g s singh Aug 19, 2022

कमर दर्द , सर्वाइकल और चारपाई. हमारे पूर्वज वैज्ञानिक थे। सोने के लिए खाट हमारे पूर्वजों की सर्वोत्तम खोज है। हमारे पूर्वजों को क्या लकड़ी को चीरना नहीं जानते थे ? वे भी लकड़ी चीरकर उसकी पट्टियाँ बनाकर डबल बेड बना सकते थे। डबल बेड बनाना कोई रॉकेट सायंस नहीं है। लकड़ी की पट्टियों में कीलें ही ठोंकनी होती हैं। चारपाई भी भले कोई सायंस नहीं है , लेकिन एक समझदारी है कि कैसे शरीर को अधिक आराम मिल सके। चारपाई बनाना एक कला है। उसे रस्सी से बुनना पड़ता है और उसमें दिमाग और श्रम लगता है। जब हम सोते हैं , तब सिर और पांव के मुकाबले पेट को अधिक खून की जरूरत होती है ; क्योंकि रात हो या दोपहर में लोग अक्सर खाने के बाद ही सोते हैं। पेट को पाचनक्रिया के लिए अधिक खून की जरूरत होती है। इसलिए सोते समय चारपाई की जोली ही इस स्वास्थ का लाभ पहुंचा सकती है। दुनिया में जितनी भी आरामकुर्सियां देख लें , सभी में चारपाई की तरह जोली बनाई जाती है। बच्चों का पुराना पालना सिर्फ कपडे की जोली का था , लकडी का सपाट बनाकर उसे भी बिगाड़ दिया गया है। चारपाई पर सोने से कमर और पीठ का दर्द का दर्द कभी नही होता है। दर्द होने पर चारपाई पर सोने की सलाह दी जाती है। डबलबेड के नीचे अंधेरा होता है , उसमें रोग के कीटाणु पनपते हैं , वजन में भारी होता है तो रोज-रोज सफाई नहीं हो सकती। चारपाई को रोज सुबह खड़ा कर दिया जाता है और सफाई भी हो जाती है, सूरज का प्रकाश बहुत बढ़िया कीटनाशक है। खटिये को धूप में रखने से खटमल इत्यादि भी नहीं लगते हैं। अगर किसी को डॉक्टर Bed Rest लिख देता है तो दो तीन दिन में उसको English Bed पर लेटने से Bed -Soar शुरू हो जाता है । भारतीय चारपाई ऐसे मरीजों के बहुत काम की होती है । चारपाई पर Bed Soar नहीं होता क्योकि इसमें से हवा आर पार होती रहती है । गर्मियों में इंग्लिश Bed गर्म हो जाता है इसलिए AC की अधिक जरुरत पड़ती है जबकि सनातन चारपाई पर नीचे से हवा लगने के कारण गर्मी बहुत कम लगती है । बान की चारपाई पर सोने से सारी रात Automatically सारे शारीर का Acupressure होता रहता है । गर्मी में छत पर चारपाई डालकर सोने का आनद ही और है। ताज़ी हवा , बदलता मोसम , तारों की छाव ,चन्द्रमा की शीतलता जीवन में उमंग भर देती है । हर घर में एक स्वदेशी बाण की बुनी हुई (प्लास्टिक की नहीं ) चारपाई होनी चाहिए । सस्ते प्लास्टिक की रस्सी और पट्टी आ गयी है , लेकिन वह सही नही है। स्वदेशी चारपाई के बदले हजारों रुपये की दवा और डॉक्टर का खर्च बचाया जा सकता है।l अगर दाब या कांस की बुनी हुए तो सर्वोत्तम होती है। ऐसे और पोस्ट देखने के लिए और JAIDEV INTERNATIONAL से जुड़ने के लिए क्लिक करें 👇👇 https://kutumbapp.page.link/LRLzXmfTecEQToNYA?ref=6YTEB

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g s singh Aug 18, 2022

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g s singh Aug 18, 2022

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g s singh Aug 17, 2022

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g s singh Aug 17, 2022

