Neha Sharma May 3, 2022

🌷 *अक्षय फलदायी “अक्षय तृतीया”* 🌷 ➡*आज 03 मई 2022 मंगलवार को अक्षय तृतीया है ।* 🙏🏻 *वैशाख शुक्ल तृतीया की महिमा मत्स्य, स्कंद, भविष्य, नारद पुराणों व महाभारत आदि ग्रंथो में है । इस दिन किये गये पुण्यकर्म अक्षय (जिसका क्षय न हो) व अनंत फलदायी होते हैं, अत: इसे 'अक्षय तृतीया' कहते है । यह सर्व सौभाग्यप्रद है ।* 🙏🏻 *यह युगादि तिथि यानी सतयुग व त्रेतायुग की प्रारम्भ तिथि है । श्रीविष्णु का नर-नारायण, हयग्रीव और परशुरामजी के रूप में अवतरण व महाभारत युद्ध का अंत इसी तिथि को हुआ था ।* 👉🏻 *इस दिन बिना कोई शुभ मुहूर्त देखे कोई भी शुभ कार्य प्रारम्भ या सम्पन्न किया जा सकता है । जैसे - विवाह, गृह - प्रवेश या वस्त्र -आभूषण, घर, वाहन, भूखंड आदि की खरीददारी, कृषिकार्य का प्रारम्भ आदि सुख-समृद्धि प्रदायक है ।* 🌷 *प्रात:स्नान, पूजन, हवन का महत्त्व* 🌷 🙏🏻 *इस दिन गंगा-स्नान करने से सारे तीर्थ करने का फल मिलता है । गंगाजी का सुमिरन एवं जल में आवाहन करके ब्राम्हमुहूर्त में पुण्यस्नान तो सभी कर सकते है । स्नान के पश्चात् प्रार्थना करें :* 🌷 *माधवे मेषगे भानौं मुरारे मधुसुदन ।* *प्रात: स्नानेन में नाथ फलद: पापहा भव ॥* 🙏🏻 *'हे मुरारे ! हे मधुसुदन ! वैशाख मास में मेष के सूर्य में हे नाथ ! इस प्रात: स्नान से मुझे फल देनेवाले हो जाओ और पापों का नाश करों ।'* 👉🏻 *सप्तधान्य उबटन व गोझरण मिश्रित जल से स्नान पुण्यदायी है । पुष्प, धूप-दीप, चंदनम अक्षत (साबुत चावल) आदि से लक्ष्मी-नारायण का पूजन व अक्षत से हवन अक्षय फलदायी है ।* 🌷 *जप, उपवास व दान का महत्त्व* 🌷 🙏🏻 *इस दिन किया गया उपवास, जप, ध्यान, स्वाध्याय भी अक्षय फलदायी होता है । एक बार हल्का भोजन करके भी उपवास कर सकते है । 'भविष्य पुराण' में आता है कि इस दिन दिया गया दान अक्षय हो जाता है । इस दिन पानी के घड़े, पंखे, (खांड के लड्डू), पादत्राण (जूते-चप्पल), छाता, जौ, गेहूँ, चावल, गौ, वस्त्र आदि का दान पुण्यदायी है । परंतु दान सुपात्र को ही देना चाहिए ।* 🌷 *पितृ-तर्पण का महत्त्व व विधि* 🌷 🙏🏻 *इस दिन पितृ-तर्पण करना अक्षय फलदायी है । पितरों के तृप्त होने पर घर में सुख-शांति-समृद्धि व दिव्य संताने आती है ।* 💥 *विधि : इस दिन तिल एवं अक्षत लेकर र्विष्णु एवं ब्रम्हाजी को तत्त्वरूप से पधारने की प्रार्थना करें । फिर पूर्वजों का मानसिक आवाहन कर उनके चरणों में तिल, अक्षत व जल अर्पित करने की भावना करते हुए धीरे से सामग्री किसी पात्र में छोड़ दें तथा भगवान दत्तात्रेय, ब्रम्हाजी व विष्णुजी से पूर्वजों की सदगति हेतु प्रार्थना करें ।* 🌷 *आशीर्वाद पाने का दिन* 🌷 🙏🏻 *इस दिन माता-पिता, गुरुजनों की सेवा कर उनकी विशेष प्रसन्नता, संतुष्टि व आशीर्वाद प्राप्त करें । इसका फल भी अक्षय होता है ।* 🌷 *अक्षय तृतीया का तात्त्विक संदेश* 🌷 🙏🏻 *'अक्षय' यानी जिसका कभी नाश न हो । शरीर एवं संसार की समस्त वस्तुएँ नाशवान है, अविनाशी तो केवल परमात्मा ही है । यह दिन हमें आत्म विवेचन की प्रेरणा देता है । अक्षय आत्मतत्त्व पर दृष्टी रखने का दृष्टिकोण देता है । महापुरुषों व धर्म के प्रति हमारी श्रद्धा और परमात्म प्राप्ति का हमारा संकल्प अटूट व अक्षय हो - यही अक्षय तृतीया का संदेश मान सकते 🌷 *अक्षय तृतीया* 🌷 🙏🏻 *'अक्षय' शब्द का मतलब है- जिसका क्षय या नाश न हो। इस दिन किया हुआ जप, तप, ज्ञान तथा दान अक्षय फल देने वाला होता है अतः इसे 'अक्षय तृतीया' कहते हैं। भविष्यपुराण, मत्स्यपुराण, पद्मपुराण, विष्णुधर्मोत्तर पुराण, स्कन्दपुराण में इस तिथि का विशेष उल्लेख है। इस दिन जो भी शुभ कार्य किए जाते हैं, उनका बड़ा ही श्रेष्ठ फल मिलता है। इस दिन सभी देवताओं व पित्तरों का पूजन किया जाता है। पित्तरों का श्राद्ध कर धर्मघट दान किए जाने का उल्लेख शास्त्रों में है। वैशाख मास भगवान विष्णु को अतिप्रिय है अतः विशेषतः विष्णु जी की पूजा करें।* 🙏🏻 *स्कन्दपुराण के अनुसार, जो मनुष्य अक्षय तृतीया को सूर्योदय काल में प्रातः स्नान करते हैं और भगवान विष्णु की पूजा करके कथा सुनते हैं, वे मोक्ष के भागी होते हैं। जो उस दिन मधुसूदन की प्रसन्नता के लिए दान करते हैं, उनका वह पुण्यकर्म भगवान की आज्ञा से अक्षय फल देता है।* 🙏🏻 *भविष्यपुराण के मध्यमपर्व में कहा गया है वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया में गंगाजी में स्नान करनेवाला सब पापों से मुक्त हो जाता है | वैशाख मास की तृतीया स्वाती नक्षत्र और माघ की तृतीया रोहिणीयुक्त हो तथा आश्विन तृतीया वृषराशि से युक्त हो तो उसमें जो भी दान दिया जाता है, वह अक्षय होता है | विशेषरूप से इनमें हविष्यान्न एवं मोदक देनेसे अधिक लाभ होता है तथा गुड़ और कर्पूर से युक्त जलदान करनेवाले की विद्वान् पुरुष अधिक प्रंशसा करते हैं, वह मनुष्य ब्रह्मलोक में पूजित होता है | यदि बुधवार और श्रवण से युक्त तृतीया हो तो उसमें स्नान और उपवास करनेसे अनंत फल प्राप्त होता हैं |* 🌷 *अस्यां तिथौ क्षयमुर्पति हुतं न दत्तं ।* *तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया ।* *उद्दिश्य दैवतपितृन्क्रियते मनुष्यै: ।* *तत् च अक्षयं भवति भारत सर्वमेव ।। – मदनरत्न* 🙏🏻 *अर्थ : भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठरसे कहते हैं, हे राजन इस तिथि पर किए गए दान व हवन का क्षय नहीं होता है; इसलिए हमारे ऋषि-मुनियोंने इसे ‘अक्षय तृतीया’ कहा है । इस तिथि पर भगवानकी कृपादृष्टि पाने एवं पितरोंकी गतिके लिए की गई विधियां अक्षय-अविनाशी होती हैं ।* *बधाई संदेश*...🙇🏻‍♂🙇🏻‍♂ 🌸अक्षय रहे *सुख* आपका,🌸 😊अक्षय रहे *धन* आपका,💰 💗अक्षय रहे *प्रेम* आपका. 💗 अक्षय रहे *स्वास्थ* आपका, अक्षय रहे *रिश्ता* हमारा ! *अक्षय तृतीया पर हमारी तरफ से, *आप व आप सभी भाई-बहनों के परिवार को 💐 🙏*हार्दिक शुभकामनाएं*💐 *🙏🏻🌹*जय-जय श्री राधेश्याम*🌹🙏🏻* *🙇🌺*जय-जय श्री राधेकृष्णा*🌺🙇*

