🔯अथ श्री दुर्गा सप्तशती🔯 🦁ॐ नम चण्डिकायै नमः 🦁 🎎शारदीय नवरात्रि 🎎 ✍️अध्याय :- पहला✍️ *सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके* *शरण्ये त्रयम्बके देवी नारायणी नमोस्तुते* ✍️महर्षि ऋषि का राजा सुरथ और समाधि को देवी की महिमा बताना । 🌹महर्षि मार्कण्डये जी बोले- सूर्य के पुत्र सावर्णि की उत्पति की कथा विस्तार पूरक कहता हो, सावर्णि महामाया की कृपा से जिस प्रकार मन्वन्तर के स्वामी हुए, उसका हाल भी सुनो। पहले स्वरोचिष नामक मन्वन्तर में चैत्र वंशी सुरथ नाम के एक राजा थे। सारी पृथवी पर उनका राज्य था। वह प्रजा को अपने पुत्र की सामान मानते थे तो भी कोलाविधवंशी राजा उनके शत्रु बन गये। दुष्टों को दण्ड देने वाले राजा सुरथ की उनके साथ लड़ाई हुई, कोलाविधवंशीयों के संख्या में कम होने के पर भी राजा सुरथ युद्ध में उनसे हार गये। तब वह अपने नगर में आ गए, केवल अपने देश का राज्य ही उनके पास रह गया और वह उसी देश के राजा होकर राज्य करने लगे, किन्तु उनके शत्रुओं ने उन पर वहां भी आक्रमण किय। राजा को बलहीन देखकर उसके दुष्ट मंत्रियो ने राजा की सेना और खजाना अपने अधिकार में कर लिया। राजा सुरथ अपने राज्य अधिकार को हार कर शिकार खेलने के बहाने घोड़े पर सवार होकर वहां से एक भयंकर वन की ओर चले गये। उस वन में उन्होंने महर्षि मेघा का आश्राम देखा, वहां महर्षि मेघा अपने शिष्ययो तथा मुनियो से सुशोभित बैठे हुए थे और वहां कितने ही हिंसक जीव परम शांति भाव से रहते थे। राजा सुरथ ने महर्षि मेघा को प्रणाम किया और महर्षि ने भी उनका उचित सत्कार किय। राजा सुरथ महर्षि के आश्रम में कुछ समय तक ठहरे। अपने नगर की ममता के आकर्षण से राजा अपने मन में सोचने लगे- पूर्वकाल में पूर्वजों ने जिस नगर का पालन किया था वह आज मेरे हाथ से निकल गया। मेरे दुष्ट एवम दुरात्मा मंत्री मेरे नगर की अब धर्म से रक्षा कर रहे होंगे या नहीं? मेरे प्रधान हाथी जो कि सदा मद की वर्षा करने वाला और शूरवीर था मेरे बेरियो के वश में होकर न जाने क्या दुःख भोग रहा होगा ? मेरे आज्ञाकारी नोकर जो मेरी कृपा से धन और भोजन पाने से सदैव सुखी रहते थे और मेरे पीछे-पीछे चलते थे, वह अब निश्चय ही दुष्ट राजाओं का अनुसरण करते होंगे तथा मेरे दुष्ट एवम दुरात्मा मंत्रियो द्वारा व्यर्थ ही धन को व्यय करने से संचित किया हुआ मेरा खज़ाना एक दिन अवश्य खाली हो जायेगा । इस प्रकार की बहुत से बातें सोचता हुआ राजा निरंतर दुखी रहने लगा । एक दिन राजा सुरथ ने महर्षि मेघा के आश्रम के निकट एक वैश्य को देखा, राजा ने उससे पूछा- भाई, तुम कौन हो? यहाँ तुम्हारे आने का क्या कारण है और तुम मुझे शोकग्रस्त अनमने से दिखाई देते हो, इस का क्या कारण है ? राजा के यह नम्र वचन सुन वैश्य ने महाराज सुरथ को प्रणाम करके कहा, वैश्य बोला- राजन! मेरा नाम समाधि है, मैं धनियो के कुल