के विवाह बिना किसी रूकावट के सम्पूर्ण होने के बारे में बताया| इससे पहले कि गणेश जी क्रोधित होते, ब्रह्मा जी उनके सामने ऋद्धि सिद्धि को लेकर प्रकट हुए और बोलने लगे कि मुझे इनके लिए कोई योग्य वर नहीं मिल रहा है| कृपया आप इनसे विवाह कर लें| इस प्रकार गणेश जी का विवाह बड़ी धूमधाम से ऋद्धि और सिद्धि के साथ हुआ और इसके बाद इन्हे दो पुत्रों की प्राप्ति हुई जिनका नाम था शुभ और लाभ।

+23 प्रतिक्रिया 8 कॉमेंट्स • 6 शेयर

💐🌹🙏 जय श्री राधे कृष्ण 🙏🌹💐 🌱💞💞💞🌱💞💞💞🌱💞💞💞🌱 आपकी रात्रि शुभ और मंगलमय हो 🌻❤️🌻❤️🌻❤️🌻❤️🌻❤️🌻❤️🌻 जय श्री राधे कृष्ण 🙏🌹🙏🌹 बहुत सुंदर कथा घर कब आओगी,बेटी? 🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸 अभी तो गरमियों की छुट्टियाँ लगने में दो-ढाई महीने हैं, अभी से कैसे बताऊँ कब आऊँगी? गरमियों में स्नेहा की एक्सटरा क्लासेस भी तो हैं। और फिर उसकी म्यूज़िक क्लासेस भी तो हैं। अपने पापा का घर आने का आग्रह सुन अवंतिका ने एक ही साँस में उन्हें इतना कुछ बता दिया। पापा भी बेटी की बात सुन और कुछ ना बोले। बस इतना ही कहा,"हम्म, समझ सकता हूँ" और फ़ोन माँ को पकड़ा दिया। माँ ने भी कहा,"पता नहीं क्या हो गया है। कल से तुझे बहुत याद कर रहें हैं। कल सुबह से ही शुरू हैं की कब गरमियों की छुट्टियाँ लगेंगी कब अवंतू घर आयेगी?" बोलते बोलते माँ का तो गला ही भर आया। तीन साल बीत चुके थे अवंतिका को अपने घर गये हुये। हर साल कुछ ना कुछ एेसा निकल ही आता था की वह दस दिन के लिये भी अपने घर ना जा सकी थी। हाँ, माँ और पापा ज़रूर मिल आये थे उसके ससुराल जा कर उससे पर वह ना आ पायी थी अपने घर। माँ ने थोड़ा ज़ोर दे कर कहा,"हो सके तो इस बार घर आजा। पापा को बहुत अच्छा लगेगा"। इस पर अवंतिका ने माँ से कहा,"माँ, तुम तो समझती हो ना। आख़िर तुम भी तो कभी ना कभी इस दुविधा में पड़ी होगी"। माँ ने भी लम्बी साँस छोड़ते हुये हामी भर दी। अवंतिका ने कहा," अच्छा चलो अब कल बात करतें हैं। स्नेहा के टेनिस क्लास का समय हो गया है। पूरा दिन भागमभाग में निकल गया और रात को थककर जब वह सोने के लिये अपने कमरे में आई तो सोचा था लेटते ही सो जायेगी पर आज नींद को तो जैसे बैर हो गया था उससे। बिस्तर पर लेटे लेटे वह मम्मी पापा से हुयी बातों के बारे में सोचती रही। पूरे दिन की व्यस्तता में समय ही कहाँ था की वह इस बारे में कुछ सोचती भी। वह सोचने लगी कैसे हर बार मम्मी पापा उसके आने की राह देखतें हैं और उसके किसी भी कारणवश ना जा पाने की वजह समझ कर चुप रह जातें हैं। काश! वह भी कहते, नहीं हम कुछ नहीं समझते। हमें कुछ नहीं सुनना तुमको घर आना ही होगा। काश! अपनी बेटी पर थोड़ा हक़ वह भी जता पाते। क्यूँ हर बार वह सब समझ जातें हैं। क्यूँ वह कभी भी ज़िद्द नहीं करते। इन्हीं सब बातों के बीच कब उसकी नींद लगी पता ही नहीं चला। सुबह छ: बजे नींद खुली। उसने अपने नियमित काम फुरती से निबटाये। स्नेहा को स्कूल भेजा और मयंक को ऑफ़िस। फिर रोज़ की तरह एक हाथ में नाश्ते की प्लेट और दूसरे हाथ में माँ पापा से बात करने के लिये फ़ोन लिया। वह अपने कमरे में आकर पलंग पर बैठी ही थी की मोबाइल पर अपने पापा के मैसेज पर उसकी नज़र पड़ी। मैसेज रात साढ़े बारह बजे का था। मैसेज खोला तो उसमें लिखा था,"तेरी हर ज़िम्मेदारी का एहसास है मुझे बेटी पर इस बार अपने बूढ़े पिता की जिद्द ही समझ ले इसे। इस बार तेरी एक ना सुनुँगा। इस बार तुझे घर आना ही होगा। अवंतिका की आँखें नम हो गयीं। वह फिर सोचने लगी की कैसे बिना कहे ही आज भी उसके पापा उसकी हर बात समझ जातें हैं।उसने अपने पापा को मैसेज किया,"पापा, काश! हर बार आप ऐसे ही जिद्द करते और मैं आपकी जिद्द के आगे हार मान कर अपने घर आ जाती। काश! हर बार आप इतना ही हक़ जताते और हर बार मैं लौटती अपने आँगन में जहाँ मेरा बचपन फिर से लौट आता है। उसकाफोन बज उठा। पापा का ही फ़ोन था। बिना एक पल गँवाये उसने फ़ोन उठाया। दोनों के गले भरे हुये थे। पापा ने बस प्यार से इतना ही कहा,"बेटी इस बार तुझे लेने मैं ख़ुद आँऊगा"। शायद आपकी और मेरी कहानी भी अवंतिका की कहानी से कुछ हद तक मेल खाती है। आइये इस बार अपने बचपन का कुछ हिस्सा मम्मी पापा को लौटा दें। आइये इस बार गरमियों की छुट्टियाँ अपने मायकें में ही बिता दें। 🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸

+13 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 9 शेयर

🌹🙏🌹जय श्री राम 🌹🙏🌹 🙏💐 जय हनुमान जी महाराज की💐🙏 शुभ प्रभात वंदन मित्रों, आज हनुमानजी महराज के विरता और शौर्य के दर्शन करेंगे, चार सौ कोस के सागर को पार करके लंका में प्रवेश करने का साहस हनुमानजी के अलावा किसी में नही था, रावण को फटकारने का सामर्थ्य किसी मे नही था, अक्षय कुमार को मारना सामान्य बात नही थी, अक्षय को एक वरदान था, अंगद ने कहा था कि मैं जा तो सकता हूँ पर मुझे लौटकर आने में संशय है, बोले क्यों? क्योंकि? अक्षय और अंगदजी एक साथ पढ़ा करते थे, अंगदजी अक्षय को बहुत तंग करते थे, एक ऋषि ने अक्षय को वरदान दिया था कि अंगद जब तुम्हारे सामने आयेगा तो इसकी सारी शक्ति तुम्हारे अन्दर आ जाएगी, अंगद अक्षय के सामने कभी जाते नही थे इसलिये अंगद लंका जाने में डर रहे थे कि यदि अक्षय से मेरी भेंट हो गयी तो मेरी शक्ति क्षीण हो जाएगी और मैं लौटकर नही आ पाऊंगा। इसलिये हनुमानजी ने पहले अक्षय का क्षय किया ताकि अंगदजी रावण को आकर फटकार सके, जिस समय लक्ष्मणजी मूर्छित हो गये थे तो भगवान् का विलाप सुनकर सभी वानर विकल हो गये कि स्वामी की यह दुर्दशा है तो हमारी क्या होगी? उस समय जामवंतजी ने कहा था कि हनुमानजी "कबन सो काज कठिन जग माहीं, जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं" हनुमानजी ने कहा- क्या करूँ? चन्द्रमा मेंसे अमृत निचोड़ लाऊँ या पाताललोक में जाकर नागों के बीच से अमृत का घड़ा उठा लाऊँ या मौत को ही मार डालूँ, भगवान् कुछ बोले नही, एक संत कहते है कि भगवान् ने यहाँ अगर सिर हिला देते कि हाँ ठीक है मौत को ही मार दो, तो मौत का यह झंझट ही खत्म हो जाता, जामवंतजी ने कहा कि लंका के भीतर जाओ और वहाँ से सुषैन वैध को ले आओ। सज्जनों, एक तो दुश्मन का नगर और रात्रि का पहर और हनुमानजी से कहा जा रहा है कि वहाँ से सुषैन वैध को ले आइए, यह दुर्गम नही बल्कि दुर्गमतम कार्य है, लेकिन हुआ क्या? "अति लघुरूप धरेऊ हनुमंता, आनेहु भवन समेत तुरन्ता" श्रीहनुमानजी गये दुश्मन के नगर में, युद्ध का समय चल रहा है, वैध आयेगा भी कि नही, उस वैध के घर के बाहर हनुमानजी पहुँच गये कितना सुन्दर नाम है सुषैन। दोस्तो, सतगुरु वैध और सतगुरु का आयन ही सुख का आयन होता है, जितना सद्गुरु से दूर रहोगे दुःख के साथ रहोगे, सुषैन को लेने के लिए सद्गुरु हनुमानजी स्वयं गये हैं और भवन समेत उठा लाये, हनुमानजी ने सोचा कि युद्ध चल रहा है दुश्मन का वैध है चतुराई कर सकता है, अगर मैं वैध को पकड़कर ले गया तो बहाना बना सकता है कि पहले क्यों नही बताया? मैं औषधि नही लाया वह तो वहीं छूट गयी। फिर लंका में जाना पड़ेगा, जासूस होंगे भीड़ना पड सकता है, मुश्किल हो सकती है इसलिये मकान सहित उठा लाये, संत केवल एक व्यक्ति को ही भगवान् से नही जोड़ता बल्कि पूरे परिवार को भगवान् से जोड़ दिया, अगर साधु के सम्पर्क में परिवार का एक भी व्यक्ति आ गया तो साधु पूरे परिवार को भगवान् से जोड़ देता है, यही संत का कार्य है। धौलागिरी पर्वत पर जाकर वहाँ से औषधि लाना, बीच में कालनेमि के रूप में मार्ग की बाधा खड़ी है, फिर उससे संघर्ष करना उसको मारकर जाना फिर संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण के प्राण बचाना यह कार्य ओर कोई नही कर सकता था, बाकी तो दुनिया में बहुत देवता हैं! दुनिया में देव हजारों हैं। बजरंगबली का क्या कहना।। जो कार्य कोई सोच न सके, जितने भी जगत् में दुर्गम काज हैं वे हनुमानजी की कृपा से, अनुग्रह से बहुत सुगमता से हो जाते है, भगवान् के जितने कार्य थे जिनके बारे मे कोई सोच भी नही सकता था लंका में पहुँचना, जानकीजी को प्रभु का सन्देश देना, लंका को जलाना, सुषैन वैध को भवन सहित वहाँ से ले आना, कालनेमि को मारकर धौलागिरी पर्वत पर पहुँचना, औषधि का पूरा पहाड उठा कर लाना यह कोई सामान्य घटना नही है, आज मंगलवार के मंगल् दिवस की मंगल् शुभ अपराह्न आप सभी को मंगलमय् हो जय श्री रामजी! जय श्री हनुमानजी!