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Neha Sharma Apr 22, 2022

🌹🍀🌹 सत्संग का लाभ 🌹🍀🌹 🍁जीवन मे जब भगवान की हम पर विशेष कृपा होती है, तब हमें, हमारे कल्याण के लिए कोई न कोई सत्संगी व्यक्ति मिलता है ।और भगवान की ही कृपा से उस सत्संगी पुरुष के कारण हमारा जीवन ही बदल जाता है। श्री कृष्ण नाम ही भवसागर की नैया है। 🍁 🌷🍀 एक भंवरा हर रोज फूलों के एक बाग के पास से गुजरता है वहा एक गन्दा नाला बहता है और उस नाले में एक कीड़ा रहता हैं। .एक दिन उस भँवरे की नजर कीड़े पे पड़ी और उसने सोचा ये कीड़ा कैसे इस नाले में रहता है। .भँवरे ने कीड़े से पूछा तुम इस गन्दी जगह में कैसे रहते हो। कीड़ा बोला ये मेरा घर है। .भँवरे ने कीड़े से कहा चलो मैं तुम्हे स्वर्ग की सैर करवाता हूं। तुम मे्रे साथ चलो और मुझ से दोस्ती कर लो। .भँवरे ने कहा मैं कल आऊंगा तब तुम मेरे साथ चलना। .अगले दिन भँवरा कीड़े को अपने कंधे पर बिठाकर बाग में ले जाता है और कीड़े को एक फूल पर बिठाकर खुद फूलो का रस चूसने चला जाता है। .वह शाम को कीड़े को ले जाना भूल जाता है। .जिस फूल में कीड़ा बैठा था वो फूल शाम को बंद हो जाता हैं। कीड़ा भी उसी में बंद हो जाता है। .अगले दिन माली फूल तोड़ता है और फूलो की माला बना कर बिहारी जी के मंदिर भेज देता हैं। .वही माला बिहारी जी के गले मे पहना दी गयी और पूरे दिन के बाद माला यमुना में प्रवाहित कर दी गयी.. और वो कीड़ा ये सब देख रहा है। .कीड़ा कहता है वाह रे भँवरे तेरी दोस्ती ने मुझे भगवान का स्पर्श करवा दिया और अंतिम समय यमुना जी मे प्रवाहित करवा दिया। . सज्जनों, यह भंवरा और कोई नही जीवन मे मिला कोई सत्संगी पुरुष है जो हमे इस भव बन्धन के सागर से दूर बहुत दूर ले जाने में सहायता करता है. .और ये सत्संगी मित्र भगवान श्री कृष्ण की कृपा से ही मिलता है। 🍀🌷 🙏🌹 जय श्री राधेकृष्ण 🌹🙏 .

