parteek kaushik Oct 16, 2021

🙏*ओम् नमो भगवते वासुदेवाय नमः*🙏 🙇🌺*शुभ प्रभात् नमन*🌺🙇 👍*गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र हिंदी में...*गजराज को बचाने के लिए भगवान विष्णु नंगे पैर ही दौड़ पड़े थे, गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र से मिलती है कर्ज़ से मुक्ति। भगवान विष्णु अपने भक्तों को जरा भी कष्ट नहीं होने देते हैं. गजेंद्र मोक्ष की कथा हमें यही बताती है. आइए जानते हैं इस कथा और गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र के महत्व के बारे में..... *गजेंद्र मोक्ष की कथा का वर्णन श्रीमद भागवत पुराण में भी मिलता है. कथा के अनुसार क्षीरसागर में त्रिकुट नाम का पर्वत था. जिसके आसपास हाथियों का परिवार रहता था. गजेंद्र हाथी इस परिवार का मुखिया था. एक दिन घूमते-घूमते उसे प्यार लगी.परिवार के अन्य सदस्यों के साथ ही गजेंद्र पास के ही एक सरोवर से पाने पी कर अपनी प्यास बुझाने लगा. लेकिन तभी एक शक्तिशाली मगरमच्छ ने गजराज के पैर को दबोच लिया और पाने के अंदर खीचने लगा. *मगर से बचने के लिए गजराज ने पूरी शक्ति लगा दी लेकिन सफल नहीं हो सका. दर्द से गजेंद्र चीखने लगा. गजेंद्र की चीख सुनकर अन्य हाथी भी शोर करने लगे. इन्होंने भी गजेंद्र को बचाने का प्रयास किया लेकिन कोई सफलता नहीं मिली. गजेंंद्र जब सारे प्रयास करके थक गया और उसे अपना काल नजदीक आते दिखाई देने लगा तब उसने भगवान विष्णु का स्मरण किया और उन्हें पुकारने लगा. अपने भक्त की आवाज सुनकर भगवान विष्णु नंगे पैर ही गरुण पर सवार होकर गजेंद्र को बचाने के लिए आ गए और अपने सुर्दशन चक्र से मगर को मार दिया. *गजेंद्र मोक्ष का महत्व..... *ऐसी मान्यता है गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का नियमित पाठ करने से कर्ज की समस्या से निजात मिलती है, वहीं गजेंद्र मोक्ष का चित्र घर में लगाने से आने वाली बाधा दूर होती है. इस स्तोत्र का सूर्योदय से पहले स्नान करने के बाद प्रतिदिन करना चाहिए. *गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र..... *नाथ कैसे गज को फन्द छुड़ाओ, यह आचरण माहि आओ. गज और ग्राह लड़त जल भीतर, लड़त-लड़त गज हार्यो. जौ भर सूंड ही जल ऊपर तब हरिनाम पुकार्यो. नाथ कैसे गज को फन्द छुड़ाओ, यह आचरण माहि आओ. शबरी के बेर सुदामा के तन्दुल रुचि-रु‍चि-भोग लगायो. दुर्योधन की मेवा त्यागी साग विदुर घर खायो. नाथ कैसे गज को फन्द छुड़ाओ, यह आचरण माहि आओ. पैठ पाताल काली नाग नाथ्‍यो, फन पर नृत्य करायो. गिर‍ि गोवर्द्धन कर पर धार्यो नन्द का लाल कहायो. नाथ कैसे गज को फन्द छुड़ाओ, यह आचरण माहि आओ. असुर बकासुर मार्यो दावानल पान करायो. खम्भ फाड़ हिरनाकुश मार्यो नरसिंह नाम धरायो. नाथ कैसे गज को फन्द छुड़ाओ, यह आचरण माहि आओ. अजामिल गज गणिका तारी द्रोपदी चीर बढ़ायो. पय पान करत पूतना मारी कुब्जा रूप बनायो. नाथ कैसे गज को फन्द छुड़ाओ, यह आचरण माहि आओ. कौर व पाण्डव युद्ध रचायो कौरव मार हटायो. दुर्योधन का मन घटायो मोहि भरोसा आयो. नाथ कैसे गज को फन्द छुड़ाओ, यह आचरण माहि आओ. सब सखियां मिल बन्धन बान्धियो रेशम गांठ बंधायो. छूटे नाहिं राधा का संग, कैसे गोवर्धन उठायो. नाथ कैसे गज को फन्द छुड़ाओ, यह आचरण माहि आओ. योगी जाको ध्यान धरत हैं ध्यान से भजि आयो. सूर श्याम तुम्हरे मिलन को यशुदा धेनु चरायो. नाथ कैसे गज को फन्द छुड़ाओ, यह आचरण माहि आओ. *जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌸🌸

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parteek kaushik Oct 15, 2021

🙇🌺🚩*जय श्री सियाराम*🚩🌺🙇 *अधर्म पर धर्म की,असत्य पर सत्य की एवं बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक विजयादशमी(दशहरा) के पावन पर्व की बहुत बहुत बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएं*🌺🙇 *दशहरा (विजयदशमी,आयुध-पूजा) विशेष..... 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 *आश्विन (क्वार) मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विजय दशमी या दशहरे के नाम से मनाया जाता है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसीलिये इस दशमी को विजयादशमी के नाम से जाना जाता है। दशहरा वर्ष की तीन अत्यन्त शुभ तिथियों में से एक है, अन्य दो हैं चैत्र शुक्ल की एवं कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा। इस वर्ष यह शुभ पर्व 15 अक्टूबर शुक्रवार के दिन मनाया जाएगा। *इसी दिन लोग नया कार्य प्रारम्भ करते हैं, शस्त्र-पूजा की जाती है। प्राचीन काल में राजा लोग इस दिन विजय की प्रार्थना कर रण-यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे। इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं। रामलीला का आयोजन होता है। रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है। दशहरा अथवा विजयदशमी भगवान राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा पूजा के रूप में, दोनों ही रूपों में यह शक्ति-पूजा का पर्व है, शस्त्र पूजन की तिथि है। हर्ष और उल्लास तथा विजय का पर्व है। भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक है, शौर्य की उपासक है। व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव रखा गया है। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है। *दशहरा आयुध पूजन एवं अन्य शुभ मुहूर्त..... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ देवी अपराजिता और शमी 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ विजयादशमी के दिन आपको पूजा के लिए शुभ मुहूर्त दोपहर 02 बजकर 05 मिनट से लेकर दोपहर 2 बजकर 45 मिनट तक रहेगा। इस अवधि में आपको देवी अपराजिता और शमी वृक्ष की पूजा करनी चाहिए। दशहरा: शस्त्र पूजा मुहूर्त 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ दशहरा के दिन शस्त्र पूजा के लिए विजय मुहूर्त उत्तम माना जाता है। इस मुहूर्त में किए गए कार्य में सफलता अवश्य प्राप्त होती है। विजयादशमी के दिन शस्त्र पूजा के लिए विजय मुहूर्त दोपहर 02:05 बजे से दोपहर 02:45 बजे तक है। इस समय में आपको अपने शस्त्रों की पूजा करनी चाहिए। शस्त्र पूजन विधि एवं मंत्र 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ सायंकाल में नित्यकर्म से निवृत्त होकर सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्रादि को एकत्र करके हाथ में जलपुष्पादि के साथ अपना नाम, गोत्रादि के साथ संकल्प करें, यथा-''ममक्षेमारोग्य आदि सिद्धयर्थं यात्रायांविजय सिद्धयर्थं गणपतिमातृका श्रीराम, शिवशक्ति व सूर्यादि देवता अपराजिता शमीपूजन-अस्त्र-शस्त्रादि पूजनानि करिष्ये।' पुष्पाक्षत लेकर स्वऽस्तिवाचन, गणेश पूजन तथा शक्ति-मंत्र, खड्ग-मंत्र एवं अग्नि यंत्र-मंत्र से पुष्पाक्षत एवं तिलक लगाकर सत्कार पूजन करने के पश्चात् अपराजिता पूजन, भगवान राम, शिव, शक्ति (दुर्गा), गणेश तथा सूर्यादि देवताओं का पूजन करके आयुध-अस्त्र-शस्त्रों (हथियारों) की पूजा इस प्रकार करें- शक्ति मंत्र: शक्तिस्त्वं सर्वदेवानां गुहस्य च विशेषत:। शक्ति रूपेण देवि त्वं रक्षां कुरु नमोऽस्तुते॥ अग्नि यंत्र-मंत्र: अग्निशस्त्र नमोऽस्तुदूरत: शत्रुनाशन। शत्रून्दहहि शीघ्रं त्वं शिवं मे कुरु सर्वदा॥ खड्ग मंत्र: इयं येन धृताक्षोणी हतश्च महिषासुर:। ममदेहं सदा रक्ष खड्गाय नमोऽस्तुते॥ सभी प्रकार के अस्तशस्त्रो को तिलक लगाकर पुष्प अर्पण कर देवी अपराजिता की आरती करनी चाहिये। संध्या रावण दहन पूजा का मुहूर्त – शाम 5 बजकर 25 से 09:21 तक। दशमी तिथि आरंभ – 14 अक्तूबर, गुरुवार शाम 06:50 से। दशमी तिथि समाप्त – 15 अक्तूबर शुक्रवार शाम 06:50 बजे तक। दशहरे का महत्त्व 〰〰〰️〰〰 भारत कृषि प्रधान देश है इसलिए जब किसान अपने खेत में सुनहरी फसल उगाकर अनाज रूपी संपत्ति घर लाता है तो उसके उल्लास और उमंग का पारावार नहीं रहता। इस प्रसन्नता के अवसर पर वह भगवान की कृपा को मानता है और उसे प्रकट करने के लिए वह उसका पूजन करता है। समस्त भारतवर्ष में यह पर्व विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इस अवसर पर सिलंगण के नाम से सामाजिक महोत्सव के रूप में भी इसको मनाया जाता है। सायंकाल के समय पर सभी ग्रामीणजन सुंदर-सुंदर नव वस्त्रों से सुसज्जित होकर गाँव की सीमा पार कर शमी वृक्ष के पत्तों के रूप में 'स्वर्ण' लूटकर अपने ग्राम में वापस आते हैं। फिर उस स्वर्ण का परस्पर आदान-प्रदान किया जाता है। विजय पर्व के रूप में दशहरा 〰〰〰️〰〰〰️〰〰 दशहरे का उत्सव शक्ति और शक्ति का समन्वय बताने वाला उत्सव है। नवरात्रि के नौ दिन जगदम्बा की उपासना करके शक्तिशाली बना हुआ मनुष्य विजय प्राप्ति के लिए तत्पर रहता है। इस दृष्टि से दशहरे अर्थात विजय के लिए प्रस्थान का उत्सव का उत्सव आवश्यक भी है। भारतीय संस्कृति सदा से ही वीरता व शौर्य की समर्थक रही है। प्रत्येक व्यक्ति और समाज के रुधिर में वीरता का प्रादुर्भाव हो कारण से ही दशहरे का उत्सव मनाया जाता है। यदि कभी युद्ध अनिवार्य ही हो तब शत्रु के आक्रमण की प्रतीक्षा ना कर उस पर हमला कर उसका पराभव करना ही कुशल राजनीति है। भगवान राम के समय से यह दिन विजय प्रस्थान का प्रतीक निश्चित है। भगवान राम ने रावण से युद्ध हेतु इसी दिन प्रस्थान किया था। मराठा रत्न शिवाजी ने भी औरंगजेब के विरुद्ध इसी दिन प्रस्थान करके हिन्दू धर्म का रक्षण किया था। भारतीय इतिहास में अनेक उदाहरण हैं जब हिन्दू राजा इस दिन विजय-प्रस्थान करते थे। इस पर्व को भगवती के 'विजया' नाम पर भी 'विजयादशमी' कहते हैं। इस दिन भगवान रामचंद्र चौदह वर्ष का वनवास भोगकर तथा रावण का वध कर अयोध्या पहुँचे थे। इसलिए भी इस पर्व को 'विजयादशमी' कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि आश्विन शुक्ल दशमी को तारा उदय होने के समय 'विजय' नामक मुहूर्त होता है। यह काल सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है। इसलिए भी इसे विजयादशमी कहते हैं। ऐसा माना गया है कि शत्रु पर विजय पाने के लिए इसी समय प्रस्थान करना चाहिए। इस दिन श्रवण नक्षत्र का योग और भी अधिक शुभ माना गया है। युद्ध करने का प्रसंग न होने पर भी इस काल में राजाओं (महत्त्वपूर्ण पदों पर पदासीन लोग) को सीमा का उल्लंघन करना चाहिए। दुर्योधन ने पांडवों को जुए में पराजित करके बारह वर्ष के वनवास के साथ तेरहवें वर्ष में अज्ञातवास की शर्त दी थी। तेरहवें वर्ष यदि उनका पता लग जाता तो उन्हें पुनः बारह वर्ष का वनवास भोगना पड़ता। इसी अज्ञातवास में अर्जुन ने अपना धनुष एक शमी वृक्ष पर रखा था तथा स्वयं वृहन्नला वेश में राजा विराट के यहँ नौकरी कर ली थी। जब गोरक्षा के लिए विराट के पुत्र धृष्टद्युम्न ने अर्जुन को अपने साथ लिया, तब अर्जुन ने शमी वृक्ष पर से अपने हथियार उठाकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी। विजयादशमी के दिन भगवान रामचंद्रजी के लंका पर चढ़ाई करने के लिए प्रस्थान करते समय शमी वृक्ष ने भगवान की विजय का उद्घोष किया था। विजयकाल में शमी पूजन इसीलिए होता है। दशहरे पर करने के कुछ विशेष उपाय 〰〰〰️〰〰〰️〰〰〰️〰〰 👉 दशहरे के द‌िन नीलकंठ पक्षी का दर्शन बहुत ही शुभ होता है। माना जाता है क‌ि इस द‌िन यह पक्षी द‌िखे तो आने वाला साल खुशहाल होता है। 👉 दशहरा के द‌िन शमी के वृक्ष की पूजा करें। अगर संभव हो तो इस द‌िन अपने घर में शमी के पेड़ लगाएं और न‌ियम‌ित दीप द‌िखाएं। मान्यता है क‌ि दशहरा के द‌िन कुबेर ने राजा रघु को स्वर्ण मुद्राएं देने के ल‌िए शमी के पत्तों को सोने का बना द‌िया था। तभी से शमी को सोना देने वाला पेड़ माना जाता है। 👉 रावण दहन के बाद बची हुई लकड़‌ियां म‌िल जाए तो उसे घर में लाकर कहीं सुरक्ष‌ित रख दें। इससे नकारात्मक शक्‍त‌ियों का घर में प्रवेश नहीं होता है। 👉 दशहरे के द‌िन लाल रंग के नए कपड़े या रुमाल से मां दुर्गा के चरणों को पोंछ कर इन्‍हें त‌िजोरी या अलमारी में रख दें। इससे घर में बरकत बनी रहती है। 🌼🌼आप सभीको विजय दशमी की हार्दिक शुभकामनाये🌼🌼 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ . "अज्ञानी राम"...... *चैत्र मास की नवमीं तिथि के दिन जब कौशल्या अपनेेे कक्ष में बैठ भगवान विष्णु का ध्यान कर रहीं थीं तब भगवान विष्णु चतुर्भुज रूप में उनके सामने प्रकट हुए। *सदा की भांति मंद-मंद मुस्कुराते हुए भगवान विष्णु ने कौशल्या से कहा, ‘‘आप और आपके पति ने पिछले जन्म में तपस्या की थी। आप दोनों की इच्छा पूरी करते हुए मैंने वरदान दिया था कि अगले जन्म में मैं आपके घर पुत्र बनकर आऊँगा। अपना वचन निभाते हुए मैं आ गया हूँ।’’ *कौशल्या ने भगवान से कहा, ‘‘मैंने तो सुना था कि भगवान हमेशा सत्य बोलते हैं लेकिन आज जाना कि भगवान झूठ भी बोलते हैं।’’ *भगवान ने आश्चर्य जताया, ‘‘मैंने आपसे क्या झूठ बोला ?’’ *कौशल्या ने बड़ा मधुर जवाब दिया, ‘‘आपने तो कहा था कि आप मेरे घर पुत्र के रूप में आयेंगे। लेकिन ये जो चतुर्भुज रूप लेकर आये हैं ये क्या पुत्र का रूप है ? ये तो परमपिता का रूप है। मतलब कि आप झूठे हैं।’’ *भगवान को बड़ा आनन्द आया। वो समझ गये कि कौशल्या क्या चाहती हैं। वो तुरन्त शिशु रूप धारण कर कौशल्या की गोद में बैठ गये और हमेशा की तरह मुस्कुराते हुए कौशल्या का आनन्द बढ़ाने लगे। *तभी कौशल्या ने कहा, ‘‘मैंने तो सुना था कि भगवान को हर चीज का ज्ञान होता है लेकिन आज जाना कि भगवान बिल्कुल अज्ञानी होते हैं।’’ *भगवान ने पूछा, ‘‘ये आप कैसे कह सकती हो ?’’ *माता कौशल्या बोलीं, ‘‘आप इस समय मुस्कुरा रहे हैं। इसी से पता चलता है कि आपको इतना भी ज्ञान नहीं कि बच्चा जब जन्म लेता है तो हंसता नहीं, बल्कि रोता है।’’ *भगवान ने जान लिया कि माता क्या चाहती हैं और वो तुरन्त रो पड़े। 🙏🌺🚩"जय श्री राम"🚩🌺🙏

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parteek kaushik Oct 12, 2021

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parteek kaushik Oct 8, 2021

*श्री दुर्गासप्तशती पाठ (हिंदी अनुवाद सहित सम्पूर्ण)..... *(द्वितीयोध्याय)...... ।।ॐ नमश्चण्डिकायै।। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ *द्वितीयोऽध्याय...... *देवताओं के तेज से देवी का प्रादुर्भाव और *महिषासुर की सेना का वध....... *विनियोगः *ॐ मध्यमचरित्रस्य विष्णुर्रषिः, महालक्ष्मी देवता, उष्णिक् छन्दः, शाकम्भरी शक्तिः, दुर्गा बीजम्, वायुस्त्त्वम्, यजुर्वेद: स्वरूपम्, श्रीमहालक्ष्मीप्रीत्यर्थं मध्यमचरित्रजपे विनियोगः। ॐ मध्यम चरित्र के विष्णु ऋषि, महालक्ष्मी देवता, उष्णिक् छन्द, शाकम्भरी शक्ति, दुर्गा बीज, वायु त्त्व और यजुर्वेद स्वरूप है। श्रीमहा-लक्ष्मी की प्रसन्नता के लिये मध्यम चरित्र के पाठ में इसका विनियोग है। ध्यानम् ॐ अक्षस्त्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकां दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्। शुलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम् ॥ मैं कमल के आसन पर बैठी हुई प्रसन्न मुखवाली महिषासुरमर्दिनी भगवती महालक्ष्मी का भजन करता हूँ, जो अपने हाथों में अक्षमाला, फरसा, गदा, बाण, वज्र, पद्म, धनुष, कुण्डिका, दण्ड, शक्ति, खड्ग, ढाल, शंख, घण्टा, मधुपात्र, शूल, पाश और चक्र धारण करती हैं। ॐ ह्रीं' ऋषिरुवाच॥ १ ॥ ऋषि कहते हैं-॥ १॥ देवासुरमभूद्युद्ं पूर्णमब्दशतं पुरा।महिषेऽसुराणामधिपे देवानां च पुरन्दरे॥ २॥ तत्रासुरैर्महावीर्यर्देवसैन्यं पराजितम् । जित्वा च सकलान् देवानिन्द्रोऽभून्महिषासुरः॥ ३॥ पूर्वकाल में देवताओं और असुरोंमें पूरे सौ वर्षोंतक घोर संग्राम हुआ था। उसमें असुरोंका स्वामी महिषासुर था और देवताओंके नायक इन्द्र थे। उस युद्धमें देवताओंकी सेना महाबली असुरोंसे परास्त हो गयी। सम्पूर्ण देवताओंको जीतकर महिषासुर इन्द्र बन बैठा ॥ २-३॥ ततः पराजिता देवा: पद्मयोनिं प्रजापतिम्। पुरस्कृत्य गतास्तत्र यत्रेशगरुडध्वजौ ॥ ४ ॥ तब पराजित देवता प्रजापति ब्रह्माजी को आगे करके उस स्थान पर गये, जहाँ भगवान् शंकर और विष्णु विराजमान थे ॥ ४ ॥ यथावृत्तंतयोस्तद्वन्महिषासुरचेष्टितम् । त्रिदशा: कथयामासुर्देवाभिभवविस्तरम् ॥ ५॥ देवताओं ने महिषासुर के पराक्रम तथा अपनी पराजयका यथावत् वृत्तान्त उन दोनों देवेश्वरों से विस्तार पूर्वक कह सुनाया॥ ५॥ सूर्यन्द्राग्न्यनिलेन्दूनां यमस्य वरुणस्य च। अन्येषां चाधिकारान् स स्वयमेवाधितिष्ठति ॥ ६ ॥ वे बोले-'भगवन्! महिषासुर सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण तथा अन्य देवताओं के भी अधिकार छीनकर स्वयं ही सबका अधिष्ठाता बना बैठा है॥ ६॥ स्वर्गान्निराकृता: सर्वे तेन देवगणा भुवि। विचरन्ति यथा मत्या महिषेण दुरात्मना ॥ ७ ॥ उस दुरात्मा महिषने समस्त देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया है। अब वे मनुष्यों की भाँति पृथ्वी पर विचरते हैं ॥ ७ ॥ एतद्वः कथितं सर्वममरारिविचेष्टितम् । शरणं वः प्रपन्ना: स्मो वधस्तस्य विचिन्त्यताम् ॥ ८॥ दैत्यों की यह सारी करतूत हमने आप लोगों से कह सुनायी। अब हम आपकी ही शरण में आये हैं। उसके वध का कोई उपाय सोचिये' ॥ ८॥ इत्थं निशम्य देवानां वचांसि मधुसूदनः। चकार कोपं शम्भुश्च भ्रुकुटीकुटिलाननौ ।॥ ९ ॥ इस प्रकार देवताओं के वचन सुनकर भगवान् विष्णु और शिव ने दैत्यों पर बड़ा क्रोध किया। उनकी भौंहें तन गयीं और मुँह टेढ़ा हो गया॥ ९ ॥ ततोऽतिकोपपूर्णस्य चक्रिणो वदनात्ततः। निश्चक्राम महत्तेजो ब्रह्मण: शंकरस्य च॥ १०॥ अन्येषां चैव देवानां शक्रादीनां शरीरतः। निर्गतं सुमहत्तेजस्तच्चैक्यं समगच्छत ॥ ११ ॥ तब अत्यन्त कोप में भरे हुए चक्रपाणि श्रीविष्णु के मुख से एक महान् तेज प्रकट हुआ। इसी प्रकार ब्रह्मा, शंकर तथा इन्द्र आदि अन्यान्य देवताओं के शरीरसे भी बड़ा भारी तेज निकला। वह सब मिलकर एक हो गया॥ १०-११॥ अतीव तेजसः कूटं ज्वलन्तमिव पर्वतम् क्छ्र ददृशुस्ते सुरास्तत्र ज्वालाव्याप्तदिगन्तरम् ॥ १२॥ महान् तेज का वह पुंज जाज्वल्यमान पर्वत-सा जान पड़ा। देवताओं ने देखा, वहाँ उसकी ज्वालाएँ सम्पूर्ण दिशाओं में व्याप्त हो रही थीं ॥ १२ ॥ अतुलं तत्र तत्तेज: सर्वदेवशरीरजम् । एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा ॥ १३॥ सम्पूर्ण देवताओं के शरीर से प्रकट हुए उस तेज की कहीं तुलना नहीं थी। एकत्रित होने पर वह एक नारी के रूप में परिणत हो गया और अपने प्रकाश से तीनों लोकों में व्याप्त जान पड़ा ॥ १३॥ यदभूच्छाम्भवं तेजस्तेनाजायत तन्मुखम्। याम्येन चाभवन् केशा बाहवो विष्णुतेजसा ॥ १४॥ भगवान् शंकर का जो तेज था, उससे उस देवी का मुख प्रकट हुआ। यमराज के तेज से उसके सिर में बाल निकल आये। श्रीविष्णुभगवान् के तेज से उसकी भुजाएँ उत्पन्न हुईं ॥ १४॥ सौम्येन स्तनयोर्युग्मं मध्यं चैन्द्रेण चाभवत्। वारुणेन च जङ्कोरू नितम्बस्तेजसा भुवः ॥ १५ ॥ चन्द्रमा के तेज से दोनों स्तनों का और इन्द्र के तेज से मध्य भाग (कटिप्रदेश) का प्रादुर्भाव हुआ। वरुण के तेज से जंघा और पिंडली तथा पृथ्वी के तेज से नितम्ब भाग प्रकट हुआ ॥ १५ ॥ ब्रह्मणस्तेजसा पादौ तदङ्गुल्योऽर्कतेजसा । वसूनां च कराङ्गुल्यः कौबेरेण च नासिका॥ १६॥ ब्रह्मा के तेज से दोनों चरण और सूर्य के तेज से उसकी अँगुलियाँ हुईं। वसुओं के तेज से हाथों की अँगुलियाँ और कुबेर के तेज से नासिका प्रकट हुई।॥ १६ ॥ तस्यास्तु दन्ताः सम्भूताः प्राजापत्येन तेजसा । नयनत्रितयं जज्ञे तथा पावकतेजसा ॥ १७ ॥ उस देवी के दाँत प्रजापति के तेज से और तीनों नेत्र अग्नि के तेज से प्रकट हुए थे ॥ १७॥ भ्रुवौ च संध्ययोस्तेजः श्रवणावनिलस्य च। अन्येषां चैव देवानां सम्भवस्तेजसां शिवा ॥ १८॥ उसकी भौंहें संध्या के और कान वायु के तेज से उत्पन्न हुए थे। इसी प्रकार अन्यान्य देवताओं के तेज से भी उस कल्याणमयी देवी का आविर्भाव हुआ॥ १८॥ ततः समस्तदेवानां तेजोराशिसमुद्भवाम् । तां विलोक्य मुदं प्रापुरमरा महिषादिताः* ।॥ १९॥ तदनन्तर समस्त देवताओं के तेज:पुंज से प्रकट हुई देवी को देखकर महिषासुर के सताये हुए देवता बहुत प्रसन्न हुए॥ १९॥ शूलं शूलाद्विनिष्कृष्य ददौ तस्यै पिनाकधृक्। चक्रं च दत्तवान् कृष्णः समुत्पाद्य स्वचक्रतः ॥ २०॥ अर्धचन्द्रं तथा शुभ्रं केयूरान् सर्वबाहुषु। पिनाकधारी भगवान् शंकर ने अपने शूल से एक शूल निकालकर उन्हें दिया; फिर भगवान् विष्णु ने भी अपने चक्र से चक्र उत्पन्न करके भगवती को अर्पण किया॥ २० ॥ शङ्खं च वरुणः शक्तिं ददौ तस्यै हुताशनः शशवणुषी मारुतो दत्तवांश्चापं बाणपूर्णे तथेषुधी ॥ २१ ॥ वरुण ने भी शंख भेंट किया, अग्नि ने उन्हें शक्ति दी और वायु ने धनुष तथा बाण से भरे दो तरकस प्रदान किये॥ २१ ॥ वज्रमिन्द्रः समुत्पाद्य कुलिशादमराधिपः । ददौ तस्यै सहस्त्राक्षो घण्टामैरावताद् गजात् ॥ २२ ॥ सहस्र नेत्रों वाले देवराज इन्द्र ने अपने वज्र से वज्र उत्पन्न करके दिया और ऐरावत हाथी से उतारकर एक घण्टा भी प्रदान किया॥ २२॥ कालदण्डाद्यमो दण्डं पाशं चाम्बुपतिर्ददौ । प्रजापतिश्चाक्षमालां दरदौ ब्रह्मा कमण्डलुम् ॥ २३ ।। यमराज ने कालदण्ड से दण्ड, वरुणने पाश, प्रजापति ने स्फटिकाक्ष की माला तथा ब्रह्माजी ने कमण्डलु भेंट किया॥ २३ ॥ समस्तरोमकूपेषु निजरश्मीन् दिवाकरः । कालश्च दत्तवान् खड्गं तस्याश्चर्म च निर्मलम्॥ २४॥ सूर्य ने देवी के समस्त रोम-कूपों में अपनी किरणों का तेज भर दिया। काल ने उन्हें चमकती हुई ढाल और तलवार दी॥ २४॥ क्षीरोदश्चामलं हारमजरे च तथाम्बरे। चूडामणि तथा दिव्यं कुण्डले कटकानि च ॥ २५॥ नूपुरौ विमलौ तद्वद् ग्रैवेयकमनुत्तमम् ॥ २६॥ अङ्गुलीयकरत्नानि समस्तास्वङ्गुलीषु च। विश्वकर्मा दरदौ तस्यै परशुं चातिनिर्मलम् ॥ २७॥ क्षीरसमुद्र ने उज्ज्वल हार तथा कभी जीर्ण न होने वाले दो दिव्य वस्त्र भेंट किये । साथ ही उन्होंने दिव्य चूड़ामणि, दो कुण्डल, कड़े, उज्ज्वल अर्धचन्द्र, सब बाहुओं के लिये केयूर, दोनों चरणों के लिये निर्मल नूपुर, गले की सुन्दर हँसली और सब अँगुलियों में पहनने के लिये रत्नों की बनी अँगूठियाँ भी दीं। विश्वकर्मा ने उन्हें अत्यन्त निर्मल फरसा भेंट किया॥ २५-२७॥ अस्त्राण्यनेकरूपाणि तथाभेद्यं च दंशनम्। अम्लानपङ्कजां मालां शिरस्युरसि चापराम् ॥ २८॥ साथ ही अनेक प्रकार के अस्त्र और अभेद्य कवच दिये; इनके सिवा मस्तक और वक्ष:स्थल पर धारण करने के लिये कभी न कुम्हलाने वाले कमलों की मालाएँ दीं ॥ २८॥ अददज्जलधिस्तस्यै पङ्कजं चातिशोभनम्।लगाता हिमवान् वाहनं सिंहं रत्नानि विविधानि च॥ २९ ॥ जलधि ने उन्हें सुन्दर कमल का फूल भेंट किया। हिमालय ने सवारी के लिये सिंह तथा भाँति-भाँति के रत्न समर्पित किये॥ २९ ॥ ददावशून्यं सुरया पानपात्रं धनाधिपः । शेषश्च सर्वनागेशो महामणिविभूषितम् ॥ ३०॥ नागहारं ददौ तस्यै धत्ते यः पृथिवीमिमाम्। अन्येरपी सुरैर्देवी भूषणैरायुधैस्तथा ॥ ३१ ॥ सम्मानिता ननादोच्चैः साट्टाहासं मुहुर्मुहुः। तस्या नादेन घोरेण कृत्स्नमापूरितं नभः॥ ३२॥ धनाध्यक्ष कुबेर ने मधु से भरा पानपात्र दिया तथा सम्पूर्ण नागों के राजा शेष ने, जो इस पृथ्वी को धारण करते हैं, उन्हें बहुमूल्य मणियों से विभूषित नागहार भेंट दिया। इसी प्रकार अन्य देवताओं ने भी आभूषण और अस्त्र - शस्त्र देकर देवी का सम्मान किया। तत्पश्चात् उन्होंने बारंबार अट्टहास पूर्वक उच्च स्वर से गर्जना की। उनके भयंकर नाद से सम्पूर्ण आकाश गूँज उठा॥ ३०- ३२ ॥ अमायतातिमहता प्रतिशब्दो महानभूत्। चुक्षुभुः सकला लोकाः समुद्राश्च चकम्पिरे॥ ३३॥ देवी का वह अत्यन्त उच्च स्वर से किया हुआ सिंहनाद कहीं समा न सका, आकाश उसके सामने लघु प्रतीत होने लगा। उससे बड़े जोर की प्रतिध्वनि हुई, जिससे सम्पूर्ण विश्व में हलचल मच गयी और समुद्र काँप उठे॥ ३३॥ चरचाल वसुधा चेलुः सकलाश्च महीधराः। जयेति देवाश्च मुदा तामूचुः सिंहवाहिनीम्*॥ ३४॥ पृथ्वी डोलने लगी और समस्त पर्वत हिलने लगे। उस समय देवताओं ने अत्यन्त प्रसन्नता के साथ सिंहवाहिनी भवानी से कहा- 'देवि! तुम्हारी जय हो'॥३४॥ तुष्टुवुर्मुनयश्चैनां भक्तिनप्रात्मूर्तयः। दृष्ट्वा समस्तं संक्षुब्धं त्रैलोक्यममरारयः ॥ ३५ ॥ सन्नद्धाखिलसैन्यास्ते समुक्तस्थुरुदायुधाः। आ: किमेतदिति क्रोधादाभाष्य महिषासुरः ॥ ३६ ॥ अभ्यधावत तं शब्दमशेषैरसुरैर्वृतः । स ददर्श ततो देवीं व्याप्तलोकत्रयां त्विषा ॥ ३७॥ साथ ही महर्षियों ने भक्तिभाव से विनम्र होकर उनका स्तवन किया। सम्पूर्ण त्रिलोकी को क्षोभग्रस्त देख दैत्यगण अपनी समस्त सेना को कवच आदि से सुसज्जित कर, हाथों में हथियार ले सहसा उठकर खड़े हो गये। उस समय महिषासुर ने बड़े क्रोध में आकर कहा- 'आ:! यह क्या हो रहा है?' फिर वह सम्पूर्ण असुरों से घिरकर उस सिंहनाद की ओर लक्ष्य करके दौड़ा और आगे पहुँचकर उसने देवी को देखा, जो अपनी प्रभा से तीनों लोकों को प्रकाशित कर रही थीं॥ ३५ - ३७॥ पादाक्रान्त्या नतभुवं किरीटोल्लिखिताम्बराम्। क्षोभिताशेषपातालां धनुज्ज्यानिःस्वनेन ताम् ॥ ३८ ॥। उनके चरणों के भार से पृथ्वी दबी जा रही थी। माथे के मुकुट से आकाश में रेखा-सी खिंच रही थी तथा वे अपने धनुष की टंकार से सातों पातालों को क्षुब्ध किये देती थीं॥ ३८ ॥ दिशो भुजसहस्रेण समन्ताद् व्याप्य संस्थिताम्। ततः प्रववृते युद्धं तया देव्या सुरद्विषाम् ॥ ३९॥ देवी अपनी हजारों भुजाओं से सम्पूर्ण दिशाओं को आच्छादित करके खड़ी थीं। तदनन्तर उनके साथ दैत्यों का युद्ध छिड़ गया॥ ३९ ॥ शस्त्रास्त्रैबर्रहुधा मुक्तैरादीपितदिगन्तरम् । महिषासुरसेनानीश्चिक्षुराख्यो महासुरः॥ ४०।। नाना प्रकार के अस्त्र- शस्त्रों के प्रहार से सम्पूर्ण दिशाएँ उद्भासित होने लगीं । चिक्षुर नामक महान् असुर महिषासुर का सेनानायक था॥ ४० ॥ युयुधे चामरश्चान्यैश्चतुरङ्गबलान्वितः । रथानामयुतैः षड्भिरुदग्राख्यो महासुरः॥४१॥ वह देवी के साथ युद्ध करने लगा। अन्य दैत्यों की चतुरंगिणी सेना साथ लेकर चामर भी लड़ने लगा। साठ हजार रथियों के साथ आकर उदग्र नामक महादैत्य ने लोहा लिया ॥ ४१ ॥ अयुध्यतायुतानां च सहस्त्रेण महाहनु:। पञ्चाशद्भिश्च नियुतैरसिलोमा महासुरः॥ ४२।। एक करोड़ रथियों को साथ लेकर महाहनु नामक दैत्य युद्ध करने लगा। जिसके रोएँ तलवार के समान तीखे थे, वह असिलोमा नाम का महादैत्य पाँच करोड़ रथी सैनिकों सहित युद्धमें आ डटा ॥ ४२ ॥ अयुतानां शतैः षड्भिर्बाष्कलो युयुधे रणे। गजवाजिसहस्त्रौधैरनेकैः' परिवारितः ॥४३॥ वृतो रथानां कोट्या च युद्धे तस्मिन्नयुध्यत । बिडालाख्योऽयुतानां च पञ्चाशद्भिरथायुतैः ॥ ४४॥ यूयुधे संयुगे तत्र रथानां परिवारितः * । अन्ये च तत्रायुतशो रथनागहयैर्वृताः ॥ ४५॥ यूयुधुः संयुगे देव्या सह तत्र महासुराः। कोटिकोटिसहस्त्रैस्तु रथानां दन्तिनां तथा ॥ ४६ ॥ हयानां च वृतो युद्धे तत्राभून्महिषासुरः । तोमरैर्भिन्दिपालैश्च शक्तिभिर्मुसलैस्तथा ॥ ४७ ॥ युयुधुः संयुगे देव्या खड्गैः परशुपट्टिशैः । केचिच्च चिक्षिपुः शक्ती: केचित्पाशांस्तथापरे ॥ ४८॥ साठ लाख रथियों से घिरा हुआ बाष्कल नामक दैत्य भी उस युद्धभूमि में लड़ने लगा। परिवारित नामक राक्षस हाथी सवार और घुड़सवारों के अनेक दलों तथा एक करोड़ रथियों की सेना लेकर युद्ध करने लगा। बिडाल नामक दैत्य पाँच अरब रथियों से घिरकर लोहा लेने लगा। इनके अतिरिक्त और भी हजारों महादैत्य रथ, हाथी और घोड़ों की सेना साथ लेकर वहाँ देवी के साथ युद्ध करने लगे। स्वयं महिषासुर उस रणभूमि में कोटि-कोटि सहस्त्र रथ, हाथी और घोड़ों की सेनासे घिरा हुआ खड़ा था। वे दैत्य देवी के साथ तोमर, भिन्दिपाल, शक्ति, मूसल, खड्ग, परशु और पट्टिश आदि अस्त्र -शस्त्रों का प्रहार करते हुए युद्ध कर रहे थे। कुछ दैत्यों ने उनपर शक्ति का प्रहार किया, कुछ लोगों ने पाश फेंके ॥ ४३-४८॥ देवीं खड्गप्रहारैस्तु ते तां हन्तुं प्रचक्रमुः। सापि देवी ततस्तानि शस्त्राण्यस्त्राणि चण्डिका ॥ ४९॥ लीलयैव प्रचिच्छेद निजशस्त्रास्त्रवर्षिणी। अनायस्तानना देवी स्तूयमाना सुरषिभिः॥ ५०॥ मुमोचासुरदेहेषु शस्त्राण्यस्त्राणि चेश्वरी। सोऽपि क्रुद्धो धुतसटो देव्या वाहनकेसरी ॥ ५१॥ चरचारासुरसैन्येषु वनेष्विव हुताशन:। नि:श्वासान् मुमुचे यांश्च युध्यमाना रणेऽम्बिका॥ ५२ ॥ त एवं सद्यः सम्भूता गणाः शतसहस्त्रशः। युयुधुस्ते परशुभिर्भिन्दिपालासिपट्टिशैः ॥ ५३ ॥ तथा कुछ दूसरे दैत्यों ने खड्ग प्रहार करके देवी को मार डालने का उद्योग किया। देवी ने भी क्रोध में भरकर खेल-खेल में ही अपने अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करके दैत्यों के वे समस्त अस्त्र-शस्त्र काट डाले। उनके मुख पर परिश्रम या थकावट का रंचमात्र भी चिह्न नहीं था, देवता और ऋषि उनकी स्तुति करते थे और वे भगवती परमेश्वरी दैत्यों के शरीरों पर अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करती रहीं । देवी का वाहन सिंह भी क्रोध में भरकर गर्दन के बालों को हिलाता हुआ असुरों की सेना में इस प्रकार विचरने लगा, मानो वनों में दावानल फैल रहा हो। रणभूमि में दैत्यों के साथ युद्ध करती हुई अम्बिकादेवी ने जितने नि:श्वास छोड़े, वे सभी तत्काल सैकड़ो हजारों गणों के रूप में प्रकट हो गये और परशु, भिन्दिपाल, खड्ग तथा पट्टिश आदि अस्त्रोंद्वारा असुरों का सामना करने लगे ॥ ४९-५३॥ नाशयन्तोऽसुरगणान् देवीशक्त्युपबृंहिताः। अवादयन्त पटहान् गणाः शङ्खांस्तथापरे॥ ५४॥ देवी की शक्ति से बढ़े हुए वे गण असुरों का नाश करते हुए नगाड़ा और शंख आदि बाजे बजाने लगे ॥ ५४॥ मृदङ्गांश्च तथैवान्ये तस्मिन् युद्धमहोत्सवे | ततो देवी त्रिशूलेन गदया शक्तिवृष्टिभिः * ॥ ५५॥ खड्गादिभिश्च शतशो निजघान महासुरान्। पातयामास चैवान्यान् घण्टास्वनविमोहितान्॥ ५६॥ उस संग्राम-महोत्सव में कितने ही गण मृदंग बजा रहे थे । तदनन्तर देवी ने त्रिशूल से, गदा से, शक्ति की वर्षा से और खड्ग आदि से सैकड़ों महादैत्यों का संहार कर डाला। कितनों को घण्टे के भयंकर नाद से मूर्च्छित करके मार गिराया ॥ ५५ ५६॥ असुरान् भुवि पा्शन बद्ध्वा चान्यानकर्षयत् । केचिद् द्विधा कृतास्तीक्ष्णैः खङ्गपातैस्तथापरे॥ ५७॥ बहुतेरे दैत्यों को पाश से बाँधकर धरती पर घसीटा। कितने ही दैत्य उनकी तीखी तलवार की मार से दो-दो टुकड़े हो गये॥ ५७ ॥ विपोथिता निपातेन गदया भुवि शेरते। वेमुश्च केचिद्रुधिरं मुसलेन भृशं हताः ॥ ५८॥ केचिन्निपतिता भूमौ भिन्नाः शूलेन वक्षसि । निरन्तराः शरौघेण कृताः केचिद्रणाजिरे॥ ५९॥ कितने ही गदा की चोट से घायल हो धरती पर सो गये। कितने ही मूसल की मार से अत्यन्त आहत होकर रक्त वमन करने लगे। कुछ दैत्य शूल से छाती फट जाने के कारण पृथ्वी पर ढेर हो गये। उस रणांगण में बाण समूहों की वृष्टि से कितने ही असुरों की कमर टूट गयी॥ ५८-५९ ॥ श्येनानुकारिणः प्राणान् मुमुचुस्त्रिदशार्दनाः। केषांचिद् बाहवश्छिन्नाश्छिन्नग्रीवास्तथापरे ॥ ६० ॥ शिरांसि पेतुरन्येषामन्ये मध्ये विदारिताः । विच्छिन्नजङ्कास्त्वपरे पेतुरुव्व्यां महासुराः॥ ६१॥ एकबाह्वृक्षिचरणाः केचिद्देव्या द्विधा कृताः। छिनेऽपि चान्ये शिरसि पतिता: पुनरुत्थिताः ।॥६२॥ कबन्धा युयुधुर्देव्या गृहीतपरमायुधाः हल ननृतुश्चापरे तत्र युद्धे तूर्यलयाश्रिताः॥ ६३॥ बाज की तरह झपटने वाले देवपीडक दैत्यगण अपने प्राणों से हाथ धोने लगे। किन्हीं की बाँहें छिन्न-भिन्न हो गयीं कितनों की गर्दनें कट गयीं। कितने ही दैत्यों के मस्तक कट-कटकर गिरने लगे। कुछ लोगों के शरीर मध्यभाग में ही विदीर्ण हो गये। कितने ही महादैत्य जाँघें कट जाने से पृथ्वी पर गिर पड़े । कितनों को ही देवी ने एक बाँह, एक पैर और एक नेत्रवाले करके दो टूुकड़ों में चीर डाला। कितने ही दैत्य मस्तक कट जाने पर भी गिरकर फिर उठ जाते और केवल धड़के ही रूप में अच्छे अच्छे हथियार हाथ में ले देवी के साथ युद्ध करने लगते थे। दूसरे कबन्ध युद्धके बाजों की लय पर नाचते थे॥ ६०-६३॥ कबन्धाश्छिन्नशिरसः खड्गशक्त्यृष्टिपाणयः। तिष्ठ तिष्ठेति भाषन्तो देवीमन्ये महासुरा:* ॥ ६४॥ पातितै रथनागाश्वैरसुरैश्च वसुन्धरा। अगम्या साभवत्तत्र यत्राभूत्स महारणः ॥ ६५॥ कितने ही बिना सिर के धड़ हाथों में खड्ग, शक्ति और ऋष्टि लिये दौड़ते थे तथा दूसरे दूसरे महादैत्य 'ठहरो! ठहरो!!' यह कहते हुए देवी को युद्ध के लिये ललकारते थे। जहाँ वह घोर संग्राम हुआ था, वहाँ की धरती देवी के गिराये हुए रथ, हाथी, घोड़े और असुरों की लाशों से ऐसी पट गयी थी कि वहाँ चलना-फिरना असम्भव हो गया था॥ ६४-६५॥ शोणितौघा महानद्यः सद्यस्तत्र प्रसुस्रुवुः। मध्ये चासुरसैन्यस्य वारणासुरवाजिनाम् ॥ ६६॥ दैत्यों की सेना में हाथी, घोड़े और असुरों के शरीरों से इतनी अधिक मात्रा में रक्तपात हुआ था कि थोड़ी ही देर में वहाँ खून की बड़ी-बड़ी नदियाँ बहने लगीं ॥ ६६ ॥ क्षणेन तन्महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका। निन्ये क्षयं यथा वह्निस्तृणदारुमहाचयम् ।॥ ६७॥ जगदम्बा ने असुरों की विशाल सेना को क्षणभर में नष्ट कर दिया-ठीक उसी तरह, जैसे तृण और काठ के भारी ढेर को आग कुछ ही क्षणों में भस्म कर देती है॥ ६७ ॥ स च सिंहो महानादमुत्सृजन्धुतकेसरः । शरीरेभ्योऽमरारीणामसूनिव विचिन्वति ॥ ६८॥ और वह सिंह भी गर्दन के बालों को हिला-हिलाकर जोर-जोर से गर्जना करता हुआ दैत्यों के शरीरों से मानो उनके प्राण चुने लेता था ॥ ६८ ॥ देव्या गणैश्च तैस्तत्र कृतं युद्धं महासुरैः। यथैषाँ तुतुषुर्देवाः पुष्पवृष्टिमुचो दिवि ॥ ॐ ॥ ६९॥ वहाँ देवी के गणों ने भी उन महादैत्यों के साथ ऐसा युद्ध किया, जिससे आकाश में खड़े हुए देवतागण उन पर बहुत संतुष्ट हुए और फूल बरसाने लगे॥ ६९॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णि के मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये महिषासुरसैन्यवधो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २॥ इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अन्तर्गत देवीमाहात्म्य में 'महिषासुर की सेना का वध नामक दूसरा अध्याय पूरा हुआ॥ २ ॥ क्रमशः.... अगले लेख में तृतीय अध्याय जय माता जी की। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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parteek kaushik Oct 8, 2021