+13 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 11 शेयर

🙏🌹जय श्री हनुमान जी महाराज की 🌹🙏 💐❤️💐❤️💐❤️💐❤️💐❤️💐❤️💐 शुभ प्रभात वंदन सप्त चिरंजीवी 〰️〰️🌼〰️〰️ हमारे धर्मग्रंथो में एक श्लोक है 'अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभीषणः । कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरंजीविनः ॥ सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्। जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।' इस श्लोक की प्रथम दो पंक्तियों का अर्थ है की अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और भगवान परशुराम ये सात महामानव चिरंजीवी हैं। तथा अगली दो पंक्तियों का अर्थ है की यदि इन सात महामानवों और आठवे ऋषि मार्कण्डेय का नित्य स्मरण किया जाए तो शरीर के सारे रोग समाप्त हो जाते है और 100 वर्ष की आयु प्राप्त होती है। आइये जानते है इन सात महामानवों के बारे में जिनके बारे में माना जाता है की वो पृथ्वी पर आज भी ज है। योग में जिन अष्ट सिद्धियों की बात कही गई है वे सारी शक्तियाँ इनमें विद्यमान है। यह सब किसी न किसी वचन, नियम या शाप से बंधे हुए हैं और यह सभी दिव्य शक्तियों से संपन्न है। 1👉 परशुराम 〰️〰️〰️〰️ भगवान विष्णु के छठें अवतार हैं परशुराम। परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका थीं। माता रेणुका ने पाँच पुत्रों को जन्म दिया, जिनके नाम क्रमशः वसुमान, वसुषेण, वसु, विश्वावसु तथा राम रखे गए। राम ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया था। शिवजी तपस्या से प्रसन्न हुए और राम को अपना फरसा (एक हथियार) दिया था। इसी वजह से राम परशुराम कहलाने लगे। इनका जन्म हिन्दी पंचांग के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हुआ था। इसलिए वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली तृतीया को अक्षय तृतीया कहा जाता है। भगवान परशुराम राम 0के पूर्व हुए थे, लेकिन वे चिरंजीवी होने के कारण राम के काल में भी थे। परशुराम ने 21 बार पृथ्वी से समस्त क्षत्रिय राजाओं का अंत किया था। 2👉 बलि 〰️〰️〰️〰️ राजा बलि के दान के चर्चे दूर-दूर तक थे। देवताओं पर चढ़ाई करने राजा बलि ने इंद्रलोक पर अधिकार कर लिया था। बलि सतयुग में भगवान वामन अवतार के समय हुए थे। राजा बलि के घमंड को चूर करने के लिए भगवान ने ब्राह्मण का भेष धारण कर राजा बलि से तीन पग धरती दान में माँगी थी। राजा बलि ने कहा कि जहाँ आपकी इच्छा हो तीन पैर रख दो। तब भगवान ने अपना विराट रूप धारण कर दो पगों में तीनों लोक नाप दिए और तीसरा पग बलि के सर पर रखकर उसे पाताल लोक भेज दिया। शास्त्रों के अनुसार राजा बलि भक्त प्रहलाद के वंशज हैं। राजा बलि से श्रीहरि अतिप्रसन्न थे। इसी वजह से श्री विष्णु राजा बलि के द्वारपाल भी बन गए थे। 3.👉 हनुमान 〰️〰️〰️〰️〰️ ( अंजनी पुत्र हनुमान को भी अजर अमर रहने का वरदान मिला हुआ है। यह राम के काल में राम भगवान के परम भक्त रहे हैं। हजारों वर्षों बाद वे महाभारत काल में भी नजर आते हैं। महाभारत में प्रसंग हैं कि भीम उनकी पूँछ को मार्ग से हटाने के लिए कहते हैं तो हनुमानजी कहते हैं कि तुम ही हटा लो, लेकिन भीम अपनी पूरी ताकत लगाकर भी उनकी पूँछ नहीं हटा पाता है। सीता ने हनुमान को लंका की अशोक वाटिका में राम का संदेश सुनने के बाद आशीर्वाद दिया था कि वे अजर-अमर रहेंगे। 4👉 विभिषण 〰️〰️〰️〰️〰️ राक्षस राज रावण के छोटे भाई हैं विभीषण। विभीषण श्रीराम के अनन्य भक्त हैं। जब रावण ने माता सीता हरण किया था, तब विभीषण ने रावण को श्रीराम से शत्रुता न करने के लिए बहुत समझाया था। इस बात पर रावण ने विभीषण को लंका से निकाल दिया था। विभीषण श्रीराम की सेवा में चले गए और रावण के अधर्म को मिटाने में धर्म का साथ दिया। 5👉 ऋषि व्यास 〰️〰️〰️〰️〰️ ऋषि व्यास जिन्हे की वेद व्यास के नाम से भी जाना जाता है ने ही चारों वेद (ऋग्वेद, अथर्ववेद, सामवेद और यजुर्वेद), सभी 18 पुराणों, महाभारत और श्रीमद्भागवत् गीता की रचना की थी । वेद व्यास, ऋषि पाराशर और सत्यवती के पुत्र थे। इनका जन्म यमुना नदी के एक द्वीप पर हुआ था और इनका रंग सांवला था। इसी कारण ये कृष्ण द्वैपायन कहलाए। इनकी माता ने बाद में शान्तनु से विवाह किया, जिनसे उनके दो पुत्र हुए, जिनमें बड़ा चित्रांगद युद्ध में मारा गया और छोटा विचित्रवीर्य संतानहीन मर गया। कृष्ण द्वैपायन ने धार्मिक तथा वैराग्य का जीवन पसंद किया, किन्तु माता के आग्रह पर इन्होंने विचित्रवीर्य की दोनों सन्तानहीन रानियों द्वारा नियोग के नियम से दो पुत्र उत्पन्न किए जो धृतराष्ट्र तथा पाण्डु कहलाए, इनमें तीसरे विदुर भी थे। 6👉 अश्वत्थामा 〰️〰️〰️〰️〰️ अश्वथामा गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र हैं। ग्रंथों में भगवान शंकर के अनेक अवतारों का वर्णन भी मिलता है। उनमें से एक अवतार ऐसा भी है, जो आज भी पृथ्वी पर अपनी मुक्ति के लिए भटक रहा है। ये अवतार हैं गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा का। द्वापरयुग में जब कौरव व पांडवों में युद्ध हुआ था, तब अश्वत्थामा ने कौरवों का साथ दिया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने ही ब्रह्मास्त्र चलाने के कारण अश्वत्थामा को चिरकाल तक पृथ्वी पर भटकते रहने का श्राप दिया था। अश्वथाम के संबंध में प्रचलित मान्यता... मध्य प्रदेश के बुरहानपुर शहर से 20 किलोमीटर दूर एक किला है। इसे असीरगढ़ का किला कहते हैं। इस किले में भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर है। यहां के स्थानीय निवासियों का कहना है कि अश्वत्थामा प्रतिदिन इस मंदिर में भगवान शिव की पूजा करने आते हैं। 