0 कॉमेंट्स • 1 शेयर

+1 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर

0 कॉमेंट्स • 0 शेयर

0 कॉमेंट्स • 0 शेयर

जनम तेरा बातों ही बीत गयो तुने कबहू न कृष्ण कह्यौ । पाँच बरस का भोला भाला अब तो बीस भयो । मकर पच्चीसी माया कारन, देश विदेश गयो ॥ [1] तीस बरस की अब मति उपजी, लोभ बढ़े नित नयो । माया जोरी लाख करोरी, अजहूं न तृप्त भयो ॥ [2] वृद्ध भयो तब आलस उपज्यो, कफ नित कंठ नयो । साधू संगति कबहू न किन्हीं , बिरथा जन्म गयो ॥ [3] यह जग सब मतलब का लोभी, झूठो ठाठ रचयौ । कहत ‘कबीर’ समझ मन मूरख, तूं क्यूँ भूल गयो ॥ [4] श्री कबीरदास अपने मन से कहते हैं कि हे मन, तेरा जनम बातों में ही बीता जा रहा है, तूने कभी कृष्ण नाम नहीं लिया ? तू पाँच वर्ष का भोला भाला था । उसके बाद तू जब बीस वर्ष का हुआ तब तूने मकर पचीसी (पँच महाभूत ,पँच कर्मेन्द्रियाँ, पँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पँच ज्ञानेन्द्रियों के विषय, त्रिगुण [रजोगुण,तमोगुण ,सतोगुण], अहंकार, मन) में लिप्त होकर देश विदेश के चक्कर काटे । [1] जब तू तीस वर्ष का हो गया तब तेरा नित्य नया नया लोभ जगा और तूने लाख, करोड़ रुपया (माया) जोड़ना शुरू किया जिससे तू आज तक नहीं तृप्त हो सका । [2] जब तू वृद्ध हो गया फिर तुझे आलस ने घेर लिया और तेरे कंठ में नित्य कफ होने लगा । तूने जीवन में कभी भी संतों का संग

+3 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर

0 कॉमेंट्स • 0 शेयर