🌹🙏 जय बाबा श्याम की🙏🌹 🔱🌾🔱🌾🔱🌾🔱🌾🔱 शुभ प्रभात वंदन धर्मानुबन्धनम् ~~~ भगवान् का प्रत्येक अवतार सामान्य-धर्म का उद्धार करने के लिए होता है , किन्तु इन्ही अवतारों में भी कहीं-कहीं सामान्य-धर्म के विरुद्ध विशेष-धर्म का भी आश्रय लेते हैं , जो सामान्य-धर्म के विपरीत दिखाई देता है । वह विशेष-धर्म सामान्य धर्मशास्त्र की दृष्टि से पाप होने पर भी धर्मानुबन्धित होने से उसे धर्म ही कहना चाहिये , क्योंकि उस धर्म के पथ का अनुसरण करने से जीव का कल्याण होता है । जैसे भगवान् राम ने गौ-ब्राह्मण-देवता-सन्त की रक्षा के लिए अवतार लिया , यह संस्कृत तथा भाषा की अनेक रामायणों से सिद्ध होता है । किन्तु उसी ब्राह्मण धर्म के विपरीत कर्म करने वाले सोमयाजी वेद के महाविद्वान् महाब्राह्मण रावण की परिवार सहित हत्या करके अनेकों ऋषियों के धर्म की रक्षा की । जैसे भगवान् श्रीकृष्ण ने युद्ध में शस्त्र न धारण करने की प्रतिज्ञा करके भी अपने भक्त अर्जुन की रक्षा के लिए तथा भीष्म के प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर भी सुदर्शन चक्र धारण कर लिया । सामान्य-धर्म किसी पतिव्रता स्त्री के धर्म को नष्ट करने को महापाप मानता है , किन्तु जब उसी महासती के पतिव्रत-धर्म के प्रभाव से भगवान् शंकर के हाथों से भी उसका पति नहीं मारा जा सका , और वह इसीके प्रभाव से प्रतिदिन हजारों स्त्रियों का शीलभंग करता था । तब शिवजी की प्रार्थना से महाविष्णु ने करोड़ों सतियों के सतीत्व की रक्षा के लिए सामान्य-धर्म के विरुद्ध माया से उसके पति जलन्धर का रूप धारण करके तुलसी का शीलभंग किया व करोड़ों सतियों के सतीत्व की रक्षा की । अतः भगवान् के द्वारा अधर्म के समान भासमान होने पर भी धर्मानुबन्धित होने से यह विशेष-धर्म है , क्योंकि यह धर्म मात्र की रक्षा के उद्देश्य से किया । धर्मानुबन्धित = धर्म से सम्बन्धित सर्वसाधारण की दृष्टि में अधर्म होने पर भी जो धर्म हो । "अर्थमर्थानुबन्धं च कामं कमानुबन्धनम् । धर्म धर्मानुबन्धं च व्यवस्यति स बुद्धिमान् ।।" धन वही है जो धन से सम्बन्धित हो , काम वही है जो काम से सम्बन्धित हो , धर्म वही है जो धर्म से सम्बन्धित हो --- जो ऐसा मानता है वही बुद्धिमान है ।

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🙏 हारे का सहारा बाबा श्याम हमारा 🙏 🚩💐🚩💐🚩💐🚩💐🚩💐🚩 शुभ प्रभात वंदन आज की महती आवश्यकता........ मनुष्य की काया संरचना और मस्तिष्कीय बुद्धि विचारणा का इतना बड़ा अनुदान हर किसी को मिला है कि वह अपना और संबद्ध परिजन का काम भली प्रकार चला सके। इस क्षमता से रहित कोई भी नहीं है। इतने पर भी व्यामोह का कुछ ऐसा कुचक्र चलता रहता है कि उपलब्धियों की न तो उपस्थिति का अनुभव होता है और न उससे किस प्रकार का क्या काम लिया जाना चाहिए?, इसका निर्धारण बन पड़ता है। ऐसी दशा में असमर्थता अनुभव करने वालों को समर्थों का मार्गदर्शन एवं सहयोग प्राप्त करना होता है। उसके अभाव में विद्यमान क्षमताएं प्रसुप्त अवस्था में पड़ी रहती हैं और उनके द्वारा जिस प्रयोजन की पूर्ति की जा सकती थी, वह नहीं हो पाती। कपड़े कोई भी धो सकता है पर अनभ्यास या आलस्य की स्थिति में धोबी का आश्रय लेना पड़ता है। पेट भरने योग्य भोजन बना लेने की आदत दो चार दिन में डाली जा सकती है पर देखा यह गया है कि आवश्यक वस्तुएँ घर में होते हुए भी रसोई बनाने का सरंजाम नहीं जुट पाता और भूखे रहने या बाजार से खाने की कठिनाई सामने आ खड़ी होती है। अनेक अपने हाथ से हजामत बनाते हैं पर कितनों ही का काम नाई का सहयोग लिए बिना चलता ही नहीं। अभ्यास से संगीत-संभाषण जैसे कौशल सहज ही सीखे जा सकते हैं, पर अपने से इस संदर्भ में कुछ करते धरते न बन पड़ने पर किसी दूसरे को बकौल प्रतिनिधि या माध्यम के खड़ा करना पड़ता है। इसे आलस्य, अनभ्यास भी कहा जा सकता है और अनुकूल सुविधा हस्तगत न होने का कुयोग भी। इस हेय स्थिति में से निकलने का सभी को प्रयत्न करना पड़ता है और किया जाना चाहिए। इस अवलम्बन का नाम है- मार्गदर्शन। उसे प्राप्त करने में किसी को अपनी छुटाई या अवमानना अनुभव नहीं करनी चाहिए। वरन् इस तलाश में रहना चाहिए कि जो अब तक उपलब्ध नहीं है, वह आगे उपलब्ध हो। तालाबों में निज का पानी कहाँ होता है? वे बादलों से ही उधार लेकर अपना भण्डार भरते हैं। जलवायु जैसे प्रकृति अनुदानों