7👉 कृपाचार्य 〰️〰️〰️〰️〰️ कृपाचार्य अश्वथामा के मामा और कौरवों के कुलगुरु थे। शिकार खेलते हुए शांतनु को दो शिशु प्राप्त हुए। । उन दोनों का नाम कृपी और कृप रखकर शांतनु ने उनका लालन-पालन किया। महाभारत युद्ध में कृपाचार्य कौरवों की ओर से सक्रिय थे। कृप और कृपि का जन्म महर्षि गौतम के पुत्र शरद्वान के वीर्य के सरकंडे पर गिरने के कारण हुआ था। ऋषि मार्कण्डेय 〰️〰️〰️〰️〰️ भगवान शिव के परम भक्त थे ऋषि मार्कण्डेय। इन्होंने शिवजी को तप कर प्रसन्न किया और महामृत्युंजय मंत्र को सिद्धि किया। महामृत्युंजय मंत्र का जाप मौत को दूर भगाने लिए किया जाता है। चुकि ऋषि मार्कण्डेय ने इस मन्त्र को सिद्ध किया था इसलिए इन सातो के साथ साथ ऋषि मार्कण्डेय के नित्य स्मरण के लिए भी कहा जाता है। सप्त चिरंजीवियों के लिये सनातन संस्कृति में किसी भी पूजा के वक्त एक श्लोक बोला जाता है- वह है अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमानश्च विभीषण:। कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥ सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्। जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।। इस श्लोक की पहली दो लाइनों का अर्थ यह है कि अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और परशुराम ये सात चिरंजीवी यानी अमर हैं। इसके बाद अगली लाइन का अर्थ यह है कि इन सात के साथ ही मार्कंडेय ऋषि के नाम का जाप करने से व्यक्ति स्वस्थ रहता है और उसे लंबी आयु मिलती है। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

+11 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 21 शेयर

🌹🙏जय श्री बजरंग बली की 🙏🌹 💕🌼💕🌼💕🌼💕🌼💕🌼💕 शुभ प्रभात वंदन आपका दिन शुभ और मंगलमय हो 🌱💞💞💞🌱💞💞💞🌱 रामचरितमानस के बालकाण्ड से ली गयी, नारद मोह की कथा!!!!!!! *हिमगिरि गुहा एक अति पावनि। बह समीप सुरसरी सुहावनि॥ आश्रम परम पुनीत सुहावा। देखि देवरिषि मन अति भावा॥ हिमालय पर्वत में एक बड़ी पवित्र गुफा थी। उसके समीप ही सुंदर गंगाजी बहती थीं। वह परम पवित्र सुंदर आश्रम देखने पर नारदजी के मन को बहुत ही सुहावना लगा। पर्वत, नदी और वन के (सुंदर) विभागों को देखकर नादरजी का लक्ष्मीकांत भगवान के चरणों में प्रेम हो गया। भगवान का स्मरण करते ही उन (नारद मुनि) के शाप की (जो शाप उन्हें दक्ष प्रजापति ने दिया था और जिसके कारण वे एक स्थान पर नहीं ठहर सकते थे) गति रुक गई और मन के स्वाभाविक ही निर्मल होने से उनकी समाधि लग गई। ऐसी समाधि लगी की इंद्र को चिंता हो गई। नारद जी का तप जब बढ़ा तो इंद्र घबरा गया। और इंद्र ने कामदेव को नारदजी की समाधि खोलने के लिए भेजा। कामदेव ने अपनी माया से वहाँ वसन्त ऋतु को उत्पन्न किया। तरह-तरह के वृक्षों पर रंग-बिरंगे फूल खिल गए, उन पर कोयलें कूकने लगीं और भौंरे गुंजार करने लगे। कामाग्नि को भड़काने वाली तीन प्रकार की (शीतल, मंद और सुगंध) सुहावनी हवा चलने लगी। रम्भा आदि नवयुवती देवांगनाएँ, जो सब की सब कामकला में निपुण थीं वे बहुत प्रकार की तानों की तरंग के साथ गाने लगीं और हाथ में गेंद लेकर नाना प्रकार के खेल खेलने लगीं। कामदेव अपने इन सहायकों को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और फिर उसने अनेक प्रकार के मायाजाल किए। कामदेव ने बहुत प्रयास किया लेकिन नारदजी की समाधि को नही खुलवा पाया। कामदेव ने हार मान ली और नारद जी के चरणो में गिर गए। कामदेव बोले की मैंने बड़े बड़े महात्माओं की समाधि को खुलवाया लेकिन आपकी समाधि इतनी पक्की थी की मैं तुड़वा नही सका। कामदेव जी कहते है-नारदजी आज आपने केवल काम को नही जीता है, काम के साथ-साथ क्रोध को भी जीत लिया है। क्योंकि मैंने भोले नाथ की समाधि खुलवाई थी, और उन्हें क्रोध भी आया था। मुझे जलाकर भस्म कर दिया था। लेकिन आपने तो मुझ पर क्रोध भी नही किया। आपने काम और क्रोध दोनों को जीत लिया है। कामदेव के ये वचन नारद जी के दिमाग में आ गए। नारदजी को लगा की मैं तो शंकर जी से भी श्रेष्ठ हो गया। और अभिमान आ गया। तुरंत देवताओं के समाज में गए हैं और खूब अपना गुणगान गाया हैं। कहते फिर रहे हैं की मैंने काम को जीत लिया, मैंने क्रोध को जीत लिया। इसके बाद तुरंत भोले नाथ के पास पहुंचे हैं। शिव के पास गए हैं- मार चरति संकरहि सुनाए। यहाँ पर गोस्वामी तुलसीदास जी ने कामदेव को एक नाम दिया हैं मार। पूज्य गुरुदेव कहते हैं की क्योंकि जिसके सिर पर कामदेव सवार हो जाता हैं उसे मार कर ही छोड़ता हैं। नारद जी ने खूब अपना गुणगान गया हैं और कहते हैं मैंने इस तरह से कामदेव को हराया हैं। काम और क्रोध दोनों को जीत लिया हैं। शिव जी को अच्छा नही लगा हैं। क्योंकि जो राम चरित्र सुनने वाले हैं उन्हें काम का चरित्र अच्छा नहीं लगेगा। भोले नाथ बोले एक बात कहूँ नारद- जो आप ये काम कथा सुना रहे हो ना। नारद जी बीच में ही बोल पड़े – हाँ महाराज, जरा बताओ मेरी कथा कैसी लगी? शिव जी बोले की कथा आपने ऐसी सुनाई हैं की मैं इस बारे में केवल इतना ही कहूँगा की यहाँ तो सुना रहे हो, पर भगवान विष्णु को मत सुनाना। अगर चर्चा भी चले तो भी इसे छिपाना। भगवान शिव ने बहुत समझाया हैं पर नारद जी को ये बात अच्छी नहीं लगी हैं। विचरण करते हुए जा रहे थे और हरी का गान करते हुए विष्णु लोक पहुंचे हैं। लेकिन अभिमान से भरे हुए हैं। भगवान उठकर बड़े आनंद से उनसे मिले और ऋषि (नारदजी) के साथ आसन पर बैठ गए। भगवान कहते हैं नारदजी क्या बात हैं कई दिनों बाद दर्शन दिए आपने? भगवान शिव ने नारद जी को मना किया था लेकिन इसके बावजूद नारदजी ने कामदेव का सारा चरित्र भगवान को कह सुनाया। भगवान बोले की आप तो ब्रह्मचर्यव्रत में तत्पर और बड़े धीर बुद्धि हैं। भला, कहीं आपको भी कामदेव सता सकता है? नारदजी ने अभिमान के साथ कहा- भगवन! यह सब आपकी कृपा है। करुणानिधान भगवान ने मन में विचारकर देखा कि इनके मन में गर्व के भारी वृक्ष का अंकुर पैदा हो गया है। मैं उसे तुरंत ही उखाड़ फेंकूँगा, क्योंकि सेवकों का हित करना हमारा प्रण है। मैं अवश्य ही वह उपाय करूँगा, जिससे नारद जी का कल्याण और मेरा खेल हो। तब नारदजी भगवान के चरणों में सिर नवाकर चले। उनके हृदय में अभिमान और भी बढ़ गया। अब लक्ष्मीपति ने अपनी माया रचनी शुरू कर दी। एक सुंदर नगर का निर्माण किया है। जो देखने में वैकुण्ठ से भी सुंदर है। उस नगर में ऐसे सुंदर नर-नारी बसते थे, मानो बहुत से कामदेव और (उसकी स्त्री) रति ही मनुष्य शरीर धारण किए हुए हों। उस नगर में शीलनिधि नाम का राजा रहता था, जिसके यहाँ असंख्य घोड़े, हाथी और सेना के समूह (टुकड़ियाँ) थे। इस राजा के एक कन्या है- जिका नाम है विश्वमोहिनी। ये ऐसी रूपवती है जिसे देखकर स्वयं लक्ष्मी भी मोहित हो जाये। यह राजकुमारी स्वयंवर करना चाहती है जिस कारण से अनेक राजकुमार यहाँ आये हुए है। नारद जी भी उसी नगर में पहुंच गए और राजा ने मुनि को आसन पर