Hari Priya Nov 27, 2021

श्री कृष्ण-अर्जुन संवाद अर्जुन ने पूछा- हे गोविंद! जैसे अग्नि को हाथ लगाने से तुरंत मनुष्य का हाथ जल जाता है, ठीक वैसे ही बुरा कर्म करने पर मनुष्य को उस कर्म का फल उसी समय क्यों नहीं मिल जाता है? श्री कृष्ण ने कहा- ऐसा इसलिए संभव नहीं हो पाता है क्योंकि यह प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है। अर्जुन ने पूछा- परंतु वह कैसे वासुदेव? श्री कृष्ण ने कहा- हे अर्जुन! मनुष्य का प्रत्येक कर्म एक बीज के समान होता है। जैसे "अच्छे-कर्म" के लिए अच्छा बीज होता है वैसे ही "बुरे-कर्म" के लिए बुरा बीज होता है। अब इसमें समझने वाली बात यह है कि मनुष्य को बीज बोने में तो कोई अधिक समय नहीं लगता है परंतु उस बीज का फल आने में एक निश्चित अवधि का समय लग जाता है। ठीक इसी प्रकार से उसके द्वारा किए गए किसी भी कर्म का फल आने में भी एक निश्चित अवधि का समय लग जाता है। अर्जुन ने पूछा- परंतु यह निश्चित अवधि का समय क्यों? श्री कृष्ण ने कहा- क्योंकि प्रकृति किसी भी मनुष्य को उसके द्वारा किए गए पाप-कर्म का फल उसी समय देकर उसके साथ अन्याय नहीं कर सकती। बल्कि वह हर मनुष्य को उसकी गलती का "पश्चाताप" करने और उसको सुधारने का अवसर अवश्य देती है। इसी कारण से किसी मनुष्य द्वारा किए गए बुरे-कर्म के फल को आने में एक निश्चित अवधि का समय लग जाता है। यदि इस निश्चित समय अवधि के दौरान मनुष्य अपनी गलती का "पश्चाताप" करके उसे सुधार लेता है तो वह उस पाप-कर्म के फल को भोगने से बच सकता है। अन्यथा उसे पाप-कर्म के फल को भोगने से कोई नहीं बचा सकता है, उसे भविष्य में उसका फल भोगना ही पड़ता है। 🙏ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय:🙏

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Hari Priya Nov 27, 2021

मेरी श्रृद्धा मेरा विश्वास 🙏 जय गुरुदेव 🙏🌹🙏 🌹 *दुनिया में ऐसा कोई हितैषी नहीं जितने गुरुदेव...!!* ➡️ *तीन हितैषी होते हैं :-* 🌻 *एक तो अपना संयत सच्चाई वाला मन...* 🌼 *दूसरा इष्ट देव भगवान हमारे हितैषी... और* 🌹 *तीसरा सदगुरु परम हितैषी ।* 🌷 *परम हितैषी शब्द भी छोटा है। वो हमारी कमजोरी को जानते हैं। कई जन्मों की हमारी दुष्टता को भी जानते हैं। कई हमारी बुरी आदतों को भी जानते हैं और कई हमारी अकडों - पकड़ो को भी जानते हैं और ये सारी अकड़ - पकड़... हम जो चाहते हैं उसको तो खींच लेते हैं, खिसका देते हैं और हमारी जो आवश्यकता है वो पूरी कर देते हैं । कितनी बार लम्बे पड़ेंगे महाराज फिर भी नहीं चुका सकते...।* - पूज्य बापूजी 🌱🌷🌱🌷🌱🌷🌱🌷🌱

