. श्रीमद्भगवद्गीता का माहात्म्य दूसरे अध्याय का माहात्म्य श्री भगवान कहते हैं–प्रिये! अब दूसरे अध्याय के माहात्म्य बतलाता हूँ। दक्षिण दिशा में वेदवेत्ता ब्राह्मणों के पुरन्दरपुर नामक नगर में देव शर्मा नामक एक विद्वान ब्राह्मण रहता था, वह अतिथियों की सेवा करने वाला, स्वाध्याय-शील, वेद-शास्त्रों का विशेषज्ञ, यज्ञों का अनुष्ठान करने वाला और तपस्वियों के सदा ही प्रिय था। उसने उत्तम द्रव्यों के द्वारा अग्नि में हवन करके दीर्घकाल तक देवताओं को तृप्त किया, किंतु उस धर्मात्मा ब्राह्मण को कभी सदा रहने वाली शान्ति नही मिली, वे परम कल्याणमय तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा से प्रतिदिन प्रचुर सामग्रियों के द्वारा सत्य संकल्प वाले तपस्वियों की सेवा करने लगा। एक दिन इस प्रकार शुभ आचरण करते हुए उसके समक्ष एक त्यागी संत प्रकट हुए, वे पूर्ण अनुभवी, शान्त-चित्त थे, निरन्तर परमात्मा के चिन्तन में संलग्न होकर वे सदा आनन्द विभोर रहते थे। उन नित्य सन्तुष्ट तपस्वी संत को शुद्ध-भाव से प्रणाम करके देव शर्मा ने पूछा–'महात्मन ! मुझे सदा रहने वाली शान्ति कैसे प्राप्त होगी?' आत्म-ज्ञानी संत ने कहा–ब्रह्मन् ! सौपुर ग्राम का निवासी मित्रवान, जो बकरियों का चरवाहा है, 'वही तुम्हें उपदेश देगा।' यह सुनकर देव शर्मा ने महात्मा के चरणों की वन्दना की और सौपुर ग्राम के लिये चल दिया, समृद्ध-शाली सौपुर ग्राम में पहुँच कर उसने उत्तर भाग में एक विशाल वन देखा, उसी वन में नदी के किनारे एक शिला पर मित्रवान बैठा था, उसके नेत्र आनन्द से निश्चल हो रहे थे, वह अपलक दृष्टि से देख रहा था। वह स्थान आपस का स्वाभाविक वैर छोड़कर एकत्रित हुए परस्पर विरोधी जन्तुओं से घिरा था, जहाँ उद्यान में मन्द-मन्द वायु चल रही थी, मृगों के झुण्ड शान्त-भाव से बैठे थे और मित्रवान दया से भरी हुई आनन्द विभोर दृष्टि से पृथ्वी पर मानो अमृत छिड़क रहा था, इस रूप में उसे देखकर देव शर्मा का मन प्रसन्न हो गया, वे उत्सुक होकर बड़ी विनय के साथ मित्रवान के पास गया। मित्रवान ने भी अपने मस्तक को झुकाकर देव शर्मा का सत्कार किया, तदनन्तर विद्वान ब्राह्मण देव शर्मा अनन्य चित्त से मित्रवान के समीप गया और जब उसके ध्यान का समय समाप्त हो गया तो– देव शर्मा ने पूछा–'महाभाग ! मैं आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ, मेरे इस मनोरथ की पूर्ति के लिए मुझे किसी उपाय का उपदेश कीजिए, जिसके द्वारा परम-सिद्धि की प्राप्ति हो सके।' देवशर्मा की बात सुनकर एक क्षण तक कुछ विचार करने के बाद बोले– मित्रवान ने कहा–'महानुभाव ! एक समय की बात है, मैं वन के भीतर बकरियों की रक्षा कर रहा था, इतने में ही एक भयंकर बाघ पर मेरी दृष्टि पड़ी, जो मानो सब को खा लेना चाहता था, मैं मृत्यु से डरता था, इसलिए बाघ को आते देख बकरियों के झुंड को आगे करके वहाँ से भाग चला, किंतु एक बकरी तुरन्त ही सारा भय छोड़कर नदी के किनारे उस बाघ के पास चली गयी, फिर तो बाघ भी द्वेष छोड़कर चुपचाप खड़ा हो गया। बाघ को इस अवस्था में देखकर बकरी ने कहा– बकरी बोली–'बाघ ! तुम्हें तो उत्तम भोजन प्राप्त हुआ है, मेरे शरीर से मांस निकाल कर प्रेम पूर्वक खाओ न ! तुम इतनी देर से खड़े क्यों हो? तुम्हारे मन में मुझे खाने का विचार क्यों नहीं हो रहा है?' बाघ बोला–बकरी ! इस स्थान पर आते ही मेरे मन से द्वेष का भाव निकल गया, भूख प्यास भी मिट गयी, इसलिए पास आने पर भी अब मैं तुझे खाना नहीं चाहता।' तब बकरी ने कहा– बकरी बोली–'न जाने मैं कैसे निर्भय हो गयी हूँ, यदि तुम जानते हो तो बताओ,' इसका क्या कारण हो सकता है? बाघ ने कहा–'मैं भी नहीं जानता, वही सामने एक वृक्ष की शाखा पर एक बन्दर था, चलो सामने उस वृक्ष पर बैठे बन्दर से पूछते है,' ऐसा निश्चय करके वे दोनों वहाँ से चल दिये, उन दोनों के स्वभाव में यह विचित्र परिवर्तन देखकर मैं बहुत विस्मय में पड़ा गया, इतने में उन्होंने उस बन्दर से प्रश्न किया। उनके पूछने पर वानर बोला– वानर-राज ने कहा–'श्रीमान ! सुनो, इस विषय में मैं तुम्हें प्राचीन कथा सुनाता हूँ, यह सामने वन के भीतर जो बहुत बड़ा मन्दिर है, उसकी ओर देखो इसमें ब्रह्माजी का स्थापित किया हुआ एक शिवलिंग है। पूर्वकाल में यहाँ सुकर्मा नामक एक बुद्धिमान ब्राह्मण रहते थे, जो तपस्या में संलग्न होकर इस मन्दिर में उपासना करते थे, वे वन में से फूलों का संग्रह कर लाते और नदी के जल से पूजनीय भगवान शंकर को स्नान कराकर उन्हीं से उनकी पूजा किया करते थे, इस प्रकार आराधना का कार्य करते हुए सुकर्मा यहाँ निवास करते थे, बहुत समय के बाद उनके समीप किसी अतिथि महात्मा का आगमन हुआ, भोजन के लिए फल लाकर अतिथि महात्मा को अर्पण करने के बाद वह बोला– सुकर्मा ने कहा–महात्मा ! मैं केवल तत्त्वज्ञान की इच्छा से भगवान शंकर की आराधना करता हूँ, आज इस आराधना का फल मुझे मिल गया क्योंकि इस समय आप जैसे महापुरुष ने मुझ पर अनुग्रह किया है। सुकर्मा के ये मधुर वचन सुनकर तपस्या के धनी महात्मा अतिथि को बड़ी प्रसन्नता हुई, उन्होंने एक शिलाखण्ड पर गीता का दूसरा अध्याय लिख दिया और सुकर्मा को उसके पाठ और अभ्यास के लिए आज्ञा देते हुए महात्मा बोले– महात्मा ने कहा–'ब्रह्मन् ! इससे तुम्हारा आत्मज्ञान-सम्बन्धी मनोरथ अपने-आप सफल हो जायेगा।' यह कहकर वे बुद्धिमान तपस्वी महात्मा सुकर्मा के सामने ही उनके देखते-देखते अन्तर्धान हो गये। सुकर्मा विस्मित होकर उनके आदेश के अनुसार निरन्तर गीता के द्वितीय अध्याय का अभ्यास करने लगे। तदनन्तर दीर्घकाल के पश्चात् अन्तःकरण शुद्ध होकर उन्हें आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई फिर वे जहाँ-जहाँ गये, वहाँ-वहाँ का तपोवन शान्त हो गया। उनमें सर्दी-गर्मी और राग-द्वेष आदि की बाधाएँ दूर हो गयीं, इतना ही नहीं, उन स्थानों में भूख-प्यास का कष्ट भी जाता रहा तथा भय का सर्वथा अभाव हो गया। यह सब द्वितीय अध्याय का जप करने वाले सुकर्मा ब्राह्मण की तपस्या का ही प्रभाव को समझो। मित्रवान कहता है–वानर-राज के इस प्रकार बताने पर मैं प्रसन्नता पूर्वक बकरी और बाघ के साथ उस मन्दिर की ओर गया। वहाँ जाकर शिलाखण्ड पर लिखे हुए गीता के द्वितीय अध्याय को मैंने देखा और पढ़ा। उसी का अध्यन करने से मैंने तपस्या का पार पा लिया है, अतः भद्रपुरुष ! तुम भी सदा द्वितीय अध्याय का ही अध्यन किया करो, ऐसा करने पर मुक्ति तुमसे दूर नहीं रहेगी। श्रीभगवान कहते हैं–प्रिये ! मित्रवान के इस प्रकार आदेश देने पर देव शर्मा ने उसका पूजन किया और उसे प्रणाम करके पुरन्दरपुर की राह ली। वहाँ किसी देवालय में पूर्वोक्त आत्म-ज्ञानी महात्मा को पाकर उन्होंने यह सारा वृत्तान्त निवेदन किया और सबसे पहले उन्हीं से द्वितीय अध्याय को पढ़ा, उनसे उपदेश पाकर शुद्ध अन्तःकरण वाले देव शर्मा प्रतिदिन बड़ी श्रद्धा के साथ द्वितीय अध्याय का अध्यन करके ब्रह्म-ज्ञान में लीन होकर परम पद प्राप्त हुआ। ० ० ० "जय जय श्री हरि" "कुमार रौनक कश्यप " ***********************************************

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. श्रीमद्भगवद्गीता का माहात्म्य पहले अध्याय का माहात्म्य श्री पार्वती जी ने कहा–भगवन् ! आप सब तत्त्वों के ज्ञाता हैं, आपकी कृपा से मुझे श्रीविष्णु-सम्बन्धी नाना प्रकार के धर्म सुनने को मिले, जो समस्त लोक का उद्धार करने वाले हैं, देवादिदेव ! अब मैं गीता का माहात्म्य सुनना चाहती हूँ, जिसका श्रवण करने से श्री हरि की भक्ति बढ़ती है। श्री महादेवजी बोले–जिनका श्री विग्रह अलसी के फूल की भाँति श्याम वर्ण का है, पक्षीराज गरूड़ ही जिनके वाहन हैं, जो अपनी महिमा से कभी च्युत नहीं होते तथा शेषनाग की शय्या पर शयन करते हैं, उन भगवान महाविष्णु की हम उपासना करते हैं। एक समय की बात है, मुर दैत्य के नाशक भगवान विष्णु शेषनाग के रमणीय आसन पर सुख-पूर्वक विराजमान थे, उस समय समस्त लोकों को आनन्द देने वाली भगवती लक्ष्मी ने आदर-पूर्वक प्रश्न किया। श्रीलक्ष्मीजी ने पूछा–भगवन ! आप सम्पूर्ण जगत का पालन करते हुए भी अपने ऐश्वर्य के प्रति उदासीन से होकर जो इस क्षीरसागर में नींद ले रहे हैं, इसका क्या कारण है? श्रीभगवान बोले–सुमुखि ! मैं नींद नहीं लेता हूँ, अपितु तत्त्व का अनुसरण करने वाली अन्तर्दृष्टि के द्वारा अपने ही माहेश्वर स्वरुप का साक्षात्कार कर रहा हूँ। यह वही तेज है, जिसका योगी पुरुष कुशाग्र बुद्धि के द्वारा अपने अन्तःकरण में दर्शन करते हैं तथा जिसे मीमांसक विद्वान वेदों का सार-तत्त्व निश्च्चित करते हैं। वह माहेश्वर तेज एक, अजर, प्रकाश स्वरूप, आत्म रूप, रोग-शोक से रहित, अखण्ड आनन्द का पुंज, निष्पन्द तथा द्वैत-रहित है, इस जगत का जीवन उसी के अधीन है, उसी का अनुभव करता हूँ, देवेश्वरी ! यही कारण है कि मैं तुम्हें नींद लेता सा प्रतीत हो रहा हूँ। श्रीलक्ष्मीजी ने कहा–अन्तर्यामी ! आप ही योगी पुरुषों के ध्येय हैं, आपके अतिरिक्त भी कोई ध्यान करने योग्य तत्त्व है, यह जानकर मुझे बड़ा कौतूहल हो रहा है, इस चराचर जगत की सृष्टि और संहार करने वाले स्वयं आप ही हैं, आप सर्व-समर्थ हैं, इस प्रकार की स्थिति में होकर भी यदि आप उस परम तत्त्व से भिन्न हैं तो मुझे उसका बोध कराइये। श्री भगवान बोले–प्रिये ! आत्मा का स्वरूप द्वैत और अद्वैत से पृथक, भाव और अभाव से मुक्त तथा आदि और अन्त से रहित है, शुद्ध ज्ञान के प्रकाश से उपलब्ध होने वाला तथा परमानन्द स्वरूप होने के कारण एक मात्र सुन्दर है, वही मेरा ईश्वरीय रूप है, आत्मा का एकत्व ही सबके द्वारा जानने योग्य है। गीता-शास्त्र में इसी का प्रतिपादन हुआ है, अमित तेजस्वी भगवान विष्णु के ये वचन सुनकर लक्ष्मी देवी ने शंका उपस्थित करते हुए कहाः भगवन ! यदि आपका स्वरूप स्वयं परम-आनन्दमय और मन-वाणी की पहुँच के बाहर है तो गीता कैसे उसका बोध कराती है? मेरे इस संदेह का निवारण कीजिए। श्री भगवान बोले–सुन्दरी ! सुनो, मैं गीता में अपनी स्थिति का वर्णन करता हूँ, क्रमश पाँच अध्यायों को तुम पाँच मुख जानो, दस अध्यायों को दस भुजाएँ समझो तथा एक अध्याय को उदर और दो अध्यायों को दोनों चरणकमल जानो, इस प्रकार यह अठारह अध्यायों की वाङमयी ईश्वरीय मूर्ति ही समझनी चाहिए, यह ज्ञानमात्र से ही महान पातकों का नाश करने वाली है, जो उत्तम बुद्धिवाला पुरुष गीता के एक या आधे अध्याय का अथवा एक, आधे या चौथाई श्लोक का भी प्रति-दिन अभ्यास करता है, वह सुशर्मा के समान मुक्त हो जाता है। श्री लक्ष्मीजी ने पूछा–भगवन ! सुशर्मा कौन था? किस जाति का था और किस कारण से उसकी मुक्ति हुई? श्रीभगवान बोले–प्रिय ! सुशर्मा बड़ी खोटी बुद्धि का मनुष्य था और पापियों का तो वह शिरोमणि ही था। उसका जन्म वैदिक ज्ञान से शून्य और क्रूरता-पूर्ण कर्म करने वाले ब्राह्मणों के कुल में हुआ था, वह न ध्यान करता था, न जप, न होम करता था न अतिथियों का सत्कार, वह मूढ होने के कारण सदा विषयों के सेवन में ही लगा रहता था, हल जोतता और पत्ते बेचकर जीविका चलाता था, उसे मदिरा पीने का व्यसन था तथा वह मांस भी खाया करता था, इस प्रकार उसने अपने जीवन का