🌹जय भास्कर भगवान की🌹 🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻 Good morning everyone 🌞🌹🌞🌹 Have a nice day 🌹💐🌹💐 Happy Sunday ❣️🌼❣️🌼❣️🌼 एक प्रश्न जिसके उत्तर देने में ८ पीढ़ियाँ असफल रही - कक्षीवान एवं प्रियमेघ की कथा!!!!!! पौराणिक काल में एक विद्वान ऋषि कक्षीवान हुए जो हर प्रकार के शास्त्र और वेद में निपुर्ण थे। एक बार वे ऋषि प्रियमेध से मिलने गए जो उनके सामान ही विद्वान और सभी शास्त्रों के ज्ञाता थे। दोनों सहपाठी भी थे और जब भी वे दोनों मिलते तो दोनों के बीच एक लम्बा शास्त्रार्थ होता था जिसमे कभी कक्षीवान तो कभी प्रियमेघ विजय होते थे। उस दिन भी ऋषि कक्षीवान ने प्रियमेध से शास्त्रार्थ में एक प्रश्न पूछा कि ऐसी कौन सी चीज है जिसे यदि जलाये तो उस से ताप तो उत्पन्न हो किन्तु तनिक भी प्रकाश ना फैले? प्रियमेध ने बहुत सोच-विचार किया परन्तु वे इस पहेली के उत्तर दे पाने असमर्थ रहे। उन्होंने उसका उत्तर बाद में देने की बात कही पर उत्तर ढूढ़ने के उधेड़बुन में उनकी जिंदगी बीत गयी। चाहे कैसा भी पदार्थ हो पर जलाने पर वो थोड़ा प्रकाश तो करता ही है। जब प्रियमेध ऋषि का अंत समय नजदीक आया तो उन्होंने कक्षीवान ऋषि को संदेश भेजा की मैं आपकी पहेली का उत्तर ढूंढ पाने में असमर्थ रहा किन्तु मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे वंश में ऐसा विद्वान जरूर जन्म लेगा जो आपके इस प्रश्न का उत्तर दे पायेगा। किन्तु तुम मुझे वचन दो कि जब तक कोई मेरे कुल का विद्वान तुम्हारे प्रश्न का उत्तर ना दे दे, तुम इस पृथ्वी को छोड़ कर नहीं जाओगे। ऐसा कहकर उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। कक्षीवान को उनकी मृत्यु का बड़ा दुःख हुआ किन्तु उससे भी अधिक दुःख उन्हें इस बात का हुआ कि उनके प्रश्न के कारण प्रियमेघ ने असंतोष में प्राण त्यागे। प्रियमेघ की मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र ने इस प्रश्न के उत्तर का दायित्व लिया किन्तु वो भी वह इस प्रश्न का उत्तर ढूढ़ पाने में असमर्थ रहा और एक दिन उसकी भी मृत्यु हो गयी। इसी प्रकार एक के बाद एक प्रियमेघ की आठ पीढ़ियाँ कक्षीवान के उस प्रश्न के उत्तर को ढूढ़ने के प्रयास में काल के गाल में समा गयीं। कक्षीवान अपने पहेली का हल पाने के लिए जिन्दा रहे। कक्षीवान को वरदान स्वरुप देवराज इंद्र से एक थैली मिली थी जो नेवले के चमड़े से बनी थी। उसमे चावल के दानें भरे थे और उन्हें वरदान था कि जब तक चावल के दानें समाप्त ना हो जाएँ, वे जीवित रहेंगे। प्रत्येक वर्ष वे उसमे से एक दाना निकालकर फेक देते थे और अपने प्रश्न के उत्तर के लिए जिए जा रहे थे। प्रियमेघ की नवीं पीढ़ी में साकमश्व नाम का बालक पैदा हुआ जो बचपन से ही बहुत विद्वान था। बालपन में ही उसने असंख्य शास्त्राथों में भाग लिया था और सदैव विजय रहा था। साकमश्व जब बड़ा हुआ तो उसे एक बात चुभने लगी की एक पहेली का उत्तर उसकी पूरी ८ पीढ़िया देने में असमर्थ रही हैं और ऋषि कक्षीवान अपने प्रश्न का उत्तर पाने के लिए ही जीवित हैं। उसने निश्चय किया की वह इस प्रश्न का उत्तर ढूँढ कर अपने परिवार के कलंक को मिटाएगा और ऋषि कक्षीवान को इस जीवन चक्र से मुक्त करवाएगा। एक दिन वो इस प्रश्न के विषय में सोच रहा था कि उसे सामवेद का एक श्लोक याद आया और वो भाव-विभोर होकर उसे मधुर स्वर में गाने लगा। इसी के साथ ही उसे अपने प्रश्न का उत्तर भी मिल गया। वह तुरंत कक्षीवान के आश्रम की ओर भागा और वहाँ पहुँच कर उन्हें प्रणाम किया। कक्षीवान उसे देखते ही जान गए की उन्हें आज उनके प्रश्न का उत्तर मिल जायेगा। साकमश्व ने कहा कि हे गुरुदेव, जो मनुष्य ऋग्वेद की ऋचा के बाद सामवेद का साम का भी गायन करता हो वो गायन उस अग्नि के सामान होता है जिससे ताप भी उत्पन्न होता है और प्रकाश भी। किन्तु जो मनुष्य केवल ऋग्वेद की ऋचा गाता है, सामवेद का साम नही, वह गायन साक्षात अग्नि के समान ही है किन्तु ये वो अग्नि है जिससे ताप तो उत्पन्न होता है किन्तु प्रकाश नहीं। साकमश्व का उत्तर सुनकर कक्षीवान की आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने भरे स्वर में कहा कि "हे पुत्र! तुम धन्य हो। मेरे द्वारा अनजाने में पूछे गए एक प्रश्न ने मेरे प्रिय मित्र प्रियमेघ को मुझसे छीन लिया। ये नहीं, उसकी अनेक पीढ़ियों को भी मैं अपने सामने काल के गाल में समाते देखता रहा। किन्तु आज तुमने इस प्रश्न का उत्तर देकर ना केवल अपने पूर्वजों का कल्याण किया बल्कि मुझे भी इस जीवन रूपी चक्र से मुक्त कर दिया।" ऐसा कह कर उन्होंने साकमश्व को अपनी थैली दी और कहा कि वो बचे हुए चावल के दाने बिखरा दे ताकि वे परलोक गमन कर सकें। उनकी आज्ञा पाकर साकमश्व ने सारे चावल के दानों को पृथ्वी पर फेंक दिया और फिर कक्षीवान ने अपने शरीर का त्याग कर दिया।

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💐🌹💐🌹 जय श्री राम🌹💐🌹💐 🌾🚩🌾🚩🌾🚩🌾🚩🌾🚩🌾🚩 🌹🚩🌹जय पवन पुत्र बजरंगबली की🌹🚩🌹 Good morning everyone 👋🌞👋🌞 Have a nice day 🌹💐🌹💐 Happy Saturday ❣️🌼❣️🌼 द्रोणागिरि पर्वत यहां वर्जित है हनुमान जी की पूजा हम सब जानते है हनुमान जी हिन्दुओं के प्रमुख आराध्य देवों में से एक है, और सम्पूर्ण भारत में इनकी पूजा की जाती है। लेकिन बहुत काम लोग जानते है की हमारे भारत में ही एक जगह ऐसी है जहां हनुमान जी की पूजा नहीं की जाती है। ऐसा इसलिए क्योंकि यहाँ के रहवासी हनुमान जी द्वारा किए गए एक काम से आज तक नाराज़ हैं। यह जगह है उत्तराखंड स्तिथ द्रोणागिरि गांव। द्रोणागिरि गांव द्रोणागिरि गांव उत्तराखंड के सीमांत जनपद चमोली के जोशीमठ प्रखण्ड में जोशीमठ नीति मार्ग पर है। यह गांव लगभग 14000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां के लोगों का मानना है कि हनुमानजी जिस पर्वत को संजीवनी बूटी के लिए उठाकर ले गए थे, वह यहीं स्थित था। चूंकि द्रोणागिरि के लोग उस पर्वत की पूजा करते थे, इसलिए वे हनुमानजी द्वारा पर्वत उठा ले जाने से नाराज हो गए। यही कारण है कि आज भी यहां हनुमानजी की पूजा नहीं होती। यहां तक कि इस गांव में लाल रंग का झंडा लगाने पर पाबंदी है। द्रोणागिरि गांव के निवासियों के अनुसार ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ द्रोणागिरि गांव के निवासियों के अनुसार जब हनुमान बूटी लेने के लिये इस गांव में पहुंचे तो वे भ्रम में पड़ गए। उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था कि किस पर्वत पर संजीवनी बूटी हो सकती है। तब गांव में उन्हें एक वृद्ध महिला दिखाई दी। उन्होंने पूछा कि संजीवनी बूटी किस पर्वत पर होगी? वृद्धा ने द्रोणागिरि पर्वत की तरफ इशारा किया। हनुमान उड़कर पर्वत पर गये पर बूटी कहां होगी यह पता न कर सके। वे फिर गांव में उतरे और वृद्धा से बूटीवाली जगह पूछने लगे। जब वृद्धा ने बूटीवाला पर्वत दिखाया तो हनुमान ने उस पर्वत के काफी बड़े हिस्से को तोड़ा और पर्वत को लेकर उड़ते बने। बताते हैं कि जिस वृद्धा ने हनुमान की मदद की थी उसका सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया। आज भी इस गांव के आराध्य देव पर्वत की विशेष पूजा पर लोग महिलाओं के