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Neha Sharma Apr 15, 2022

‼️💖💖💖💖जय श्री राधे कृष्णा 💖💖💖💖‼️ ☔☔☔☔☔☔ सौंदर्य वही .........जो प्रभू मनभाये ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ पाककला निपुण वही ......जासों प्रभू ललचाये ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ गायन वही ........जो प्रभू कों रिझावे ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ वाणी वही.........जो प्रभू गुण गावे ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ जिव्हा वही....जो प्रभू गुण गाय के रसना कहावे ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ लेखनी वही.......जो प्रभू को ही चित्रण करे ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ दृष्टि वही ..........जो प्रभू को ही दर्शन करे ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ कर्ण वही..........जो प्रभू को ही नाम सुने ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ हाथ वही .........जो प्रभू की सेवा में रहें ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ पैर वही............जो प्रभू दर्शन को भागें ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ केश वही.........जो प्रभू के नाम को सिंदूर भरें ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ हृदय वही...जो प्रभू के बिराजवे को आसन होय ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ धड़कन वही.........जो प्रभू के लिये धड़के ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ श्वास वही...........जिनमें प्रभू को ही वास हो ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ देह वही..............जो प्रभू की चाहत हो ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ आत्मा वही..........जो प्रभू को समर्पित हो ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ नृत्य वही...........जिनके संग प्रभू भी नृत्य करें ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ प्रेम वही.............जिनसों प्रभू प्रेम करें ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ आसक्ति वही.......जिनमें प्रभू आसक्त होंयं ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ संयोग वही.... जो प्रभू के मिलन को योग हो ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ दासत्व वही.......जो संपूर्ण पुष्टि सृष्टि सों संयुक्त प्रभू को समर्पित हो ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ नमन वही...........जो श्री कान्हा प्रभू के चरणार्विंद में सदैव करें। ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ #जय_श्री_राधे_राधे ☔☔☔☔☔☔☔☔☔☔☔☔☔☔☔ ‼️🍄🍄🍄🍄🍄🍄🍄🍄🍄🍄🍄🍄🍄‼️

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Neha Sharma Apr 14, 2022

*जय श्रीकृष्ण....🙏🏻 *प्रेम करना हम सभी को आता है । एक माता अपनी *संतान से प्रेम करती है । *एक छोटा बच्चा अपनी माता से प्रेम करता है । * पति अपनी पत्नी से प्रेम करता है । पत्नी अपने पति से *प्रेम करती है और अपने पीहर से प्रेम करती है । *भक्ति में केवल इतना करना है कि बस इस प्रेम की दिशा *को मोड़कर प्रभु की तरफ कर देना है । *जैसे ही हम अपने प्रेम की दिशा प्रभु की तरफ मोड़ देते हैं ,तो वह भक्ति हो जाती है । *वैसे भी सच्चा प्रेम उन्हीं से करना चाहिए जो हमारे सबसे *समीप हैं । * प्रभु ही हमारे सबसे समीप है क्योंकि हम प्रभु के अंश हैं *और प्रभु हमारे मूल हैं । *इसलिए प्रभु से ही हमारा शाश्वत और सदा रहने वाला *संबंध है । 🌹*हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे*🌹 🌹*हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे*🌹