दीर्घकाल व्यतीत कर दिया। एक दिन मूढ़-बुद्धि सुशर्मा पत्ते लाने के लिए किसी ऋषि की वाटिका में घूम रहा था, इसी बीच मे काल रूप धारी काले साँप ने उसे डँस लिया, सुशर्मा की मृत्यु हो गयी। तदनन्तर वह अनेक नरकों में जा वहाँ की यातनाएँ भोग कर मृत्यु-लोक में लौट आया और वहाँ बोझ ढोने वाला बैल हुआ, उस समय किसी पंगु ने अपने जीवन को आराम से व्यतीत करने के लिए उसे खरीद लिया, बैल ने अपनी पीठ पर पंगु का भार ढोते हुए बड़े कष्ट से सात-आठ वर्ष बिताए। एक दिन पंगु ने किसी ऊँचे स्थान पर बहुत देर तक बड़ी तेजी के साथ उस बैल को घुमाया, इससे वह थककर बड़े वेग से पृथ्वी पर गिरा और मूर्च्छित हो गया। उस समय वहाँ कुतूहल-वश आकृष्ट हो बहुत से लोग एकत्रित हो गये, उस जन-समुदाय में से किसी पुण्यात्मा व्यक्ति ने उस बैल का कल्याण करने के लिए उसे अपना पुण्य दान किया, तत्पश्चात् कुछ दूसरे लोगों ने भी अपने-अपने पुण्यों को याद करके उन्हें उसके लिए दान किया, उस भीड़ में एक वेश्या भी खड़ी थी, उसे अपने पुण्य का पता नहीं था तो भी उसने लोगों की देखा-देखी उस बैल के लिए कुछ त्याग किया। तदनन्तर यमराज के दूत उस मरे हुए प्राणी को पहले यमपुरी में ले गये, वहाँ यह विचार कर कि यह वेश्या के दिये हुए पुण्य से पुण्यवान हो गया है, उसे छोड़ दिया गया फिर वह भूलोक में आकर उत्तम कुल और शील वाले ब्राह्मणों के घर में उत्पन्न हुआ, उस समय भी उसे अपने पूर्व जन्म की बातों का स्मरण बना रहा, बहुत दिनों के बाद अपने अज्ञान को दूर करने वाले कल्याण-तत्त्व का जिज्ञासु होकर वह उस वेश्या के पास गया और उसके दान की बात बतलाते हुए उसने पूछाः 'तुमने कौन सा पुण्य दान किया था?' वेश्या ने उत्तर दिया–'वह पिंजरे में बैठा हुआ तोता प्रतिदिन कुछ पढ़ता है, उससे मेरा अन्तःकरण पवित्र हो गया है, उसी का पुण्य मैंने तुम्हारे लिए दान किया था।' इसके बाद उन दोनों ने तोते से पूछा, तब उस तोते ने अपने पूर्वजन्म का स्मरण करके प्राचीन इतिहास कहना आरम्भ किया। तोता बोला–पूर्वजन्म में मैं विद्वान होकर भी विद्वता के अभिमान से मोहित रहता था, मेरा राग-द्वेष इतना बढ़ गया था कि मैं गुणवान विद्वानों के प्रति भी ईर्ष्या भाव रखने लगा, फिर समयानुसार मेरी मृत्यु हो गयी और मैं अनेकों घृणित लोकों में भटकता फिरा, उसके बाद इस लोक में आया, सदगुरु की अत्यन्त निन्दा करने के कारण तोते के कुल में मेरा जन्म हुआ, पापी होने के कारण छोटी अवस्था में ही मेरा माता-पिता से वियोग हो गया, एक दिन मैं ग्रीष्म ऋतु में तपे मार्ग पर पड़ा था, वहाँ से कुछ श्रेष्ठ मुनि मुझे उठा लाये और महात्माओं के आश्रय में आश्रम के भीतर एक पिंजरे में उन्होंने मुझे डाल दिया। वहीं मुझे पढ़ाया गया, ऋषियों के बालक बड़े आदर के साथ गीता के प्रथम अध्याय का अध्यन करते थे, उन्हीं से सुनकर मैं भी बार-बार पाठ करने लगा, इसी बीच में एक चोरी करने वाले बहेलिये ने मुझे वहाँ से चुरा लिया, तत्पश्चात् इस देवी ने मुझे खरीद लिया, पूर्व काल में मैंने इस प्रथम अध्याय का अभ्यास किया था, जिससे मैंने अपने पापों को दूर किया है, फिर उसी से इस वेश्या का भी अन्तःकरण शुद्ध हुआ है और उसी के पुण्य से ये द्विज-श्रेष्ठ सुशर्मा भी पाप-मुक्त हुए हैं। इस प्रकार परस्पर वार्तालाप और गीता के प्रथम अध्याय के माहात्म्य की प्रशंसा करके वे तीनों निरन्तर अपने-अपने घर पर गीता का अभ्यास करने लगे, फिर ज्ञान प्राप्त करके वे मुक्त हो गये, इसलिए जो गीता के प्रथम अध्याय को पढ़ता, सुनता तथा अभ्यास करता है, उसे इस भव-सागर को पार करने में कोई कठिनाई नहीं होती। ० ० ० "जय जय श्री हरि" "कुमार रौनक कश्यप " ***********************************************

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. श्रीमद्भगवद्गीता का माहात्म्य श्रीवाराहपुराण में गीताका माहात्म्यं बताते हुए श्रीविष्णुजी कहते हैं श्रीविष्णुरुवाच: प्रारब्ध को भोगता हुआ जो मनुष्य 'सदा' श्रीगीता के अभ्यास में आसक्त हो वही इस लोक में मुक्त 'और' सुखी होता है 'तथा' कर्म में लेपायमान 'नहीं' होता। जिस प्रकार कमल के पत्ते को जल स्पर्श 'नहीं' करता उसी प्रकार जो मनुष्य श्रीगीता का ध्यान करता है उसे महापापादि पाप 'कभी' स्पर्श नहीं करते। जहाँ श्रीगीता की पुस्तक होती है और जहाँ श्रीगीता का पाठ होता है वहाँ प्रयागादि 'सर्व' तीर्थ निवास करते हैं। जहाँ श्रीगीता प्रवर्तमान है वहाँ 'सभी' देवों, ऋषियों, योगियों, नागों और गोपालबाल श्रीकृष्ण भी नारद, ध्रुव आदि सभी पार्षदों सहित 'जल्दी ही' सहायक होते हैं। जहाँ श्री गीता का विचार, पठन, पाठन तथा श्रवण होता है वहाँ मैं (श्री विष्णु भगवान) 'अवश्य' निवास करता हूँ। मैं (श्री विष्णु भगवान) श्रीगीता के आश्रय में रहता हूँ, श्रीगीता मेराश्री विष्णु भगवान 'उत्तम' घर है और श्रीगीता के ज्ञान का आश्रय करके मैं (श्री विष्णु भगवान) तीनों लोकों का पालन करता हूँ। श्रीगीता 'अति' अवर्णनीय पदोंवाली, अविनाशी, अर्धमात्रा तथा अक्षरस्वरूप, नित्य, ब्रह्मरूपिणी और 'परम' श्रेष्ठ मेरी (श्री विष्णु भगवान) विद्या है इसमें सन्देह नहीं है। वह श्रीगीता चिदानन्द श्रीकृष्ण ने अपने मुख से अर्जुन को कही हुई तथा तीनों वेदस्वरूप, परमानन्दस्वरूप तथा तत्त्वरूप पदार्थ के ज्ञान से युक्त है। जो मनुष्य स्थिर मन वाला होकर 'नित्य' श्री गीता के अध्यायों का जप-पाठ करता है वह ज्ञानस्थ सिद्धि को प्राप्त होता है 'और' फिर परम पद को पाता है। संपूर्ण पाठ करने में असमर्थ हो तो आधा पाठ करे, तो भी गाय के दान से होने वाले पुण्य को प्राप्त करता है, इसमें सन्देह नहीं। तीसरे भाग का पाठ करे तो गंगास्नान का फल प्राप्त करता है 'और' छठवें भाग का पाठ करे तो सोमयाग का फल पाता है। जो मनुष्य भक्तियुक्त होकर 'नित्य' एक अध्याय का 'भी' पाठ करता है, वह रुद्रलोक को प्राप्त होता है और वहाँ शिवजी का गण बनकर 'चिरकाल तक' निवास करता है। जो मनुष्य 'नित्य' एक अध्याय एक श्लोक अथवा श्लोक के एक चरण का पाठ करता है वह मन्वंतर तक मनुष्यता को प्राप्त करता है। जो मनुष्य गीता के दस, सात, पाँच, चार, तीन, दो, एक या आधे श्लोक का पाठ करता है वह 'अवश्य' दस हजार वर्ष तक चन्द्रलोक को प्राप्त होता है। गीता के पाठ में लगे हुए मनुष्य की अगर मृत्यु होती है तो वहपशु आदि की अधम योनियों में 'न' जाकर पुनः मनुष्य जन्म पाता है।, और वहाँ गीता का पुनः अभ्यास करके 'उत्तम' मुक्ति को पाता है। 'गीता' ऐसे उच्चार के साथ जो मरता है वह सदगति को पाता है। गीता का अर्थ तत्पर सुनने में 'तत्पर' बना हुआ मनुष्य महापापी हो तो भी वह वैकुण्ठ को प्राप्त होता है 'और' विष्णु के साथ आनन्द करता है। अनेक कर्म करके 'नित्य' श्री गीता के अर्थ का जो विचार करता है उसे जीवन्मुक्त जानो। मृत्यु के बाद वह परम पद को पाता है। गीता का आश्रय करके जनक आदि 'कई' राजा पाप रहित होकर लोक में यशस्वी बने हैं 'और' परम पद को प्राप्त हुए हैं। श्रीगीता का पाठ करके जो माहात्म्य का पाठ 'नहीं' करता है उसका पाठ निष्फल होता है 'और' ऐसे पाठ को श्रमरूप कहा है। इस माहात्म्यसहित श्रीगीता का जो अभ्यास करता है वह उसका फल पाता है 'और' दुर्लभ गति को प्राप्त होता है। सूत उवाच: जो 'अपने आप' श्रीविष्णु भगवान के मुखकमल से निकली हुई है गीता 'अच्छी तरह' कण्ठस्थ करना चाहिए। अन्य शास्त्रों के संग्रह से क्या लाभ? गीता धर्ममय, सर्वज्ञान की प्रयोजक तथा सर्व शास्त्रमय है, अतः गीता श्रेष्ठ है। जो मनुष्य 'घोर' संसार-सागर को तैरना चाहता है उसे गीतारूपी नौका पर चढ़कर 'सुखपूर्वक' पार होना चाहिए। जो पुरुष इस पवित्र गीताशास्त्र को 'सावधान होकर' पढ़ता है वह भय, शोक 'आदि' से रहित होकर श्रीविष्णुपद को प्राप्त होता है। जिसने सदैव अभ्यासयोग से गीता का ज्ञान सुना नहीं है फिर भी जो मोक्ष की इच्छा करता है वह मूढात्मा, बालक की तरह हँसी का पात्र होता है। जो 'रात-दिन' गीताशास्त्र पढ़ते हैं 'अथवा' इसका पाठ करते हैं 'या' सुनते हैं उन्हें मनुष्य नहीं अपितु 'निःसन्देह' देव ही जानें। हर रोज जल से किया हुआ स्नान मनुष्यों का मैल दूर करता है किन्तु गीतारूपी जल में 'एक' बार किया हुआ स्नान भी संसाररूपी मैल का नाश करता है। जो मनुष्य स्वयं गीता शास्त्र का पठन-पाठन 'नहीं' जानता है, जिसने अन्य लोगों से वह 'नहीं' सुना है, स्वयं को उसका ज्ञान 'नहीं' है, जिसको उस पर श्रद्धा 'नहीं' है, भावना भी 'नहीं' है, वह मनुष्य लोक में भटकते हुए शूकर जैसा ही है। उससे अधिक नीच दूसरा कोई मनुष्य नहीं है, क्योंकि वह गीता को 'नहीं' जानता है। जो गीता के अर्थ का पठन 'नहीं' करता उसके ज्ञान को, आचार को, व्रत को, चेष्टा को, तप को 'और' यश को धिक्कार है। उससे अधम और कोई मनुष्य नहीं है। जो ज्ञान गीता में 'नहीं' गाया गया है वह वेद 'और' वेदान्त में निन्दित होने के कारण उसे निष्फल, धर्मरहित 'और' आसुरी जानें। जो मनुष्य रात-दिन, सोते, चलते, बोलते और खड़े रहते हुए गीता का यथार्थतः सतत अध्ययन करता है वह 'सनातन' मोक्ष को प्राप्त होता है। योगियों के स्थान में, सिद्धों के स्थान में, श्रेष्ठ पुरुषों के आगे, संतसभा में, यज्ञस्थान में 'और' विष्णुभक्तोंके आगे गीता का पाठ करने वाला मनुष्य परम गति को प्राप्त होता है। जो गीता का पाठ 'और' श्रवण 'हर' रोज करता है उसने दक्षिणा के साथ अश्वमेध 'आदि' यज्ञ किये ऐसा माना जाता है। जिसने 'भक्तिभाव से' एकाग्र चित्त से गीता का अध्ययन किया है उसने 'सर्व' वेदों, शास्त्रों तथा पुराणों का अभ्यास किया है ऐसा माना जाता है। जो मनुष्य 'स्वयं' गीता का अर्थ सुनता है, गाता है 'और' परोपकार हेतु सुनाता है वह परम पद को प्राप्त होता है। जिस घर में गीता का पूजन होता है वहाँआध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक तीन ताप से उत्पन्न होने वाली पीड़ा तथा व्याधियों का भय 'नहीं' आता है। उसको शाप या पाप 'नहीं' लगता, 'जरा भी' दुर्गति नहीं होती 'और' छः शत्रुकाम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर देह में पीड़ा 'नहीं' करते। जहाँ 'निरन्तर' गीता का अभिनंदन होता है वहाँ श्री भगवान परमेश्वर में 'एकनिष्ठ' भक्ति उत्पन्न होती है। स्नान किया हो या न किया हो, पवित्र हो या अपवित्र हो फिर भी जो परमात्म-विभूति का 'और' विश्वरूप का स्मरण करता है वह 'सदा' पवित्र है। सब जगह भोजन करने वाला और 'सर्व प्रकार का' दान लेने वाला भी अगर गीता पाठ करता हो तो 'कभी' लेपायमान नहीं होता। जिसका चित्त 'सदा' गीता में ही रमण करता है वह 'संपूर्ण' अग्निहोत्री, 'सदा' जप करनेवाला, क्रियावान तथा पण्डित है। वह दर्शन करने योग्य, धनवान, योगी, ज्ञानी, याज्ञिक, ध्यानी तथा 'सर्व' वेद के अर्थ को जानने वाला है। जहाँ गीता की पुस्तक का 'नित्य' पाठ होता रहता है वहाँ पृथ्वी पर के प्रयागादि 'सर्व' तीर्थ निवास करते हैं। उस घर में और देहरूपी देश में 'सभी' देवों, ऋषियों, योगियों और सर्पों का 'सदा' निवास होता है। गीता, गंगा, गायत्री, सीता, सत्या, सरस्वती, ब्रह्मविद्या, ब्रह्मवल्ली, त्रिसंध्या, मुक्तगेहिनी, अर्धमात्रा, चिदानन्दा, भवघ्नी, भयनाशिनी, वेदत्रयी, परा, अनन्ता