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Hari Priya Nov 10, 2021

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Hari Priya Nov 10, 2021

गोपाष्टमी का महत्त्व इस दिन प्रातःकाल गायों को स्नान कराके गंध-पुष्पादि से उनका पूजन किया जाता है । गायों को गोग्रास देकर उनकी परिक्रमा करें तथा थोड़ी दूर तक उनके साथ जाने से सब प्रकार के अभीष्ट की सिद्धि होती है । गोपाष्टमी के दिन सायंकाल गायें चरकर जब वापस आयें तो उस समय भी उनका आतिथ्य, अभिवादन और पंचोपचार-पूजन करके उन्हें कुछ खिलायें और उनकी चरणरज को मस्तक पर धारण करें, इससे सौभाग्य की वृद्धि होती है । भारतवर्ष में गोपाष्टमी का उत्सव बड़े उल्लास से मनाया जाता है । विशेषकर गौशालाओं तथा पिंजरापोलों के लिए यह बड़े महत्त्व का उत्सव है । इस दिन गौशालाओं में एक मेला जैसा लग जाता है । गौ कीर्तन-यात्राएँ निकाली जाती हैं । यह घर-घर व गाँव-गाँव में मनाया जानेवाला उत्सव है । इस दिन गाँव-गाँव में भंडारे किये जाते हैं । विश्व के लिए वरदानरूप : गोपालन देशी गाय का दूध, दही, घी, गोबर व गोमूत्र सम्पूर्ण मानव-जाति के लिए वरदानरूप हैं । दूध स्मरणशक्तिवर्धक, स्फूर्तिवर्धक, विटामिन्स और रोगप्रतिकारक शक्ति से भरपूर है । घी ओज-तेज प्रदान करता है । इसी प्रकार गोमूत्र कफ व वायु के रोग, पेट व यकृत (लीवर) आदि के रोग, जोड़ों के दर्द, गठिया, चर्मरोग आदि सभी रोगों के लिए एक उत्तम औषधि है । गाय के गोबर में कृमिनाशक शक्ति है । जिस घर में गोबर का लेपन होता है वहाँ हानिकारक जीवाणु प्रवेश नहीं कर सकते । पंचामृत व पंचगव्य का प्रयोग करके असाध्य रोगों से बचा जा सकता है । ये हमारे पाप-ताप भी दूर करते हैं । गाय से बहुमूल्य गोरोचन की प्राप्ति होती है । देशी गाय के दर्शन एवं स्पर्श से पवित्रता आती है, पापों का नाश होता है । गोधूलि (गाय की चरणरज) का तिलक करने से भाग्य की रेखाएँ बदल जाती हैं । ‘स्कंद पुराण’ में गौ-माता में सर्व तीर्थों और सभी देवताओं का निवास बताया गया है । गायों को घास देनेवाले का कल्याण होता है । स्वकल्याण चाहनेवाले गृहस्थों को गौ-सेवा अवश्य करनी चाहिए क्योंकि गौ-सेवा में लगे हुए पुरुष को धन-सम्पत्ति, आरोग्य, संतान तथा मनुष्य-जीवन को सुखकर बनानेवाले सम्पूर्ण साधन सहज ही प्राप्त हो जाते हैं । विशेष : ये सभी लाभ देशी गाय से ही प्राप्त होते हैं, जर्सी व होल्सटीन से नहीं । किसानों के लिए संदेश खेती और गाय का बड़ा घनिष्ठ संबंध है । खेती से गाय पुष्ट होती है और गाय के गोबर व गोमूत्र से खेती पुष्ट होती है । विदेशी खाद से आरम्भ में कुछ वर्ष तो खेती अच्छी होती है पर कुछ वर्षों बाद जमीन उपजाऊ नहीं रहती । विदेशों में तो खाद से जमीन खराब हो गयी है और वे लोग मुंबई से जहाजों में गोबर लादकर ले जा रहे हैं, जिससे गोबर से जमीन ठीक हो जाय । गोबर-खाद किसानों को सस्ते में व आसानी से उपलब्ध होती है । गोझरण एक सुरक्षित, फसलों को नुकसान न पहुँचानेवाला कीटनाशक है । गाँव में गोबर गैस प्लांट लगाकर वहाँ ईंधन, बिजली, बिजली पर चलनेवाले यंत्रों आदि का फायदा लिया जाता है । वैज्ञानिकों ने कहा है कि ‘एक समय ऐसा आनेवाला है जब न बिजली मिलेगी, न पेट्रोल-डीजल !’ अब भी तेल महँगा हो रहा है और हम ट्रैक्टरों में तेल खर्च रहे हैं। खेती की पुष्टि जितनी गाय-बैलों से होती है, उतनी ट्रैक्टरों से नहीं होती । जब ट्रैक्टर चलता है तो जीव-जंतुओं की बड़ी हत्या होती है । ट्रैक्टर से पाला, घास, बुड़ेसी, गँठिया आदि की जड़ें उखड़ जाती हैं । अतः समृद्ध खेती के लिए किसानों को बैल व गायों का पालन करना चाहिए । उनकी रक्षा करनी चाहिए, हत्यारों के हाथ में उन्हें बेचना नहीं चाहिए । स्वास्थ्य-लाभ व्यक्ति स्वास्थ्य के लिए लाखों-लाखों रुपये खर्च करता है, कहाँ-कहाँ जाता है फिर भी बीमारियों से छुटकारा नहीं पाता । कई बार तो कंगालियत ही हाथ लगती है और स्वस्थ भी नहीं हो पाता । इसका उपाय बताते हुए पूज्य बापूजी कहते हैं : ‘‘गाय घर पर होती है न, तो उसके गोबर, उसके गोझरण का लाभ तो मिलता ही है, साथ ही गाय के रोमकूपों से जो तरंगें निकलती हैं, वे स्वास्थ्यप्रद होती हैं । कोई बीमार आदमी हो, डॉक्टर बोले, ‘यह नहीं बचेगा’ तो बीमार आदमी गाय को अपने हाथ से कुछ खिलाये और गाय की पीठ पर हाथ घुमाये तो गाय की प्रसन्नता की तरंगें हाथों की अंगुलियों से अंदर आयेंगी और वह आदमी तंदुरुस्त हो जायेगा; दो-चार महीने लगते हैं लेकिन असाध्य रोग भी गाय की प्रसन्नता से मिट जाते हैं ।’’ गायें दूध न देती हों तो भी वे परम उपयोगी हैं । दूध न देनेवाली गायें अपने गोझरण व गोबर से ही अपने आहार की व्यवस्था कर लेती हैं । उनका पालन-पोषण करने से हमें आध्यात्मिक, आर्थिक व स्वास्थ्यलाभ होता ही है । गोपाष्टमी के दिन गौ-सेवा, गौ-चर्चा, गौ-रक्षा से संबंधित गौ-हत्या निवारण आदि विषयों पर चर्चासत्रों का आयोजन करना चाहिए । भगवान एवं महापुरुषों के गौप्रेम से संबंधित प्रेरक प्रसंगों का वाचन-मनन करना चाहिए । जीवमात्र के परम हितैषी गौपालक पूज्य संत श्री आशारामजी बापू गायों का विशेष खयाल रखते हैं । तभी तो उनके मार्गदर्शन में भारतभर में कई गौशालाएँ चलती हैं और वहाँ अधिकतर ऐसी गायें हैं जो दूध न देने के कारण अनुपयोगी मानकर कत्लखाने ले जायी जा रही थीं । यहाँ उनका पालन-पोषण व्यवस्थित ढंग से किया जाता है । पूज्य बापूजी विश्व गौ-संरक्षक औैर संवर्धक भी हैं । उनके द्वारा वर्षभर गायों के लिए कुछ-न-कुछ सेवाकार्य चलते ही रहते हैं तथा गौ-सेवा प्रेरणा के उपदेश उनके प्रवचनों का अभिन्न अंग हैं । गायों को पर्याप्त मात्रा में चारा व पोषक पदार्थ मिलें इसका वे विशेष ध्यान रखते हैं । बापूजी के निर्देशानुसार गोपाष्टमी व अन्य पर्वों पर गाँवों में घर-घर जाकर गायों को उनका प्रिय आहार खिलाया जाता है । इतना ही नहीं, बापूजी समय-समय पर विभिन्न गौशालाओं में जाकर अपने हाथों से गायों को खिलाते हैं, उन्हें सहलाते हैं, उनसे स्नेह करते हैं । गौ-पालकों को मार्गदर्शन देते हैं, उनका उत्साह बढ़ाते हैं, उन्हें विभिन्न प्रकार से सहयोग देते हैं । महाराजश्री द्वारा चलाया गया यह गौ-रक्षा एवं गौ-संवर्धन अभियान एक दिन देश के अर्थतंत्र, सामाजिक स्वास्थ्य-समृद्धि तथा व्यक्तिगत उत्थान की सुदृढ़ रीढ़ अवश्य बनेगा । (ऋषि प्रसाद : नवम्बर 2012)

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Hari Priya Nov 10, 2021

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Hari Priya Nov 7, 2021

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Hari Priya Nov 7, 2021

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