में उत्पन एक वैश्य हूँ, मेरे दुष्ट स्त्री- पुत्रादिकं ने लोभ से मेरा सब धन छीन लिया है और मुझे घर से निकाल दिया है। मैं इस तहर से दुखी होकर इस वन में चला आया हूँ और यहाँ रहता हुआ मैं इस बात को भी नहीं जानता कि अब घर में इस समय सब कुशल हैं या नहीं । यहाँ मैं अपने परिवार का आचरण संबंधी कोई समाचार भी नहीं प् सकता कि वह घर में इस समय कुशलपूर्वक है या नहीं । मैं अपने पुत्रों के सम्बन्ध में यह भी नहीं जानता कि वह सदाचारी है या दुराचार में फंसे हुए हैं । राजा बोले- जिस धन के लोभी स्त्री पुत्रों ने तुम्हें घर से निकाल दिया है, फिर भी तुम्हारा चित उनसे क्यों प्रेम करता है । वैश्य ने कहा- मेरे विषय में आपका ऐसा कहना ठीक है, किन्तु मेरा मन इतना कठोर नहीं है। यदपि उन्होंने धन के लोभ में पड़कर पितृस्नेह को त्यागकर मुझे घर से निकाल दिया है, तो भी मेरे मन में उनके लिए कठोरता नहीं आती। हे महामते! मेरा मन फिर भी उनमें क्यों फँस रहा है, इस बात को जानता हुआ भी मैं नहीं जान रहा, मेरा चित उनके लिए दुखी है। मैं उनके लिए लंबी २ सांसे ले रहा हूँ, उन लोगों में प्रेम नाम को नहीं है, फिर भी ऐसे नि :स्नेहियों के लिए मेरा ह्रदय कठोर नहीं होता। 🎎महर्षि मार्कण्ड जी कहा -हे ब्राह्मण! इसके पश्चात महाराज सुरथ और वह वैश्य दोनों महर्षि मेघा के समीप गए और उनके साथ यथायोग्य न्याय सम्भषण करके दोनों ने वार्ता आरंभ की । राजा बोले- हे भगवन! मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ, सो आप कृपा करके मुझे बातये, मेरा मन मेरे अधीन नहीं है, इससे मैं बहुत दुखी हूँ, राज्य, धनादिक की चिंता अभी तक मुझे बनी हुई है और मेरी यह ममता अज्ञानियों की तरह बढ़ती जा रही है और यह समाधि नामक वैश्य भी अपने से अपमानित होकर आया है, इसके स्वजनों ने भी इसे त्याग दिया है, स्वजनों से त्यागा हुआ भी यह उनसे हार्दिक प्रेम रखता है, इस तरह हम दोनों ही दुखी हैं । हे महाभाग! उन लोगों के अवगुणों को देखकर भी हम दोनों के मन में उनके लिए ममता- जनित आकर्षण उत्पन्न हो रहा है। हमारे ज्ञान रहते हुए भी ऐसा क्यों है? अज्ञानी मनुष्यों की तरह हम दोनों में यह मूर्खता क्यों है? महर्षि मेघा ने कहा- विषम मार्ग का ज्ञान सब जंतुओं को है, सबों के लिए विषय पृथक-२ होते है, कुछ प्राणी दिन में नहीं देखते और कुछ रात को, परंतु कोई जीव ऐसे हैं, जो दिन तथा रात दोनों में देख सकते है, यह सत्य है कि मनुष्यों में ज्ञान प्रधान है, किन्तु केवल मनुष्य ही ज्ञानी नहीं होता, पशु पक्षी आदि भी ज्ञान रखते हैं। जैसे यह पशु ज्ञानी है, वैसे ही मनुष्यों का ज्ञान है और जो ज्ञान मनुष्यों में हैं वैसे ही पाशो पक्षयों में हैं तथा अन्य बातें भी दोनों में एक जैसी पाई जाती है। ज्ञान होने पर भी इन पक्षियो की ओर देखो कि अपने भूख से पीड़ित बच्चों की चोंच में कितने