को हम कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार करते हैं, न इसमें अपनी हेठी मानते हैं और न अभावग्रस्तता। छोटे बच्चे अभिभावकों का सहयोग लेकर ही अपनी भ्रूण स्थिति को पार करते स्तनपान का लाभ लेते, आच्छादनों और सेवाओं का लाभ उठाते हैं। इतना बन पड़ने पर ही वे घुटनों के बल चलने या खड़ा होने की स्थिति में आते हैं। भाषा बोध भी उन्हें परिवार के सदस्यों का अनुकरण करते-करते ही हस्तगत होता है। जिन बालकों का पालन पशु समुदाय के बीच हुआ है, उन अपवादों में मनुष्य बालक भी पशु स्तर का आचरण करते और शब्द बोलते देखे गये हैं। यह है समर्थ मनुष्य की असमर्थता। मौलिक रूप से वह सृष्टा की दी हुई अनेकानेक विशेषताओं से सम्पन्न है, किन्तु इसे प्रकृति का व्यंग्य ही कहना चाहिए कि वह अपनी महत्वपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपने पैरों खड़ा नहीं हो पाता। उसे दूसरों के सहयोग, मार्गदर्शन या आश्रय की आवश्यकता पड़ती है, चाहे वह कितना ही न्यून क्यों न हो।

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🔱 जय श्री खाटू वाले श्याम की 🔱 🙏🌾🌹🌾🌹🌾🌹🌾🌹🙏 Good morning everyone 👋 Have a great day 🌹💐🌹💐 Happy Friday 🙏🌹🙏🌹 पुनर्जन्म की मान्यता में विश्वास क्यों? 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ हमारे धर्मशास्त्रों, अगणित आप्त वचनों में आत्मा के पुनर्जन्म लेने की बात कही गई है। मृत्यु के साथ शरीर की समाप्ति भौतिक मान्यता है, लेकिन आध्यात्मिक मान्यता के अनुसार आत्मा की अमरता का एक प्रमाण पुनर्जन्म है। भारत में समय-समय पर समाचार पत्रों में प्रकाशित घटनाओं के माध्यम से पुनर्जन्म के उदाहरणों का विवरण मिलता रहता है, जिसमें पिछले जन्म की स्मृतियों को प्रामाणिक करके अनेक लोग इस तथ्य के यथार्थ को सिद्ध करते हैं। पुनर्जन्म की घटना को विज्ञान की भाषा में पैरानामोल फिनामिना भी कहा जाता है। प्रायः संचित संस्कारों के अनुरूप ही दिवंगत आत्माएं नया शरीर धारण कर पुनर्जन्म लेती हैं। इस बंध में हमारे शास्त्रों में विस्तृत विवरण मिलता है। महाभारत वनपर्व 209.32 अर्थात् प्राणी शुभ कर्मों से देव योनि को प्राप्त होता है और मिले-जुले (पाप-पुण्यमय) कर्मों से मनुष्य योनि को प्राप्त होता है। शुभैः प्रयोगैर्देवत्वं व्यामिश्रैम्मानुषो भवेत् । योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः । स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥ -कठोपनिषद् 227 अर्थात् अपने कर्म और ज्ञान के अनुसार कोई देहधारी शरीर धारणार्थ विशिष्ट योनि को प्राप्त होते हैं और अन्य कोई देहधारी स्थावर भाव को प्राप्त होते हैं। एहिकं प्रोक्तनं वापि कर्म यदचितं स्फुरन् । पौरषोऽसो परो यत्नो न कदाचन निष्फलः ॥ -योगवासिष्ठ अर्थात् पुनर्जन्म और इस जन्म में किए हुए कर्म, फल के रूप में अवश्य प्रकट होते हैं, क्योंकि मनुष्य के द्वारा किए हुए कर्म, फल लाए बिना नहीं रहते हैं। क्लेशमूलः कर्मोशयो दृष्टादृष्ट जन्मवेदनीयः। सतिमूले तद्विपाको जात्यायुभोगाः ॥ -पातंजलियोगसूत्र 2 12-13 अर्थात् यदि पूर्वजन्म के संचित संस्कार या कर्म अच्छे हैं, तो उत्तम जाति, आयु और योग प्राप्त होते हैं। जब मनुष्य शरीर का त्याग करता है, तब इस जन्म की विद्या, कर्म और पूर्व प्रज्ञा, आत्मा के साथ ही चली जाती है, उसी ज्ञान और कर्म के अनुसार उस जीवात्मा का जन्म होता है। तदनुसार उसके संस्कार नवीन जीवन में प्रकट होने लगते हैं। आशापाशा शताबद्धा वासनाभाव धारिणः। कायात्कायमुपायान्ति वृक्षाद्वृक्षमिवाण्डजा ॥ अर्थात् मनुष्य का मन सैकड़ों आशाओं (महत्वाकांक्षाओं) और वासनाओं के बंधन में बंधा हुआ मृत्यु के उपरांत उन क्षुद्र वासनाओं की पूर्ति वाली योनियों और शरीर में उसी प्रकार चला जाता है, जिस प्रकार एक पक्षी एक वृक्ष को छोड़कर फल की आशा से दूसरे वृक्ष पर जा बैठता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भी श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है। यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ श्रीमद्भगवद्गीता 8/6 अर्थात् यह मनुष्य अंत समय में जिस-जिस भी भाव का स्मरण करता हुआ शरीर छोड़ता है, सदा उसी भाव से भावित होने के कारण उस भाव को ही प्राप्त होता है। पुराणों में भागवत, विष्णु, अग्नि, मार्कण्डेय और