Neha Sharma Nov 10, 2021

🌹🌿*लड़कर सारी दुनिया से जब मेरे गोविन्द के प्रीत के रंग में रंगती हैं, होकर आराध्य में विलीन तब कोई मीरा बनती हैं।🌹🌿#मेरे_गोविन्द*🌹🙏..... 🙇🌹*शुभ रात्रि नमन*🌹🙇 "मिडिल-क्लास" का होना भी किसी वरदान से कम नही है कभी बोरियत नहीं होती.!जिंदगी भर कुछ ना कुछ आफत लगी ही रहती है.!मिडिल क्लास वालो की स्थिति सबसे दयनीय होती है,न इन्हे तैमूर जैसा बचपन नसीब होता है न अनूप जलोटा जैसा बुढ़ापा,फिर भी अपने आप में उलझते हुऐ व्यस्त रहते है.!मिडिल क्लास होने का भी अपना फायदा है चाहे BMW का भाव बढे या AUDI का या फिर नया i phone लांच हो जाऐ, कोई फर्क नहीं पङता.!मिडिल क्लास लोगों की आधी जिंदगी तो झड़ते हुए बाल और बढ़ते हुए पेट को रोकने में ही चली जाती है.! इन घरो में पनीर की सब्जी तभी बनती है तो जब दुध गलती से फट जाता है और मिक्स-वेज की सब्ज़ी भी तभी बनती हैं जब रात वाली सब्जी बच जाती है.! इनके यहाँ फ्रूटी,कॉल्ड ड्रिंक एक साथ तभी आते है जब घर में कोई बढिया वाला रिश्तेदार आ रहा होता है.!मिडिल क्लास वालो के कपङो की तरह खाने वाले चावल की भी तीन वेराईटी होती है!डेली,कैजुवल और पार्टी वाला.!छानते समय चायपत्ती को दबा कर लास्ट बून्द तक निचोड़ लेना ही मिडिल क्लास वालो के लिऐ परमसुख की अनुभुति होती है.!ये लोग रूम फ्रेशनर का इस्तेमाल नही करते,सीधे अगरबत्ती जला लेते है.!मिडिल क्लास भारतीय परिवार के घरों में Get together नही होता,यहां 'सत्यनारायण भगवान की कथा' होती है.!इनका फैमिली बजट इतना सटीक होता है कि सैलरी अगर 31के बजाय 1 को आये तो गुल्लक फोड़ना पड़ जाता है.!मिडिल क्लास लोगो की आधी ज़िन्दगी तो "बहुत महँगा है" बोलने में ही निकल जाती है.!इनकी "भूख" भी होटल के रेट्स पर डिपेंड करती है दरअसल महंगे होटलों की मेन्यू-बुक में मिडिल क्लास इंसान 'फूड-आइटम्स' नहीं बल्कि अपनी "औकात" ढूंढ रहा होता है.!इश्क मोहब्बत तो अमीरो के चोचलें है मिडिल क्लास वाले तो सीधे "ब्याह" करते हैं इनके जीवन में कोई वैलेंटाइन नहीं होता "जिम्मेदारियां" जिंदगी भर बजरंग-दल सी पीछे लगी रहती हैं.!मध्यम वर्गीय दूल्हा दुल्हन भी मंच पर ऐसे बैठे रहते हैं मानो जैसे किसी भारी सदमे में हो.!अमीर शादी के बाद हनीमून पे चले जाते है और मिडिल क्लास लोगो की शादी के बाद टेंन्ट बर्तन वाले ही इनके पीछे पड़ जाते है.! मिडिल क्लास बंदे को पर्सनल बेड और रूम भी शादी के बाद ही अलाॅट हो पाता है! मिडिलक्लास बस ये समझ लो कि जो तेल सर पे लगाते है वही तेल मुंह में भी रगङ लेते है.!एक सच्चा मिडिल क्लास आदमी गीजर बंद करके तब तक नहाता रहता है जब तक कि नल से ठंडा पानी आना शुरू ना हो जाए!रूम ठंडा होते ही AC बंद करने वाला मिडिल क्लास आदमी चंदा देने के वक्त नास्तिक हो जाता है और प्रसाद खाने के वक्त आस्तिक.!दरअसल मिडिल-क्लास तो चौराहे पर लगी घण्टी के समान है, जिसे लूली-लगंड़ी, अंधी-बहरी, अल्पमत-पूर्णमत हर प्रकार की सरकार पूरा दम से बजाती है।मिडिल क्लास को आजतक बजट में वही मिला हैं जो अक्सर हम मंदिर में बजाते हैं।फिर भी हिम्मत करके मिडिल क्लास आदमी की पैसा बचाने की बहुत कोशिश करता हैं लेकिन बचा कुछ भी नहीं पाता।हकीकत में मिडिल मैन की हालत पंगत के बीच बैठा हुआ उस आदमी की तरह होता है जिसके पास पूड़ी-सब्जी चाहे इधर से आये,चाहे उधर से, उस तक आते-आते खत्म हो जाता है।मिडिल क्लास के सपने भी लिमिटेड होते है "टंकी भर गई है मोटर बंद करना है"। गैस पर दूध उबल गया है चावल जल गया है इसी टाईप के सपने आते है। दिल मे अनगिनत सपने लिए बस चलता ही जाता है चलता ही जाता है।🤔🙏🙏🙏🌹🌹 *जय-जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌸🌸 *भगवान ने आँखें सभी प्राणियों को दी हैं पर वे काम उतना ही देती हैं जितना कि उस प्राणी के निर्वाह के लिए आवश्यक है। बिना जरूरत का भार उसने किसी पर भी नहीं लादा है। *सृष्टि का विस्तार असीम है। आवश्यक नहीं कि हर प्राणी उसके हर रहस्य को खोजें और उसके लिए हाथ पैर पटके जिसकी कि उसे सामान्य निर्वाह के लिए आवश्यकता ही नहीं है। हर प्राणी की शरीर संरचना इसी स्तर की है कि उसे अपना काम चलाने समय गुजारने में कठिनाई न पड़े और जानकारियों का इतना बोझ भी न लदे जो उसके लिए आवश्यक नहीं है। साधन सुविधाओं के संबंध में भी यही बात है। सृष्टि एक असीम सागर है उसमें से मछली, शैवाल, घोंघे, प्रबाल और बादल अपनी काम चलाऊ आवश्यकता ही पूर्ण करते हैं। जो अनावश्यक उसके लिए हाथ पैर नहीं पीटते। आँखों का अन्यान्य सभी अवयवों की तुलना में अधिक महत्व है। वे जीवनचर्या में बहुत काम आती हैं तो भी हर प्राणी के शरीर में उन्हें इस योग्य बनाया गया है और इस प्रकार लगाया गया है कि उन्हें