Neha Sharma Sep 25, 2021

*सकारात्मक "विचार" को कोई जहर नहीं मार सकता है.. *और ना ही कोई "दवा" नकारात्मक विचार को बचा सकती है! *जय श्री सीताराम जय श्री हनुमान*🙏🌺 *जय श्री शनिदेव जय श्री राधे कृष्णा*🙏🌺 🌺🙏*शुभ प्रभात् नमन*🙏🌺 *सीता माता द्वारा दिया श्राद्ध भोज... 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 *भगवान श्रीकृष्ण से पक्षीराज गरुड़ ने पूछा- हे प्रभु ! पृथ्वी पर लोग अपने मृत पितरों का श्राद्ध करते हैं. उनकी रुचि का भोजन ब्राह्मणों आदि को कराते हैं. पर क्या पितृ लोक से पृथ्वी पर आकर श्राद्ध में भोजन करते पितरों को किसी ने देखा भी है भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- हे गरुड़ ! तुम्हारी शंका का निवारण करने के लिए मैं देवी सीता के साथ हुई घटना सुनाता हूं. सीताजी ने पुष्कर तीर्थ में अपने ससुर आदि तीन पितरों को श्राद्ध में निमंत्रित ब्राह्मणों के शरीर में देखा था, वह कथा सुनो गरूड़ ! यह तो तुम्हें ज्ञात ही है कि श्री राम अपने पिता दशरथ की आज्ञा के बाद वनगमन कर गये, साथ में सीता भी थीं. बाद में श्रीराम को यह पता लग चुका था कि उनके पिता उनके वियोग में शरीर त्याग चुके हैं *जंगल-जंगल घूमते सीता जी के साथ श्रीराम ने पुष्कर तीर्थ की भी यात्रा की. अब यह श्राद्ध का अवसर था ऐसे में पिता का श्राद्ध पुष्कर में हो इससे श्रेष्ठ क्या हो सकता था. तीर्थ में पहुंचकर उन्होंने श्राद्ध के तैयारियां आरंभ कीं *श्रीराम ने स्वयं ही विभिन्न शाक, फल, एवं अन्य उचित खाद्य सामग्री एकत्र की. जानकी जी ने भोजन तैयार किया. उन्होंने एक पके हुए फल को सिद्ध करके श्रीराम जी के सामने उपस्थित किया *श्रीराम ने ऋषियों और ब्राह्मणों को सम्मान सहित आमंत्रित किया. श्राद्ध कर्म में दीक्षित श्रीराम की आज्ञा से स्वयं दीक्षित होकर सीता जी ने उस धर्म का सम्यक और उचित पालन किया. सारी तैयारियां संपन्न हो गयीं *अब श्राद्ध में आने वाले ऋषियों और ब्राह्मणों की प्रतीक्षा थी. उस समय सूर्य आकाश मण्डल के मध्य पहुंच गए और कुतुप मुहूर्त यानी दिन का आठवां मुहूर्त अथवा दोपहर हो गयी. श्री राम ने जिन ऋषियों को निमंत्रित किया था वे सभी आ गये थे *श्रीराम ने सभी ऋषियों और ब्राह्मणों का स्वागत और आदर सत्कार किया तथा भोजन करने के लिये आग्रह किया. ऋषियों और ब्राह्मणों को भोजन हेतु आसन ग्रहण करने के बाद जानकी अन्न परोसने के लिए वहाँ आयीं *उन्होंने कुछ भोजन बड़े ही भक्ति भाव से ऋषियों के समक्ष उनके पत्तों के बनी थाली परोसा. वे ब्राह्मणों के बीच भी गयीं. पर अचानक ही जानकी भोजन करते ब्राह्मणों और ऋषियों के बीच से निकलीं और तुरंत वहां से दूर चली गयीं *सीता लताओं के मध्य छिपकर जा बैठी. यह क्रिया कलाप श्रीराम देख रहे थे. सीता के इस कृत्य से श्रीराम कुछ चकित हो गए. फिर उन्होंने विचार किया- ब्राह्मणों को बिना भोजन कराए साध्वी सीता लज्जा के कारण कहीँ चली गयी होंगी सीता जी एकान्त में जा बैठी हैं. फिर श्रीराम जी ने सोचा- अचानक इस कार्य का क्या कारण हो सकता है, अभी यह जानने का समय नहीं. जानकी से इस बात को जानने पहले मैं इन ब्राह्मणों को भोजन करा लूं, फिर उनसे बात कर कारण समझूंगा *ऐसा विचार कर श्रीराम ने स्वयं उन ब्राह्मणों को भोजन कराया. भोजन के बाद ऋषियों को विदा करते समय भी श्रीराम के मस्तिष्क में यह बात रह-रहकर कौंध रही थी कि सीता ने ऐसा अप्रत्याशित व्यवहार क्यों किया *उन ब्राह्मणों के चले जाने पर श्रीराम ने अपनी प्रियतमा सीताजी से पूछा- ब्राह्मणों को देखकर तुम लताओं की ओट में क्यों छिप गई थीं ? यह उचित नहीं जान पड़ा. इससे ऋषियों के भोजन में व्यवधान हो सकता था. वे कुपित भी हो सकते थे श्रीराम बोले- हे सीते ! तुम्हें तो ज्ञात है कि ऋषियों और ब्राह्मणों को पितरों के प्रतीक मान जाता है. ऐसे में तुमने ऐसा क्यों किया ? इसका कारण जानने की इच्छा है. मुझे अविलम्ब बताओ *श्री राम के ऐसा कहने पर सीता जी मुँह नीचे कर सामने खड़ी हो गयीं और अपने नेत्रों से आँसू बहाती हुई बोलीं- हे नाथ ! मैंने यहां जिस प्रकार का आश्चर्य देखा है, उसे आप सुनें इस श्राद्ध में उपस्थित ब्राह्मणों की अगली पांत में मैंने दो महापुरुषों को देखा जो राजा से प्रतीत होते थे. ऋषियों, ब्राह्मणों के बीच सजे धजे राजा-महाराजा जैसे महापुरुषों को देख मैं अचरज में थी. तभी मैंने आपके पिताश्री के दर्शन भी किए वह भी सभी तरह के राजसी वस्त्रों और आभूषणों से सुशोभित थे. आपके पिता को देखकर मैं बिना बताए एकान्त में चली आय़ी थी. मुझे न केवल लज्जा का बोध हुआ वरन मेरे विचार में कुछ और भी अया तभी निर्णय लिया *हे प्रभो ! पेड़ों की छाल वल्कल और मृगचर्म धारण करके मैं अपने स्वसुर के सम्मुख कैसे जा सकती थी ? मैं आपसे यह सत्य ही कह रही हूं. अपने हाथ से राजा को मैं वह भोजन कैसे दे सकती थी, जिसके दासों के भी दास कभी वैसा भोजन नहीं करते *मिट्टी और पत्तों आदि से बने पात्रों में उस अन्न को रखकर मैं उन्हें कैसे देती ? मैं तो वही हूँ जो पहले सभी प्रकार के आभूषणों से सुशोभित रहती थी और आपके पिताश्री मुझे वैसी स्थिति में देख चुके थे. आज मैं इस अवस्था में उनके सामने कैसे जाती इससे उनके मन को भी क्षोभ होता. मैं उनको क्षोभ में कैसे देख सकती थी ? क्या यह कहीं से उचित होता ? इन सब कारणों से हुई लज्जा के कारण मैं वापस हो गयी और किसी की दृष्टि न पड़े इस लिए सघन लता गुल्मों में आ बैठी *गरुड़ जी बोले- हे भगवन आपकी इस कथा से मेरी शंका का उचित निवारण हो गया कि श्रद्धा में पितृगण साक्षात प्रकट होते हैं और वे श्राद्ध का भोजन करने वाले ब्राह्मणों में उपस्थित रहते हैं. (गरूड़ पुराण से) *जय-जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌺🌺 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰

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Neha Sharma Sep 25, 2021

🙏*श्रीगरुड़ पुराण (सारोद्धार)"🙏"अध्याय - 06"🙏 *इस अध्याय में (जीव की गर्भावस्था का दुःख, गर्भ में पूर्वजन्मों के ज्ञान की स्मृति, जीव द्वारा भगवान् से अब आगे दुष्कर्मो को न करने की प्रतिज्ञा, गर्भवास से बाहर आते ही वैष्णवी माया द्वारा उसका)..... *गरुड़ जी ने कहा, 'हे केशव ! नरक से आया हुआ जीव माता के गर्भ में कैसे उत्पन्न होता है? वह गर्भवास आदि के दु:खों को जिस प्रकार भोगता है, वह सब भी मुझे बताइए। *भगवान विष्णु ने कहा, 'स्त्री और पुरुष के संयोग से जैसे मनुष्य की उत्पत्ति होती है, उसे मैं तुम्हें कहूँगा। *ऋतुकाल के आरंभ के तीन दिनों तक इन्द्र को लगी ब्रह्महत्या का चतुर्थांश रजस्वला स्त्रियों में रहता है, उस ऋतुकाल के मध्य में किये गये गर्भाधान के फलस्वरुप पापात्माओं के देह की उत्पत्ति होती है। रजस्वला स्त्री प्रथम दिन चाण्डालिनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी और तीसरे दिन रजकी (धोबिन) कहलाती है। नरक से आए हुए प्राणियों की ये तीन माताएँ होती हैं। दैव की प्रेरणा से कर्मानुरोधी शरीर प्राप्त करने के लिये प्राणि पुरुष के वीर्य का आश्रय लेकर स्त्री के उदर में प्रविष्ट होता है। एक रात्रि में वह शुक्राणु कलल के रूप में, पाँच रात्रि में बुदबुद के रूप में, दस दिनों में बेर के समान तथा उसके पश्चात मांस पेशियों से युक्त अण्डाकार हो जाता है। *एक मास में सिर, दो मास में बाहु आदि शरीर के सभी अंग, तीसरे मास में नख, लोम, अस्थि, चर्म तथा लिंगबोधक छिद्र उत्पन्न होते हैं। चौथे मास में रस, रक्त, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा और शुक्र, 'ये सात धातुएँ तथा पाँचवें मास में भूख-प्यास पैदा होती है। छठे मास में जरायु में लिपटा हुआ वह जीव माता की दाहिनी कोख में घूमता है और माता के द्वारा खाये-पीये अन्नादि से बढ़े हुए धातुओं वाला वह जन्तु विष्ठा-मूत्र के दुर्गन्धयुक्त गढ्ढे रूप गर्भाशय में सोता है। *वहाँ गर्भस्थ क्षुधित कृमियों के द्वारा उसके सुकुमार अंग प्रतिक्षण बार-बार काटे जाते हैं, जिससे अत्यधिक क्लेश होने के कारण वह जीव मूर्च्छित हो जाता है। माता के द्वारा खाये हुए कड़वे, तीखे, गरम, नमकीन, रूखे तथा खट्टे पदार्थों के अति उद्वेजक संस्पर्श से उसे समूचे अंग में वेदना होती है और जरायु अर्थात झिल्ली से लिपटा हुआ वह जीव आँतों द्वारा बाहर से ढका रहता है। *उसकी पीठ और गरदन कुण्डलाकार रहती है। इस प्रकार अपने अंगों से चेष्टा करने में असमर्थ होकर भी वह जीव पिंजरे में स्थित पक्षी की भाँति माता की कुक्षि में अपने सिर को दबाए हुए पड़ा रहता है। भगवान की कृपा से अपने सैकड़ों जन्मों के कर्मों का स्मरण करता हुआ वह गर्भस्थ जीव लम्बी श्वास लेता है। ऎसी स्थिति में भला उसे कौन सा सुख प्राप्त हो सकता है? मांस-मज्जा आदि सात धातुओं के आवरण में आवृत वह ऋषिकल्प जीव भयभीत होकर हाथ जोड़कर विकल वाणि से उन भगवान की स्तुति करता है, जिन्होंने उसको माता के उदर में डाला है। सातवें महीने के आरंभ से ही सभी जन्मों के कर्मों का ज्ञान हो जाने पर भी गर्भस्थ प्रसूतिवायु के द्वारा चालित होकर वह विष्ठा में उत्पन्न सहोदर (उसी पेट में उत्पन्न अन्य) कीड़े की भाँति एक स्थान पर ठहर नहीं पाता। *जीव कहता है, 'मैं लक्ष्मी के पति, जगत के आधार, अशुभ का नाश करने वाले तथा शरण में आये हुए जीवों के प्रति वात्सल्य रखने वाले भगवान विष्णु की शरण में जाता हूँ। 'हे नाथ ! आपकी माया से मोहित होकर मैं देह में अहं भाव तथा पुत्र और पत्नी आदि में ममत्वभाव के अभिमान से जन्म-मरण के चक्कर में फँसा हूँ। मैंने अपने परिजनों के उद्देश्य से शुभ और अशुभ कर्म किये, किंतु अब मैं उन कर्मों के कारण अकेला जल रहा हूँ। उन कर्मों के फल भोगने वाले पुत्र-कलत्रादि अलग हो गये। यदि इस गर्भ से निकलकर मैं बाहर आऊँ तो फिर आपके चरणों का स्मरण करुँगा और ऎसा उपाय करूँगा जिससे मुक्ति प्राप्त कर लूँ। *विष्ठा और मूत्र के कुएँ में गिरा हुआ जठराग्नि से जलता हुआ एवं यहाँ से बाहर निकलने की इच्छा करता हुआ मैं कब बाहर निकल पाऊँगा। जिस दीनदयाल परमात्मा ने मुझे इस प्रकार का विशेष ज्ञान दिया है, मैं उन्हीं की शरण ग्रहण करता हूँ जिससे मुझे पुन: संसार के चक्कर में न आना पड़े। अथवा मैं माता के गर्भगृह से कभी भी बाहर जाने की इच्छा नहीं करता क्योंकि बाहर जाने पर पाप कर्मों से पुन: मेरी दुर्गति हो जाएगी। इसलिए यहाँ बहुत दु:ख की स्थिति में रहकर भी मैं खेद रहित होकर आपके चरणों का आश्रय लेकर संसार से अपना उद्धार कर लूँगा।' *श्रीभगवान बोले, 'इस प्रकार की बुद्धिवाले एवं स्तुति करते हुए दस मास के ऋषिकल्प उस जीव को प्रसूतिवायु प्रसव के लिये तुरंत नीचे की ओर ढकेलता है। प्रसूतिमार्ग के द्वारा नीचे सिर करके सहसा गिराया गया वह आतुर जीव अत्यन्त कठिनाई से बाहर निकलता है और उस समय वह श्वास नहीं ले पाता है तथा उसकी स्मृति भी नष्ट हो जाती है। पृथ्वी पर विष्ठा और मूत्र के बीच गिरा हुआ वह जीव मल में उत्पन्न कीड़े की भाँति चेष्टा करता है और विपरीत गति प्राप्त करके ज्ञान नष्ट हो जाने के कारण अत्यधिक रुदन करने लगता है। *गर्भ में, रुग्णावस्था में श्मशान भूमि में तथा पुराण के पारायण या श्रवण के समय जैसी बुद्धि होती है, वह यदि स्थिर हो जाय तो कौन व्यक्ति सांसारिक बन्धन से मुक्त नहीं हो सकता। कर्मभोग के अनन्तर जीव जब गर्भ से बाहर आता है तब उसी समय वैष्णवी माया उस पुरुष को मोहित कर देती है। उस समय माया के स्पर्श से वह जीव विवश होकर कुछ बोल नहीं पाता, प्रत्युत शैशवादि अवस्थाओं में होने वाले दु:खों को पराधीन की भाँति भोगता है। *उसका पोषण करने वाले लोग उसकी स्थिति इच्छा को जान नहीं पाते। अत: प्रत्याख्यान करने में असमर्थ होने के कारण वह अनभिप्रेत अर्थात विपरीत स्थिति को प्राप्त हो जाता है। स्वदज जीवों से दूषित तथा विष्ठा-मूत्र से अपवित्र शय्या पर सुलाए जाने के कारण अपने अंगों को खुजलाने में, आसन से उठने में तथा अन्य चेष्टाओं को करने में वह असमर्थ रहता है। जैसे एक कृमि दूसरे कृमि को काटता है, उसी प्रकार ज्ञानशून्य और रोते हुए उस शिशु की कोमल त्वचा को डाँस, मच्छर और खटमल आदि जन्तु व्यथित करते हैं। *इस प्रकार शैशवावस्था का दु:ख भोगकर वह पौगण्डावस्था में भी दु:ख ही भोगता है। तदनन्तर युवावस्था प्राप्त होने पर आसुरी सम्पत्ति (दम्भ, घमण्द और अभिमान तथा क्रोध, कठोरता तथा अज्ञान, 'ये सब आसुरी-सम्पदा लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं) को प्राप्त करता है। तब वह दुर्व्यसनों में आसक्त होकर नीच पुरुषों के साथ संबंध बनाता है और वह काम लम्पट प्राणी शास्त्र तथा सत्पुरुषों से द्वेष करता है। *भगवान की माया रूपी स्त्री को देखकर वह अजितेन्द्रिय पुरुष उसकी भाव भंगिमा से प्रलोभित होकर महामोहरुप अन्धतम में उसी प्रकार गिर पड़ता है जिस प्रकार अग्नि में पतंगा। हिरन, हाथी, पतंगा, भौंरा और मछली, 'ये पाँचों क्रमश: शब्द, स्पर्श, रूप, गन्ध तथा रस, 'इन पाँच विषयों में एक-एक में आसक्ति होने के कारण ही मारे जाते हैं, फिर एक प्रमादी व्यक्ति जो पाँचों इन्द्रियों से पाँचों विषयों का भोग करता है, वह क्यों नहीं मारा जाएगा? *अभीप्सित वस्तु की अप्राप्ति की स्थिति में अज्ञान के कारण ही क्रोध हो आता है और शोक को प्राप्त व्यक्ति देह के साथ ही बढ़ने वाले अभिमान तथा क्रोध के कारण वह कामी व्यक्ति स्वयं अपने नाश हेतु दूसरे कामी से शत्रुता कर लेता है। इस प्रकार अधिक बलशाली अन्य कामीजनों के द्वारा वह वैसे ही मारा जाता है जैसे किसी बलवान हाथी से दूसरा हाथी। इस प्रकार जो मूर्ख अत्यन्त दुर्लभ मानव जीवन को विषयासक्ति के कारण व्यर्थ में नष्ट कर लेता है, उससे बढ़कर पापी और कौन होगा? *सैकड़ों योनियों को पार करके पृथ्वी पर दुर्लभ मानव योनि प्राप्त होती है। मानव शरीर प्राप्त होने पर भी द्विजत्व की प्राप्ति उससे भी अधिक दुर्लभ है। अतिदुर्लभ द्विजत्व को प्राप्त कर जो व्यक्ति द्विजत्व की रक्षा के लिये अपेक्षित धर्म-कर्मानुष्ठान नहीं करता, केवल इन्द्रियों की तृप्ति में ही प्रयत्नशील रहता है, उसके हाथ में आया हुआ अमृतस्वरुप वह अवसर उसके प्रमाद से नष्ट हो जाता है। इसके बाद वृद्धावस्था को प्राप्त करके महान व्याधियों से व्याकुल होकर मृत्यु को प्राप्त करके वह पूर्ववत महान दु:खपूर्ण नरक में जाता है। इस प्रकार जन्म-मरण के हेतुभूत कर्मपाशों से बँधे हुए वे पापी मेरी माया से विमोहित होकर कभी भी वैराग्य को प्राप्त नहीं करते। हे तार्क्ष्य ! इस प्रकार मैंने तुम्हें अन्त्येष्टि कर्म से हीन पापियों की नरक गति बतायी, अब आगे और क्या सुनना चाहते हो? *(इस प्रकार गरुड़ पुराण के अन्तर्गत सारोद्धार में “पापजन्मादिदु:खनिरुपण” नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ) ----------:::×:::---------- "जय जय श्रीहरि" 🌺🙏🌺🙏🌺 *************************************************