हाथ का दिया नहीं खाते हैं और न ही महिलायें इस पूजा में मुखर होकर भाग लेती हैं। इस घटना से जुड़ा प्रसंग ~~~~~~~~~~~~~~~~ यूँ तो राम के जीवन पर अनेकों रामायण लिखी गई है पर इनमे से दो प्रमुख है एक तो वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण और एक तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस। इनमे से जहाँ वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण को सबसे प्रामाणिक ग्रन्थ माना जाता है वही तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस सबसे अधिक पढ़ा जाता है। पर जैसा की हमने हमारे एक पिछले लेख में आप सब को बताया था की रामायण और रामचरितमानस में कई घटनाओं में, कई प्रसंगो में अंतर है। ऐसा ही कुछ अंतर दोनों किताबों में इस प्रसंग के संबंध में भी है। यहाँ हम आपको दोनों किताबो में वर्णित प्रसंग के बारे में बता रहे है। वाल्मीकि रचित रामायण के अनुसार ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ हनुमानजी द्वारा पर्वत उठाकर ले जाने का प्रसंग वाल्मीकि रामायण के युद्ध कांड में मिलता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण के पुत्र मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र चलाकर श्रीराम व लक्ष्मण सहित समूची वानर सेना को घायल कर दिया। अत्यधिक घायल होने के कारण जब श्रीराम व लक्ष्मण बेहोश हो गए तो मेघनाद प्रसन्न होकर वहां से चला गया। उस ब्रह्मास्त्र ने दिन के चार भाग व्यतीत होते-होते 67 करोड़ वानरों को घायल कर दिया था। हनुमानजी, विभीषण आदि कुछ अन्य वीर ही उस ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से बच पाए थे। जब हनुमानजी घायल जांबवान के पास पहुंचे तो उन्होंने कहा - इस समय केवल तुम ही श्रीराम-लक्ष्मण और वानर सेना की रक्षा कर सकते हो। तुम शीघ्र ही हिमालय पर्वत पर जाओ और वहां से औषधियां लेकर आओ, जिससे कि श्रीराम-लक्ष्मण व वानर सेना पुन: स्वस्थ हो जाएं। जांबवान ने हनुमानजी से कहा कि- हिमालय पहुंचकर तुम्हें ऋषभ तथा कैलाश पर्वत दिखाई देंगे। उन दोनों के बीच में औषधियों का एक पर्वत है, जो बहुत चमकीला है। वहां तुम्हें चार औषधियां दिखाई देंगी, जिससे सभी दिशाएं प्रकाशित रहती हैं। उनके नाम मृतसंजीवनी, विशल्यकरणी, सुवर्णकरणी और संधानी है। हनुमान तुम तुरंत उन औषधियों को लेकर आओ, जिससे कि श्रीराम-लक्ष्मण व वानर सेना पुन: स्वस्थ हो जाएं। जांबवान की बात सुनकर हनुमानजी तुरंत आकाश मार्ग से औषधियां लेने उड़ चले। कुछ ही समय में हनुमानजी हिमालय पर्वत पर जा पहुंचे। वहां उन्होंने हनुमानजी ने अनेक महान ऋषियों के आश्रम देखे। हिमालय पहुंचकर हनुमानजी ने कैलाश तथा ऋषभ पर्वत के दर्शन भी किए। इसके बाद उनकी दृष्टि उस पर्वत पर पड़ी, जिस पर अनेक औषधियां चमक रही थीं। हनुमानजी उस पर्वत पर चढ़ गए और औषधियों की खोज करने लगे। उस पर्वत पर निवास करने वाली संपूर्ण महाऔषधियां यह जानकर कि कोई हमें लेने आया है, तत्काल अदृश्य हो गईं। यह देखकर हनुमानजी बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने वह पूरा पर्वत ही उखाड़ लिया, जिस पर औषधियां थीं। कुछ ही समय में हनुमान उस स्थान पर पहुंच गए, जहां श्रीराम-लक्ष्मण व वानर सेना बेहोश थी। हनुमानजी को देखकर श्रीराम की सेना में पुन: उत्साह का संचार हो गया। इसके बाद उन औषधियों की सुगंध से श्रीराम-लक्ष्मण व घायल वानर सेना पुन: स्वस्थ हो गई। उनके शरीर से बाण निकल गए और घाव भी भर गए। इसके बाद हनुमानजी उस पर्वत को पुन: वहीं रख आए, जहां से लेकर आए थे। लेकिन रामचरितमानस में कुछ अन्य प्रसंग है। ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ तुलसीदास रचित रामचरितमानस के अनुसार ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ गोस्वामी तुलसीदास द्वारा चरित श्रीरामचरितमानस के अनुसार रावण के पुत्र मेघनाद व लक्ष्मण के बीच जब भयंकर युद्ध हो रहा था, उस समय मेघनाद ने वीरघातिनी शक्ति चलाकर लक्ष्मण को बेहोश कर दिया। हनुमानजी उसी अवस्था में लक्ष्मण को लेकर श्रीराम के पास आए। लक्ष्मण को इस अवस्था में देखकर श्रीराम बहुत दु:खी हुए। तब जांबवान ने हनुमानजी से कहा कि लंका में सुषेण वैद्य रहता है, तुम उसे यहां ले आओ। हनुमानजी ने ऐसा ही किया। सुषेण वैद्य ने हनुमानजी को उस पर्वत और औषधि का नाम बताया और हनुमानजी से उसे लाने के लिए कहा, जिससे कि लक्ष्मण पुन: स्वस्थ हो जाएं। हनुमानजी तुरंत उस औषधि को लाने चल पड़े। जब रावण को यह बात पता चली तो उसने हनुमानजी को रोकने के लिए कालनेमि दैत्य को भेजा। कालनेमि दैत्य ने रूप बदलकर हनुमानजी को रोकने का प्रयास किया, लेकिन हनुमानजी उसे पहचान गए और उसका वध कर दिया। इसके बाद हनुमानजी तुरंत औषधि वाले पर्वत पर पहुंच गए, लेकिन औषधि पहचान न पाने के कारण उन्होंने पूरा पर्वत ही उठा लिया और आकाश मार्ग से उड़ चले। अयोध्या के ऊपर से गुजरते समय भरत को लगा कि कोई राक्षस पहाड़ उठा कर ले जा रहा है। यह सोचकर उन्होंने हनुमानजी पर बाण चला दिया। हनुमानजी श्रीराम का नाम लेते हुए नीचे आ गिरे। हनुमानजी के मुख से पूरी बात जानकर भरत को बहुत दु:ख हुआ। इसके बाद हनुमानजी पुन: श्रीराम के पास आने के लिए उड़ चले। कुछ ही देर में हनुमान श्रीराम के पास आ गए। उन्हें देखते ही वानरों में हर्ष छा गया। सुषेण वैद्य ने औषधि पहचान कर तुरंत लक्ष्मण का उपचार किया, जिससे वे पुन: स्वस्थ हो गए। श्रीलंका में स्थित है संजीवनी बूटी वाला पर्वत जहां वाल्मीकि रचित रामायण के अनुसार हनुमान जी पर्वत को पुनः यथास्थान रख आए थे वही तुलसीदास रचित रामचरितमानस के अनुसार हनुमान जी पर्वत को वापस नहीं रख कर आए थे, उन्होंने उस पर्वत को वही लंका में ही छोड़ दिया था। श्रीलंका के सुदूर इलाके में श्रीपद नाम का एक पहाड़ है। मान्यता है कि यह वही पर्वत है, जिसे हनुमानजी संजीवनी बूटी के लिए उठाकर लंका ले गए थे। इस पर्वत को एडम्स पीक भी कहते हैं। यह पर्वत लगभग 2200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। श्रीलंकाई लोग इसे रहुमाशाला कांडा कहते हैं। इस पहाड़ पर एक मंदिर भी बना है।