दूसरों से तुलना करने के झंझट में न पड़कर अपना काम चलाते रहने की सुविधा मिलती रहे। मेंढक, रेंगने वाले कीड़े मकोड़े और मछलियाँ हिलती-जुलती चीजों को देखते हैं। जो स्थिर है वह उन्हें दिखाई ही नहीं पड़ता। मेंढक को एक लम्बा चौड़ा बगीचा मात्र भूरे पर्दे की तरह स्थिर दीखता है। या तो मक्खी आदि शिकार स्वयं उठे या मेढ़क उचले तभी उसे काम की वस्तु देखने पकड़ने का अवसर मिलता है। अन्यथा सब कुछ स्थिर एवं एक रंग का ही दीखता रहता है। कुत्ता सिर्फ काला सफेद रंग पहचानता है। शिकार तलाश करने में उसकी आँखें उतना काम नहीं देती जितना कि नाक के सहारे सूँघकर पता चलता है। आँखें तो रुकावटों से बचाने भर में काम आती है। खरगोश उसकी इस कमजोरी को भली-भाँति जानते हैं इसलिए अपना बचाव करने के लिए हवा की विपरीत दिशा में दौड़ते हैं ताकि सूँघने से पता न चले। घोड़े की आँखें ऊपर और नीचे भी देख सकती हैं। उसे शत्रुओं से बचने के लिए मात्र सामने देखना ही पर्याप्त नहीं होता वरन् अन्य दिशाओं में क्या हो रहा है इसकी जानकारी भी बहुत काम आती है। प्रकृति ने उसकी आँखें इसी हिसाब से बनाई हैं। चील गिद्धों की आँखें बहुत दूर का देख सकती है यही कारण है कि वे ऊँचे रहकर भी जमीन पर अपने आहार का पता लगाने को नीचे उतर पड़ते हैं। उकाव मछलियों की ताक में तालाबों के इर्द-गिर्द मंडराता रहता है। साँस लेने के लिए जैसे ही कोई मछली पानी से बाहर तनिक भी शिर उठाती है कि बिजली की तरह झपटकर वह उसे लपक लेता है। मनुष्य की पुतलियाँ चलती हैं और पलक झपकते हैं। जबकि यह विशेषता अन्य प्राणियों में बहुत कम मात्रा में ही देखी जाती है। मनुष्य प्रायः 700 प्रकार के रंगों को देख सकता है। किन्तु इससे क्या। सात रंगों के सम्मिश्रण तो 6700 के लगभग बनते हैं। इन सभी को देख पाना मनुष्य की आँखों के लिए सम्भव नहीं। टिड्डी, मक्खियों, मच्छरों के कई-कई आंखें होती है। वे कुछ से देखते हैं तथा कुछ से अन्य प्रकार के अनुभव करते हैं। प्रागैतिहासिक काल के प्राणी अपेक्षाकृत अधिक आँखों वाले थे जब मस्तिष्क का विकास हुआ और सामने दीखने वाली दो आँखें ही आवश्यक ज्ञान अर्जित करने में कई प्रकार की भूमिकाएँ निभाने लगीं तो उनकी बढ़ी हुई संख्या अनावश्यक होने के कारण क्रमशः समाप्त होती चली गई। मनुष्य और उसी वर्ग के पशुओं को रीढ़ वाले प्राणियों में गिना जाता है। उनमें से सभी की तीन आँखें होती है। दो प्रत्यक्ष दृश्यमान एक झोपड़ी के भीतर विद्यमान किन्तु टटोलने में अदृश्य। इस तीसरे नेत्र को वैज्ञानिक भाषा में ‘पीनियल ग्लाण्ड’ कहा जाता है। मनुष्य में यह ग्रन्थि प्रायः डेढ़ दो मिलीग्राम की होती है। बनावट आँख की तरह। इसमें एक पारदर्शक द्रव भरा रहता है। आँख की पुतली की तरह उसमें प्रकाश संवेदी कोशिकाएँ भी रहती हैं। न केवल मनुष्य में वरन् थोड़ा हट-बढ़कर थोड़े आकार प्रकार के अन्तर से यह प्रायः सभी रीढ़ वाले प्राणियों में पाई जाती है। प्रत्यक्ष वाली दो आँखें सिर्फ अमुक दूरी तक अमुक स्तर के प्रकाश में दीख पड़ने वाले दृश्य ही देख पाती हैं पर यह तीसरी आँख अनेकों काम आती है। प्रकाश की कमी पड़ने पर पलकों वाली आँखों को कुछ दिखाई नहीं पड़ता परन्तु सर्वदा, सर्वत्र किसी न किसी रूप में विद्यमान रहने वाली सूक्ष्म प्रकाश तरंगों के सहारे वह अन्धकार में भी बहुत कुछ देख सकती है, अनुमान इसी आधार पर लगाते जाते हैं। अन्धों के लिए तो यह लाठी का काम देती है। न केवल दृश्य वरन् गंध, शब्द और ताप की इन तरंगों को भी वह ग्रहण कर सकती है जो नाक, कान या त्वचा की पकड़ में सामान्यतया आती नहीं है। मछलियाँ इसी उपकरण के सहारे पानी का तापमान नापती हैं और अनुकूल क्षेत्र के लिए चली जाती हैं। वे समुद्र की गहराई और अत्यधिक दूरी में क्या स्थिति हैं, इस संबंध की सभी जानकारियाँ प्राप्त करती रहती हैं जो खुली आँखों की सामर्थ्य से बाहर है। मेंढ़कों की तीसरी आँख में ‘मेलाटोनि’ नामक हारमोन निकलता है। उसी प्रकृति वरदान के सहारे उनका काया उन चित्र विचित्र पुरुषार्थों को सम्पन्न करती रहती है जो अन्य प्राणियों के बस से बाहर है। पीनियल ग्लाण्ड का मनुष्य की विशेषतया महत्वाकाँक्षा और कामुकता के साथ गहरा संबंध है। इस क्षेत्र में थोड़ी से विशिष्टता बढ़ जाने से मनुष्य असाधारण रूप से महत्वाकाँक्षी हो उठते हैं और दुस्साहस भरे कदम उठाने के लिए बिना डरे, रुके, आतुर रहते देखा जाता। इसी प्रकार इस क्षेत्र के उतार-चढ़ावों से कामुकता की प्रवृत्ति पर गहरा असर पड़ता है। वह असाधारण रूप से उत्तेजित एवं अतृप्त भी रहती देखी गई है और ऐसा भी पाया गया कि उस उत्साह का एक प्रकार से लोप ही हो जाय एवं नपुँसकता की स्थिति बन पड़े। अल्प आयु में प्रौढ़ों जैसी परिपक्व एवं विकसित