Kailash Chandra Vyas Nov 30, 2021

[29/11, 5:26 pm] Anant Ram Ji Gahlot: किसी अपने के घर जाते वक्त उपरोक्त सभी को लेकर मत जाना बनधुऔ❤️ [29/11, 5:33 pm] Anant Ram Ji Gahlot: *महादेवी वर्मा* की सुंदर पंक्तियाँ आ गए तुम? द्वार खुला है, अंदर आओ..! पर तनिक ठहरो.. *ड्योढी पर पड़े पायदान पर,* *अपना अहं झाड़ आना..!* मधुमालती लिपटी है मुंडेर से, *अपनी नाराज़गी वहीँ उड़ेल आना..!* तुलसी के क्यारे में, *मन की चटकन चढ़ा आना..!* अपनी व्यस्ततायें, *बाहर खूंटी पर ही टांग आना..!* जूतों संग, *हर नकारात्मकता उतार आना..!* बाहर किलोलते बच्चों से, *थोड़ी शरारत माँग लाना..!* वो गुलाब के गमले में, *मुस्कान लगी है..* *तोड़ कर पहन आना..!* लाओ, *अपनी उलझनें मुझे थमा दो..* तुम्हारी थकान पर, *मनुहारों का पँखा झुला दूँ..!* *देखो, शाम बिछाई है मैंने,* सूरज क्षितिज पर बाँधा है,* लाली छिड़की है नभ पर..!* *प्रेम और विश्वास की मद्धम आंच पर,* *चाय चढ़ाई है घूँट घूँट पीना*..! *इतना मुश्किल भी नहीं हैं जीना* _*त्यौहार ख़त्म हुआ है - खुशिया नहीं, खुशिया बिखरते रहिए,,,!!!*_ *👏जय श्री कृष्ण🚩*

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Kailash Chandra Vyas Nov 30, 2021

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Kailash Chandra Vyas Nov 29, 2021

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Kailash Chandra Vyas Nov 29, 2021

क्रोध एक संत भिक्षा में मिले अन्न से अपना जीवत चला रहे थे। वे रोज अलग-अलग गांवों में जाकर भिक्षा मांगते थे। एक दिन वे गांव के बड़े सेठ के यहां भिक्षा मांगने पहुंचे। सेठ ने संत को थोड़ा अनाज दिया और बोला कि गुरुजी मैं एक प्रश्न पूछना चाहता हूं। संत ने सेठ से अनाज लिया और कहा कि ठीक है पूछो। सेठ ने कहा कि मैं ये जानना चाहता हूं कि लोग लड़ाई-झगड़ा क्यों करते हैं? संत कुछ देर चुप रहे और फिर बोले कि मैं यहां भिक्षा लेने आया हूं, तुम्हारे मूर्खतापूर्ण सवालों के जवाब देने नहीं आया। ये बात सुनते ही सेठ एकदम क्रोधित हो गया। उसने खुद से नियंत्रण खो दिया और बोला कि तू कैसा संत है, मैंने दान दिया और तू मुझे ऐसा बोल रहा है। सेठ ने गुस्से में संत को खूब बातें सुनाई। संत चुपचाप सुन रहे थे। उन्होंने एक भी बार पलटकर जवाब नहीं दिया। कुछ देर बाद सेठ का गुस्सा शांत हो गया, तब संत ने उससे कहा कि भाई जैसे ही मैंने तुम्हें कुछ बुरी बातें बोलीं, तुम्हें गुस्सा आ गया। गुस्से में तुम मुझ पर चिल्लाने लगे। अगर इसी समय पर मैं भी क्रोधित हो जाता तो हमारे बीच बड़ा झगड़ा हो जाता। > क्रोध ही हर झगड़े का मूल कारण है और शांति हर विवाद को खत्म कर सकती है। अगर हम क्रोध ही नहीं करेंगे तो कभी भी वाद-विवाद नहीं होगा। जीवन में सुख-शांति चाहते हैं तो क्रोध को नियंत्रित करना चाहिए। क्रोध को काबू करने के लिए रोज ध्यान करें..!!

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Kailash Chandra Vyas Nov 28, 2021