प्रेम से अन्न के दाने डालते है । हे राजन ! ऐसे ही प्रेम मनुष्यों में अपनी संतान के प्रति पाया जाता है । लोभ के कारण अपने उपकार का बदला पाने के लिए मनुष्य पुत्रों की इच्छा करते हैं, और इस प्रकार मोह के गड्ढे में गिरा करते है। भगवान श्रीहरि की जो माया है, उसी से यह संसार मोहित हो रहा है। इससे आश्चर्य की कोई बात नहीं क्योंकि वह भगवान विष्णु की योगनिद्रा है, यह माया ही हो है जिसका कारण संसार मोह में जकड़ा हुआ है, यही महामाया भगवती देवी ज्ञानिओं के चित हो बलपूर्वक खींचकर मोह में दाल देती है और उसी के द्वारा सम्पूर्ण जगत की उत्पति होती है। यही भगवती देवी प्रसन्न होकर मनुष्य को मुक्ति प्रदान करती है। यही संसार के बंधन का कारण है तथा सम्पूर्ण ईश्वरों को भी स्वामिनी है। 💐महाराज सुरथ ने पूछा- भगवन! वह देवी कोन सी है, जिसको आप महामाया कहते है? हे ब्रह्मन ! वह कैसे उत्पन्न हुई और उसका कार्य क्या है? उसका चरित्र कौन -२ से हैं । प्रभु ! उसका जैसा प्रभाव हो, जैसा स्वरूप हो वह सब ही कृपा कर मुझे से कहिये, मैं आपसे सुनना चाहता हूँ। महर्षि मेघा बोले- राजन! वह देवी तो नित्यस्वरूपा है, उसके द्वारा यह संसार रचा गया है। तब भी उसकी उत्पति अनेक प्रकार से होती है। वह सब आप मुझे सुनो, वह देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए प्रकट होती है उस समय वह उत्पन्न हुई कहलाती है । संसार को जलमय करके जब भगवन विष्णु योगनिद्रा आश्रय लेकर, शेष शय्या पर सो रहे थे, तब मधु-केटभ नाम के दो असुर उनके कानों के मेल से प्रकट हुए और वह श्रीब्रह्मा जी को मारने के लिए तैयार हो गये। श्रीब्रह्माजी ने जब उन दोनों को अपनी ओर आते देखा और यह भी देखा कि भगवान विष्णु योगनिद्रा का आश्रय लिकर सो रहे है, तो वह उस समय श्रीभगवान के जगाने के लिए उनके नेत्रों में निवास करने वाली योगनिद्रा की स्तुति करने लगे । 🎎श्री ब्रह्माजी ने कहा- हे देवी! तुम ही स्वाहा, तुम ही स्वधा और तुम ही वषट्कार हो स्वर भी तुम्हारा ही स्वरुप है, तुम ही जीवन देने वाली सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणव में अकार,उकार, मकार इन तीनों माताओं के रूप में तुम ही स्थित हो। इनके अतिरिक्त जो बिंदुपथ अर्धमात्रा है, जिसका कि विशेष रूप से उच्चारण नहीं किया जाता है, हे देवी! वह भी तुम ही हो। संध्या, सावित्री तथा परम जननी तुम ही हो। तुम इस विश्व को धारण करने वाली हो, तुमने ही इस जगत की रचना की है और तुम ही इस जगत की पालन करने वाली हो। और तुम ही कल्प के अंत में सबको भक्षण करने वाली हो हे देवी! जगत की उत्पति के समय तुम सृष्टि रूपा होती हो, पालन काल में सिथत रूपा हो और कल्प के अंत में संहाररूप धारण कर लेती हो। श्री ईश्वरी और बोध स्वरूपा बुद्धि भी तुम ही हो, लज्जा, पुष्टि, तुष्टि , शांति, और क्षमा भी तुम ही हो। तुम