*"स्व-तंत्र" की चेतना का अमृत महोत्सव* आज हमारा भारत स्वतंत्रता दिवस की 75 वीं वर्षगांठ मना रहा है। आज के दिन ही 75 वर्ष पूर्व अंतिम परकीय सत्ता से मुक्त हुआ था हमारा भारत। सदियों से प्रत्येक भारतीय ही नहीं वरन भारत से बाहर के लोग भी हमारे देश को "गोल्डन बर्ड" अर्थात सोने की चिड़िया कहते आ रहे हैं। भारतवर्ष में सोना सभी क्षेत्रों में धन का प्रतीक है। सोने की चिड़िया से स्पष्ट है कि भारत सबसे धनी देशों में से एक रहा है। यह धन केवल अर्थ का ही नहीं अपितु सभी क्षेत्रों में समृद्धि का प्रतीक है। आर्थिक, कृषि, शैक्षिक, अनुसंधानिक, सामाजिक, सामरिक, नैतिक... इत्यादि सभी विषयों में समृद्धि हमारी विरासत में सदियों से है। अत्याधुनिक विज्ञान एवं पुरातात्विक सर्वेक्षण के आधार पर भी हमारा इतिहास कम से कम 10,000 वर्षों का है। प्रारंभिक काल से ही हमारी अर्थव्यवस्था इतनी सुदृढ़ रही कि नगर से लेकर ग्राम तक कोई बेरोजगार नहीं था और न ही कोई भूखा मरता था। शैक्षणिक व्यवस्था इतनी उत्कट एवं प्रभावी थी कि प्रत्येक ग्राम में गुरुकुल थे। गुरुकुल में सभी वर्गों के सर्वांगीण उन्नति की चिंता होती थी। त्याग, समर्पण एवं आस्था की प्रबलता से सर्वजनहिताय सर्वजनसुखाय की परोपकारी वृत्ति जन-जन में भरी हुई थी। शिक्षा बिल्कुल व्यवहारिक थी जिसमें नित्य नवीन प्रयोग एवं अनुसंधान का समावेश था। नैतिक जीवन मूल्य आधारित सामाजिक व्यवस्था इतनी सहयोगात्मक एवं समरस कि कलम, श्रम एवं श्रम भी कलम के लिए अपनी जान तक छिड़क दे। सबके अंदर मातृभूमि के प्रति अगाध स्नेह एवं बुराइयों के प्रति दंड-विधान भी सख्त। मातृशक्ति के प्रति अतिशय सम व्यवहार एवं सम्मान हमारे समृद्ध सामाजिक व्यवस्था के आदर्श स्थिति को प्रतिबिंबित करती है। अपने आप को विकसित का ढिंढोरा पीटने वाला संसार का कोई भी देश, आज भी एक बार खड़ा होकर कहे कि हमारे यहां नारियों को सम्मान है। अरे! वह हम भारतवासी ही हैं जिसने आज तक भी नारियों को देवी का दर्जा दिया है। विश्वास नहीं हो तो सुदूर गांव जाकर आज भी सामान्य नारियों से नाम पूछोगे तो वे अपने नाम के साथ देवी बोलती हैं। हां, आजकल के नव विकसित समाज में शहरों की नारियां अपने नाम के पीछे देवी लगाना मूर्खता की निशानी समझने लगी हैं। उनके कहने का तात्पर्य यह है कि पढ़े-लिखे लोग अपने नाम के साथ कुछ न कुछ टाइटल लगाते हैं। देवी तो अनपढ़ लोगों के लिए है जिन्हें कोई सर्टिफिकेट नहीं है। यह हमारे समाज में बाहर से आई हुई विकृति है। भारतवर्ष के इतिहास को सूक्ष्मता से खंगालने पर कई विदुषी मातृशक्ति के उदाहरण मिलेंगे। देवी का सम्मान एवं शिक्षा के उच्च स्तर से स्पष्ट है कि हमारे समाज में लिंग भेद भी कतई नहीं था। सुरक्षा के प्रति लोगों में इतनी साहसिक संवेदना थी कि बहुजनों की रक्षा में अपने प्राणों की बलि भी स्वीकार्य थी। देश की रक्षा के लिए ग्राम-ग्राम एवं नगर-नगर में पाठशाला के साथ मल्लशालाएं साथ-साथ चलती थीं। हमारे इतिहास में कई ऐसे महापुरुष हुए हैं जिनके एक हाथ में शस्त्र तो दूसरे हाथ में शास्त्र है। शस्त्र एवं शास्त्र का बेजोड़ समन्वय एवं संतुलन हमारे प्राचीन जीवन शैली की उत्कृष्टता को प्रदर्शित करता है। जिससे व्यक्ति-व्यक्ति में राष्ट्र भावना का संचार इस प्रकार हो रहा था कि मेरा गांव ही मेरा देश। यह सर्वत्रसमभावना थी। वसुधैव कुटुंबकम् या वसुंधरा परिवार हमारा यह हमारा उदात्त चिंतन रहा है। अर्थात वसुधा पर निवास करने वाली सभी जंतु एवं जीवों के अलावा अजैव घटकों अर्थात पंचतत्वों से भी हमारा कुटुंब अर्थात परिवार जैसा व्यवहार रहा है। हम अपनी रक्षा के साथ-साथ प्रकृति के पर्यावरण की सुरक्षा की भी चिंता परिजनों के जैसा ही करते रहे हैं। विचारणीय प्रश्न है- अब इतनी उन्नत सोच रखता हुआ समाज मनुष्य-मनुष्य में ही भेद कैसे कर सकता है! आज की पीढ़ी यह कहती है ये तो हमने इतिहास में पढ़ा है। इतिहास को किस प्रकार कहा गया था और किस प्रकार लिखी गई है यह चिंतन मंथन करिए, सारी बातें समझ में आ जाएगी। केवल तोते की तरह रटते रहेंगे तो मेरी बातें भी थोथी दलील सी ही लगेगी। शासन व्यवस्था इतनी शक्तिशाली थी कि छोटे-छोटे स्थानों पर भी शासन-प्रशासन की सुदृढ़ संरचन, जिससे देश की अखंडता अक्षुण्ण रहे। इसकी देखरेख और समुचित विकास की व्यवस्था भी कड़ी के रूप में उससे ऊपर और सबसे ऊपर अपना राष्ट्र अर्थात राष्ट्र सर्वोपरि का भाव जन-जन में चिरंतन काल से ही रहा है। इसलिए छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त रहकर भी भारत सदैव राष्ट्रीयता के रूप में एक दूसरे से बिखर कर कभी नहीं रहा। छोटे-छोटे जनपदों के शासक समग्र रूप से भारतवर्ष का चिंतन करते और रक्षा के लिए सम्मिलित प्रयत्नशील रहते। जीवन पद्धति इतनी सहज एवं सरल कि सामान्य जनों के घर आए नवागंतुक को देवता के जैसा सम्मान मिलता था। दरवाजे पर किसी बाहरी नागरिक को देखकर उसके समुचित भोजन और ठहराव की व्यवस्था हमारे समृद्ध समाज की ओर इशारा करते हैं। इतना ही नहीं आवश्यकता पड़े तो उसके जीविकोपार्जन की व्यवस्था तक के लिए हमारे यहां चिंतन था और उनके साथ ही व्यवहार बिल्कुल परिजन जैसा ही था। इस प्रकार वसुधा का कोई भी नागरिक अपनी जीविका चलाने के लिए व्यापार-व्यवसाय के लिए अपने यहां आकर परिवार भी चलाता और सम्मान भी पाता रहा। इस प्रकार "अतिथिदेवो भवः" के सूत्र पर अपने यहां आश्रय पाने वाले ने हमारी संपन्नता की चर्चा अपने समूह एवं समुदायों के बीच भी की जो आदम खानाबदोश की जिंदगी जीते थे, वह भी सुदूर द्वीपों पर जिन्हें खाने पीने के लिए भी लालायित रहना पड़ता, संपन्न जीवन तो दुर्लभ ही था। भारतवर्ष की इन्हीं संस्कारों एवं उदारवादी सामाजिक नीतियों के कारण बाहरी लुटेरों एवं आक्रमणकारियों की कुदृष्टि हमारे ऊपर पड़ी। ईरानियों, यूनानियों, शकों, हूनों आदि ने आक्रमण किए। कुछ को तो वापस जाना पड़ा बाकी को हमने पचा लिया अर्थात वह हमारी संस्कृति के अनुरूप रच बस गए। अर्थात हमारी जीवनशैली इतनी सभ्य एवं प्रभावी थी कईयों ने सभ्यता के साथ यहां रहना भी स्वीकार किया। इतिहासकारों ने सिकंदर को विश्व विजेता कहा है परंतु सिकंदर भारतवर्ष के ही राजा पोरस से पराजित होकर वापस गया था। भला कोई विश्वविजेता खाली हाथ अपने देश लौटेगा! अरे! वह तो हार नहीं पचा पाया और अपने देश पहुंचते-पहुंचते ही स्वर्गवासी हो गया। समझदार लोगों के लिए यह इशारा ही काफी है कि मरते वक्त भी उसने यही कहा था कि मेरे दोनों हाथ कब्र से बाहर कर देना कि लोग यह देखें कि विश्वविजेता का सपना देखने वाला व्यक्ति भी खाली हाथ ही यहां से गया। 712 ईस्वी में अरब शासक अल्ल हज्जाम के भतीजे एवं दामाद मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध एवं बलूच प्रांत पर आक्रमण किया। सिंध प्रांत के राजा दाहिर आतिथ्य सत्कार करने में व्यस्त रहे तब तक कासिम ने आक्रमण कर दाहिर को बंदी बना लिया। क्रूरता एवं अपसंस्कृतियों का व्यवहार देखिए कि उनकी दोनों जवान बेटियों का बलात्कार किया गया। हालांकि उन वीरांगनाओं ने भी वीरता का अद्भुत उदाहरण दिखाते हुए कासिम से बदला लिया। भारत अब चैन से नहीं रहने वाला था अब विश्व में यह बात फैल गई की एक ऐसा भारतीय महाद्वीप है जहां अकूत संपत्ति एवं अतीव समृद्धि है परंतु वहां के निवासी बड़े सच्चे और सरल हृदय के हैं। सरल हृदय एवं आतिथ्य भाव ही हमारी कमजोरी बन गई। इसके बाद तुर्कों का आक्रमण हुआ। सुबुक्तगीन, गजनी एवं गौरी लूट कर धन स्त्रियां आदि भी ले गया। बाद में अपने गुलामों के हाथ में दिल्ली सल्तनत को छोड़ा दिया। गुलामों के बाद मंगोल, खिलजी, तुगलक, लोधी आदि ने आक्रमण कर क्रूरता के साथ शासन किया। 