** WISDOM STORY** *ये कथा रात को सोने से पहले घर में सबको सुनायें* स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी कर्क रोग से पीड़ित थे। उन्हें खाँसी बहुत आती थी और वे खाना भी नहीं खा सकते थे। स्वामी विवेकानंद जी अपने गुरु जी की हालत से बहुत चिंतित थे। एक दिन की बात है स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी ने विवेकानंद जी को अपने पास बुलाया। "नरेंद्र,तुझे वो दिन याद है,जब तूँ अपने घर से मेरे पास मंदिर में आता था ? तूने दो-दो दिनों से कुछ नहीं खाया होता था। परंतु अपनी माँ से झूठ कह देता था कि तूने अपने मित्र के घर खा लिया है,ताकि तेरी गरीब माँ थोड़े बहुत भोजन को तेरे छोटे भाई को परोस दें। हैं न ?" नरेंद्र ने रोते-रोते हाँ में सर हिला दिया। स्वामी रामकृष्ण परमहंस फिर बोले,"यहां मेरे पास मंदिर आता,तो अपने चेहरे पर ख़ुशी का मुखौटा पहन लेता। परन्तु मैं भी झट जान जाता कि तेरा शरीर क्षुधाग्रस्त है।और फिर तुझे अपने हाथों से लड्डू,पेड़े,माखन-मिश्री खिलाता था। है ना?" नरेंद्र ने सुबकते हुए गर्दन हिलाई। अब रामकृष्ण परमहंस फिर मुस्कुराए और प्रश्न पूछा-"कैसे जान लेता था मैं यह बात? कभी सोचा है तूने?" नरेंद्र सिर उठाकर परमहंस को देखने लगे। "बता न,मैं तेरी आंतरिक स्थिति को कैसे जान लेता था ?" नरेंद्र - "क्योंकि आप अंतर्यामी हैं गुरुदेव"। राम कृष्ण परमहंस- "अंतर्यामी,अंतर्यामी किसे कहते है?" नरेंद्र- "जो सब के अंदर की जाने" परमहंस -"कोई अंदर की कब जान सकता है ?" नरेंद्र- "जब वह स्वयं अंदर में ही विराजमान हो।" परमहंस -"अर्थात मैं तेरे अंदर भी बैठा हूँ। हूँ ना?? नरेंद्र- "जी बिल्कुल। आप मेरे हृदय में समाये हुए हैं ।" परमहंस-"तेरे भीतर में समाकर मैं हर बात जान लेता हूँ। हर दुःख दर्द पहचान लेता हूँ ।तेरी भूख का अहसास कर लेता हूँ तो क्या तेरी तृप्ति मुझ तक नहीं पहुँचती होगी ?" नरेंद्र- "तृप्ति ?" परमहंस "हाँ तृप्ति! जब तूँ भोजन करता है और तुझे तृप्ति होती है,क्या वो मुझे तृप्त नही करती होगी ? अरे पगले, गुरु अंतर्यामी है,अंतर्जगत का स्वामी है। वह अपने शिष्यों के भीतर बैठा सबकुछ भोगता है। मैं एक नहीं हज़ारों मुखों से खाता हूँ।" याद रखना,गुरु कोई बाहर स्थित एक देह भर नहीं है। वह तुम्हारे रोम-रोम का वासी है। तुम्हें पूरी तरह आत्मसात कर चुका है। अलगाव कहीं है ही नहीं। अगर कल को मेरी यह देह नहीं रही,तब भी जीऊंगा, तेरे माध्यम से जीऊंगा। मैं तुझमे रहूँगा। *कथासार* गुरु अपने शिष्य के प्रति कितने भावुक कितने दयावान होते है। अपने शिष्य की,हर उलझन को वे भली भांति जानते हैं। शिष्य इन सब बातों से बे खबर होता है। वह अपनी उलझनें गुरु के आगे गाता रहता है। और भूल जाता है कि गुरु से कोई बात छिप सकती है क्या ?

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Kailash Chandra Vyas Nov 28, 2021

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Kailash Chandra Vyas Nov 27, 2021

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Kailash Chandra Vyas Nov 27, 2021

🌹*चरणों की मिट्टी* एक पापी इन्सान मरते वक्त बहुत दुख और पीड़ा भोग रहा था। लोग वहाँ काफी संख्या मेँ इक्ट्ठे हो गये, वहीँ पर एक महापुरूष आ गये, पास खड़े लोगोँ ने महापुरूष से पूछा कि आप इसका कोई उपाय बतायेँ जिससे यह पीड़ा से मुक्त होकर प्राण त्याग दे और ज्यादा पीड़ा ना भोगे। महापुरूष ने बताया कि अगर जनन्त की मिट्टी लाकर इसको तिलक किया जाये तो ये पीड़ा से मुक्त हो जायेगा। ये सुनकर सभी चुप हो गये। अब जनन्त कि मिट्टी कहाँ से और कैसे लायेँ ? महापुरुष की बात सुन कर एक छोटा सा बच्चा दोड़ा दोड़ा गया और थोड़ी देर बाद एक मुठ्ठी मिट्टी लेकर आया और बोला ये लो जनन्त की मिट्टी इसे तिलक कर दो। बच्चे की बात सुनकर एक आदमी ने मिट्टी लेकर उस आदमी को जैसे ही तिलक किया कुछ ही क्षण मेँ वो आदमी पीड़ा से एकदम मुक्त हो गया। ये चमत्कार देखकर सब हैरान थे, क्योँकि जनन्त की मिट्टी कोई कैसे ला सकता है ? और वो भी एक छोटा सा बच्चा। हो ही नहीँ सकता। महापुरूष ने बच्चे से पूछा-बेटा! ये मिट्टी तुम कहाँ से लेकर आये हो ? पृथ्वी लोक पे कोन सा जनन्त है जहाँ से तुम कुछ ही पल मेँ ये मिट्टी ले आये? लड़का बोला-बाबा जी एक दिन हमारे स्कूल की टीचर ने बताया था कि माँ के चरणोँ मेँ सबसे बड़ा जनन्त है, उसके चरणोँ की धुल से बढ़कर दूसरा कोई जनन्त नहीँ। इसलिये मैँ ये मिट्टी अपनी माँ के चरणोँ के नीचे से लेकर आया हूँ। बच्चे मुँह से ये बात सुनकर महापुरूष बोले-बिल्कुल बेटे माँ के चरणो से बढ़कर इस जहाँ मेँ दूसरा कोई जनन्त नहीँ। और जिस औलाद की वजह से माँ की आँखो मेँ आँसू आये ऐसी औलाद को नरक इस जहाँ मेँ ही भोगना पड़ता है। इसलिये अगर आप चाहे कितनी भी तरक्की कर लेँ, कितना भी रूपया पैसा जमा कर लेँ आसमां की उच्चाईयोँ को क्योँ ना छू लेँ जब तक आपकी वजह से माँ खुश नहीँ है तब तक वो भगवान भी आपसे खुश नहीँ होगा। कोई भी दान, पुण्य और तीर्थ करने का फल आपको नहीँ मिलेगा। जय श्री राधे जी🙏🙏

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