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Neha Sharma Sep 24, 2021

🌸*जय श्री राधेकृष्णा*🌸🙏🌸*शुभ रात्रि नमन*🌸 ***जिन्दगी के सफर में गुजर जाते हैं जो मुकाम, वो फिर नहीं आते वो फिर नहीं आते***😥😥😥😥😥😥😥 👉*कहानी जो अंतर्मन को छू जाए..."सफर और हमसफ़र" *ट्रेन चलने को ही थी कि अचानक कोई जाना पहचाना सा चेहरा जर्नल बोगी में आ गया। मैं अकेली सफर पर थी। सब अजनबी चेहरे थे। स्लीपर का टिकिट नहीं मिला तो जर्नल डिब्बे में ही बैठना पड़ा। मगर यहां ऐसे हालात में उस शख्स से मिलना। जिंदगी के लिए एक संजीवनी के समान था। *जिंदगी भी कमबख्त कभी कभी अजीब से मोड़ पर ले आती है। ऐसे हालातों से सामना करवा देती है जिसकी कल्पना तो क्या कभी ख्याल भी नहीं कर सकते । *वो आया और मेरे पास ही खाली जगह पर बैठ गया। ना मेरी तरफ देखा। ना पहचानने की कोशिश की। कुछ इंच की दूरी बना कर चुप चाप पास आकर बैठ गया। बाहर सावन की रिमझिम लगी थी। इस कारण वो कुछ भीग गया था। मैने कनखियों से नजर बचा कर उसे देखा। उम्र के इस मोड़ पर भी कमबख्त वैसा का वैसा ही था। हां कुछ भारी हो गया था। मगर इतना ज्यादा भी नही। *फिर उसने जेब से चश्मा निकाला और मोबाइल में लग गया। *चश्मा देख कर मुझे कुछ आश्चर्य हुआ। उम्र का यही एक निशान उस पर नजर आया था कि आंखों पर चश्मा चढ़ गया था। चेहरे पर और सर पे मैने सफेद बाल खोजने की कोशिश की मग़र मुझे नही दिखे। *मैंने जल्दी से सर पर साड़ी का पल्लू डाल लिया। बालो को डाई किए काफी दिन हो गए थे मुझे। ज्यादा तो नही थे सफेद बाल मेरे सर पे। मगर इतने जरूर थे कि गौर से देखो तो नजर आ जाए। *मैं उठकर बाथरूम गई। हैंड बैग से फेसवाश निकाला चेहरे को ढंग से धोया फिर शीशे में चेहरे को गौर से देखा। पसंद तो नही आया मगर अजीब सा मुँह बना कर मैने शीशा वापस बैग में डाला और वापस अपनी जगह पर आ गई। *मग़र वो साहब तो खिड़की की तरफ से मेरा बैग सरकाकर खुद खिड़की के पास बैठ गए थे। मुझे पूरी तरह देखा भी नही बस बिना देखे ही कहा, " सॉरी, भाग कर चढ़ा तो पसीना आ गया था । थोड़ा सुख जाए फिर अपनी जगह बैठ जाऊंगा।" फिर वह अपने मोबाइल में लग गया। मेरी इच्छा जानने की कोशिश भी नही की। उसकी यही बात हमेशा मुझे बुरी लगती थी। फिर भी ना जाने उसमे ऐसा क्या था कि आज तक मैंने उसे नही भुलाया। एक वो था कि दस सालों में ही भूल गया। मैंने सोचा शायद अभी तक गौर नही किया। पहचान लेगा। थोड़ी मोटी हो गई हूँ। शायद इसलिए नही पहचाना। मैं उदास हो गई। *जिस शख्स को जीवन मे कभी भुला ही नही पाई उसको मेरा चेहरा ही याद नही😔 *माना कि ये औरतों और लड़कियों को ताड़ने की इसकी आदत नही मग़र पहचाने भी नही😔 *शादीशुदा है। मैं भी शादीशुदा हुँ जानती थी इसके साथ रहना मुश्किल है मग़र इसका मतलब यह तो नही कि अपने खयालो को अपने सपनो को जीना छोड़ दूं। एक तमन्ना थी कि कुछ पल खुल के उसके साथ गुजारूं। माहौल दोस्ताना ही हो मग़र हो तो सही😔 *आज वही शख्स पास बैठा था जिसे स्कूल टाइम से मैने दिल मे बसा रखा था। सोसल मीडिया पर उसके सारे एकाउंट चोरी छुपे देखा करती थी। उसकी हर कविता, हर शायरी में खुद को खोजा करती थी। वह तो आज पहचान ही नही रहा😔 *माना कि हम लोगों में कभी प्यार की पींगे नही चली। ना कभी इजहार हुआ। हां वो हमेशा मेरी केयर करता था, और मैं उसकी केयर करती थी। कॉलेज छुटा तो मेरी शादी हो गई और वो फ़ौज में चला गया। फिर उसकी शादी हुई। जब भी गांव गई उसकी सारी खबर ले आती थी। *बस ऐसे ही जिंदगी गुजर गई। *आधे घण्टे से ऊपर हो गया। वो आराम से खिड़की के पास बैठा मोबाइल में लगा था। देखना तो दूर चेहरा भी ऊपर नही किया😔 *मैं कभी मोबाइल में देखती कभी उसकी तरफ। सोसल मीडिया पर उसके एकाउंट खोल कर देखे। तस्वीर मिलाई। वही था। पक्का वही। कोई शक नही था। वैसे भी हम महिलाएं पहचानने में कभी भी धोखा नही खा सकती। 20 साल बाद भी सिर्फ आंखों से पहचान ले☺️ फिर और कुछ वक्त गुजरा। माहौल वैसा का वैसा था। मैं बस पहलू बदलती रही। *फिर अचानक टीटी आ गया। सबसे टिकिट पूछ रहा था। मैंने अपना टिकिट दिखा दिया। उससे पूछा तो उसने कहा नही है। *टीटी बोला, "फाइन लगेगा" वह बोला, "लगा दो" टीटी, " कहाँ का टिकिट बनाऊं?" *उसने जल्दी से जवाब नही दिया। मेरी तरफ देखने लगा। मैं कुछ समझी नही। उसने मेरे हाथ मे थमी टिकिट को गौर से देखा फिर टीटी से बोला, " कानपुर।" टीटी ने कानपुर की टिकिट बना कर दी। और पैसे लेकर चला गया। *वह फिर से मोबाइल में तल्लीन हो गया। *आखिर मुझसे रहा नही गया। मैंने पूछ ही लिया,"कानपुर में कहाँ रहते हो?" *वह मोबाइल में नजरें गढ़ाए हुए ही बोला, " कहीँ नही" वह चुप हो गया तो मैं फिर बोली, "किसी काम से जा रहे हो" वह बोला, "हाँ" *अब मै चुप हो गई। वह अजनबी की तरह बात कर रहा था और अजनबी से कैसे पूछ लूँ किस काम से जा रहे हो। कुछ देर चुप रहने के बाद फिर मैंने पूछ ही लिया, "वहां शायद आप नौकरी करते हो?" उसने कहा,"नही" *मैंने फिर हिम्मत कर के पूछा "तो किसी से मिलने जा रहे हो?" वही संक्षिप्त उत्तर ,"नही" आखरी जवाब सुनकर मेरी हिम्मत नही हुई कि और भी कुछ पूछूँ। अजीब आदमी था । बिना काम सफर कर रहा था। मैं मुँह फेर कर अपने मोबाइल में लग गई। कुछ देर बाद खुद ही बोला, " ये भी पूछ लो क्यों जा रहा हूँ कानपुर?" *मेरे मुंह से जल्दी में निकला," बताओ, क्यों जा रहे हो?" फिर अपने ही उतावलेपन पर मुझे शर्म सी आ गई। उसने थोड़ा सा मुस्कराते हुवे कहा, " एक पुरानी दोस्त मिल गई। जो आज अकेले सफर पर जा रही थी। फौजी आदमी हूँ। सुरक्षा करना मेरा कर्तव्य है । अकेले कैसे जाने देता। इसलिए उसे कानपुर तक छोड़ने जा रहा हूँ। " इतना सुनकर मेरा दिल जोर से धड़का। नॉर्मल नही रह सकी मैं। *मग़र मन के भावों को दबाने का असफल प्रयत्न करते हुए मैने हिम्मत कर के फिर पूछा, " कहाँ है वो दोस्त?" कमबख्त फिर मुस्कराता हुआ बोला," यहीं मेरे पास बैठी है ना" *इतना सुनकर मेरे सब कुछ समझ मे आ गया। कि क्यों उसने टिकिट नही लिया। क्योंकि उसे तो पता ही नही था मैं कहाँ जा रही हूं। सिर्फ और सिर्फ मेरे लिए वह दिल्ली से कानपुर का सफर कर रहा था। जान कर इतनी खुशी मिली कि आंखों में आंसू आ गए। *दिल के भीतर एक गोला सा बना और फट गया। परिणाम में आंखे तो भिगनी ही थी। बोला, "रो क्यों रही हो?" *मै बस इतना ही कह पाई," तुम मर्द हो नही समझ सकते" वह बोला, " क्योंकि थोड़ा बहुत लिख लेता हूँ इसलिए एक कवि और लेखक भी हूँ। सब समझ सकता हूँ।" मैंने खुद को संभालते हुए कहा "शुक्रिया, मुझे पहचानने के लिए और मेरे लिए इतना टाइम निकालने के लिए" वह बोला, "प्लेटफार्म पर अकेली घूम रही थी। कोई साथ नही दिखा तो आना पड़ा। कल ही रक्षा बंधन था। इसलिए बहुत भीड़ है। तुमको यूँ अकेले सफर नही करना चाहिए।" "क्या करती, उनको छुट्टी नही मिल रही थी। और भाई यहां दिल्ली में आकर बस गए। राखी बांधने तो आना ही था।" मैंने मजबूरी बताई। "ऐसे भाइयों को राखी बांधने आई हो जिनको ये भी फिक्र नही कि बहिन इतना लंबा सफर अकेले कैसे करेगी?" "भाई शादी के बाद भाई रहे ही नही। भाभियों के हो गए। मम्मी पापा रहे नही।" कह कर मैं उदास हो गई। वह फिर बोला, "तो पति को तो समझना चाहिए।" "उनकी बहुत बिजी लाइफ है मैं ज्यादा डिस्टर्ब नही करती। और आजकल इतना खतरा नही रहा। कर लेती हुँ मैं अकेले सफर। तुम अपनी सुनाओ कैसे हो?" "अच्छा हूँ, कट रही है जिंदगी" "मेरी याद आती थी क्या?" मैंने हिम्मत कर के पूछा। वो चुप हो गया। *कुछ नहीं बोला तो मैं फिर बोली, "सॉरी, यूँ ही पूछ लिया। अब तो परिपक्व हो गए हैं। कर सकते है ऐसी बात।" उसने शर्ट की बाजू की बटन खोल कर हाथ मे पहना वो तांबे का कड़ा दिखाया जो मैंने ही फ्रेंडशिप डे पर उसे दिया था। बोला, " याद तो नही आती पर कमबख्त ये तेरी याद दिला देता था।" *कड़ा देख कर दिल को बहुत शुकुन मिला। मैं बोली "कभी सम्पर्क क्यों नही किया?" *वह बोला," डिस्टर्ब नही करना चाहता था। तुम्हारी अपनी जिंदगी है और मेरी अपनी जिंदगी है।" मैंने डरते डरते पूछा," तुम्हे छू लुँ" *वह बोला, " पाप नही लगेगा?" मै बोली," नही छू ने से नही लगता।" और फिर मैं कानपुर तक उसका हाथ पकड़ कर बैठी रही।। *बहुत सी बातें हुईं। *जिंदगी का एक ऐसा यादगार दिन था जिसे आखरी सांस तक नही बुला पाऊंगी। वह मुझे सुरक्षित घर छोड़ कर गया। रुका नही। बाहर से ही चला गया। *जम्मू थी उसकी ड्यूटी । चला गया। *उसके बाद उससे कभी बात नही हुई । क्योंकि हम दोनों ने एक दूसरे के फोन नम्बर नही लिए। *हालांकि हमारे बीच कभी भी नापाक कुछ भी नही हुआ। एक पवित्र सा रिश्ता था। मगर रिश्तो की गरिमा बनाए रखना जरूरी था। *फिर ठीक एक महीने बाद मैंने अखबार में पढ़ा कि वो देश के लिए शहीद हो गया। क्या गुजरी होगी मुझ पर वर्णन नही कर सकती। उसके परिवार पर क्या गुजरी होगी। पता नही😔 *लोक लाज के डर से मैं उसके अंतिम दर्शन भी नहीं कर सकी। *आज उससे मीले एक साल हो गया है आज भी रक्षाबन्धन का दूसरा दिन है आज भी सफर कर रही हूँ। दिल्ली से कानपुर जा रही हूं। जानबूझकर जर्नल डिब्बे का टिकिट लिया है मैंने। अकेली हूँ। न जाने दिल क्यों आस पाले बैठा है कि आज फिर आएगा और पसीना सुखाने के लिए उसी खिड़की के पास बैठेगा। *एक सफर वो था जिसमे कोई #हमसफ़र था। एक सफर आज है जिसमे उसकी यादें हमसफ़र है। बाकी जिंदगी का सफर जारी है देखते है कौन मिलता है कौन साथ छोड़ता है...!!! 😥😥😥 *जय-जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌺🌺

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Neha Sharma Sep 24, 2021

🙏*जय श्री राधे कृष्णा*🙏*शुभ संध्या नमन*🙏 🌺*श्री राधेकृष्ण शरण मम*🌺......*आपको यह जानकर बहुत आश्चर्य होगा की जिस ईश्वर को पाना बहुत कठिन बताया जाता है उसी ईश्वर को अगर बाल रूप में भजा जाय तो सिर्फ कुछ ही दिनों में वो आपसे चमत्कारी रूप से रीझ जाता है! *जी हाँ, एकदम सत्य और आजमाई गयी बात है उन अनेक कृष्ण भक्तों द्वारा जो अक्सर ही अपने जीवन में लड्डू गोपाल की नटखट शरारतों के प्रत्यक्ष अनुभव और दर्शन का महा दुर्लभ सौभाग्य पाते रहतें हैं ! *जैसे कोई छोटा मासूम बच्चा हो और उसे आप पीट भी दें, लेकिन फिर थोड़ी देर बाद उसे प्यार से बुलाएँ तो वो आपकी मार को भूलकर आपके पास खिलखिलाते हुए चला आयेगा, ठीक उसी तरह से कोई बड़ा पापी भी अगर अच्छा इन्सान बनना चाहता हो तो वो भी प्रेम से लड्डू गोपाल को बार बार बुलाये तो लड्डू गोपाल ठुमुक ठुमुक कर हसतें हुए उसके पास पहुच जायेंगे ! *लाड लड़ाना वो अति आसान प्रक्रिया है जिससे अनन्त ब्रह्मांडो को जन्म देने वाला, पालने वाला और नष्ट करने वाला परम सत्ता आपके बंधन में बध जाता है | अब ये आपके ऊपर है की आप उसे किस रिश्ते में बाधना चाहते हैं | आपको जिस भी रिश्ते में सबसे ज्यादा प्यार महसूस होता हो (चाहे वह बेटा, भाई, भतीजा, भांजा कोई भी रिश्ता हो) उसी रिश्ते से बिना किसी संकोच बाल गोपाल को तुरन्त जोड़ लीजिये और कुछ दिनों तक उस रिश्ते को नियम से निभाइए और फिर निश्चित देखिये ! *कुछ दिन बाद भले ही आप उस रिश्ते को भूल जाय पर लड्डू नहीं भूलेंगे और आपको ये देखकर महान आश्चर्य होगा की अब रिश्ता लड्डू गोपाल खुद निभा रहे है ! *मन में लड्डू गोपाल को खाना खिलाने में एकाग्रता नहीं हो पा रही हो तो आप मूर्ति के सामने भोग लगाईये, दोनों में कोई अंतर नहीं है | वास्तव में प्रभु सामान के भूखे नहीं, सिर्फ आपके प्रेम के भूखे हैं ! *अपनी नौकरी, व्यापार, पढाई को ईमानदारी से निभाते हुए जब भी आपको खाली समय मिले लड्डू गोपाल के साथ ही मन ही मन खेलिए, बातें करिए और वो हर काम करिए जो आपको पसंद हो | बस इसी तरह खेल खेल में लड्डू गोपाल कब आपके अपने हो जायेंगे, आपको पता ही नहीं चलेगा ! *यही बाल गोपाल, चैतन्य महाप्रभु की गुरु माता के यहाँ पानी भरना, झाड़ू लगाना, खाना बनाना और बर्तन मांजना सब काम करते थे और यही बाल गोपाल बूढ़े वल्लभाचार्य को रोज सुबह हाथ पकड़ कर लैट्रिन कराने खेत में ले जाते थे | और क्या क्या कहे यही बाल गोपाल कभी किसी गरीब भक्त की लड़की की शादी के लिए चुपके से रूपए घर में रख गये तो कभी किसी भक्त को दुश्मनों के जानलेवा हमलों से बचाया, इसी बाल गोपाल ने कितनों को फर्जी मुकदमों से बचाया तो कितनों की सालों पुरानी बिमारियों के दर्द को सेकंडों में लेकर भागा | *ये ऐसा पक्का रिश्ता निभाता है की 24 घंटा आपके साथ ही रहता है और आपको छोड़ कर कभी भी जाता ही नहीं तो फिर जब 24 घंटे का अति प्यारा, अति सुन्दर, अति मनमोहक बॉडी गार्ड आपके साथ है जो आपके पूर्व जन्मों के आपके ही द्वारा किये गएँ पापों की सजा के अधिकांश हिस्से को खुद ही झेल जाय तो फिर जीवन में किस बात की टेंशन ! सृष्टि का अटल नियम है की गलत और सही, दोनों भावना द्वारा किये गये कामों का भोग तो भोगना ही पड़ता है पर कृष्ण साथ हो तो आने वाला प्रचंड दुर्भाग्य भी चीटी काटने के समान हल्का हो जाता है ! *इस दुनिया की हर स्त्री, लड्डू गोपाल की माँ और हर आदमी पिता बनने का महा सौभाग्य निश्चित ही पा सकता है ! शुरू में तो भक्त को भावना करनी पड़ती है पर कुछ दिन बाद उसे सही में लड्डू गोपाल का अहसास होने लगता है फिर उसके कुछ दिन बाद उसे स्वप्न में लड्डू गोपाल के दर्शन होने लगते हैं और फिर उसके कुछ दिन बाद ऐसा स्पष्ट महसूस होता है की लड्डू गोपाल ने अपने छोटे छोटे मुलायम हाथों से उसे छूया हो और उसके कुछ दिन बाद लड्डू गोपाल की विशेष कृपा हुई तो अति दुर्लभ दर्शन भी होता है ! ये एक ऐसा रिश्तेदार है जिसे सिर्फ चाहिए, आपका थोडा सा *समय जिसमे वो प्रेमपूर्वक आपके साथ खेल कूद सके और बदले में ये इतना कुछ देता है की झोली छोटी पड़ जाती है तो कोई क्यों न जोड़े ऐसे सुन्दर रिश्तेदार से रिश्ता ! एक रोचक कथा श्रवण करते हैं पुरानी बात है वृंदावन में बांके बिहारी जी के मंदिर में रोज गोसाई बड़े भाग से सेवा करते थे वह रोज बिहारी जी की आरती करते भोग लगाते हैं और उन्हें शयन का अंत में रोज चार लड्डू भगवान के बिस्तर के पास रखते थे उनका यह भाव था कि यदि रात में बिहारी जी को भूख लगेगी तो उठ कर खा लेंगे और जब वह सुबह मंदिर मंदिर के किवाड़ खोलते तो भगवान के बिस्तर पर प्रसाद बिखरा मिलता था इसी भाव से वह रोज ऐसा करते थे। *आज भी उसी भाव से बिहारी जी की सेवा की जाती है एक दिन बिहारी जी को शयन कराने के बाद गोसाई जी चार लड्डू रखना भूल गए और रात्रि होने पर अपने घर चले गए थे। बाबा की दुकान खुली थी वह घर जाने वाले थे तभी एक छोटा सा बालक आया जिसकी मोटी मोटी कजरारी आंखें हैं और घुंघराले बाल है सुंदर श्याम वर्ण है वह बालक कहता है बाबा 'ओ बाबा मोको बूंदी की लड्डू दे' बाबा ने कह लड्डू खत्म हो गए हैं अब तो मैं दुकान बंद करने जा रहा हूं तू कल आ जाना जितने चाहिए उतने लड्डू तेरे को दूंगा। बालक बोला बाबा एक बार जाकर देखो ना आपके पास चार लड्डू रखे हैं *उसकी हठ करने पर बाबा ने अंदर जाकर देखा तो है वह चार लड्डू मिल गए क्योंकि वह आज मंदिर नहीं गए थे वह बिहारी जी के लिए ही बना कर रखे थे उसने लड्डू दिए और कहा बालक पैसे दो बालक ने कहा मेरे पास पैसे तो है नहीं यह मेरा सोने का कंगन रखो सुबह मेरे बाबा आपसे कंगन ले लेंगे और पैसे दे देंगे बाबा ने कहा लाला पैसे नहीं है तो कोई बात नहीं मैं कल तुम्हारे बाबा से पैसे ले लूंगा पर फिर भी बालक नहीं माना उसने लड्डू ले लिए और दुकान में कंगन फेक कर भाग गया। जब पुजारी जी ने सुबह बिहारी जी का पट खोला तो देखा कि बिहारी जी के उनके हाथ में कंगन नहीं है फिर सोचते हैं कि ऐसा लगता है बिहारी जी के कंगन चोरी हो गए फिर देखते हैं कि यही बूंदी के लड्डू कैसे बिखरे पड़े हैं मैं तो रखना ही भूल गया। *थोड़ी देर बाद यह बात सारे मंदिर में फैल गई थी की बिहारी जी के कंगन चोरी हो गए सारे वृंदावन में हल्ला हो गया बांके बिहारी के कंगन चोरी कर लिए गए हैं जब उस दुकान वाले को इस बात का पता चला तो तुरंत गोसाई जी के पास आया और कहा कि भैया क्या यही कंगन है गोसाई जी ने तुरंत पहचान लिया हां हां भैया यही कंगन है तुम्हारे पास कैसे आई दुकानदार बोला कि कल रात आप बिहारी जी के सोने के समय बूंदी के लड्डू रखना भूल गए थे ना उस गोसाई जी ने कहा हां भाई मैं भूल गया था पर बात क्या है? आप बताइए ना दुकानदार ने कहा कि एक छोटा सा बालक मेरी दुकान पर रात में आया और बूंदी के लड्डू लिए और चला गया जैसे ही गोसाई जी ने यह बात सुनी तो उनकी आंखों से आंसू आने लगे बिहारी जी खुद आपके पास लड्डू लेने के लिए आए हैं और खुद के मन में आया हाय हाय मैं कैसे लड्डू रखना भूल गया मैं इतना स्वार्थी कैसे हो सकता हूं दुकानदार से कहते हैं जो बालक आपकी दुकान पर लड्डू लेने आया था वह और कोई नहीं अपना सावरा सलोना बांके बिहारी कृष्ण जी ही है इस तरह से भगवान आज भी रोज़ लीला करते हैं और कहते है कि भक्ति में भक्त कोई सेवा भूल जाता है तो खुद पूरा कर लेता हूं। । 🌹🌹 🌹🌹*जय-जय श्री राधेकृष्णा*🌹🌹 ***********************************************