जननेन्द्रियों वाले कितने ही व्यक्तियों की यह विचित्रता, पीनियल ग्लाण्ड की उत्तेजना से संबंधित पाई गई है। इसी प्रकार शरीर से सर्वथा हृष्ट पुष्ट होने पर भी वासना से घृणा करने वालों या डरने वालों में इसी क्षेत्र की शिथिलता को आधारभूत कारण समझा गया है। इतना ही नहीं आयु की तुलना बहुत घटी या बढ़ी हुए व्यक्तित्व का आश्चर्य भी इसी कारण दृश्यमान होता है। कई अधेड़ों की प्रवृत्ति बचपन जैसी पाई गई है जबकि कई बच्चे बुजुर्गों जैसे गम्भीर और दूरदर्शी देखे गये हैं। इसी तीसरे नेत्र का सहयोग करने के लिए एक छोटी ग्रन्थि मस्तिष्क के पिछले भाग में रहती है। इसे ‘पिट्यूटरी’ ग्रन्थि कहते हैं। यों इसका प्रभाव क्षेत्र एड्रीनल और थाइराइड ग्रन्थियों से रिसने वाले हारमोनों पर अधिक रहता है फिर भी वह पीनियल के कामों में बराबर हिस्सा बंटाती और भार हलका करती है। इसीलिए इन दोनों का एक युग्म माना गया है। मनुष्य में उदासी या प्रसन्नता का स्वभाव इसी क्षेत्र की स्थिति एवं प्रतिक्रिया पर निर्भर रहता है। आलसी और उत्साही का अन्तर भी इसी क्षेत्र से सम्बन्धित है। शरीर का विकास जब असाधारण रूप से घट रहा या बढ़ रहा होता तब उसका कारण पोषण की न्यूनाधिकता न होकर उपरोक्त ग्रन्थियों की हलचलों में कोई व्यतिरेक उत्पन्न होने की बात ही मस्तिष्क विधा के ज्ञाता सोचते और तद्नुरूप उपचार करते देखे गये हैं। चूहों और मुर्गियों पर किये गये प्रयोगों में यह तथ्य स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुआ कि यह तीसरी आँख जो सामान्यतया निरर्थक जैसी प्रतीत होती है, उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति को उठाने गिराने में कितनी बड़ी भूमिका निभाती हैं। उस क्षेत्र को उत्तेजित कर देने पर यह प्राणी अपनी सामान्य गतिविधियों और योग्यताओं को कई गुना बढ़ा सके। जबकि शिथिल कर देने पर वे मुर्दनी के शिकार हुए और अपनी दक्षता तथा क्रियाशीलता सर्वथा स्वस्थ होते हुए भी गँवा बैठे। पीनियल ग्रन्थि मेंढक और गिरगिट के मस्तिष्क पर एक उभार के रूप में ऊँची उठी हुई देखी जा सकता है। वे इसी के सहारे ऋतुओं के अनुरूप अपनी स्थिति बदलते रहते हैं जिसे रंग परिवर्तन के रूप में देखा जा सकता है। मनुष्य की आंखें मस्तिष्कीय पीनियल ग्रन्थि से प्रभावित होतीं और उसी स्तर के अनुरूप दृश्य देखती हैं। इन्फ्रारेड और अल्फा वायलेट किरणों को पकड़ने की क्षमता उसमें विशेष रूप से पाई जाती है। इसलिए मनुष्य प्रकाश किरणों के सातों रंग न देखकर मात्र उन्हीं रंगों को उतनी ही मात्रा में देख पाता है जितने के लिए कि पीनियल ग्रन्थि का कामकाजी भाग सहमति प्रदान करता है। जिस प्रकार मस्तिष्क का मात्र 7 प्रतिशत कामकाजी प्रयोजनों में प्रयुक्त होता है और शेष भाग प्रस्तुत स्थिति में पड़ा रहता है उसी प्रकार पीनियल का एक अंश ही प्रकृति ने दैनिक व्यवहार में काम आने के लिए पर्याप्त समझा है और शेष को विशेष व्यक्तियों द्वारा, विशेष प्रयोजन के लिए, विशेष प्रयत्नों के सहारे प्रयुक्त किये जाने के लिए सुरक्षित रखा है। यदि उन अन्धेरे क्षेत्रों को प्रकाशवान बनाया जा सके तो न केवल पीनियल ग्रन्थि वरन् सुविस्तृत मस्तिष्कीय चेतना भी जागृत हो सकती है और मानवी क्षमता से रहस्य भरे चमत्कारों का समावेश हो सकता है। सन् 1898 में जर्मन चिकित्सक ह्यूबनर के सामने एक बारह वर्षीय ऐसा बालक लाया गया जिसके अन्य सभी अंग तो आयु के हिसाब से ही विकसित हुए थे किन्तु जननेन्द्रिय पूर्ण वयस्कों जितनी परिपुष्ट हो गई थी और वह सन्तानोत्पादन में हर दृष्टि से समर्थ थी। इस असाधारण और एकाँगी प्रगति का कारण उन्होंने खोजा तो पाया कि उसकी पीनियल ग्रन्थि को अविकसित रहने वाला भाग किसी कारण उत्तेजित हो गया है और उसने अपने प्रभाव क्षेत्र को अतिशय विकसित करने की भूमिका निभाई है। ह्यूबनर से पूर्व पीनियल ग्रन्थि की रहस्यमय क्षमता के संबंध में ईसा में 400 वर्ष पहले यूनान के चिकित्सक हैरी फिल्म ने ऐसे संकेत दिये थे कि यह क्षेत्र मानवी व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं को प्रभावित कर सकने में समर्थ है। फ्राँसीसी तत्ववेत्ता रेने डेस्कार्टीज ने भी इस क्षेत्र को आत्मा का निवास माना था और वहाँ दिव्य दर्शन की सम्भावना व्यक्ति की थी। पीनियल में कितनी ही अतीन्द्रिय क्षमताएँ विद्यमान है। आज्ञा चक्र जागरण एवं तृतीय नेत्र उन्मीलन के रूप में उन्हीं के माहात्म्य प्रतिफल की चर्चा होती रहती है। शिवजी द्वारा कामदेव जलाया जाना, दमयन्ती के शाप से व्याध का भस्म होना, गाँधार द्वारा दुर्योधन का वज्रांग बना दिया जाना, संजय को महाभारत का दृश्य धृतराष्ट्र को दिखाना, लेख द्वारा ऊषा के अनिरुद्ध दर्शन कराना जैसा पौराणिक आख्यायिकाएं इसी तृतीय