और तत्त्वार्थज्ञानमंजरीतत्त्वरूपी अर्थ के ज्ञान का भंडार इस प्रकारगीता के अठारह नामों का स्थिर मन से जो मनुष्य 'नित्य' जप करता है वह 'शीघ्र' ज्ञानसिद्धि 'और' अंत में परम पद को प्राप्त होता है। मनुष्य जो-जो कर्म करे उसमें 'अगर' गीतापाठ चालू रखता है तो वह 'सब' कर्म निर्दोषता से संपूर्ण करके उसका फल प्राप्त करता है। जो मनुष्य श्राद्ध में पितरों को लक्ष्य करके गीता का पाठ करता है उसके पितृ सन्तुष्ट होते हैं 'और' नर्क से सदगति पाते हैं। गीतापाठ से प्रसन्न बने हुए 'तथा' श्राद्ध से तृप्त किये हुए पितृगण पुत्र को आशीर्वाद देने के लिए तत्पर होकर पितृलोक में जाते हैं। जो मनुष्य गीता को लिखकर गले में, हाथ में 'या' मस्तक पर धारण करता है उसके 'सर्व' विघ्नरूप दारूण उपद्रवों का नाश होता है। भरतखण्ड में चार वर्णों में मनुष्य देह प्राप्त करके भी जो 'अमृतस्वरूप' गीता 'नहीं' पढ़ता है 'या' नहीं सुनता है वह हाथ में आया हुआ अमृत छोड़कर कष्ट से विष खाता है। किन्तु जो मनुष्य गीता सुनता है, पढ़ता तो वह इस लोक में गीतारूपी अमृत का पान करके मोक्ष प्राप्त कर सुखी होता है। संसार के दुःखों से पीड़ित जिन मनुष्यों ने गीता का ज्ञान सुना है उन्होंने अमृत प्राप्त किया है 'और' वे श्री हरि के धाम को प्राप्त हो चुके हैं। इस लोक में जनकादि की तरह 'कई' राजा गीता का आश्रय लेकर पापरहित होकर परम पद को प्राप्त हुए हैं। गीता में उच्च 'और' नीच मनुष्य विषयक भेद 'ही' नहीं हैं, क्योंकि गीता ब्रह्मस्वरूप है अतः उसका ज्ञान सबके लिए 'समान' है। गीता के अर्थ को 'परम' आदर से सुनकर जो आनन्दवान 'नहीं' होता वह मनुष्य प्रमाद के कारण इस लोक में फल 'नहीं' प्राप्त करता है किन्तु व्यर्थ श्रम 'ही' प्राप्त करता है। गीता का पाठ करे जो माहात्म्य का पाठ 'नहीं' करता है उसके पाठ का फल व्यर्थ होता है 'और' पाठ केवल श्रमरूप 'ही' रह जाता है। इस माहात्म्य के साथ जो गीता पाठ करता है 'तथा' जो श्रद्धा से सुनता है वह दुर्लभ गति को प्राप्त होता है। गीता का 'सनातन' माहात्म्य मैंने कहा है। गीता पाठ के अन्त में जो इसका पाठ करता है वह उपर्युक्त फल को प्राप्त होता है। इति श्रीवाराहपुराणे श्रीमद् गीतामाहात्म्यं संपूर्णम्। ० ० ० "जय जय श्री हरि" "कुमार रौनक कश्यप 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. श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय - 02 इस अध्याय में:- अर्जुन को युद्ध के लिये उत्साहित करते हुए भगवान् के द्वारा नित्यानित्य वस्तु के विवेचनपूर्वक सांख्ययोग, कर्मयोग एवं स्थितप्रज्ञ की स्थिति और महिमा का प्रतिपादन सम्बन्ध- पहले अध्याय में गीता के उपदेश की प्रस्तावना के रूप में दोनों सेनाओं के महारथियों का और उनकी शंखध्वनि का वर्णन करके अर्जुन का रथ दोनो सेनाओं के बीच में खड़ा करने की बात कही गयी; उसके बाद दोनों सेनाओं में स्थित स्वजन समुदाय को देखकर शोक और मोह के कारण अर्जुन के युद्ध से निवृत्त हो जाने की और शस्त्र-अस्त्रों को छोड़कर विषाद करते हुए बैठ जाने की बात कहकर उस अध्याय की समाप्ति की गयी। ऐसी स्थिति में भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन से क्या बात कही और किस प्रकार उसे युद्ध के लिये पुनः तैयार किया; यह सब बतलाने की आवश्यकता होने पर संजय अर्जुन की स्थिति का वर्णन करते हुए दूसरे अध्याय का आरम्भ करते है- संजय बोले- उस प्रकार करुणा से व्याप्त और आँसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले शोकयुक्त उस अर्जुन के प्रति भगवान् मधुसूदन ने यह वचन कहा। श्रीभगवान् बोले- हे अर्जुन! तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु से प्राप्त हुआ? क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्वर्ग को देने वाला है और न कीर्ति को करने वाला ही है। इसलिये हे अर्जुन! नपुंसकता को मत प्राप्त हो, तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती। हे परंतप! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिये खड़ा हो जा। अर्जुन बोले- हे मधुसूदन! मैं रणभूमि में किस प्रकार बाणों से भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य के विरुद्ध लडूँगा? क्योंकि हे अरिसूदन! वे दोनों ही पूजनीय हैं। इसलिये इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर मैं इस लोक में भिक्षा का अन्न भी खाना कल्याणकारक समझता हूँ; क्योंकि गुरुजनों को मारकर भी इस लोक में रुधिर से सने हुए अर्थ और कामरूप भोगों को ही तो भोगूँगा। सम्बन्ध- इस प्रकार अपना निश्चय प्रकट कर देने पर भी जब अर्जुन को संतोष नहीं हुआ और अपने निश्चय में शंका उत्पन्न हो गयी, तब वे फिर कहने लगे- हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिये युद्ध करना और न करना- इन दोनों में से कौन-सा श्रेष्ठ है, अथवा यह भी नहीं जानते कि उन्हें हम जीतेंगे या हमको वे जीतेंगे। और जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही हमारे आत्मीय धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे मुकाबले में खड़े हैं। इसलिये कायरतारूप दोष से उपहत हुए स्वभाव वाला तथा धर्म के विषय में मोहितचित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो, वह मेरे लिये कहिये; क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिये आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिये। क्योंकि भूमि में निष्कण्टक, धन-धान्य सम्पन्न राज्य को और देवताओं के स्वामीपने को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ, जो मेरी इन्द्रियों के सुखाने वाले शोक को दूर कर सके। संजय बोले- हे राजन्! निद्रा को जीतने वाले अर्जुन अन्तर्यामी श्री कृष्ण महाराज के प्रति इस प्रकार कहकर फिर श्रीगोविन्द भगवान् से युद्ध नहीं करूँगा यह स्पष्ट कहकर चुप हो गये। हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! अर्न्तयामी श्रीकृष्ण महाराज दोनों सेनाओं के बीच में शोक करते हुए उस अर्जुन को हँसते हुए से यह वचन बोले- सम्बन्ध- उपर्युक्त प्रकार से चिन्तामग्न अर्जुन ने जब भगवान् के शरण होकर अपने महान् शोक की निवृत्ति का उपाय पूछा और यह कहा कि इस लोक और परलोक का राज्यसुख इस शोक की निवृत्ति का उपाय नहीं है, तब अर्जुन को अधिकारी समझकर उसके शोक और मोह को सदा के लिये नष्ट करने के उद्देश्य से भगवान् पहले नित्य और अनित्य वस्तु के विवेचनपूर्वक सांख्ययोग की दृष्टि से भी युद्ध करना कर्तव्य है, ऐसा प्रतिपादन करते हुए सांख्यनिष्ठा का वर्णन करते हैं- श्रीभगवान् बोले- हे अर्जुन! तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिये शोक करता है और पण्डितों के से वचनों को कहता है; परन्तु जिनके प्राण चले गये हैं, उनके लिये और जिनके प्राण नहीं गये हैं, उनके लिये भी पण्डितजन शोक नहीं करते। सम्बन्ध- पहले भगवान् आत्मा की नित्यता और निर्विकारता का प्रतिपादन करके आत्मदृष्टि से उनके लिये शोक करना अनुचित सिद्ध करतें हैं- न तो ऐसा है कि मैं किसी काल में किसी काल में नहीं था या तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे। जैसा जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है; उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता। अर्थात जैसे कुमार, युवा और जरा-अवस्थारूप स्थूल शरीर का विकार अज्ञान से आत्मा में भासता है, वैसे ही एक शरीर से दूसरे शरीर को प्राप्त होना रूप सूक्ष्म शरीर का विकार भी अज्ञान से ही आत्मा में भासता है, इसलिये तत्त्व को जानने वाला और पुरुष मोहित नहीं होता। हे कुन्तीपुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःखों को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति-विनाशशील और अनित्य है; इसलिये भारत! उनको तू सहन कर। क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! दुःख-सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है। सम्बन्ध- बारहवें और तेरहवें श्लोक में भगवान् ने आत्मा की नित्यता और निर्विकारता का प्रतिपादन किया गया तथा चौदहवें श्लोक में इन्द्रियों के साथ विषयों के संयोग को अनित्य बतलाया, किन्तु आत्मा क्यों नित्य है और ये संयोग क्यों अनित्य है? इसका स्पष्टीकरण नहीं किया गया; अतएव श्लोक में भगवान् नित्य और अनित्य वस्तु के विवेचन की रीति बतलाने के लिये दोनों के लक्षण बतलाते हैं- असत् वस्तु की तो सत्ता नहीं है और सत् का अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनों का ही तत्त्व तत्त्वज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है। नाशरहित तो तू उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण जगत्- दृश्यवर्ग व्याप्त है। इस अविनाशी का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है। इस नाशरहित, अप्रमेय, नित्यस्वरूप जीवात्मा के ये सब शरीर नाशवान् कहे गये हैं। इसलिये हे भरतवंशी अर्जुन! तु युद्ध कर। सम्बन्ध- अर्जुन ने जो यह बात कही थी कि मैं इनको मारना नहीं चाहता और यदि वे मुझे मार डालें तो वह मेरे लिये क्षेमतर होगा उसका समाधान करने के लिये अगले श्लोकों में आत्मा को मरने या मारने वाला मानना अज्ञान है, यह कहते हैं- जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते; क्योंकि यह आत्मा वास्तव में न तो किसी को मारता है और न किसी के द्वारा मारा जाता है। यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है; क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता। हे पृथापुत्र अर्जुन! जो पुरुष इस आत्मा को नाशरहित, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष कैसे किसको मरवाता है और कैसे किसको मारता है। सम्बन्ध- यहाँ यह शंका होती है कि आत्मा का जो एक शरीर से सम्बन्ध छूटकर दूसरे शरीर से सम्बन्ध होता है, उसमें उसे अत्यन्त कष्ट होता है; अतः उसके लिये शोक करना कैसे अनुचित है? इस पर कहते हैं- जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नयें वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नये शरीरों को प्राप्त होता है। सम्बन्ध- आत्मा का स्वरूप दुर्विज्ञेय होने के कारण पुनः तीन श्लोकों द्वारा प्रकारान्तर से उसकी नित्यता, निराकारता और निर्विकारता- का प्रतिपादन करते हुए उसके विनाश की आशंका से शोक करना अनुचित सिद्ध करते हैं- इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, इसको आग नहीं जला सकती, इसको जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सुखा सकता। क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य है; यह आत्मा अदाह्य, अल्केद्य और निःसन्देह अशोष्य है तथा यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर रहने वाला और सनातन है। यह आत्मा अव्यक्त है, वह आत्मा अचिन्तय है और वह आत्मा विकार रहित कहा जाता है। इससे से अर्जुन! इस आत्मा को उपर्युक्त प्रकार से जानकर तू शोक करने को योग्य नहीं है अर्थात् तुझे शोक करना उचित नहीं है। सम्बन्ध- उपर्युक्त श्लोकों में भगवान ने आत्मा को अजन्मा और अविनाशी