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Neha Sharma Sep 24, 2021

╱◥◣ ‼️ *❣️मीरा चरित्र❣️‼️* *🔆🔆💢 पोष्ट-0️⃣7️⃣💢 🔆🔆* ๑۩๑๑۩๑๑۩๑๑۩๑๑۩๑๑۩๑๑۩๑۩๑๑۩ ◆ ▬▬▬▬▬❴✪❵▬▬▬▬▬ ◆ क्रमशः से आगे ............ श्री कृष्ण जनमोत्सव सम्पन्न होने के पश्चात बाबा बिहारी दास जी ने वृन्दावन जाने की इच्छा प्रकट की । भारी मन से दूदाजी ने स्वीकृति दी । मीरा को जब मिथुला ने बाबा के जाने के बारे में बताया तो उसका मन उदास हो गया । वह बाबा के कक्ष में जाकर उनके चरणों में प्रणाम कर रोते रोते बोली ," बाबा आप पधार रहें है ।" " हाँ बेटी ! वृद्ध हुआ अब तेरा यह बाबा ।अंतिम समय तक वृन्दावन में श्री राधामाधव के चरणों में ही रहना चाहता हूँ ।" "बाबा ! मुझे यहाँ कुछ भी अच्छा नहीं लगता ।मुझे भी अपने साथ वृन्दावन ले चलिए न बाबा ।" मीरा ने दोनों हाथों से मुँह ढाँपकर सुबकते हुए कहा । "श्री राधे! श्री राधे! बिहारी दास जी कुछ बोल नहीं पाये । उनकी आँखों से भी अश्रुपात होने लगा । कुछ देर पश्चात उन्होंने मीरा के सिर पर हाथ फेरते हुये कहा ," हम सब स्वतन्त्र नहीं है पुत्री । वे जब जैसा रखना चाहे...... उनकी इच्छा में ही प्रसन्न रहे । भगवत्प्रेरणा से ही मैं इधर आया । सोचा भी नहीं था कि शिष्या के रूप में तुम जैसा रत्न पा जाऊँगा । तुम्हारी शिक्षा में तो मैं निमित्त मात्र रहा । तुम्हारी बुद्धि , श्रद्धा ,लग्न और भक्ति ने मुझे सदा ही आश्चर्य चकित किया है । तुम्हारी सरलता , भोलापन और विनय ने ह्रदय के वात्सल्य पर एकाधिपत्य स्थापित कर लिया । राव दूदाजी के प्रेम , विनय और संत -सेवा के भाव इन सबने मुझ विरक्त को भी इतने दिन बाँध रखा । किन्तु बेटा ! जाना तो होगा ही ।" " बाबा ! मैं क्या करूँ ? मुझे आप आशीर्वाद दीजिये कि.......... ।मीरा की रोते रोते हिचकी बँध गई..........," मुझे भक्ति प्राप्त हो, अनुराग प्राप्त हो , श्यामसुन्दर मुझ पर प्रसन्न हो ।"उसने बाबा के चरण पकड़ लिए । बाबा कुछ बोल नहीं पाये, बस उनकी आँखों से झर झर आँसू चरणों पर पड़ी मीरा को सिक्त करते रहे । फिर भरे कण्ठ से बोले," श्री किशोरी जी और श्यरश्यामसुन्दर तुम्हारी मनोकामना पूर्ण करे । पर मैं एक तरफ जब तुम्हारी भाव भक्ति और दूसरी ओर समाज के बँधनों का विचार करता हूँ तो मेरे प्राण व्याकुल हो उठते है । बस प्रार्थना करता हूं कि तुम्हारा मंगल हो । चिन्ता न करो पुत्री ! तुम्हारे तो रक्षक स्वयं गिरधर है ।" अगले दिन जब बाबा श्याम कुन्ज में ठाकुर को प्रणाम करने आये तो मीरा और बाबा की झरती आँखों ने वहाँ उपस्थित सब जन को रूला दिया । मीरा अश्रुओं से भीगी वाणी में बोली ," आप वृन्दावन जा रहे हैं बाबा ! मेरा एक संदेश ले जायेंगे ?" "बोलो बेटी ! तुम्हारा संदेश - वाहक बनकर तो मैं भी कृतार्थ हो जाऊँगा ।" मीरा ने कक्ष में दृष्टि डाली । दासियों - सखियों के अतिरिक्त दूदाजी व रायसल काका भी थे । लाज के मारे क्या कहती । शीघ्रता से कागज़ कलम ले लिखने लगी । ह्रदय के भाव तरंगों की भांति उमड़ आने लगे ; आँसुओं से दृष्टि धुँधला जाती । वह ओढ़नी से आँसू पौंछ फिर लिखने लगती । लिख कर उसने मन ही मन पढ़ा .......... 🌿 गोविन्द......... गोविन्द कबहुँ मिलै पिया मेरा । 🌿 चरण कँवल को हँस हँस देखूँ , राखूँ नैणा नेरा । निरखन का मोहि चाव घणेरौ , कब देखूँ मुख तेरा ॥ 🌿 व्याकुल प्राण धरत नहीं धीरज, मिल तू मीत सवेरा । मीरा के प्रभु गिरधर नागर , ताप तपन बहु तेरा ॥ 🌿 पत्र को समेट कर और सुन्दर रेशमी थैली में रखकर मीरा ने पूर्ण विश्वास से उसे बाबा की ओर बढ़ा दिया । बाबा ने उसे लेकर सिर चढ़ाया और फिर उतने ही विश्वास से गोविन्द को देने के लिए अपने झोले में सहेज कर रख लिया ।गिरधर को सबने प्रणाम किया । मीरा ने पुनः प्रणाम किया । बिहारी दास जी के जाने से ऐसा लगा , जैसे गुरु , मित्र और सलाहकार खो गया हो । कल गुरु पूर्णिमा है ।मीरा श्याम कुन्ज में बैठी हुई सोच रही है, सदा से इस दिन गुरुपूजा करते आ रहे है । शास्त्र कहते है कि गुरु के बिना ज्ञान नहीं होता , वही परमतत्व का दाता है ।तब मेरे गुरु कौन ? वह एकदम से उठकर दूदाजी के पास चल पड़ी ।वहाँ जयमल ,(वीरमदेव जी के पुत्र और मीरा के छोटे भाई ) दूदाजी से तलवारबाज़ी के दाव पैच सीख रहे थे ।मीरा दूदाजी को प्रणाम कर भाई की बात खत्म होने की प्रतीक्षा करते बैठ गई ।पर जयमल तो युद्ध, घोड़ों और धनुष तलवार के बारे में वीरता से दूदाजी से कितने ही प्रश्न पूछते जा रहे थे । मीरा ने भाई को टोकते हुए कहा," बाबोसा से मुझे कुछ पूछना था ।पूछ लूँ तो फिर भाई ,आप बाबोसा के साथ पुनः महाभारत प्रारम्भ कर लेना । तलवार जितने तो आप हो नहीं अभी और युद्ध पर जाने की बातें कर रहे हो ।" जयमल और दूदाजी दोनों मीरा की बात पर हँस पड़े । मीरा अपनी जिज्ञासा रखती हुई बोली ," बाबोसा !शास्त्र और संत कहते है कि गुरु के बिना ज्ञान नहीं होता ।मेरे गुरु कौन है?" " है तो सही, बाबा बिहारी दास और योगी निवृतिनाथ जी ।" जयमल ने कहा । " नहीं बेटा ! वे दोनों मीरा के शिक्षा गुरू है -एक संगीत के और दूसरे योग के , पर वे दीक्षा गुरू नहीं ।सुनो बेटी ! इस क्षेत्र में अधिकारी कभी भी वंचित नहीं रहता ।तृषित यदि स्वयं सरोवर के पास नहीं पहुँच पाता तो सरोवर ही प्यासे के समीप पहुँच जाता है ।बेटी ! तुम अपने गिरधर से प्रार्थना करो ,वे उचित प्रबन्ध कर देंगें ।" " गुरु होना आवश्यक तो है न बाबा ?" "आवश्यकता होने पर अवश्य ही आवश्यक है ।गुरु तो एक ऐसी जलता हुआ दिया है जो तुम्हारा भी अध्यात्मिक पथ प्रकाशित कर देते है । फिर गुरु के होने से उनकी कृपा तुम्हारे साथ जुड़ जाती है।------यों तो तुम्हारे गिरधर स्वयं जगदगुरू है ।" " वो तो है बाबोसा पर मन्त्र ?" उसके इस प्रश्न पर दूदाजी हँस दिये, "भगवान का प्रत्येक नाम मन्त्र है बेटी ।उनका नाम उनसे भी अधिक शक्तिशाली है, यही तो अभी तक सुनते आये हैं ।" " वह कानों को प्रिय लगता है बाबोसा ! पर आँखें तो प्यासी रह जाती है ।"अनायास ही मीरा के मुख से निकल पड़ा पर बात का मर्म समझ में आते ही सकुचा गई और उसने दूदाजी की ओर पीठ फेर ली । "उसमें( भगवान के नाम में) इतनी शक्ति है किमें) आँखों की प्यास बुझाने वाले को भी खींच लाये ।"उसकी पीठ की ओर देखते हुये मुस्कुरा कर दूदाजी ने कहा । " जाऊँ बाबोसा ? " मीरा ने सकुचा कर पूछा । "हाँ , जाओ बेटी ।" जयमल ने आश्चर्य से पूछा ," बाबोसा ! जीजा ने यह क्या कहा और उन्हें लाज क्यों आई ?" " वह तुम्हारे क्षेत्र की बात नहीं है बेटा ।बात इतनी सी है कि भगवान के नाम में भगवान से भी अधिक शक्ति है और उस शक्ति का लाभ नाम लेने वाले को मिलता है ।" मीरा श्याम कुन्ज लौट आई और ठाकुर से निवेदन कर बोली ," कल गुरु पूर्णिमा है, अतः कल जो भी संत हमारे घर पधारेगें , वे ही प्रभु आपके द्वारा निर्धारित गुरू होंगे।" मीरा ने अपना तानपुरा उठाया और गाने लगी........... 🌿मोहि लागी लगन गुरु चरणन की । चरण बिना मोहे कछु नहिं भावे, जग माया सब सपनन की ॥ भवसागर सब सूख गयो है , फिकर नहीं मोही तरनन की ॥ मीरा के प्रभु गिरधर नागर , आस लगी गुरु सरनन की ॥ मोहे लागी लगन गुरू चरणन की🌿 क्रमशः ............✍🏻🙏🏻 *🔲🔮🔲🔮🔲🔮🔲🔮🔲*🔮