बिठाया। (फिर) राजा ने राजकुमारी को लाकर नारदजी को दिखलाया। और कहाँ की महाराज आप इसके लक्षणों को कहिये। उसके रूप को देखकर मुनि वैराग्य भूल गए और बड़ी देर तक उसकी ओर देखते ही रह गए। उसके लक्षण देखकर मुनि अपने आपको भी भूल गए। (लक्षणों को सोचकर वे मन में कहने लगे कि) जो इसे ब्याहेगा, वह अमर हो जाएगा और रणभूमि में कोई उसे जीत न सकेगा। यह शीलनिधि की कन्या जिसको वरेगी, सब चर-अचर जीव उसकी सेवा करेंगे। राजा से लड़की के सुलक्षण कहकर नारदजी चल दिए। अब नारद जी ये सोच रहे हैं की मैं कुछ ऐसा करूँ की ये कन्या मुझसे ही शादी करे। सोचते हैं की मैं श्री हरि के पास जाता हूँ। क्योंकि वो मुझे सुंदरता भी प्रदान कर देंगे और मेरा हित भी कर देंगे। नारद जी ने भगवन की बहुत प्रकार से विनती की हैं। और भगवान विष्णु वहीं प्रकट हो गए हैं। नारद जी ने सब बात विष्णु जी को बताई हैं। और कहते हैं हे नाथ! जिस तरह मेरा हित हो, आप वही शीघ्र कीजिए। मैं आपका दास हूँ। जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा। करहु सो बेगि दास मैं तोरा॥ इस पर भगवान विष्णु कहते हैं- हे नारदजी! सुनो, जिस प्रकार आपका परम हित होगा, हम वही करेंगे, दूसरा कुछ नहीं। हमारा वचन असत्य नहीं होता। और भगवान ये कहकर अंतर्ध्यान हो गए हैं। अब ऋषिराज नारदजी तुरंत वहाँ गए जहाँ स्वयंवर की भूमि बनाई गई थी। राजा लोग खूब सज-धजकर समाज सहित अपने-अपने आसन पर बैठे थे। मुनि (नारद) मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे कि मेरा रूप बड़ा सुंदर है, मुझे छोड़ कन्या भूलकर भी दूसरे को न वरेगी। वहां शिवजी के दो गण भी थे। वे सब भेद जानते थे और ब्राह्मण का वेष बनाकर सारी लीला देखते-फिरते थे। वे भी बड़े मौजी थे। नारदजी अपने हृदय में रूप का बड़ा अभिमान लेकर जिस समाज (पंक्ति) में जाकर बैठे थे, ये शिवजी के दोनों गण भी वहीं बैठ गए। ब्राह्मण के वेष में होने के कारण उनकी इस चाल को कोई न जान सका। अब श्री भगवान ने नारद जी का मोह दूर करने के लिए उन्हें बंदर का रूप दिया हैं। राजकन्या ने (नारदजी का) वह रूप देखा। उनका बंदर का सा मुँह और भयंकर शरीर देखते ही कन्या के हृदय में क्रोध उत्पन्न हो गया। जिस ओर नारदजी (रूप के गर्व में) फूले बैठे थे, उस ओर उसने भूलकर भी नहीं ताका। नारद मुनि बार-बार उचकते और छटपटाते हैं। उनकी दशा देखकर शिवजी के गण मुसकराते हैं। उसी स्वयंवर में भगवान विष्णु भी जा पहुंचे। राजकुमारी ने हर्षित होकर भगवान के गले में जयमाला डाल दी। लक्ष्मीनिवास भगवान दुलहिन को ले गए। सारी राजमंडली निराश हो गई। तब शिवजी के गणों ने मुसकराकर कहा- जाकर दर्पण में अपना मुँह तो देखिए! ऐसा कहकर वे दोनों बहुत भयभीत होकर भागे। मुनि ने जल में झाँककर अपना मुँह देखा। अपना रूप देखकर उनका क्रोध बहुत बढ़ गया। उन्होंने शिवजी के उन गणों को अत्यन्त कठोर शाप दिया। तुम दोनों कपटी और पापी जाकर राक्षस हो जाओ। तुमने हमारी हँसी की, उसका फल चखो। नि ने फिर जल में देखा, तो उन्हें अपना (असली) रूप प्राप्त हो गया, तब भी उन्हें संतोष नहीं हुआ। उनके होठ फड़क रहे थे और मन में क्रोध (भरा) था। तुरंत ही वे भगवान कमलापति के पास चल दिए हैं। इन्हे मार्ग में ही भगवान मिल गए हैं। नारद जी ने देखा की भगवान के एक ओर लक्ष्मी हैं तो दूसरी ओर विश्वमोहिनी हैं। भगवान ने पूछा की नारद जी कहाँ जा रहे हो? नारद जी बोले की मुझे एक भी नही मिलने दी और खुद दो-दो लिए खड़े हो। मेरी एक भी शादी नही होने दी आपने। बड़ा क्रोध आया हैं। और जो मन में आया हैं वो भगवान को बोला हैं। नारद जी भगवान से कहते हैं- तुम दूसरों की सम्पदा नहीं देख सकते, तुम्हारे ईर्ष्या और कपट बहुत है। समुद्र मथते समय तुमने शिवजी को बावला बना दिया और देवताओं को प्रेरित करके उन्हें विषपान कराया।असुरों को मदिरा और शिवजी को विष देकर तुमने स्वयं लक्ष्मी और सुंदर (कौस्तुभ) मणि ले ली। तुम बड़े धोखेबाज और मतलबी हो। सदा कपट का व्यवहार करते हो। तुम परम स्वतंत्र हो, सिर पर तो कोई है नहीं, इससे जब जो मन को भाता है, (स्वच्छन्दता से) वही करते हो। भले को बुरा और बुरे को भला कर देते हो। जब इतने से भी नारद जी को संतोष नही मिला तो शाप दे दिया हैं भगवान को। जिस शरीर को धारण करके तुमने मुझे ठगा है, तुम भी वही शरीर धारण करो, यह मेरा शाप है। तुमने हमारा रूप बंदर का सा बना दिया था, इससे बंदर ही तुम्हारी सहायता करेंगे। (मैं जिस स्त्री को चाहता था, उससे मेरा वियोग कराकर) तुमने मेरा बड़ा अहित किया है, इससे तुम भी स्त्री के वियोग में दुःखी होंगे। नारद जी ने जैसे ही शाप दिया हैं भगवान ने उसे सर पर धारण कर लिया हैं। उसी समय लक्ष्मी और विश्वमोहिनी वहां से गायब हो गई हैं। माया का साम्राज्य समाप्त हो गया हैं और मायाधिपति सामने आ गए हैं। अब नारद जी ने भयभीत होकर श्री हरि के चरण पकड़ लिए और कहा- हे शरणागत के दुःखों को हरने वाले! मेरी रक्षा कीजिए। हे कृपालु! मेरा शाप मिथ्या हो जाए। मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया। तब भगवान बोले की नारद ये सब मेरी ही इच्छा से हुआ हैं। नारद जी कहते हैं- मैंने आपको अनेक खोटे वचन कहे हैं। मेरे पाप कैसे मिटेंगे? भगवान बोले हैं की- जाकर शंकरजी के शतनाम का जप करो, इससे हृदय में तुरंत शांति होगी। शिवजी के समान मुझे कोई प्रिय नहीं है, इस विश्वास को भूलकर भी न छोड़ना। जपहु जाइ संकर सत नामा। होइहि हृदयँ तुरत बिश्रामा॥ कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें। असि परतीति तजहु जनि भोरें॥ हे मुनि ! पुरारि (शिवजी) जिस पर कृपा नहीं करते, वह मेरी भक्ति नहीं पाता। जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी। सो न पाव मुनि भगति हमारी॥ शिव ने पार्वती को प्रसंग सुनाकर कहा की वही दोनों रुद्रगण रावण और कुम्भकर्ण बने हैं। और भगवान ने राम अवतार लेकर इनका उद्धार किया हैं। एक कारण ये भी हैं। इस तरह से सुंदर नारद चरित्र सुनाया है।

+10 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 2 शेयर