बतलाकर उसके लिये शोक करना अनुचित सिद्ध किया; अब दो श्लोकों द्वारा आत्मा को औपचारिक रूप से जन्मने-मरने वाला मानने पर भी उसके लिये शोक करना अनुचित है, ऐसा सिद्ध करते है- किन्तु यदि तू इस आत्मा को सदा जन्मने वाला तथा सदा मरने वाला मानता हो, तो भी हे महाबाहो! तू इस प्रकार शोक करने को योग्य नहीं है। क्योंकि इस मान्यता के अनुसार जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है। इससे भी इस बिना उपाय वाले विषय में तू शोक करने को योग्य नहीं है। सम्बन्ध- अब अगले श्लोक में यह सिद्ध करते हैं कि प्राणियों के शरीरों को उद्देश्य करके भी शोक करना नहीं बनता- हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं, केवल बीच में ही प्रकट हैं; फिर ऐसी स्थिति में क्या शोक करना है? सम्बन्ध- आत्मतत्त्व अत्यन्त दुर्बोव होने के कारण उसे समझाने के लिये भगवान् ने उपुर्यक्त श्लोंकों द्वारा भिन्न-भिन्न प्रकार से उसके स्वरूप का वर्णन किया; अब अगले श्लोक में उस आत्मतत्त्व के दर्शन, वर्णन और श्रवण की अलौकिकता और दुर्लभता का निरूपण करते हैं- कोई एक महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही इसके तत्त्व का आश्चर्य की भाँति वर्णन करता है तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इसे आश्चर्य की भाँति सुनता है और कोई-कोई तो सुनकर भी इसको नहीं जानता है। हे अर्जुन! यह आत्मा सबके शरीर में सदा ही अवध्य है। इस कारण सम्पूर्ण प्राणियों के लिये तू शोक करने के योग्य नहीं है। सम्बन्ध- यहाँ तक भगवान् ने सांख्य योग के अनुसार अनेक युक्तियों द्वारा नित्य शुद्ध, बुद्ध, सम, निर्विकार और अकर्ता आत्मा के एकल, नित्यत्व, अविनाशित्व आदि का प्रतिपादन करके तथा शरीरों को विनाशशील बतलाकर आत्म के या शरीर के लिये अथवा शरीर और आत्मा के वियोग के लिये शोक करना अनुचित सिद्ध किया। साथ ही प्रसङ्ग वश आत्मा को जन्मने-मरने वाला मानने पर भी शोक करने के अनौचित्य का प्रतिपादन किया और अर्जुन को युद्ध करने के लिये आज्ञा दी। अब सात श्लोकों द्वारा क्षात्रधर्म के अनुसार शोक करना अनुचित सिद्ध करते हुए अर्जुन को युद्ध के लिये उत्साहित करते हैं - तथा अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है यानी तुझे भय नहीं करना चाहिये; क्योंकि क्षत्रिय के लिये धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है। हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वारा रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान् क्षत्रिय लोग ही पाते हैं। यदि तु इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा। तथा सब लोग तेरी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति का भी कथन करेंगे और माननीय पुरुष के लिये अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर है। और जिनकी दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित होकर अब लघुता को प्राप्त होगा, वे महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे। तेरे वैरी लोग तेरे सामर्थ्य की निन्दा करते हुए तुझे बहुत से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे; उससे अधिक दु:ख और क्या होगा? या तो युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इस कारण हे अर्जुन! तु युद्ध के लिये निश्चय करके खड़ा हो जा। सम्बन्ध- उपर्युक्त श्लोक में भगवान् ने युद्ध का फल राज्यसुख या स्वर्ग की प्राप्ति तक बतलाया, किन्तु अर्जुन ने तो पहले ही कह दिया था कि इस लोक के राज्य की तो बात ही क्या है, मैं तो त्रिलोकी के राज्य के भी अपने कुल का नाश नहीं करना चाहता; अत: जिसे राज्यसुख और स्वर्ग की इच्छा न हो उसको किस भाव से युद्ध करना चाहिये, यह बात अगले श्लोक में बतलायी जाती है- जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दु:ख को समान समझकर उसके बाद युद्ध के लिये तैयार हो जा, इस प्रकार युद्ध करने से तू पाप को नहीं प्राप्त होगा। सम्बन्ध- यहाँ तक भगवान् ने सांख्ययोग के सिद्धान्त से तथा क्षात्रधर्म की दृष्टि से युद्ध का औचित्य सिद्ध करके अर्जुन को समता-पूर्वक युद्ध करने के लिये आज्ञा दी; अब कर्मयोग के सिद्धान्त से युद्ध का औचित्य बतलाने के लिये कर्मयोग के वर्णन की प्रस्तावना करते हैं- हे पार्थ! यह बुद्धि तेरे लिये ज्ञानयोग के विषय में कही गयी और अब तु इसको कर्मयोग के विषय में सुन जिस बुद्धि से युक्त हुआ तू कर्मों के बन्धन को भली-भाँति त्याग देगा यानि सर्वथा नष्ट कर डालेगा। सम्बन्ध- इस प्रकार कर्मयोग के वर्णन की प्रस्तावना करके अब उसका रहस्यपूर्ण महत्त्व बतलाते हैं- इस कर्मयोग में आरम्भ का अर्थात बीज का नाश नहीं है और उल्टा फलरूप दोष भी नहीं है; बल्कि इस कर्मयोग रूप धर्म का थोड़ा सा भी साधन जन्म-मृत्यु रूप महान् भय से रक्षा कर लेता है। सम्बन्ध- इस प्रकार कर्मयोग का महत्त्व बतलाकर अब उसके आचरण की विधि बतलाने के लिये पहले उस कर्मयोग में परम आवश्यक जो सिद्ध कर्मयोगी की निश्चयात्मिका स्थायी समबुद्धि है, उसका और कर्मयोग में बाधक जो सकाम मनुष्यों की भिन्न-भिन्न बुद्धियाँ हैं, उनका भेद बतलाते हैं- हे अर्जुन! इस कर्मयोग में निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है; किन्तु अस्थिर विचार वाले विवेकहीन सकाम मनुष्यों की बुद्धियाँ निश्चय ही बहुत भेदों वाली और अनन्त होती हैं। सम्बन्ध- अब तीनों श्लोकों में सकाम भाव को त्याज्य बतलाने के लिये सकाम मनुष्यों के स्वभाव, सिद्धान्त और आचार व्यवहार का वर्णन करते हैं- हे अर्जुन! जो भोगों में तन्मय हो रहे हैं, जो कर्मफल के प्रशंसक वेद वाक्यों में ही प्रीति रखते हैं, जिनकी बुद्धि में स्वर्ग ही परम प्राप्य वस्तु है और जो स्वर्ग से बढ़कर दूसरी कोई वस्तु ही नहीं है- ऐसा कहने वाले हैं, वे अविवेकीजन इस प्रकार की जिस पुष्पित यानि दिखाऊ शोभायुक्त वाणी-को कहा करते हैं जो कि जन्मरूप कर्मफल देने वाली एवं भोग तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये नाना प्रकार की बहुत सी क्रियाओं का वर्णन करने वाली है; उस वाणी द्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है, जो भोग और ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं, उन पुरुषों की परमात्मा में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती। हे अर्जुन! वेद उपर्युक्त प्रकार से तीनों गुणों के कार्यरूप समस्त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन करने वाले हैं; इसलिये तू उन भोगों एवं उनके साधनों में आसक्तिहीन, हर्ष-शोकादी द्वन्द्वों से रहित, नित्यवस्तु परमात्मा में स्थित, योगक्षेमको न चाहने वाला और स्वाधीन अन्त:करण वाला हो। सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है, ब्रह्म को तत्त्व से जानने वाले ब्राह्मण का समस्त वेदों में उतना ही प्रयोजन रह जाता है। सम्बन्ध- इस प्रकार समबुद्धि रूप कर्मयोग का और उसके फल का महत्त्व बतलाकर अब दो श्लोकों में भगवान् कर्मयोग का स्वरूप बतलाते हुए अर्जुन को कर्मयोग में स्थित होकर कर्म करने के लिये कहते हैं- तेरा कर्म करने में ही अधिकार है उसके फलों में कमी नहीं। इसलिये तू कर्मों के फल का हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो। हे धनंजय! तू आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धि वाला होकर योग में स्थित हुआ कर्तव्य कर्मों को कर समत्व ही योग कहलाता है। सम्बन्ध- इस प्रकार कर्मयोग की प्रक्रिया बतलाकर अब सकाम भाव की निन्दा और समभावरूप बुद्धि योग का महत्व प्रकट करते हुए भगवान् अर्जुन को उसका आश्रय लेने के लिये आज्ञा देते हैं- इस समत्व रूप बुद्धि योग से सकाम कर्म अत्यन्त ही निम्न श्रेणी का है। इसलिये हे धनजंय! तु समबुद्धि में ही रक्षा का उपाय ढूँढ़ अर्थात् बुद्धियोग का ही आश्रय ग्रहण कर; क्योंकि फल के हेतु बनने वाले अत्यन्त दीन हैं। समबुद्धियुक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनों को इसी लोक में त्याग देता है अर्थात उनसे मुक्त हो जाता है इससे तू समत्वरूप योग में लग जायेगा; यह समत्वरूप योग ही कर्मों में कुशलता है अर्थात कर्मबन्धन से छूटने का उपाय है। क्योंकि समबुद्धि से युक्त ज्ञानीजन कर्मों से उत्पन्न होने वाले फल को त्यागकर जन्मरूप बन्धन से मुक्त हो निर्विकार परमपद को प्राप्त हो जाते हैं। सम्बन्ध- भगवान् ने कर्मयोग के आचरण द्वारा अनामय पद की प्राप्ति बतलायी, इस पर अर्जुन को यह जिज्ञासा हो सकती है कि अनामय परम पद की प्रात्ति मुझे कब और कैसे होगी, इसके लिये भगवान् दो श्लोकों में कहते हैं- जिस काल में तेरी बुद्धि मोह रूप दलदल को भलीभाँति पार कर जायेगी, उस समय तू सुने हुए और सुनने में आने वाले इस लोक और परलोक सम्बन्धी सभी मार्गों से वैराग्य को प्राप्त हो जायेगा। भाँति-भाँति के वचनों को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा में अचल और स्थिर ठहर जायेगी, तब तू योग को प्राप्त हो जायेगा अर्थात् तेरा परमात्मा से नित्य संयोग हो जायेगा। सम्बन्ध- पूर्व श्लोक में भगवान् ने यह बात कही की जब तुम्हारी बुद्धि परमात्मा में निश्चल ठहर जायेगी, तब तुम परमात्मा को प्राप्त हो जाओगे। इस पर परमात्मा की प्राप्त स्थितप्रज्ञ सिद्धयोगी के लक्षण और आचरण जानने की इच्छा से अर्जुन पूछते हैं- अर्जुन बोले- हे केशव! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिर बुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिर बुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? सम्बन्ध- पूर्व श्लोक में अर्जुन ने परमात्मा को प्राप्त हुए सिद्ध योग के विषय में चार बातें पूछी हैं; इन चारों बातों का उत्तर भगवान् ने अध्याय की समाप्ति पर्यन्त दिया है, बीच में प्रसंगवश दूसरी बातें भी कही हैं। इस अगले श्लोक में भगवान् अर्जुन के पहले प्रश्न का उत्तर संक्षेप में देते हैं- श्रीभगवान् बोले- हे अर्जुन! जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है। सम्बन्ध- अब दो श्लोकों में स्थितप्रज्ञ कैसे बोलता है इस दूसरे प्रश्न का उत्तर दिया जाता है- दु:खों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्देग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में जो सर्वथा नि:स्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं, ऐसा मुनि स्थिर बुद्धि कहा जाता है। जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है उसकी बुद्धि स्थिर है। सम्बन्ध- अब भगवान् वह कैसे बैठता है? इस तीसरे प्रश्न का उत्तर देते हैं- कछुआ सब ओर से अपने अङ्गों को जैसे समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है (ऐसा समझना चाहिये)। सम्बन्ध- पूर्व श्लोक में तीसरे प्रश्न का उत्तर देते हुए स्थितप्रज्ञ के बैठने का प्रकार बतलाकर अब उसमें होने वाली शंकाओं का समाधान करने के लिये अन्य प्रकार से किये जाने वाले इन्द्रिय संयम की अपेक्षा स्थितप्रज्ञ के इन्द्रिय संयम की विलक्षणता दिखलाते हैं- इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है। सम्बन्ध- आसक्ति