kamlesh goyal Oct 25, 2021

जय श्री कृष्णा जी हर हर महादेव जी शुभ संध्या वंदन जी🥀🙏🥀 ♦️🍀♦️🍀♦️🍀♦️🍀♦️🍀♦️🍀♦️🍀♦️🍀♦️ 🥀🥀आज की अमृत 🥀🥀 🌹🌹कर्मो का फल🌹🌹 एक बार शंकर जी पार्वती जी भ्रमण पर निकले। रास्ते में उन्होंने देखा कि एक तालाब में कई बच्चे तैर रहे थे, लेकिन एक बच्चा उदास मुद्रा में बैठा था। पार्वती जी ने शंकर जी से पूछा, यह बच्चा उदास क्यों है? शंकर जी ने कहा, बच्चे को ध्यान से देखो। पार्वती जी ने देखा, बच्चे के दोनों हाथ नही थे, जिस कारण वो तैर नही पा रहा था। पार्वती जी ने शंकर जी से कहा कि आप शक्ति से इस बच्चे को हाथ दे दो ताकि वो भी तैर सके। शंकर जी ने कहा, हम किसी के कर्म में हस्तक्षेप नही कर सकते हैं क्योंकि हर आत्मा अपने कर्मो के फल द्वारा ही अपना काम अदा करती है। पार्वती जी ने बार-बार विनती की। आखिकार शंकर जी ने उसे हाथ दे दिए। वह बच्चा भी पानी में तैरने लगा। एक सप्ताह बाद शंकर जी पार्वती जी फिर वहाँ से गुज़रे। इस बार मामला उल्टा था, सिर्फ वही बच्चा तैर रहा था और बाकी सब बच्चे बाहर थे। पार्वती जी ने पूछा यह क्या है ? शंकर जी ने कहा, ध्यान से देखो। देखा तो वह बच्चा दूसरे बच्चों को पानी में डुबो रहा था इसलिए सब बच्चे भाग रहे थे। शंकर जी ने जवाब दिया- हर व्यक्ति अपने कर्मो के अनुसार फल भोगता है। भगवान किसी के कर्मो के फेर में नही पड़ते हैं। उसने पिछले जन्मो में हाथों द्वारा यही कार्य किया था इसलिए उसके हाथ नहीं थे। हाथ देने से पुनः वह दूसरों की हानि करने लगा है। प्रकृति नियम के अनुसार चलती है, किसी के साथ कोई पक्षपात नहीं। आत्माएँ जब ऊपर से नीचे आती हैं तब सब अच्छी ही होती हैं, कर्मों के अनुसार कोई अपाहिज है तो कोई भिखारी, तो कोई गरीब तो कोई अमीर लेकिन सब परिवर्तनशील हैं। अगर महलों में रहकर या पैसे के नशे में आज कोई बुरा काम करता है तो कल उसका भुगतान तो उसको करना ही पड़ेगा। *कर्म तेरे अच्छे तो किस्मत तेरी दासी* *नियत तेरी अच्छी तो घर मे मथुरा काशी हर-हर महादेव जी🙏🙏

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kamlesh goyal Oct 25, 2021

हर-हर महादेव जी♦️♦️🙏🙏♦️♦️ शुभ दोपहर वंदन जी ♦️💞♦️💞♦️💞♦️💞♦️💞♦️💞♦️💞♦️💞♦️ * आज का श्रीमद् भागवत भाव .37 ------------------------------------- ( 25 - 10 - 21 ) 🔔 भागवत कहती है , कि यह संसार और इसमें रहने वाले सभी जीव नाशवान यानि अनित्य हैं । और सभी लोग यह जानते भी हैं , क्योंकि वे सबको सब कुछ यहीं छोडकर जाते हुए देख रहे हैं । न कोई किसी के साथ आ रहा है , और न कोई किसी के साथ जा रहा है , फिर भी यदि वे खुद को अमर मानकर उन परमात्मा को भूले हुए हैं , जिनको कि याद किये बिना जीव की कोई गति नहीं है , तो फिर वे ज्ञानवान कहाँ हुये ? यह तो बिल्कुल वही बात हुई , कि --- * पठन्ति चतुरो वेदान् , धर्म शास्त्राण्य नेकशः। आत्मानं नैव जानन्ति , दवी पाकरसं यथा ।।१२।। किसी व्यक्ति को चारों वेद और सभी धर्मं शास्त्रों का ज्ञान हो , लेकिन उसे यदि अपने आत्मा की अनुभूति नहीं हुई , तो वह बिल्कुल उसी चमचे के समान हुआ , जिसने अनेकों पकवानों को तो हिलाया , लेकिन स्वाद किसी का नहीं चखा । 🔔 यदि किसी व्यक्ति को कांटों से भरे जंगल में छोड दिया जाए , और वह उन कांटों से बचना चाहे , तो क्या वह जंगल के सारे कांटों को हटा पाएगा ? तो जबाब होगा , नहीं , यह संभव नहीं है । लेकिन यदि वही व्यक्ति यदि अपने पैरों में जूते पहन ले , तो उसे कांटों से बचने के लिए उन्हें हटाने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। उसी तरह जीवन में यदि किसी मनुष्य को सच्ची शांति व सुख की चाहना है , तो वह केवल अपने प्रारब्ध को याद करके सन्तोष रूपी पादुका अपने हृदय में धारण कर ले , कि मेरे पूर्व कर्मानुसार मेरी पात्रता इतनी ही है , तो इतने मात्र से ही उसे अपने आप शांति मिल जाएगी । 🔔 गीता कहती है , कि जीव स्वयं ही तो अपना सबसे बड़ा मित्र है , और स्वयं ही अपना सबसे बड़ा शत्रु । यदि वह स्वयं से मित्रता निभाले , तो बात बन जाय । * उद्धरेदात्मानम् नात्मानम वसादयेत । गीता ( 6/5 ) आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।। क्योंकि यहाँ सबको अपना उद्धार स्वयं ही करना होता है - जीव स्वयं ही स्वयं का मित्र है , और स्वयं ही स्वयं का दुश्मन । इसमें कोई किसी के काम नहीं आता , न पत्नी पति के , और न पति , पत्नी के । आवश्यकता बस इस बात की है , कि वह भगवान श्रीकृष्ण की वाणी को हृदयंगम करके अपना मित्र बन जाय । ♦️🙏♦️

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