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Neha Sharma Sep 24, 2021

🌺🙏*भगवान् श्रीकृष्ण की वाणी – श्रीमद्भगवद्गीता*🙏🌺 🌺🙏*अध्याय - 05*🙏🌺 *इस अध्याय में सांख्ययोग, निष्काम कर्मयोग, ज्ञानयोग एवं भक्तिसहित ध्यानयोग का वर्णन..... *सम्बन्ध–गीता के तीसरे और चौथे अध्याय में अर्जुन ने भगवान् के श्रीमुख से अनेकों प्रकार से कर्मयोग की प्रशंसासुनी और उसके सम्पादन की प्रेरणा तथा आज्ञा प्राप्त की। साथ ही वह भी सुना कि ‘कर्मयोग के द्वारा भगवत्स्वरूप का तत्त्वज्ञान अपने-आप ही हो जाता है; गीता के चौथे अध्याय के अन्त में भी उन्हें भगवान् के द्वारा कर्मयोग के सम्पादन की ही आज्ञा मिली। परन्तु बीच-बीच में उन्होंने भवगान् के श्रीमुख से ही ‘ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हवि:’ ‘ब्रह्माग्रावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुहृति, ‘तद् विद्धि प्रणिपातेन’ आदि वचनों द्वारा ज्ञानयोग अर्थात् कर्मसंन्यास की भी प्रशंसा सुनी। इससे अर्जुन यह निर्णय नहीं कर सके कि इन दोनों में से मेरे लिये कौन-सा साधन श्रेष्ठ है। अतएव अब भगवान् के श्रीमुख से ही उसका निर्णय कराने के उद्देश्य से अर्जुन उनसे प्रश्न करते हैं- *अर्जुन बोले–हे कृष्ण! आप कर्मों के संन्यास की और फिर कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं। इसलिये इन दोनों में से जो एक मेरे लिये भलीभाँति निश्चित कल्याणकारक साधन हो, उसको कहिये *श्रीभगवान् बोले–कर्मसंन्यास और कर्मयोग- ये दोनों ही परम कल्याण के करने वाले हैं, परन्तु उन दोनों में भी कर्मसंन्यास से कर्मयोग साधन में सुगम होने से श्रेष्ठ है। *हे अर्जुन! जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह कर्मयोगी सदा संन्यासी ही समझने योग्य है; क्योंकि राग-द्वेषादि द्वन्द्वों से रहित पुरुष सुखपूर्वक संसार बंधन से मुक्त हो जाता है। *उपर्युक्त संन्यास और कर्मयोग को मूर्ख लोग पृथक्-पृथक् फल देने वाले कहते हैं न कि पण्डितजन, क्योंकि दोनों में से एक में भी सम्यक् प्रकार से स्थित पुरुष दोनों के फलरूप परमात्मा को प्राप्त होता है। *ज्ञानयोगियों द्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियों द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। इसलिये जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग को फलरूप में एक देखता है, वही यथार्थ देखता है। *परन्तु हे अर्जुन! कर्मयोग के बिना संन्यास अर्थात् मन, इन्द्रिय और शरीर द्वारा होने वाले सम्पूर्ण कर्मों में कर्तापन का त्याग प्राप्त होना कठिन है और भगवत्स्वरूप को मन करने वाला कर्मयोगी परब्रह्म परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है। *जिसका मन अपने वश में है, जो जितेन्द्रिय एवं विशुद्ध अन्त:करण वाला हैं और सम्पूर्ण प्राणियों का आत्मरूप परमात्मा ही जिसका आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता। *तत्त्व को जानने वाला सांख्ययोगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा आँखों को खोलता और मूंदता हुआ भी, सब इन्द्रियों अपने-अपने अर्थों में बरत रही हैं- इस प्रकार समझकर नि:सन्देह ऐसा माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ। *सम्बन्ध–इस प्रकार सांख्ययोगी के साधन का स्वरूप बतलाकर अब दसवें ओर ग्यारहवें श्लोकों में कर्मयोगियों के साधन का फलसहित स्वरूप बतलाते हैं- *जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर कर्म करता हैं, वह पुरुष जल से कमल के पत्ते की भाँति पाप से लिप्त नहीं होता। *कर्मयोगी ममत्व बुद्धि रहित केवल इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति को त्यागकर अन्त:करण की शुद्धि के लिये कर्म करते हैं। *कर्मयोगी कर्मों के फल का त्याग करके भगवत्प्राप्तिरूप शान्ति को प्राप्त होता है और सकाम पुरुष कामना की प्रेरणा से फल में आसक्त होकर बंधता हैं। *अन्त:करण जिसके वश में हैं, ऐसा सांख्ययोग का आचरण करने वाला पुरुष न करता हुआ और न करवाता हुआ ही नवद्वारों वाले शरीररूप घर में सब कर्मों को मन से त्यागकर आनन्दपूर्वक सच्चिदानन्दघन परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता हैं। *सम्बन्ध–जबकि आत्मा वास्तव में कर्म करने वाला भी नहीं है और इन्द्रियादि से करवाने वाला भी नहीं है, तो फिर सब मनुष्य अपने को कर्मों का कर्ता क्यों मानते हैं और वे कर्मफल के भागी क्यों होते हैं? इस पर कहते हैं- *परमेश्वर मनुष्यों के न तो कर्तापन की, न कर्मों की और न कर्मफल के संयोग की ही रचना करते हैं; किन्तु स्वभाव ही बर्त रहा है। *सम्बन्ध–जो साधक समस्त कर्मों को और कर्मफलों की भगवान् के अर्पण करके कर्मफल से अपना सम्बन्धविच्छेद कर लेते हैं, उनके शुभाशुभ कर्मों के फल के भागी क्या भगवान् होते हैं। इस जिज्ञासा पर कहते हैं- *सर्वव्यापी परमेश्वर भी न किसी के पापकर्म को और न किसी के शुभकर्म को ही ग्रहण करता है; किन्तु अज्ञान के द्वारा ज्ञान ढका हुआ है, उसी से सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं। *परन्तु जिनका वह अज्ञान परमात्मा के तत्त्वज्ञान द्वारा नष्ट कर दिया गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य के सदृश उस सच्चिदानन्दघन परमात्मा को प्रकाशित कर देता है। *सम्बन्ध–यथार्थ ज्ञान से परमात्मा की प्राप्ति होती हैं, यह बात संक्षेप में कहकर अब छब्बीसवें श्लोक तक ज्ञानयोग द्वारा परमात्मा को प्राप्त होने के साधन तथा परमात्मा को प्राप्त सिद्ध पुरुषों के लक्षण, आचरण, महत्त्व और स्थिति का वर्णन करने के उद्देश्य से पहले यहाँ ज्ञानयोग के एकान्त साधन द्वारा परमात्मा की प्राप्ति बतलाते हैं- *जिनका मन तद्रूप हो रहा है, जिनकी बुद्धि तद्रुप हो रही है और सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही जिनकी निरन्तर एकीभाव से स्थिति हैं, ऐसे तत्परायण पुरुष ज्ञान के द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्ति को अर्थात् परम गति को प्राप्त होते हैं। *वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्शी ही होते हैं। *जिनका मन समभाव में स्थित है, उनके द्वारा इस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया अर्थात् वे सदा के लिये जन्म-मरण से छूटकर जीवन् मुक्त हो गये; क्योंकि सच्चिदानंदघन परमात्मा निर्दोष और सम है, इससे वे सच्चिदानंदघन परमात्मा में ही स्थित हैं *जो पुरुष प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित नहीं हो और अप्रिय को प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, वह स्थिर बुद्धि संशयरहित ब्रह्मवेत्ता पुरुष सच्चिदानंदघन परब्रह्म परमात्मा में एकीभाव से नित्य स्थित है। *बाहर के विषयों में आसक्तिरहित अन्त:करण वाला साधक आत्मा में स्थित जो ध्यानजनित सात्त्विक आनन्द है, उसको प्राप्त होता है; तदनन्तर वह सच्चिदानंदधन परब्रह्म परमात्मा के ध्यानरूप योग में अभिन्नभाव से स्थित पुरुष अक्षय आनन्द का अनुभव करता है। *जो ये इन्द्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सब भोग हैं, वे यद्यपि विषयी पुरुषों को सुखरूप भासते हैं तो भी दु:ख ही हेतु हैं और आदि-अन्त वाले अर्थात् अनित्य हैं। इसलिये हे अर्जुन! बुद्धिमान् विवेकी पुरुष उनमें नहीं रमता। *जो साधक इस मनुष्य शरीर में शरीर का नाश होने से पहले-पहले ही काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही पुरुष योगी है और वही सुखी है। *सम्बन्ध–उपर्युक्त प्रकार से ब्रह्म विषयभोगों को क्षणिक और दु:खों का कारण समझकर तथा आसक्ति का त्याग करके जो काम-क्रोध पर विजय प्राप्त कर चुका है, अब ऐसे सांख्ययोगी की अन्तिम स्थिति का फलसहित वर्णन किया जाता है- *जो पुरुष अन्तरात्मा में ही सुख वाला है, आत्मा में ही रमण करने वाला है तथा जो आत्मा में ही ज्ञान वाला है, वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा के साथ एकीभाव को प्राप्त सांख्ययोगी शान्त ब्रह्म को प्राप्त होता है। *जिनके सब पाप नष्ट हो गये हैं, जिनके सब संशय ज्ञान के द्वारा निवृत्त हो गये हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चलभाव से परमात्मा में स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शान्त ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। *काम-क्रोध से रहित, जीते हुए चित्त वाले, परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार किये हुए ज्ञानी पुरुषों के लिये सब ओर से शान्त परब्रह्म परमात्मा ही परिपूर्ण हैं। *सम्बन्ध–कर्मयोग और सांख्ययोग- दोनों साधनों द्वारा परमात्मा की प्राप्ति और परमात्मा को प्राप्त महापुरुषों के लक्षण कहे गये। उक्त दोनों ही प्रकार के साधकों के लिये वैराग्यपूर्वक मन-इन्द्रियों को वश में करके ध्यानयोग का साधन करना उपयोगी है, अत: अब संक्षेप में फलसहित ध्यानयोग का वर्णन करते हैं- *बाहर के विषयभोगों को न चिन्तन करना हुआ बाहर ही निकालकर और नेत्रों की दृष्टि को भृकुटी के बीच में स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपानवायु को सम करके, जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि जीती हुई हैं- ऐसा जो मोक्षपरायण मुनि इच्छा, भय और क्रोध से रहित हो गया है, वह सदा मुक्त ही है। *सम्बन्ध–जो मनुष्य इस प्रकार मन, इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करके कर्मयोग, सांख्ययोग या ध्यानयोग का साध न करने में अपने को समर्थ नहीं समझता हो, ऐसे साधक के लिये सुगमता से परमपद की प्राप्ति कराने वाले भक्तियोग का संक्षेप में वर्णन करते हैं- *मेरा भक्त मुझको सब यज्ञ और तपों का भोगने वाला, सम्पूर्ण लोकों के ईश्वरों का भी ईश्वर तथा सम्पूर्ण भूतप्राणियों का सुहृद् अर्थात् स्वार्थरहित दयालु और प्रेमी, ऐसा तत्त्व से जानकर शांति को प्राप्त होता है। ० ० ० *इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गतापर्व के अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्र रूप श्रीमद्भगवतद्गीतोपनिषद्, श्रीकृष्णार्जुन संवाद में कर्मसंन्यासयोग नामक पांचवा अध्याय पूरा हुआ॥५॥ ----------:::×:::---------- "जय जय श्रीहरि" 🌺🙏🌺🙏🌺 *************************************************

