Hara Narayan Mishra May 28, 2022

॥स्वयं विचार करे॥ 🌸🌸ॐ नमो नारायणाय 🌸🌸 मान लो आप धूप में कही जा रहे हो, पसीने से तर-बतर ,बहुत प्यासे ,पर कहीं भी पानी नहीं मिल रहा। ऐसे में आप एक वृक्ष की छाया में थकान मिटाने के लिए खड़े हो जाते हो ! तभी सामने की एक इमारत की पहली मंजिल की खिड़की खुलती है और आपकी उस व्यक्ति से आँखे मिलती है। आपकी स्थिति देखकर, वह व्यक्ति हाथ के इशारे से आपको पानी के लिए पूछता है। आपने तत्काल उस व्यक्ति पर एक राय बनाई। कितना सहृदय व्यक्ति है।। उस व्यक्ति के लिये यह आपकी पहली राय है ! आदमी नीचे आने का इशारा करता है और खिड़की बंद कर देता है।आप पानी लेने तेज़ कदमों से उसके दरवाज़े पर पहुंचते है। लेकिन नीचे का दरवाजा 15 मिनट बाद भी नहीं खुलता। अब उस व्यक्ति के बारे में आपकी क्या राय है? आप उसे गालियां देते है। बेवकूफ, धोखेबाज, आलसी, कही का। *यह आपकी दूसरी राय है!* थोड़ी देर बाद दरवाजा खुलता है और आदमी कहता है: मुझे देरी के लिए खेद है, लेकिन आपकी हालत देखकर, मैंने आपको पानी के बजाय नींबू पानी देना सबसे अच्छा समझा ! इसलिए थोड़ा लंबा समय लगा ! सोचिये उस व्यक्ति के बारे में अब आपकी क्या राय है? कितना अच्छा आदमी है। अब जैसे ही आप शर्बत को अपनी जीभ पर लगाते हैं, आपको पता चलता है कि इसमें चीनी नहीं है। अब सोचिये उस व्यक्ति के बारे में क्या राय है ।बेवकूफ, नालायक, कंजूस कही का ? आपके चेहरे को खट्टेपन से भरा हुआ देखकर, व्यक्ति धीरे से चीनी का एक पाऊच निकालता है और कहता है, माफ कीजिये, मुझे पता नहीं था आप कितनी चीनी लेंगे, इसलिए अलग से चीनी ले आया। आप जितनी चाहें उतना डाल लें। अब उसी व्यक्ति के बारे में आपकी क्या राय होगी ? अब आप मनन कीजिये…. एक सामान्य सी स्थिति में भी, अगर हमारी राय इतनी खोखली है और लगातार बदलती जा रही है, तो क्या हम किसी भी बारे में राय देने के लायक है या नहीं ! इसलिए किसी के बारे में जल्दी राय न बनाइये ! कौन किस परिस्थिति या स्थिति में क्या एक्शन कर रहा है ,ये वो ही बेहतर जान सकता है अपनी अपनी स्थिति आप भी ठीक हो और दूसरा भी ठीक हो। वास्तव में, दुनिया में हम सभी को इतना समझ में आया है कि अगर कोई व्यक्ति हमारी अपेक्षाओं के अनुरूप व्यवहार करता तो वह अच्छा है अन्यथा वह बुरा है !

