Jasbir Singh nain Oct 15, 2021

शुभ प्रभात 🙏। 🙏🙏। 🙏🙏 🌷 🪔 जय श्री हरि 🙏 🌷🙏 🙏 🌷🙏पापांकुशा एकादशी व्रत करने से मिलती है पापों से मुक्ति, Dussehra की शाम से ही शुरु हो जाएगा एकादशी व्रत, जानें व्रत कथा अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी कल्याण करने वाली होती है. कहते हैं कि इस दिन भगवान विष्णु का व्रत और पूजा आदि करने से जीवन में वैभव की प्राप्ति होती है. पापांकुशा एकादशी अश्विन मास (के शुक्ल पक्ष की एकादशी कल्याण करने वाली होती है. कहते हैं कि इस दिन भगवान विष्णु का व्रत और पूजा आदि करने से जीवन में वैभव की प्राप्ति होती है. इतना ही नहीं, सभी मनोकामनाएं भी पूर्ण होती हैं और घर में पैसों की बढ़ोतरी होती है. अश्विन मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली इस एकादशी को पापांकुशा एकादशी के नाम से जाना जाता है. इस बार 16 अक्टूबर, शनिवार के दिन ये एकादशी पड़ रही है. एकादशी का व्रत आमतौर पर द्वादश तिथि की शाम सूर्यास्त के बाद से ही शुरू हो जाता है. ऐसे में 15 अक्टूबर को दशहरा है और इस दिन सूर्यास्त के बाद से ही एकादशी का व्रत प्रारंभ हो जाता है. और एकादशी के अलगे दिन सूर्योदय के बाद ही व्रत पारण किया जाता है. इस दिन व्रत कथा पढ़ने का भी विशेष महत्व है. कहते हैं कथा का श्रवण करने से मात्र के ही व्रत का फल मिलता है. इसलिए इस दिन व्रत कथा अवश्य करें. आइए जानते हैं पापांकुशा व्रत के बारे में. पापांकुशा व्रत कथा शास्त्रों के अनुसार एक बार विध्‍यांचल पर्वत पर क्रोधना नामक एक क्रूर शिकारी वहां रहता था. उसने अपने जीवन में सारे बुरे कर्म ही किए. जब उसका अंतिम समय आया तो यमराज के दूत उसे लेने के लिए आए और बोला कि तुम्हारा अंतिम समय आ गया है अब हम कल तु्म्हें लेने आएंगे. लेकिन क्रोधना मौत से बहुत डरता था. इसलिए यमराज के दूतों की बात सुनकर वह बहुत घबरा गया. और एकदम से वह अंगारा नाम के ऋषि के पास जा पहुंचा. वहां जाकर उसने मदद की अपील की. क्रोधना की बात सुनकर ऋषि ने उसे पापांकुशा एकादशी के महत्व के बारे में बताया और ये एकादशी का व्रत करने की बात कही. ऋषि ने बताया कि क्रोध न करते हुए पूरी श्रद्धा के साथ अगर विष्णु जी की आराधना की जाए और व्रत रखा जाए, तो समस्त पाप नष्ट होते हैं और व्यक्ति को मुक्ति मिलती है. क्रोधना ने ऋषि अनुसार व्रत रखा और अपने सारे पापों से छुटकारा पा लिया. व्रत रखने से वे विष्णु लोक को गया.

+152 प्रतिक्रिया 55 कॉमेंट्स • 604 शेयर
Jasbir Singh nain Oct 15, 2021

शुभ प्रभात 🪔🪔🪔🪔🪔 जय श्री राम 🪔🪔🪔🪔🌅🙏💥दशहरा के दिन जलेबी से मुंह मीठा करने की पुरानी परंपरा, इसके बिना दशहरा नहीं होता पूरा! आइए जानते है जलेबी बनाने की दशहरा की पूजा का शुभ मुहुर्त दशहरा यानि विजयदशमी इस साल 15 अक्टूबर को है. शुभ मुहुर्त 1 बजकर 38 मिनट से 2 बजकर 24 मिनट तक रहेगा. इस बीच आप कोई भी शुभ कार्य कर सकते हैं. दशहरा की पूजा विधि दशहरा यानि विजयदशमी के दिन भगवान राम, मां दुर्गा, मां सरस्वती, भगवान गणेश और हनुमान जी पूजा की जाती है. इस दिन गाय के गोबर से दस गोले बनाए जाते हैं जिन्हें कंडे भी कहते हैं. इन कंडों में नवरात्रि के दिन बोये गए जौ को लगाते हैं. इसके बाद धूप और दीप जलाकर पूजा की जाती है. कई जगह जौ को कान के पीछे रखने का भी रिवाज होता है. दशहरा का महत्व दशरहा के दिन ही भगवान श्री राम ने अत्याचारी रावण का वध कर विजय हासिल की थी और कहा जाता है​ ​कि यह युद्ध 9 दिनों तक लगातार चला. इसके बाद 10वें दिन भगवान राम ने विजय हासिल की. इसके बाद माता सीता को उसकी कैद से मुक्त कराकर लाए. वहीं यह भी कहा जाता है कि भगवान राम से युद्ध पर जाने से पहले मां दुर्गा की अराधना की थी और मां ने प्रसन्न होकर उन्हें विजयी होने का वरदान दिया था. इसके अलावा एक और मान्यता है कि मां दुर्गा ने दशहरा के दिन महिषासुर का वध कर जीत हासिल की थी.