का नाश और इन्द्रिय संयम नहीं होने से क्या हानि है? इस पर कहते हैं- हे अर्जुन! आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमंथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ यत्न करते हुए बुद्धिमान् पुरुष के मन को भी बलात्कार से हर लेती हैं। इसलिये साधक को चाहिये कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे; क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती है उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है। सम्बन्ध- उपर्युक्त प्रकार से मनसहित इन्द्रियों को वश में न करने से और भगवत्परायण न होने से क्या हानि है ? यह बात अब दो श्लोकों में बतलायी जाती हैं- विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामनायें विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से अत्यन्त मूढभाव उत्पन्न हो जाता है, मूढभाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है। सम्बन्ध- इस प्रकार मन सहित इन्द्रियों को वश में न करने वाले मनुष्य के पतन का क्रम बतलाकर अब भगवान् स्थितप्रज्ञ योगी कैसे चलता है इस चौथे प्रश्न का उत्तर आरम्भ करते हुए पहले दो श्लोकों में जिसके मन और इन्द्रियाँ वश में होते हैं, ऐसे साधक द्वारा विषयों में विचरण किये जाने का प्रकार और उसका फल बतलाते हैं- परन्तु अपने अधीन किये हुए अन्त:करण वाला साधक अपने वश में की हुई रागद्वेष से रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ अन्त:करण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है। अन्त:करण की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दु:खों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्न चित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भली-भाँति स्थिर हो जाती है। सम्बन्ध- इस प्रकार मन और इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त भाव से इन्द्रियों द्वारा व्यवहार करने वाले साधक को सुख, शान्ति और स्थितप्रज्ञ अवस्था प्राप्त होने की बात कहकर अब दो श्लोकों द्वारा इससे विपरित जिसके मन इन्द्रिय जीते हुए नहीं हैं, ऐसे विषयासक्त मनुष्य में सुख शान्ति का अभाव दिखलाकर विषयों के संग से उसकी बुद्धि के विचलित हो जाने का प्रकार बतलाते हैं- न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्त:करण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है? क्योंकि जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है। इसीलिये हे महाबाहो! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों से सब प्रकार निग्रह की हुई हैं उसी की बुद्धि स्थिर है। सम्पूर्ण प्राणियों के लिये जो रात्रि के समान है, उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्द की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ योगी जागता है और जिस नाशवान सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं, परमात्मा के तत्त्व को जानने वाले मुनि के लिये वह रात्रि के समान है। जैसे नाना नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किये बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परम शान्ति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं। सम्बन्ध- स्थितप्रज्ञ कैसे चलता है? अर्जुन का यह चौथा प्रश्न परमात्मा को प्राप्त हुए पुरुष के विषय में ही था; किन्तु यह प्रश्न आचरण विषयक होने के कारण उसके उत्तर में चौंसठवें श्लोक से यहाँ तक किस प्रकार आचरण करने वाला मनुष्य शीघ्र स्थितप्रज्ञ बन सकता है, कौन नहीं बन सकता और जब मनुष्य स्थितप्रज्ञ हो जाता है उस समय उसकी कैसी स्थिती होती है- ये सब बातें बतलायी गयीं। अब उस चौथे प्रश्न का स्पष्ट उत्तर देते हुए स्थितप्रज्ञ पुरुष के आचरण का प्रकार बतलाते हैं- जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्यागकर ममतारहित, अहंकाररहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है, वही शान्ति को प्राप्त होता है अर्थात् वह शान्ति को प्राप्त है। सम्बन्ध- इस प्रकार अर्जुन के चारों प्रश्नों का उत्तर देने के अनन्तर अब स्थितप्रज्ञ पुरुष की स्थिति का महत्त्व बतलाते हुए इस अध्याय का उपसंहार करते हैं- हे अर्जुन! यह ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति है; इसको प्राप्त होकर योगी कभी मोहित नहीं होता और अन्तकाल में भी इस ब्राह्य स्थिति में स्थित होकर ब्रह्मानन्द को प्राप्त हो जाता है। ० ० ० इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतापर्व के अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्र रूप श्रीमद्भावद्गीतोपनिषद, श्री कृष्णार्जुन संवाद में सांख्ययोग नामक दूसरा अध्याय पूरा हुआ॥२॥ ----------:::×:::---------- "जय जय श्रीहरि" "कुमार रौनक कश्यप " *******************************************

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. ॥हरि ॐ तत्सत्॥ श्रीमद्भागवत-कथा श्रीमद्भागवत-महापुराण पोस्ट - 307 स्कन्ध - 11 अध्याय - 10 इस अध्याय में:- लौकिक तथा पारलौकिक भोगों की असारता का निरूपण भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- 'प्यारे उद्धव! साधक को चाहिये कि सब तरह से मेरी शरण में रहकर (गीता-पंचरात्र आदि में) मेरे द्वारा उपदिष्ट अपने धर्मों का सावधानी से पालन करे। साथ ही जहाँ तक उनसे विरोध न हो ,वहाँ तक निष्काम भाव से अपने वर्ण, आश्रम और कुल के अनुसार सदाचार का भी अनुष्ठान करे। निष्काम होने का उपाय यह है कि स्वधर्मों का पालन करने से शुद्ध हुए अपने चित्त में यह विचार करे कि जगत् के विषयी प्राणी शब्द, स्पर्श, रूप आदि विषयों को सत्य समझकर उनकी प्राप्ति के लिये जो प्रयत्न करते हैं, उसमें उनका उद्देश्य तो यह होता है कि सुख मिले, परन्तु मिलता है दुःख, इसके सम्बन्ध में ऐसा विचार करना चाहिये कि स्वप्नावस्था में और मनोरथ करते समय जाग्रत्-अवस्था में भी मनुष्य मन-ही-मन अनेकों प्रकार के विषयों का अनुभव करता है, परन्तु उसकी वह सारी कल्पना वस्तुशून्य होने के कारण व्यर्थ है। वैसे ही इन्द्रियों के द्वारा होने वाली भेद बुद्धि भी व्यर्थ ही है, क्योंकि यह भी इन्द्रियजन्य और नाना वस्तु विषयक होने के कारण पूर्ववत् असत्य ही है। जो पुरुष मेरी शरण में है, उसे अन्तर्मुख करने वाले निष्काम अथवा नित्यकर्म ही करने चाहिये। उन कर्मों का बिलकुल परित्याग कर देना चाहिये जो बहिर्मुख बनाने वाले अथवा सकाम हों। जब आत्मज्ञान की उत्कट इच्छा जाग उठे, तब तो कर्मसम्बन्धी विधि-विधानों का भी आदर नहीं करना चाहिये। अहिंसा आदि यमों का तो आदरपूर्वक सेवन करना चाहिये, परन्तु शौच (पवित्रता) आदि नियमों का पालन शक्ति के अनुसार और आत्मज्ञान के विरोधी न होने पर ही करना चाहिये। जिज्ञासु पुरुष के लिये यम और नियमों के पालन से भी बढ़कर आवश्यक बात यह है कि वह अपने गुरु की, जो मेरे स्वरूप को जानने वाले और शान्त हों, मेरा ही स्वरूप समझकर सेवा करे। शिष्य को अभिमान न करना चाहिये। वह कभी किसी से डाह न करे-किसी का बुरा न सोचे। वह प्रत्येक कार्य में कुशल हो-उसे आलस्य छू न जाये। उसे कहीं भी ममता न हो, गुरु के चरणों में दृढ़ अनुराग हो। कोई काम हड़बड़ाकर न करे-उसे सावधानी से पूरा करे। सदा परमार्थ के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा बनाये रखे। किसी के गुणों में दोष न निकाले और व्यर्थ की बात न करे। जिज्ञासु का परम धन है आत्मा; इसलिये वह स्त्री-पुत्र, घर-खेत, स्वजन और धन आदि सम्पूर्ण पदार्थों में एक सम आत्मा को देखे और किसी में कुछ विशेषता का आरोप करके उससे ममता न करे, उदासीन रहे। उद्धव! जैसे जलने वाली लकड़ी से उसे जलाने और प्रकाशित करने वाली आग सर्वथा अलग है। ठीक वैसे ही विचार करने पर जान पड़ता है कि पंचभूतों का बना स्थूल शरीर और मन-बुद्धि आदि सत्रह तत्त्वों का बना सूक्ष्म शरीर दोनों ही दृश्य और जड़ हैं तथा उनको जानने और प्रकाशित करने वाला आत्मा साक्षी एवं स्वयं प्रकाश है। शरीर अनित्य, अनेक एवं जड़ है। आत्मा नित्य, एक एवं चेतन है। इस प्रकार देह की अपेक्षा आत्मा में महान् विलक्षणता है। अतएव देह से आत्मा भिन्न है। जब आग लकड़ी में प्रज्वलित होती है, तब लकड़ी के उत्पत्ति-विनाश, बड़ाई-छोटाई और अनेकता आदि सभी गुण वह स्वयं ग्रहण कर लेती है। परन्तु सच पूछो तो लकड़ी के उन गुणों से आग का कोई सम्बन्ध नहीं है। वैसे ही जब आत्मा अपने को शरीर मान लेता है, तब वह देह के जड़ता, अनित्यता, स्थूलता, अनेकता आदि गुणों से सर्वदा रहित होने पर भी उनसे युक्त जान पड़ता है। ईश्वर के द्वारा नियन्त्रित माया के गुणों ने ही सूक्ष्म और स्थूल शरीर का निर्माण किया है। जीव को शरीर और शरीर को जीव समझ लेने के कारण ही स्थूल शरीर के जन्म-मरण और सूक्ष्म शरीर के आवागमन का आत्मा पर आरोप किया जाता है। जीव को जन्म-मृत्युरूप संसार इसी भ्रम अथवा अध्यास के कारण प्राप्त होता है। आत्मा के स्वरूप का ज्ञान होने पर उसकी जड़ कट जाती है। प्यारे उद्धव! इस जन्म-मृत्युरूप संसार का कोई दूसरा कारण नहीं, केवल अज्ञान ही मूल कारण है। इसलिए अपने वास्तविक स्वरूप को, आत्मा को जानने की इच्छा करनी चाहिये। अपना यह वास्तविक स्वरूप समस्त प्रकृति और प्राकृत जगत् से अतीत, द्वैत की गन्ध से रहित एवं अपने-आप में ही स्थित हैं। उसका कोई और आधार नहीं है। उसे जानकार धीरे-धीरे स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर आदि में जो सत्यत्व बुद्धि हो रही है, उसे क्रमशः मिटा देना चाहिये। (यज्ञ में जब अरणि मन्थन करके अग्नि उत्पन्न करते हैं, तो उसमें नीचे-ऊपर दो लकड़ियाँ रहती हैं और बीच में मन्थन काष्ठ रहता है; वैसे ही) विद्यारूप अग्नि की उत्पत्ति के लिये आचार्य और शिष्य तो नीचे-ऊपर की अरणियाँ हैं तथा उपदेश मन्थन काष्ठ है। इनसे जो ज्ञानाग्नि प्रज्वलित होती है, वह विलक्षण सुख देने वाली है। इस यज्ञ में बुद्धिमान शिष्य सद्गुरु के द्वारा जो अत्यन्त विशुद्ध ज्ञान प्राप्त करता है, वह गुणों से बनी हुई विषयों की माया को भस्म कर देता है। तत्पश्चात् वे गुण भी भस्म हो जाते हैं, जिनसे कि यह संसार बना हुआ है। इस प्रकार सब के भस्म हो जाने पर जब आत्मा के अतिरिक्त और कोई वस्तु शेष नहीं रह जाती, तब वह ज्ञानाग्नि भी ठीक वैसे ही अपने वास्तविक स्वरूप में शान्त हो जाती है, जैसे समिधा न रहने पर आग बुझ जाती है। प्यारे उद्धव! यदि तुम कदाचित् कर्मों के कर्ता और सुख-दुःखों के भोक्ता जीवों को अनेक तथा जगत्, काल, वेद और आत्माओं को नित्य मानते हो; साथ ही समस्त पदार्थों की स्थिति प्रवाह से नित्य और यथार्थ स्वीकार करते हो तथा यह समझते हो कि घर-घट आदि बाह्य आकृतियों के भेद से उनके अनुसार ज्ञान ही उत्पन्न होता और बदलता रहता है; तो ऐसे मत के मानने से बड़ा अनर्थ हो जायेगा। (क्योंकि इस प्रकार जगत् के कर्ता आत्मा की नित्य सत्ता और जन्म-मृत्यु के चक्कर से मुक्ति भी सिद्ध न हो सकेगी।) यदि कदाचित् ऐसा स्वीकार भी कर लिया जाये तो देह और संवत्सरादि कालावयवों के सम्बन्ध से होने वाली जीवों की जन्म-मरण