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Neha Sharma Sep 24, 2021

*सिर्फ दुनिया के सामने जीतने वाला ही विजेता नहीं होता...... किन रिश्तों के सामने कब और कहाँ हारना है, यह जानने वाला भी विजेता होता है...!!*🌺🙏ॐ श्री गणेशाय नमः*🙏*जय माता की*🙏*जय श्री राधेकृष्णा*🙏*शुभ प्रभात् नमन*🙏🌺 *अग्निदेव कौन हैं,और क्या है इनकी पौराणिक कथा?????? *अग्निदेवता यज्ञ के प्रधान अंग हैं। ये सर्वत्र प्रकाश करने वाले एवं सभी पुरुषार्थों को प्रदान करने वाले हैं। सभी रत्न अग्नि से उत्पन्न होते हैं और सभी रत्नों को यही धारण करते हैं। वेदों में सर्वप्रथम ऋग्वेद का नाम आता है और उसमें प्रथम शब्द अग्नि ही प्राप्त होता है। अत: यह कहा जा सकता है कि विश्व-साहित्य का प्रथम शब्द अग्नि ही है। ऐतरेय ब्राह्मण आदि ब्राह्मण ग्रन्थों में यह बार-बार कहा गया है कि देवताओं में प्रथम स्थान अग्नि का है। आचार्य यास्क और सायणाचार्य ऋग्वेद के प्रारम्भ में अग्नि की स्तुति का कारण यह बतलाते हैं कि अग्नि ही देवताओं में अग्रणी हैं और सबसे आगे-आगे चलते हैं। युद्ध में सेनापति का काम करते हैं इन्हीं को आगे कर युद्ध करके देवताओं ने असुरों को परास्त किया था। पुराणों के अनुसार इनकी पत्नी स्वाहा हैं। ये सब देवताओं के मुख हैं और इनमें जो आहुति दी जाती है, वह इन्हीं के द्वारा देवताओं तक पहुँचती है। केवल ऋग्वेद में अग्नि के दो सौ सूक्त प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में भी इनकी स्तुतियाँ प्राप्त होती हैं। ऋग्वेद के प्रथम सूक्त में अग्नि की प्रार्थना करते हुए विश्वामित्र के पुत्र मधुच्छन्दा कहते हैं कि मैं सर्वप्रथम अग्निदेवता की स्तुति करता हूँ, जो सभी यज्ञों के पुरोहित कहे गये हैं। पुरोहित राजा का सर्वप्रथम आचार्य होता है और वह उसके समस्त अभीष्ट को सिद्ध करता है। उसी प्रकार अग्निदेव भी यजमान की समस्त कामनाओं को पूर्ण करते हैं। अग्निदेव की सात जिह्वाएँ बतायी गयी हैं। उन जिह्वाओं के नाम : - काली,कराली, मनोजवा, सुलोहिता,धूम्रवर्णी, स्फुलिंगी तथा विश्वरुचि हैं। पुराणों के अनुसार अग्निदेव की पत्नी स्वाहा के पावक, पवमान और शुचि नामक तीन पुत्र हुए। इनके पुत्र-पौत्रों की संख्या उनंचास है। भगवान कार्तिकेय को अग्निदेवता का भी पुत्र माना गया है। स्वारोचिष नामक द्वितीय स्थान पर परिगणित हैं। ये आग्नेय कोण के अधिपति हैं। अग्नि नामक प्रसिद्ध पुराण के ये ही वक्ता हैं। प्रभास क्षेत्र में सरस्वती नदी के तट पर इनका मुख्य तीर्थ है। इन्हीं के समीप भगवान कार्तिकेय, श्राद्धदेव तथा गौओं के भी तीर्थ हैं। अग्निदेव की कृपा के पुराणों में अनेक दृष्टान्त प्राप्त होते हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं। महर्षि वेद के शिष्य उत्तंक ने अपनी शिक्षा पूर्ण होने पर आचार्य दम्पति से गुरु दक्षिणा माँगने का निवेदन किया। गुरु पत्नी ने उनसे महाराज पौष्य की पत्नी का कुण्डल माँगा। उत्तंक ने महाराज के पास पहुँचकर उनकी आज्ञा से महारानी से कुण्डल प्राप्त किया। रानी ने कुण्डल देकर उन्हें सतर्क किया कि आप इन कुण्डलों को सावधानी से ले जाइयेगा, नहीं तो तक्षक नाग कुण्डल आप से छीन लेगा। मार्ग में जब उत्तंक एक जलाशय के किनारे कुण्डलों को रखकर सन्ध्या करने लगे तो तक्षक कुण्डलों को लेकर पाताल में चला गया। अग्निदेव की कृपा से ही उत्तंक दुबारा कुण्डल प्राप्त करके गुरु पत्नी को प्रदान कर पाये थे। अग्निदेव ने ही अपनी ब्रह्मचारी भक्त उपकोशल को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया था। अग्नि की प्रार्थना उपासना से यजमान धन, धान्य, पशु आदि समृद्धि प्राप्त करता है। उसकी शक्ति, प्रतिष्ठा एवं परिवार आदि की वृद्धि होती है। अग्निदेव का बीजमन्त्र रं तथा मुख्य मन्त्र रं वह्निचैतन्याय नम: है। ऋग्वेद के अनुसार,अग्निदेव अपने यजमान पर वैसे ही कृपा करते हैं, जैसे राजा सर्वगुणसम्पन्न वीर पुरुष का सम्मान करता है। एक बार अग्नि अपने हाथों में अन्न धारण करके गुफा में बैठ गए। अत: सब देवता बहुत भयभीत हुए। अमर देवताओं ने अग्नि का महत्व ठीक से नहीं पहचाना था। वे थके पैरों से चलते हुए ध्यान में लगे हुए अग्नि के पास पहुँचे। मरुतों ने तीन वर्षों तक अग्नि की स्तुति की। अंगिरा ने मंत्रों द्वारा अग्नि की स्तुति तथा पणि नामक असुर को नाद से ही नष्ट कर डाला। देवताओं ने जांघ के बल बैठकर अग्निदेव की पूजा की। अंगिरा ने यज्ञाग्नि धारण करके अग्नि को ही साधना का लक्ष्य बनाया। तदनन्तर आकाश में ज्योतिस्वरूप सूर्य और ध्वजस्वरूप किरणों की प्राप्ति हुई। देवताओं ने अग्नि में अवस्थित इक्कीस गूढ़ पद प्राप्त कर अपनी रक्षा की।[3] अग्नि और सोम ने युद्ध में बृसय की सन्तान नष्ट कर डाली तथा पणि की गौएं हर लीं।[4] अग्नि के अश्वों का नाम रोहित तथा रथ का नाम धूमकेतु है।[5] महाभारत के अनुसार : - देवताओं को जब पार्वती से शाप मिला था कि वे सब सन्तानहीन रहेंगे, तब अग्निदेव वहाँ पर नहीं थे। कालान्तर में विद्रोहियों को मारने के लिए किसी देवपुत्र की आवश्यकता हुई। अत: देवताओं ने अग्नि की खोज आरम्भ की। अग्निदेव जल में छिपे हुए थे। मेढ़क ने उनका निवास स्थान देवताओं को बताया। अत: अग्निदेव ने रुष्ट होकर उसे जिह्वा न होने का शाप दिया। देवताओं ने कहा कि वह फिर भी बोल पायेगा। अग्निदेव किसी दूसरी जगह पर जाकर छिप गए। हाथी ने देवताओं से कहा-अश्वत्थ (सूर्य का एक नाम) अग्नि रूप है। अग्नि ने उसे भी उल्टी जिह्वा वाला कर दिया। इसी प्रकार तोते ने शमी में छिपे अग्नि का पता बताया तो वह भी शापवश उल्टी जिह्वा वाला हो गया। शमी में देवताओं ने अग्नि के दर्शन करके तारक के वध के निमित्त पुत्र उत्पन्न करने को कहा। अग्नि देव शिव के वीर्य का गंगा में आधान करके कार्तिकेय के जन्म के निमित्त बने। भृगु पत्नी पुलोमा का पहले राक्षस पुलोमन से विवाह हुआ था। जब भृगु अनुपस्थित थे, वह पुलोमा को लेने आया तो उसने यज्ञाग्नि से कहा कि वह उसकी है या भृगु की भार्या। उसने उत्तर दिया कि यह सत्य है कि उसका प्रथम वरण उसने (राक्षस) ही किया था, लेकिन अब वह भृगु की पत्नी है। जब पुलोमन उसे बलपूर्वक ले जा रहा था, उसके गर्भ से 'च्यवन' गिर गए और पुलोमन भस्म हो गया। उसके अश्रुओं से ब्रह्मा ने 'वसुधारा नदी' का निर्माण किया। भृगु ने अग्नि को शाप दिया कि तू हर पदार्थ का भक्षण करेगी। शाप से पीड़ित अग्नि ने यज्ञ आहुतियों से अपने को विलग कर लिया, जिससे प्राणियों में हताशा व्याप्त हो गई। ब्रह्मा ने उसे आश्वासन दिया कि वह पूर्ववत् पवित्र मानी जाएगी। सिर्फ़ मांसाहारी जीवों की उदरस्थ पाचक अग्नि को छोड़कर उसकी लपटें सर्व भक्षण में समर्थ होंगी। अंगिरस ने अग्नि से अनुनय किया था कि वह उसे अपना प्रथम पुत्र घोषित करें, क्योंकि ब्रह्मा द्वारा नई अग्नि स्रजित करने का भ्रम फैल गया था। अंगिरस से लेकर बृहस्पति के माध्यम से अन्य ऋषिगण अग्नि से संबद्ध रहे हैं। हरिवंश पुराण के अनुसार ,असुरों के द्वारा देवताओं की पराजय को देखकर अग्नि ने असुरों को मार डालने का निश्चय किया। वे स्वर्गलोक तक फैली हुई ज्वाला से दानवों की दग्ध करने लगे। मय तथा शंबरासुर ने माया द्वारा वर्षा करके अग्नि को मंद करने का प्रयास किया, किन्तु बृहस्पति ने उनकी आराधना करके उन्हें तेजस्वी रहने की प्रेरणा दी। फलत: असुरों की माया नष्ट हो गई। जातवेदस् नामक अग्नि का एक भाई था। वह हव्यवाहक (यज्ञ-सामग्री लाने वाला) था। दिति-पुत्र (मधु) ने देवताओं के देखते-देखते ही उसे मार डाला। अग्नि गंगाजल में आ छिपा। देवता जड़वत् हो गए। अग्नि के बिना जीना कठिन लगा तो वे सब उसे खोजते हुए गंगाजल में पहुँचे। अग्नि ने कहा, भाई की रक्षा नहीं हुई, मेरी होगी, यह कैसे सम्भव है? देवताओं ने उसे यज्ञ में भाग देना आरम्भ किया। अग्नि ने पूर्ववत् स्वर्गलोक तथा भूलोक में निवास आरम्भ कर दिया। देवताओं ने जहाँ अग्नि प्रतिष्ठा की, वह स्थान अग्नितीर्थ कहलाया। दक्ष की कन्या (स्वाहा) का विवाह अग्नि (हव्यवाहक) से हुआ। बहुत समय तक वह नि:सन्तान रही। उन्हीं दिनों तारक से त्रस्त देवताओं ने अग्नि को सन्देशवाहक बनाकर शिव के पास भेजा। शिव से देवता ऐसा वीर पुत्र चाहते थे, जो कि तारक का वध कर सके। पत्नी के पास जाने में संकोच करने वाले अग्नि ने तोते का रूप धारण किया और एकान्तविलासी शिव-पार्वती की खिड़की पर जा बैठा। शिव ने उसे देखते ही पहचान लिया तथा उसके बिना बताये ही देवताओं की इच्छा जानकर शिव ने उसके मुँह में सारा वीर्य उड़ेल दिया। शुक (अग्नि) इतने वीर्य को नहीं सम्भाल पाए। उसने वह गंगा के किनारे कृत्तिकाओं में डाल दिया, जिनसे कार्तिकेय का जन्म हुआ। थोड़ा-सा बचा हुआ वीर्य वह पत्नी के पास ले गया। उसे दो भागों में बाँटकर स्वाहा को प्रदान किया, अत: उसने (स्वाहा ने) दो शिशुओं को जन्म दिया। पुत्र का नाम सुवर्ण तथा कन्या का नाम सुवर्णा रखा गया। मिश्र वीर्य सन्तान होने के कारण वे दोनों व्यभिचार दोष से दूषित हो गए। सुवर्णा असुरों की प्रियाओं का रूप बनाकर असुरों के साथ घूमती थी तथा सुवर्ण देवताओं का रूप धारण करके उनकी पत्नियों को ठगता था। सुर तथा असुरों को ज्ञात हुआ तो उन्होंने दोनों को सर्वगामी होने का शाप दिया। ब्रह्मा के आदेश पर अग्नि ने गोमती नदी के तट पर, शिवाराधना से शिव को प्रसन्न कर दोनों को शापमुक्त करवाया। वह स्थान तपोवन कहलाया। *जय-जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌺🌺

