lalit mohan jakhmola Dec 31, 2021

श्री रामधारी सिंह दिनकर की कविता---! ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं है अपना ये त्यौहार नहीं है अपनी ये तो रीत नहीं है अपना ये व्यवहार नहीं धरा ठिठुरती है सर्दी से आकाश में कोहरा गहरा है बाग़ बाज़ारों की सरहद पर सर्द हवा का पहरा है सूना है प्रकृति का आँगन कुछ रंग नहीं , उमंग नहीं हर कोई है घर में दुबका हुआ नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं चंद मास अभी इंतज़ार करो निज मन में तनिक विचार करो नये साल नया कुछ हो तो सही क्यों नक़ल में सारी अक्ल बही उल्लास मंद है जन -मन का आयी है अभी बहार नहीं ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं है अपना ये त्यौहार नहीं ये धुंध कुहासा छंटने दो रातों का राज्य सिमटने दो प्रकृति का रूप निखरने दो फागुन का रंग बिखरने दो प्रकृति दुल्हन का रूप धार जब स्नेह – सुधा बरसायेगी शस्य – श्यामला धरती माता घर -घर खुशहाली लायेगी तब चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि नव वर्ष मनाया जायेगा आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर जय गान सुनाया जायेगा युक्ति – प्रमाण से स्वयंसिद्ध नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्ध आर्यों की कीर्ति सदा -सदा नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा अनमोल विरासत के धनिकों को चाहिये कोई उधार नहीं ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं है अपना ये त्यौहार नहीं है अपनी ये तो रीत नहीं है अपना ये त्यौहार नहीं 🙏🕉🙏**जय श्री राम***

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lalit mohan jakhmola Dec 31, 2021