नेत्र उन्मीलन के साथ जुड़ी हुई सिद्धियों का दिग्दर्शन कराती हैं। मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म में नेत्रों के द्वारा जिस वेधक दृष्टि को उगाया बढ़ाया एवं प्रयुक्त किया जाता है वस्तुतः वह उसी तृतीय नेत्र का उत्पादन है जिसे शरीर शास्त्री पीनियल ग्रन्थि के नाम से संवर्धन करते हैं। चर्म चक्षुओं की यदि हिफाजत न रखी जाय, उनके प्रति उपेक्षा बरती जाय, दृश्य शक्ति का व्यतिक्रम किया जाय तो वे असमय में ही खराब हो जाते हैं और समान या आँशिक मान्यता का शिकार बनना पड़ता है। यही बात तृतीय नेत्र के सम्बन्ध में भी है। ध्यान योग त्राटक अभ्यास आदि के माध्यम से आज्ञाचक्र के नाम से जानने वाले पीनियल संस्थान को विशिष्ट क्षमता सम्पन्न बना सकते हैं। तीसरी आँख प्रस्तुत दो आँखों से कम महत्वपूर्ण नहीं है। उसे न तो उपेक्षित पड़े रहने देना चाहिए और कुदृष्टि अपनाकर नष्ट-भ्रष्ट ही करना चाहिए। *जय-जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌸🌸

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Neha Sharma Nov 10, 2021

*कजरारे मोटे मोटे तेरे नैन हे नजर ना लग जाये - एक बार अवश्य सुनें.....बाबा श्री चित्र विचित्र जी महाराज द्वारा...*!!💙💙💙💙💝💝💙💙💙💙!!* *||||||||||||‼️जय श्री राधेकृष्णा‼️||||||||||||* *ओ कान्हा प्रेमियों:-••••••••••••••••!!* !!किसी ने"कन्हैया"को मंदिर में बिठाया है!! किसी ने कन्हैया को फूलों से सजाया है 🌹 ‌ *!!हमने तो खोले हैं "दिल" के ताले!!* !!अपने कन्हैया को दिल ❣️ में बसाया है!! *!! जय जय श्री !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! राधेकृष्णा!!* *!!✍️ शुभ संध्या नमन🙏!!* ||•••••••••••••••💙❣️💙••••••••••••••||* 🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚 *कैसे पड़ा भगवान का "गोविंद" नाम*? 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 *भगवान् की गोवर्धन लीला के समय जब इंद्र देव वर्षा और विनाश का तांडव करके थक गए...* *वह वृन्दावन और वृन्दावन वासिओं का कुछ भी अहित नहीं कर पाए तब वह बहुत लज्जित हुए...* *वह भगवान् लीला और उनकी शक्ति को पहचान चुके थे, उनका अभिमान चूर-चूर हो चुका था...* *वह भगवान् से अपने कृत्य के लिए क्षमा मांगने की सोंच रहे थे किन्तु साहस नहीं कर पा रहे थे...* *तभी आकाश मार्ग में तेज प्रकाश उत्तपन्न हुआ और घंटियों की मधुर ध्वनि गूंजने लगी...* *कुछ ही देर में गौ माता सुरभि वहाँ प्रकट हुई और इंद्र को सम्बोधित करते हुए बोली..* *हे देवराज मैंने अब तक आप को गौ वंश का रक्षक ही समझा था, किन्तु अब मेरा भ्रम टूट चुका है...* *आपने अपने अहंकार के कारण वृन्दावन के सम्पूर्ण गो वंश को समाप्त करने के लिए अपनी पूरी शक्ति का प्रयोग किये...* *किन्तु धन्य है भगवान् श्री कृष्ण जिन्होंने गो वंश ही नहीं समस्त वृन्दावन वासिओं की आपके कोप से रक्षा की...* *सत्य में तो वही गौ रक्षक हैं, जिन्होंने गौ वंश के किसी भी प्राणी का तनिक भी अहित नहीं होने दिया..* *अतः मैं आपको गो वंश का रक्षक मानने से इंकार करती हूँ...* *मैं जा रही हूँ वृन्दावन की पावन धरती पर जहां भगवान् श्री कृष्ण अपनी लीला कर रहे हैं, मैं जा रही हूँ, श्री हरी के चरणो की वंदना करने...* *ऐसा कह कर गौ माता सुरभी वृन्दावन की और चल दी ।* *वृन्दावन पहुँच कर गौ माता सुरभी भगवान् श्री कृष्ण के सम्मुख प्रकट हुई।* *गौ माता को अपने सम्मुख देख कर भगवान कृष्ण अत्यंत प्रसन्न हुए उन्होंने उनके आने का कारण पूंछा...* *गौ माता सुरभी बोली, हे स्वामी आप तीनो लोकों के पालन हार हैं, आज आपने अपनी लीला से वृन्दावन के समस्त गौ वंश की रक्षा की है...* *मैं आपके चरणो की वंदना करती हूँ, हे नाथ आज में बहुत प्रसन्न हूँ।* *हे स्वामी यू तो समस्त सृष्टि आपके संकेत मात्र से ही चलायमान है, आप ही समस्त सृष्टि की उत्त्पत्ति का कारण है...* *आप ही एक मात्र दाता है, समस्त संसार आप ही से उपभोग प्राप्त करता है, किन्तु हे स्वामी आज मैं आपको कुछ देना चाहती हूँ, कृपया स्वीकार करें...* *तब भगवान् प्रेम पूर्वक बोले... हे माता आप मुझको अपनी माता के सामान ही प्रिय हैं, आप जो भी देंगी उसको प्राप्त करना मेरा सौभाग्य होगा।* *यह सुनकर गौ माता सुरभी अत्यंत प्रसन्न हुई और बोलीं.. हे स्वामी आपके इस संसार में अनेको नाम हैं..* *किन्तु आज में भी आपको एक नाम देना चाहती हूँ कृपया इसे स्वीकार करें...* *तब भगवान् अत्यंत प्रसन्न होते हुए बोले... अवश्य माता, शीघ्र ही बताएं...* *गौ माता सुरभी बोलीं हे, नाथ आपने समस्त गौ वंश की रक्षा की इस लिए आज से आप "गोविन्द" नाम से पुकारे जायेंगे...* *"गोविन्द" नाम सुनकर भगवान् कृष्ण प्रसन्ता से झूम उठे और गौ माता सुरभी से बोले...