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Hara Narayan Mishra May 28, 2022

ଓଡ଼ିଆ ର ବିଭିନ୍ନ ଶକ୍ତି ପୀଠ ରୁ ଆଜିର ଦିବ୍ୟ ଦର୍ଶନ 💥 न तातो न माता न बन्धुर्न दाता न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता । न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥१॥ भवाब्धावपारे महादुःखभीरुः प्रपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः । कुसंसारपाशप्रबध्दः सदाहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥२॥ न जानामि दानं न च ध्यानयोगं न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम् । न जानामि पूजां न च न्यासयोगं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥३॥ न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थं न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित । न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातः गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥४॥ कुकर्मी कुसंगी कुबुध्दिः कुदासः कुलाचारहीनः कदाचारलीनः । कुदृष्टीः कुवाक्यप्रबन्धः सदाहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥५॥ प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित् । न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥६॥ विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये । अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाही गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥७॥ अनाथो दरिद्रो जरारोगयुक्तो महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः । विपत्तौ प्रविष्टः प्रणष्टः सदाहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥८॥ ॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं भवान्यष्टकं संपूर्णम् ॥

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Hara Narayan Mishra May 28, 2022

ଓଡ଼ିଆ ର ବିଭିନ୍ନ ଶକ୍ତି ପୀଠ ରୁ ଆଜିର ଦିବ୍ୟ ଦର୍ଶନ 💥 न तातो न माता न बन्धुर्न दाता न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता । न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥१॥ भवाब्धावपारे महादुःखभीरुः प्रपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः । कुसंसारपाशप्रबध्दः सदाहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥२॥ न जानामि दानं न च ध्यानयोगं न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम् । न जानामि पूजां न च न्यासयोगं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥३॥ न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थं न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित । न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातः गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥४॥ कुकर्मी कुसंगी कुबुध्दिः कुदासः कुलाचारहीनः कदाचारलीनः । कुदृष्टीः कुवाक्यप्रबन्धः सदाहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥५॥ प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित् । न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥६॥ विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये । अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाही गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥७॥ अनाथो दरिद्रो जरारोगयुक्तो महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः । विपत्तौ प्रविष्टः प्रणष्टः सदाहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥८॥ ॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं भवान्यष्टकं संपूर्णम् ॥