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विजय दशमी की हार्दिक शुभकामनाएं 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 मंगलमय शुभ रात्रि विश्राम भाई-बहनों, दशहरा दस इन्द्रियों पर विजय का पर्व है, यह असत्य पर सत्य का विजय पर्व है, बहिर्मुखता पर अंतर्मुखता की विजय का पर्व है, अन्याय पर न्याय की विजय का पर्व है, दुराचार पर सदाचार की विजय का पर्व है, तमोगुण पर दैवीगुण की विजय का पर्व हैं, दुष्कर्मों पर सत्कर्मों की विजय का पर्व है, भोग पर योग की विजय का पर्व है, असुरत्व पर देवत्व की विजय का पर्व है, जीवत्व पर शिवत्व की विजय का यह दशहरा पर्व है। दशहरा पर्व हमारे समाज व हमारे देश का महत्वपूर्ण धार्मिक त्योहार है जिसे माँ दुर्गाजी और भगवान् श्रीरामजी से जोडकर देखा जाता है, दशहरा त्‍यौहार को मानने के संदर्भ में अास्‍था ये है कि माँ दुर्गा ने महिषासूर से लगातार नौ दिनो तक युद्ध करके दशहरे के दिन ही महिषासुर का वध किया था, इसलिये नवरात्रि के बाद इसे दुर्गा के नौ शक्ति रूप के विजय-दिवस के रूप में विजया-दशमी के नाम से मनाते हैं। जबकि भगवान् श्रीरामजी ने नौ दिनो तक रावण के साथ युद्ध करके दसवें दिन ही रावण का वध किया था, इसलिये इस दिन को भगवान् श्रीरामजी के संदर्भ में भी विजय-दशमी के रूप में मनाते हैं, साथ ही इस दिन रावण का वध हुआ था, जिसके दस सिर थे, इसलिये आज के दिन को "दशहरा" यानी दस सिर वाले के प्राण हरण होने वाले दिन के रूप में भी मनाया जाता है। हमारे सनातन धर्म में दशहरा यानी विजय-दशमी एक ऐसा त्‍योहार है जो आज ही के दिन क्षत्रिय शस्‍त्र-पूजा करते हैं, जबकि ब्राम्‍हण शास्‍त्र-पूजा करते हैं, पुराने समय में राजा-महाराजा जब किसी दूसरे राज्‍य पर आक्रमण कर उस पर कब्‍जा करना चाहते थे, तो वे आक्रमण के लिए आज ही के दिन का चुनाव करते थे, जबकि ब्राम्‍हण विद्यार्जन के लिये गुरूकूलों में प्रस्‍थान करने हेतु आज ही के दिन का चुनाव करते थे। सज्जनों! हिन्‍दु धर्म की मान्‍यतानुसार आज दशहरा पर्व के दिन जो भी काम किया जाता है, उसमें विजय यानी सफलता प्राप्‍त होती है, और इसी मान्‍यता के कारण ही व्‍यापारी भाई किसी नये व्‍यापार या प्रतिष्‍ठान का उद्घाटन करने या शुरूआत करने के लिये आज के दिन को उतना ही महत्‍व देते हैं, जितना दिपावली के बाद लाभ पंचमी अथवा दिपावली से पहले धनतेरस को देते हैं। विजय-दशमी के इस दिन सामान्‍यत: बुराइ पर अच्‍छाई की विजय के प्रतीक के रूप में रावण के पुतले का दहन किया जाता है, और रावण दहन के बाद जब लोग घर लौटते हैं, तो सामान्‍यत: शमी के पत्‍तों को भी अपने घर लेकर आते है, जो कि इस अास्‍था का प्रतीक है कि शमी के पत्‍तों को घर लाने से घर में स्‍वर्ण का आगमन होता है। शमी के पत्‍तों को घर लानें के संदर्भ में एक पौराणिक कथा है, कि एक बार एक राजा ने अपने राज्‍य में एक मंदिर बनवाया और उस मंदिर में भगवान् की प्राण-प्रतिष्‍ठा कर भगवान की स्‍थापना करने के लिये ए‍क ब्राम्‍हाण को बुलाया, प्राण-प्रतिष्‍ठा कर भगवान् की स्‍थापना करने के बाद राजा ने ब्राम्‍हान से पूछा कि हे ब्रम्‍हान देव! आपको दक्षिणा के रूप में क्‍या दूँ? तब ब्राह्मण ने कहा कि हे राजन! मुझे एक लाख स्‍वर्ण मुद्रा चाहिये, ब्राह्मण की दक्षिणा सुनकर राजा को बडी चिंता हुई, क्‍योंकि राजा के पास देने के लिए इतनी स्‍वर्ण मुद्रायें नहीं थीं, और ब्राह्मण को उसकी मांगी गई दक्षिणा दिये बिना विदा करना भी ठीक नहीं था, इसलिये राजा ने ब्राह्मण को उस दिन विदा नहीं किया, बल्कि अपने मेहमान भवन में ही रात ठहरने की व्‍यवस्‍था कर दी। राजा ब्राह्मण की दक्षिणा देने के संदर्भ में स्‍वयं काफी चिन्‍ता में था, कि आखिर वह किस प्रकार से ब्राह्मण की दक्षिणा पूरी करे, यही सोंचते-सोंचते व भगवान् से प्रार्थना करते-करते राजा की आँख लग गई और जैसे ही राजा की आँख लगी, तभी राजा को एक स्‍वपन आया जिसमें भगवान् प्रकट होकर उसे कहते हैं कि तुम अभी उठो और जाकर जितने हो सकें उतने शमी वृक्ष के पत्‍ते अपने घर ले आओ, तुम्‍हारी समस्‍या का समाधान हो जायेगा। इतना कहकर भगवान् अन्‍तर्ध्‍यान हो गए और अचानक ही राजा की नींद खुल गई, राजा को स्‍वप्‍न पर ज्‍यादा विश्‍वास तो नहीं हुआ, लेकिन फिर भी राजा ने सोंचा कि शमी के पत्‍ते लाने में बुराई ही क्‍या है, सो राजा स्‍वप्‍नानुसार रात ही में स्वयं जाकर ढेर सारे शमी वृक्ष के पत्‍ते ले आया, जब सुबह हुई तो राजा ने देखा कि वे सभी शमी के पत्‍ते, स्‍वर्ण के पत्‍ते बन गये थे, राजा ने उन स्‍वर्ण के पत्‍तों से ब्राह्मण की दक्षिणा पूरी कर उसे विदा किया। सज्जनों, जिस दिन राजा शमी के पत्‍ते अपने घर लाया था, उस दिन विजय-दशमी‌ ही थी, इसलिए तभी से ये मान्‍यता हो गई कि विजय-दशमी की रात शमी के पत्‍ते घर लाने से घर में सोने का आगमन होता है, दोस्तों! आज दशहरा पर्व हैं, और कुछ ही दिनों में दिपावली का महापर्व का आगमन होने वाला हैं इन तयोहारों में आप सावधान और सजग रहें, असावधानी और लापरवाही से मनुष्य बहुत कुछ खो बैठता है, विजयादशमी और दीपावली के आगमन पर इस त्योहार का आनंद, ख़ुशी और उत्साह बनाये रखने के लिए सावधानीपूर्वक रहें। पटाखों के साथ खिलवाड़ न करें, उचित दूरी से पटाखे चलायें, आप देवी-देवताओं के फोटो वाले पटाखें न तो खरीदें और नाहीं फोड़े, इससे हमारे देवी-देवताओं का अपमान होता है, तथा मिठाइयों और पकवानों की शुद्धता, पवित्रता का ध्यान रखें, आजकल ज्यादा कमाने के चक्कर में कुछ लोग मिलावटी, या डुप्लिकेट मावा की मिठाईयां धड़ल्ले से दुकानों में बेच रहे है। ऐसे कुछ स्वार्थी व्यापारीयों से सजग व सावधान रहें, अगर ऐसे किसी व्यक्तिय या व्यापारी आप के नजर में है, तो आप एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते उन्हें बेनकाब करें और उसकी उस विभाग को शिकायत करें ताकि त्योहारों की पवित्रता बनी रहे, भारतीय संस्कृति के अनुसार त्योहारों को आदर्शों व सादगी से मनायें। पाश्चात्य जगत का अंधानुकरण ना करें, आप स्वदेशी वस्तु या सामान ही खरीदें एवम बेचे, ताकि अपना पैसा अपने देश में ही रहे, चायना या अन्य देशों की वस्तुओं का बहिष्कार कर आप स्वाभिमान भारतीय होने का परिचय दें, पटाखे घर से दूर चलायें और आस-पास के लोगों की असुविधा के प्रति सजग रहें, स्वच्छ्ता और पर्यावरण का ध्यान रखें, पटाखों से बच्चों को उचित दूरी बनाये रखने और सावधानि पूर्वक प्रयोग करने के लिये बाध्य करें। भाई-बहनों! विजयादशमी के पर्व की आप सभी को बहुत बहुत बधाई, भगवान् श्री रामचन्द्रजी एवम् माँ भगवती से आप सभीके जीवन में सौभाग्य तथा सुख संपन्नता प्रदान करने की मंगल कामना करता हूँ, आप सभी हमेशा खुश रहें, सुखी रहे, आप सभी के मंगलमय् जीवन की ढेरों शुभकामनायें, आज के पावनदिवस की पावन शुभ रात्रि आप सभी के लिये मंगलमय् हो। 🌹जय श्री रामजी🌹🙏

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विजय दशमी की हार्दिक शुभकामनाएं 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 शुभ रात्रि विश्राम🙏🌹🙏🌹 अहंकार का नाश - विजयादशमी आप सभी को विजयादशमी की शुभकामनाएं .. काम , क्रोध , मद , मोह , लोभ ओर मत्सर (अहंकार ) इस अवगुणों का त्याग करना और अपने जीवन को दिव्य बनाना ही है विजयादशमी उत्सव । " दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान | तुलसी दया न छांड़िए ,जब लग घटमे प्राण || अर्थ: गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं कि मनुष्य को दया कभी नहीं छोड़नी चाहिए क्योंकि दया ही धर्म का मूल है और इसके विपरीत अहंकार समस्त पापों की जड़ होता है| शारदीय नवरात्र वस्तुत: भगवान राम की शक्ति पूजा है। रावण के साथ युद्ध से पहले भगवान राम ने भी अपराजिता देवी का स्मरण किया था और उनकी पूजा की थी। अपराजिता देवी का पूजन के पीछे भाव यह है कि समस्त दिशाओं में हमारी विजय हो। राम की तरह हमारा चरित्र हो। राम जैसी शक्ति मिले। राम जैसी मर्यादा पर चलते हुए हम पुरुषोत्तम बनें। आसुरी प्रवृत्तियां हम पर हावी न हों। हम किसी का अहित न करें। किसी के साथ अन्याय न करें। अन्याय के आगे सिर न झुकाएं। समस्त दैवीय शक्तियों की एकीकृत देवी मां अपराजिता हमारा कल्याण करें। चूंकि इस दिन देवी की मूर्तियों का विसर्जन भी होता है और नवरात्र के पर्व का समापन भी, इसलिए राम की शक्ति पूजा के संदर्भ में अपराजिता देवी की पूजा होती है। विजयदशमी के दिन अवश्य करें अपराजिता पूजा कहने को शारदीय नवरात्र नौमी कोकन्या भोग के साथ संपन्न हो जाते हैं। लेकिन एसा है नहीं। असल में, शक्ति पर्व का समापन दशहरे के पूजनोपरांत ही संपन्न होता है। राम पूजन से पहले शक्ति पूजन अवश्य करना चाहिए। इस दिन देवी सूक्तम का पाठ समस्त ऋद्धि-सिद्धि प्रदान करता है। 