खड्ग धारिणी, शूल धारिणी तथा गदा, चक्र, शंख और धनुष के धारण करने वाली हो। बाण, भुशंडी और परिध यह भी तुम्हारे ही अस्त्र हैं । तुम सौम्य और सौम्यतर हो - यही नहीं, बल्कि जितनी भी सौम्य तथा सुंदर वस्तुएं इस संसार में हैं, उन सबसे बढ़ कर सुन्दर तुम हो। पर और अपर सबसे पर रहने वाली सुन्दर तुम ही हो। हे सर्वस्वरूपे देवी! जो भी सत-असत पदार्थ हैं और उनमें जो शक्ति है, वह तुम ही हो। ऐसी अवस्था में भला तुम्हारी स्तुति कौन कर सकता है? इस संसार की सृष्टि, पालन और संहार करने वाले जो भगवान हैं, उनको भी जब तुमने निद्रा के वशीभूत कर दिया है तो फिर तुम्हारी स्तुति कौन कर सकता है? मुझे, भगवान विष्णु तथा भगवान शंकर को शरीर धारण कराने वाली तुम ही हो। तुम्हारी स्तुति करने की शक्ति किसमें हैं? हे देवी! तुम तो अपने इन उदार प्रभावों के कारण ही प्रशंसनीय हो। मधु और केंटभ जो भयंकर असुर हैं इन्हें तो मोह में डाल दो और श्रीहरि भगवान विष्णु को भी जल्दी जगा दो और उनमें इनको मार डालने की बुद्धि भी उत्पन्न कर दो। महर्षि मेघा बोले हे- राजन! जब श्रीब्रह्माजी ने देवी से इस प्रकार स्तुति करके भगवान को जगाने तथा मधु और केटभ को मारने के लिए कहा तो वह भगवान श्रीविष्णु के नेत्र, मुख, नासिक, बाहु ,ह्रदय और वक्षस्थल से निकल श्रीब्रह्माजी के सामने खड़ी हो गई । उनका ऐसा कहना था कि भगवान श्रीहरि तुरन्त जाग उठे और दोनों असुंरो को देखा, जो कि अत्यंत बलवान तथा पराक्रमी थे और मारे क्रोध के जिनके नेत्र लाल हो रहे थे और जो ब्रह्मजी को वध करने के लिए तैयार थे। तब क्रोध हो उन दोनों दुरात्मा असुरों के साथ भगवान श्रीहरि पुरे पांच हज़ार वर्ष तक लड़ते रहे। एक तो वह अत्यंत बलवान तथा पराक्रमी थे, दूसरे महामाया ने भी उन्हें मोह में डाल रखा था । अतः वह भी भगवान से कहने लगे- है दोनों तुम्हारी वीरता से अत्यंत प्रसन्न है, तुम हमसे कोई वर मागो! भगवान ने कहा- यदि तुम मुझ पर प्रसन्न हो तो अब तुम मेरे हाथों से मर जाओ। बस, इतना सा ही वर मैं तुमसे माँगता हूँ । यहाँ दूसरे वर से क्या प्रयोजन है। महर्षि मेघा बोले- इस तरह से जब वह धोखे में आ गए और अपने चारों ओर जल ही जल देखा भगवान श्रीहरि तो कहने लगे - जहाँ पर जल न हो, सूखी जमीन हो, उसी जगह हमारा वध कीजिये । महर्षि मेघा कहते है, ( तथास्तु ) कहकर भगवान श्रीहरि ने उन दोनों को अपनी जांघ पर लिटाकर उन दोनों के शिर काट डाले। इस तरह ये देवी श्री ब्रह्माजी के स्तुति करने पर प्रकट हुई थी, अब तुम से उनके प्रभाव का वर्णन करता हूँ, सो सुनो । *दुर्गा सप्तशती का पहला अध्याय समाप्त* 🚩👣🌹 जय माता दी 🌹👣🚩 🦁🦁🦁🦁🦁🦁🦁🦁🦁🦁