आदि अवस्थाएँ भी नित्य होने के कारण दूर न हो सकेंगी; क्योंकि तुम देहादि पदार्थ और काल की नित्यता स्वीकार करते हो। इसके सिवा, यहाँ भी कर्मों का कर्ता तथा सुख-दुःख का भोक्ता जीव परतन्त्र ही दिखायी देता है; यदि वह स्वतन्त्र हो तो दुःख का फल क्यों भोगना चाहेगा? इस प्रकार सुख-भोग की समस्या सुलझ जाने पर भी दुःख-भोग की समस्या तो उलझी हो रहेगी। अतः इस मत के अनुसार जीव को कभी मुक्ति या स्वतन्त्रता प्राप्त न हो सकेगी। अब जीव स्वरूपतः परतन्त्र है, विवश है, तब तो स्वार्थ या परमार्थ कोई भी उसका सेवन न करेगा। अर्थात् वह स्वार्थ और परमार्थ दोनों से ही वंचित रह जायेगा। (यदि यह कहा जाये कि जो भलीभाँति कर्म करना जानते हैं, वे सुखी रहते हैं, और जो नहीं जानते उन्हें दुःख भोगना पड़ता है तो यह कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि) ऐसा देखा जाता है कि बड़े-बड़े कर्मकुशल विद्वानों को भी कुछ सुख नहीं मिलता और मूढ़ों का भी कभी दुःख से पाला नहीं पड़ता। इसलिये जो लोग अपनी बुद्धि या कर्म से सुख पाने का घमंड करते हैं, उनका वह अभिमान व्यर्थ है। यदि यह स्वीकार कर लिया जाये कि वे लोग सुख की प्राप्ति और दुःख के नाश का ठीक-ठाक उपाय जानते हैं, तो भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि उन्हें भी ऐसे उपाय का पता नहीं है, जिससे मृत्यु उनके ऊपर कोई प्रभाव न डाल सके और वे कभी मरें ही नहीं। जब मृत्यु उनके सिर पर नाच रही है, तब ऐसी कौन-सी भोग-सामग्री या भोग-कामना है, जो उन्हें सुखी कर सके? भला, जिस मनुष्य को फाँसी पर लटकाने के लिये वधस्थान पर ले जाया जा रहा है, उसे क्या फूल-चन्दन-स्त्री आदि पदार्थ सन्तुष्ट कर सकते हैं? कदापि नहीं। (अतः पूर्वोक्त मत मानने वालों की दृष्टि से न सुख ही सिद्ध होगा और न जीव का कुछ पुरुषार्थ ही रहेगा)। प्यारे उद्धव! लौकिक सुख के समान पारलौकिक सुख भी दोषयुक्त ही है; क्योंकि वहाँ भी बराबरी वालों से होड़ चलती है, अधिक सुख भोगने-वालों के प्रति असूया होती है-उनके गुणों में दोष निकाला जाता है और छोटों से घृणा होती है। प्रतिदिन पुण्य क्षीण होने के साथ ही वहाँ के सुख भी क्षय के निकट पहुँचते रहते हैं और एक दिन नष्ट हो जाते हैं। वहाँ की कामना पूर्ण होने में भी यजमान, ऋत्विज् और कर्म आदि की त्रुटियों के कारण बड़े-बड़े विघ्नों की सम्भावना रहती है। जैसे हरी-भरी खेती भी अतिवृष्टि-अनावृष्टि आदि के कारण नष्ट हो जाती है, वैसे ही स्वर्ग भी प्राप्त होते-होते विघ्नों के कारण नहीं मिल पाता। यदि यज्ञ-यागादी धर्म बिना किसी विघ्न के पूरा हो जाये तो उसके द्वारा जो स्वर्गादि लोक मिलते हैं, उनकी प्राप्ति का प्रकार मैं बतलाता हूँ, सुनो। यज्ञ करने वाला पुरुष यज्ञों के द्वारा देवताओं की आराधना करके स्वर्ग में जाता है और वहाँ अपने पुण्यकर्मों के द्वारा उपार्जित दिव्य भोगों को देवताओं के समान भोगता है। उसे उसके पुण्यों के अनुसार एक चमकीला विमान मिलता है और वह उस पर सवार होकर सुर-सुन्दरियों के साथ विहार करता है। गन्धर्वगण उसके गुणों का गान करते हैं और उसके रूप-लावण्य को देखकर दूसरों का मन लुभा जाता है। उसका विमान वह जहाँ ले जाना चाहता है, वहीं चला जाता है और उसकी घंटियाँ घनघनाकर दिशाओं को गुंजारित करती हैं। वह अप्सराओं के साथ नन्दनवन आदि देवताओं की विहार-स्थलियों में क्रीड़ाएँ करते-करते इतना वेसुध हो जाता है कि उसे इस बात का पता ही नहीं चलता कि अब मेरे पुण्य समाप्त हो जायेंगे और मैं यहाँ से ढकेल दिया जाऊँगा। जब तक उसके पुण्य शेष रहते हैं, तब तक वह स्वर्ग में चैन की वंशी बजाता रहता है; परन्तु पुण्य क्षीण होते ही इच्छा न रहने पर भी उसे नीचे गिरना पड़ता है, क्योंकि काल की चाल ही ऐसी है। यदि कोई मनुष्य दुष्टों की संगती में पड़कर अधर्म-परायण हो जाये, अपनी इन्द्रियों के वश में होकर मनमानी करने लगे, लोभवश दाने-दाने में कृपणता करने लगे, लम्पट हो जाये अथवा प्राणियों को सताने लगे और विधि-विरुद्ध पशुओं की बलि देकर भूत और प्रेतों की उपासना में लग जाये, तब तो वह पशुओं से भी गया-बीता हो जाता है और अवश्य ही नरक में जाता है। उसे अन्त में घोर अन्धकार, स्वार्थ और परमार्थ से रहित अज्ञान में ही भटकना पड़ता है। जितने भी सकाम और बहिर्मुख करने वाले कर्म हैं, उनका फल दुःख ही है। जो जीव शरीर में अहंता-ममता करके उन्हीं में लग जाता है, उसे बार-बार जन्म-पर-जन्म और मृत्यु-पर-मृत्यु प्राप्त होती रहती है। ऐसी स्थिति में मृत्युधर्मा जीव को क्या सुख हो सकता है? सारे लोक और लोकपालों की आयु भी केवल एक कल्प है, इसलिये मुझसे भयभीत रहते हैं। औरों की बात ही क्या, स्वयं ब्रह्मा भी मुझसे भयभीत रहते हैं; क्योंकि उनकी आयु भी काल से सीमित-केवल दो परार्द्ध है। सत्त्व, रज और तम-ये तीनों गुण इन्द्रियों को उनके कर्मों में प्रेरित करते हैं और इन्द्रियाँ कर्म करती हैं। जीव अज्ञानवश सत्त्व, रज आदि गुणों और इन्द्रियों को अपना स्वरूप मान बैठता है और उनके किये हुए कर्मों का फल सुख-दुःख भोगने लगता है। जब तक गुणों की विषमता है अर्थात् शरीरादि में मैं और मेरेपन का अभिमान है; तभी तक आत्मा के एकत्व की अनुभूति नहीं होती-वह अनेक जान पड़ता है; और जब तक आत्मा की अनेकता है, तब तक तो उन्हें काल अथवा कर्म किसी के अधीन रहना ही पड़ेगा। जब तक परतन्त्रता है, तब तक ईश्वर से भय बना ही रहता है। जो मैं ओर मेरेपन के भाव से ग्रस्त रहकर आत्मा की अनेकता, परतन्त्रता आदि मानते हैं तो वैराग्य न ग्रहण करके बहिर्मुख करने वाले कर्मों का ही सेवन करते रहते हैं, उन्हें शोक और मोह की प्राप्ति होती है। प्यारे उद्धव! जब माया के गुणों में क्षोभ होता है, तब मुझ आत्मा को ही काल, जीव, वेद, लोक, स्वभाव और धर्म आदि अनेक नामों से निरूपण करने लगते हैं। (ये सब मायामय है। वास्तविक सत्य मैं आत्मा ही हूँ)। उद्धव जी ने पूछा- 'भगवन्! यह जीव देह आदि रूप गुणों में ही रह रहा है। फिर देह से होने वाले कर्मों या सुख-दुःख आदि रूप फलों में क्यों नहीं बँधता है? अथवा यह आत्मा गुणों से निर्लिप्त है, देह आदि के सम्पर्क से सर्वथा रहित है, फिर इसे बन्धन की गति कैसे होती है? बद्ध अथवा मुक्त पुरुष कैसा बर्ताव करता है, वह कैसे विहार करता है, या वह किन लक्षणों से पहचाना जाता है, कैसे भोजन करता है? और मल-त्याग आदि कैसे करता है? कैसे सोता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? अच्युत! प्रश्न का मर्म जानने वालों में आप श्रेष्ठ हैं। इसलिये आप मेरे इस प्रश्न का उत्तर दीजिये-एक आत्मा अनादि गुणों के संसर्ग से नित्यबद्ध भी मालूम पड़ता है और असंग होने के कारण नित्य मुक्त भी। इस बात को लेकर मुझे भ्रम हो रहा है। ~~~०~~~ श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" "कुमार रौनक कश्यप " ********************************************

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. श्रीगरुड़ पुराण (सारोद्धार) अध्याय - 02 इस अध्याय में:- (यममार्ग की यातनाओं का वर्णन, वैतरणी नदी का स्वरूप, यममार्ग के सोलह पुरों में क्रमश: गमन तथा वहाँ पुत्रादिकों द्वारा दिये गये पिण्डदान को ग्रहण करना) गरुड़ जी ने कहा, 'हे केशव ! यमलोक का मार्ग किस प्रकार दु:खदायी होता है। पापी लोग वहाँ किस प्रकार जाते हैं, वह मुझे बताइये। श्री भगवान बोले, 'हे गरुड़ ! महान दुख प्रदान करने वाले यममार्ग के विषय में मैं तुमसे कहता हूँ, मेरा भक्त होने पर भी तुम उसे सुनकर काँप उठोगे। यममार्ग में वृक्ष की छाया नहीं है, जहाँ प्राणी विश्राम कर सके। उस यममार्ग में अन्न आदि भी नहीं हैं, जिनसे कि वह अपने प्राणों की रक्षा कर सके? 'हे खग ! वहाँ कहीं जल भी नहीं दिखता, जिसे अत्यन्त तृषातुर वह जीव पी सके। वहाँ प्रलयकाल की भाँति बारहों सूर्य तपते रहते हैं। उस मार्ग में जाता हुआ पापी कभी बर्फीली हवा से पीड़ित होता है तथा कभी काँटे चुभते हैं और कभी महाविषधर सर्पों के द्वारा डसा जाता है। वह पापी कहीं सिंहों, व्याघ्रों और भयंकर कुत्तों द्वारा खाया जाता है, कहीं बिच्छुओं द्वारा डसा जाता है और कहीं उसे आग से जलाया जाता है। तब कहीं अति भयंकर महान असिपत्रवन नामक नरक में वह पहुँचता है, जो दो हजार योजन विस्तारवाला कहा गया है। वह वन कौओं, उल्लुओं, वटों (पक्षी विशेषों), गीधों, सरघों तथा डाँसों से व्याप्त है। उसमें चारों ओर दावाग्नि व्याप्त है, असिपत्र के पत्तों से वह जीव उस वन में छिन्न-भिन्न हो जाता है। कहीं अंधे कुएँ में गिरता है, कहीं विकट पर्वत से गिरता है, कहीं छुरे की धार पर चलता है तो कहीं कीलों के ऊपर चलता है। कहीं घने अन्धकार में गिरता है, कहीं उग्र (भय उत्पन्न करने वाले) जल में गिरता है, कहीं जोंको से भरे हुए कीचड़ में गिरता है तो कहीं जलते हुए कीचड़ में गिरता है। कहीं तपी हुई बालुका से व्याप्त और कहीं धधकते हुए ताम्रमय मार्ग, कहीं अंगार की राशि और कहीं अत्यधिक धुएँ से भरे हुए मार्ग पर उसे चलना पड़ता है। कहीं अंगार की वृष्टि होती है, कहीं बिजली गिरने के साथ शिलावृष्टि होती है, कहीं रक्त की, कहीं शस्त्र की और कहीं गर्म जल की वृष्टि होती है। कहीं खारे कीचड़ की वृष्टि होती है, मार्ग में कहीं गहरी खाई है, कहीं पर्वत-शिखरों की चढ़ाई है, और कहीं कन्दराओं में प्रवेश करना पड़ता है। वहाँ मार्ग में कहीं घना अंधकार है तो कहीं दु:ख से चढ़ी जाने योग्य शिलाएँ हैं, कहीं मवाद, रक्त तथा विष्ठा से भरे हुए तालाब हैं। यम मार्ग के बीचोबीच अत्यन्त उग्र और घोर वैतरणी नदी बहती है। वह देखने पर दु:खदायिनी हो तो क्या आश्चर्य? उसकी वार्ता ही भय पैदा करने वाली है। वह सौ योजन चौड़ी है, उसमें पूय (पीब-मवाद) और शोणित (रक्त) बहते रहते हैं। हड्डियों के समूह से तट बने हैं अर्थात उसके तट पर हड्डियों का ढेर लगा रहता है। माँस और रक्त के कीचड़ वाली वह नदी दु:ख से पार की जाने वाली है। अथाह गहरी और पापियों द्वारा दु:खपूर्वक पार की जाने वाली यह नदी केशरूपी सेवार से भरी होने के कारण दुर्गम है। वह विशालकाय ग्राहों (घड़ियालों) से व्याप्त है और सैकड़ो प्रकार के घोर पक्षियों से आवृत है। 'हे गरुड़ ! आये हुए पापी को देखकर वह नदी ज्वाला और धूम से भरकर कड़ाह में रखे घृत की भाँति खौलने लगती है। वह नदी सूई के समान मुख वाले भयानक कीड़ो से चारों ओर व्याप्त है। वज्र के समान चोंच वाले बड़े-बड़े गीध एवं कौओं से घिरी हुई है। वह नदी शिशुमार, मगर, जोंक, मछली, कछुए तथा अन्य मांसभक्षी जलचर, 'जीवों से भरी पड़ी है। उसके प्रवाह में गिरे हुए बहुत से पापी रोते-चिल्लाते हैं और 'हे भाई! हा पुत्र! हा तात!, 'इस प्रकार कहते हुए बार-बार विलाप करते हैं। भूख और प्यास से व्याकुल होकर पापी जीव रक्त का पान करते हैं। वह नदी झागपूर्ण रक्त के प्रवाह से व्याप्त, महाघोर, अत्यन्त गर्जना करने वाली, देखने में दु:ख पैदा करने वाली तथा भयावह है। उसके दर्शन मात्र से पापी चेतनाशून्य हो जाते हैं। बहुत से बिच्छू तथा काले सर्पों से व्याप्त उस नदी के बीच में गिरे हुए पापियों की रक्षा करने वाला कोई नहीं है। उसके सैकड़ों, हजारों भँवरों में पड़कर पापी पाताल में चले जाते हैं। क्षण भर पाताल में रहते हैं और एक क्षण में ही ऊपर चले आते हैं। 