देवी पुराण में अनेक कथाओं और घटनाओं के जरिए पुनर्जन्म को सिद्ध किया गया है। महर्षि वाल्मीकि और संत तुलसीदास ने रामायण में कई स्थलों पर पुनर्जन्म का रोचक वर्णन किया है। एक बार मनु से शतरूपा ने पूछा-'भगवन्! मनुष्य को अन्यान्य योनियों में क्यों भटकना पड़ता है? कई बार मानव योनि पाकर भी मुक्त होने के स्थान पर फिर पदच्युत कर दिया जाता है, ऐसा क्यों? मनु बोले-शारीरिक पाप कर्मों से जड़ योनियों में जन्म होता है। वाणी के पाप से पशु-पक्षी बनना पड़ता है। मानसिक दोष करने वाले मनुष्य योनि से बहिष्कृत हो जाते हैं। इस जन्म के अथवा पूर्वजन्म के किए हुए पापों से मनुष्य अपनी अस्वाभाविकता खोकर विद्रूप बनते हैं। जब महाराज प्रद्युम्न का स्वर्गवास हो गया, तो पूरे परिवार में कुहराम मच गया महर्षि कौत्स पुनर्जन्म विज्ञान के ज्ञाता थे। उन्हें बुलाया गया और कहा, 'राजा जिस रूप में भी हों, हम उनका दर्शन करना चाहते हैं। राजा काष्ठ कीट हो गए थे। उनका छोटा-सा परिवार भी बन गया। कीड़े को पकड़ने का प्रयत्न किया गया, तो उसने कहा कि मुझे मत छेड़ो, मैं अब इसी योनि में प्रसन्न हूं। नए मोह ने मेरा पुराना मोह समाप्त कर दिया है। सांसारिक संबंध शरीर रहने तक ही है।" इस प्रकार देखें, तो हमें पुनर्जन्म के धार्मिक, नैतिक, मनोवैज्ञानिक व दार्शनिक आधारों का विवरण मिलता है। परामनोवैज्ञानिक डॉ. रैना रूथ ने पदार्थगत रूपांतरण को ही पुनर्जन्म माना है। उन्होंने अपनी पुस्तक में उल्लेख किया है कि पदार्थ एवं ऊर्जा दोनों ही परस्पर परिवर्तनशील हैं। ऊर्जा नष्ट नहीं होती, भले ही रूपांतरित व अदृश्य हो जाए। उनके मतानुसार डी.एन.ए. मृत्यु के बाद भी संस्कारों के रूप में अदृश्य अवस्था में रहते हैं और नए जन्म के समय फिर से प्रकट हो जाते हैं। हमें जो विलक्षण प्रतिभाएं देखने को मिलती हैं, वे पूर्वजन्म के संचित ज्ञान का प्रतिफल होती हैं। पुनर्जन्म की यादें, पूर्वाभास होना, भविष्य ज्ञान की अतींद्रिय क्षमता, विलक्षणताएं इन्हीं संचित संस्कारों का शुभ परिणाम होती हैं। इस प्रकार कह सकते हैं कि पुनर्जन्म पुनरावर्तन नहीं, बल्कि जीवात्मा इस जन्म के संचित संस्कारों को लेकर ही अगला जन्म लेती है। उल्लेखनीय है कि जींस (डी.एन. ए.) में पूर्वजन्म के या पैतृक संस्कार मौजूद रहते हैं और इसकी संरचना में प्रकाशीय भाग ही प्राण कहलाता है । 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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🌹 *श्री राधे राधे जी* 👏 🙏🌹प्रेम से बोलो जय माता दी🌹🙏 🌺💐🌺💐🌺💐🌺💐🌺💐🌺 शुभ प्रभात वंदन आपका दिन शुभ और मंगलमय हो माता रानी का आशीर्वाद आपके पूरे परिवार पर सदैव बना रहे प्रेम से बोलो जय माता दी🌹🙏🌹🙏 . "गणेश लक्ष्मी" एक बार एक साधु को राजसी सुख भोगने की इच्छा हुई। अपनी इच्छा की पूर्ति हेतु उसने लक्ष्मी की कठोर तपस्या की। कठोर तपस्या के फलस्वरूप लक्ष्मी ने उस साधु को राज सुख भोगने का वरदान दे दिया। वरदान प्राप्त कर साधु राजा के दरबार में पहुँचा और राजा के पास जाकर राजा का राज मुकुट नीचे गिरा दिया। यह देख राजा क्रोध से कांपने लगा। किन्तु उसी क्षण उस राजमुकुट से एक सर्प निकल कर बाहर चला गया। यह देखकर राजा का क्रोध समाप्त हो गया और प्रसन्नता से उसने साधु को अपना मंत्री बनाने का प्रस्ताव रखा। साधु ने राजा का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और वह मंत्री बना दिया गया। कुछ दिन बाद उस साधु ने राजमहल में जाकर सबको बाहर निकल जान का आदेश दिया। चूंकि सभी लोग उस साधु के के चमत्कार को देख चुके थे, अत: उसके कहने पर सभी लोग राजमहल से बाहर आ गए तो राजमहल स्वत: गिरकर ध्वस्त हो गया। इस घटना के बाद तो सम्पूर्ण राज्य व्यवस्था का कार्य उस साधु द्वारा होने लगा। अपने बढ़ते प्रभाव को देखकर साधु को अभिमान हो गया और वह अपने को सर्वेसर्वा समझने लगा। अपने अभिमानवश एक दिन साधु ने राजमहल के सामने स्थित गणेश की मूर्ति को वहाँ से हटवा दिया, क्योंकि उसकी दृष्टि में यह मूर्ति राजमहल के सौदर्य को बिगाड़ रही थी। अभिमानवश एक दिन साधु ने राजा से कहा कि उसके कुर्ते में सांप है अत: वह कुर्ता उतार दें। राजा ने पूर्व घटनाओं के आधार पर भरे दरबार में अपना कुर्ता उतार दिया किन्तु उसमें से सांप नहीं निकला। फलस्वरूप राजा बहुत नाराज हुआ और उसने