🌹🙏🌹जय शिव शंकर की 🌹🙏🌹 💕🌾💕🌾💕🌾💕🌾💕🌾💕🌾 शुभ रात्रि विश्राम आपकी रात्रि शुभ और मंगलमय हो 🌼❣️🌼❣️🌼❣️🌼❣️🌼❣️🌼 भगवान शंकर के अवतार दुर्बासा ऋषि की सम्पूर्ण कथा!!!!!!!!! दुर्वासा ऋषि सतयुग, त्रेता एवं द्वापर तीनों युगों के एक प्रसिद्ध सिद्ध योगी और महान महर्षि थे। वे अपने क्रोध के लिए जाने जाते थे। छोटी-सी त्रुटि हो जाने पर ही वे शाप दे देते थे। महर्षि दुर्वासा महादेव शंकर के अंश से आविर्भूत हुए थे। ब्रह्मा के पुत्र महर्षि अत्रि ने सौ वर्ष तक ऋष्यमूक पर्वत पर अपनी पत्नी अनुसूया सहित तपस्या की। उनकी पत्नी अनसूयाजी के पातिव्रत धर्म की परीक्षा लेने हेतु ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों ही पत्‍ि‌नयों के अनुरोध पर श्री अत्री और अनसूयाजी के चित्रकुट स्थित आश्रम में शिशु रूप में उपस्थित हुए। ब्रह्मा जी चंद्रमा के रूप में, विष्णु दत्तात्रेय के रूप में और महेश दुर्वासा के रूप में उपस्थित हुए। बाद में देव पत्नियों के अनुरोध पर अनसूयाजी ने कहा कि इस वर्तमान स्वरूप में वे पुत्रों के रूप में मेरे पास ही रहेंगे। साथ ही अपने पूर्ण स्वरूप में अवस्थित होकर आप तीनों अपने-अपने धाम में भी विराजमान रहेंगे। यह कथा सतयुग के प्रारम्भ की है। पुराणों और महाभारत में इसका विशद वर्णन है। दुर्वासा जी कुछ बड़े हुए, माता-पिता से आदेश लेकर वे अन्न जल का त्याग कर कठोर तपस्या करने लगे। विशेषत: यम-नियम, आसन, प्राणायाम, ध्यान-धारणा आदि अष्टांग योग का अवलम्बन कर वे ऐसी सिद्ध अवस्था में पहुंचे कि उनको बहुत सी योग-सिद्धियां प्राप्त हो गई। अब वे सिद्ध योगी के रूप में विख्यात हो गए। तत्पश्चात् यमुना किनारे इसी स्थल पर उन्होंने एक आश्रम का निर्माण किया और यहीं पर रहकर आवश्यकता के अनुसार बीच-बीच में भ्रमण भी किया। महर्षि दुर्वासा जी शंकर जी के अवतार एवं प्रकाश हैं। शंकर जी के ईश्वर होने के कारण ही उनका निवास स्थान ईशापुर के नाम से प्रसिद्ध है। आश्रम का पुनर्निर्माण त्रिदण्डि स्वामी श्रीमद्भक्ति वेदान्त गोस्वामी जी ने कराया। सम्प्रति व्यवस्था सन्त रास बिहारी दास आश्रम पर रह कर देख रहे हैं। ब्रज मण्डल के अंतर्गत प्रमुख बारह वनों में से लोहवनके अंतर्गत यमुना के किनारे मथुरा में दुर्वासाजी का अत्यन्त प्राचीन आश्रम है। यह महर्षि दुर्वासा की सिद्ध तपस्या स्थली एवं तीनों युगों का प्रसिद्ध आश्रम है। भारत के समस्त भागों से लोग इस आश्रम का दर्शन करने और तरह-तरह की लौकिक कामनाओं की पूर्ति करने के लिए आते हैं। भारत के पौराणिक इतिहास में अनेक ऐसे ऋषियों, मुनियों का जिक्र है, जिनके पास अलौकिक शक्तियां थीं। वह अपनी इसी शक्ति के कारण चाहे तो श्राप देकर सामने वाले को भस्म कर सकते थे या फिर वरदान के द्वारा किसी का जीवन खुशियों से भर देते थे। यह सब उन्हें क्रोधित करने व प्रसन्न करने से जुड़ा था। ऐसे ही एक महर्षि थे दुर्वासा ऋषि, जो अपने क्रोध के लिए जाने जाते थे। ऋषि दुर्वासा को शिव का अवतार कहा जाता था लेकिन जहां भोले शंकर को प्रसन्न करना बेहद आसान माना जाता है वहीं ऋषि दुर्वासा को प्रसन्न करना शायद सबसे मुश्किल काम था। शिव का स्वरूप!!!!!!!!! शिव और दुर्वासा में एक बात समान थी कि दोनों के ही क्रोध की ज्वाला से बच पाना लगभग असंभव था। ऋषि दुर्वासा के क्रोध से जुड़ी अनेक कहानियां हमारे पौराणिक इतिहास में मौजूद हैं, जब किसी के कृत्य या दुस्साहस ने उन्हें इस कदर क्रोधित कर दिया कि उन्हें अपना आपा खोना पड़ा। लेकिन हर बार नुकसान सामने वाले व्यक्ति को ही उठाना पड़े ऐसा जरूरी नहीं है, कभी-कभार आपका क्रोध और अहंकार स्वयं आपके लिए भी घातक साबित हो जाता है। दुर्वासा ऋषि के साथ भी ऐसा ही हुआ जब उनका क्रोध उनकी जान के पीछे पड़ गया। कल्पवृक्ष की कथा!!!!!!!!! एक समय जब श्री रामचंद्र जी का दर्शन करने के लिए अपने साठ हजार शिष्यों सहित दुर्वासा ऋषि अयोध्या को जा रहे थे, तब मार्ग में जाते हुए दुर्वासा ने सोचा कि, मनुष्य का रूप धारण कर यह तो विष्णु जी ही संसार में अवतीर्ण हुए हैं; यह तो मैं जानता हूँ किन्तु संसारी जनों को आज मैं उनका पौरुष दिखलाऊँगा। अपने मन में ऐसा विचारते हुए वे अयोध्या आए और नगरी में प्रवेश कर सबको साथ लिए भगवान के भवन के आठ चौकों को लाँघकर पहले सीता जी के भवन में पहुँचे। तब शिष्यों सहित दुर्वासा को सीता जी के द्वार पर उपस्थित देख पहरेदारों ने शीघ्रता से दौड़कर श्री रामचंद्र जी को इसकी सूचना दी। यह सुनते ही भगवान राम मुनि दुर्वासा के पास आ पहुँचे और प्रणाम कर सबको बड़े आदर सहित भवन के भीतर लिवा गये तथा बैठने के लिए सुंदर आसन दिया। तब आसन पर बैठते ही दुर्वासा ने मधुर वचनों में श्री रामचंद्र जी से कहा कि, आज एक हजार वर्ष का मेरा उपवास व्रत पूरा हुआ है। इस कारण मेरे शिष्यों सहित मुझे भोजन कराइये और इसके लिए आपको केवल एक मुहूर्त का समय देता हूँ। साथ ही यह भी ज्ञात रहे कि मेरा यह भोजन जल, धेनु और अग्नि की सहायता से प्रस्तुत न किया जायेगा। केवल एक मुहूर्त में ही मेरी इच्छानुसार वह भोजन जिसमें विविध प्रकार के पकवान प्रस्तुत हों, मुझे प्राप्त हो। इसके अतिरिक्त यदि तुम अपने गार्हस्थ्य-धर्म की रक्षा चाहो तो शिव पूजन निमित्त मुझे ऐसे पुष्प मँगवा दो कि जैसे पुष्प यहाँ अब तक किसी ने देखे न हों । यदि यह तुम्हारा किया न हो सके, तो मुझसे स्पष्ट कह दो कि, मैं इसमें असमर्थ हूँ। मैं चला जाऊँ। तब मुनि की इस बात को सुनकर श्री रामचंद्र जी ने मुस्कराते हुए नम्रता से कहा —“भगवान् ! मुझे आपकी यह सब आज्ञा स्वीकार है।” तब राम की बात सुनकर दुर्वासा ने प्रसन्न होकर कहा — मैं सरयू में स्नान करके अभी तुम्हारे पास आता हूँ, शीघ्रता करना। हमारे लिए सब सामग्रियों को प्रस्तुत करने के लिए अपने भाइयों तथा सीता को शीघ्रता के लिए कह देना। रामचंद्र जी ने कहा —अच्छा, आप जाइये स्नान कर आइये। दुर्वासा जी स्नान करने चले गये । राम चिन्तित हो गये। लक्ष्मण आदि भ्राता, जानकी तथा सब के सब व्याकुल हो राम की ओर निर्निमेष दृष्टि से देखने लगे कि मुनि ने तो इस प्रकार की सब अद्भुत वस्तुएँ माँगी हैं। इसके लिए देखें कि अब भगवान क्या करते हैं? क्योंकि बिना अग्नि, जल और बिना गौ के उनके लिए किस प्रकार से भोजन प्रस्तुत करते हैं। तब रामचंद्र जी ने लक्ष्मण जी से एक पत्र लिखवाया। फिर उस पत्र को अपने बाण में बाँध कर धनुष पर चढ़ाया और छोड़ दिया । वह बाण वायु वेग से उड़कर अमरावती में इन्द्र की सुधर्मा नामक सभा में जाकर उनके सामने गिर पड़ा। उस बाण को देखकर इन्द्र व्याकुल हो