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Neha Sharma Sep 24, 2021

. श्रीगरुड़ पुराण (सारोद्धार) अध्याय - 05 इस अध्याय में:- (कर्मविपाक वश मनुष्य को अनेक योनियों और विविध रोगों की प्राप्ति) गरुड़ जी ने कहा, 'हे केशव ! जिस-जिस पाप से जो-जो चिह्न प्राप्त होते हैं और जिन-जिन योनियों में जीव जाते हैं, वह मुझे बताइए। श्रीभगवान ने कहा, 'नरक से आये हुए पापी जिन पापों के द्वारा जिस योनि में आते हैं और जिस पाप से जो चिह्न होता है, वह मुझसे सुनो। ब्रह्महत्यारा क्षय रोगी होता है, गाय की हत्या करने वाला मूर्ख और कुबड़ा होता है। कन्या की हत्या करने वाला कोढ़ी होता है और ये तीनों पापी चाण्डाल योनि प्राप्त करते हैं। स्त्री की हत्या करने वाला तथा गर्भपात कराने वाला पुलिन्द(भिल्ल) होकर रोगी होता है। परस्त्रीगमन करने वाला नपुंसक और गुरु पत्नी के साथ व्यभिचार करने वाला चर्म रोगी होता है। मांस का भोजन करने वाले का अंग अत्यन्त लाल होता है, मद्य पीने वाले के दाँत काले होते हैं, लालचवश अभक्ष्य भक्षण करने वाले ब्राह्मण को महोदर रोग होता है। जो दूसरे को दिये बिना मिष्टान्न खाता है, उसे गले में गण्डमाला रोग होता है, श्राद्ध में अपवित्र अन्न देने वाला श्वेतकुष्ठी होता है। गर्व से गुरु का अपमान करने वाला मनुष्य मिरगी का रोगी होता है। वेदशास्त्र की निन्दा करने वाला निश्चित ही पाण्डुरोगी होता है। झूठी गवाही देने वाला गूँगा, पंक्तिभेद करने वाला काना, विवाह में विघ्न करने वाला व्यक्ति ओष्ठ रहित और पुस्तक चुराने वाला जन्मान्ध होता है। गाय और ब्राह्मण को पैर से मारने वाला लूला-लंगड़ा होता है, झूठ बोलने वाला हकलाकर बोलता है तथा झूठी बात सुनने वाला बहरा होता है। विष देने वाला मूर्ख और उन्मत्त (पागल) तथा आग लगाने वाला खल्वाट (गंजा) होता है। पल (माँस) बेचने वाला अभागा और दूसरे का मांस खाने वाला रोगी होता है। रत्नों का अपहरण करने वाला हीन जाति में उत्पन्न होता है, सोना चुराने वाला नखरोगी और अन्य धातुओं को चुराने वाला निर्धन होता है। अन्न चुराने वाला चूहा और धान चुराने वाला शलभ (टिड्डी) होता है। जल की चोरी करने वाला चातक और विष का व्यवहार करने वाला वृश्चिक (बिच्छू) होता है। शाक-पात चुराने वाला मयूर होता है, शुभ गन्धवाली वस्तुओं को चुराने वाला छुछुन्दरी होता है, मधु चुराने वाला डाँस, मांस चुराने वाला गीध और नमक चुराने वाला चींटी होता है। ताम्बूल, फल तथा पुष्प आदि की चोरी करने वाला वन में बंदर होता है। जूता, घास तथा कपास को चुराने वाला भेड़ योनि में उत्पन्न होता है। जो रौद्र कर्मों (क्रूरकर्मों) से आजीविका चलाने वाला है, मार्ग में यात्रियों को लूटता है और जो आखेट का व्यसन रखने वाला, वह कसाई के घर का बकरा होता है। विष पीकर मरने वाला पर्वत पर काला नाग होता है। जिसका स्वभाव अमर्यादित है, वह निर्जन वन में हाथी होता है। बलिवैश्वदेव न करने वाले तथा सब कुछ खा लेने वाले द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) और बिना परीक्षण किये भोजन कर लेने वाले व्यक्ति निर्जन वन में व्याघ्र होते हैं। जो ब्राह्मण गायत्री का स्मरण नहीं करता और जो संध्योपासना नहीं करता, जिसका अन्त:स्वरुप दूषित तथा बाह्य स्वरूप साधु की तरह प्रतीत होता है, वह ब्राह्मण बगुला होता है। जिनको यज्ञ नहीं करना चाहिए, उनके यहाँ यज्ञ कराने वाला ब्राह्मण गाँव का सूअर होता है, क्षमता से अधिक यज्ञ कराने वाला गर्दभ तथा बिना आमंत्रण के भोजन करने वाला कौआ होता है। जो सत्पात्र शिष्य को विद्या नहीं प्रदान करता, वह ब्राह्मण बैल होता है। गुरु की सेवा न करने वाला शिष्य बैल और गधा होता है। गुरु के प्रति अपमान के तात्पर्य से हुं या तुं शब्दों का उच्चारण करने वाला और वाद-विवादों में ब्राह्मण को पराजित करने वाला जल विहीन अरण्य में ब्रह्म राक्षस होता है। प्रतिज्ञा करके द्विज को दान न देनेवाला सियार होता है। सत्पुरुषों का अनादर करने वाला व्यक्ति अग्निमुख सियार होता है। मित्र से द्रोह करने वाला पर्वत का गीध होता है और क्रय में धोखा देने वाला उल्लू होता है। वर्णाश्रम की निन्दा करने वाला वन में कपोत होता है। आशा को तोड़ने वाला और स्नेह को नष्ट करने वाला, द्वेष वश स्त्री का परित्याग कर देने वाला बहुत काल तक चक्रवाक (चकोर) होता है। माता-पिता, गुरु से द्वेष करने वाला तथा बहन और भाई से शत्रुता करने वाला हजारों जन्मों तक गर्भ में या योनि में नष्ट होता रहता है। सास-ससुर को अपशब्द कहने वाली स्त्री तथा नित्य कलह करने वाली स्त्री जलौका अर्थात जल जोंक होती है और पति की भर्त्सना करने वाली नारी जूँ होती है। अपने पति का परित्याग करके परपुरुष का सेवन करने वाली स्त्री वल्गुनी (चमगादड़ी), छिपकली अथवा दो मुँह वाली सर्पिणी होती है। सगोत्र की स्त्री के साथ संबंध बनाकर अपने गोत्र को विनष्ट करने वाला तरक्ष (लकड़बग्घा) और शल्लक(साही) होकर रीछ योनि में जन्म लेता है। तापसी के साथ व्यभिचार करने वाला कामी पुरुष मरु प्रदेश में पिशाच होता है और अप्राप्त यौवन से संबंध करने वाला वन में अजगर होता है। गुरु पत्नी के साथ गमन की इच्छा रखने वाला मनुष्य कृकलास (गिरगिट) होता है। राजपत्नी के साथ गमन करने वाला ऊँट तथा मित्र की पत्नी के साथ गमन करने वाला गधा होता है। गुदा गमन करने वाला विष्ठा भोगी सूअर तथा शूद्रागामी बैल होता है। जो महाकामी होता है, वह काम लम्पट घोड़ा होता है। किसी के मरणाशौच में एकादशाह तक भोजन करने वाला कुत्ता होता है। देवद्रव्य भोक्ता देवलक ब्राह्मण मुर्गे की योनि प्राप्त करता है। जो ब्राह्मण द्रव्यार्जन के लिये देवता की पूजा करता है, वह देवलक कहलाता है। वह देवकार्य तथा पितृकार्य के लिये निन्दनीय है। महापातक से प्राप्त अत्यन्त घोर एवं दारुण नरकों का भोग प्राप्त करके महापातकी व्यक्ति कर्म के क्षय होने पर पुन: इस मर्त्य लोक में जन्म लेते हैं। ब्रह्महत्यारा गधा, ऊँट और महिषी की योनि प्राप्त करता है तथा सुरापान करने वाला भेड़िया, कुत्ता एवं सियार की योनि में जाते हैं। स्वर्ण चुराने वाला कृमि, कीट तथा पतंग कि योनि प्राप्त करता है। गुरु पत्नी के साथ गमन करने वाला क्रमश: तृण, गुल्म तथा लता होता है। परस्त्री का हरण करने वाला, धरोहर का हरण करने वाला तथा ब्राह्मण के धन का अपहरण करने वाला ब्रह्मराक्षस होता है। ब्राह्मण का धन कपट-स्नेह से खानेवाला सात पीढ़ियों तक अपने कुल का विनाश करता है और बलात्कार तथा चोरी के द्वारा खाने पर जब तक चन्द्रमा और तारकों की स्थिति होती है, तब तक वह अपने कुल को जलाता है। लोहे और पत्थरों के चूर्ण तथा विष को व्यक्ति पचा सकता है, पर तीनों लोकों में ऎसा कौन व्यक्ति है, जो ब्रह्मस्व (ब्राह्मण के धन) को पचा सकता है? ब्राह्मण के धन से पोषित की गयी सेना तथा वाहन युद्ध काल में बालू से बने सेतु, 'बाँध के समान नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं। देवद्रव्य का उपभोग करने से अथवा ब्रह्मस्वरुप का हरण करने से ब्राह्मण का अतिक्रमण करने से कुल पतित हो जाते हैं। अपने आश्रित वेद परायण ब्राह्मण को छोड़कर अन्य ब्राह्मण को दान देना ब्राह्मण का अतिक्रमण करना कहलाता है। वेदवेदांग के ज्ञान से रहित ब्राह्मण को छोड़ना अतिक्रमण नहीं कहलाता है, क्योंकि जलती हुई आग को छोड़कर भस्म में आहुति नहीं दी जाती। 'हे तार्क्ष्य! ब्राह्मण का अतिक्रमण करने वाला व्यक्ति नरकों को भोगकर क्रमश: जन्मान्ध एवं दरिद्र होता है, वह कभी दाता नहीं बन सकता अपितु याचक ही रहता है। अपने द्वारा दी हुई अथवा दूसरे द्वारा दी गई पृथ्वी को जो छीन लेता है, वह साठ हजार वर्षों तक विष्ठा का कीड़ा होता है। जो स्वयं कुछ देकर पुन: स्वयं ले भी लेता है, वह पापी एक कल्प तक नरक में रहता है। जीविका अथवा भूमि का दान देकर यत्नपूर्वक उसकी रक्षा करनी चाहिए, जो रक्षा नहीं करता प्रत्युत उसे हर लेता है, वह पंगु अर्थात लंगड़ा कुता होता है। ब्राह्मण को आजीविका देने वाला व्यक्ति एक लाख गोदान का फल प्राप्त करता है और ब्राह्मण की वृत्तिका हरण करने वाला बन्दर, कुत्ता तथा लंगूर होता है। 'हे खगेश्वर! प्राणियों को अपने कर्म के अनुसार लोक में पूर्वोक्त योनियाँ तथा शरीर पर चिह्न देखने को मिलते हैं। इस प्रकार दुष्कर्म करने वाले जीव नारकीय यातनाओं को भोगकर अवशिष्ट पापों को भोगने के लिये इन पूर्वोक्त योनियों में जाते हैं। इसके बाद हजारों जन्मों तक तिर्यक (पशु-पक्षी) का शरीर प्राप्त करके वे बोझा ढोने आदि कार्यों से दु:ख प्राप्त करते हैं। फिर पक्षी बनकर वर्षा, शीत तथा आतप से दु:खी होते हैं। इसके बाद अन्त में जब पुण्य और पाप बराबर हो जाते हैं तब मनुष्य की योनि मिलती है। स्त्री-पुरुष के संबंध से वह गर्भ में उत्पन्न होकर क्रमश: गर्भ से लेकर मृत्यु तक के दु:ख प्राप्त करके पुन: मर जाता है। इस प्रकार सभी प्राणियों का जन्म और विनाश होता है। यह जन्म-मरण का चक्र चारों प्रकार की सृष्टि में चलता रहता है। मेरी माया से प्राणी रहट (घटी यन्त्र) की भाँति ऊपर-नीचे की योनियों में भ्रमण करते रहते हैं। कर्मपाश बँधे रहकर कभी वे नरक में और कभी भूमि पर जन्म लेते हैं। दान न देने से प्राणी दरिद्र होता है। दरिद्र हो जाने पर फिर पाप करता है। पाप के प्रभाव से नरक में जाता है और नरक से लौटकर पुन: दरिद्र और पुन: पापी होता है। प्राणी के द्वारा किये गये शुभ और अशुभ कर्मों का फल भोग उसे अवश्य ही भोगना पड़ता है, क्योंकि सैकड़ों कल्पों के बीत जाने पर भी बिना भोग के कर्म फल का नाश नहीं होता। *(इस प्रकार गरुड़ पुराण के अन्तर्गत सारोद्धार में “पापचिह्ननिरुपण” नामक पाँचवां अध्याय पूर्ण हुआ) ----------:::×:::---------- "जय जय श्रीहरि" 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