साधु को मंत्री पद से हटाकर जेल में डाल दिया। इस घटना से साधु बहुत दु:खी हुआ और उसने पुन: लक्ष्मी की तपस्या की। लक्ष्मी ने साधु को स्वप्न में बताया कि उसने गणेश की मूर्ति को हटाकर गणेश को नाराज कर दिया है। इसलिए उस पर यह विपत्ति आई है क्योंकि गणेश के नाराज होने से उसकी बुद्धि नष्ट हो गई तथा धन या लक्ष्मी के लिए बुद्धि आवश्यक है, अत: जब तुम्हारे पास बुद्धि नहीं रही तो लक्ष्मीजी भी चली गई। जब साधु ने स्वप्न में यह बात जानी तो उसे अपने किए पर बहुत पश्चाताप हुआ। साधु को अपनी गलती का अहसास हो गया और उसने पश्चाताप किया तो अगले ही दिन राजा ने भी स्वत: जेल में जाकर साधु से अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी और उसे जेल से मुक्त कर पुन: मंत्री बना दिया। मंत्री बनने पर साधु ने पुन: गणेश की मूर्ति को पूर्ववत स्थापित करवाया, साथ ही साथ लक्ष्मी की भी मूर्ति स्थापित की और सर्व साधारण को यह बताया कि सुखपूर्वक रहने के लिए ज्ञान एवं समृद्धि दोनों जरूरी हैं। इसलिए लक्ष्मी एवं गणेश दोनों का पूजन एक साथ करना चाहिए। तभी से लक्ष्मी के साथ गणेश पूजन की परम्परा आरम्भ हो गई। ० ० ० "जय जय श्री राधे" ************************ *बोलो श्री बाँके बिहारी लाल की जय👏*

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जय श्री राधे कृष्ण 🙏🌹🌹🌹🌹🌹🙏 शुभ रात्रि विश्राम माता-पिता की सेवा सबसे बड़ा धर्म क्यों? 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ हिंदू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी सेवा माना गया है। शास्त्र - मातृ देवो भव, पित्र देवो भव आदि सम्मानित वचनों से माता-पिता को देवताओं के समान पूजनीय मानते हैं। माता का स्थान तो पिता से अधिक माना गया है-जननी और जन्म-भूमि को तो स्वर्ग से भी श्रेष्ठ कहा गया है। प्रत्यक्ष में माता और पिता के द्वारा ही संतान के शरीर का निर्माण होता है। अतः शरीर देने वाले सबसे पहले देवता माता-पिता ही हैं। माता संतान का पालन-पोषण करने के लिए नौ-दस मास तक कष्ट सहती है और अपने विचारों से संस्कार-संपन्न संतान को जन्म देती है, इसलिए माता-पिता संसार में सर्वाधिक पूजनीय हैं। माता-पिता की इस सेवा के लिए ही हिंदू धर्म में पितृ-ऋण की व्यवस्था है। इस ऋण को चुकाए बिना अथवा माता की अनुमति के बिना पुत्र को गृहस्थ जीवन से विमुख होने की आज्ञा नहीं है। संन्यास ग्रहण करने के लिए भी इस ऋण से मुक्त होना आवश्यक है। ज्ञान पाने की दृष्टि से यद्यपि गुरु का बड़ा महत्त्व हैं, लेकिन माता को बच्चे की पहली गुरु कहकर सम्मानित किया गया है। मनुस्मृति में स्पष्ट व्यवस्था दी गई है कि। उपाध्यायान्दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता। सहनं तु पितॄन्माता गौरवेणातिरिच्यते ॥ -मनुस्मृति 2/145 अर्थात् उपाध्यायों से दस गुना श्रेष्ठ आचार्य, आचार्य से सौ गुना श्रेष्ठ पिता और पिता से हजार गुना श्रेष्ठ माता गौरव से युक्त होती है। इस श्रेष्ठता का कारण स्पष्ट करते हुए मनु लिखते हैं। यं मातापितरौ क्लेशं सहेते संभवे नृणाम् । न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि ।। - मनुस्मृति 2/227 अर्थात् प्राणियों की उत्पत्ति में माता-पिता को जो क्लेश सहन करना पड़ता है, उस क्लेश से वे (प्राणी) सौ वर्षों में भी निस्तार नहीं पा सकते। इसलिए मनु ने माता-पिता और गुरु इन तीन को सदा सेवा से प्रसन्न रखने के निर्देश दिए हैं। यह व्यवस्था जीवन के सत्य और लक्ष्य को पाने के लिए भी आवश्यक है इमं लोकं मातृभक्तया पितृभक्तया तु मध्यमम् । गुरुशुश्रूषया त्वेवं ब्रह्मलोकं समश्नुते ॥ मनुस्मृति 2233 अर्थात माता में भक्ति से इस लोक का, पिता में भक्ति से मध्य लोक का और गुरु में भक्ति से ब्रह्म लोक का सुख प्राप्त होता है। जिन पर इन तीनों की कृपा होती है, उनको सभी धर्मों का सम्मान मिलता है और जिन पर माता-पिता तथा गुरु की कृपा नहीं होती, उन्हें किसी धर्म के पालन से सम्मान नहीं मिलता। उनके सभी कर्म निष्फल होते हैं। अतः जब तक माता-पिता और गुरु जीवित रहें, तब तक उनकी सेवा ही करें और किसी अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं है। यही कर्तव्य है, यही साक्षात धर्म है। माता-पिता की महत्ता का उल्लेख शिवपुराण में यूं मिलता है। पित्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रकान्तिं च करोति च। तस्य वै पृथिवीजन्यफलं भवति निश्चितम् ॥ अपहाय गृहे यो वै पितरोतीर्थमाव्रजेत्। तस्य पापं तवा प्रोक्तं हनने च तयोर्यवा ॥ पुत्रस्य च महत्तीर्थ पित्रोश्चरणपंकजम् ।अन्यतीर्थ तु दूरे वै गत्वा सम्प्राप्यते पुनः ॥ इदं संन्निहितं तीर्थं सुलभं धर्मसाधनम् । पुत्रस्य च स्त्रियाश्चैव तीर्व गेहे सुशोभनम् ॥ -शिवपुराण रुद्रसंहिता कुमारखंड 19/39-42 अर्थात् जो पुत्र माता-पिता की पूजा करके उनकी प्रदक्षिणा करता है, उसे पृथ्वी परिक्रमाजनित फल सुलभ हो जाता है। जो माता-पिता को घर पर छोड़कर तीर्थयात्रा के लिए जाता है, वह माता-पिता की हत्या से मिलने वाले पाप का भागी होता है, क्योंकि पुत्र के लिए माता-पिता के चरण-सरोज ही महान तीर्थ हैं। अन्य तीर्थ तो दूर जाने पर प्राप्त होते हैं, परंतु धर्म का साधन भूत यह तीर्थ तो पास में ही सुलभ है। पुत्र के लिए (माता-पिता) और स्त्री के लिए (पति) सुंदर तीर्थ घर में ही वर्तमान है। शास्त्रों की इस प्रकार की आज्ञा पालन करने वाले पुत्र के रूप में श्रवण कुमार का नाम अमर है। भगवान् श्रीराम माता और पिता की आज्ञा मानकर ही एक आदर्श पुत्र के रूप में चौदह वर्ष तक वनवास में रहे। अतः शास्त्र और महापुरुषों के चरित्र से प्रेरणा लेकर संतान को सदैव माता-पिता की सेवा को ही सबसे ऊंचा स्थान देना चाहिए। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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🌺🌺राजा मोरध्वज की कथा🌺🌺 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद अर्जुन को वहम हो गया की वो श्रीकृष्ण के सर्वश्रेष्ठ भक्त है, अर्जुन सोचते की कन्हैया ने मेरा रथ चलाया, मेरे साथ रहे इसलिए में भगवान का सर्वश्रेष्ठ भक्त हूँ। अर्जुन को क्या पता था की वो केवल भगवान के धर्म की स्थापना का जरिया था। फिर भगवान ने उसका गर्व तोड़ने के लिए उसे एक परीक्षा का गवाह बनाने के लिए अपने साथ ले गए। श्रीकृष्ण और अर्जुन ने जोगियों का वेश बनाया और वन से एक शेर पकड़ा और पहुँच जाते है भगवान विष्णु के परम-भक्त राजा मोरध्वज के द्वार पर। राजा मोरध्वज बहुत ही दानी और आवभगत वाले थे अपने दर पे आये किसी को भी वो खाली हाथ और बिना भोज के जाने नहीं देते थे। दो साधु एक सिंह के साथ दर पर आये है ये जानकर राजा नंगे पांव दौड़के द्वार पर गए और भगवान के तेज से नतमस्तक हो आतिथ्य स्वीकार करने के लिए कहा। भगवान कृष्ण ने मोरध्वज से कहा की हम मेजबानी तब ही स्वीकार करेंगे जब राजा उनकी शर्त मानें, राजा ने जोश से कहा आप जो भी कहेंगे मैं तैयार हूँ। भगवान कृष्ण ने कहा, हम तो ब्राह्मण है कुछ भी खिला देना पर ये सिंह नरभक्षी है, तुम अगर अपने इकलौते बेटे को अपने हाथों से मारकर इसे खिला सको तो ही हम तुम्हारा आतिथ्य स्वीकार करेंगे। भगवान की शर्त सुन मोरध्वज के होश उड़ गए, फिर भी राजा अपना आतिथ्य-धर्म नहीं छोडना चाहता था। उसने भगवान से कहा प्रभु ! मुझे मंजूर है पर एक बार में अपनी पत्नी से पूछ लूँ । भगवान से आज्ञा पाकर राजा महल में गया तो राजा का उतरा हुआ मुख देख कर पतिव्रता रानी ने राजा से कारण पूछा। राजा ने जब सारा हाल बताया तो रानी के आँखों से अश्रु बह निकले। फिर भी वो अभिमान से राजा से बोली की आपकी आन पर मैं अपने सैंकड़ों पुत्र कुर्बान कर सकती हूँ। आप साधुओ को आदरपूर्वक अंदर ले आइये। अर्जुन ने भगवान से पूछा- माधव ! ये क्या माजरा है ? आप ने ये क्या मांग लिया ? कृष्ण बोले -अर्जुन तुम देखते जाओ और चुप रहो। राजा तीनो को अंदर ले आये और भोजन की तैयारी शुरू की। भगवान को छप्पन भोग परोसा गया पर अर्जुन के गले से उत्तर नहीं रहा था। राजा ने स्वयं जाकर पुत्र को तैयार किया। पुत्र भी तीन साल का था नाम था रतन कँवर, वो भी मात पिता का भक्त था, उसने भी हँसते हँसते अपने प्राण दे दिए परंतु उफ़ ना की । राजा रानी ने अपने हाथो में आरी लेकर पुत्र के दो टुकड़े किये और सिंह को परोस दिया। भगवान ने भोजन ग्रहण किया पर जब रानी ने पुत्र का आधा शरीर देखा तो वो आंसू रोक न पाई। भगवान इस बात पर गुस्सा हो गए की लड़के का एक फाड़ कैसे बच गया? भगवान रुष्ट होकर जाने लगे तो राजा रानी रुकने की मिन्नतें करने लगे। अर्जुन को अहसास हो गया था की भगवान मेरे ही गर्व को तोड़ने के लिए ये सब कर रहे