16वीं शताब्दी के आरंभ में भारत प्रवेश करने वाला क्रूर आक्रांता बाबर ने न केवल भारत की संपदा को लूटी बल्कि लोदियों को हराकर शासन सत्ता में आया और मुगलिया सल्तनत की स्थापना की। इन लोगों ने भारत को लूटने के साथ ही यहां की धार्मिक पुस्तकों एवं पुस्तकालयों को जलाकर बर्बाद करने के साथ ही जबरन धर्मांतरण का खेल तलवार के बल पर किया। दिल्ली पर हुकूमत करने वाले बाबर, हुमायूं, अकबर, जहांगीर, शाहजहां आदि मुगलों ने भारतीय सभ्यता संस्कृति के साथ-साथ मंदिरों एवं स्थापत्य का भी विध्वंस किया। इतिहासकार इस काल को स्थापत्य कला का स्वर्णिम काल बताते हैं। हां, वही स्वर्णिम काल जिसमें बड़े-बड़े महलों एवं मंदिरों को तोड़कर उस पर गुंबद स्थापित कर दिए गए अंदर की बनावट वही रही और बाहर से लीपापोती कर नई संरचना दी गई। यह मैं नहीं कह रहा हूं आज जब देश की परिस्थितियां बदली है तो यह पुरातत्व विभाग के सर्वमान्य पुरातत्वविद बता रहे हैं। हद तो औरंगजेब ने की जब दबाव में भयाक्रांत कर समाज को धर्मांतरित किया अन्यथा मौत के घाट उतारा। तब तक भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के नाम से अंग्रेज व्यवसायी के रूप में प्रवेश कर चुका था। अंग्रेज केवल व्यवसाय कर अपनी जीविकोपार्जन हेतु ही नहीं बल्कि पुनर्जागरण एवं औद्योगिक क्रांति के नाम पर औपनिवेशिक साम्राज्यवाद का लक्ष्य लेकर आया था। जिस भारतीय समाज के घरों के दरवाजे में ताले तक नहीं लगते थे,वसुधैव कुटुंबकम् के भाव से अनुप्राणित यह समाज अब भयग्रस्त होकर आत्मविस्मृत भी हो चला था। व्यवसायी के रूप में नगर-नगर एवं ग्राम-ग्राम में जाकर अंग्रेजों ने सर्वप्रथम भारतीय समाज एवं जीवन संरचना का गहन अध्ययन किया। उसे इतना तो दिख गया कि भारत पर सत्तासीन होना इतना आसान नहीं है क्योंकि इसकी गुरुकुल व्यवस्था इतनी सुदृढ़ है कि जन जन में मातृभूमि के प्रति अगाध श्रद्धा व स्नेह है एवं समाज सर्वगुण संपन्न है। व्यावसायिक केंद्रों की घेराबंदी के नाम पर किला तैयार करता अंग्रेज धीरे-धीरे छोटे-छोटे क्षेत्रों में सत्तासीन हो गया। आपस में भड़का कर "फूट डालो और शासन करो" की नीति से सशक्तिशाली होता चला गया। इसके बाद पहले तो गुरुकुल व्यवस्था को अमान्य एवं बर्बाद किया उसके बाद धार्मिक पुनः वर्ग आधार पर समाज को तोड़ा। सामान्य सी बात है कई पीढ़ियों तक अपने ही सामानों से दूर रहने पर एक व्यक्ति अपनी ही धनों को भूल जाता है तो अपनी संस्कृति से सदियों तक विस्मृत होता समाज अपनी मूल सामाजिक व्यवस्था एवं जीवन संरचना से भी कटता चला गया। ऐसा बिष घोला कि समाज अपने ही बंधुओं से द्वेषपूर्ण भावनाओं से घृणा करने लगा। यही अंग्रेजों की प्रायोजित मंशा थी। अंग्रेज अपनी चाल में सफल हो गए और हमारा समाज भिन्न जाति, भाषा, प्रांत, क्षेत्र, वर्ग, रंग इन आधार पर भी अपने आप में ही संघर्ष करने लगा। अब अंग्रेजों को भारत पर शासन करना बिल्कुल आसान हो गया। मनचाहे रूप से उसने भारत का लगभग 200 वर्षों तक शासन तो नहीं कह सकते शोषण किया। ईरानी और यूनानियों से लेकर अंग्रेजों के प्रतिकार स्वरूप सेनानियों की एक लंबी दास्तान है। अनगिन राष्ट्र प्रेमियों ने मातृभूमि रक्षार्थ अपना सर्वस्व न्यौछावर किया है। इनपर एक दृष्टिपात करें तो स्पष्ट दिखता है कहीं-न-कहीं आपसी फूट ही हमारी कमजोरी बनी। चाहे तक्षशिला शासक आम्भी द्वारा पोरष को या जयचंद द्वारा पृथ्वीराज को धोखा दिया गया हो। इसी लंबी कड़ी के बीच में भारतीय जनपद के राजाओं राणा कुंभा, मिहिर भोज, बप्पा रावल, राणा सांगा, महाराणा प्रताप, छत्रसाल, दुर्गादास राठौड़, वीर शिवाजी ने न केवल दुश्मनों के दांत खट्टे किए बल्कि भारतीय संस्कृति को भी बरकरार रखते हुए शासन सत्ता की बागडोर संभाली और परकीय सत्ता का प्रतिकार किया। पेशवा बाजीराव जैसे योद्धाओं ने मातृभूमि की रक्षा में लड़े गए सभी युद्ध जीते। मातृभूमि के संस्कारों के रक्षार्थ गुरु नानक देव जी ने सिख पंथ की स्थापना की जिनके गुरुओं के त्याग समर्पण की गाथा किसी से छुपी नहीं है चाहे वह गुरु तेग बहादुर या गुरु गोविंद सिंह और उनके पुत्रों का हो। एक सच्चाई यह भी है कि कोई भी आक्रमणकारी या एक विदेशी सत्ता, भारत को पूर्णतया गुलाम नहीं बना पाया। कई जनपदों के हमारे ऐसे राजा हुए कि अन्य सभी को जीत जाने के बाद भी जिन्हें जीत पाना आसान नहीं था। भारत को छोड़कर जाने तक भी अंग्रेज उन्हें राजा साहब ही कह के पुकारा करते थे। हमें इतिहास में इन सब का भी अध्ययन करना चाहिए। 