* *हे माता.. आपका दिया यह नाम अत्यंत सुन्दर है, में इसको सहर्ष स्वीकार करता हूँ..* *मेरे जितने भी नाम है उन सभी नामो में यह नाम मुझको सबसे अधिक प्रिय होगा..* *मैं आपको वचन देता हूँ कि आज से मेरा जो भी भक्त मुझको "गोविन्द" नाम से पुकारेगा, उसके सभी दुःख मैं स्वयं ही वहन करूँगा।* *भगवान् और गौमाता सुरभी के मध्य यह वार्तालाप चल ही रहा था तभी वहां देवराज इंद्र भी आप पहुंचे...* *उन्होंने भगवान् से अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी और "गोविन्द" नाम से भगवान् की वंदना की..* *भगवान् ने प्रसन्न हो कर इन्द्र को क्षमा कर दिया। तत्पश्चात देवराज इंद्र और गौ माता सुरभी ने प्रभु से विदा ली।* *इस प्रकार मेरे ठाकुर जी का एक और नाम पड़ा “गोविन्द”...* *क्योंकि भगवान् कृष्ण को गायों से विशेष स्नेह था अतः गौ माता द्वारा दिया गया यह गोविन्द नाम भगवान् को अत्यंत प्रिय है।* *जो भी भक्त भगवान् को गोविन्द नाम से पुकारता है भगवान् उसकी प्रार्थना को इस प्रकार स्वीकार करते है जैसे गौ माता उनको पुकार रही हो।* *इसलिए, भगवान् के जिस भी भक्त को भगवान् का आश्रय प्राप्त करना हो उसे जीवन के प्रत्येक क्षण में गोविन्द-गोविन्द नाम रटते रहना चाहिए।* *कृष्ण गोविन्द गोपाल गाते चलो* *मन के विषयों को हरदम हटाते चलो* *काम करते चलो नाम जपते चलो* *हर समय कृष्ण का ध्यान धरते चलो* *काम की वासना को मिटाते चलो* *कृष्ण गोविन्द गोपाल गाते चलो ..* *🌹!!जय जय श्री राधेकृष्णा!!🌹* *🙏!!ठाकुर बांके बिहारी लाल की जय !!🙏*

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Neha Sharma Nov 10, 2021

!!🥀!! *सुविचार* !!🥀!!.....!!* दिन में जिसे अनुराग है वैसे कमल को, दिन सूर्य से पैदा हुई शोभा देता है। अर्थात् परोपकार करना तो सज्जनों का व्यसन-आदत है, उन्हें गुण-दोष की परवाह नहीं होती!!*ॐ श्री गणेशाय नमः*🙇 *छठ महापर्व 2021 पर भगवान सूर्य देव और छठी माई आप की सभी मनोकामनाएं पूरी करें।*🌺🥀🌹🎎 *छठ पूजा में सूर्य देव और छठी मैया की पूजा का प्रचलन और उन्हें अर्घ्य देने का विधान है। इस दिन सभी महिलाएं नदी, तालाब या जलाशय के तट पर सूर्य को अर्घ्‍य देकर उसकी पूजा करती है। यह पर्व 4 दिनों तक मनाया जाता है। 8 नंबर से ही नहाय खा से इस पर्व की शुरुआत हो जाएगी। 9 नंबर को खरना, 10 नवंबर को सांध्य अर्घ्‍य और 11 नवंबर को उषा काल का अर्घ्‍य दिया जाएगा। *छठ हिंदू धर्म का बहुत प्राचीन त्यौहार है, जो ऊर्जा के परमेश्वर के लिए समर्पित है जिन्हें सूर्य या सूर्य षष्ठी के रूप में भी जाना जाता है। लोग पृथ्वी पर हमेशा के लिये जीवन का आशीर्वाद पाने के लिए भगवान सूर्य को धन्यवाद देने के लिये ये त्यौहार मनाते हैं। लोग बहुत उत्साह से भगवान सूर्य की पूजा करते हैं और अपने परिवार के सदस्यों, दोस्तों और बुजुर्गों के अच्छे के लिये सफलता और प्रगति के लिए प्रार्थना करते हैं। हिन्दू धर्म के अनुसार सूर्य की पूजा कुछ श्रेणी रोगों के इलाज से संबंधित है जैसे कुष्ठ रोग आदि। *इस दिन जल्दी उठकर पवित्र गंगा में नहाकर पूरे दिन उपवास रखने का रिवाज है, यहाँ तक कि वो पानी भी नहीं पीते और एक लम्बे समय तक पानी में खड़े रहते हैं। वो उगते हुये सूर्य को प्रसाद और अर्घ्य देते हैं। ये भारत के विभिन्न राज्यों में मनाया जाता है, जैसे: बिहार, यू।पी।, झारखण्ड और नेपाल। हिन्दू कलैण्डर के अनुसार, ये कार्तिक महाने (अक्टूबर और नवम्बर महीने में) के छठे दिन मनाया जाता है। *छठ पूजा हिन्दू धर्म में बहुत महत्व रखती है और ऐसी धारणा है कि राजा द्वारा पुराने पुरोहितों से आने और भगवान सूर्य की परंपरागत पूजा करने के लिये अनुरोध किया गया था। उन्होनें प्राचीन ऋगवेद से मंत्रों और स्त्रोतों का पाठ करके सूर्य भगवान की पूजा की। प्राचीन छठ पूजा हस्तिनापुर (नई दिल्ली) के पांडवों और द्रौपदी के द्वारा अपनी समस्याओं को हल करने और अपने राज्य को वापस पाने के लिये की गयी थी। ये भी माना जाता है कि छठ पूजा सूर्य पुत्र कर्ण के द्वारा शुरु की गयी थी। वो महाभारत युद्ध के दौरान महान योद्धा था और अंगदेश (बिहार का मुंगेर जिला) का शासक था। *छठ पूजा के दिन छठी मैया (भगवान सूर्य की पत्नी) की भी पूजा की जाती है, छठी मैया को वेदों में ऊषा के नाम से भी जाना जाता है। ऊषा का अर्थ है सुबह (दिन की पहली किरण)। लोग अपनी परेशानियों को दूर करने के साथ ही साथ मोक्ष या मुक्ति पाने के लिए छठी मैया से प्रार्थना करते हैं। *छठ पूजा मनाने के पीछे दूसरी ऐतिहासिक कथा भगवान राम की है। यह माना जाता है कि 14 वर्ष के वनवास के बाद जब भगवान राम और माता सीता ने अयोध्या वापस आकर राज्यभिषेक के दौरान उपवास रखकर कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष में भगवान सूर्य की पूजा की थी। उसी समय से, छठ पूजा हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण और परंपरागत त्यौहार बन गया और लोगों ने उसी तिथि को हर साल मनाना शुरु कर दिया। *बहुत समय पहले, एक राजा था जिसका नाम प्रियव्रत था और उसकी पत्नी मालिनी थी। वे बहुत खुशी से रहते थे किन्तु इनके जीवन में एक बहुत बचा दुःख था कि इनके कोई संतान नहीं थी। उन्होंने महर्षि कश्यप की मदद से सन्तान प्राप्ति के आशीर्वाद के लिये बहुत बडा यज्ञ करने का निश्चय किया। यज्ञ के प्रभाव के कारण उनकी पत्नी गर्भवती हो गयी। किन्तु 9 महीने के बाद उन्होंने मरे हुये बच्चे को जन्म दिया। राजा बहुत दुःखी हुआ और उसने आत्महत्या करने का निश्चय किया। अचानक आत्महत्या करने के दौरान उसके सामने एक देवी प्रकट हुयी। देवी ने कहा, मैं देवी छठी हूँ और जो भी कोई मेरी पूजा शुद्ध मन और आत्मा से करता है वह सन्तान अवश्य प्राप्त करता है। राजा प्रियव्रत ने वैसा ही किया और उसे देवी के आशीर्वाद स्वरुप सुन्दर और प्यारी संतान की प्राप्ति हुई। तभी से लोगों ने छठ पूजा को मनाना शुरु कर दिया। *छठ की पूजा में एक-एक विधि-विधान को महत्व दिया गया है। इन विधि-विधानों में पूजन सामग्री विशेष महत्व है साथ ही इन सामग्री के बिना छठ पूजा अधूरा माना गया है। छठ पूजा के लिए जो पूजन सामग्री महवपूर्ण है इसका पूरा लिस्ट इस प्रकार है:- बाँस या पीतल की सूप, बाँस के फट्टे से बने दौरा, डलिया और डगरा, पानी वाला नारियल, गन्ना जिसमें पत्ता लगा हो, सुथनी, शकरकंदी, हल्दी और अदरक का पौधा (हरा हो तो अच्छा), नाशपाती, नींबू बड़ा, शहद की डिब्बी, पान और साबूत सुपारी, कैराव, सिंदूर, कपूर, कुमकुम, चावल (अक्षत), चन्दन, मिठाई। इसके अतिरिक्त घर में बने हुए पकवान जैसे ठेकुवा, खस्ता, पुवा, जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी भी कहते हैं, इसके अलावा चावल के लड्डू, जिसे लड़ुआ भी कहा जाता है, इत्यादि छठ पूजन के सामग्री में शामिल है। *यह माना जाता है कि छठ पूजा करने वाला व्यक्ति पवित्र स्नान लेने के बाद संयम की अवधि के 4 दिनों तक अपने मुख्य परिवार से अलग हो जाता है। पूरी अवधि के दौरान वह शुद्ध भावना के साथ एक कंबल के साथ फर्श पर सोता है। सामान्यतः यह माना जाता है कि यदि एक बार किसी परिवार नें छठ पूजा शुरु कर दी तो उन्हें और उनकी अगली पीढी को भी इस पूजा को प्रतिवर्ष करना पडेगा और इसे तभी छोडा जा सकता है जब उस वर्ष परिवार में किसी की मृत्यु हो गयी हो। (आध्यात्मिक जानकारी और ऐसे रोचक एवं ज्ञानवर्धक पोस्टों के लिये हमारे फेसबुक पेज रामायण संदेश के साथ जुड़े रहें) *भक्त छठ पर मिठाई, खीर, ठेकुआ और फल सहित छोटी बाँस की टोकरी में सूर्य को प्रसाद अर्पण करते है। प्रसाद शुद्धता बनाये रखने के लिये बिना नमक, प्याज और लहसुन के तैयार किया जाता है। यह 4 दिन का त्यौहार है जो शामिल करता है :- *पहले दिन भक्त जल्दी सुबह गंगा के पवित्र जल में स्नान करते हैं और अपने घर प्रसाद तैयार करने के लिये कुछ जल घर भी लेकर आते हैं। इस दिन घर और घर के आसपास साफ-सफाई होनी चाहिये। वे एक वक्त का खाना लेते हैं, जिसे कद्दू-भात के रूप में जाना जाता है जो केवल मिट्टी के स्टोव (चूल्हे) पर आम की लकडियों का प्रयोग करके ताँबे या मिट्टी के बर्तन में बनाया जाता है। *दूसरे दिन (छठ से एक दिन पहले) पंचमी को, भक्त पूरे दिन उपवास रखते हैं और शाम को पृथ्वी (धरती) की पूजा के बाद सूर्य अस्त के बाद व्रत खोलते हैं। वे पूजा में खीर, पूरी, और फल अर्पित करते हैं। शाम को खाना खाने के बाद, वे बिना पानी पियें 36 घण्टे का उपवास रखते हैं। *तीसरे दिन (छठ वाले दिन) वे नदी के किनारे घाट पर संध्या अर्घ्य देते हैं। अर्घ्य देने के बाद वे पीले रंग की साडी पहनती हैं। परिवार के अन्य सदस्य पूजा से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए इंतजार करते हैं। छठ की रात कोसी पर पाँच गन्नों से कवर मिट्टी के दीये जलाकर पारम्परिक कार्यक्रम मनाया जाता है। पाँच गन्ने पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) को प्रर्दशित करते हैं जिससे मानव शरीर का निर्माण करते हैं। *चौथे दिन की सुबह (पारण), भक्त अपने परिवार और मित्रों के साथ गंगा नदी के किनारे बिहानिया अर्घ्य अर्पित करते है। भक्त छठ प्रसाद खाकर व्रत खोलते है। *छठ पूजा का अनुष्ठान, (शरीर और मन शुद्धिकरण द्वारा) मानसिक शांति प्रदान करता है, ऊर्जा का स्तर और प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है, जलन क्रोध की आवृत्ति, साथ ही नकारात्मक भावनाओं को बहुत कम कर देता है। यह भी माना जाता है कि छठ पूजा प्रक्रिया के उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करने में मदद करता है। इस तरह की मान्यताएँ और रीति-रिवाज छठ अनुष्ठान को हिंदू धर्म में सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार बनाते हैं। *छठ पूजा की शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी तिथि से होती है। यह छठ पूजा का पहला दिन होता है, इस दिन नहाय खाय होता है। इस वर्ष नहाय-खाय 08 नवम्बर (सोमवार) को है। इस दिन सूर्योदय सुबह 06:40 बजे और सूर्यास्त शाम को 05:30 बजे पर होगा। *लोहंडा और खरना छठ पूजा का दूसरा दिन होता है। यह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को होता है। इस वर्ष लोहंडा और खरना 09 नवम्बर दिन मंगलवार को है। इस दिन सूर्योदय सुबह 06:41 बजे पर होगा और सूर्यास्त शाम को 05:29 बजे पर होगा। *छठ पूजा का मुख्य दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को होता है। इस दिन ही छठ पूजा होती है। इस दिन शाम को सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है इस वर्ष छठ पूजा 10 नवम्बर बुधवार को है। इस दिन सूर्यादय 06:42 बजे पर होगा और सूर्यास्त 05:29 बजे पर होगा। छठ पूजा के लिए षष्ठी तिथि का प्रारम्भ 09 नवम्बर को सुबह 10:36 बजे से हो रहा है, जो 10 नवम्बर को सुबह 08:25 बजे तक है। *छठ पूजा का अन्तिम दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि होती है। इस दिन सूर्योदय के समय सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित किया जाता है। उसके बाद पारण कर व्रत को पूरा किया जाता है। इस वर्ष छठ पूजा का सूर्योदय अर्घ्य तथा पारण 11 नवम्बर गुरुवार को होगा। इस दिन सूर्योदय सुबह 06:42 बजे तथा सूर्यास्त शाम को 05:28 बजे होगा। *इस लेख में सूर्योदय और सूर्यास्त का जो समय दिया गया है वह भारत की राजधानी दिल्ली शहर का है ।किसी तरह के संशय से बचने के लिए और अपने शहर के सही समय के लिए और पंचांग की सटीकता और प्रामाणिकता के लिए आप अपने स्थानीय ज्योतिषी से अवश्य संपर्क करें। 🙏🚩*जय जय छठ माता की*🚩🙏 🙇🌺*जय जय श्री राधेकृष्णा*🌺🙇

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Neha Sharma Nov 9, 2021

🚩*जय श्रीराम जय श्री हनुमान*🚩 🙇🌺*शुभ रात्रि नमन*🌺🙇 "सम्मान......... *मम्मी.....आप मेरी शादी कराना चाहती हैं ना.... ठीक है तो सुनो.. मैं भाभी से शादी करना चाहता हूँ.. *चटाक.. (थप्पड़ की आवाज़ से कमरा गूंज गया) *क्या बक रहा है सोहन *तेरा दिमाग़ तो ख़राब नहीं हो गया....भाभी है वो तेरी सगी भाभी.... *तेरे भाई मोहन की ब्याहता है वो और तू.... छी.... शर्म आनी चाहिए तुझे.. *भाई की ब्याहता......सोहन ताली बजाता हुए बोला चलो शुक्र है कि मम्मी.... याद आ गया आपको वो मेरे बडे भाई मोहन की पत्नी हैं.. *और क्या कहा आपने शर्म..... हां मम्मी.... *शर्म आई थी मुझे..... बहुत शर्म आई जब भाभी को विधवा कहकर रमा काकी ने ताना मारा.. ... *बहुत शर्म आई जब शगुन के कामों में उन्हें विधवा कह सब दूर कर देते हैं..... *और उससे भी ज्यादा शर्म तब आती है जब मेरी मम्मी ही भाभी के साथ ऐसा बर्ताव करती हैं जैसे उनका पति नही मरा कोई पाप हो गया है उनसे..... *सोहन...... मां ने चिल्लाते हुए कहा *चिल्लाओ मत मम्मी...... आपके चिल्लाने से मेरा इरादा नहीं बदलेगा...... *तू समझता कयो नहीं है सोहन....... हमारे समाज में विधवा के लिए कुछ नियम, कुछ कायदे होते हैं, और हमें उनको मानना चाहिए... विधवा शगुन के काम नहीं करती, अपशगुन होता है.. पिता ने बीच मे आते हुए कहा... *पापा..... जब भाभी इस घर की बहु बनकर आई थीं तो आपने उनके सिर पर हाथ रख के कहा था.. ... *बहु नहीं बेटी घर लाया हूं...... बेटी की तरह पलकों पे रख रहे थे उनको और भाई के जाते ही आज वही बेटी इतनी अपशगुनी हो गई..... आप लोगों की सोच से मुझे घृणा आ रही है...... *कुछ देर की खामोशी के बाद सोहन ने कहा *मेरा इरादा पक्का है पापा.. ...ऐसा कहकर वह जाने लगा.. *तो ठीक है...... आज से सुधा को विधवा कहकर कोई नहीं पुकारेगा.. ... *और अगर किसी ने कहा तो मैं उसकी जुंबान खींच लुंगी.. उसके साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा.. ...मगर तू वहीं शादी करेगा जहां मैं कहूंगी.. *वाह मम्मी वाह.. ....आप तो सौदा करने लगीं.. ...चलिए तो एक सौदा मैं करता हूं...... *भाभी की दूसरी शादी होगी.....किसी अच्छे घर में एक सभ्य लड़के से..... उनका भविष्य संवारने की कसम खाईए मम्मी..... *तेरे सर की कसम सोहन बेटा .....