Kailash Chandra Vyas Nov 24, 2021

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Kailash Chandra Vyas Nov 24, 2021

!!!---: यक्ष-युधिष्ठिर-संवाद :---!!! ======================== यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा - सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया वैदिक-संस्कृत “अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम् । शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम् ॥" अर्थात् प्रतिदिन मरते हुए प्राणियों को देखकर भी जीवित लोग सोचते हैं मैं जीता ही रहूंगा ‌। इससे बढ़कर और क्या आश्चर्य हो सकता है ! Laukik sanskrit लौकिक संस्कृत इस श्लोक को गहराई से समझिए । मृत्यु अटल है , आज नहीं तो कल आ जाएगी ! इसलिए अपने अन्तिम और परम लक्ष्य के लिए तीव्र गति से पुरुषार्थ करना चाहिए । व्यक्ति विषय भोगों से स्वयं को निकाल नहीं पाता । शिशु-संस्कृतम् सोचता है पहले खूब धन कमा लूं फिर ७०-८० वर्ष की आयु होगी तो ले लेंगे ईश्वर का नाम । यह दिलासा स्वयं को सबसे बड़ा धोखा है । हम प्रतिदिन देख रहे हैं कोई १०० वर्ष के बाद देह त्याग करता है तो कोई अल्पायु में ही मृत्यु का ग्रास बन जाता है , ऐसे में यह निश्चित नहीं कि ७०-८० वर्ष तक आप जीवित रहेंगे या उससे पूर्व ही मृत्यु का शिकार होंगे ! एक कथानक है जो मैंने अपने गुरुदेव से सुना था । भाषाणां जननी संस्कृत भाषा एक बार गुरु जी अंत्येष्टि संस्कार में गये । वहां उन्होंने देखा कि दो व्यक्ति परस्पर वार्तालाप कर रहे हैं कि “ सोने का भाव पहले से सस्ता हो गया है , खरीद लेते हैं ” शव को कंधा देते समय वही दो लोग यह कह रहे थे “ राम नाम सत्य है , यह शरीर अनित्य है ” । वैदिक संस्कृत Vaidik sanskrit ऐसा हमें अक्सर देखने को मिलता है कि शमशान घाट में बड़े अक्षरों में लिखा होता है “ यही तेरी मंजिल थी ” , “ तुझे यही आना था ”‌ , “ यही परम सत्य है ” और उपस्थित लोगों के लिए भी वैराग्य परक दोहे और श्लोक वर्णित रहते हैं । पर शमशान से बाहर आते ही सब कुछ भूलकर हफ्ते बाद सफेद बालों को काला रंग करवाते है । चाणक्य नीति सदैव स्मरण रहे “ हम अमर नहीं और मृत्यु से बच नहीं सकते । परन्तु हम तत्वज्ञान, योगाभ्यास और ईश्वर समर्पण से जन्म-मृत्यु के चक्र से छूटकर परम आनन्द प्राप्त कर सकते हैं ।”

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Kailash Chandra Vyas Nov 23, 2021

आराध्या 🔸🔹🔸 एक संत ने एक द्वार पर दस्तक दी और आवाज लगाई " भिक्षां देहि "। एक छोटी बच्ची बाहर आई और बोली, ‘‘बाबा, हम गरीब हैं, हमारे पास देने को कुछ नहीं है।’’ संत बोले, ‘‘बेटी, मना मत कर, अपने आंगन की धूल ही दे दे।’’ लड़की ने एक मुट्ठी धूल उठाई और भिक्षा पात्र में डाल दी। शिष्य ने पूछा, ‘‘गुरु जी, धूल भी कोई भिक्षा है? आपने धूल देने को क्यों कहा ?’’ संत बोले, ‘‘बेटे, अगर वह आज ना कह देती तो फिर कभी नहीं दे पाती। आज धूल दी तो क्या हुआ, देने का संस्कार तो पड़ गया। आज धूल दी है, उसमें देने की भावना तो जागी, कल समर्थवान होगी तो फल-फूल भी देगी।’’ जितनी छोटी कथा है निहितार्थ उतना ही विशाल । साथ में आग्रह भी .... दान करते समय दान हमेशा अपने परिवार के छोटे बच्चों के हाथों से दिलवाये जिससे उनमें देने की भावना बचपन से बने। !! जय जय श्री राधे गोविंद!! 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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Kailash Chandra Vyas Nov 23, 2021

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