1757 के प्लासी युद्ध से ही अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांतिकारी आंदोलन समग्र स्वाधीनता तक चलता रहा। भारत को वास्तविक आजादी तो गोवा मुक्ति 1961 के बाद ही मिली है। जिस प्रकार एक विशाल नदी अपने उद्गम स्थल से गंतव्य अर्थात सागर मिलन तक निर्बाध रूप से बहती जाती है और बीच-बीच में कई छोटी-छोटी अन्य धाराएं मिलकर अपनी अंजुली चढ़ा रही होती है और नदी को सागर तक पहुंचने में मदद करती है, ठीक उसी प्रकार भारतवर्ष की "मुक्ति गंगा प्रवाह" जो 1757 से 1961 तक संघर्षरत रही है उसमें मुक्ति यत्न की विविध धाराएं भी मिलती रही हैं। स्वतंत्रता के सशस्त्र संग्राम की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि क्रांतिकारियों के मुक्ति प्रयास कभी शिथिल न हुए। अनवरत नरम एवं क्रांतिकारी गरम शक्तियां सक्रिय रहीं। परकीय सत्ता से त्रस्त समाज अब मुक्ति हेतु सामूहिक एवं संगठित प्रयास की ओर अग्रसर होता दिख रहा था। ऐसी बात नहीं है ये सारे कार्य एकतरफा चल रहे थे और सुधार के प्रयास नहीं हो रहे थे। इस कड़ी में भारतीय जीवन दर्शनोनुरूप समाज को पुनर्स्थापित करने कई पुरखों ने अपने आपको गलाया। बर्बरता, क्रूरता का दंश झेल रहे समाज के अंदर स्वराज की भावना का अलख जगाने के लिए अनगिन लोगों ने अनथक प्रयास किए। यह प्रयास 1757 के प्लासी के युद्ध के पूर्व से ही चल रहा था। तत्कालीन सभी समाज सुधारकों, क्रांतिकारियों एवं सेनानियों की प्राथमिकता में केवल स्वातंत्र्य ही था । चर्बी युक्त एनफील्ड राइफल के विरोध में बैरकपुर छावनी से क्रांतिकारी मंगल पांडे द्वारा शंखनाद ने भारत के सभी क्षेत्रों को एक बार ही उद्वेलित किया था। 1857 की क्रांति की ज्वाला बहुत जल्द ही समूचे देश में फैल गई। समाज में कोई भी क्रांति अचानक नहीं आती और आती है तो सफलता का भी प्रतिशत बहुत ही कम रहता है। यदि इस कदम की योजना पूर्व में बनी होती या कुछ क्रांतिकारियों से ही सही परंतु देश के प्रत्येक भाग से पूर्व नियोजित रहने पर परिणाम सकारात्मक हो सकता था। परंतु जो घटित हो गया वही सच है। इस क्रांति को भारतीय स्वतंत्रता हेतु प्रथम संग्राम भी कहा जाता है। इसका एक सकारात्मक प्रभाव तो अवश्य पड़ा कि भारतवर्ष के जनमानस में स्वातंत्र्य के लिए व्यक्ति-व्यक्ति में ज्वाला धधक उठी। आध्यात्मिक, क्रांतिकारी एवं सामाजिक रुप से राष्ट्रीयता का बोध जन-जन में भर रहे सेनानियों की संख्या लाखों में थी। केवल पुरुष ही नहीं बल्कि मातृशक्ति भी आगे आकर जान की बाज़ी तक लगा रही थीं। कुछ ने हंसते-हंसते अपने आप को बलिदान किया तो कुछ ने कठिन संघर्षों एवं यातनाओं से अपना दम तोड़ा। लेकिन फांसी पर झूलते एवं टूटते आखरी दम तक अंतर्मन 🚩वंदे मातरम🚩 एवं 🚩भारत माता की जय🚩 का ही उद्घोष कर रहा था। अनगिन बलिदानों के फलस्वरुप विभाजन के कीमत पर, वह भी धार्मिक आधार पर स्वाधीनता भारत को मिली। समाज सुधारकों, बलिदानी सेनानी एवं क्रांतिकारियों की संख्या इतनी बड़ी है कि उनके नाम गिनाए नहीं जा सकते। अंग्रेज जाते-जाते भी अपनी चाल में सफल रहे और हम भारतीय तत्कालीन नेतृत्वकर्ता के अदूरदर्शिता के कारण स्वतंत्र(अखंड