जैसा तू चाहेगा वैसा ही होगा..... *तो ठीक है भाभी की शादी के बाद आप लोग जहां कहेंगे मैं वहां शादी करूंगा.. *वहीं दूसरे कमरे मे दरवाजे के पीछे खडी सुधा सिसकियां लेकर रो रही थी..... *सोहन ने सिसकियों की आवाज सुनी ओर कमरे तक पहुंचा मगर वो कुछ कहता उसके पहले सुधा अपने कमरे में चली गयी और अंदर से कमरा बंद कर लिया.... *सोहन सुधा से बहुत कुछ कहना चाहता था मगर वो भी चुपचाप अपने कमरे में चला गया.. *मम्मी-पापा वहीं बैठे थे.. *सुनिए..... आपने देखा ना सोहन किस तरह बात कर रहा था.. ....आज से पहले उसने इस तरह मुझसे कभी बात नहीं की.. ... *और अपनी भाभी से शादी..... *नहीं...सुषमा जी...... जिसे उसने नज़र उठा कर ठीक से कभी देखा नहीं वो सुधा से शादी करना तो दूर ऐसा ख्याल भी मन मे नहीं लाएगा.. *सच कहूं सुषमा जी.....बच्चे बड़े हो गए हैं..... और सोहन सही कह रहा है जिसे बेटी बनाकर लाए थे उसका कितना तिरिस्कार किया हमने..... और वो पढ़ी-लिखी आज के ज़माने की लड़की सब सह गई... सच पूछो तो गलती हमारी ही है... *आप सही कह रहे है जी.....मोहन के जाने के बाद मैंने जैसे सुधा को कभी प्यार से देखा ही नहीं.. ... *पहले ये घर सुधा की हँसी से गूंज उठता था..... मैंने सिर्फ सुधा का ही दिल नहीं दुखाया.. मैंने अपने मोहन का भी दिल दुखाया है.. *सुषमा जी उठकर सुधा के पास गई.. .... *दरवाजे को बजा के आवाज़ दी.....सुधा..... बेटा सुधा.... *सुधा ने दरवाजा खोल दिया.. *जी..... *आ बैठ यहां मेरे पास.. ...बेटा मुझे माफ़ कर दे मुझसे गलती हो गई...... मैंने रीति-रिवाज़ के नाम पर तेरा बहुत दिल दुखाया है.. *पीछे से पापा भी आ गए *सुषमा के साथ-साथ बेटा मुझे भी माफ़ कर दो.. ... मैंने भी कोई कसर नहीं छोड़ी बहुत बुरा बर्ताव किया तुम्हारे साथ.. ...मैं हाथ जोड़कर..... *नहीं पापा..... मैं आप दोनों से बिल्कुल भी नाराज़ नही हूं..... *मुझे कोई शिकायत नहीं है आप दोनो से.....सुधा ने बीच में ही ससुरजी को रोक कर कहा *मां..... अगर मैं कुछ माँगू तो दोगी मुझे.... *हां बेटा .....आज इतने वक़्त के बाद तो तू कुछ माँग रही है.. ...मैं ज़रूर दूँगी..मांग बेटा.. *मां..... मैं शादी नहीं करना चाहती.....अब मुझसे ये दुबारा नहीं होगा.. ...मैं आज भी सिर्फ मोहन से प्यार करती हूँ.. मैं मोहन को नहीं भूल पाऊंगी मां...... मैं इसी घर में आपकी बेटी बन के रहना चाहती हूं...... रोते हुए सुधा बोली... *मगर बेटा तेरी उम्र ही क्या है.. ...और हम लोग कब तक तेरा सहारा बने रहेंगे.. एक दिन तो हमे भी जाना है *नहीं पापा..... हम सब साथ में रहेंगे आप दोनों को मैं कहीं नहीं जाने दूँगी.. कृपा कर मेरी शादी का विचार मन से निकाल दीजिए.... *ठीक है बेटा जैसा तुम चाहो.. ...अब तुम आराम करो *आँखें पोंछ ऐसा कहकर वो दोनों चले गए। *तब तक सोहन की आवाज़ आई..... भाभी मैं अंदर आ सकता हूँ.. *सुधा ने कुछ नहीं कहा..... *सोहन सुधा के पैरों की तरफ नीचे सिर झुकाए बैठ गया.. *भाभी मुझे माफ कर दो.... *मैंने आज आपका बहुत दिल दुखाया है मगर मैं क्या करता कोई रास्ता ही समझ नहीं आया मुझे.... *पहले आप कितना खुश रहती थी....मगर मोहन भैया के जाते ही आपके साथ हो रहा दुर्व्यवहार दिनों दिन बढ़ता जा रहा था और आप चुपचाप सब कुछ सहन कर रही थी सोहन की बातें सुन सुधा अब भी खामोश थी.. मैंने आपको हमेशा मां की नज़र से देखा है और आप ये जानती है.... मेरी मां के साथ अन्याय हो ये कैसे हो सकता है..... और फिर मुझे मोहन भैया को भी तो ऊपर जाकर मुंह दिखाना है..... इतनी बड़ी बातें छोटे.. ...और तुम उन्हें मुंह मत दिखाना.....सुधा ने सोहन का मुंह ऊपर करते हुए कहा क्यों...... सोहन चोंककर बोला अरे अपना बंदर जैसा मुंह दिखा दिया मोहन को, तो वो डर नहीं जाएंगे.. ..सुधा ने मुस्कुराकर कहा हा.... हा ....हा....मोहन भैया मुझे बचपन में बंदर बोलते थे.....मगर ये आपको कैसे पता...हंसते हुए सोहन बोला .... और दोनों रोते हुए ही हंसने लगे.. और सुधा की हँसी से घर एक बार फिर गूंजने लगा..... *एक प्ररेणादायक रचना।।।। ******************************************* 🌹🌹🌹🌹🙏🙏🌹🌹🌹🌹 *विचार पुष्प* *कपड़े से छाना हुआ पानी स्वास्थ्य ठीक रखता है...और विवेक से छानी हुई वाणी संबंध को ठीक रखती है......* *भले ही 'शब्द' को कोई 'स्पर्श' नहीं कर सकता पर...'शब्द' सभी को स्पर्श कर जाते हैं......* *अगर रिश्तों की बनावट में समर्पण की भावना हो,तो मुठ्ठी भर शिकायतों से दरारे नहीं पड़ती.....* *मदद करने के लिए केवल..धन..की जरुरत नहीं होती उसके लिए एक अच्छे..मन..की भी जरुरत होती है* *ईश्वर की कृपा एक अंधेरी गुफा में मोमबत्ती की तरह होती है...यह आपको एक बार में सब कुछ नहीं दिखाती है..लेकिन..अगले कदम को सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त रोशनी देती है......* 🙏🌺*जय-जय श्री राधेकृष्णा*🌺🙏

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