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Hara Narayan Mishra May 28, 2022

रोम रोम से श्रीकृष्ण नाम!!!!!!! भगवान के नाम में विलक्षण शक्ति है । जिस प्रकार किसी व्यक्ति का नाम लेने पर वही आता है; ठीक उसी तरह ‘श्रीकृष्ण’ नाम का उच्चारण करने पर वह तीर की तरह लक्ष्यभेद करता हुआ सीधे भगवान के हृदय पर प्रभाव करता है; जिसके फलस्वरूप मनुष्य श्रीकृष्ण कृपा का भाजन बनता है । जहाँ कहीं और कभी भी शुद्ध हृदय से ‘कृष्ण’ नाम का उच्चारण होता है; वहाँ-वहाँ स्वयं कृष्ण अपने को व्यक्त करते हैं । पौराणिक कथाओं पर विश्वास करना यद्यपि कठिन होता है; परन्तु भक्ति हृदय की वस्तु है, तर्क की नहीं । उसमें श्रद्धा और विश्वास का होना अत्यंत आवश्यक है । इस प्रस्तुति में ‘श्रीकृष्ण का अहर्निश नाम लेने वाले भक्त की क्या महिमा है ?’ इसका सुंदर प्रसंग दिया जा रहा है— एक बार भगवती पार्वती ने भगवान शंकर से कहा–’देव ! आज किसी भक्तश्रेष्ठ का दर्शन कराने की कृपा करें ।’ भगवान शंकर तत्काल उठ खड़े हुए और बोले–’जीवन के वही क्षण सार्थक हैं जो भगवान के भक्तों के सांनिध्य में व्यतीत हों ।’ भगवान शंकर पार्वती जी को वृषभ पर बैठाकर चल दिए । पार्वती जी ने पूछा–’हम कहां जा रहे हैं ?’ शंकर जी ने कहा–’हस्तिनापुर चलेंगे । जिनके रथ का सारथि बनना श्रीकृष्ण ने स्वीकार किया, उन महाभाग्यशाली अर्जुन के अतिरिक्त श्रेष्ठ भक्त पृथ्वी पर और कौन हो सकता है ? श्रीकृष्ण और अर्जुन—एक ही आत्मा के दो रूप हैं ।’ हस्तिनापुर में अर्जुन के भवन के द्वार पर पहुँचने पर भगवान शंकर को पता लगा कि अर्जुन सो रहे हैं । पार्वती जी को भक्त का दर्शन करने की जल्दी थी; परंतु शंकर जी अर्जुन की निद्रा में विघ्न डालना नहीं चाहते थे । उन्होंने श्रीकृष्ण का स्मरण किया । तत्काल ही श्रीकृष्ण उद्धव जी, रुक्मिणी जी और सत्यभामा जी के साथ पधारे और शंकर-पार्वती जी को प्रणाम कर उनसे आने का कारण पूछा । शंकर जी ने कहा–’आप भीतर जाकर अपने सखा को जगा दें, क्योंकि पार्वती जी अर्जुन के दर्शन करना चाहती हैं ।’ ‘जैसी आज्ञा’ कहकर श्रीकृष्ण अंदर चले गए । बहुत देर हो गयी पर अंदर से कोई संदेश नहीं आया । तब शंकर जी ने ब्रह्मा जी का स्मरण किया । हंस पर बैठ कर चतुर्भुज ब्रह्मा जी वहां आए तो शंकर जी ने उन्हें अर्जुन के कक्ष में भेजा । परन्तु ब्रह्मा जी के अंदर जाने पर बहुत देर तक उनका कोई संदेश नहीं आया । शंकर जी ने नारद जी का स्मरण किया । शंकर जी की आज्ञा से नारद जी अंदर गए; किन्तु संदेश तो दूर, कक्ष से वीणा की झंकार सुनाई देने लगी । अब पार्वती जी से रहा नहीं गया । वे बोलीं–’यहां तो जो आता है, वहीं का हो जाता है । पता नहीं वहां क्या हो रहा है ? आइये, अब हम स्वयं चलते हैं ।’ पार्वती जी की बात मान कर भगवान शंकर पार्वती जी के साथ अर्जुन के कक्ष में पहुँचे । उधर श्रीकृष्ण जब अर्जुन के कक्ष में पहुँचे तब अर्जुन सो रहे थे और उनके सिरहाने बैठी सुभद्रा जी उन्हें पंखा झल रही थीं । अपने भाई (श्रीकृष्ण) को आया देखकर वे खड़ी हो गईं और सत्यभामा जी पंखा झलने लगीं । उद्धव जी भी पंखा झलने लगे । रुक्मिणी जी अर्जुन के पैर दबाने लगीं । तभी उद्धव जी व सत्यभामा जी चकित होकर एक-दूसरे को देखने लगे । श्रीकृष्ण ने पूछा–’क्या बात है ?’ तब उद्धव जी ने उत्तर दिया–’धन्य हैं ये कुन्तीनन्दन ! निद्रा में भी इनके रोम-रोम से ‘श्रीकृष्ण-श्रीकृष्ण’ की ध्वनि निकल रही है ।’ तभी रुक्मिणी जी बोलीं–’वह तो इनके चरणों से भी निकल रही है।’ अर्जुन के शरीर से निकलती अपने नाम की ध्वनि जब श्रीकृष्ण के कान में पड़ी तो प्रेमविह्वल होकर भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण स्वयं अर्जुन के चरण दबाने बैठ गए । भगवान श्रीकृष्ण के नवनीत से भी सुकुमार हाथों के स्पर्श से अर्जुन की निद्रा और भी प्रगाढ़ हो गयी । उसी समय ब्रह्मा जी ने कक्ष में प्रवेश किया और यह दृश्य देखा कि भक्त सो रहा है और उसके रोम-रोम से ‘श्रीकृष्ण’ की मधुर ध्वनि निकल रही है । स्वयं भगवान श्रीकृष्ण अपनी पत्नी रुक्मिणी जी के साथ उसके चरण दबा रहे हैं । ब्रह्मा जी भावविह्वल हो गए और अपने चारों मुखों से वेद की स्तुति करने लगे । इसे देखकर देवर्षि नारद भी वीणा बजाकर संकीर्तन करने लगे । किसी को भी यह स्मरण नहीं रहा कि वे अर्जुन को जगाने इस कक्ष में आए हैं । भगवान शंकर व माता पार्वती जी भक्त और भगवान के इस अलौकिक दिव्य-प्रेम को देखकर प्रेम के अपार सिन्धु में निमग्न हो गए । शंकर जी का डमरू ‘डिमडिम-डिमडिम’ निनाद करने लगा और वे नृत्य करने लगे । पार्वती जी भी स्वर मिला कर हरिगुणगान करने लगीं । इस तरह सच्चे भक्त के अलौकिक दिव्य-प्रेम ने भगवान को भी भावविह्वल कर दिया । नाम ही जपै शून्य मन धरै, पाँचों इन्द्रिय वश में करै । ब्रह्म अगिनि में होमै काया, ताके विष्णु पखारै पाँया ।। भगवान के नाम में विलक्षण शक्ति है । जिस प्रकार किसी व्यक्ति का नाम लेने पर वही आता है; ठीक उसी तरह ‘श्रीकृष्ण’ नाम का उच्चारण करने पर वह तीर की तरह लक्ष्यभेद करता हुआ सीधे भगवान के हृदय पर प्रभाव करता है; जिसके फलस्वरूप मनुष्य श्रीकृष्ण कृपा का भाजन बनता है । जहाँ कहीं और कभी भी शुद्ध हृदय से ‘कृष्ण’ नाम का उच्चारण होता है; वहाँ-वहाँ स्वयं कृष्ण अपने को व्यक्त करते हैं । आज इस घोर कलिकाल में भगवान तो प्रकट हैं नहीं, जो कलयुगी मानव का उद्धार करें; परन्तु उनका नाम तो है ही । इसलिए— साँस-साँस पर कृष्ण भज, वृथा साँस मत खोय । ना जाने या साँस को आवन होय, न होय ।।

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Hara Narayan Mishra May 28, 2022

सभी स्नेही मानसप्रेमी साधकजनों को हमारी स्नेहमयी राम राम | जय सियाराम जय सियाराम जय सियाराम जय जय सियाराम श्रीरामचरितमानस–अरण्य काण्ड दोहा संख्या 001से आगे ....... चौपाई : प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा॥ धरि निज रूप गयउ पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं॥ भा निरास उपजी मन त्रासा। जथा चक्र भय रिषि दुर्बासा॥ ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका॥ काहूँ बैठन कहा न ओही। राखि को सकइ राम कर द्रोही ॥ मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना॥ मित्र करइ सत रिपु कै करनी। ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी॥ सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता॥ नारद देखा बिकल जयंता। लगि दया कोमल चित संता॥ पठवा तुरत राम पहिं ताही। कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही॥ आतुर सभय गहेसि पद जाई। त्राहि त्राहि दयाल रघुराई॥ अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जानि नहीं पाई॥ निज कृत कर्म जनित फल पायउँ। अब प्रभु पाहि सरन तकि आयउँ॥ सुनि कृपाल अति आरत बानी। एकनयन करि तजा भवानी॥ भावार्थ:-मंत्र से प्रेरित होकर वह ब्रह्मबाण दौड़ा। कौआ भयभीत होकर भाग चला । वह अपना असली रूप धरकर पिता इन्द्र के पास गया, पर श्री रामजी का विरोधी जानकर इन्द्र ने उसको नहीं रखा ॥ तब वह निराश हो गया, उसके मन में भय उत्पन्न हो गया, जैसे दुर्वासा ऋषि को चक्र से भय हुआ था। वह ब्रह्मलोक, शिवलोक आदि समस्त लोकों में थका हुआ और भय-शोक से व्याकुल होकर भागता फिरा ॥ (पर रखना तो दूर रहा) किसी ने उसे बैठने तक के लिए नहीं कहा। श्री रामजी के द्रोही को कौन रख सकता है ? (काकभुशुण्डिजी कहते हैं-) है गरुड़ ! सुनिए, उसके लिए माता मृत्यु के समान, पिता यमराज के समान और अमृत विष के समान हो जाता है ॥ मित्र सैकड़ों शत्रुओं की सी करनी करने लगता है। देवनदी गंगाजी उसके लिए वैतरणी (यमपुरी की नदी) हो जाती है। हे भाई! सुनिए, जो श्री रघुनाथजी के विमुख होता है, समस्त जगत उनके लिए अग्नि से भी अधिक गरम (जलाने वाला) हो जाता है ॥ नारदजी ने जयन्त को व्याकुल देखा तो उन्हें दया आ गई, क्योंकि संतों का चित्त बड़ा कोमल होता है। उन्होंने उसे समझाकर तुरंत श्री रामजी के पास भेज दिया। उसने (जाकर) पुकारकर कहा- हे शरणागत के हितकारी ! मेरी रक्षा कीजिए॥ आतुर और भयभीत जयन्त ने जाकर श्री रामजी के चरण पकड़ लिए (और कहा-) हे दयालु रघुनाथजी ! रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए। आपके अतुलित बल और आपकी अतुलित प्रभुता (सामर्थ्य) को मैं मन्दबुद्धि जान नहीं पाया था॥अपने कर्म से उत्पन्न हुआ फल मैंने पा लिया। अब हे प्रभु! मेरी रक्षा कीजिए। मैं आपकी शरण तक कर आया हूँ। शिवजी कहते हैं- हे पार्वती ! कृपालु श्री रघुनाथजी ने उसकी अत्यंत आर्त्त (दुःख भरी) वाणी सुनकर उसे एक आँख का काना करके छोड़ दिया ॥ सोरठा : कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि कर बध उचित। प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम॥2॥ भावार्थ:-उसने मोहवश द्रोह किया था, इसलिए यद्यपि उसका वध ही उचित था, पर प्रभु ने कृपा करके उसे छोड़ दिया। श्री रामजी के समान कृपालु और कौन होगा ? ॥2॥ शेष अगली पोस्ट में.... गोस्वामी तुलसीदासरचित श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, सोरठा संख्या 002, टीकाकार श्रद्धेय भाई श्रीहनुमान प्रसाद पोद्दार, पुस्तक कोड-81, गीताप्रेस गोरखपुर

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Hara Narayan Mishra May 28, 2022

*॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥* "श्रीमद्भागवतमहापुराण" स्कन्ध 06; अध्याय 17,श्रलोक..(01-41) ---------------------------------------- *चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप* ---------------------------------------- श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! विद्याधर चित्रकेतु, जिस दिशा में भगवान्‌ सङ्कर्षण अन्तर्धान हुए थे, उसे नमस्कार करके आकाशमार्ग से स्वच्छन्द विचरने लगे ।महायोगी चित्रकेतु करोड़ों वर्षों तक सब प्रकार के संकल्पों को पूर्ण करनेवाली सुमेरु पर्वत की घाटियों में विहार करते रहे। उनके शरीर का बल और इन्द्रियों की शक्ति अक्षुण्ण रही। बड़े-बड़े मुनि, सिद्ध, चारण उनकी स्तुति करते रहते। उनकी प्रेरणासे विद्याधरोंकी स्त्रियाँ उनके पास सर्वशक्तिमान् भगवान्‌के गुण और लीलाओंका गान करती रहतीं । एक दिन चित्रकेतु भगवान्‌के दिये हुए तेजोमय विमानपर सवार होकर कहीं जा रहे थे। इसी समय उन्होंने देखा कि भगवान्‌ शङ्कर बड़े-बड़े मुनियोंकी सभामें सिद्ध-चारणोंके बीच बैठे हुए हैं और साथ ही भगवती पार्वतीको अपनी गोदमें बैठाकर एक हाथसे उन्हें आलिङ्गन किये हुए हैं, यह देखकर चित्रकेतु विमानपर चढ़े हुए ही उनके पास चले गये और भगवती पार्वतीको सुना-सुनाकर जोरसे हँसने और कहने लगे । चित्रकेतु ने कहा—अहो ! ये सारे जगत् के धर्मशिक्षक और गुरुदेव हैं। ये समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ हैं। इनकी यह दशा है कि भरी सभा में अपनी पत्नी को शरीर से चिपकाकर बैठे हुए हैं । जटाधारी, बहुत बड़े तपस्वी एवं ब्रह्मवादियोंके सभापति होकर भी साधारण पुरुषके समान निर्लज्जतासे गोदमें स्त्री लेकर बैठे हैं । प्राय: साधारण पुरुष भी एकान्तमें ही स्त्रियोंके साथ उठते-बैठते हैं, परंतु ये इतने बड़े व्रतधारी होकर भी उसे भरी सभामें लिये बैठे हैं । श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌! भगवान्‌ शङ्करकी बुद्धि अगाध है। चित्रकेतुका यह कटाक्ष सुनकर वे हँसने लगे, कुछ भी बोले नहीं। उस सभामें बैठे हुए उनके अनुयायी सदस्य भी चुप रहे। चित्रकेतुको भगवान्‌ शङ्करका प्रभाव नहीं मालूम था। इसीसे वे उनके लिये बहुत कुछ बुरा-भला बक रहे थे। उन्हें इस बातका घमंड हो गया था कि ‘मैं जितेन्द्रिय हूँ।’ पार्वतीजीने उनकी यह धृष्टता देखकर क्रोधसे कहा। पार्वतीजी बोलीं—अहो ! हम-जैसे दुष्ट और निर्लज्जोंका दण्डके बलपर शासन एवं तिरस्कार करनेवाला प्रभु इस संसारमें यही है क्या ? जान पड़ता है कि ब्रह्माजी, भृगु, नारद आदि उनके पुत्र, सनकादि परमर्षि, कपिलदेव और मनु आदि बड़े-बड़े महापुरुष धर्मका रहस्य नहीं जानते। तभी तो वे धर्ममर्यादा का उल्लङ्घन करनेवाले भगवान्‌ शिव को इस कामसे नहीं रोकते । ब्रह्मा आदि समस्त महापुरुष जिनके चरणकमलों का ध्यान करते रहते हैं, उन्हीं मङ्गलों को मङ्गल बनाने वाले साक्षात् जगद्गुरु भगवान्‌ का और उनके अनुयायी महात्माओं का इस अधम क्षत्रिय ने तिरस्कार किया है और शासन करनेकी चेष्टा की है। इसलिये यह ढीठ सर्वथा दण्डका पात्र है । इसे अपने बड़प्पनका घमंड है। यह मूर्ख भगवान्‌ श्रीहरिके उन चरणकमलोंमें रहनेयोग्य नहीं है, जिनकी उपासना बड़े-बड़े सत्पुरुष किया करते हैं । अत: दुर्मते ! तुम पापमय असुरयोनिमें जाओ। ऐसा होनेसे बेटा ! तुम फिर कभी किसी महापुरुषका अपराध नहीं कर सकोगे। श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌! जब पार्वतीजीने इस प्रकार चित्रकेतुको शाप दिया, तब वे विमानसे उतर पड़े और सिर झुकाकर उन्हें प्रसन्न करने लगे । चित्रकेतुने कहा—माता पार्वतीजी ! मैं बड़ी प्रसन्नतासे अपने दोनों हाथ जोडक़र आपका शाप स्वीकार करता हूँ। क्योंकि देवतालोग मनुष्योंके लिये जो कुछ कह देते हैं, वह उनके प्रारब्धानुसार मिलनेवाले फलकी पूर्वसूचनामात्र होती है । देवि ! यह जीव अज्ञानसे मोहित हो रहा है और इसी कारण इस संसार-चक्रमें भटकता रहता है तथा सदा-सर्वदा सर्वत्र सुख और दु:ख भोगता रहता है । माताजी ! सुख और दु:खको देनेवाला न तो अपना आत्मा है और न कोई दूसरा। जो अज्ञानी हैं, वे ही अपनेको अथवा दूसरेको सुख-दु:खका कर्ता माना करते हैं । यह जगत् सत्त्व, रज आदि गुणोंका स्वाभाविक प्रवाह है। इसमें क्या शाप, क्या अनुग्रह, क्या स्वर्ग, क्या नरक और क्या सुख, क्या दु:ख । एकमात्र परिपूर्णतम भगवान्‌ ही बिना किसीकी सहायताके अपनी आत्मस्वरूपिणी मायाके द्वारा समस्त प्राणियोंकी तथा उनके बन्धन, मोक्ष और सुख-दु:खकी रचना करते हैं । माताजी ! भगवान्‌ श्रीहरि सबमें सम और माया आदि मलसे रहित हैं। उनका कोई प्रिय-अप्रिय, जाति-बन्धु, अपना-पराया नहीं है। जब उनका सुखमें राग ही नहीं है, तब उनमें रागजन्य क्रोध तो हो ही कैसे सकता है । तथापि उनकी मायाशक्तिके कार्य पाप और पुण्य ही प्राणियोंके सुख-दु:ख, हित-अहित, बन्ध-मोक्ष, मृत्यु-जन्म और आवागमनके कारण बनते हैं । पतिप्राणा देवि ! मैं शापसे मुक्त होनेके लिये आपको प्रसन्न नहीं कर रहा हूँ। मैं तो यह चाहता हूँ कि आपको मेरी जो बात