1. अपराजिता देवी का पूजन अपराह्न को किया जाता है। 2. अष्टचक्र बनाएं या स्वास्तिक। 3. ऊं अपराजितायै नम: का जाप करें 4. ऊं क्रियाशक्तयै नम: और ऊं उमायै नम: का भी जाप करें ( 11 बार) 5. सरल उपाय यह है कि देवी कवच के साथ अर्गला स्तोत्र का पाठ कर लें । सतयुग से आजतक अनेक महान ऋषी मुनिओ ने अनेक उपासनाओं द्वारा विरल सिद्धिया प्राप्त की , अनेक साधको ने तंत्र और यंत्र से अलौकिक शक्तियां पायी ओर ब्रह्म ज्ञान प्राप्त कर ब्रह्ममे लीन हुवे पर आजतक पुलत्स्य ऋषि के कूलमे जिन्होंने जन्म धारण किया और महान सिद्धिया प्राप्त की वो पवीत्र ब्राह्मण ( रावण ) के समान कोई नही है । चारो वेद के ज्ञाता बनकर यज्ञ , याग , तंत्र , मंत्र , यंत्र , पूजा , अनुष्ठानों द्वारा ब्रह्मांड के हरेक देवी देवताओं को प्रसन्न कर अभेद शक्तियां प्राप्त कर रावण दिग्विजय कहलाया था । नवग्रह को पलंग से बांधा मतलब सभी ग्रह देवता , वीर , भैरव ,देवी देवताओं की उपासना कर सिद्ध किया था । महादेव की दिव्य उपासना से महादेव के प्रिय भक्त कहलाये ओर अनेक वरदान प्राप्त किये थे । शिवजी के मुखसे 64 तंत्र का ज्ञान सुनकर खुद रावण ने 65 वा तंत्र ( उडिश तंत्र ) की रचना की थी ऐसे ज्ञाता थे वो । पर एक अटल सत्य है कि सत्ता , सम्पति ओर शक्ति अगर विनम्रता नही हो तो अहंकार को जन्म देती है । यही हुवा रावण के साथ भी । अहंकार पैदा हुवा ओर ऋषिमुनि , साधक , ब्राह्मण को परास्त करने की धुनमें अनेक प्रकार के पापाचार किये और दिग्विजयी रावणका भगवान श्री राम के हाथ ध्वंश हुवा । हमारे मनमे अहम , क्रोध , ईर्ष्या , लोभ जैसे अवगुन पैदा होना ही रावण है । यहां कई लोग बिन बुलाए महाज्ञानी तर्क वितर्क करके खुद को ब्रह्मज्ञानी दिखाने सलाह देने लगते है ये अहंकार है ... घरमे कभी छोटे बच्चे या भाइयो ने सही किया हो फिरभी मैं बड़ा हु जानकार हु ये दिखाने अलग मत देने लगते है ये अहंकार है ... हर घरमे अपने ही परिवार जन , ज्ञातिजन की ईर्ष्या , निंदा करना शुरु हो जाता है ये अहंकार है .... अपने से अशक्त या छोटो पर क्रोध करना , अपशब्द कहना या अन्याय करना ये अहंकार है ... मन , वचन , वाणी से किया हरेक कर्म अवश्य ही फल देता है ये गीता का संदेश है । इस अवगुणों का त्याग करने केलिये सिर्फ विनम्र वाणी से शुरुआत की जाय तो उनके अद्भुत परिणाम देखने मिलते है । नम्र वाणी से जीवन के हरेक क्षेत्र परिवार , समाज , नॉकरी , व्यवसाय सभी जगह लोगो की प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है । हरेक लोग आपको सन्मान देने लगते है । हरेक क्षेत्रमे सफलता मिलने लगती है । विनम्रता के साथ दया , धर्म , सत्य , प्रेम जैसे सद्गुण स्वयम ही प्रकट हो जाते है । सिर्फ नम्रता का एक प्रयत्न जीवन परिवर्तन कर देता है । दया गुण को आत्मसात करना है तो हर दिन एक जीव पर दया करना , पहु , पक्षी , बालक , अशक्त , वृद्ध , याचक , साधक , ब्राह्मण , किसी भी एक जीव को प्रसन्न करो । जीवन प्रेम मय हो जाएगा । ये एक कर्म ही हरेक देवी देवता की प्रसन्नता का कारण बन जायेगा । रावण जैसे महान सिद्ध को जलाना वो हमारी ओकात भी नही है । बस हमारे अंदर के अवगुन स्वरूप रावण का त्याग करना वो विजया दशमी है । जय श्रीराम जय श्रीराम बोलने से कोई रामभक्त नही बन जाता । प्रभु राम के गुण आत्मसात करने का प्रयत्न ही प्रभु राम की प्रसन्नता प्राप्त करवा सकता है । अतुलित बलधाम हनुमानजी की विनम्रता ही प्रभु राम को प्रिय है ।

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विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏 आप और आपके पूरे परिवार को विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं शुभ रात्रि विश्राम🌹🙏🌹🙏 त्रेतायुग से आरम्भ रावणवध के स्मारकी-- विजया दशमी दशहरा : अच्छाई से बुराई को खत्म करने की दिव्य सन्देश युक्त सांस्कृतिक त्यौहार है विजया दशमी-- दशहरा, जिसका आरम्भ त्रेतायुग से है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम है-- अच्छाई की प्रतीक, जंहा बुराई की प्रतीक है-- असुरराज लंकपति रावण। इसीलिए त्रेतायुग से आरम्भ विजय- उत्सव स्वरूप विजया- दशमी में अच्छाई के द्वारा बुराई को जलाने की परंपरा है, जो इन्सानियत की आधार पर आर्य- संस्कृति की एक प्रतीकात्मक रूपकल्प सम्बलित विजय- सन्देश।। यंहा प्रश्न है कि त्रेता युग में जिस मास की तिथि में रावण वध हुआ था, इस से अलग एक समय में विजया दशमी मनाने की रहस्य क्या हो सकता है। रावण था विश्रवा ऋषि के पुत्र। इस कारण से ब्राह्मण सन्तान रावण को वध करना यदि ब्रह्महत्या दोषयुक्त, तो ऐसी धर्मसंकट में हर साल रावण को जलाना दोषप्रद है की नहीं?? दोनों प्रश्नों के उत्तर में कहा जा सकता है कि-- संहिता के अनुसार, जन्म से कोई भी इंसान ब्राह्मण होकर जन्म नहीं लेता; सिर्फ कर्मगुण से ही कोई ब्राह्मण बन सकता है। अतः एक ऋषि- पुत्र तथा ब्रह्मज्ञानी होने के साथ परम् शिवभक्त होते हुए भी अपवाद में प्रचंड अहंकारी तथा त्रिलोक में आसुरिक- संत्रास फैलाने वाला दुष्ट लंकपति रावण के लिए विजया- दशमी में दहनोत्सव पालन को ब्रह्महत्या- दोषप्रद कहकर टाल नहीं सकते। रही बात दूसरे माह में विज्योत्सव मनाने की तो, सिर्फ इतनी कहा जा सकता है कि-- अयोध्यावासी सब रावण वध होने की सम्बाद जानने के बाद ही प्रतीकात्मक रूप से रावण- दहन कर विजयोत्सव मनाये थे और इसी के पीछे कोई भ्रम या दूसरा कारण नहीं है।। प्रश्न-- ''रावण एक प्रकांड पंडित था ! उसने माता सीता को कभी छुआ नहीं ! अपनी बहन के अपमान के लिये पूरा कुल को दाँव पर लगा दिया ! तो रावण कंहा कैसे अन्याय किया !!" उत्तर-- "माता सीता को नहीं छूने का कारण उसकी अच्छाई प्रवृत्ति नहीं, बल्कि कुबेर के पुत्र “नलकुबेर” द्वारा दिया गया श्राप था कि, यदि काम- प्रवणता के साथ किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध छुआ, तो उसके सिर के टुकड़े- टुकड़े हो जायेंगे।।" प्रश्न-- ''रावण अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के लिये सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था, तो भाई की कर्त्तव्य निभाना कैसे अन्याय कहा जाए !!" उत्तर-- "रावण की बहन सूर्पणखा के पति विद्युतजिव्ह था राजा कालकेय का सेनापति। जब रावण तीनो लोकों पर विजय प्राप्त करने निकला, तो उसका युद्ध कालकेय से भी हुआ, जिसमें उसने बहनोई विद्युतजिव्ह का वध कर दिया। तब सूर्पणखा ने अपने ही भाई को श्राप दिया था कि, बहन के द्वारा ही भाई का सर्वनाश होगा। बहन को विधवा बनाते समय तो भाई