है। वो स्वयं भगवान के पैरों में गिरकर विनती करने लगा और कहने लगा की आप ने मेरे झूठे मान को तोड़ दिया है। राजा रानी के बेटे को उनके ही हाथो से मरवा दिया और अब रूठ के जा रहे हो, ये उचित नही है। प्रभु ! मुझे माफ़ करो और भक्त का कल्याण करो। तब केशव ने अर्जुन का घमंड टूटा जान रानी से कहा की वो अपने पुत्र को आवाज दे। रानी ने सोचा पुत्र तो मर चुका है, अब इसका क्या मतलब !! पर साधुओं की आज्ञा मानकर उसने पुत्र रतन कंवर को आवाज लगाई। कुछ ही क्षणों में चमत्कार हो गया । मृत रतन कंवर जिसका शरीर शेर ने खा लिया था, वो हँसते हुए आकर अपनी माँ से लिपट गया। भगवान ने मोरध्वज और रानी को अपने विराट स्वरुप का दर्शन कराया। पूरे दरबार में वासुदेव कृष्ण की जय जय कार गूंजने लगी। भगवान के दर्शन पाकर अपनी भक्ति सार्थक जान मोरध्वज की ऑंखें भर आई और वो बुरी तरह बिलखने लगे। भगवान ने वरदान मांगने को कहा तो राजा रानी ने कहा भगवान एक ही वर दो की अपने भक्त की ऐसी कठोर परीक्षा न ले, जैसी आप ने हमारी ली है। तथास्तु कहकर भगवान ने उसको आशीर्वाद दिया और पूरे परिवार को मोक्ष दिया। 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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महाभारत के अनसुने प्रसंग 〰️〰️🌸🌸🌸🌸〰〰 महाभारत की रचना महर्षि वेदव्यास ने की थी। यह पांचवें वेद शास्त्र के तौर पर जाना जाता है और हिन्दू संस्कृति की बहुमूल्य संपत्ति है। इसी महाकाव्य से भगवद् गीता का उद्गम हुआ है। भगवद् गीता में कुल एक लाख श्लोक हैं और इसलिए इसे शतसाहस्त्री-संहिता भी कहा जाता है। हम सभी महाभारत में पांडु के पांच पुत्रों और धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों के बीच की शत्रुता के बारे में जानते हैं। उनके बीच की इस शत्रुता ने चौसर के खेल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और इसके परिणामस्वरूप ही पांडव कौरवों से अपना राज्य एवं पत्नी द्रौपदी दोनों को हार गए थे। 13 वर्षों के वनवास के बाद, जब पांडव वापस आए तो दुर्योधन ने उन्हें उनकी आधी जमीन वापस करने से इनकार कर दिया, जिसकी वजह से उनके बीच में कुरुक्षेत्र का युद्ध हुआ। इस युद्ध में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को नैतिकता का पाठ पढ़ाया जिसे भगवद् गीता भी कहते हैं। इस युद्ध को जीतने के बाद पांडव अपने परिवारजनों की हत्या के अपराधबोध से ग्रस्त हो गए थे और ध्रुवीय पहाड़ों की महान यात्रा पर निकल पड़े थे। इस यात्रा के दौरान स्वर्ग का द्वार बनाने वाले युधिष्ठिर का देहांत हो गया था। नीचे महाभारत से संबंधित कुछ अज्ञात तथ्य दिए जा रहे हैं। इनमें से ज्यादातर के बारे में हम में से किसी को जानकारी नहीं है– 1. महाभारत का संयोजन महर्षि वेद व्यास ने किया था और इसकी रचना भगवान गणेश जी ने इस शर्त पर की थी कि महर्षि वेद व्यास बिना एक भी बार रूके लिखे जाने वाले श्लोकों का लगातार उच्चारण करते रहेंगे। फिर वेदव्यास ने भी एक शर्त रखी कि वे श्लोकों का अर्थ समझने के साथ ही उसका उच्चारण करेंगे लेकिन गणेश उन्हें अपने दिमाग में व्याख्या किए बिना नहीं लिखेंगे। इसलिए, इस तरीके से पूरे महाकाव्य में कभी– कभी वेदव्यास कठिन श्लोकों का उच्चारण करते जिसे समझने में गणेश को वक्त लग जाता और उसी समय वेदव्यास थोड़ा विश्राम कर लेते थे। 2. वेदव्यास नाम नहीं है बल्कि एक पद है जिसे वेदों की जानकारी रखने वाले व्यक्तियों को दिया जाता है। कृष्णद्विपायन से पहले 27 वेदव्यास थे और कृष्णद्विपायन 28वें वेदव्यास हुए , भगवान कृष्ण के रंग जैसे श्याम वर्ण और द्वीप पर जन्म लेने की वजह से उन्हें यह नाम दिया गया था। 3. अजीब, लेकिन सच है कि व्याघ गीता, अष्टावक्र गीता, पराशर गीता आदि जैसी 10 अन्य गीताएं भी हैं। हालांकि श्री भगवद् गीता, भगवान कृष्ण द्वारा दी गई जानकारी वाली शुद्ध और पूर्ण गीता है। 4. वैश्यमपायन, वेदव्यास के शिष्य, ने राजा जन्मेजय के दरबार में पहली बार महाभारत का पाठ किया था। जन्मेजय अभिमन्यु के पौत्र और परीक्षित के पुत्र थे। अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए उन्होंने कई सर्पयज्ञ (सापों की आहुति) किए थे। 