. 👉*आज़ 08.10.2021 दूसरा नवरात्र*🙏 🚩*नवरात्रि का दूसरा दिन माता का दूसरा स्वरूप*🚩 🚩🙏🌸"माँ ब्रह्मचारिणी"🌸🙏🚩 *नवरात्र के दूसरे दिन देवी ब्रह्मचारिणी रूप की पूजा होती है। इस रूप में देवी को समस्त विद्याओं का ज्ञाता माना गया है। देवी ब्रह्मचारिणी भवानी माँ जगदम्बा का दूसरा स्वरुप है। ब्रह्मचारिणी ब्रह्माण्ड की रचना करने वाली। ब्रह्माण्ड को जन्म देने के कारण ही देवी के दूसरे स्वरुप का नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा। देवी के ब्रह्मचारिणी रूप में ब्रह्मा जी की शक्ति समाई हुई है। माना जाता है कि सृष्टी कि उत्पत्ति के समय ब्रह्मा जी ने मनुष्यों को जन्म दिया। समय बीतता रहा , लेकिन सृष्टी का विस्तार नहीं हो सका। ब्रह्मा जी भी अचम्भे में पड़ गए। देवताओं के सभी प्रयास व्यर्थ होने लगे। सारे देवता निराश हो उठें तब ब्रह्मा जी ने भगवान शंकर से पूछा कि ऐसा क्यों हो रहा है। भोले शंकर बोले कि बिना देवी शक्ति के सृष्टी का विस्तार संभव नहीं है। सृष्टी का विस्तार हो सके इसके लिए माँ जगदम्बा का आशीर्वाद लेना होगा, उन्हें प्रसन्न करना होगा। देवता माँ भवानी के शरण में गए। तब देवी ने सृष्टी का विस्तार किया। उसके बाद से ही नारी शक्ति को माँ का स्थान मिला और गर्भ धारण करके शिशु जन्म कि नीव पड़ी। हर बच्चे में १६ गुण होते हैं और माता पिता के ४२ गुण होते हैं। जिसमें से ३६ गुण माता के माने जातें हैं। *देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप पूर्ण ज्योर्तिमय है। माँ दुर्गा की नौ शक्तियों में से द्वितीय शक्ति देवी ब्रह्मचारिणी का है। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली अर्थात तप का आचरण करने वाली माँ ब्रह्मचारिणी। यह देवी शांत और निमग्न होकर तप में लीन हैं। मुख पर कठोर तपस्या के कारण अद्भुत तेज और कांति का ऐसा अनूठा संगम है जो तीनों लोको को उजागर कर रहा है। देवी ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में अक्ष माला है और बायें हाथ में कमण्डल होता है। देवी ब्रह्मचारिणी साक्षात ब्रह्म का स्वरूप हैं अर्थात तपस्या का मूर्तिमान रूप हैं। इस देवी के कई अन्य नाम हैं जैसे तपश्चारिणी, अपर्णा और उमा इस दिन साधक का मन ‘स्वाधिष्ठान ’चक्र में स्थित होता है। इस चक्र में अवस्थित साधक माँ ब्रह्मचारिणी जी की कृपा और भक्ति को प्राप्त करता है। #ब्रह्मचारिणी : ब्रह्मचारिणी अर्थात् जब उन्होंने तपश्चर्या द्वारा शिव को पाया था। एक हाथ में रुद्राक्ष की माला और दुसरे हाथ में कमंडल धारण करने वाली देवी का यह ब्रह्मचारिणी स्वरुप कल्याण और मोक्ष प्रदान करने वाला है। देवी के ब्रह्मचारिणी स्वरुप की आराधना का विशेष महत्व है। माँ के इस रूप की उपासना से घर में सुख सम्पति और समृद्धि का आगमन होता है। *देवी ब्रह्मचारिणी कथा* *माता ब्रह्मचारिणी हिमालय और मैना की पुत्री हैं। इन्होंने देवर्षि नारद जी के कहने पर भगवान शंकर की ऐसी कठोर तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने इन्हें मनोवांछित वरदान दिया। जिसके फलस्वरूप यह देवी भगवान भोले नाथ की वामिनी अर्थात पत्नी बनी। जो व्यक्ति अध्यात्म और आत्मिक आनंद की कामना रखते हैं उन्हें इस देवी की पूजा से सहज यह सब प्राप्त होता है। देवी का दूसरा स्वरूप योग साधक को साधना के केन्द्र के उस सूक्ष्मतम अंश से साक्षात्कार करा देता है जिसके पश्चात व्यक्ति की ऐन्द्रियां अपने नियंत्रण में रहती और साधक मोक्ष का भागी बनता है। इस देवी की प्रतिमा की पंचोपचार सहित पूजा करके जो साधक स्वाधिष्ठान चक्र में मन को स्थापित करता है उसकी साधना सफल हो जाती है और व्यक्ति की कुण्डलनी शक्ति जागृत हो जाती है। जो व्यक्ति भक्ति भाव एवं श्रद्धादुर्गा पूजा के दूसरे दिन मॉ ब्रह्मचारिणी की पूजा करते हैं उन्हें सुख, आरोग्य की प्राप्ति होती है और प्रसन्न रहता है, उसे किसी प्रकार का भय नहीं सताता है। *पूजा विधि* *नवरात्र के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना का विधान है। देवी दुर्गा का यह दूसरा रूप भक्तों एवं सिद्धों को अमोघ फल देने वाला है। देवी ब्रह्मचारिणी की उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। माँ ब्रह्मचारिणी की कृपा से मनुष्य को सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है। तथा जीवन की अनेक समस्याओं एवं परेशानियों का नाश होता है। *देवी ब्रह्मचारिणी जी की पूजा का विधान इस प्रकार है, सर्वप्रथम आपने जिन देवी-देवताओ एवं गणों व योगिनियों को कलश में आमत्रित किया है, उनकी फूल, अक्षत, रोली, चंदन, से पूजा करें उन्हें दूध, दही, शर्करा, घृत, व मधु से स्नान करायें व देवी को जो कुछ भी प्रसाद अर्पित कर रहे हैं उसमें से एक अंश इन्हें भी अर्पण करें. प्रसाद के पश्चात आचमन और फिर पान, सुपारी भेंट कर इनकी प्रदक्षिणा करें। कलश देवता की पूजा के पश्चात इसी प्रकार नवग्रह, दशदिक्पाल, नगर देवता, ग्राम देवता, की पूजा करें। इनकी पूजा के पश्चात माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा करें। देवी की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में एक फूल लेकर प्रार्थना करें- “दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू. *देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा”। *इसके पश्चात् देवी को पंचामृत स्नान करायें और फिर भाँति-भाँति से फूल, अक्षत, कुमकुम, सिन्दुर, अर्पित करें देवी को अरूहूल का फूल (लाल रंग का एक विशेष फूल) व कमल काफी पसन्द है। उनकी माला पहनायें. प्रसाद और आचमन के पश्चात् पान सुपारी भेंट कर प्रदक्षिणा करें और घी व कपूर मिलाकर देवी की आरती करें। अंत में क्षमा प्रार्थना करें “आवाहनं न जानामि न जानामि वसर्जनं, *पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरी"। *ब्रह्मचारिणी मंत्र* *या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। *नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥ *दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू। *देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥ ----------:::×:::---------- "जय माता दी" 🌸🚩🙏🚩🌸 *************************************************

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parteek kaushik Oct 7, 2021

*नवदुर्गा (नवरात्रि) में माँ दुर्गा के प्रथम स्वरूप श्री शैलपुत्री जी की उपासना विधि..... 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 *वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्द्वकृत शेखराम। *वृषारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम॥ *श्री दुर्गा का प्रथम रूप श्री शैलपुत्री हैं। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण ये शैलपुत्री कहलाती हैं। नवरात्र के प्रथम दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। गिरिराज हिमालय की पुत्री होने के कारण भगवती का प्रथम स्वरूप शैलपुत्री का है, जिनकी आराधना से प्राणी सभी मनोवांछित फल प्राप्त कर लेता है। माँ शैलपुत्री दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल का पुष्प लिए अपने वाहन वृषभ पर विराजमान होतीं हैं. नवरात्र के इस प्रथम दिन की उपासना में साधक अपने मन को ‘मूलाधार’ चक्र में स्थित करते हैं, शैलपुत्री का पूजन करने से ‘मूलाधार चक्र’ जागृत होता है और यहीं से योग साधना आरंभ होती है जिससे अनेक प्रकार की शक्तियां प्राप्त होती हैं। मां दुर्गा शक्ति की उपासना का पर्व शारदीय नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक सनातन काल से मनाया जाता रहा है. आदि-शक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में पूजा की जाती है. अत: इसे नवरात्र के नाम भी जाना जाता है. सभीदेवता, राक्षस, मनुष्य इनकी कृपा-दृष्टि के लिए लालायित रहते हैं. यह हिन्दू समाज का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है जिसका धार्मिक, आध्यात्मिक, नैतिकव सांसारिक इन चारों ही दृष्टिकोण से काफी महत्व है.