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***इतिहास के पन्नों से*** @चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण ता उपर सुल्तान है,मत चूको चौहान।।### ******जय श्री राम**जय माता दी**** ************मत चूको चौहान … बहुत पुराना और बहुत ही अर्थपूर्ण दोहा कहा गया था आज से कोई आठ सौ साल पहले | आप लोग समझ गए होंगे किसकी बात हो रही है यहाँ ? अगर नहीं तो किस्सा और भी ज्यादा रोमांचक होने वाला है | अच्छा एक बात और है, ये मैत्री का सम्बन्ध शायद किसी भी अन्य सम्बन्ध से सर्वथा श्रेष्ठ रहा है | जब कभी भी दुनियादारी से मन ऊबे तो कृष्ण और सुदामा की कहानी पढ़िए थोड़ी, या फिर राम और हनुमान की कहानी, सुग्रीव, जामवंत कितने तो पात्र और घटनाएँ इस सन्दर्भ में अपनी प्रविष्टि की मजबूत वकालत करते हुए दिखायी देने लगते हैं | शायद ये हमारी संपन्न संस्कृति का प्रमाण भी है कि इतिहास हमे वीरता, प्रेम, मैत्री आदि के उचित, पुष्ट, तर्कसंगत एवं भावपूर्ण, अनेकों किस्से देता है | आज का किस्सा भी एक रोचक मैत्री प्रसंग से ओतप्रोत है | अगर इसमें मैत्री का प्राधान्य नहीं होता तो शायद ये किस्सा इतना अधिक पावन नहीं हो सकता था | बारहवीं शताब्दी में,अजमेर में एक महान हिन्दू सम्राट हुए, पृथ्वीराज चौहान | एक नायक जीवन का उपभोग किया उन्होंने | वीरता जैसे उनके रक्त में सम्मिलित थी | कहते हैं युवावस्था में ही उन्हें, शब्दभेदी बाण चलने में महारत हासिल हो चुका था | 1179 ई. में अपने पिता की एक संग्राम में मृत्यु के बाद उन्होंने, सिंघासन को संभाला | अपने राज्य विस्तार को लेकर, उन्होंने जो पराक्रम किये उसके चलते, उनकी एक वीर योद्धा एवं शाशक की छवि स्थापित हो चुकी थी | इसी क्रम में उन्होंने खजुराहो और महोबा के चंदेलों पर आक्रमण किये और सफल रहे | कन्नौज के गढ़वालों पे आक्रमण किये | इसके उपरांत इस किस्से को रोमांचक मोड़ देने वाली घटना घटती है | मुहम्मद गोरी, सन ११९१ में पूर्वी पंजाब के भटिंडा में आक्रमण करता है जो कि पृथ्वीराज चौहान के शाशकीय परिक्षेत्र से संलग्न था | पृथ्वीराज चौहान, कन्नौज से मदद मांगता है और उसे बदले में मिलता है सिर्फ इनकार | इसके बावजूद वो बिना भयभीत हुए, निकल पड़ता है भटिंडा की तरफ और तराइन में मुठभेड़ होती है शत्रु से | इसी युद्ध को इतिहास तराइन के प्रथम युद्ध के नाम से जानता है | इस युद्ध में पृथ्वीराज विजयी होते हैं और मुहम्मद गोरी को बंधक बना लिया जाता है, किन्तु अपने स्वभाव के अनुरूप दया भाव से, गोरी को रिहा भी कर दिया जाता है, और यही निर्णय बाद में गलत साबित हुआ | पृथ्वीराज को कन्नौज के राजा जयचंद की पुत्री के साथ प्रेम हो जाता है , जयचंद इस रिश्ते को मंजूरी नहीं देता है | जयचंद इस प्रस्ताव से नाखुश होकर, प्रस्ताव के प्रतिरोध में एक स्वयंवर का आयोजन करता है और पृथ्वीराज को आमंत्रित नहीं किया जाता है | लेकिन नियति को कुछ और मंज़ूर था, स्वयंवर के समय नाटकीय रूप से पृथ्वीराज हाज़िर होते हैं और संयुक्ता (जयचंद की पुत्री ) को लेकर, तमाम प्रतिरोधों की धता बताते हुए दिल्ली आ पहुँचते हैं | जयचंद इस अपमान का बदला लेने की फ़िराक में था, उधर मुहम्मद गोरी भी प्रथम युद्ध का प्रतिशोध लेना चाहता था | अर्थात् पृथ्वीराज के दोनों शत्रु मिल चुके थे | मुहम्मद गोरी , राजपूतों की युद्ध परंपरा के प्रतिकूल समय पर आक्रमण करता है और इस तरह तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज की पराजय होती है और उसे बंधक बना लिया जाता है | इस पूरे घटनाक्रम में पृथ्वीराज के एक मित्र सदैव उनके साथ रहे | विद्वानों का ऐसा मानना है कि उनके इस मित्र का जन्म भी उसी दिन हुआ था जिस दिन पृथ्वीराज का हुआ था और इन दोनों मित्रों की मृत्यु भी एक ही दिन, लगभग एक ही समय पर हुई |हालांकि काफ़ी मतभेद भी उत्त्पन्न हुए हैं इस कथानक को लेकर | उनके इस मित्र का नाम था — चंदबरदाई | चंदबरदाई को इनके राज्य में राजकवि का दर्ज़ा प्राप्त था | पृथ्वीराज के जीवन को सूक्ष्मता से अनुभव करते हुए चंदबरदाई ने पिंगल (जो कि राजस्थानी में बृजभाषा का पर्याय है ) भाषा में एक काव्यग्रंथ लिखा, जिसे हिंदी भाषा का प्रथम एवं सबसे बड़ा काव्य ग्रन्थ माना गया | ग्रन्थ का नाम हुआ — पृथ्वीराज रासो | चंदबरदाई का पृथ्वीराज के साथ अनुराग कुछ ऐसा था कि जब तराइन के द्वितीय युद्ध में पराजय के बाद इन्हें गजनी भेजा गया तो चंदबरदाई भी इनके साथ गए | वहां पृथ्वीराज चौहान को कई यातनाएं सहनी पड़ी | धातु की गर्म छड़ों से इन्हें नेत्र विहीन कर दिया गया | चंदबरदाई को अपने परम मित्र के साथ ये दुर्भाव तनिक भी नहीं भाया | तभी चंदबरदाई ने अपनी युक्ति से मुहम्मद गोरी का विश्वास जीता और उसका प्रिय भी बन गया | एक दिन, चंदबरदाई ने पृथ्वीराज की ‘शब्दभेदी बाण’ चलने की क्षमता को मुहम्मद गोरी के सामने बहुत आकर्षक ढंग से बताया | गोरी की जिज्ञासा हुई इस कला को देखने की सो पृथ्वीराज को दरबार में बुलाया गया और कला प्रदर्शन का आदेश दिया गया | पृथ्वीराज अपनी कला का प्रदर्शन करते रहे और तभी सही मौका देखकर, चंदबरदाई ने एक दोहा पढ़ दिया और वो दोहा था ये – चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण ता उपर सुल्तान है,मत चूको चौहान।। फिर क्या ? पृथ्वीराज ने इस मौके को चूके बिना भुना लिया | चौबीस गज और आठ अंगुल पे बैठे मुहम्मद गोरी अगले बाण का शिकार हुए | इस तरह चंदबरदाई ने श्रेष्ठ मैत्री का परिचय देते हुए, गोरी का वध करने में पृथ्वीराज की मदद की | इससे पहले की शत्रु की तरफ से कोई और प्रतिघात होता इन मित्रों पर, दोनों ने स्वयं एक दूसरे को मारकर, मित्रता अमर कर दी | अपने कृतित्व से साहित्य को संमृद्ध करने वाले इस पुरोधा को इसकी जन्मतिथि पर हम उन्हें स्मरण एवं नमन करते हैं |*****जय श्री राधे कृष्णा जी***शुभ रात्रि वन्दन***

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lalit mohan jakhmola Nov 25, 2021