5. शांतनु, भीष्म पीतामह के पिता थे। इनका विवाह गंगा से हुआ था। अपने अगले जन्म में शांतनु राजा महाभिष थे, वे ब्रह्मा की सेवा करने गए जहां उन्होंने गंगा को देखा और उनकी तरफ आकर्षित हो गए। इसी बीच ब्रह्मा ने उन्हें श्राप दे दिया और नरक में जाने को कहा, जिसकी वजह से अपने अगले जन्म में वे राजा प्रतीप के पुत्र शांतनु के रूप में पृथ्वी पर आए और गंगा से विवाह किया लेकिन गंगा ने शांतनु से वचन लिया कि वे कभी भी उनसे कोई भी प्रश्न नहीं पूछेंगे। शांतनु इस बात पर सहमत हो गए। उन्हें 8 बच्चे हुए और पहले 7 बच्चों को गंगा ने नदी में डुबा दिया, उन्होंने कभी कोई प्रश्न नहीं पूछा लेकिन जब गंगा अपने आठवें बच्चे को डुबो रही थी, वे क्रोध से भर उठे और गंगा से इसकी वजह पूछी। तब गंगा ने उनसे उनके पिछले जन्म और भगवान ब्रह्मा के श्राप के बारे में बताया। इसके बाद वह उनके आठवें बच्चे के साथ चली गई। 6. धर्म ग्रंथों के अनुसार 33 मुख्य भगवान हैं और उनमें से एक हैं अष्ट वसु जिनका जन्म शांतनु और गंगा के पुत्र के रूप में हुआ था। उनकी आठवीं संतान भीष्म थी। 7. शांतनु का दूसरा विवाह निषाद की पुत्री सत्यवती से हुआ और उससे उनके दो बच्चे– चित्रांगद और विचित्रवीर्य हुए। एक युद्ध में चित्रांगद की मृत्यु हो गई और विचित्रवीर्य राजा बने जिसने काशी की राजकुमारी अम्बिका और अम्बालिका से विवाह किया। 8. महाभारत में विदुर यमराज के अवतार थे। ये धर्म शास्त्र और अर्थशास्त्र के महान ज्ञाता थे। ऋषि मंदव्य के श्राप की वजह से उन्हें मनुष्य योनी में जन्म लेना पड़ा था। 9. कुंती ने अपने बचपन में ऋषि दुर्वासा की सेवा की थी। वे कुंती की सेवा से प्रसन्न हुए और उसे एक चमत्कारी मंत्र बताया, इस मंत्र के माध्यम से कुंती किसी भी भगवान से बच्चा मांग सकती थी। इसलिए, विवाह के पहले कुंती ने सूर्य देव से शिशु की मांग की और कर्ण का जन्म हुआ। 10. ऋषि किंदम की श्राप की वजह से पांडु ने साम्राज्य छोड़ दिया था और संन्यासी बन गए थे। कुंती और मादरी भी उनके साथ वन में रहने लगीं। यहां दुर्वासा के मंत्र से धर्मराज युधिष्ठिर का जन्म हुआ। इसी प्रकार वायुदेव से भीम, इंद्र से अर्जुन का जन्म हुआ। कुंती ने यह मंत्र मादरी को बताया और सहदेव का जन्म हुआ। 11. इसके बाद उसके घी से भरे घड़ों को दो वर्षों तक रखा और पहले घड़े से दुर्योधन का जन्म हुआ और उसी दिन भीम और फिर बाकियों का। जन्म के बाद दुर्योधन गधे के जैसे रोने लगा और इसी वजह से गिद्ध और कौवे शोर मचाने लगे। विधुर ने धृतराष्ट्र को कहा कि वे दुर्योधन को मार डालें क्योंकि वे उनके परिवार का नाश कर देगा लेकिन अपने बच्चे से प्रेम ने उन्हें ऐसा करने नहीं दिया। दुर्योधन का वास्तविक नाम सुयोधन था। 12. हम सभी जानते हैं कि महाभारत में, दुर्योधन ने चौसर का खेल जीता और युधिष्ठिर से द्रौपदी को दुर्योधन की बाईं जंघा पर बैठने को कहने के लिए कहा। इसी वजह से वह खलनायक के रूप में जाना गया। लेकिन उस समय, पत्नी को पुरुष के बाईं जंघा या बाईं तरफ और पुत्रियों को दाईं जंघा या दाईं तरफ रखा जाता था। 13. आमतौर पर लोग छह–पक्षीय पासे के बारे में जानते हैं। अजीब बात यह है कि जिस पासे से शकुनी ने पांडवों को चौसर के खेल में हराया था, उसके चार ही पक्ष थे और वे पासे किस चीज से बने थे, इसके बारे में किसी को पता नहीं था। 14. कहा जाता है कि महाभारत धर्म के बारे में शिक्षा देता है और कई लोग इसे सत्य और झूठ से जोड़ कर भी देखते हैं लेकिन महाभारत में कहीं भी, किसी भी उदाहरण में, सत्य या झूठ को परिभाषित नहीं किया गया है। महाभारत का प्रत्येक कार्य उसके पात्रों की वर्तमान स्थिति पर निर्भर करता है। 15. भविष्यवाणी करने के लिए ज्योतिषि नक्षत्रों पर निर्भर रहते थे क्योंकि महाभारत युग में कोई राशि चिह्न नहीं था। नक्षत्रों में रोहिणी पहले स्थान पर था न कि अश्विनी। कुमारी कंदम की अनकही कहानी: हिंद महासागर में मानव सभ्यता का उद्गम स्थल 16. क्या आप जानते हैं कि महाभारत के युद्ध में विदेशी भी शामिल थे। वास्तविक युद्ध सिर्फ पांडवों और कौरवों के बीच नहीं था बल्कि रोम और यमन की सेना भी इसका हिस्सा थी । 17. अभिमन्यु की मौत के लिए चक्रव्यूह की रचना करने वाले सात महारथियों को उसकी मौत का कारण माना जाता है लेकिन यह पूर्ण सत्य नहीं है। अभिमन्यु ने दुर्योधन के पुत्र की हत्या की थी, जो सात महारथियों में से एक था। इसी बात से नाराज हो कर दुशासन ने अभिमन्यु का वध कर दिया था। 