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Neha Sharma Apr 10, 2022

▬๑⁂❋ ॥ *श्री दुर्गायै नमः*❋⁂๑▬ *⛳🔱👁️श्रीदुर्गासप्तशती👁️🔱⛳* ❋❋❋🙏🏻दशमोऽध्यायः🙏🏻❋❋❋ 🔱🙏🏻शुम्भ-वध🙏🏻🔱 *▬▬▬▬▬๑⁂❋⁂๑▬▬▬▬▬* 🙏🏻ध्यानम्🙏🏻 मैं मस्तक पर अर्ध चन्द्र धारण करने वाली शिवशक्तिस्वरूपा भगवती कामेश्वरी का हृदय में चिन्तन करता हूँ। वे तपाये हुए सुवर्ण के समान सुन्दर । सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि-ये ही तीन उनके नेत्र हैं तथा वे अपने मनोहर हाथोंमें धनुष-बाण, अंकुश, पाश और शूल धारण किये हुए हैं। ❋❋❋❋❋❋❋❋❋❋❋❋❋❋❋❋ ऋषि कहते हैं-राजन्! अपने प्राणों के समान प्यारे भाई निशुम्भ को मारा गया देख तथा सारी सेना का संहार होता जान शुम्भ ने कुपित होकर कहा- दुष्ट दुर्गे! तू बल के अभिमान में आकर झूठ-मूठ का घमंड न दिखा। तू बड़ी मानिनी हुई है, किंतु दूसरी स्त्रियोंके बलका सहारा लेकर लड़ती है'॥ देवी बोलीं-ओ दुष्ट ! मैं अकेली ही हूँ। इस संसार में मेरे सिवा दूसरी कौन है ? देख, ये मेरी ही विभूतियाँ हैं, अतः मुझमें ही प्रवेश कर रही हैं। तदनन्तर ब्रह्माणी आदि समस्त देवियाँ अम्बिका देवी के शरीर में लीन हो गयीं। उस समय केवल अम्बिका देवी ही रह गयीं। देवी बोलीं- मैं अपनी ऐश्वर्यशक्ति से अनेक रूपों में यहाँ उपस्थित हुई थी। उन सब रूपों को मैंने समेट लिया। अब अकेली ही युद्ध में खड़ी हूँ। स्थिर हो जाओ। ऋषि कहते हैं- तदनन्तर देवी और शुम्भ दोनों में सब दानवों के देखते-देखते भयंकर युद्ध छिड़ गया। बाणों की तथा तीखे शस्त्रों एवं दारुण अस्त्रों के प्रहार के कारण उन दोनों का सब लोगों के लिये बड़ा भयानक प्रतीत हुआ। देवताओं वर्षा युद्ध मे उस समय अम्बिकादेवी ने जो सैकड़ों दिव्य अस्त्र छोड़े, उन्हें दैत्यराज शुम्भ ने उनके निवारक अस्त्रों द्वारा काट डाला। इसी प्रकार शुम्भ ने भी जो दिव्य अस्त्र चलाये; उन्हें परमेश्वरी ने भयंकर हुंकार शब्दके उच्चारण आदि द्वारा खिलवाड़ में ही नष्ट कर डाला। तब उस असुर ने सैकड़ों बाणों से देवी को आच्छादित कर दिया। यह देख क्रोध में भरी हुई उन देवी ने भी बाण मारकर उसका धनुष काट डाला। धनुष कट जाने पर फिर शक्ति हाथ में ली, किंतु देवी ने चक्र से उसके हाथ की शक्ति को भी काट गिराया। तत्पश्चात् दैत्यों के स्वामी शुम्भ ने सौ चाँद वाली चमकती ढाल और तलवार हाथ में ले उस समय देवी पर धावा किया उसके आते ही चण्डिका ने अपने धनुष से छोड़े हुए तीखे बाणों द्वारा उसकी सूर्यकिरणों के समान उज्ज्वल ढाल और तलवार को तुरंत काट दिया। फिर उस दैत्य के घोड़े और सारथि मारे गये, धनुष तो पहले ही कट चुका दैत्य और चण्डि का आकाश में एक-दूसरे से लड़ने लगे। उनका वह युद्ध पहले और मुनियों को विस्मय में डालने वाला हुआ। अब उसने अम्बिका को मारनेके लिये उद्यत हो भयंकर मुद्गर हाथ में लिया। उसे आते देख देवीने अपने तीक्ष्ण बाणों से उसका मुद्गर भी काट , तिसपर भी वह असुर मुक्का तानकर बड़े वेगसे देवीकी ओर झपटा। दैत्यराज ने देवी की छाती में मुक्का मारा, तब उन देवी ने भी उसकी छाती में एक चाँटा जड़ दिया। देवी का थप्पड़ खाकर दैत्यराज शुम्भ पृथ्वी पर गिर पड़ा, किंतु पुनः सहसा पूर्ववत् उठकर खड़ा हो गया। फिर वह उछला और देवी को ऊपर ले जाकर आकाश में खड़ा हो गया; तब चण्डि का आकाश में भी बिना किसी आधार के ही शुम्भ के साथ युद्ध करने लगीं। उस समय फिर अम्बिका ने शुम्भके साथ बहुत देर तक युद्ध करने के पश्चात् उसे उठाकर घुमाया और पृथ्वी पर पटक दिया। पटके जानेपर पृथ्वीपर आने के बाद वह दुष्टात्मा दैत्य पुनः चण्डिका का वध करने के लिये उनकी ओर बड़े वेग से दौड़ा। तब समस्त दैत्यों के राजा शुम्भ को अपनी ओर आते देख देवी ने त्रिशूल से उसकी छाती छेदकर उसे पृथ्वीपर गिरा दिया। शूल की धारसे घायल होनेपर उसके प्राण-पखेरू उड़ गये और वह , द्वीपों तथा पर्वतों सहित समूची पृथ्वी को कँपाता हुआ भूमि पर गिर पड़ा। तदनन्तर उस दुरात्मा के मारे जाने पर सम्पूर्ण जगत् प्रसन्न एवं पूर्ण हो गया तथा आकाश स्वच्छ दिखायी देने लगा। पहले जो मेघ और उल्कापात होते थे, वे सब शान्त हो गये तथा उस दैत्य के मारे जाने पर नदियाँ भी ठीक मार्गसे बहने लगीं। - उस समय शुम्भ की मृत्यु के बाद सम्पूर्ण देवताओं का हृदय हर्ष से भर गया और गन्धर्व गण मधुर गीत गाने लगे। दूसरे गन्धर्व बाजे बजाने लगे और अप्सराएँ नाचने लगीं। पवित्र वायु बहने लगी। सूर्य की प्रभा उत्तम हो । अग्निशाला की बुझी हुई आग अपने-आप प्रज्वलित हो उठी तथा सम्पूर्ण दिशाओं के भयंकर शब्द शान्त हो गये। ༺꧁꧂༻༺꧁꧂༻༺꧁꧂༻ इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अन्तर्गत देवी माहात्म्य में 'शुम्भ-वध' नामक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥१०॥ ༺꧁꧂༻༺꧁꧂༻༺꧁꧂༻ *▬▬▬▬▬๑⁂❋⁂๑▬▬▬▬▬* ⛳ 🙏🏻प्रेम से बोलो जय माता दी🙏🏻 ⛳ *▬▬▬▬▬๑⁂❋⁂๑▬▬▬▬▬*