अनुचित प्रतीत हुई हो, उसके लिये क्षमा करें । श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! विद्याधर चित्रकेतु भगवान्‌ शङ्कर और पार्वतीजीको इस प्रकार प्रसन्न करके उनके सामने ही विमानपर सवार होकर वहाँसे चले गये। इससे उन लोगोंको बड़ा विस्मय हुआ । तब भगवान्‌ शङ्करने देवता, ऋषि, दैत्य, सिद्ध और पार्षदोंके सामने ही भगवती पार्वतीजीसे यह बात कही । भगवान्‌ शङ्कर ने कहा—सुन्दरि ! दिव्यलीला-विहारी भगवान्‌ के नि:स्पृह और उदारहृदय दासानुदासों की महिमा तुमने अपनी आँखों देख ली । जो लोग भगवान्‌ के शरणागत होते हैं, वे किसी से भी नहीं डरते। क्योंकि उन्हें स्वर्ग, मोक्ष और नरकोंमें भी एक ही वस्तु के—केवल भगवान्‌ के ही समान भाव से दर्शन होते हैं । जीवों को भगवान्‌ की लीला से ही देहका संयोग होने के कारण सुख-दु:ख, जन्म-मरण और शाप-अनुग्रह आदि द्वन्द्व प्राप्त होते हैं । जैसे स्वप्नमें भेद-भ्रमसे सुख-दु:ख आदिकी प्रतीति होती है और जाग्रत्-अवस्थामें भ्रमवश मालामें ही सर्पबुद्धि हो जाती है—वैसे ही मनुष्य अज्ञानवश आत्मामें देवता, मनुष्य आदिका भेद तथा गुण-दोष आदिकी कल्पना कर लेता है । जिनके पास ज्ञान और वैराग्यका बल है और जो भगवान्‌ वासुदेव के चरणोंमें भक्तिभाव रखते हैं, उनके लिये इस जगत् में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जिसे वे हेय या उपादेय समझकर राग-द्वेष करें । मैं, ब्रह्माजी, सनकादि, नारद, ब्रह्माजीके पुत्र भृगु आदि मुनि और बड़े-बड़े देवता—कोई भी भगवान्‌की लीलाका रहस्य नहीं जान पाते। ऐसी अवस्थामें जो उनके नन्हे-से-नन्हे अंश हैं और अपनेको उनसे अलग ईश्वर मान बैठे हैं, वे उनके स्वरूपको जान ही कैसे सकते हैं ? भगवान्‌को न कोई प्रिय है और न अप्रिय। उनका न कोई अपना है और न पराया। वे सभी प्राणियोंके आत्मा हैं, इसलिये सभी प्राणियोंके प्रियतम हैं । प्रिये ! यह परम भाग्यवान् चित्रकेतु उन्हींका प्रिय अनुचर, शान्त एवं समदर्शी है और मैं भी भगवान्‌ श्रीहरिका ही प्रिय हूँ । इसलिये तुम्हें भगवान्‌के प्यारे भक्त, शान्त, समदर्शी, महात्मा पुरुषोंके सम्बन्धमें किसी प्रकारका आश्चर्य नहीं करना चाहिये । श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! भगवान्‌ शङ्कर का यह भाषण सुनकर भगवती पार्वती की चित्तवृत्ति शान्त हो गयी और उनका विस्मय जाता रहा । भगवान्‌ के परमप्रेमी भक्त चित्रकेतु भी भगवती पार्वती को बदले में शाप दे सकते थे, परंतु उन्होंने उन्हें शाप न देकर उनका शाप सिर चढ़ा लिया ! यही साधु पुरुषका लक्षण है। यही विद्याधर चित्रकेतु दानवयोनिका आश्रय लेकर त्वष्टाके दक्षिणाग्रिसे पैदा हुए। वहाँ इनका नाम वृत्रासुर हुआ और वहाँ भी ये भगवत्स्वरूपके ज्ञान एवं भक्तिसे परिपूर्ण ही रहे । तुमने मुझसे पूछा था कि वृत्रासुरका दैत्ययोनिमें जन्म क्यों हुआ और उसे भगवान्‌की ऐसी भक्ति कैसे प्राप्त हुई। उसका पूरा-पूरा विवरण मैंने तुम्हें सुना दिया । महात्मा चित्रकेतुका यह पवित्र इतिहास केवल उनका ही नहीं, समस्त विष्णुभक्तोंका माहात्म्य है; इसे जो सुनता है, वह समस्त बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है । जो पुरुष प्रात:काल उठकर मौन रहकर श्रद्धाके साथ भगवान्‌का स्मरण करते हुए इस इतिहासका पाठ करता है, उसे परमगतिकी प्राप्ति होती है । क्रमशः अगला पोस्ट :- “स्कन्ध 06; अध्याय 18;श्रलोक 01से 78 तक” ---------------------------------------- "गीताप्रेस ; गोरखपुर द्वारा प्रकाशित पुस्तक *'श्रीमद्भागवतमहापुराण'* पु० कोड..(1535) से"

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