गये कि यह किसका बाण है? फिर उठाकर जो देखा तो उस पर राम का नाम अंकित था। फिर उसमें बँधे पत्र को खोलकर पढ़ा। पत्र खुलते ही वह बाण फिर वहाँ से उड़कर राम के तरकश में आ घुसा। उधर इन्द्र ने उस पत्र को सभा में बैठे हुए सब देवताओं को सुनाया । उसमें लिखा था — इन्द्र ! स्वर्ग में सुखी रहो। मैं सर्वदा तुम्हारा स्मरण करता हूँ; परंतु तुम्हें एक आज्ञा देता हूँ। आज 1000 वर्ष के भूखे हुए दुर्वासा मुनि अपने साठ हजार शिष्यों के साथ मेरे यहाँ आए हैं। वे ऐसा भोजन चाहते हैं, जो गऊ, जल अथवा अग्नि के द्वारा सिद्ध न किया हो। इसके साथ ही उन्होंने शिव पूजन के लिए ऐसे पुष्प माँगे हैं जिन्हें कि अब तक मनुष्यों ने न देखा हो। मैंने उनकी यह माँग स्वीकार कर ली है। वे सरयू में स्नान करने गये हैं। इसलिए तुम शीघ्र ही कल्पवृक्ष और पारिजात जो क्षीरसागर से निकले हैं, क्षणमात्र में मेरे पास भेज दो, इसके लिए रावण के संहारक मेरे बाणों की प्रतीक्षा मत करना। यह पत्र देवताओं को सुनाकर इन्द्रदेव तत्क्षण उठ पड़े और कल्पवृक्ष तथा पारिजात को साथ ले देवताओं सहित विमान में बैठकर अयोध्या में आ पहुँचे। लक्ष्मण जी ने इन्द्र का स्वागत किया। इन्द्र ने राम के पास पहुँच पारिजात और कल्पवृक्ष को राम को अर्पण किया। इतने ही में सरयू तट से दुर्वासा ने अपने एक शिष्य को राम के पास भेजा कि तुम जाकर देखो कि राम इस समय क्या कर रहे हैं? मैंने जो आज्ञा दी है, उसके अनुसार कुछ अन्न अब तक बना है कि नहीं? अब-तक वैसे ही चिन्तामग्न हैं या कुछ कर रहे हैं? यदि मेरी आज्ञानुसार पकवान प्रस्तुत कर रहे हैं तो अब तक कितनी सामग्री तैयार हुई है? यह सब तुम चुपके से देखकर मेरे पास आओ। तब ‘जो आज्ञा’ ऐसा कहकर वह शिष्य राम के भवन में आया। देखा तो कल्पवृक्ष और पारिजात से युक्त देवताओं की मण्डली में राम विराजमान हैं । यह देखकर उस शिष्य ने शीघ्र ही दुर्वासा के पास जाकर वह समाचार कह सुनाया। शिष्य की यह बात सुनकर दुर्वासा को आश्चर्य हुआ। स्नान कर शिष्यों को साथ ले दुर्वासा ऋषि श्री रामचंद्र जी के सुंदर भवन में आ पहुँचे। दुर्वासा जी को आया देख देवताओं सहित राम ने उठकर उन्हें तथा उनके सब शिष्यों को बड़े आदर के साथ प्रणाम किया और उत्तम आसन पर बिठाकर सीता तथा लक्ष्मण आदि के साथ उनकी पूजा की, फिर जिन पुष्पों को मनुष्यों ने अब-तक नहीं देखा था, शिव पूजन के हेतु पारिजात के उन पुष्पों को राम ने दुर्वासा के समक्ष प्रस्तुत किया। उन पुष्पों को देख मुनि दुर्वासा ने एक बार तो आश्चर्य किया किन्तु मौन भाव से उन्हें ग्रहण कर शिव जी तथा अन्य देवताओं की उन पुष्पों से पूजा की।फिर उसी क्षण श्री रामचंद्र जी ने लक्ष्मण तथा सीता आदि को सब भोजन परोसने की आज्ञा दी। तब दिव्य अलंकारों से विभूषित सीता ने कल्पवृक्ष और पारिजात की पूजा कर अनेक पात्रों को लाकर उनके नीचे रख दिया और वह प्रार्थना करती हुयी इस प्रकार बोली कि, हे क्षीरसागर से उत्पन्न होने तथा देवताओं के मनोरथों को पूर्ण करने वाले कल्पवृक्ष ! आज शिष्यों सहित हमारे यहाँ आए हुए दुर्वासा को तुम सन्तुष्ट कर दो। तब सीता के इस प्रकार कहते ही कल्पवृक्ष ने पलमात्र में वहाँ रखे हुए करोड़ों पात्रों को अनेक प्रकार की खाद्य सामग्रियों से पूर्ण कर दिया । फिर तो उन सब अन्नों को उर्मिला सहित सीता ने सुवर्ण के पात्रों में रख रख कर दुर्वासा के समक्ष परोस दिया। फिर तो रामचंद्र से निवेदित दुर्वासा ने अपने शिष्यों के साथ बड़े प्रेम से वह सब भोजन किया। फिर हाथ मुँह धो ताम्बूल तथा दक्षिणा ली। कृत्या राक्षसी!!!!!!!!!! व्रत खोलने का समय बीत जाने के बाद दुर्वासा वापस आए। वह ये देखकर अत्याधिक क्रोध हो उठे कि उनकी अनुपस्थिति में राजा अंबरीश ने अपना व्रत खोल लिया। क्रोध के आवेश में आकर उन्होंने कृत्या राक्षसी की रचना की और उसे अंबरीश पर आक्रमण करने का निर्देश दिया। अपनी जान बचाने के लिए अंबरीश ने सुदर्शन चक्र को प्रहार करने का आदेश दिया। सुदर्शन चक्र के प्रहार से कृत्या राक्षसी उसी समय मारी गयी। कृत्या का वध करने के बाद सुदर्शन चक्र ऋषि दुर्वासा का पीछा करने लगा। अपनी जान बचाने के लिए ऋषि दुर्वासा इधर-उधर भागने लगे लेकिन वह जहां भी जाते सुदर्शन चक्र उनके पीछे आ जाता था। वह अपनी जान बचाने के लिए इन्द्र के पास पहुंचे। इन्द्र ने अपनी अक्षमता दर्शाते हुए उन्हें ब्रह्मा के पास भेज दिया। ब्रह्मा ने उन्हें शिव और शिव ने उन्हें विष्णु के पास जाने को कहा। आखिरकार वे विष्णु के पास पहुंचे। विष्णु ने उन्हें कहा कि सुदर्शन चक्र का नियंत्रण अंबरीश के पास है इसलिए उन्हें अंबरीश के पास ही जाना होगा। हार कर दुर्वासा अंबरीश के पास पहुंचे और सुदर्शन चक्र को रोकने को कहा। राजा ने ऋषि की प्रार्थना मान ली और आखिरकार सुदर्शन चक्र को रोककर दुर्वासा ऋषि की जान बचाई। कुंती को वरदान!!!!!!!!!! ऋषि दुर्वासा को क्रोधित करना जितना आसान है उन्हें प्रसन्न करना उतना या शायद उससे भी कही ज्यादा मुश्किल। लेकिन पांडवों की माता कुंती ने अपने सेवा भाव से ऋषि दुर्वासा को प्रसन्न करने में सफलता हासिल की थी। कुंती की सेवा से प्रसन्न होकर ऋषि दुर्वासा ने उन्हें ऐसा मंत्र बताया था जिसकी सहायता से वह देवताओं का ध्यान कर पुत्र रत्न की प्राप्ति कर सकती थी। पांडवों का जन्म इसी मंत्र की सहायता से हुआ था। दुर्वासा ऋषि की भविष्यवाणियां!!!!!!! अत्रि ऋषि और अनुसुया की संतान, दुर्वासा ऋषि ने राम और सीता के वनवास के दौरान ही यह भविष्यवाणी कर दी थी कि इनका अलगाव निश्चित है। इतना ही नहीं अभिज्ञान शांकुतलम के अनुसार क्रोध के आवेग में आकर दुर्वासा ऋषि ने शकुंतला को यह श्राप दिया था कि उसका अपना पति उसे पहचानने से इनकार कर देगा। इन्द्र का अहंकार!!!!!!!!!! दुर्वासा ऋषि ने इन्द्र देव को खूबसूरत कल्पक फूलों की माला भेंट की थी जो उन्हें मेनका ने दी थी। इन्द्र ने वो माला अपने हाथी ऐरावत के गले में डाल दी, ऐरावत ने वो माला जमीन पर फेंक दी, जिसे देखकर दुर्वासा अत्यंत क्रोधित हो उठे। दुर्वासा ऋषि ने इन्द्र से कहा कि गौतम और वशिष्ठ ऋषि द्वारा लगातार की जाती सराहना से इन्द्र के भीतर अहंकार आ गया है। इन्द्र के अहंकार को शांत करने के लिए दुर्वासा ने उन्हें श्राप दिया, जिसके बाद देवताओं की शक्ति क्षीण हो