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Neha Sharma Apr 10, 2022

🌸*नौंवा नवरात्र*🌸 🚩🙏"माँ सिद्धिदात्री"🙏🚩 *माँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। नवरात्र-पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता है। ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है। *मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व- ये आठ सिद्धियाँ होती हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्म खंड में यह संख्या अठारह बताई गई है। इनके नाम इस प्रकार हैं- *माँ सिद्धिदात्री भक्तों और साधकों को ये सभी सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। देवीपुराण के अनुसार भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही इन सिद्धियों को प्राप्त किया था। इनकी अनुकम्पा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण वे लोक में 'अर्द्धनारीश्वर' नाम से प्रसिद्ध हुए। माँ सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं। इनका वाहन सिंह है। ये कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं। इनकी दाहिनी तरफ के नीचे वाले हाथ में कमलपुष्प है। प्रत्येक मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह माँ सिद्धिदात्री की कृपा प्राप्त करने का निरंतर प्रयत्न करे। उनकी आराधना की ओर अग्रसर हो। इनकी कृपा से अनंत दुख रूप संसार से निर्लिप्त रहकर सारे सुखों का भोग करता हुआ वह मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। *नवदुर्गाओं में माँ सिद्धिदात्री अंतिम हैं। अन्य आठ दुर्गाओं की पूजा उपासना शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार करते हुए भक्त दुर्गा पूजा के नौवें दिन इनकी उपासना में प्रवत्त होते हैं। इन सिद्धिदात्री माँ की उपासना पूर्ण कर लेने के बाद भक्तों और साधकों की लौकिक, पारलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। सिद्धिदात्री माँ के कृपापात्र भक्त के भीतर कोई ऐसी कामना शेष बचती ही नहीं है, जिसे वह पूर्ण करना चाहे। वह सभी सांसारिक इच्छाओं, आवश्यकताओं और स्पृहाओं से ऊपर उठकर मानसिक रूप से माँ भगवती के दिव्य लोकों में विचरण करता हुआ उनके कृपा-रस-पीयूष का निरंतर पान करता हुआ, विषय-भोग-शून्य हो जाता है। माँ भगवती का परम सान्निध्य ही उसका सर्वस्व हो जाता है। इस परम पद को पाने के बाद उसे अन्य किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं रह जाती। माँ के चरणों का यह सान्निध्य प्राप्त करने के लिए भक्त को निरंतर नियमनिष्ठ रहकर उनकी उपासना करने का नियम कहा गया है। ऐसा माना गया है कि माँ भगवती का स्मरण, ध्यान, पूजन, हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हुए वास्तविक परम शांतिदायक अमृत पद की ओर ले जाने वाला है। विश्वास किया जाता है कि इनकी आराधना से भक्त को अणिमा, लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, सर्वकामावसायिता, दूर श्रवण, परकामा प्रवेश, वाकसिद्ध, अमरत्व भावना सिद्धि आदि समस्त सिद्धियों नव निधियों की प्राप्ति होती है। ऐसा कहा गया है कि यदि कोई इतना कठिन तप न कर सके तो अपनी शक्तिनुसार जप, तप, पूजा-अर्चना कर माँ की कृपा का पात्र बन सकता ही है। माँ की आराधना के लिए इस श्लोक का प्रयोग होता है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में नवमी के दिन इसका जाप करने का नियम है। *या देवी सर्वभूतेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता। *नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥ *अर्थ :- हे माँ ! सर्वत्र विराजमान और माँ सिद्धिदात्री के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे अपनी कृपा का पात्र बनाओ। ----------:::×:::---------- "जय माँ सिद्धिदात्री" 🌸🚩🙏🚩🌸 *******************************************