****जय श्री राधे कृष्णा जी*** ##विज्ञान और संस्कार का अति सुन्दर वार्तालाप## @*एक माँ* अपने पूजा-पाठ से फुर्सत पाकर अपने *विदेश में रहने वाले बेटे* से विडियो चैट करते वक्त *पूछ बैठी-* *"बेटा! कुछ पूजा-पाठ भी करते हो या नहीं?"* *बेटा बोला-* *"माँ, मैं एक जीव वैज्ञानिक हूँ। मैं अमेरिका में मानव के विकास पर काम* कर रहा हूँ। *विकास का सिद्धांत, चार्ल्स डार्विन.. क्या आपने उसके बारे में सुना भी है?"* *उसकी माँ मुस्कुराई* और *बोली.....* *"मैं डार्विन के बारे में जानती हूँ बेटा.. उसने जो भी खोज की, वह वास्तव में सनातन-धर्म के लिए बहुत पुरानी खबर है।"* “हो सकता है माँ!” बेटे ने भी *व्यंग्यपूर्वक* कहा। *“यदि तुम कुछ समझदार हो, तो इसे सुनो..” उसकी माँ ने प्रतिकार किया।* *“क्या तुमने दशावतार के बारे में सुना है?* *विष्णु के दस अवतार ?”* बेटे ने सहमति में कहा... *"हाँ! पर दशावतार का मेरी रिसर्च से क्या लेना-देना?"* *माँ फिर बोली-* *"लेना-देना है..* *मैं तुम्हें बताती हूँ कि तुम और मि. डार्विन क्या नहीं जानते हो ?"* *“पहला अवतार था 'मत्स्य', यानि मछली।* ऐसा इसलिए कि *जीवन पानी में आरम्भ हुआ। यह बात सही है या नहीं?”* बेटा अब ध्यानपूर्वक सुनने लगा.. “उसके बाद आया *दूसरा अवतार 'कूर्म', अर्थात् कछुआ* क्योंकि *जीवन पानी से जमीन की ओर चला गया.. 'उभयचर (Amphibian)',* तो *कछुए ने समुद्र से जमीन की ओर के विकास को दर्शाया।”* *“तीसरा था 'वराह' अवतार, यानी सूअर।* जिसका मतलब *वे जंगली जानवर, जिनमें अधिक बुद्धि नहीं होती है*। *तुम उन्हें डायनासोर कहते हो।”* बेटे ने आंखें फैलाते हुए सहमति जताई.. *“चौथा अवतार था 'नृसिंह', आधा मानव, आधा पशु*। जिसने दर्शाया *जंगली जानवरों से बुद्धिमान जीवों का विकास।”* *“पांचवें 'वामन' हुए, बौना जो वास्तव में लंबा बढ़ सकता था*। क्या तुम जानते हो ऐसा क्यों है? *क्योंकि मनुष्य दो प्रकार के होते थे- होमो इरेक्टस(नरवानर) और होमो सेपिअंस (मानव),* और *होमो सेपिअंस ने विकास की लड़ाई जीत ली।”* बेटा दशावतार की प्रासंगिकता सुन के स्तब्ध रह गया.. माँ ने बोलना जारी रखा- *“छठा अवतार था 'परशुराम', जिनके पास शस्त्र (कुल्हाड़ी) की ताकत थी*। वे दर्शाते हैं उस *मानव* को, *जो गुफा और वन में रहा.. गुस्सैल और असामाजिक।”* *“सातवां अवतार थे 'मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम', सोच युक्त प्रथम सामाजिक व्यक्ति।* जिन्होंने *समाज के नियम बनाए और समस्त रिश्तों का आधार।”* *“आठवां अवतार थे 'भगवान श्री कृष्ण', राजनेता, राजनीतिज्ञ, प्रेमी।* जिन्होंने समाज के नियमों का आनन्द लेते हुए यह सिखाया कि *सामाजिक ढांचे में रहकर कैसे फला-फूला जा सकता है?*” बेटा सुनता रहा, चकित और विस्मित.. *माँ ने ज्ञान की गंगा प्रवाहित रखी -* *“नवां * थे 'महात्मा बुद्ध', वे व्यक्ति जिन्होंने नृसिंह से उठे मानव के सही स्वभाव को खोजा। उन्होंने मानव द्वारा ज्ञान की अंतिम खोज की पहचान की।”* “..और अंत में *दसवां अवतार 'कल्कि' आएगा।* *वह मानव जिस पर तुम काम कर रहे हो.. वह मानव, जो आनुवंशिक रूप से श्रेष्ठतम होगा।”* *बेटा अपनी माँ को अवाक् होकर देखता रह गया..* *अंत में वह बोल पड़ा-* *“ ... यह अद्भुत है माँ.. हिंदू दर्शन वास्तव में अर्थपूर्ण है!”* *मित्रों..* *वेद, पुराण, ग्रंथ, उपनिषद इत्यादि सब अर्थपूर्ण हैं। सिर्फ आपका देखने का दृष्टिकोण होना चाहिए। फिर चाहे वह धार्मिक हो या वैज्ञानिकता...🙏* 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩

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