गई। दुर्वासा और राजा अम्बरीष!!!!!!!!! दुर्वासा जी कुछ बड़े हुए तो माता-पिता से आदेश लेकर वे अन्न, जल का त्याग कर कठोर तपस्या करने लगे। विशेषत: यम-नियम, आसन, प्राणायाम, ध्यान-धारणा आदि अष्टांग योग का अवलम्बन कर वे ऐसी सिद्ध अवस्था में पहुँचे कि उनको बहुत सी योग-सिद्धियां प्राप्त हो गई। अब वे सिद्ध योगी के रूप में विख्यात हो गए। तत्पश्चात् यमुना किनारे एक स्थल पर उन्होंने एक आश्रम का निर्माण किया और यहीं पर रहकर आवश्यकता के अनुसार बीच-बीच में भ्रमण भी किया। दुर्वासा आश्रम के निकट ही यमुना के दूसरे किनारे पर महाराज अम्बरीष का एक बहुत ही सुन्दर राजभवन था। एक बार राजा निर्जला एकादशी एवं जागरण के उपरांत द्वादशी व्रत पालन में थे। समस्त क्रियाएं सम्पन्न कर संत-विप्र आदि भोज के पश्चात् भगवत प्रसाद से पारण करने को थे कि महर्षि दुर्वासा आ गए। महर्षि को देख राजा ने प्रसाद ग्रहण करने का निवेदन किया, पर ऋषि यमुना स्नान कर आने की बात कहकर चले गए। पारण काल निकलने जा रहा था। धर्मज्ञ ब्राह्मणों के परामर्श पर श्री चरणामृत ग्रहण कर राजा का पारण करना ही था कि ऋषि उपस्थित हो गए तथा क्रोधित होकर कहने लगे कि तुमने पहले पारण कर मेरा अपमान किया है। भक्त अम्बरीश को जलाने के लिए महर्षि ने अपनी जटा निचोड़ कृत्या राक्षसी उत्पन्न की, परन्तु प्रभु भक्त अम्बरीश अडिग खडे रहे। भगवान ने भक्त रक्षार्थ चक्र सुदर्शन प्रकट किया और राक्षसी भस्म हुई। दुर्वासा जी चौदह लोकों में रक्षार्थ दौड़ते फिरे। शिव की चरण में पहुँचे। शिव ने विष्णु के पास भेजा। विष्णु जी ने कहा आपने भक्त का अपराध किया है। अत: यदि आप अपना कल्याण चाहते हैं, तो भक्त अम्बरीश के निकट ही क्षमा प्रार्थना करें। जब से दुर्वासा जी अपने प्राण बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे, तब से महाराज अम्बरीश ने भोजन नहीं किया था। उन्होंने दुर्वासा जी के चरण पकड़ लिए और बडे़ प्रेम से भोजन कराया। दुर्वासा जी भोजन करके तृप्त हुए और आदर पूर्वक राजा से भोजन करने का आग्रह किया। दुर्वासा ने संतुष्ट होकर महाराज अम्बरीश के गुणों की प्रशंसा की और आश्रम लौट आए। महाराज अम्बरीश के संसर्ग से महर्षि दुर्वासा का चरित्र बदल गया। ब्रज मण्डल के अंतर्गत प्रमुख बारह वनों में से लोहवन के अंतर्गत यमुना के किनारे मथुरा में दुर्वासा का अत्यन्त प्राचीन आश्रम है। यह महर्षि दुर्वासा की सिद्ध तपस्या स्थली एवं तीनों युगों का प्रसिद्ध आश्रम है। भारत के समस्त भागों से लोग इस आश्रम का दर्शन करने और तरह-तरह की लौकिक कामनाओं की पूर्ति करने के लिए आते हैं। दुर्वासा और दुर्योधन!!!!!!!!! दुर्वासा ने जीवन-भर भक्तों की परीक्षा ली। एक बार दुर्वासा मुनि अपने दस हज़ार शिष्यों के साथ दुर्योधन के यहाँ पहुँचे। दुर्योधन ने उन्हें आतिथ्य से प्रसन्न करके वरदान मांगा कि वे अपने शिष्यों सहित वनवासी युधिष्ठिर का आतिथ्य ग्रहण करें। दुर्योधन ने उनसे यह कामना प्रकट की कि वे उनके पास तब जायें, जब द्रौपदी भोजन कर चुकी हो। दुर्योधन को पता था कि द्रौपदी के भोजन कर लेने के उपरांत बटलोई में कुछ भी शेष नहीं होगा और दुर्वासा उसे शाप दे देंगे। दुर्वासा ऐसे ही अवसर पर शिष्यों सहित पांडवों के पास पहुँचे तथा उन्हें रसोई बनाने का आदेश देकर स्नान करने चले गये। धर्म संकट में पड़कर द्रौपदी ने कृष्ण का स्मरण किया। कृष्ण ने उसकी बटलोई में लगे हुए साग के एक पत्ते को खा लिया तथा कहा- "इस साग से संपूर्ण विश्व के आत्मा, यज्ञभोक्ता सर्वेश्वर भगवान श्रीहरि तृप्त तथा संतुष्ट हो जाएँ।" उनके ऐसा करते ही दुर्वासा को अपने शिष्यों सहित तृप्ति के डकार आने लगे। वे लोग यह सोचकर कि पांडवगण अपनी बनाई रसोई को व्यर्थ जाता देख रुष्ट होंगे, दूर भाग गये।" दुर्वासा और श्रीकृष्ण!!!!!!!!!! एक बार दुर्वासा यह कहकर कि वे अत्यंत क्रोधी हैं, कौन उनका आतिथ्य करेगा, नगर में चक्कर लगा रहे थे। उनके वस्त्र फटे हुए थे। श्रीकृष्ण ने उन्हें अतिथि-रूप में आमन्त्रित किया। उन्होंने अनेक प्रकार से कृष्ण के स्वभाव की परीक्षा ली। दुर्वासा कभी शैया, आभूषित कुमारी इत्यादि समस्त वस्तुओं को भस्म कर देते, कभी दस हज़ार लोगों के बराबर खाते, कभी कुछ भी न खाते। एक दिन खीर जूठी करके उन्होंने कृष्ण को आदेश दिया कि वे अपने और रुक्मिणी के अंगों पर लेप कर दें। फिर रुक्मिणी को रथ में जोतकर चाबुक मारते हुए बाहर निकले। थोड़ी दूर चलकर रुक्मिणी लड़खड़ाकर गिर गयीं। दुर्वासा क्रोध से पागल दक्षिण दिशा की ओर चल दिये। कृष्ण ने उनके पीछे-पीछे जाकर उन्हें रोकने का प्रयास किया तो दुर्वासा प्रसन्न हो गये तथा कृष्ण को क्रोधविहीन जानकर उन्होंने कहा- "सृष्टि का जब तक और जितना अनुराग अन्न में रहेगा, उतना ही तुममें भी रहेगा। तुम्हारी जितनी वस्तुएं मैंने तोड़ीं या जलायी हैं, सभी तुम्हें पूर्ववत मिल जायेंगी।" दुर्वासा और द्रौपदी!!!!!!!!! महाभारत में कौरव पांडवों से हमेशा जलन की भावना रखते थे। हर समय पांडवों और उनकी पत्नी द्रौपदी का अपमान करने का प्रयास करते थे। जब युधिष्ठिर जुए में अपनी पत्नी द्रौपदी को हार गए, तब द्रौपदी पर दुर्योधन का अधिकार हो गया था। द्रौपदी का अपमान करने के लिए दुर्योधन ने उसे कौरवों की सभा में बुलाया। दुःशासन द्वारा द्रौपदी का चीरहरण करके का प्रयास किया गया, लेकिन द्रौपदी के वस्त्र को बढ़ाकर भगवान ने उसकी रक्षा की थी। द्रौपदी को संकट के समय उसके अन्नत (कभी खत्म न होने वाले) हो जाने का वरदान ऋषि दुर्वासा ने दिया था। शिवपुराण के अनुसार, भगवान शिव के अवतार ऋषि दुर्वासा एक बार स्नान करने के लिए नदी के तट पर गए थे। नदी का बहाव बहुत तेज होने के कारण ऋषि दुर्वासा के कपड़े नदी में बह गए। ऋषि दुर्वासा से कुछ दूरी पर द्रौपदी भी स्नान कर रही थी। ऋषि दुर्वासा की मदद करने के लिए द्रौपदी ने अपनी वस्त्र में से एक टुकड़ा फाड़कर ऋषि को दे दिया था। इस बात से ऋषि द्रौपदी पर बहुत प्रसन्न हुए और संकट के समय उसके वस्त्र अन्नत हो जाने और उसकी रक्षा का वरदान दिया था। इसी वरदान के कारण कौरव सभा में दुःशासन द्वारा द्रौपदी चीरहरण प्रसंग में भगवान श्री कृष्ण के हाथों द्रौपदी की लाज बच गयी।

+22 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 0 शेयर