'हे खग! वह नदी पापियों के गिरने के लिए ही बनाई गई है। उसका पार नहीं दिखता। वह अत्यन्त दु:खपूर्वक तरने योग्य तथा बहुत दु:ख देने वाली है। इस प्रकार बहुत प्रकार के क्लेशों से व्याप्त अत्यन्त दु:खप्रद यममार्ग में रोते-चिल्लाते हुए दु:खी पापी जाते हैं। कुछ पापी पाश से बँधे होते हैं और कुछ अंकुश में फंसाकर खींचे जाते हैं, और कुछ शस्त्र के अग्र भाग से पीठ में छेदते हुए ले जाये जाते हैं। कुछ नाक के अग्र भाग में लगे हुए पाश से और कुछ कान में लगे हुए पाश से खीचे जाते हैं। कुछ काल पाश से खींचे जाते हैं और कुछ कौओं से खींचे जाते हैं। वे पापी गरदन, हाथ तथा पैर में जंजीर से बँधे हुए तथा अपनी पीठ पर लोहे के भार को ढोते हुए मार्ग पर चलते हैं। अत्यन्त घोर यमदूतों के द्वारा मुद्गरों से पीटे जाते हुए वे मुख से रक्त वमन करते हुए तथा वमन किये हुए रक्त को पुन: पीते हुए जाते हैं। उस समय अपने दुष्कर्मों को सोचते हुए प्राणी अत्यन्त ग्लानि का अनुभव करते हैं और अतीव दु:खित होकर यमलोक को जाते हैं। इस प्रकार यममार्ग में जाता हुआ वह मन्दबुद्धि प्राणी हा पुत्र !, हा पौत्र ! इस प्रकार पुत्र और पौत्रों को पुकारते हुए, हाय-हाय इस प्रकार विलाप करते हुए पश्चाताप की ज्वाला से जलता रहता है। वह विचार करता है कि महान पुण्य के संबंध से मनुष्य-जन्म प्राप्त होता है, उसे प्राप्त कर भी मैंने धर्माचरण नहीं किया, यह मैंने क्या किया। मैंने दान दिया नहीं, अग्नि में हवन किया नहीं, तपस्या की नहीं, देवताओं की भी पूजा की नहीं, विधि-विधान से तीर्थ सेवा की नहीं, अत: हे जीव! जो तुमने किया है, उसी का फल भोगों। हे देही ! तुमने ब्राह्मणों की पूजा की नहीं, देव नदी गंगा का सहारा लिया नहीं, सत्पुरुषों की सेवा की नहीं, कभी भी दूसरे का उपकार किया नहीं, इसलिए हे जीव ! जो तुमने किया है, अब उसी का फल भोगों। मनुष्यों और पशु-पक्षियों के लिए जलहीन प्रदेश में जलाशय का निर्माण किया नहीं। गौओं और ब्राह्मणों की आजीविका के लिए थोड़ा भी प्रयास किया नहीं, इसलिए हे देही! तुमने जो किया है, उसी से अपना निर्वाह करो। तुमने नित्य-दान किया नहीं, गौओं के दैनिक भरण-पोषण की व्यवस्था की नहीं, वेदों और शास्त्रों के वचनों को प्रमाण माना नहीं, पुराणों को सुना नहीं, विद्वानों की पूजा की नहीं, इसलिए हे देही ! जो तुमने किया है, उन्हीं दुष्कर्मों के फल को अब भोगों। नारी-जीव भी पश्चाताप करते हुए कहता है मैंने पति की हितकर आज्ञा का पालन किया नहीं, पातिव्रत्य धर्म का कभी पालन किया नहीं और गुरुजनों को गौरवोचित सम्मान कभी दिया नहीं, इसलिए हे देहिन्! जो तुमने किया, उसी का अब फल भोगों। धर्म की बुद्धि से एकमात्र पति की सेवा की नहीं और पति की मृत्यु हो जाने पर वह्निप्रवेश करके उनका अनुगमन किया नहीं, वैधव्य प्राप्त करके त्यागमय जीवन व्यतीत किया नहीं, इसलिए हे देहिन्! जैसा किया, उसका फल अब भोगों। मास पर्यन्त किए जाने वाले उपवासों से तथा चान्द्रायण-व्रतों आदि सुविस्तीर्ण नियमों के पालन से शरीर को सुखाया नहीं। पूर्वजन्म में किये हुए दुष्कर्मों से बहुत प्रकार के दु:खों को प्राप्त करने के लिए नारी-शरीर प्राप्त किया था। इस तरह बहुत प्रकार से विलाप करके पूर्व देह का स्मरण करते हुए ‘मेरा मानव-जन्म शरीर कहाँ चला गया’ इस प्रकार चिल्लाता हुआ वह यमममार्ग में चलता है। 'हे तार्क्ष्य ! इस प्रकार सत्रह दिन तक अकेले वायु वेग से चलते हुए अठारहवें दिन वह प्रेत सौम्यपुर में जाता है। उस रमणीय श्रेष्ठ सौम्यपुर में प्रेतों का महान गण रहता है। वहांँ पुष्पभद्रा नदी और अत्यन्त प्रिय दिखने वाला वटवृक्ष है। उस पुर में यमदूतों के द्वारा उसे विश्राम कराया जाता है। वहाँ दुखी होकर वह स्त्री-पुत्रों के द्वारा प्राप्त सुखों का स्मरण करता है। वह अपने धन, भृत्य और पौत्र आदि के विषय में जब सोचने लगता है तो वहाँ रहने वाले यम के किंकर उससे इस प्रकार कहते हैं, 'धन कहाँ है? पुत्र कहाँ है? पत्नी कहाँ है? मित्र कहाँ है? बन्धु-बान्धव कहाँ है? हे मूढ़ ! जीव अपने कर्मोपार्जित फल को ही भोगता है इसलिए सुदीर्घ काल तक इस यम मार्ग पर चलो। हे परलोक के राही! तू यह जानता है कि राहगीरों का बल और संबल पाथेय ही होता है, जिसके लिए तूने प्रयास तो किया नहीं। तू यह भी नहीं जानता था कि तुम्हें निश्चित ही उस मार्ग पर चलना है और उस रास्ते पर कोई भी लेन-देन हो नहीं सकता। यह मार्ग के बालकों को भी विदित रहता है। हे मनुष्य ! क्या तुमने इसे सुना नहीं था? क्या तुमने ब्राह्मणों के मुख से पुराणों के वचन सुने नहीं थे। इस प्रकार कहकर मुद्गरों से पीटा जाता हुआ वह जीव गिरते-पड़ते-दौड़ते हुए बलपूर्वक पाशों से खींचा जाता है। यहाँ स्नेह अथवा कृपा के कारण पुत्र-पौत्रों द्वारा दिये हुए मासिक पिण्ड को खाता है। उसके बाद वह जीव सौरिपुर को प्रस्थान करता है। उस सौरिपुर में काल के रूप को धारण करने वाला जंगम नामक राजा रहता है। उसे देखकर वह जीव भयभीत होकर विश्राम करना चाहता है। उस पुर में गया हुआ वह जीव अपने स्वजनों के द्वारा दिये हुए त्रैपाक्षिक अन्न-जल को खाकर उस पुर को पार करता है। उसके बाद शीघ्रतापूर्वक वह प्रेत नगेन्द्र-भवन की ओर जाता है और वहाँ भयंकर वनों को देखकर दु:खी होकर रोता है। दयारहित दूतों के द्वारा खींचे जाने पर वह बार-बार रोता है और दो मासों के अन्त में वह दुखी होकर वहाँ जाता है। बान्धवों द्वारा दिये गये पिण्ड, जल, वस्त्र का उपभोग करके यमकिंकरों के द्वारा पाश से बार-बार खींचकर पुन: आगे ले जाया जाता है। तीसरे मास में वह गन्धर्वनगर को प्राप्त होता है और वहाँ त्रैमासिक पिण्ड खाकर आगे चलता है। चौथे मास में वह शैलागमपुर में पहुँचता है और वहाँ प्रेत के ऊपर बहुत अधिक पत्थरों की वर्षा होती है। वहाँ चौथे मासिक पिण्ड को खाकर वह कुछ सुखी होता है। उसके बाद पाँचवें महीने में वह प्रेत क्रौंचपुर पहुँचता है। क्रौंचपुर में स्थित वह प्रेत वहाँ बान्धवों द्वारा हाथ से दिये गये पाँचवें मासिक पिण्ड को खाकर आगे क्रूरपुर की ओर चलता है। साढ़े पाँच मास के बाद बान्धवों द्वारा प्रदत्त ऊनषाण्मासिक पिण्ड और घटदान से तृप्त होकर वह वहाँ आधे मुहूर्त तक विश्राम कर के यमदूतों के द्वारा डराये जाने पर दु:ख से काँपता हुआ उस पुर को छोड़कर, 'चित्रभवन नामक पुर को जाता है, जहाँ यम का छोटा भाई विचित्र नाम वाला राजा राज्य करता है। उस विशाल शरीर वाले राजा को देखकर जब वह जीव डर से भागता है, तब सामने आकर कैवर्त धीवर उससे यह कहते हैं, 'हम इस महावैतरणी नदी को पार करने वालों के लिए नाव लेकर आये हैं, यदि तुम्हारा इस प्रकार का पुण्य हो तो इसमें बैठ सकते हो। तत्त्वदर्शी मुनियों ने दान को ही वितरण (देना या बाँटना) कहा है। यह वैतरणी नदी वितरण के द्वारा ही पार की जा सकती है, इसलिए इसको वैतरणी कहा जाता है। यदि तुमने वैतरणी गौ का दान किया हो तो नौका तुम्हारे पास आएगी अन्यथा नहीं। उनके ऎसे वचन सुनकर प्रेत ‘हा देव’ ! ऎसा कहता है। उस प्रेत को देखकर वह नदी खौलने लगती है और उसे देखकर प्रेत अत्यन्त क्रन्दन (विलाप) करने लगता है। जिसने अपने जीवन में कभी दान दिया ही नहीं, ऎसा पापात्मा उसी वैतरणी में डूबता है। तब आकाश मार्ग से चलने वाले दूत उसके मुख में काँटा लगाकर बंसी से मछली की भाँति उसे खींचते हुए पार ले जाते हैं। वहाँ षाण्मासिक पिण्ड खाकर वह अत्यधिक भूख से पीड़ित होकर विलाप करता हुआ आगे के रास्ते पर चलता है। सातवें मास में वह बह्वापदपुर को जाता है और वहाँ अपने पुत्रों द्वारा दिये हुए सप्तम मासिक पिण्ड को खाता है। 'हे पक्षिराज गरुड़ ! उस पुर को पारकर वह दु:खद नामक पुर को जाता है। आकाश मार्ग से जाता हुआ वह महान दु:ख प्राप्त करता है। वहाँ आठवें मास में दिये हुए पिण्ड को खाकर आगे बढ़ता है और नवाँ मास पूर्ण होने पर नानाक्रन्दपुर को प्राप्त होता है। वहाँ क्रन्दन करते हुए अनेक भयावह क्रन्दगणों को देखकर स्वयं शून्य हृदयवाला वह जीव दु:खी होकर आक्रन्दन करने लगता है। उस पुर को छोड़कर वह यमदूतों के द्वारा भयभीत किया जाता हुआ दसवें महीने में अत्यन्त कठिनाई से सुतप्तभवन नामक नगर में पहुँचता है। वहाँ पुत्रादि से पिण्डदान और जलांजलि प्राप्त करके भी सुखी नहीं होता। ग्यारहवाँ मास पूरा होने पर वह रौद्रपुर को जाता है। और पुत्रादि के द्वारा दिये हुए एकादश मासिक पिण्ड को वहाँ खाता है। साढ़े ग्यारह मास बीतने पर वह जीव पयोवर्षण नामक नगर में पहुँचता है। वहाँ प्रेतों को दु:ख देने वाले मेघ घनघोर वर्षा करते हैं, वहाँ पर दु:खी वह प्रेत ऊनाब्दिक श्राद्ध के पिण्ड को खाता है। इसके बाद वर्ष पूरा होने पर वह जीव शीताढ्य नामक नगर को प्राप्त होता है, वहाँ हिम से भी सौ गुनी अधिक महान ठंड पड़ती है। शीत से दु:खी तथा क्षुधित वह जीव इस आशा से दसों दिशाओं में देखता है कि शायद कहीं कोई हमारा बान्धव हो, जो मेरे दु:ख को दूर कर सके। तब यम के दूत कहते हैं, 'तुम्हारा ऎसा पुण्य कहाँ है? फिर वार्षिक पिण्ड को खाकर वह धैर्य धारण करता है। उसके बाद वर्ष के अन्त में यमपुर के निकट पहुँचने पर वह प्रेत बहुभीतिपुर में जाकर हाथ भर माप के अपने शरीर को छोड़ देता है। 'हे पक्षी! पुन: कर्म भोग के लिए अंगुष्ठ मात्र के वायुस्वरुप यातना देह को प्राप्त करके वह यमदूतों के साथ जाता है। 'हे कश्यपात्मज ! जिन्होंने और्ध्वदैहिक, 'मरणकालिक, 'दान नहीं दिए हैं, वे यमदूतों के द्वारा दृढ़ बन्धनों से बँधे हुए अत्यन्त कष्ट से यमपुर को जाते हैं। 'हे आकाशगामी ! धर्मराजपुर में चार द्वार है, जिनमें से दक्षिण द्वार के मार्ग का तुमसे वर्णन कर दिया। इस महान भयंकर मार्ग में भूख-प्यास और श्रम से दु:खी जीव जिस प्रकार जाते हैं, वह सब मैंने बतला दिया। अब और क्या सुनना चाहते हो।' (इस प्रकार गरुड़ पुराण के अन्तर्गत सारोद्वार में “यममार्गनिरुपण” नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ) ----------:::×:::---------- "जय जय श्रीहरि" "कुमार रौनक कश्यप " *******************************************