का बहन के प्रति कर्त्तव्य ज्ञान नहीं रही, बाद में बहन को लगे अपमान की बदला लेने के लिए अपनी ब्राह्मणत्व तथा ब्रह्मज्ञान को भी भूल गया और पराई औरत को छल कर हरण किया। इसी से बढ़कर घोर अन्याय का प्रमाण और क्या हो सकता है !!" कहते है की रावण 'अजेय' होने के साथ 'महाज्ञानी' था। किन्तु प्रभु श्रीराम के अलावा उसे राजा बलि, वानरराज बाली, महिष्मति के राजा कार्तवीर्य अर्जुन और स्वयं भगवान शिव ने भी हराया था, तो पराजित को 'अजेय' कहना युक्ति सम्मत नहीं है। दूसरी बात ये है कि रावण महाज्ञानी था; लेकिन जो व्यक्ति अपने ज्ञान को यथार्थ जीवन में लागू ना करे, वही तो ज्ञान- विनाशकारी होता है।। रावण ने अनेक ऋषि- मुनियों का वध किया, अनेक यज्ञ ध्वंस किया, ना जाने कितनी स्त्रियों का अपहरण भी किया। यहाँ तक कि स्वर्गलोक की अप्सरा 'रंभा' को भी नहीं छोड़ा था। उल्लेखनीय है कि एक गरीब ब्राह्मणी 'वेदवती' के रूप से प्रलोभित होकर जब कामुक रावण उसे बालों से घसीट कर ले जाने की कोसिस किया, वेदवती ने आत्मदाह कर लिया और वो उसे श्राप दे गई कि उनका विनाश एक स्त्री के कारण ही होगा, जो बाद में हुआ था। इसीलिए रावण- वध के पीछे नारियों का श्राप था, जो अकाट्य प्रमाण है।। रावण कहता था-- "एकः ही अस्मिन द्वितीयो ना अस्ति न भूतो न भविष्यति।" अर्थात "मेरे जैसा मैं एक ही हूं, ना कोई भूतकाल में था, ना भविष्य में होगा।" इसीलिए अध्यात्म- दर्शन के दृष्टि में उसे श्रीराम ने नहीं मारा, उसे उसके इसी अहंकार ने ही मारा था, तो अहंकार पर आत्मसम्मान की विजय का पर्व ही शुभ और खुशहाल व्यंजक विजयदशमी है।। "विद्या विवादाए धनं मदाय, शक्ति परेशां परपीडनाय। खलस्य साधु विपरित्मेदय, ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय।" अर्थात-- "दुष्ट व्यक्ति को विद्या, धन और शक्ति मिलने पर वह सिर्फ विवाद, अहंकार और दुसरों की उत्पीडन के लिये ओ सब को प्रयोग करता है, जबकी साधु या सज्जन ज्ञान बांटने, दान करने एवं दुसरों की रक्षा के लिये करता है।" महाज्ञानी होकर भी रावण सिर्फ आसुरिक दुष्ट स्वभाव से अहंकारी बन गया था और विजया दशमी त्यौहार ऐसी आसुरिक दुष्टतापूर्ण अहंकार की विनाश- यज्ञ है। किन्तु ऐसे सिर्फ पुतले जलाने से बुराई की प्रतीक रावण नहीं मर सकता; सचमुच बुराई को जलाना है तो-- अच्छाई की प्रतीक राम को मन में जिंदा रखना चाहिए।। अधर्म पर धर्म की विजय, असत्य पर सत्य की विजय, बुराई पर अच्छाई की विजय, पाप पर पुण्य की विजय, अत्याचार पर सदाचार की विजय, क्रोध पर दया- क्षमा की विजय, अज्ञान पर ज्ञान की विजय-- ये सब है, रावण पर भगवान श्रीराम की विजय के प्रतीक विजयादशमी।।

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🙏🌹🙏🌹जय श्री राम🌹🙏🌹🙏 🌹🌱🌹🌱🌹🌱🌹🌱🌹🌱🌹 शांति अमन के इस देश से अब बुराई को मिटाना होगा आतंकी रावण का दहन करने के लिए आज फिर से राम को आना होगा आप और आपके पूरे परिवार को विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🌹🙏🌹 शुभ प्रभात वंदन🌹🙏 विजयदशमी की बहुत बहुत शुभकामनाएं दशहरा पर बीड़ा चबाने की परम्परा भी है। बीड़ा ताम्बूलवीटिका के घटक द्रव्य हैं सुपारी , इलायची, कत्था, कपूर। #पूग्येलाखदिराढ्यं_तु_ताम्बूलं। बाण ने कादम्बरी में कई बार ताम्बूलवीटिका का प्रयोग किया है। सिंहासनबत्तीसी में भी बीड़ा दिये जाने का वर्णन है। #दे_बीरा_रघुनाथ_पठाये ... बीड़ा पान ताम्बूल किसी कार्य को पूरा करने का संकल्प लेना - बीड़ा उठाना । "सुपारी लेना" का भाव वही जो बीड़ा उठाने का. सुपारी और पान का साथ सदा से ही है । देव पूजन में प्रयोग होता है । किसी सत्कर्म के उद्देश्य से ही पान, सुपारी का शगुन होता था । किन्तु आजकल हत्या करने जैसे जघन्य अपराध के लिये "सुपारी लेना" या देना का प्रचलन हो गया । शब्दों की यही विडम्बना है , काल के साथ अर्थ एवं भाव परिवर्तन हो जाता है । पान सुपारी खाये जाने का चलन बहुत पुराना है, आज भी लोग एक बटुआ में सरौता , कत्था, सुपारी, चूना रखे हुये मिल जायेंगे । आजकल गुटखा के चलन ने सब दूषित और विकृत कर दिया है । तम्बाकू युक्त गुटखा पर प्रतिबन्ध होते हुये भी , तम्बाकू अलग पाउच में साथ में मिलने से निष्प्रभावी है । गुटखा में बहुत से हानिकारक केमिकल और पत्थर का चूरा भी मिला होता है । पहले विप्रों और राजसामंतों के दाँत ताम्बूलरंजित होते थे। बल्लालकृत भोजप्रबन्ध में एक प्रसंग है। कवियों को अकूतधन देने वाले राजा भोज के दरबार में कविकर्म से रहित वेदशास्त्रज्ञाता विद्वान पहुँचे। द्वारपाल ने इन लोगों का सूक्ष्म निरीक्षण किया। दरबार में जाकर उसने उन वैदिक विद्वानों का परिचय इस प्रकार दिया - #राजमाषनिभैर्दन्तैः_कटिविन्यस्त_पाणयः। #द्वारतिष्ठन्ति_राजेन्द्र_छादन्साः_श्लोकशत्रावः॥ हे राजा ! द्वार पर राजमा के समान दाँतों वाले, श्लोकशत्रु, वेदज्ञ कमर पर हाथ रखे खड़े हैं। एक श्लोक है - #शुक्लदन्ताः_जिताक्षश्च_मुंडाः_काषायवाससः। #शुद्धाधर्म_वदिष्यन्ति_शाठ्यबुद्धयोपजीविनः॥ सफेद दाँत वाले' शठबुद्धि से जीविका चलाने वाले निन्दा के पात्र हैं, वे शुद्धअधर्म की बात करते हैं | आभास कुमार गांगुली जिन्हें गायक किशोर कुमार के नाम से जाना जाता है, पान की प्रशंसा में एक कविता रची थी पान सो पदारथ, सब जहान को सुधारत गायन को बढ़ावत जामे चूना चौकसाई है सुपारिन के साथ साथ,मसाला मिले भांत भांत जामे कत्थे की रत्ती भर थोड़ी सी ललाई है बैठें है सभा मांहि बात करे भांत भांत थूकन जात बार बार जाने का बड़ाई है कहें कवि 'किशोरदास' चतुरन की चतुराई साथ पान में तमाखू किसी मूरख ने चलाई है. ( मूरख न बनिये )

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💐प्रेम से बोलो जय माता दी💐 🌻🌱🌻🌱🌻🌱🌻🌱🌻 शुभ रात्रि विश्राम🌹🙏🌹🙏 आपकी रात्रि शुभ और मंगलमय हो माता रानी का आशीर्वाद आपके पूरे परिवार पर सदैव बना रहे जय माता दी🌹🙏🌹🙏 नवरात्रि के पवित्र पावन अवसर पर पढ़ें,शक्तिपीठ का अर्थ एवं इक्यावन शक्तिपीठों का संक्षिप्त विवरण !!!!!✨ शक्तिपीठ, देवीपीठ या सिद्धपीठ से उन स्थानों का ज्ञान होता है, जहां शक्तिरूपा देवी का अधिष्ठान (निवास) है। ऐसा माना जाता है कि ये शक्तिपीठ मनुष्य को समस्त सौभाग्य देने वाले हैं। मनुष्यों के कल्याण के लिए जिस प्रकार भगवान शंकर विभिन्न तीर्थों में पाषाणलिंग रूप में आविर्भूत हुए, उसी प्रकार करुणामयी देवी भी भक्तों पर कृपा करने के लिए विभिन्न तीर्थों में पाषाणरूप से शक्तिपीठों के रूप में विराजमान हैं। ✨ दक्षप्रजापति ने सहस्त्रों वर्षों तक तपस्या करके पराम्बा जगदम्बिका को प्रसन्न किया और उनसे अपने यहां पुत्रीरूप में जन्म लेने का वरदान मांगा। पराशक्ति के वरदान से दक्षप्रजापति के घर में दाक्षायणी का जन्म हुआ और उस कन्या का नाम ‘सती’ पड़ा। उनका विवाह भगवान शिव के साथ हुआ। दक्ष के मन में शिव के प्रति दुर्भाव जागा। इसी कारण दक्षप्रजापति ने अपने यज्ञ में सब देवों को तो निमन्त्रित किया, किन्तु शिव को आमन्त्रित नहीं किया। सती इस मानसिक पीड़ा के कारण पिता को उचित सलाह देना चाहती थीं, किन्तु निमन्त्रण न मिलने के कारण शिव उन्हें पिता के घर जाने की आज्ञा नहीं दे रहे थे। किसी तरह पति को मनाकर सती यज्ञस्थल पहुंचीं और पिता को समझाने लगीं। पर दक्ष ने दो टूक कहा–‘शिव अमंगलस्वरूप हैं। उनके सांनिध्य में तुम भी अमंगला हो गयी हो।’ मया कृतो देवयाग: प्रेतयागो न चैव हि। देवानां गमनं यत्र तत्र प्रेतविवर्जित:।। (शिवपुराण) अर्थात्–मैंने देवयज्ञ किया है, प्रेतयज्ञ नहीं। जहां देवताओं का आवागमन हो वहां प्रेत नहीं जा सकते। तुम्हारे पति भूत, प्रेत, पिशाचों के स्वामी हैं, अत: मैंने उन्हें नहीं बुलाया है।’ महामाया सती ने पिता द्वारा पति का अपमान होने पर उस पिता से सम्बद्ध शरीर को त्याग देना ही उचित समझा। प्राणी की तपस्या एवं आराधना से ही उसे शक्ति को जन्म देने का सौभाग्य प्राप्त होता है किन्तु यदि बीच में अहंकार और प्रमाद उत्पन्न हो जाए तो शक्ति उससे सम्बन्ध तोड़ लेती है। फिर उसकी वही स्थिति होती है जो दक्षप्रजापति की हुई। पिता के तिरस्कार से क्रोध में सती ने अपने ही समान रूप वाली छायासती को प्रादुर्भूत (प्रकट) किया और अपने चिन्मयस्वरूप को यज्ञ की प्रखर ज्वाला में दग्ध कर दिया। शिवगणों व नारदजी के द्वारा सती के यज्ञाग्नि में प्रवेश के समाचार को जानकर भगवान शंकर कुपित हो गए। उन्होंने अपने सिर से एक जटा उखाड़ी और पर्वत पर दे मारी जिससे उसके दो टुकड़े हो गए। एक भाग से भद्रकाली और दूसरे से वीरभद्र प्रकट हुए। उनके द्वारा यज्ञ का विध्वंस कर दिया गया। सभी देवताओं ने शिव के पास जाकर स्तुति की। आशुतोष शिव स्वयं यज्ञस्थल (कनखल-हरिद्वार) पहुंचे। सारे अमंगलों को दूर कर शिव ने यज्ञ को तो सम्पन्न करा दिया, किन्तु सती के पार्थिव शरीर को देखकर वे उसके मोह में पड़ गए। सती का शरीर यद्यपि मृत हो गया था, किन्तु वह महाशक्ति का निवासस्थान था। अर्धनारीश्वर भगवान शंकर उसी के द्वारा उस महाशक्ति में रत थे। अत: मोहित होने के कारण उस शवशरीर को छोड़ न सके। भगवान शंकर छायासती के शवशरीर को कभी सिर पर, कभी दांये हाथ में, कभी बांये हाथ में तो कभी कन्धे पर और कभी प्रेम से हृदय से लगाकर अपने चरणों के प्रहार से पृथ्वी को कम्पित करते हुए नृत्य करने लगे–‘ननर्त चरणाघातै: कम्पयन् धरणीतलम्।’ भगवान शंकर उन्मत्त होकर नृत्य कर रहे थे। शिव के चरणप्रहारों से पीड़ित होकर कच्छप और शेषनाग धरती छोड़ने लगे। शिव के नृत्य करने से प्रचण्ड वायु बहने लगी जिससे वृक्ष व पर्वत कांपने लगे। सर्वत्र प्रलय-सा हाहाकार मच गया। ब्रह्माजी की आज्ञा से ऋषिगण स्वस्तिवाचन करने लगे। देवताओं को चिन्ता हुई कि यह कैसी विपत्ति आ गयी। ये जगत्संहारक रुद्र कैसे शान्त होंगे? भगवान शंकर द्वारा विष्णुजी को शाप !!!!! ✨ संसार का चक्का जाम जानकर देवताओं और भगवान विष्णु ने महाशक्ति सती के देह को शिव से वियुक्त करना चाहा। भगवान विष्णु ने शिव के मोह की शान्ति एवं अनन्त शक्तियों के निवासस्थान सती के देह के अंगों से लोक का कल्याण हो–यह सोचकर सुदर्शन चक्र द्वारा छायासती के शरीर के खण्ड-खण्ड कर दिए। भगवान शंकर ने विष्णुजी को शाप देते हुए कहा–‘त्रेतायुग में विष्णु को पृथ्वी पर सूर्यवंश में जन्म लेना पड़ेगा। जिस प्रकार मुझे छायापत्नी का वियोगी बनना पड़ा, उसी प्रकार राक्षसराज रावण विष्णु की छायापत्नी का हरण करके उन्हें भी वियोगी बनायेगा। विष्णु मेरी ही भांति शोक से व्याकुल होंगे।’ शक्तिपीठों का प्रादुर्भाव : - सती के मृत शरीर के विभिन्न अंग और उनमें पहने आभूषण ५१ स्थलों पर गिरे जिससे वे स्थल शक्तिपीठों के रूप में जाने जाते हैं। सती के शरीर के हृदय से ऊपर के भाग के अंग जहां गिरे वहां वैदिक एवं दक्षिणमार्ग की और हृदय से नीचे भाग के अंगों के पतनस्थलों में वाममार्ग की सिद्धि होती है। 51 शक्तिपीठों का संक्षिप्त विवरण!!!!!!!• 1. किरीट शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के हुगली नदी के तट लालबाग कोट पर स्थित है किरीट शक्तिपीठ, जहां सती माता का किरीट यानी शिराभूषण या मुकुट गिरा था। यहां की शक्ति विमला अथवा भुवनेश्वरी तथा भैरव संवर्त हैं। इस स्थान पर सती के 'किरीट (शिरोभूषण या मुकुट)' का निपात हुआ था। कुछ विद्वान मुकुट का निपात कानपुर के मुक्तेश्वरी मंदिर में मानते हैं। 2. कात्यायनी पीठ वृन्दावन वृन्दावन, मथुरा में स्थित है कात्यायनी वृन्दावन शक्तिपीठ जहां सती का केशपाश गिरा था। यहां की शक्ति देवी कात्यायनी हैं। यहाँ माता सती 'उमा' तथा भगवन शंकर 'भूतेश' के नाम से जाने जाते है। 3. करवीर शक्तिपीठ महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित 'महालक्ष्मी' अथवा 'अम्बाईका मंदिर' ही यह शक्तिपीठ है। यहां माता का त्रिनेत्र गिरा था। यहां की शक्ति 'महिषामर्दिनी' तथा भैरव क्रोधशिश हैं। यहां महालक्ष्मी का निज निवास माना जाता है। 4. श्री पर्वत शक्तिपीठ यहां की शक्ति श्री सुन्दरी एवं भैरव सुन्दरानन्द हैं। कुछ विद्वान इसे लद्दाख (कश्मीर) में मानते हैं, तो कुछ असम के सिलहट से 4 कि.मी. दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्यकोण) में जौनपुर में मानते हैं। यहाँ सती के 'दक्षिण तल्प' (कनपटी) का निपात हुआ था। 5. विशालाक्षी शक्तिपीठ उत्तर प्रदेश, वाराणसी के मीरघाट पर स्थित है शक्तिपीठ जहां माता सती के दाहिने कान के मणि गिरे थे। यहां की शक्ति विशालाक्षी तथा भैरव काल भैरव हैं। यहाँ माता सती का 'कर्णमणि' गिरी थी। यहाँ माता सती को 'विशालाक्षी' तथा भगवान शिव को 'काल भैरव' कहते है। 6. गोदावरी तट शक्तिपीठ आंध्र प्रदेश के कब्बूर में गोदावरी तट पर स्थित है यह शक्तिपीठ, जहाँ माता का वामगण्ड यानी बायां कपोल गिरा था। यहां की शक्ति विश्वेश्वरी या रुक्मणी तथा भैरव दण्डपाणि हैं। गोदावरी तट शक्तिपीठ आन्ध्र प्रदेश देवालयों के लिए प्रख्यात है। वहाँ शिव, विष्णु, गणेश तथा कार्तिकेय (सुब्रह्मण्यम) आदि की उपासना होती है तथा अनेक पीठ यहाँ पर हैं। यहाँ पर सती के 'वामगण्ड' का निपात हुआ था। 7. शुचींद्रम शक्तिपीठ तमिलनाडु में कन्याकुमारी के त्रिासागर संगम स्थल पर स्थित है यह शुचींद्रम शक्तिपीठ, जहाँ सती के ऊर्ध्वदंत (मतान्तर से पृष्ठ भागद्ध गिरे थे। यहां की शक्ति नारायणी तथा भैरव संहार या संकूर हैं। यहाँ माता सती के 'ऊर्ध्वदंत' गिरे थे। यहाँ माता सती को 'नारायणी' और भगवान शंकर को 'संहार' या 'संकूर' कहते है। तमिलनाडु में तीन महासागर के संगम-स्थल कन्याकुमारी से 13 किमी दूर 'शुचीन्द्रम' में स्याणु शिव का मंदिर है। उसी मंदिर में ये शक्तिपीठ है। 8. पंच सागर शक्तिपीठ इस शक्तिपीठ का कोई निश्चित स्थान ज्ञात नहीं है लेकिन यहां माता के नीचे के दांत गिरे थे। यहां की शक्ति वाराही तथा भैरव महारुद्र हैं। पंच सागर शक्तिपीठ में सती के 'अधोदन्त' गिरे थे। यहाँ सती 'वाराही' तथा शिव 'महारुद्र' हैं। 9. ज्वालामुखी शक्तिपीठ हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा में स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां सती का जिह्वा गिरी थी। यहां की शक्ति सिद्धिदा व भैरव उन्मत्त हैं। यह ज्वालामुखी रोड रेलवे स्टेशन से लगभग 21 किमी दूर बस मार्ग पर स्थित है। यहाँ माता सती 'सिद्धिदा' अम्बिका तथा भगवान शिव 'उन्मत्त' रूप में विराजित है। मंदिर में आग के रूप में हर समय ज्वाला धधकती रहती है। 