भारत) के लिए नाकाम। विभाजन की विभीषिका ऐसी आई कि 14 अगस्त 1947 को भारत पुनः एक बार खंडित हुआ। यह खंडन केवल क्षेत्र को ही बांट गया बाकी लोग तो यहां भी बैठे ही रहे। सिखों को सनातन से अलग एवं नव बौद्धों पैदा, कर भारत के अन्य खंडों की भावनाओं को जगाता हुआ गया। हमारी मातृभूमि हिंदुकुश पर्वत से हिंदू सरोवर तक अखंड रूप से फैली थी। छोटे-छोटे जनपदों से शासन सत्ता को बल देता हमारा समाज अखंड भारत के सुरक्षा के प्रति सदैव प्रतिबद्ध था। इन 12 सौ बरसों से टूटता- टूटता भी हमारा भारत अभी सांस्कृतिक रूप से एक है। इस एकता के सूत्र को बनाए रखने में कई दधीचियों को गलना पड़ा है और आज भी गल रहे हैं। इतने दिनों तक दबे रहने के कारण बहुत सी विकृतियां अवश्य आईं हैं जिससे कि हमारा अपना समाज भी अपने जीवन मूल्यों को ही आत्मविस्मृत कर चुका है। स्वाधीनता पश्चात आधुनिक नेताओं ने भारत के सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन को प्रायः दबाते हुए इतिहास में कम महत्व दिया। इतना ही नहीं कई स्थानों पर उसे विकृत भी किया गया ।इस नए विकृत इतिहास में स्वाधीनता के लिए प्राणोत्सर्ग करनेवाले, सर्वस्व समर्पित करने वाले असंख्य क्रांतिकारी अमर हुतात्मा जिनकी पूर्ण उपेक्षा की गई उनके भी हम भारतवासी ऋणी हैं। देश की सुरक्षा में तैनात सैनिकों एवं आतंकवादी गतिविधियों द्वारा विभाजन की विभीषिका का दंश झेलते हुए अपने जान की बाज़ी लगा सर्वोच्च बलिदान देने वाले अमर बलिदानियों को स्वाधीनता के स्वर्णिम दिवस पर मैं उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूं। आज भी विभाजन का दंश झेल रहा भारत अपनी अस्मिता को अपनों के बीच ही ढूंढ रहा है। स्वतंत्र का सीधा अर्थ है -अपना तंत्र। 1947 से लेकर अभी तक हम अपने तंत्र पर चिंतन करें तो कितना पहुंचे हैं और उस ओर कितने प्रयत्नशील हैं ? तो पता चलेगा कि हम अब भी बहुत पीछे हैं, कारण सर्वविदित है। हम अपनी आंखों के सामने जो परिवर्तन देख रहे हैं क्या यही हमारा स्व है। सर्वांगसंपन्न हमारा राष्ट्र जो सोने की चिड़िया कहलाता था आज भी गोल्डन बर्ड है कि नहीं। आज आजादी की 75 वीं वर्षगांठ हम मना रहे हैं। इतने वर्षों में देश के उत्थान एवं विकसित सामाजिक व्यवस्था में मेरा अपना देश के एक नागरिक होने के नाते योगदान क्या होना चाहिए और मैं क्या कर रहा हूं, इसका व्यावहारिक चिंतन करने की भी आवश्यकता सभी जनों से है। हम सभी नागरिक भारतवासी बनकर इसके प्रति जब सोचेंगे और उन्नत सोच को क्रियान्वयन कर धरातल पर उतारेंगे तब हमारा अपना तंत्र विकसित होगा। सरकार की जिम्मेदारी तो बनती है परंतु सत्य यह भी है कि सरकारें सबकुछ नहीं करती और न ही कर सकती है। उदाहरण स्वरूप यदि लें ... समाज के किसी परिवार की उन्नति में घर के प्रत्येक सदस्य का हाथ होता है और उसकी जिम्मेदारी भी होती है। यदि घर के सदस्यों में से अधिकांश अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं कुछ नहीं भी निभाए तो परिवार की उन्नति होती है और उत्कर्ष पर पहुंचता है। ठीक उसी प्रकार एक राष्ट्र के समुन्नति के लिए भी वहां की अधिकांश नागरिकों की नैतिक जिम्मेदारी होती है। सामान्य जनों का यह हिसाब है कि वे अपने अधिकारों के लिए तो लड़ते हैं यहां तक कि सड़कों पर भी उतरा करते हैं परंतु एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते कर्तव्यपालन के नाम पर शून्यबोध है। देश एवं समाज के लिए कर्तव्य परायणता, उच्च जीवन मूल्यों युक्त, राष्ट्रीयत्वबोध से युक्त होना आवश्यक कड़ी है। नव आधुनिकतावाद की होड़ में हम कहां जा रहे हैं और हमें कहां जाना चाहिए इसका स्वमूल्यांकन कर लक्ष्य भी तय कर उस अनुरूप आगे