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. पितृपक्ष में करें गीता के सातवें अध्याय का पाठ सातवें अध्याय का माहात्म्य भगवान शिव कहते हैं–'पार्वती ! अब मैं सातवें अध्याय का माहात्म्य बतलाता हूँ, जिसे सुनकर कानों में अमृत-राशि भर जाती है। पाटलिपुत्र नामक एक दुर्गम नगर है, जिसका गोपुर (द्वार) बहुत ही ऊँचा है। उस नगर में शंकुकर्ण नामक एक ब्राह्मण रहता था, उसने वैश्य-वृत्ति का आश्रय लेकर बहुत धन कमाया, किंतु न तो कभी पितरों का तर्पण किया और न देवताओं का पूजन ही। वह धनोपार्जन में तत्पर होकर राजाओं को ही भोज दिया करता था। एक समय की बात है। उस ब्राह्मण ने अपना चौथा विवाह करने के लिए पुत्रों और बन्धुओं के साथ यात्रा की। मार्ग में आधी रात के समय जब वह सो रहा था, तब एक सर्प ने कहीं से आकर उसकी बाँह में काट लिया। उसके काटते ही ऐसी अवस्था हो गई कि मणि, मंत्र और औषधि आदि से भी उसके शरीर की रक्षा असाध्य जान पड़ी। तत्पश्चात कुछ ही क्षणों में उसके प्राण पखेरु उड़ गये और वह प्रेत बना। फिर बहुत समय के बाद वह प्रेत सर्पयोनि में उत्पन्न हुआ। उसका चित्त धन की वासना में बँधा था। उसने पूर्व वृत्तान्त को स्मरण करके सोचा–'मैंने घर के बाहर करोड़ों की संख्या में अपना जो धन गाड़ रखा है उससे इन पुत्रों को वंचित करके स्वयं ही उसकी रक्षा करूँगा।' साँप की योनि से पीड़ित होकर ब्राह्मण ने एक दिन स्वप्न में अपने पुत्रों के समक्ष आकर अपना मनोभाव बताया। तब उसके पुत्रों ने सवेरे उठकर बड़े विस्मय के साथ एक-दूसरे से स्वप्न की बातें कही। उनमें से मंझला पुत्र कुदाल हाथ में लिए घर से निकला और जहाँ उसके पिता सर्पयोनि धारण करके रहते थे, उस स्थान पर गया। यद्यपि उसे धन के स्थान का ठीक-ठीक पता नहीं था तो भी उसने चिह्नों से उसका ठीक निश्चय कर लिया और लोभबुद्धि से वहाँ पहुँचकर बाँबी को खोदना आरम्भ किया। तब उस बाँबी से बड़ा भयानक साँप प्रकट हुआ और बोला–'ओ मूढ़ ! तू कौन है ? किसलिए आया है ? यह बिल क्यों खोद रहा है ? किसने तुझे भेजा है ? ये सारी बातें मेरे सामने बता।' पुत्र बोला–'मैं आपका पुत्र हूँ। मेरा नाम शिव है। मैं रात्रि में देखे हुए स्वप्न से विस्मित होकर यहाँ का सुवर्ण लेने के कौतूहल से आया हूँ।' पुत्र की यह वाणी सुनकर वह साँप हँसता हुआ उच्च स्वर से इस प्रकार स्पष्ट वचन बोला–'यदि तू मेरा पुत्र है तो मुझे शीघ्र ही बन्धन से मुक्त कर। मैं अपने पूर्वजन्म के गाड़े हुए धन के ही लिए सर्पयोनि में उत्पन्न हुआ हूँ।' पुत्र ने पूछा–'पिता जी! आपकी मुक्ति कैसे होगी? इसका उपाय मुझे बताईये, क्योंकि मैं इस रात में सब लोगों को छोड़कर आपके पास आया हूँ।' पिता बोला–'बेटा ! गीता के अमृतमय सप्तम अध्याय को छोड़कर मुझे मुक्त करने में तीर्थ, दान, तप और यज्ञ भी सर्वथा समर्थ नहीं हैं। केवल गीता का सातवाँ अध्याय ही प्राणियों के जरा मृत्यु आदि दुःखों को दूर करने वाला है। पुत्र ! मेरे श्राद्ध के दिन गीता के सप्तम अध्याय का पाठ करने वाले ब्राह्मण को श्रद्धापूर्वक भोजन कराओ। इससे निःसन्देह मेरी मुक्ति हो जायेगी। वत्स ! अपनी शक्ति के अनुसार पूर्ण श्रद्धा के साथ वेदविद्या में प्रवीण अन्य ब्राह्मणों को भी भोजन कराना।' सर्पयोनि में पड़े हुए पिता के ये वचन सुनकर सभी पुत्रों ने उसकी आज्ञानुसार तथा उससे भी अधिक किया। तब शंकुकर्ण ने अपने सर्पशरीर को त्यागकर दिव्य देह धारण किया और सारा धन पुत्रों के अधीन कर दिया। पिता ने करोड़ों की संख्या में जो धन उनमें बाँट दिया था, उससे वे पुत्र बहुत प्रसन्न हुए। उनकी बुद्धि धर्म में लगी हुई थी, इसलिए उन्होंने बावली, कुआँ, पोखरा, यज्ञ तथा देवमंदिर के लिए उस धन का उपयोग किया और अन्नशाला भी बनवायी। तत्पश्चात सातवें अध्याय का सदा जप करते हुए उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। हे पार्वती ! यह तुम्हें सातवें अध्याय का माहात्म्य बतलाया, जिसके श्रवणमात्र से मानव सब पातकों से मुक्त हो जाता है।' ~~~०~~~ "जय जय श्री राधे" "कुमार रौनक कश्यप " *************************************************

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. भगवान् श्रीकृष्ण की वाणी –श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय - 01 इस अध्याय में:- दोनों सेनाओं के प्रधान-प्रधान वीरों एवं शंखध्वनि का वर्णन तथा स्वजनवध के पाप से भयभीत हुए अर्जुन का विषाद धृतराष्ट्र बोले- हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्र हुए युद्ध की इच्छा वाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया? संजय बोले- उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखकर और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा- 'हे आचार्य! आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रों की इस बड़ी भारी सेना को देखिये। इस सेना में बड़े-बड़े धनुषों वाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर सात्यकि और विराट तथा महारथी राजा द्रुपद, धृष्टकेतु और चेकितान तथा बलवान काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैव्य, पराक्रमी युधामन्यु तथा बलवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र- ये सभी महारथी हैं। हे ब्राह्मण श्रेष्ठ! अपने पक्ष में भी जो प्रधान हैं, उनको आप समझ लीजिए। आपकी जानकारी के लिये मेरी सेना के जो-जो सेनापति हैं, उनको बतलाता हूँ। आप-द्रोणाचार्य और पितामाह भीष्म तथा कर्ण और संग्राम विजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा। और भी मेरे लिये जीवन की आशा त्याग देने वाले बहुत से शूरवीर अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित और सबके सब युद्ध में चतुर हैं। भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकार से अजेय है और भीम द्वारा रक्षित इन लोगों की यह सेना जीतने में सुगम है। इसलिये सब मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह स्थित रहते हुए आप लोग सभी निःसन्देह भीष्म पितामह की ही सब ओर से रक्षा करें’। (तब) कौरवों में वृद्ध बड़े प्रतापी पितामह भीष्म ने उस दुर्योंधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए उच्च स्वर से सिंह की दहाड़ के समान गरजकर शंख बजाया। उसके पश्चात शंख और नगारे तथा ढोल, मृदङ्ग और नरसिंघे आदि बाजे एक साथ ही बज उठे। उनका यह शब्द बड़ा भयंकर हुआ। इसके अनन्तर सफेद घोड़ों से युक्त उत्तम रथ में बैठे हुए श्रीकृष्ण महाराज और अर्जुन ने अलौकिक शंख बजाये। श्रीकृष्ण महाराज ने पांचजन्य नामक, अर्जुन ने देवदत्त नामक और भयानक कर्म वाले भीमसेन ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया। कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक और नकुल तथा सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाये। श्रेष्ठ धनुष वाले काशिराज और महारथी शिखण्डी एवं धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र और बड़ी भुजा वाले सुभद्रापुत्र अभिमन्यु- इन सभी ने, हे राजन्! (सब ओर से) अलग-अलग शंख बजाये। और उस भयानक शब्द ने आकाश और पृथ्वी को भी गुँजाते हुए धार्तराष्ट्रों के यानि आपके पक्ष वालों के हृदय विदीर्ण कर दिये। हे राजन्! इसके बाद कपिध्वज अर्जुन ने मोर्चा बाँधकर डटे हुए धृतराष्ट्र-सम्बन्धियों को देखकर, उस शस्त्र चलने की तैयारी के समय धनुष उठाकर हृषीकेश श्रीकृष्ण महाराज से यह वचन कहा- ‘हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिये। और जब तक कि मैं युद्धक्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इन विपक्षी योद्धाओं को भली प्रकार देख लूँ कि इस युद्ध रूप व्यापार में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है? तब तक उसे खड़ा रखिये। ‘दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में हित चाहने वाले जो-जो ये राजा लोग इस सेना में आये है, इन युद्ध करने वालों को मैं देखूँगा’। संजय बोले- हे धृतराष्ट्र! अर्जुन द्वारा इस प्रकार कहे हुए महाराज श्रीकृष्णचन्द्र ने दोनों सेनाओं के बीच में भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने तथा सम्पूर्ण राजाओं के सामने उत्तम रथ को खड़ा करके इस प्रकार कहा कि- ‘हे पार्थ! युद्ध के लिये जुटे हुए इन कौरवों को देख’। इसके बाद पृथापुत्र अर्जुन ने उन दोनों ने ही सेनाओं में स्थित ताऊ-चाचों को, दादों-परदादों को, गुरुओं को, मामाओं को, भाईयों को, पुत्रों को, पौत्रों को तथा मित्रों को, ससुरों को और सुहृदों को भी देखा। उन उपस्थित सम्पूर्ण बन्धुओं को देखकर वे कुन्तीपुत्र अर्जुन अत्यन्त करुणा से युक्त होकर शोक करते हुए यह वचन बोले। अर्जुन बोले- हे कृष्ण! युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इस स्वजन समुदाय को देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है तथा मेरे शरीर में कम्प एवं रोमान्च हो रहा है। हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है तथा मेरा मन भ्रमित सा हो रहा है, इसलिये मैं खड़ा रहने को भी समर्थ नहीं हूँ। हे केशव! मैं लक्षणों को भी विपरित देख रहा हूँ तथा युद्ध में स्वजन समुदाय को मारकर कल्याण भी नहीं देखता। हे कृष्ण! मैं न तो विजय चाहता हूँ और न राज्य तथा सुखों को ही। हे गोविन्द! हमें ऐसे राज्य से क्या प्रयोजन है अथवा ऐसे भोगों से और जीवन से भी क्या लाभ है? हमें जिनके लिये राज्य, भोग और सुखादि अभीष्ट हैं, वे ही ये सब धन और जीवन की आशा को त्यागकर युद्ध में खड़े हैं। गुरुजन, ताऊ-चाचे, लड़के और उसी प्रकार दादे, मामे, ससुर, पौत्र, साले तथा और भी सम्बन्धी लोग हैं। हे मधुसूदन! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्य के लिये भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता; फिर पृथ्वी के लिये तो कहना ही क्या है? हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा। अतएव हे माधव! अपने ही बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के लिये हम योग्य नहीं हैं; क्योंकि अपने ही कुटुम्ब को मारकर हम कैसे सुखी होंगे? यद्यपि लोभ से भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों से विरोध करने में पाप को नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन! कुल के नाश से उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने के लिये क्यों नहीं विचार करना चाहिये? कुल के नाश से सनातन कुल धर्म नष्ट हो जाते हैं, धर्म के नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत फैल जाता है। हे कृष्ण! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है। वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने के लिये ही होता है। लुप्त हुई पिण्ड और जल की क्रिया वाले अर्थात श्राद्ध और तर्पण से वंचित इनके पितर लोग भी अधोगति को प्राप्त होते हैं। इन वर्णसंकर कारक दोषों से कुलघातियों के सनातन कुलधर्म और जाति धर्म नष्ट हो जाते हैं। हे जनार्दन! जिनका कुल-धर्म नष्ट हो गया है, ऐसे मनुष्यों का अनिश्चित काल तक नरक में वास होता है, ऐसा हम सुनते आये हैं। हा! शोक! हम लोग बुद्धिमान होकर भी महान् पाप करने को तैयार हो गये हैं, जो राज्य और सुख के लोभ से स्वजनों को मारने के लिये उद्यत हो गये हैं। यदि मुझ शस्त्ररहित एवं सामना न करने वाले को शस्त्र हाथ में लिये धृतराष्ट्र के पुत्र रण में मार डाले तो वह मारना भी मेरे लिये अधिक कल्याणकारक होगा। संजय बोले- रणभूमि में शोक से उद्विग्न मन वाला अर्जुन इस प्रकार कहकर, बाण सहित धनुष को त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गया। ० ० ० इस प्रकार श्रीमद्भगवदगीता पर्व के अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवदगीतोपनिषद्, श्री कृष्णार्जुन संवाद में अर्जुन विषाद योग नामक पहला अध्याय पूरा हुआ॥१॥ ----------:::×:::---------- "जय जय श्रीहरि" "कुमार रौनक कश्यप " *******************************************

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