10. हरसिद्धि शक्तिपीठ (उज्जयिनी शक्तिपीठ) इस शक्तिपीठ की स्थिति को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ उज्जैन के निकट शिप्रा नदी के तट पर स्थित भैरवपर्वत को, तो कुछ गुजरात के गिरनार पर्वत के सन्निकट भैरवपर्वत को वास्तविक शक्तिपीठ मानते हैं। अत: दोनों ही स्थानों पर शक्तिपीठ की मान्यता है। उज्जैन के इस स्थान पर सती की कोहनी का पतन हुआ था। अतः यहाँ कोहनी की पूजा होती है। 11. अट्टहास शक्तिपीठ अट्टाहास शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के लाबपुर (लामपुर) रेलवे स्टेशन वर्धमान से लगभग 95 किलोमीटर आगे कटवा-अहमदपुर रेलवे लाइन पर है, जहाँ सती का 'नीचे का होठ' गिरा था। इसे अट्टहास शक्तिपीठ कहा जाता है, जो लामपुर स्टेशन से नजदीक ही थोड़ी दूर पर है। 12. जनस्थान शक्तिपीठ महाराष्ट्र के नासिक में पंचवटी में स्थित है जनस्थान शक्तिपीठ जहां माता का ठुड्डी गिरी थी। यहां की शक्ति भ्रामरी तथा भैरव विकृताक्ष हैं। मध्य रेलवे के मुम्बई-दिल्ली मुख्य रेल मार्ग पर नासिक रोड स्टेशन से लगभग 8 कि.मी. दूर पंचवटी नामक स्थान पर स्थित भद्रकाली मंदिर ही शक्तिपीठ है। यहाँ की शक्ति 'भ्रामरी' तथा भैरव 'विकृताक्ष' हैं- 'चिबुके भ्रामरी देवी विकृताक्ष जनस्थले'। अत: यहाँ चिबुक ही शक्तिरूप में प्रकट हुआ। इस मंदिर में शिखर नहीं है। सिंहासन पर नवदुर्गाओं की मूर्तियाँ हैं, जिसके बीच में भद्रकाली की ऊँची मूर्ति है। 13. कश्मीर शक्तिपीठ कश्मीर में अमरनाथ गुफ़ा के भीतर 'हिम' शक्तिपीठ है। यहाँ माता सती का 'कंठ' गिरा था। यहाँ सती 'महामाया' तथा शिव 'त्रिसंध्येश्वर' कहलाते है। श्रावण पूर्णिमा को अमरनाथ के दर्शन के साथ यह शक्तिपीठ भी दिखता है। 14. नन्दीपुर शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के बोलपुर (शांति निकेतन) से 33 किमी दूर सैन्थिया रेलवे जंक्शन से अग्निकोण में, थोड़ी दूर रेलवे लाइन के निकट ही एक वटवृक्ष के नीचे देवी मन्दिर है, यह 51 शक्तिपीठों में से एक है। यहाँ देवी के देह से 'कण्ठहार' गिरा था। 15. श्री शैल शक्तिपीठ आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद से 250 कि.मी. दूर कुर्नूल के पास 'श्री शैलम' है, जहाँ सती की 'ग्रीवा' का पतन हुआ था। यहाँ की सती 'महालक्ष्मी' तथा शिव 'संवरानंद' अथवा 'ईश्वरानंद' हैं। 16. नलहाटी शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के बोलपुर में है नलहरी शक्तिपीठ, जहां माता का उदरनली गिरी थी। यहां की शक्ति कालिका तथा भैरव योगीश हैं। यहाँ सती की 'उदर नली' का पतन हुआ था। यहाँ की सती 'कालिका' तथा भैरव 'योगीश' हैं। 17. मिथिला शक्तिपीठ यहाँ माता सती का 'वाम स्कन्ध' गिरा था। यहाँ सती 'उमा' या 'महादेवी' तथा शिव 'महोदर' कहलाते हैं। इस शक्तिपीठ का निश्चित स्थान बताना कुछ कठिन है। स्थान को लेकर कई मत-मतान्तर हैं। तीन स्थानों पर 'मिथिला शक्तिपीठ' को माना जाता है। एक जनकपुर (नेपाल) से 51 किमी दूर पूर्व दिशा में 'उच्चैठ' नामक स्थान पर 'वन दुर्गा' का मंदिर है। दूसरा बिहार के समस्तीपुर और सहरसा स्टेशन के पास 'उग्रतारा' का मंदिर है। तीसरा समस्तीपुर से पूर्व 61 किमी दूर सलौना रेलवे स्टेशन से 9 किमी दूर 'जयमंगला' देवी का मंदिर है। उक्त तीनों मंदिर को विद्वजन शक्तिपीठ मानते है। 18. रत्नावली शक्तिपीठ रत्नावली शक्तिपीठ का निश्चित्त स्थान अज्ञात है, किंतु बंगाल पंजिका के अनुसार यह तमिलनाडु के मद्रास में कहीं है। यहाँ सती का 'दायाँ कन्धा' गिरा था। यहां की शक्ति कुमारी तथा भैरव शिव हैं। 19. अम्बाजी शक्तिपीठ यहाँ माता सती का 'उदार' गिरा था। गुजरात, गुना गढ़ के गिरनार पर्वत के प्रथत शिखर पर माँ अम्बा जी का मंदिर ही शक्तिपीठ है। यहाँ माता सती को 'चंद्रभागा' और भगवान शिव को 'वक्रतुण्ड' के नाम से जाना जाता है। ऐसी भी मान्यता है कि गिरिनार पर्वत के निकट ही सती का उर्द्धवोष्ठ गिरा था, जहाँ की शक्ति अवन्ती तथा भैरव लंबकर्ण है। 20. जालंधर शक्तिपीठ यहाँ माता सती का 'बायां स्तन' गिरा था। यहाँ सती को 'त्रिपुरमालिनी' और शिव को 'भीषण' के रूप में जाना जाता है। यह शक्तिपीठ पंजाब के जालंधर में स्थित है। इसे त्रिपुरमालिनी शक्तिपीठ भी कहते हैं। 21. रामगिरि शक्तिपीठ रामगिरि शक्तिपीठ की स्थिति को लेकर मतांतर है। कुछ मैहर, मध्य प्रदेश के 'शारदा मंदिर' को शक्तिपीठ मानते हैं, तो कुछ चित्रकूट के शारदा मंदिर को शक्तिपीठ मानते हैं। दोनों ही स्थान मध्य प्रदेश में हैं तथा तीर्थ हैं। रामगिरि पर्वत चित्रकूट में है। यहाँ देवी के 'दाएँ स्तन' का निपात हुआ था। 22. वैद्यनाथ का हार्द शक्तिपीठ शिव तथा सती के ऐक्य का प्रतीक झारखण्ड के गिरिडीह जनपद में स्थित वैद्यनाथ का 'हार्द' या 'हृदय पीठ' है और शिव का 'वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग' भी यहीं है। यह स्थान चिताभूमि में है। यहाँ सती का 'हृदय' गिरा था। यहाँ की शक्ति 'जयदुर्गा' तथा शिव 'वैद्यनाथ' हैं। 23. वक्त्रेश्वर शक्तिपीठ माता का यह शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के सैन्थया में स्थित है जहां माता का मन गिरा था। यहां की शक्ति महिषासुरमदिनी तथा भैरव वक्त्रानाथ हैं। यहाँ का मुख्य मंदिर वक्त्रेश्वर शिव मंदिर है। 24. कन्याकुमारी शक्तिपीठ यहाँ माता सती की 'पीठ' गिरी थी। माता सती को यहाँ 'शर्वाणी या नारायणी' तथा भगवान शिव को 'निमिष या स्थाणु' कहा जाता है। तमिलनाडु में तीन सागरों हिन्द महासागर, अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी के संगम स्थल पर कन्याकुमारी का मंदिर है। उस मंदिर में ही भद्रकाली का मंदिर शक्तिपीठ है। 25. बहुला शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के हावड़ा से 145 किलोमीटर दूर पूर्वी रेलवे के नवद्वीप धाम से 41 कि.मी. दूर कटवा जंक्शन से पश्चिम की ओर केतुग्राम या केतु ब्रह्म गाँव में स्थित है-'बहुला शक्तिपीठ', जहाँ सती के 'वाम बाहु' का पतन हुआ था। यहाँ की सती 'बहुला' तथा शिव 'भीरुक' हैं। 26. भैरवपर्वत शक्तिपीठ यह शक्तिपीठ भी 51 शक्तिपीठों में से एक है। यहाँ माता सती के कुहनी की पूजा होती है। इस शक्तिपीठ की स्थिति को लेकर विद्वानों में मतभेद है। कुछ उज्जैन के निकट शिप्रा नदी तट स्थित भैरवपर्वत को, तो कुछ गुजरात के गिरनार पर्वत के सन्निकट भैरवपर्वत को वास्तविक शक्तिपीठ मानते हैं। 27. मणिवेदिका शक्तिपीठ राजस्थान में अजमेर से 11 किलोमीटर दूर पुष्कर एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थान है। पुष्कर सरोवर के एक ओर पर्वत की चोटी पर स्थित है- 'सावित्री मंदिर', जिसमें माँ की आभायुक्त, तेजस्वी प्रतिमा है तथा दूसरी ओर स्थित है 'गायत्री मंदिर' और यही शक्तिपीठ है। जहाँ सती के 'मणिबंध' का पतन हुआ था। 28. प्रयाग शक्तिपीठ तीर्थराज प्रयाग में माता सती के हाथ की 'अँगुली' गिरी थी। यहाँ तीनों शक्तिपीठ की माता सती 'ललिता देवी' एवं भगवान शिव को 'भव' कहा जाता है। उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में स्थित है। लेकिन स्थानों को लेकर मतभेद इसे यहां अक्षयवट, मीरापुर और अलोपी स्थानों में गिरा माना जाता है। ललिता देवी के मंदिर को विद्वान शक्तिपीठ मानते है। शहर में एक और अलोपी माता ललिता देवी का मंदिर है। इसे भी शक्तिपीठ माना जाता है। निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचना कठिन है। 