+91 प्रतिक्रिया 15 कॉमेंट्स • 212 शेयर
Jasbir Singh nain Oct 13, 2021

जय माता दी🙏🙏🙏🙏🙏🙏🪔🪔🪔🪔🌷🌷🙏🙏नवरात्रि के नौवें दिन होती है मां सिद्धिदात्री की पूजा, पढ़ें मंत्र, आरती और कथा समेत अन्य जानकारियां चैत्र नवरात्रि की नवमी तिथि को मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। मान्यता है कि मां ने पृथ्वी को असुरों के अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिए अवतार लिया था। मां सिद्धिदात्री की पूजा करने से व्यक्ति के सभी कार्य सिद्ध होते हैं नवरात्रि के नौवें दिन होती है मां सिद्धिदात्री की पूजा : चैत्र नवरात्रि की नवमी तिथि को मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। मान्यता है कि मां ने पृथ्वी को असुरों के अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिए अवतार लिया था। कहा जाता है कि मां सिद्धिदात्री की पूजा करने से व्यक्ति के सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं। साथ ही व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं भी पूरी हो जाती हैं। मां सिद्धिदात्री की कृपा से ही भगवान शंकर का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसके चलते इन्हें अर्द्धनारीश्वर भी कहा जाता है। आइए जानते हैं मां सिद्धिदात्री की पूजा विधि, मंत्र, आरती और कथा। मां सिद्धिदात्री की पूजा विधि: आज नवरात्रि की नवमी तिथि है और आज के दिन मां को विदा किया जाता है। इस दिन सुबह सवेरे उठ जाना चाहिए। फिर स्नान करने के बाद चौकी लगानी चाहिए। इस पर मां सिद्धिदात्री की मूर्ति या प्रतिमा को स्थापित करें। इसके बाद मां को पुष्प अर्पित करें। मां को अनार का फल चढ़ाएं। फिर नैवेध अर्पित करें। मां को मिष्ठान, पंचामृत और घर में बनने वाले पकवान का भओग लगाया जाता है। इस दिन हवन भी किया जाता है। इस दिन कन्या पूजन भी किया जाता है। मां सिद्धिदात्री की कथा: मां सिद्धिदात्री को अणिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, वाशित्व, सर्वकामावसायिता, सर्वज्ञत्व, दूरश्रवण, परकायप्रवेशन, वाक्‌सिद्धि, कल्पवृक्षत्व, सृष्टि, संहारकरणसामर्थ्य, अमरत्व, सर्वन्यायकत्व, भावना और सिद्धि नाम से पुकारा जाता है। मां कमल पुष्प पर आसीन हैं। इनका वाहन सिंह है। मान्यता है कि मां की आराधना करने से व्यक्ति की लौकिक, पारलौकिक हर तरह की मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। मां अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करती हैं। इसके अलावा व्यक्ति मां की सच्चे मन से अराधना करने पर अणिमा, लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, सर्वकामावसायिता, दूर श्रवण, परकामा प्रवेश, वाकसिद्ध, अमरत्व भावना सिद्धि आदि समस्त सिद्धियों नव निधियों की प्राप्ति होती है। या देवी सर्वभूतेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता. नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:. मां सिद्धिदात्री की आरती: जय सिद्धिदात्री मां तू सिद्धि की दाता . तू भक्तों की रक्षक तू दासों की माता .. तेरा नाम लेते ही मिलती है सिद्धि . तेरे नाम से मन की होती है शुद्धि .. कठिन काम सिद्ध करती हो तुम . जभी हाथ सेवक के सिर धरती हो तुम .. तेरी पूजा में तो ना कोई विधि है . तू जगदंबे दाती तू सर्व सिद्धि है .. रविवार को तेरा सुमिरन करे जो . तेरी मूर्ति को ही मन में धरे जो .. तू सब काज उसके करती है पूरे . कभी काम उसके रहे ना अधूरे .. तुम्हारी दया और तुम्हारी यह माया . रखे जिसके सिर पर मैया अपनी छाया .. सर्व सिद्धि दाती वह है भाग्यशाली . जो है तेरे दर का ही अंबे सवाली .. हिमाचल है पर्वत जहां वास तेरा . महा नंदा मंदिर में है वास तेरा .. मुझे आसरा है तुम्हारा ही माता . भक्ति है सवाली तू जिसकी दाता. 'इस लेख में निहित किसी भी जानकारी/सामग्री/गणना की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है/धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है, इसके उपयोगकर्ता इसे महज सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त, इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी।'