दुर्गा पूजा का त्यौहार वर्ष में दो बार आता है, एक चैत्र मास में और दूसरा आश्विन मास में चैत्र माह में देवी दुर्गा की पूजा बड़े ही धूम धाम से की जाती है लेकिन आश्विन मास का विशेष महत्व है. दुर्गा सप्तशती में भी आश्विन माह के शारदीयनवरात्रों की महिमा का विशेष बखान किया गया है. दोनों मासों में दुर्गा पूजा का विधान एक जैसा ही है, दोनों ही प्रतिपदा से दशमी तिथि तक मनायी जाती है। माता शैलपुत्री की कथा 〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️ एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। इसमें उन्होंने सारे देवताओं को अपना-अपना यज्ञ-भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया, किन्तु शंकरजी को उन्होंने इस यज्ञ में निमंत्रित नहीं किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहाँ जाने के लिए उनका मन विकल हो उठा। अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकरजी को बताई। सारी बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा- प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं। अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है। उनके यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, किन्तु हमें जान-बूझकर नहीं बुलाया है। कोई सूचना तक नहीं भेजी है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहाँ जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा।' शंकरजी के इस उपदेश से सती का प्रबोध नहीं हुआ। पिता का यज्ञ देखने, वहाँ जाकर माता और बहनों से मिलने की उनकी व्यग्रता किसी प्रकार भी कम न हो सकी। उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकरजी ने उन्हें वहाँ जाने की अनुमति दे दी। सती ने पिता के घर पहुँचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा है। सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं। केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव भरे हुए थे। परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को बहुत क्लेश पहुँचा। उन्होंने यह भी देखा कि वहाँ चतुर्दिक भगवान शंकरजी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है। दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे। यह सब देखकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा। उन्होंने सोचा भगवान शंकरजी की बात न मान, यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है। वे अपने पति भगवान शंकर के इस अपमान को सह न सकीं। उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया। वज्रपात के समान इस दारुण-दुःखद घटना को सुनकर शंकरजी ने क्रुद्ध होअपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया। सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वे 'शैलपुत्री' नाम से विख्यात हुर्ईं। पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के नाम हैं। उपनिषद् की एक कथा के अनुसार इन्हीं ने हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व-भंजन किया था। कलश स्थापना: विधि 〰〰🌼〰〰🌼〰〰 नवरात्रा का प्रारम्भ आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को कलश स्थापना के साथ होता है. कलश को हिन्दु विधानों में मंगलमूर्ति गणेश कास्वरूप माना जाता है अत: सबसे पहले कलश की स्थान की जाती है. कलश स्थापना के लिए भूमि को सिक्त यानी शुद्ध किया जाता है. भूमि की शुद्धि के लिए गाय के गोबर और गंगा-जल से भूमि को लिपा जाता है। शैलपुत्री पूजा विधि: 〰〰🌼🌼〰〰 शारदीय नवरात्र पर कलश स्थापना के साथ ही माँ दुर्गा की पूजा शुरू की जाती है. पहले दिन माँ दुर्गा के पहले स्वरूप शैलपुत्री की पूजा होती है. दुर्गा को मातृ शक्ति यानी स्नेह, करूणा और ममता का स्वरूप मानकर हम पूजते हैं। अत: इनकी पूजा में सभी तीर्थों, नदियों, समुद्रों, नवग्रहों,दिक्पालों, दिशाओं, नगर देवता, ग्राम देवता सहित सभी योगिनियों को भी आमंत्रित किया जाता और और कलश में उन्हें विराजने हेतु प्रार्थना सहित उनका आहवान किया जाता है। कलश में सप्तमृतिका यानी सात प्रकार की मिट्टी, सुपारी, मुद्रा सादर भेट किया जाता है और पंच प्रकार के पल्लव से कलश को सुशोभित किया जाता है.इस कलश के नीचे सात प्रकार के अनाज और जौ बोये जाते हैं जिन्हें दशमी तिथि को काटा जाता है और इससे सभी देवी-देवता की पूजा होती है. इसे जयन्ती कहते हैं जिसे इस मंत्र के साथ अर्पित किया जाता है “जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा, स्वधा नामोस्तुते”. इसी मंत्र से पुरोहित यजमान के परिवार के सभी सदस्यों के सिर पर जयंती डालकर सुख, सम्पत्ति एवं आरोग्य का आर्शीवाद देते हैं।कलश स्थापना के पश्चात देवी का आह्वान किया जाता है कि ‘हे मां दुर्गा हमने आपका स्वरूप जैसा सुना है उसी रूप में आपकी प्रतिमा बनवायी है आप उसमें प्रवेश कर हमारी पूजा अर्चना को स्वीकार करें’. देवी दुर्गा की प्रतिमा पूजा स्थल पर बीच में स्थापित की जाती है और उनके दोनों तरफ यानी दायीं ओर देवी महालक्ष्मी, गणेश और विजया नामक योगिनी की प्रतिमा रहती है और बायीं ओर कार्तिकेय, देवी महासरस्वती और जया नामक योगिनी रहती है तथा भगवान भोले नाथ की भी पूजा की जाती है. प्रथम पूजन के दिन “शैलपुत्री” के रूप में भगवती दुर्गा दुर्गतिनाशिनी की पूजा फूल, अक्षत, रोली, चंदन से होती हैं। शैलपुत्री की ध्यान 〰🌼🌼🌼🌼〰 वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रर्धकृत शेखराम्। वृशारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्वनीम्॥ पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥ पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥ प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुग कुचाम्। कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥ शैलपुत्री की स्तोत्र पाठ: प्रथम दुर्गा त्वंहिभवसागर: तारणीम्। धन ऐश्वर्यदायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥ त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्। सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥ चराचरेश्वरी त्वंहिमहामोह: विनाशिन। मुक्तिभुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥ शैलपुत्री की कवच : ओमकार: मेंशिर: पातुमूलाधार निवासिनी। हींकार: पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी॥ श्रींकारपातुवदने लावाण्या महेश्वरी । हुंकार पातु हदयं तारिणी शक्ति स्वघृत। फट्कार पात सर्वागे सर्व सिद्धि फलप्रदा॥ भूमि-भवन वाहन की प्राप्ति हेतु नवरात्रि के प्रथम दिवस के उपाय 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ संपूर्ण प्रयासों के बावजूद भी भूमि-भवन वाहन की प्राप्ति नहीं हो रही है तो नवरात्र के पहले दिन यानी मां शैलपुत्री के दिन रात्रि में 8 बजे के बाद चौकी पर लाल कपड़ा बिछा कर उस पर दुर्गा जी का यंत्र स्थापित करें। तत्पश्चात 1 लौंग, 1गोमती चक्र, एक साबुत सुपारी, एक लाल चंदन का टुकड़ा, 1 रक्त गुंजा, इन समस्त सामग्री को एक पानी से भरे लोटे में रखें। घी का दीपक जला लें। 3 माला ॥ ॐ ह्लीं फट्ï॥ की करें और एक माला ऐं ह्लीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे शैलपुत्री देव्यै नम: की जाप करें। प्रत्येक माला के बाद लोटे पर एक फूंक मारे। फिर उस लोटे के जल को पीपल वृक्ष की जड़ में चढ़ा दें, उन लौंग एवं सुपारी को भी वहीं मिट्टïी में दबा दें। लाल चंदन का टुकड़ा और रक्त गुंजा का अपने ऊपर से उसार करके बहते पानी में बहा दें। अनावश्यक कोर्ट-कचेहरी के मामलों से छुटकारा मिल जाएगा। यदि अनावश्यक रूप से कोर्ट-कचहरी के मामलें परेशान कर रहे हो तो हर रोज 40 दिन तक 108 मोगरे के पुष्प ॐ ह्लीं श्रीं क्रीं शैलपुत्रिये नम:ï। मंत्र का जाप करते हुए अर्पित करें। प्रारंभ प्रथम नवरात्र को यह उपाय शुभ मुहूर्त में प्रारंभ करें। आरती माता शैलपुत्री जी की 〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️ शैलपुत्री मां बैल असवार। करें देवता जय जयकार। शिव शंकर की प्रिय भवानी। तेरी महिमा किसी ने ना जानी। पार्वती तू उमा कहलावे। जो तुझे सिमरे सो सुख पावे। ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू। दया करे धनवान करे तू। सोमवार को शिव संग प्यारी। आरती तेरी जिसने उतारी। उसकी सगरी आस पुजा दो। सगरे दुख तकलीफ मिला दो। घी का सुंदर दीप जला के। गोला गरी का भोग लगा के। श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं। प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं। जय गिरिराज किशोरी अंबे। शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे। मनोकामना पूर्ण कर दो। भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो। माँ दुर्गा की आरती 〰🌼🌼🌼🌼〰 जय अंबे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी । तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी ॥ ॐ जय… मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को । उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको ॥ ॐ जय… कनक समान कलेवर, रक्तांबर राजै । रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै ॥ ॐ जय… केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी । सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी ॥ ॐ जय… कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती । कोटिक चंद्र दिवाकर, राजत सम ज्योती ॥ ॐ जय… शुंभ-निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती । धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती ॥ॐ जय… चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे । मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भय दूर करे ॥ॐ जय… ब्रह्माणी, रूद्राणी, तुम कमला रानी । आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी ॥ॐ जय… चौंसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैंरू । बाजत ताल मृदंगा, अरू बाजत डमरू ॥ॐ जय… तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता । भक्तन की दुख हरता, सुख संपति करता ॥ॐ जय… भुजा चार अति शोभित, वरमुद्रा धारी । मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी ॥ॐ जय… कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती । श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती ॥ॐ जय… श्री अंबेजी की आरति, जो कोइ नर गावे । कहत शिवानंद स्वामी, सुख-संपति पावे ॥ॐ जय पूजन के बाद श्री दुर्गा सप्तशती पाठ एवं निर्वाण मन्त्र "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे" का यथा सामर्थ जप अवश्य करें। 〰〰🌼🌼〰〰🌼🌼〰〰🌼🌼〰〰🌼🌼〰〰

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parteek kaushik Oct 6, 2021

"श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे।हेनाथ नारायण वासुदेवाय।। 🙇*ॐ ‌श्री गणेशाय नमः*🙇*जय श्री राधेकृष्णा*🙇 🙏*जय माता की*🌺🙏🌺*शुभ प्रभात् नमन*🙏 *अमावस्या सर्वपितृ श्राद्ध विशेष..... *( 6 अक्टूबर 2021 दिन : बुधवार )..... ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ *पितृपक्ष के सोलह दिनों में अमावस्या को सर्वपितृ श्राद्ध करने से सात पीढियों के सभी पितरों की पूजा हो जाती है और गोत्र देवताओं सहित सर्व पितृलोक से आशीर्वाद बरसाता है। आश्विन माह की कृष्ण अमावस्या को सर्वपितृ मोक्ष श्राद्ध अमावस्या कहते हैं। यह दिन पितृपक्ष का आखिरी दिन होता है। इस दिन सभी जाने और अनजाने पितरों हेतु निश्चित ही श्राद्ध किया जाना चाहिए। *ब्रह्मांड बाराह राशीयों से बंधा हुआ है। मेष राशि ब्रह्मांड का प्रवेश द्वार है। मीन राशि का द्वार देवलोक (सूर्यलोक) की ओर है। कन्या राशि का द्वार पितृलोक (चंद्रलोक) की ओर है। जब किसी की मृत्यु होती है, तब जीव कर्मानुसार इनमें से एक द्वार की ओर गति करता है। सद कर्म, सदाचार और परोपकारी जीव अपने पुण्यबल से सूर्यलोक जाता है। बाकी जीव पितृयान (चन्द्र लोक) में गति करते हैं। चंद्र सूक्ष्म सृष्टि का नियमन करते हैं। *सूर्य जब कन्या राशि में प्रवेश करते है तब पाताल ओर पितृलोक की सृष्टि का जागरण हो जाता है । चंद्र की 16 कला है । पूर्णिमा से अमावस्या तक कि 16 तिथि सोलह कला है । जिस दिन मनुष्य की मृत्यु होती है उस दिन जो तिथि हो वो कला खुली होती है इसलिए वो जीव को उस कला मे स्थान मिलता है । भाद्रपद की पूर्णिमा से पितृलोक जागृत हो जाता है और जिस दिन जो कला खुली होती है उस दिन उस कला में रहे जीव पृथ्वी लोक में अपने स्नेही स्वजन, पुत्र, पौत्रादिक के घर आते है । उस दिन परिवार द्वारा उनके लिए श्रद्धापूर्वक जो भी पूजा, नैवेद्य, दान, पुण्य हो रहा हो वो देखकर तृप्त होते है और आशीर्वाद देते हैं । कुल के आराध्य देवी देवता मृतक जीवों को तृप्त देखकर प्रसन्न होते है और परिवार को सुख संपदा प्रदान करते हैं । ऐसे ही जिस घर में श्राद्ध पूजा कुछ नहीं होता ये देखकर पितृ व्यथित होकर चले जाते है और कुल के आराध्य देवी-देवता उन जीवात्माओं के व्यथित होने से खिन्न होते हैं । जीवात्मा की गति का ये सूक्ष्म विज्ञान को समझकर हमारे ऋषि मुनियों ने मनुष्य की सुखकारी के लिए ये धर्म परम्परा स्थापित की है । *अमावस्या के दिन चंद्र की सभी 16 कला खुली रहती है इसलिए उस दिन भूले बिसरे सभी पितर पृथ्वीलोक पर आते है । इसलिए उस दिन के श्राद्ध कार्य अति महत्वपूर्ण है । चंद्र देव का दूध पर आधिपत्य है इसलिए श्राद्ध में दुधपाक या क्षीर (खीर) भोजन बनाकर पितृयों को नैवेद्य भोग लगाया जाता है । श्राद्ध पूजा में ये सब किया जा सकता है। *पितरों की स्तुति के लिए रचे गए इन 5 पाठों को पढ़ेंगे तो आपके पितृ प्रसन्न होंगे। 1. पितृ-सूक्तम् : - पितृ-सूक्तम् अत्यंत चमत्कारी मंत्र-पाठ है। श्राद्ध पक्ष में पितृ-सूक्त का पाठ संध्या के समय तेल का दीपक जलाकर करने से पितृदोष की शांति होती है, शुभ फल की प्राप्ति होती है और सर्वबाधा दूर होकर उन्नति की प्राप्ति होती है। इसे ही पितृ शांति पाठ भी कहते हैं। 2. रुचि कृत पितृ स्तोत्र : - संपूर्व श्राद्ध पक्ष या सर्वपितृ अमावस्या को रूचि कृत पित्र स्तोत्र का पाठ भी किया जाता है। इसे ही पितृ स्तोत्र का पाठ भी कहते हैं। अथ पितृस्तोत्र। 3. पितृ गायत्री पाठ : - इस पाठ को पढ़ने से भी पितरों को मुक्ति मिलती है और वे हमें आशीर्वाद देते हैं। इस दौरान पितृ गायत्री मंत्र और ब्रह्म गायत्री मंत्र का भी जप करना चाहिए। 4. पितृ कवच का पवित्र पाठ : - पितृ कवच पढ़ने से पितरों के आशीर्वाद के साथ ही उनकी सुरक्षा भी मिलती है। अपने पितरों को प्रसन्न करके उनका आशी‍ष पाना है तो श्राद्ध पक्ष के दिनों में अवश्य पढ़ें सर्व पितृ दोष निवारण 'पितृ कवच' का यह पावन पाठ। 5. पितृ देव चालीसा और आरती : - हे पितरेश्वर आपको दे दियो आशीर्वाद। यह पितृ चालीसा पढ़ने से भी पितृ प्रसन्न होते हैं। श्राद्ध के अन्य तथ्य ~~~~~~~~~~~ ब्राह्मण के पास पिंडदान तर्पण पूजा। दुधपाक क्षीर का नैवेद्य बनाकर घरमे पितृदेव को भोग लगाना। पितरों के नाम ब्राह्मण, भिक्षु, बटुक, धेवता, कन्या को भोजन करवाना चाहिए। कौवे ओर पक्षियो को भोजन देना। गाय, कुते ओर पशुओं को भोजन देना। जलचर जीव ओर किट पतंगे जैसे जीवों को भोजन। पितरों के नाम दान दक्षिणा जैसे पुण्यकार्य। शिवमन्दिर मे पूजा कर पितरों की दिव्यगति के लिए प्रार्थना करना। इनमे से जो भी शक्य हो वो करना चाहिए। पितृ पूर्वजों के आशीर्वाद से परिवार सुख सम्पति धन धान्य सुआरोग्य संतति और सन्मान प्राप्त करता है। कुलगोत्र के देवी देवता सह अनेकों आराध्य देवी-देवता, पितृ पूर्वजों की प्रसन्नता देखकर ही कृपा करते है। मनुष्य जीवन को सफल और सुखी बनाने और स्वआत्मा की दिव्य गति प्राप्त करने के लिए हिन्दू धर्म शास्त्रों की ये सर्वश्रेष्ठ भाव पूजा है। जीव की सूक्ष्म गति को समझने वाले अनेक साधक प्रतिमास अमावस्या को ये भावपूजा अवश्य ही करते है। जगत के पालनहार नारायण इस पूजा से अति प्रसन्न होते है। पितृ अमावस्या को श्राद्ध करने की पूर्ण विधि ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ सर्वपितृ अमावस्या को प्रात: स्नानादि के पश्चात गायत्री मंत्र का जाप करते हुए सूर्यदेव को जल अर्पित करना चाहिये। इसके पश्चात घर में श्राद्ध के लिये बनाये गये भोजन से पंचबलि अर्थात गाय, कुत्ते, कौए, देव एवं चीटिंयों के लिये भोजन का अंश निकालकर उन्हें देना चाहिये। इसके पश्चात श्रद्धापूर्वक पितरों से मंगल की कामना करनी चाहिये। ब्राह्मण या किसी गरीब जरूरतमंद को भोजन करवाना चाहिये व सामर्थ्य अनुसार दान दक्षिणा भी देनी चाहिये। संध्या के समय अपनी क्षमता अनुसार दो, पांच अथवा सोलह दीप भी प्रज्जवलित करने चाहियें। इस दिन विशेष लाभ हेतु कुछ महत्त्वपूर्ण उपाय किए जा सकते हैं .... पितरों के निमित्त विधिवत श्राद्ध, तर्पण, विदाई एवं ब्राह्मण भोजन। काक, गौ, कुत्ता, पिपीलिका व अतिथि को भोजन। पीपल के वृक्ष पर काली तिलसहित जल अर्पण एवं तेल का दीपक लगाएं। पंडित को वस्त्र दान करें। गीता के 7वें व 11वें अध्याय का पाठ करें। सुंदरकांड एवं हनुमान चालीसा का पाठ करें। *परम कृपालु परमात्मा श्री हरि नारायण आप सभी का ओर आप सभी के पितरों - पूर्वजों का कल्याण करे, यही प्रार्थना करती हूँ। 🙇*ॐ नमो भगवते वसुदेवाय*🙇 🌺🙏*जय-जय श्री राधे कृष्णा*🙏🌺 ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~`~~~~~