29. विरजा शक्तिपीठ उत्कल (उड़ीसा) में माता सती की 'नाभि' गिरी थी। यहाँ माता सती को 'विमला' तथा भगवान शिव को 'जगत' के नाम से जाना जाता है। उत्कल शक्तिपीठ उड़ीसा के पुरी और याजपुर में माना जाता है। पुरी में जगन्नाथ जी के मंदिर के प्रांगण में ही विमला देवी का मंदिर है। यही मंदिर शक्तिपीठ है। 30. कांची शक्तिपीठ यहाँ माता सती का 'कंकाल' गिरा था। देवी यहाँ 'देवगर्मा' और भगवान शिव का 'रूद्र' रूप है। तमिलनाडु के कांचीपुरम में सप्तपुरियों में एक काशी है। वहाँ का काली मंदिर ही शक्तिपीठ है। 31. कालमाधव शक्तिपीठ कालमाधव में सती के 'वाम नितम्ब' का निपात हुआ था। इस शक्तिपीठ के बारे कोई निश्चित स्थान ज्ञात नहीं है। परन्तु, यहां माता का 'वाम नितम्ब' का निपात हुआ था। यहां की शक्ति काली तथा भैरव असितांग हैं।यहाँ की सति 'काली' तथा शिव 'असितांग' हैं। 32. शोण शक्तिपीठ मध्य प्रदेश के अमरकण्टक के नर्मदा मंदिर में सती के 'दक्षिणी नितम्ब' का निपात हुआ था और वहाँ के इसी मंदिर को शक्तिपीठ कहा जाता है। यहाँ माता सती 'नर्मदा' या 'शोणाक्षी' और भगवान शिव 'भद्रसेन' कहलाते हैं। 33. कामाख्या शक्तिपीठ यहाँ माता सती की 'योनी' गिरी थी। असम के कामरूप जनपद में असम के प्रमुख नगर गुवाहाटी (गौहाटी) के पश्चिम भाग में नीलाचल पर्वत/कामगिरि पर्वत पर यह शक्तिपीठ 'कामाख्या' के नाम से सुविख्यात है। यहाँ माता सती को 'कामाख्या' और भगवान शिव को 'उमानंद' कहते है। जिनका मंदिर ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य उमानंद द्वीप पर स्थित है। 34. जयंती शक्तिपीठ भारत के पूर्वीय भाग में स्थित मेघालय एक पर्वतीय राज्य है और गारी, खासी, जयंतिया यहाँ की मुख्य पहाड़ियाँ हैं। सम्पूर्ण मेघालय पर्वतों का प्रान्त है। यहाँ की जयंतिया पहाड़ी पर ही 'जयंती शक्तिपीठ' है, जहाँ सती के 'वाम जंघ' का निपात हुआ था। 35. मगध शक्तिपीठ बिहार की राजधानी पटना में स्थित पटनेश्वरी देवी को ही शक्तिपीठ माना जाता है जहां माता का दाहिना जंघा गिरा था। यहां की शक्ति सर्वानन्दकरी तथा भैरव व्योमकेश हैं। यह मंदिर पटना सिटी चौक से लगभग 5 कि.मी. पश्चिम में महाराज गंज (देवघर) में स्थित है। 36. त्रिस्तोता शक्तिपीठ यहाँ के बोदा इलाके के शालवाड़ी गाँव में तिस्ता नदी के तट पर 'त्रिस्तोता शक्तिपीठ' है, जहाँ सती के 'वाम-चरण' का पतन हुआ था। यहाँ की सती 'भ्रामरी' तथा शिव 'ईश्वर' हैं। 37. त्रिपुर सुन्दरी शक्तिपीठ त्रिपुरा में माता सती का 'दक्षिण पद' गिरा था। यहाँ माता सती 'त्रिपुरासुन्दरी' तथा भगवन शिव 'त्रिपुरेश' कहे जाते हैं। त्रिपुरा राज्य के राधा किशोरपुर ग्राम से 2 किमी दूर दक्षिण-पूर्व के कोण पर, पर्वत के ऊपर यह शक्तिपीठ स्थित है। 38. विभाष शक्तिपीठ यहाँ माता सती का 'बायाँ टखना' गिरा था। यहाँ माता सती 'कपालिनी' अर्थात 'भीमरूपा' और भगवन शिव 'सर्वानन्द' कपाली है। पश्चिम बंगाल के पासकुडा स्टेशन से 24 किमी दूर मिदनापुर में तमलूक स्टेशन है। वहाँ का काली मंदिर ही यह शक्तिपीठ है। 39. देवीकूप शक्तिपीठ यहाँ माता सती का 'दाहिना टखना' गिरा था। यहाँ माता सती को 'सावित्री' तथा भगवन शिव को 'स्याणु महादेव' कहा जाता है। हरियाणा राज्य के कुरुक्षेत्र नगर में 'द्वैपायन सरोवर' के पास कुरुक्षेत्र शक्तिपीठ स्थित है, जिसे 'श्रीदेवीकूप भद्रकाली पीठ' के नाम से जाना जाता है। 40. युगाद्या शक्तिपीठ 'युगाद्या शक्तिपीठ' बंगाल के पूर्वी रेलवे के वर्धमान जंक्शन से 39 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में तथा कटवा से 21 किमी. दक्षिण-पश्चिम में महाकुमार-मंगलकोट थानांतर्गत क्षीरग्राम में स्थित है- युगाद्या शक्तिपीठ, जहाँ की अधिष्ठात्री देवी हैं- 'युगाद्या' तथा 'भैरव' हैं- क्षीर कण्टक। तंत्र चूड़ामणि के अनुसार यहाँ माता सती के 'दाहिने चरण का अँगूठा' गिरा था। 41. विराट शक्तिपीठ यह शक्तिपीठ राजस्थान की राजधानी गुलाबी नगरी जयपुर से उत्तर में महाभारतकालीन विराट नगर के प्राचीन ध्वंसावशेष के निकट एक गुफा है, जिसे 'भीम की गुफा' कहते हैं। यहीं के वैराट गाँव में शक्तिपीठ स्थित है, जहाँ सती के 'दायें पाँव की उँगलियाँ' गिरी थीं। 42. कालीघाट काली मंदिर यहाँ माता सती की 'शेष उँगलियाँ' गिरी थी। यहाँ माता सती को 'कलिका' तथा भगवान शिव को 'नकुलेश' कहा जाता है। पश्चिम बंगाल, कलकत्ता के कालीघाट में काली माता का सुविख्यात मंदिर ही यह शक्तिपीठ है। 43. मानस शक्तिपीठ यहाँ माता सती की 'दाहिनी हथेली' गिरी थी। यहाँ माता सती को 'दाक्षायणी' तथा भगवान शिव को 'अमर' कहा जाता है। यह शक्तिपीठ तिब्बत में मानसरोवर के तट पर स्थित है। 44. लंका शक्तिपीठ श्रीलंका में, जहाँ सती का 'नूपुर' गिरा था। यहां की शक्ति इन्द्राक्षी तथा भैरव राक्षसेश्वर हैं। लेकिन, उस स्थान ज्ञात नहीं है कि श्रीलंका के किस स्थान पर गिरे थे। 45. गण्डकी शक्तिपीठ नेपाल में गण्डकी नदी के उद्गमस्थल पर 'गण्डकी शक्तिपीठ' में सती के 'दक्षिणगण्ड' का पतन हुआ था। यहां शक्ति `गण्डकी´ तथा भैरव `चक्रपाणि´ हैं। 46. गुह्येश्वरी शक्तिपीठ नेपाल में 'पशुपतिनाथ मंदिर' से थोड़ी दूर बागमती नदी की दूसरी ओर 'गुह्येश्वरी शक्तिपीठ' है। यह नेपाल की अधिष्ठात्री देवी हैं। मंदिर में एक छिद्र से निरंतर जल बहता रहता है। यहाँ की शक्ति 'महामाया' और शिव 'कपाल' हैं। 47. हिंगलाज शक्तिपीठ यहाँ माता सती का 'ब्रह्मरंध्र' गिरा था। यहाँ माता सती को 'भैरवी/कोटटरी' तथा भगवन शिव को 'भीमलोचन' कहा जाता है। यहाँ शक्तिपीठ पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रान्त के हिंगलाज में है। हिंगलाज कराची से 144 किमी दूर उत्तर-पश्चिम दिशा में हिंगोस नदी के तट पर है। यही एक गुफा के भीतर जाने पर माँ आदिशक्ति के ज्योति रूप के दर्शन होते है। 48. सुंगधा शक्तिपीठ बांग्लादेश के बरीसाल से 21 किलोमीटर उत्तर में शिकारपुर ग्राम में 'सुंगधा' नदी के तट पर स्थित 'उग्रतारा देवी' का मंदिर ही शक्तिपीठ माना जाता है। इस स्थान पर सती की 'नासिका' का निपात हुआ था। 49. करतोयाघाट शक्तिपीठ यहाँ माता सती का 'वाम तल्प' गिरा था। यहाँ माता 'अपर्णा' तथा भगवन शिव 'वामन' रूप में स्थापित है। यह स्थल बांग्लादेश में है। बोगडा स्टेशन से 32 किमी दूर दक्षिण-पश्चिम कोण में भवानीपुर ग्राम के बेगड़ा में करतोया नदी के तट पर यह शक्तिपीठ स्थित है। 50. चट्टल शक्तिपीठ चट्टल में माता सती की 'दक्षिण बाहु गिरी थी। यहाँ माता सती को 'भवानी' तथा भगवन शिव को 'चंद्रशेखर' कहा जाता है। बंग्लादेश में चटगाँव से 38 किमी दूर सीताकुंड स्टेशन के पास चंद्रशेखर पर्वत पर भवानी मंदिर है। यही 'भवानी मंदिर' शक्तिपीठ है। 51. यशोर शक्तिपीठ यह शक्तिपीठ वर्तमान बांग्लादेश में खुलना ज़िले के जैसोर नामक नगर में स्थित है। यहाँ सती की 'वाम' का निपात हुआ था।

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