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Neha Sharma Apr 10, 2022

🌸*देवी माहात्म्य*🚩🙏🚩*अध्याय - 09*🌸 *इस अध्याय में...... (निशुम्भ-वध)....... *राजा ने कहा- 'भगवन्! आपने रक्तबीज के वध से सम्बन्ध रखने वाला देवी-चरित्र का यह अद्भुत माहात्म्य मुझे बतलाया।अब रक्तबीज के मारे जाने पर अत्यन्त क्रोध में भरे हुए शुम्भ और निशुम्भ ने जो कर्म किया, उसे मैं सुनना चाहता हूँ। *ऋषि कहते हैं- 'राजन् ! युद्ध में रक्तबीज तथा अन्य दैत्यों के मारे जाने पर शुम्भ और निशुम्भ के क्रोध की सीमा न रही। अपनी विशाल सेना इस प्रकार मारी जाती देख निशुम्भ अमर्ष में भरकर देवी की ओर दौड़ा। उसके साथ असुरों की प्रधान सेना थी। उसके आगे, पीछे तथा पार्श्व भाग में बड़े-बड़े असुर थे, जो क्रोध से ओठ चबाते हुए देवी को मार डालने के लिये आये। महापराक्रमी शुम्भ भी अपनी सेना के साथ मातृगणों से युद्ध करके क्रोधवश चण्डिका को मारने के लिये आ पहुँचा। तब देवी के साथ शुम्भ और निशुम्भ का घोर संग्राम छिड़ गया। वे दोनों दैत्य मेघों की भाँति बाणों की भयंकर वृष्टि कर रहे थे। उन दोनों के चलाये हुए बाणों को चण्डिका ने अपने बाणों के समूह से तुरंत काट डाला और शस्त्र समूहों की वर्षा करके उन दोनों दैत्यपतियों के अंगों में भी चोट पहुँचायी। *निशुम्भ ने तीखी तलवार और चमकती हुई ढाल लेकर देवी के श्रेष्ठ वाहन सिंह के मस्तक पर प्रहार किया। अपने वाहन को चोट पहुँचने पर देवी ने क्षुरप्र नामक बाण से निशुम्भ की श्रेष्ठ तलवार तुरंत ही काट डाली और उसकी ढाल को भी, जिसमें आठ चाँद जड़े थे, खण्ड-खण्ड कर दिया। *ढाल और तलवार के कट जाने पर उस असुर ने शक्ति चलायी, किंतु सामने आने पर देवी ने चक्र से उसके भी दो टुकड़े कर दिये। अब तो निशुम्भ क्रोध से जल उठा और उस दानव ने देवी को मारने के लिये शूल उठाया; किंतु देवी ने समीप आने पर उसे भी मुक्के से मारकर चूर्ण कर दिया। तब उसने गदा घुमाकर चण्डी के ऊपर चलायी, परंतु वह भी देवी के त्रिशूल से कटकर भस्म हो गयी। तदनन्तर दैत्यराज निशुम्भ को फरसा हाथ में लेकर आते देख देवी ने बाण समूहों से घायलकर धरती पर सुला दिया। *उस भयंकर पराक्रमी भाई निशुम्भ के धराशायी हो जाने पर शुम्भ को बड़ा क्रोध हुआ और अम्बिका का वध करने के लिये वह आगे बढ़ा। रथ पर बैठे-बैठे ही उत्तम आयुधों से सुशोभित अपनी बड़ी-बड़ी आठ अनुपम भुजाओं से समूचे आकाश को ढककर वह अद्भुत शोभा पाने लगा। उसे आते देख देवी ने शंख बजाया और धनुष की प्रत्यंचा का भी अत्यन्त दुस्सह शब्द किया। साथ ही अपने घण्टे के शब्द से, जो समस्त दैत्य सैनिकों का तेज नष्ट करने वाला था, सम्पूर्ण दिशाओं को व्याप्त कर दिया। तदनन्तर सिंह ने भी अपनी दहाड़ से, जिसे सुनकर बड़े-बड़े गजराजों का महान् मद दूर हो जाता था, आकाश, पृथ्वी और दसों दिशाओं को गुँजा दिया। फिर काली ने आकाश में उछलकर अपने दोनों हाथों से पृथ्वी पर आघात किया। उससे ऐसा भयंकर शब्द हुआ, जिससे पहले के सभी शब्द शान्त हो गये। *तत्पश्चात् शिवदूती ने दैत्यों के लिये अमंगल जनक अट्टहास किया, इन शब्दों को सुनकर समस्त असुर थर्रा उठे; किंतु शुम्भ को बड़ा क्रोध हुआ। उस समय देवी ने जब शुम्भ को लक्ष्य करके कहा- 'ओ दुरात्मन् ! खड़ा रह, खड़ा रह', तभी आकाश में खड़े हुए देवता बोल उठे- 'जय हो, जय हो।' *शुम्भ ने वहाँ आकर ज्वालाओं से युक्त अत्यन्त भयानक शक्ति चलायी। अग्निमय पर्वत के समान आती हुई उस शक्ति को देवी ने बड़़े भारी लूके से दूर हटा दिया। उस समय शुम्भ के सिंहनाद से तीनों लोक गूँज उठे। राजन्! उसकी प्रतिध्वनि से वज्रपात के समान भयानक शब्द हुआ, जिसने अन्य सब शब्दों को जीत लिया। शुम्भ के चलाये हुए बाणों के देवी ने और देवी के चलाये हुए बाणों के शुम्भ ने अपने भयंकर बाणों द्वारा सैकड़ों और हजारों टुकड़े कर दिये। तब क्रोध में भरी हुई चण्डिका ने शुम्भ को शूल से मारा। उसके आघात से मूर्च्छित हो वह पृथ्वी पर गिर पड़ा। *इतनेमें ही निशुम्भ को चेतना हुई और उसने धनुष हाथ में लेकर बाणों द्वारा देवी, काली तथा सिंह को घायल कर डाला। फिर उस दैत्यराज ने दस हजार बाँहें बनाकर चक्रों के प्रहार से चण्डिका को आच्छादित कर दिया। तब दुर्गम पीड़ा का नाश करने वाली भगवती दुर्गा ने कुपित होकर अपने बाणों से उन चक्रों तथा बाणों को काट गिराया। यह देख निशुम्भ दैत्यसेना के साथ चण्डिका का वध करने के लिये हाथ में गदा ले बड़े वेग से दौड़ा। उसके आते ही चण्डी ने तीखी धारवाली तलवार से उसकी गदा को शीघ्र ही काट डाला। तब उसने शूल हाथ में ले लिया। देवताओं को पीड़ा देने वाले निशुम्भ को शूल हाथ में लिये आते देख चण्डिका ने वेग से चलाये हुए अपने शूल से उसकी छाती छेद डाली। शूल से विदीर्ण हो जाने पर उसकी छाती से एक दूसरा महाबली एवं महापराक्रमी पुरुष 'खड़ी रह, खड़ी रह' कहता हुआ निकला। *उस निकलते हुए पुरुष की बात सुनकर देवी ठठाकर हँस पड़ीं और खड्ग से उन्होंने उसका मस्तक काट डाला। फिर तो वह पृथ्वी पर गिर पड़ा। तदनन्तर सिंह अपनी दाढ़ों से असुरों की गर्दन कुचलकर खाने लगा, यह बड़ा भयंकर दृश्य था। उधर काली तथा शिवदूती ने भी अन्यान्य दैत्यों का भक्षण आरम्भ किया। कौमारी की शक्ति से विदीर्ण होकर कितने ही महादैत्य नष्ट हो गये ब्रह्माणी के मन्त्रपूत जल से निस्तेज होकर कितने ही भाग खड़े हुए। कितने ही दैत्य माहेश्वरी के त्रिशूल से छिन्न-भिन्न हो धराशायी हो गये वाराही के थूथुन के आघात से कितनों का पृथ्वी पर कचूमर निकल गया। वैष्णवी ने भी अपने चक्र से दानवों के टुकड़े-टुकड़े कर डाले। ऐन्द्री के हाथ से छूटे हुए वज्रसे भी कितने ही प्राणों से हाथ धो बैठे। कुछ असुर नष्ट हो गये, कुछ उस महायुद्ध से भाग गये तथा कितने ही काली, शिवदूती तथा सिंह के ग्रास बन गये। *इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अन्तर्गत देवी माहात्म्य में 'निशुम्भ-वध' नामक नवाँ अध्याय पूरा हुआ॥९॥ ----------:::×:::---------- "ॐ श्री दुर्गायै नमः" 🌸🚩🙏🚩🌸 *********************************************