🙏🌹🙏🌹 जय श्री महाकाल की🌹🙏🌹🙏 ❣️🌼❣️🌼❣️🌼❣️🌼❣️🌼❣️🌼❣️🌼 शुभ प्रभात वंदन आपका दिन शुभ और मंगलमय हो भोले नाथ का आशीर्वाद आपके पूरे परिवार पर सदैव बना रहे जय महाकाल की 🙏🌹🙏🌹 आदिनाथ से नाथ परंपरा परहब्रह्म शिवजी के रुद्रावतार महादेव की लीला समझना कठिन है । क्योंकि मैं ओर मेरा का सांसारिक भाव और देहभाव का अहंकार दूर नही होता तब तक आत्मतत्व का ज्ञान नही होता । अहंकार का नाश होता है तब नाथ कहलाते है । सृष्टि उत्पति के लिये, शक्ति उत्पन्न करना आवश्यक था, इसलिये ॐकार आदिनाथ जी ने अपने ही काया के अन्दर की सूक्ष्मरूपी पराशक्ति को अपने ही अंग के बाहर स्थूल रूप में प्रकट किया, जो अष्ठभुजा शक्ति के रूप में प्रकट हुई । दक्ष की तपस्या से अतिप्रसन्न होकर इस शक्ति ने सती नाम से सगुण, सुन्दर रूप में दक्ष के यहां जन्म लिया । सती ने तपस्या कर शिव को प्रसन्न करके उनसे विवाह किया। दक्षयज्ञ में पति की निन्दा सुनकर सती ने योगाग्नि में आत्मदाह किया और योगमाया नाम से प्रचलित हुई। हिमालय वंश में पार्वती रूप में जन्म लेने पर उन्हें धरत्री रूप कहा जाने लगा। शिव प्राप्ति के लिए ॐ नमः शिवाय मंत्र तप से शिव को प्रसन्न कर विवाहोपरांत कैलाश लोक शिव धाम मे निवास किया। एक समय नारद मुनि ने कैलाश लोक में शिवजी के गले में मुण्डमाल को देख भाव विभोर होकर स्तुति गान किया, उनके जाने के पश्चयात इस स्तुति का रहस्य पार्वती ने शिवजी से एकान्त स्थान में पूछा। इस अमरत्व के गुप्त ज्ञान के सोपान हेतु शिव-पार्वती के संग एकान्त क्षीर सागर किनारे श्रृंगपर्वत (डोंगी) पर पहुंचे। जहां उन्होंने योगज्ञान अर्थात अमर ज्ञान, मृत्युंजय रूप में पार्वती को दिया। परिणाम स्वरूप पार्वती जी को वैराग्य उत्पन्न हुआ। शिवजी ने उन्हें दीक्षित किया, यह महायोग ज्ञान पार्वती ने प्रथमतः शिष्य रूप में लिया अतः ज्ञानोदय होने के कारण शिव ने कहा हे पार्वती! नाद, जनेऊ, झोली, खप्पर, मुद्रा धारण कर मृत्यूलोक में नाथ सम्प्रदाय में तुम्हारा अवतार उदयनाथ नाम रूप में पूज्यनीय होगा। एक बार गुरु गोरक्षनाथ जी घनघोर जंगल में एक बिल्व पत्र वृक्ष के नीचे बैठकर गगन विहार सिद्धि प्राप्ति हेतु तपस्या कर रहे थे, उसी क्षेत्र में उदयानाथ जी भी तपस्या कर रही थीं। गुरु गोरक्षनाथ जी की तपस्या देखकर उनकी परीक्षा लेने हेतु सुन्दर मोहिनी रूप धारण कर निर्वस्त्र अवस्था में लेट गयी, समाधि जागृत होने के पश्चयात गोरक्षनाथ जी ने दृष्टिपात होने पर उनका शरीर बिल्व पत्तों ढक दिया। उदयनाथ जी ने प्रसन्न होकर गोरक्षनाथ जी को अपने मूल स्वरूप (पार्वती जी का) में दर्शन दिये और अपने रक्त रूप में भगवा वस्त्र प्रदान किये तथा अपने गुरु आदिनाथ जी का परिचय दिया। उदयनाथ जी सूक्ष्मरूपी पराशक्ति, इस चराचर सृष्टि में विधमान हैं। स्थूल रूप में कैलाश मानसरोवर पर निवास करती हैं। त्र्यम्बक महाकुम्भ पर्व पर नवनाथ चौरासी सिद्ध अनन्त कोट नाथ सिद्ध एकत्रित हुए थे तब उदयनाथ पार्वती जी ने नाथसिद्धो को दया, क्षमा, शान्ति, कृपा, आशिर्वाद आदि पर उपदेश देकर योगशक्ति से चरणों में पाताल, पेट (गर्भ) में मृत्युलोक, वक्षस्थल में स्वर्ग का तथा शीश में अखण्ड ब्रम्हाण्ड का दर्शन करवाया था । सृष्टि उत्पत्ति, शक्ति पराशक्ति रूप से कैसे हुई, एवं योग में शक्ति का महत्व आदि पर उन्होंने उपदेश दिया । आदिनाथ जी ने उदयनाथ जी को जगतजननी, गोरक्षनाथ जी ने ज्योति स्वरूपी एवं मत्स्येन्द्रनाथ जी ने योगमाया नाम प्रदान करके इन्हें गौरान्वित किया। उदयनाथ जी (पार्वती) ने अलवर जोधावास क्षेत्र के घनाघोर जंगल में “उदयनाथ धाम” में स्थित गुफा में साठ हजार वर्ष घोर तपस्या की। सम्पूर्ण चौदह भुवन भ्रमण किया। स्वयं पराशक्ति होने के कारण सभी सिद्धियां उनकी दासी थी। एक बार घाटी में भर्तहरिनाथ जी तपस्या में लीन थे। उस समय उदयनाथ जी भी उनको भेट देने के लिय वहां आई थी। गंगा माता ने भी उनके दर्शन किये थे। भर्तहरिनाथ जी को दर्शन देकर हरिद्वार जाने का आदेश दिया जहां उत्तरार्ध काल में हरिद्वार स्थित गुफा में वे तपस्यारत रहे। उदयनाथ जी ने समय- समय पर नाथ सिद्धों को उपदेश एवं मार्गदर्शन किया। दादा मत्स्येन्द्रनाथ जी के सप्तश्रृंग पर्वत पर शक्ति साधना तपस्या करने के समय वहां उदयनाथ जी ने दर्शन देकर उन्हें वज्रेश्वरी सप्तकुण्ड (मुंबई के पास) जाने को कहा और एक वनस्पति देकर कहा जिस कुण्ड में यह वनस्पति मुरझा जायगी उसी कुण्ड में तुम्हें मृत संजीवनी का लाभ होगा। नाथ सिद्ध योग में जब कुण्डलिनी शक्ति जागृत होती है, उदयानाथ जी के दिव्य दर्शन प्राप्त होते हैं। स्वाधिस्ठान चक्र में सावित्री रूप में, सुषुम्ना में गंगा रूप में, अनहद चक्र में उमा रूप में, मणिपुर चक्र में लक्ष्मी रूप में, विशुद्धि चक्र में अविधा शक्ति रूप में, प्राण चक्र में पराशक्ति रूप में, चिबुक चक्र में सरस्वती रूप में, कर्णमूल में श्रुति शक्ति रूप में तथा भ्रूमध्य में ज्ञान शक्ति रूप में, ब्रह्मरंध्र में अनुपम शक्ति रूप में, अकण्ठ पीठ में अकलेश्वरी रूप में अन्त में असंख्य चक्र में असंख्या शक्ति रूप में दर्शन देकर सम्पूर्ण ऋद्धि-सिद्धियाँ, व्रज काया, ब्रम्हाण्ड भ्रमण, महाज्ञान योगी को प्रदान करती है, योग साधना में कार्य शक्ति से पराशक्ति का अनुभव होता है। नाथ सिद्धो के सभी शक्ति साधना की यह ईष्ट शक्ति आदिशक्ति पराशक्ति रूप में कार्य करती है। मन्त्र तन्त्र साधना, कुल अकुल या कौल साधना, कापालिक साधना, वज्रायीनी साधना, घोर अघोर साधना, अत एवं योग, कुण्डलिनी साधना में उदयनाथ जी की कृपा प्रसन्नता के बिना साधना सिद्ध नहीं होती। विशेषतः मन-इन्द्रियों पर विजय पाने पर उदयनाथ पार्वती जी दर्शन देते हैं। ऐसे पूर्णत्व प्राप्त उदयनाथ जी की नवनाथों व नाथ सिद्धो में उच्च स्थान में मान्यता है। श्रद्धालुजन, अलवर जोधवास (गाँव-मई जोड़) “उदयनाथ धाम” नाम के क्षेत्र में उनकी समाधि पर पूजा अर्चना कर श्रद्धासुमन अर्पित करते है। " :गायत्री मन्त्रः " ” ॐ ह्रीं श्रीं उं उद्यनाथाय विदमहे , धत्रीरूपाय धीमही तन्नो पराशक्ति प्रचोदयात । “ "ॐ श्री उदयनाथ नमः" उपरोक्त में से किसी एक मंत्र का 108 बार नित्य जप करना चाहिए । सभी धर्मप्रेमी जनो पर उद्यनाथजी ( पार्वतीजी ) की सदैव कृपा हो!

+12 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 1 शेयर