18. क्या आप जानते हैं कि इंद्रलोक की अप्सरा उर्वशी ने अर्जुन को श्राप दिया था, क्योकि वह उर्वशी को 'मां' कहकर बुला रहा था जिसपर उर्वशी को गुस्सा आया और उसे श्राप दिया कि वह एक हिजड़ा बन जाएगा। इस पर भगवान इंद्र ने अर्जुन से कहा कि यह श्राप एक वर्ष के अज्ञातवास के दौरान तुम्हारे लिए वरदान बन जाएगा और उस अवधि के समाप्त होने पर वह फिर से अपना पुरुषत्व प्राप्त कर लेगा। वन में 12 वर्ष बिताने के बाद पांडवों ने 13वां वर्ष राजा विराट के दरबार में निर्वासन में बिताया। अर्जुन ने अपने श्राप का प्रयोग किया और ब्रिहन्नला नाम के हिजड़े के रुप में वहां रहा। 19. भगवान कृष्ण ने अर्जुन को उसके अधूरे वरदान के बारे में याद दिलाया था यानि जब अर्जुन ने वन में प्रवास के दौरान दुर्योधन की जान बचाई थी तब दुर्योधन ने उससे वरदान मांगने के लिए कहा था और अर्जुन ने उपयुक्त समय आने पर मांगने की बात कही थी। इसलिए अर्जुन, दुर्योधन के पास गया और उससे भीष्म के मंत्रों से अभिमंत्रित पांच सुनहरे बाण मांग लिए। दुर्योधन ने इन बाणों से पांडवों की हत्या करने की घोषणा की थी। जब अर्जुन ने उन पांच सुनहरे बाणों की मांग की तब दुर्योधन भयभीत हो गया लेकिन उसने वचन दिया था, इसलिए उसे बाण देने पड़े। फिर जब अगली सुबह वह भीष्म के पास गया और उनसे पांच सुनहरे बाण और मांगे तो वे हंसे और कहा कि अब ऐसा संभव नहीं है और कहा कि महाभारत के युद्ध में कल जो भी होगा वह बहुत पहले ही लिखा जा चुका है और कुछ भी बदला नहीं जा सकता। 20. महाभारत के युद्ध में भगवान कृष्ण ने हथियार न उठाने के अपने वचन को तोड़ा था। लेकिन जब उन्होंने देखा की अर्जुन, भीष्म की शक्तियों का सामना करने में समर्थ नहीं है, वह असहाय हो गया है, तब उन्होंने तत्काल रथ की लगाम छोड़ दी और युद्ध भूमि में कूद पड़े। उन्होंने रथ के पहियों में से एक को निकाल लिया और भीष्म की हत्या करने के लिए उनकी तरफ फेंका। अर्जुन ने कृष्ण को रोकने की कोशिश की लेकिन नाकाम रहा। 21. क्या आप जानते हैं कि भगवान कृष्ण ने कौरवों की बजाए पांडवों का साथ क्यों दिया। वास्तव में, अर्जुन और दुर्योधन दोनों ही कृष्ण के पास उनकी मदद मांगने के लिए गए थे। वे उनके कक्ष में पहुंचे। दुर्योधन उनके कक्ष में पहले पहुंचा था और वह कृष्ण के सिरहाने जाकर बैठ गया था। अर्जुन, कृष्ण के पैरों के पास गया और हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। जब कृष्ण की नींद खुली तो उन्होंने अर्जुन को पहले देखा, मुस्कुराए और कहा कि वह उसका साथ देंगे। 22. महाभारत में, कौरवों की रक्षा जयद्रथ कर रहा था। पांडवों को चक्रव्यूह में प्रवेश करने से रोकने के लिए वह अपने वरदान का प्रयोग कर रहा था। जयद्रथ को भगवान शिव से वरदान प्राप्त था कि वह अर्जुन को छोड़कर बाकी पांडवों को युद्ध में एक दिन के लिए रोक सकता था । अर्जुन को भगवान कृष्ण का संरक्षण प्राप्त था इसलिए वह इस वरदान से बाहर रहा। लेकिन जब अर्जुन के पुत्र की चक्रव्यूह में हत्या हुई तब बाद में अर्जुन ने जयद्रथ को अपने बाण से मार डाला। 23. एकलव्य का पुनर्जन्म द्रौपदी के जुड़वा भाई धृष्टद्युम्न के रूप में हुआ था। रुक्मणी के अपहरण के दौरान कृष्ण ने उन्हें मार डाला था। इसलिए, गुरु दक्षिणा के तौर पर कृष्ण ने उन्हें पुनर्जन्म लेने और द्रोणा से बदला पूरा करने का वरदान दिया था। 24. दुर्योधन ने भगवद् गीता सुनने से यह कह कर मना कर दिया था कि वह सही और गलत के बारे में जानता है। उसने यह भी कहा कि कुछ शक्तियां हैं जो उसे सही मार्ग चुनने नहीं दे रहीं। अगर उसने कृष्ण की बातें सुनी होतीं, तो युद्ध टाला जा सकता था। 25. आश्चर्य की बात है, द्रौपदी देवी दुर्गा की अवतार थी। एक बार देर रात भीम ने द्रौपदी को मां दुर्गा के रूप में देखा, वह भीम से खाली कटोरे में भीम का खून मांग रही थी, मृत्यु से डरा हुआ , उसने यह पूरी कहानी अपनी मां– कुंती को सुनाई। फिर उन्होंने द्रौपदी को भीम को कभी दुख न पहुंचाने के लिए कहा। नश्वर होने के नाते, द्रौपदी को वचन देना पड़ा और ऐसा करते समय वह अपने होंठ काट लेती है। कुंती अपने कपड़े के किनारे से उनके होठों पर लगे हुए खून को साफ करती है और वचन देती है कि भीम उसके लिए कटोरा भरेगा। 〰️〰️🌸〰〰🌸〰〰🌸〰〰🌸〰〰🌸〰〰

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