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Neha Sharma Apr 10, 2022

🌸*देवी माहात्म्य*🚩🙏🚩*अध्याय - 08*🌸 *इस अध्याय में.....(रक्तबीज-वध)...... *ऋषि कहते हैं- 'चण्ड और मुण्ड नामक दैत्यों के मारे जाने तथा बहुत-सी सेना का संहार हो जाने पर दैत्यों के राजा प्रतापी शुम्भके मन में बड़ा क्रोध हुआ और उसने दैत्यों की सम्पूर्ण सेना को युद्ध के लिये कूच करने की आज्ञा दी। वह बोला- 'आज उदायुध नाम के छियासी दैत्य-सेनापति अपनी सेनाओं के साथ युद्ध के लिये प्रस्थान करें। कम्बु नाम वाले दैत्यों के चौरासी सेनानायक अपनी वाहिनी से घिरे हुए यात्रा करें। *पचास कोटिवीर्य-कुल के और सौ धौम्र-कुल के असुर सेनापति मेरी आज्ञा से सेनासहित कूच करें। कालक, दौ्हद, मौर्य और कालकेय असुर भी युद्ध के लिये तैयार हो मेरी आज्ञा से तुरंत प्रस्थान करें।' भयानक शासन करने वाला असुरराज शुम्भ इस प्रकार आज्ञा दे सहस्रों बड़ी-बड़ी सेनाओं के साथ युद्ध के लिये प्रस्थित हुआ। उसकी अत्यन्त भयंकर सेना आती देख चण्डिका ने अपने धनुष की टंकार से पृथ्वी और आकाश के बीच का भाग गुँजा दिया। *राजन्! तदनन्तर देवी के सिंह ने भी बड़े जोर-जोर से दहाड़ना आरम्भ किया, फिर अम्बिका ने घण्टे के शब्द से उस ध्वनि को और भी बढ़ा दिया। धनुष की टंकार, सिंह की दहाड़ और घण्टे की ध्वनि से सम्पूर्ण दिशाएँ गुँज उठीं। उस भयंकर शब्द से काली ने अपने विकराल मुख को और भी बढ़ा लिया तथा इस प्रकार वे विजयिनी हुईं। *उस तुमुल नाद को सुनकर दैत्यों की सेनाओं ने चारों ओर से आकर चण्डिका देवी, सिंह तथा कालीदेवी को क्रोध पूर्वक घेर लिया। राजन्! इसी बीच में असुरों के विनाश तथा देवताओं के अभ्युदय के लिये ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु तथा इन्द्र आदि देवों की शक्तियाँ, जो अत्यन्त पराक्रम और बल से सम्पन्न थीं, उनके शरीरों से निकलकर उन्हीं के रूप में चण्डिकादेवी के पास गयीं। जिस देवता का जैसा रूप, जैसी वेश- भूषा और जैसा वाहन है, ठीक वैसे ही साधनों से सम्पन्न हो उसकी शक्ति असुरों से युद्ध करने के लिये आयी। सबसे पहले हंसयुक्त विमान पर बैठी हुई अक्षसूत्र और कमण्डलु से सुशोभित ब्रह्माजी की शक्ति उपस्थित हुई, जिसे 'ब्रह्माणी' कहते हैं। महादेवजी की शक्ति वृषभ पर आरूढ़ हो हाथों में श्रेष्ठ त्रिशूल धारण किये महानाग का कंकण पहने, मस्तक में चन्द्ररेखा से विभूषित हो वहाँ आ पहुँची। *कार्तिकेयजी की शक्तिरूपा जगदम्बिका उन्हीं का रूप धारण किये श्रेष्ठ मयूर पर आरूढ़ हो हाथ में शक्ति लिये दैत्यों से युद्ध करने के लिये आयीं। इसी प्रकार भगवान् विष्णु की शक्ति गरुड़ पर विराजमान हो शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग धनुष तथा खड्ग हाथ में लिये वहाँ आयी। अनुपम यज्ञ वाराह का रूप धारण करने वाले श्रीहरि की जो शक्ति है, वह भी वाराह शरीर धारण करके वहाँ उपस्थित हुई। नारसिंही शक्ति भी नृसिंह के समान शरीर धारण करके वहाँ आयी। उसकी गर्दन के बालों के झटके से आकाश के तारे बिखरे पड़ते थे। इसी प्रकार इन्द्र की शक्ति वज्र हाथ में लिये गजराज ऐरावत पर बैठकर आयी उसके भी सहस्र नेत्र थे। इन्द्र का जैसा रूप है, वैसा ही उसका भी था। *तदनन्तर उन देव-शक्तियों से घिरे हुए महादेवजी ने चण्डिका से कहा- 'मेरी प्रसन्नता के लिये तुम शीघ्र ही इन असुरों का संहार करो।' तब देवी के शरीर से अत्यन्त भयानक और परम उग्र चण्डिका-शक्ति प्रकट हुई। जो सैकड़ों गीदड़ियों की भाँति आवाज करने वाली थी। उस अपराजिता देवी ने धूमिल जटावाले महादेवजी से कहा- 'भगवन् ! आप शुम्भ-निशुम्भ के पास दूत बनकर जाइये, और उन अत्यन्त गर्वीले दानव शुम्भ एवं निशुम्भ दोनों से कहिये। साथ ही उनके अतिरिक्त भी जो दानव युद्ध के लिये वहाँ उपस्थित हों उनको भी यह संदेश दीजिये- 'दैत्यो ! यदि तुम जीवित रहना चाहते हो तो पाताल को लौट जाओ। इन्द्र को त्रिलोकी का राज्य मिल जाय और देवता यज्ञ भाग का उपभोग करें। यदि बल के घमंड में आकर तुम युद्ध की अभिलाषा रखते हो तो आओ। मेरी शिवाएँ (योगिनियाँ) तुम्हारे कच्चे मांस से तृप्त हों।' *चूँकि उस देवी ने भगवान् शिव को दूत के कार्य में नियुक्त किया था, इसलिये वह 'शिवदूती' के नाम से संसारमें विख्यात हुई। वे महादैत्य भी भगवान् शिव के मुँह से देवी के वचन सुनकर क्रोध में भर गये और जहाँ कात्यायनी विराजमान थीं, उस ओर बढ़े। तदनन्तर वे दैत्य अमर्ष में भरकर पहले ही देवी के ऊपर बाण, शक्ति और ऋष्टि आदि अस्त्रों की वृष्टि करने लगे। तब देवी ने भी खेल-खेल में ही धनुष की टंकार की और उससे छोड़े हुए बड़े-बड़े बाणों द्वारा दैत्यों के चलाये हुए बाण, शूल, शक्ति और फरसों को काट डाला। *फिर काली उनके आगे होकर शत्रुओं को शूल के प्रहार से विदीर्ण करने लगी और खट्वांग से उनका कचूमर निकालती हुई रणभूमि में विचरने लगी। ब्रह्माणी भी जिस-जिस