बढ़ने की आवश्यकता है। सामान्य जन को देश की रक्षा अखंडता के लिए संकल्प लेकर आगे बढ़ना होगा। विकृत मानसिकताओं के लोग, समाज को खंडित करने वाली अलगाववादी शक्तियां चहुंओर से अपना मुंह सुरसा की तरह बाए खड़ी है। वे भी अपना लक्ष्य लेकर उस ओर आगे बढ़ ही रहे हैं वो भी कहीं दूर नहीं हमारे बीच के और बीच ही हैं। हमें उस ओर भी सूक्ष्म सिंहावलोकन करना होगा। भारत आज भी विश्व के केंद्र बिंदु में है। हमारी एक प्रभावशाली छवि पूर्व में भी थी आज भी हम वैश्विक स्तर पर नकारे नहीं जा सकते। दुर्बलता से हमारी यह छवि संभव नहीं हो सकती और हम सक्षम भी नहीं हो सकते। हमें ज्ञान-विज्ञान, अनुसंधान, शिक्षा, सामाजिक, राजनीतिक, सामरिक, आत्म सुरक्षा, आर्थिक, स्वावलंबन, स्वरोजगार आदि के अलावा मूल में स्थित कृषि की उन्नत, उत्तम एवं अद्यतन तकनीक की समुचित व्यवस्था के साथ साथ किसानों के संभाल की चिंता व्यावसायिक नहीं व्यावहारिक रूप से करके सभी क्षेत्रों में सक्षम और संपन्न होना होगा। सभी क्षेत्रों में संपन्नता से ही हम परम वैभव संपन्न होकर वैश्विक स्तर पर सर्वशक्तिमान भी हो सकते हैं, यह दृढ़ विश्वास भी जन-जन को रखना होगा। हमारी भारत माता ने अपना आंचल सभी पुत्रों पर समान फैलाया है परंतु हम पुत्रों का दायित्व बनता है कि मातृभूमि और भूमिपुत्रों से हमारा स्नेहिल भावात्मक जुड़ाव और अखंड भारत का चिंतन हमारे हृदय में सदैव रहे। अपने ही अस्तित्व की पुनर्स्थापना हेतु अपना यह पुण्य पुरातन देश भारतवर्ष अभी परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। बिछड़े-वंचितों को भी मुख्यधारा में ही नहीं बल्कि देश की दिशा-दशा तय करने वाले स्थान पर पहुंचा, देश के रक्षकों के प्रति बढ़ते सम्मान की भावना, देखकर स्वाभाविक रूप से हार्दिक प्रसन्नता हो रही है। आज के 25 वर्ष तक के युवा 2047 में जब हम स्वाधीनता के 100 वर्ष मना रहे होंगे तो उस समय वही नीति-निर्धारक के रूप में रहने वाले हैं। हमें अपने अधिकारों के साथ-साथ मौलिक कर्तव्यों का भी ध्यान सदैव रखना होगा। अपने लक्ष्योनुरूप परिश्रम से व्यक्तिगत जीवन में हम उत्कर्ष पर पहुंचें लेकिन भारत का ध्यान अवश्य रहे। हमारा समग्र चिंतन एक भारतीय होने के नाते अभी से होगा तो आने वाला समय अवश्य ही भारतवर्ष का होगा। विश्व का हर देश जब भी, दिग्भ्रमित हो लड़खड़ाया। लक्ष्य की पहचान करने, इस धरा के पास आया। भूमि यह हर दलित को पुचकारती, हर पतित को उद्धारती। धन्य देश महान! धन्य हिंदुस्तान! सारे परिवर्तनों के जड़ में यदि शिक्षा है तो हम भारतवासी को यह सदा भान रहे कि विश्वविद्यालय की प्रत्यक्ष परिकल्पना विश्व को हमने ही दी है। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के अवसर पर आज हम यह संकल्प लें कि विगत 75 वर्षों में भी, जो हमने हासिल नहीं किया है जहां तक हमारी सूक्ष्मदृष्टि नहीं गई, वहां भी हमारे कदम पहुंचेंगे। हमें अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए भारत को बचा कर रखना होगा अर्थात राष्ट्र सर्वोपरि का भाव युवजनों में कूट-कूट कर भरा रखना होगा। पुण्य मातृभूमि के प्रति श्रद्धा का भाव रख जागृत रुप से जन-जन जब इसे उत्सव स्वरूप आत्मसात करेंगे जिससे निश्चय ही एकात्मकता रुपी अमृत का पान कर यह स्वातंत्र्योत्सव "स्व-तंत्र" महोत्सव का रूप लेकर हमारी भारत माता को सर्वोच्च स्थान पर पुनर्स्थापित करेगा। अपने वास्तविक स्वरूप में हमारी भारत माता सर्वांग सुंदर दिखेगी। इस पुनीत कार्य के लिए गहरी विवेकशील मानवीय संवेदना एवं आवश्यक शक्ति अपने साथ-साथ सभी भारतवासियों को सस्नेह प्रदान करें, मानव इतनी छोटी सी विनती सर्वशक्तिमान श्रीपरमेश्वर से करता हुआ आप सभी स्वजनों को स्वाधीनता के अमृत महोत्सव की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं देता है। *आइए मिलकर प्रेरित करें 🇮🇳* *जय हिन्द की सेना।* *वन्दे भारत मातरम् 🚩* *भारत माता की जय।* *विधान चन्द्र चौधरी* *स्वाधीनता दिवस* *15 अगस्त 2022, सोमवार*