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parteek kaushik Oct 5, 2021

*हाथों ने पैरों से पूछा..सब तुझ पर ही मस्तक रखते हैं, मुझ पर नहीं...पैर ने कहा.. उसके लिए ज़मीन पर रहना पड़ता है हवा में नहीं...!!!🌺🙏*जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌺 🌺🙏*शुभ रात्रि नमन*🙏🌺 🌴 मनुष्य! सबसे श्रेष्ठ रचना है परमात्मा की!! *पुरानी कथा है कि परमात्मा ने जब प्रकृति बनाई, सब बनाया और फिर आदमी को बनाया, आदमी को उसने मिट्टी से बनाया। जब आदमी बन गया तो परमात्मा ने सारे देवताओं को इकट्ठा करके कहा कि देखो, मेरी श्रेष्ठतम कृति यह मनुष्य है, इससे ऊपर मैंने कुछ भी नहीं बनाया। यह मेरी प्रकृति के सारे विस्तार में सबसे श्रेष्ठ, सबसे गरिमाशाली है। लेकिन एक संदेहवादी देवता ने कहा, यह तो ठीक है, लेकिन मिट्टी से क्यों बनाया ? निकृष्टतम चीज से बनाई श्रेष्ठतम चीज, यह कुछ समझ में नहीं आती। अरे, सोने से बनाते! कम से कम चांदी से बनाते। मिट्टी! कुछ और न मिला ? निकृष्टतम से श्रेष्ठतम को बनाया। तो परमात्मा हंसने लगा, उसने कहा, जिसे श्रेष्ठतम बनना हो, उसे निकृष्टतम से यात्रा करनी होती है। जिसे स्वर्ग जाना हो उसे नर्क में पैर जमाने पड़ते हैं। जिसे ऊपर उठना हो उसे निम्नतम को छूना पड़ता है। और फिर परमात्मा ने कहा, तुमने कभी सोन-चाँदीे में से किसी चीज को उगते देखा ? बो दो बीज सोने में, कभी उगेगा नहीं, मर जाएगा। मिट्टी भर में उगता है कुछ और मनुष्य एक संभावना है, एक आश्वासन है। अभी मनुष्य को होना है, अभी हो नहीं गया, हो सकता है। होने की सब व्यवस्था कर दी है। लेकिन होना पड़ेगा। इसलिए मिट्टी से बनाया है, क्योंकि मिट्टी में ही बीज फूटता है, अंकुर निकलते हैं, वृक्ष पैदा होते, फूल लगते, फल लगते, सुगंध फैलती, महोत्सव घटित होता है। मिट्टी में ही संभावना है, सोने की कोई संभावना नहीं। सोना तो मुर्दा है, चांदी तो मुर्दा है। इसीलिए तो मरे - मरे लोग सोने - चांदी को पूजते हैं। जिंदा लोग मिट्टी को पूजते हैं। जितना जिंदा आदमी उतना उसका मिट्टी लगाव, मिट्टी से प्रेम। मिट्टी जीवन है। ठीक कहा ईश्वर ने कि बीज मिट्टी में फेंक दो तो खिलता, फैलता, बड़ा होता है। मनुष्य एक संभावना है, मनुष्य यात्रा है, अंत नहीं। अभी मनुष्य को होना है, अभी मनुष्य हुआ नहीं। सारी क्षमता पड़ी है छिपी अचेतन में; प्रकट होना है, अभिव्यक्त होना है। गीत तुम लेकर आए हो, अभी गाया नहीं। तुम्हारी वीणा तो है तुम्हारे पास, लेकिन तुम्हारी अंगुलियों ने अभी छुआ नहीं। अष्टावक्र महागीता. 🌹 राधे कृष्णा राधे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे 🌹 *********************************************** 👉*#गोद_भराई*...✍️ *विनीता के विवाह को पूरे 11 साल हो चुके थे परंतु मां बनने का सुख उसको मिला ही नही। था।... मंदिर ,देवी मनौती,व्रत उपवास सब किया पर कुछ नहीं मिला...डॉक्टर ने भी कोई कमी नहीं बताई थी दोनों में फिर..पता नहीं किस पाप का फल मुझे ईश्वर ने दिया ...यही सोच कर मन खराब किये रहती विनीता। उसके दोनों देवरों की शादी उसके सामने हुई ... साल भर में दोनों की गोद में एक-एक बच्चा भगवान ने उनको दे दिया . ! रोज ही तकिया गीला करते उसकी रात कटती...! हालांकि पति कुछ कहते नही थे ...पर जब शाम को बाहर से आते ही देवरानियों के बच्चों को लेकर व्यस्त हो जाते ..उन्हें गोद में लेकर खिलाने लगते तब विनीता का मन बहुत ही कचोटता ...! खैर किया भी क्या जा सकता था?? ऐसा नहीं कि वो इन बच्चों से प्यार नहीं करती थी.. वो तो जान छिड़कती थी... उन पर किन्तु मन का एक कोना बहुत उदास रहता था ....उसका ....! समय पंख लगा कर उड़ रहा था ...!इस बीच मंझले देवर का ट्रांसफर दूसरे शहर हो गया ।अब घर में छोटे देवर- देवरानी और उनकी छुटकी बेटी और वो और उसकी दुनिया बन गयी....! अचानक उसे पता चलता कि छोटी के पांव फिर से भारी है।मन में एक बार फिर अपनी कमी का अहसास तो हुआ पर उसने भगवान की इच्छा के आगे हथियार डाल दिये थे...! भोजन करते करतेअचानक एक दिन उसने सुना ... देवरजी देवरानी से कह रहे थे "सीमा हम अपना दूसरा बच्चा बड़े भाभी-भैया को दे देते हैं..!कैसा रहेगा ??विनीता ने सुना तो वो धक्क से रह गयी ।क्या ऐसा होगा??मैं सचमुच में किसी बच्चे की मां की बन सकती हूँ???अपनी खुशी के रौ में वो देवरानी के चेहरे के भाव नहीं देख पाई..! दूसरे दिन से वो देवरानी की और ज्यादा देखभाल करने लगी। विनीता इतनी खुश थी मानो वो खुद ही मां बन रही हो। उसने छुप- छुप कर नए बच्चे के लिए कपड़े- मोजा टोपा सब बना लिए...! समय आया छोटी देवरानी को बच्चा तो हुआ किन्तु बच्चा मां की गोद में ही रहा... देवरानी के उदासीन व्यवहार ने उसका दिल एकदम तोड़ दिया।बची खुची उम्मीद उसने उन दोनों की बात सुनकर छोड़ दी...जब देवर अपनी पत्नी को समझा रहे थे कि "क्या हुआ अगर हम भाभी को बच्चा दे दे तो...! और देवरानी का कहना कि... भई बच्चा तो घर में ही रहेगा मेरे पास रहे या उनके ... मैं पूरा पूरा अपने बच्चे को किसी को नहीं दे सकती... बस! पटाक्षेप हो गया उसके मां बनने के सपने का भी....! कुछ दिनों बाद फिर खबर आई कि मंझली देवरानी भी मां बनने वाली है ..फोन पर खूब बधाई दी विनीता ने...! मन बहुत रोया उसका पर ईश्वर की इच्छा के आगे भला क्या हो सकता है...? एक रात खबर आई मंझली के बेटा हुआ है... दरअसल मंझली देवरानी को इस बार कुछ कॉम्प्लिकेशन होने के कारण डॉक्टर ने ट्रेवल करने मना कर दिया था...!तो वो उन लोगों ने वहीं शहर में ही डिलवरी करवाने का फैसला कर लिया था.....!रात फोन पर देवर ने कहा "भाभी आप सबको लेकर आ जाइए अगले हफ्ते फंक्शन रख रहे हैं बच्चे का...!" मन ही मन रोते- रोते उसने यात्रा पूरी की। छोटा देवर,उसके दोनों बच्चे, पति, सास सब थे साथ में ...बस वो किसी के साथ नहीं थी ..!"मेरा जीवन तो निरर्थक हो गया भगवान तुमने मेरी कभी नहीं सुनी ...! हर गुजरते मंदिर के आगे वो ऐसा बुदबुदाती...! शाम तक वो सबके साथ मंझले के घर पर पहुंच चुकी थी...!लम्बा चौड़ा आयोजन खूब लोग- बाग गहमा- गहमी ! लेकिन उससे कोई ठीक से बात तक नहीं कर रहा था ...!कुछ औरतें कानाफूसी भी कर रही थी ...पति भी आकर काम में रम गए थे ।वो ही निठल्ली सी बैठी थी...!तभी एक स्त्री ने कहा "आप विनीता जी हैं?"जी हां""चलिये आप"... कह कर वो औरत विनीता को एक कमरे में ले गयी...वहां मंझली देवरानी बच्चे के साथ लेटी थी... उलाहना देते हुए बोली "दीदी कहां हो आप ?शाम को हमारा गोद भराई का फंक्शन है और आप ऐसे मुंह उतार कर बैठी हो ...चलो पहले आप तैयार हो जाइए अच्छे से फिर बच्चे को सम्भालिए ...रुआंसी सी विनीता तैयार होने उठी तो साथ आई महिला ने कहा "आज चलिये मैं आपको तैयार कर देती हूं.....विनीता को बाद में पता चला कि वो ब्यूटिशियन थी...! हल्का मेकअप ,आंखों में काजल, बालों में ढेर सारा गजरा, लाल बनारसी साड़ी ....विनीता का सौंदर्य देखते ही बन रहा था किंतु आंखों में झुंझलाहट भी थी ...गोद में बच्चा देवरानी के आया है और मुझे इन लोग क्यों इतना सजा रहे हैं ..?? फिर हॉल में जहां कार्यक्रम होना था सब इकठ्ठे हुए ....! बच्चे को मंझली देवरानी एक बार भी उसको हाथ लगाने नहीं दी थी... !बस रोने- रोने को हुई जा रही थी विनीता.... तभी मंझले देवर ने सबको शांत करते हुए कहा... "आज का यह आयोजन मेरे बड़े भैया और भाभी के प्रथम पुत्र रत्न की प्राप्ति के उपलक्ष्य में रखा गया है... आप सब श्रीमती विनीता एवं राजेश जी को और नवजात शिशु को अपना आशीर्वाद देकर हमें अनुग्रहित करें...। और मंझली ने आकर विनीता को उलाहना देते हुए कहा...लो भी दीदी अब अपने बच्चे को गोद में कब से लिये लिए फिर रही हूं... थक गई हूँ भई मैं...!!!! और विनीता के आंखों के आँसू झर- झर बहने लगे..राजेश की बांहों का सहारा और उन दोनों के बीच नन्हा- सा राजकुमार सब मानो गड्डमगड्ड हुए जा रहे थे...!! क्या मैं सचमुच मां बन गयी??? तालियों का शोर सबके मुस्कुराते चेहरे मंझले देवर देवरानी की पुलकित मुस्कान यही तो कह रही थी... कि वो मां बन गयी...🙏🙏🙏🌹🌹 *जय-जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌺🌺

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