ओर दौड़ती, उसी-उसी ओर अपने कमण्डलु का जल छिड़ककर शत्रुओं के ओज और पराक्रम को नष्ट कर देती थी। माहेश्वरी ने त्रिशूल से तथा वैष्णवी ने चक्र से और अत्यन्त क्रोध में भरी हुई कुमार कार्तिकेय की शक्ति ने शक्ति से दैत्यों का संहार आरम्भ किया। इन्द्र शक्ति के वज्र प्रहार से विदीर्ण हो सैकड़ों दैत्य-दानव रक्त की धारा बहाते हुए पृथ्वी पर सो गये। *वाराही शक्ति ने कितनों को अपनी थूथुन की मार से नष्ट किया, दाढ़ों के अग्रभाग से कितनों की छाती छेद डाली तथा कितने ही दैत्य उसके चक्र की चोट से विदीर्ण होकर गिर पड़े। नारसिंही भी दूसरे-दूसरे महादैत्यों को अपने नखों से विदीर्ण करके खाती और सिंहनाद से दिशाओं एवं आकाश को गुँजाती हुई युद्धक्षेत्र में विचरने लगी। कितने ही असुर शिवदूती के प्रचण्ड अट्टहास से अत्यन्त भयभीत हो पृथ्वी पर गिर पड़े और गिरने पर उन्हें शिवदूती ने उस समय अपना ग्रास बना लिया। *इस प्रकार क्रोध में भरे हुए मातृगणों को नाना प्रकार के उपायों से बड़े-बड़े असुरों का मर्दन करते देख दैत्य सैनिक भाग खड़े हुए।मातृगणों से पीडित दैत्यों को युद्ध से भागते देख रक्तबीज नामक महादैत्य क्रोध में भरकर युद्ध करने के लिये आया। उसके शरीर से जब रक्त की बूँद पृथ्वी पर गिरती, तब उसी के समान शक्तिशाली एक दूसरा महादैत्य पृथ्वी पर पैदा हो जाता। *महासुर रक्तबीज हाथ में गदा लेकर इन्द्रशक्ति के साथ युद्ध करने लगा। तब ऐन्द्री ने अपने वज्र से रक्तबीज को मारा। वज्र से घायल होने पर उसके शरीर से बहुत-सा रक्त चूने लगा और उससे उसी के समान रूप तथा पराक्रम वाले योद्धा उत्पन्न होने लगे। उसके शरीर से रक्त की जितनी बूँदें गिरीं, उतने ही पुरुष उत्पन्न हो गये वे सब रक्तबीज के समान ही वीर्यवान्, बलवान् तथा पराक्रमी थे। वे रक्त से उत्पन्न होने वाले पुरुष भी अत्यन्त भयंकर अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार करते हुए वहाँ मातृगणों के साथ घोर युद्ध करने लगे। पुनः वज्र के प्रहार से जब उसका मस्तक घायल हुआ, तब रक्त बहने लगा और उससे हजारों पुरुष उत्पन्न हो गये। वैष्णवी ने युद्ध में रक्तबीज पर चक्र का प्रहार किया तथा ऐन्द्री ने उस दैत्य सेनापति को गदा से चोट पहुँचायी। *वैष्णवी के चक्र से घायल होने पर उसके शरीर से जो रक्त बहा और उससे जो उसी के बराबर आकार वाले सहस्रों महादैत्य प्रकट हुए, उनके द्वारा सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो गया। कौमारी ने शक्ति से, वाराही ने खड्ग से और माहेश्वरी ने त्रिशूल से महादैत्य रक्तबीज को घायल किया। क्रोध में भरे हुए उस महादैत्य रक्तबीज ने भी गदा से सभी मातृ-शक्तियों पर पृथक्-पृथक् प्रहार किया। शक्ति और शूल आदि से अनेक बार घायल होने पर जो उसके शरीर से रक्त की धारा पृथ्वी पर गिरी, उससे भी निश्चय ही सैकड़ों असुर उत्पन्न हुए। इस प्रकार उस महादैत्य के रक्त से प्रकट हुए असुरों द्वारा सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो गया। इससे उन देवताओं को बड़ा भय हुआ। *देवताओं को उदास देख चण्डिका ने काली से शीघ्रता पूर्वक कहा- 'चामुण्डे! तुम अपना मुख और भी फैलाओ। तथा मेरे शस्त्र पात से गिरने वाले रक्तबिन्दुओं और उनसे उत्पन्न होने वाले महादैत्यों को तुम अपने इस उतावले मुख से खा जाओ। इस प्रकार रक्त से उत्पन्न होने वाले महादैत्यों का भक्षण करती हुई तुम रण में विचरती रहो। ऐसा करने से उस दैत्य का सारा रक्त क्षीण हो जाने पर वह स्वयं भी नष्ट हो जायगा। उन भयंकर दैत्यों को जब तुम खा जाओगी, तब दूसरे नये दैत्य उत्पन्न नहीं हो सकेंगे। काली से यों कहकर चण्डिकादेवी ने शूल से रक्तबीज को मारा, और काली ने अपने मुख में उसका रक्त ले लिया। तब उसने वहाँ चण्डिका पर गदा से प्रहार किया। किंतु उस गदापात ने देवी को तनिक भी वेदना नहीं पहुँचायी। रक्तबीज के घायल शरीर से बहुत-सा रक्त गिरा। किंतु ज्यों ही वह गिरा त्यों ही चामुण्डा ने उसे अपने मुख में ले लिया। रक्त गिरने से काली के मुख में जो महादैत्य उत्पन्न हुए, उन्हें भी वह चट कर गयी और उसने रक्तबीज का रक्त भी पी लिया। तदनन्तर देवी ने रक्तबीज को, जिसका रक्त चामुण्डा ने पी लिया था, वज्र, बाण, खड्ग तथा ऋष्टि आदि से मार डाला। *राजन्! इस प्रकार शस्त्रों के समुदाय से आहत एवं रक्तहीन हुआ महादैत्य रक्तबीज पृथ्वी पर गिर पड़ा। नरेश्वर! इससे देवताओं को अनुपम हर्ष की प्राप्ति हुई, और मातृगण उन असुरों के रक्तपान के मद से उद्धत-सा होकर नृत्य करने लगीं। *इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अन्तर्गत देवी माहात्म्य में 'रक्तबीज-वध' नामक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥८॥ ----------:::×:::---------- "ॐ श्री दुर्गायै नमः" 🌸🚩🙏🚩🌸 *********************************************

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