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g s singh Aug 17, 2022

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g s singh Aug 17, 2022

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g s singh Aug 17, 2022

बीजू (बिजयानंद) पटनायक (1916 - 1997) भारत के एकमात्र ऐसे नायक थें जिनकी मृत्यु पर उनके शरीर को तीन देशों के राष्ट्रीय ध्वज में लपेटा गया था भारत, रूस और इंडोनेशिया। बीजू पटनायक 2 बार ओडिशा के मुख्यमंत्री भी रहें, बीजू पटनायक भारतीय सेना में पायलट थे और द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीय सेना इंग्लैंड की तरह से लडी थीं युद्ध के दौरान सोवियत संघ संकट में था तब उन्होंने डकोटा लड़ाकू विमान उड़ाकर हिटलर की सेना पर बमबारी की जिससे हिटलर की सेना पीछे हटने के लिए मजबूर हो गए थें। उन्हें सर्वोच्च पुरस्कार भी दिया गया और उन्हें सोवियत संघ द्वारा मानद नागरिकता प्रदान की गई। जब कबायलीयों ने पाकिस्तान की सेना के साथ मिलकर कश्मीर पर हमला किया तो बीजू पटनायक ने 27 अक्टूबर 1947 को भारतीय सेना का विमान उड़ाकर और सैनिकों को दिल्ली से श्रीनगर तक एक दिन में कई यात्राएँ कीं थीं। इंडोनेशिया कभी डच यानि हॉलैंड का उपनिवेश था और डचों ने इंडोनेशिया के एक बड़े क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था डच सैनिकों ने इंडोनेशिया के आसपास के पूरे समुद्र को अपने नियंत्रण में कर रखा था उन्होंने किसी भी इंडोनेशियाई नागरिक को बाहर नहीं जाने दिया। 1945 में इंडोनेशिया को डचों से मुक्त कराया गया और फिर जुलाई 1947 में प्रधान मंत्री सुतन सजहिर को डचों ने गिरफ्तार कर लिया उन्होंने भारत से मदद मांगी और भारतीय सेना ने तब बीजू पटनायक को तत्कालीन इंडोनेशियाई पीएम सजहिर को भारत लाने के लिए कहा था। 22 जुलाई 1947 को बीजू पटनायक ने अपनी जान की परवाह किए बिना डकोटा विमान लिया डचों के नियंत्रण क्षेत्र में उड़ान भरते हुए वे अपनी धरती पर उतरे और बड़ी बहादुरी दिखाते हुए इंडोनेशिया के प्रधान मंत्री को भारत लाए। इस घटना से उनमें जबरदस्त ऊर्जा का विकास हुआ और सिंगापुर की सहायता से डच सैनिकों पर हमला कर दिया और इंडोनेशिया पूरी तरह से स्वतंत्र देश बन गया। बाद में जब इंडोनेशियाई राष्ट्रपति सुकर्णो की बेटी का जन्म हुआ तो उन्होंने बीजू पटनायक और उनकी पत्नी को नवागंतुक नाम देने के लिए बुलाया तब बीजू पटनायक और उनकी पत्नी ने इंडोनेशिया के राष्ट्रपति की बेटी का नाम मेघावती रखा था। इंडोनेशिया ने 1950 में बीजू पटनायक और उनकी पत्नी को अपने देश का मानद नागरिकता पुरस्कार 'भूमि पुत्र' प्रदान किया था बाद में उन्हें स्वतंत्रता के 50वें वर्ष में इंडोनेशिया के सर्वोच्च मानद पुरस्कार 'बिंटांग जस उत्तम' से सम्मानित किया गया। बीजू पटनायक की मृत्यु के बाद इंडोनेशिया में सात दिनों का राजकीय शोक मनाया गया और रूस में एक दिन का राजकीय शोक मनाया गया और सभी झंडे उतारे गए थें। अपने देश के महान सेना नायक बाद में राजनेता के बारे में हमारे इतिहास की किताबों ने कभी नहीं बताया गया क्योंकि यह इतिहास नेहरु को सूट नहीं करता था। 🔥🔥🔥🔥🙏🙏🙏🙏 ️🇮🇳🇮🇳 जय हिन्द 🇮🇳❤️ हमको "भारतीय होने पर गर्व है। ⚔️🇮🇳 देश पहले हैं 🇮🇳⚔️ वंदे मातरम् 🇮🇳🇮🇳⚔️⚔️ भारत माता की जय 🇮🇳🇮🇳🇮🇳⚔️⚔️

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