+206 प्रतिक्रिया 70 कॉमेंट्स • 582 शेयर
Jasbir Singh nain Oct 11, 2021

जय माता दी🌷🌷🌷🪔🪔🪔🙏🙏🙏🌷🪔🌷🪔🌷🪔🙏आज के दिन मां कालरात्रि की इस तरह करें पूजा, जानें मंत्र, आरती, भोग विधि और कथा आज चैत्र नवरात्रि का सांतवा आज के दिन मां कालरात्रि की इस तरह करें पूजा आज चैत्र नवरात्रि का सांतवा दिन है। आज के दिन मां कालरात्रि की पूजा की विधान है। मान्यता है कि मां की पूजा करने से व्यक्ति को उसके हर पाप से मुक्ति मिल जाती है। साथ ही शत्रुओं का भी नाश हो जाता है। मां को कालरात्रि इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनका रंग काला है। इनके तीन नेत्र हैं। मां के हाथ में खड्ग और कांटा है। मां का वाहन गधा है। इनका स्वरूप आक्रामक व भयभीत करने वाला है। आइए जानते हैं नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा कैसे की जाती है। पढ़ें आरती, मंत्र, भोग, कथा, पूजा विधि। मां कालरात्रि की इस तरह करें पूजा: इस दिन सुबह के समय उठ जाना चाहिए और सभी नित्यकर्मों से निवृत्त होकर स्नानादि कर लें। फिर मां की पूजा आरंभ करें। सर्वप्रथम गणेश जी की अराधना करें। कलश देवता की विधिवत पूजा करें। इसके बाद मां को अक्षत, धूप, रातरानी के पुष्प, गंध, रोली, चंदन अर्पित करें। इसके बाद पान, सुपारी मां को चढ़ाएं। घी या कपूर जलाकर माँ की आरती करें। व्रत कथा सुनें। आज करें मां कात्यायनी के बीज मंत्र का जाप, मिलेगा यश, शक्ति और सफलता मां कालरात्रि को क्या लगाएं भोग: मां को गुड़ का नैवेद्य अर्पित करें। अपनी सामर्थ्यनुसार ब्राह्यणों को दान दें। इससे आकस्मिक संकटों से रक्षा करती हैं। मां कालरात्रि की कथा: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार कैलाश पर्वत पर मां पार्वती की अनुपस्थिति में दुर्गासुर नामक राक्षस हमला करने की कोशिश कर रहा था। उस राक्षस का वध करने के लिए देवी पार्वती ने कालरात्रि को भेजा। उस राक्षस का कद विशालकाय होता जा रहा था तब देवी ने खुद को शक्तिशाली बनाया है। वे शस्त्रों से सुसज्जित हुईं। फिर उन्होंने दुर्गासुर को मार गिराया। इसी कारण उन्हें दुर्गा भी कहा जाता है। पूजन में करें महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र का पाठ, दूर होगी सारी नकारात्मकता मां कालरात्रि की आरती: काल के मुंह से बचाने वाली दुष्ट संहारिणी नाम तुम्हारा महा चंडी तेरा अवतारा पृथ्वी और आकाश पर सारा महाकाली है तेरा पसारा खंडा खप्पर रखने वाली दुष्टों का लहू चखने वाली कलकत्ता स्थान तुम्हारा सब जगह देखूं तेरा नजारा सभी देवता सब नर नारी गावे स्तुति सभी तुम्हारी रक्तदंता और अन्नपूर्णा कृपा करे तो कोई भी दुःख ना ना कोई चिंता रहे ना बीमारी ना कोई गम ना संकट भारी उस पर कभी कष्ट ना आवे महाकाली मां जिसे बचावे तू भी ‘भक्त’ प्रेम से कह कालरात्रि मां तेरी जय बीज मंत्र: ॐ देवी कालरात्र्यै नमः’ स्तुति: या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ प्रार्थना मंत्र: एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता। लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्त शरीरिणी॥ वामपादोल्लसल्लोह लताकण्टकभूषणा। वर्धन मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥ 'इस लेख में निहित हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है, इसके उपयोगकर्ता इसे महज सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त, इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी।'

+200 प्रतिक्रिया 66 कॉमेंट्स • 712 शेयर
Jasbir Singh nain Oct 11, 2021

+47 प्रतिक्रिया 13 कॉमेंट्स • 0 शेयर
Jasbir Singh nain Oct 11, 2021

जय माता दी🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🪔🪔🪔🪔जानिए कैसे करें मां कात्यायिनी की पूजा? क्या है विधि, मंत्र और कथा मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत चमकीला और भव्य है। इनकी चार भुजाएं हैं। मां कात्‍यायनी सिंह की सवारी करती हैं और उनका पसंदीदा रंग लाल है। जिस भी लड़की की शादी में बाधा आ रही होती है, उन्हें मां कात्यायनी की खास पूजा करनी चाहिए नवरात्रि में छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है। उसके रोग, शोक, संताप और भय नष्ट हो जाते हैं। मान्‍यता है कि मां कात्‍यायनी की पूजा करने से शादी में आ रही बाधा दूर होती है और भगवान बृहस्‍पति प्रसन्‍न होकर विवाह का योग बनाते हैं। यह भी कहा जाता है कि अगर सच्‍चे मन से मां की पूजा की जाए तो वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। जानिए नवरात्रि के छठे दिन की पूजा विधि, व्रत कथा, आरती, मंत्र, मुहूर्त… पूजा विधि: नवरात्रि के छठे दिन यानि कि षष्‍ठी को स्‍नान कर लाल या पीले रंग के वस्‍त्र पहनें। सबसे पहले घर के पूजा स्‍थान या मंदिर में देवी कात्‍यायनी की मूर्ति अथवा तस्वीर स्‍थापित करें। अब गंगाजल से छिड़काव कर शुद्धिकरण करें और मां की प्रतिमा के आगे दीपक रखें। अब हाथ में फूल लेकर मां को प्रणाम कर उनका ध्‍यान करें। इसके बाद उन्‍हें पीले फूल, कच्‍ची हल्‍दी की गांठ और शहद अर्पित करें। धूप-दीपक से मां की आरती उतारें। आरती के बाद सभी में प्रसाद वितरित कर स्‍वयं भी ग्रहण करें। ध्यान: वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्। सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्वनीम्॥ स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्। वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥ पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालंकार भूषिताम्। मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥ प्रसन्नवदना पञ्वाधरां कांतकपोला तुंग कुचाम्। कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम॥ स्तोत्र पाठ: कंचनाभा वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां। स्मेरमुखीं शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोअस्तुते॥ पटाम्बर परिधानां नानालंकार भूषितां। सिंहस्थितां पदमहस्तां कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥ परमांवदमयी देवि परब्रह्म परमात्मा। परमशक्ति, परमभक्ति,कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥ मां कात्यायनी की कथा: कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे, उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए। इन्हीं कात्य के गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे। इन्होंने मां पराम्बा की उपासना करते हुए कई वर्षों तक बड़ी कठिन तपस्या की थी। उनकी इच्छा थी कि मां भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें, उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां भगवती ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। कुछ समय पश्चात जब दानव महिषासुर का अत्याचार धरती पर बढ़ गया तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों ने अपने-अपने तेज का अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया। महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम इनकी पूजा की जिस वजह से यह कात्यायनी कहलाईं। वहीं, पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार गोपियों ने श्रीकृष्‍ण को पति रूप में पाने के लिए यमुना नदी के तट पर मां कात्‍यायनी की ही पूजा की थी। मां कात्यायनी की आरती: जय कात्यायनि मां, मैया जय कात्यायनि मां। उपमा रहित भवानी, दूं किसकी उपमा॥ मैया जय कात्यायनि, गिरजापति शिव का तप, असुर रम्भ कीन्हां। वर-फल जन्म रम्भ गृह, महिषासुर लीन्हां॥ मैया जय कात्यायनि, कर शशांक-शेखर तप, महिषासुर भारी। शासन कियो सुरन पर, बन अत्याचारी॥ मैया जय कात्यायनि, त्रिनयन ब्रह्म शचीपति, पहुंचे, अच्युत गृह। महिषासुर बध हेतु, सुर कीन्हौं आग्रह॥ मैया जय कात्यायनि, सुन पुकार देवन मुख, तेज हुआ मुखरित। जन्म लियो कात्यायनि, सुर-नर-मुनि के हित॥ मैया जय कात्यायनि, अश्विन कृष्ण-चौथ पर, प्रकटी भवभामिनि, पूजे ऋषि कात्यायन, नाम काऽऽत्यायिनि॥ मैया जय कात्यायनि, अश्विन शुक्ल-दशी को, महिषासुर मारा।। मां कात्यायनी के मंत्र: चंद्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥ कात्यायनी महामाये , महायोगिन्यधीश्वरी। नन्दगोपसुतं देवी, पति मे कुरु ते नमः॥

+235 प्रतिक्रिया 61 कॉमेंट्स • 833 शेयर