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🌺🌲शुभ शनिवार 🌲🌺 🌹🌿जय श्री राम 🌿🌹 🚩🛕जय श्री हनुमान🛕🚩 🌻💥सुप्रभात💥🌻 (((🎎रामायण के कुछ रोचक तथ्य🎎))) ********************************* 🔸1. रामायण को महर्षि वाल्मीकि जी ने लिखा था तथा इस महाग्रंथ में 24,000 श्लोक, 500 उपखंड तथा उत्तर सहित सात कांड है। 🔸2. जिस समय दशरथ जी ने पुत्रेष्ठी यज्ञ किया था उस समय दशरथ जी की आयु 60 वर्ष थी। 🔸3. तुलसीरामायण में लिखा है की सीता जी के स्वयंवर में श्री राम ने भगवान शिव का धनुष बाण उठाया व इन्हें तोड़ दिया परंतु इस घटना का वाल्मीकि रामायण में कोई उल्लेख नहीं है। 🔸4. रामचरितमानस के अनुसार परशुरामजी सीता स्वयंवर के मध्य में आए थे परंतु बाल्मीकि रामायण के अनुसार जब प्रभु श्री राम, माता सीता के साथ अयोध्या जा रहे थे उस समय बीच रास्ते में परशुराम जी इन्हें मिले थे। 🔸5. जब भगवान श्री राम वनवास के लिए जा रहे थे तब उनकी आयु 27 वर्ष थी। 🔸6. जब लक्ष्मण जी आए और उन्हें पता चला कि श्री राम को वनवास का आदेश मिला है तब वह बहुत क्रोधित हुए तथा श्री राम के पास जाकर उनसे अपने ही पिता के विरुद्ध युद्ध के लिए बोला परंतु बाद में श्री रामजी के समझाने पर वह शांत हो गए। 🔸7. जब दशरथ जी ने श्री राम को वनवास के लिए कहा, तब वह चाहते थे कि श्री राम जी बहुत सा धन एवं दैनिक उपयोग की चीजें अपने साथ ले जाए परंतु कैकई ने इन सब चीजों के लिए भी मना कर दिया। 🔸8. भरत जी को सपने में ही इनके पिता दशरथ की मृत्यु का अनुमान हो गया था क्योंकि उन्होंने अपने सपने में दशरथ जी को काले कपड़े पहने एवं उदास देखा था। 🔸9. हिंदू मान्यताओं के अनुसार इस ब्रह्माण्ड में 33 करोड़ देवी-देवता है लेकिन बाल्मीकि रामायण के के अनुसार 33 करोड़ नहीं अपितू 33 कोटि अर्थात 33 प्रकार के देवी देवता है। 🔸10. प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि जब माता सीता का अपहरण रावण के द्वारा हुआ तब जटायु ने उन्हें बचाने का प्रयास किया और अपना बलिदान दिया परंतु राम वाल्मीकि रामायण के अनुसार यह जटायु नहीं थे अपितु उनके पिता अरुण थे। 🔸11. जिस दिन रावण ने माता सीता का हरण किया तथा उन्हें अशोक वाटिका लेकर आया, उसी रात भगवान ब्रह्मदेव ने इंद्रदेव को एक विशेष प्रकार की खीर सीता जी को देने के लिए कहा, तब इंद्रदेव ने पहले अपनी अलौकिक शक्तियों के द्वारा अशोक वाटिका में उपस्थित सारे राक्षसों को सुला दिया, उसके बाद वह खीर माता सीता को दी। 🔸12. जब भगवान श्री राम, लक्ष्मण जी, माता सीता की खोज में जंगल में गए तब वहां उनकी राह में कंबंध नाम का एक राक्षस आया जो श्री राम व लक्ष्मण के हाथ मारा गया परंतु वास्तव में कंबंध एक श्रापित देवता था और एक श्राप के कारण राक्षस योनी में जन्मा और जब प्रभु श्रीराम ने उसकी उसका मृत शरीर जलाया तब उसकी आत्मा मुक्त हो गई एवं उसने ही उसने ही श्रीराम व लक्ष्मण को सुग्रीव से मित्रता करने का मार्ग सुझाया। 🔸13. एक बार रावण कैलाश पर्वत पर भगवान शिव से मिलने गया और उसने वहां उपस्थित नंदी का मजाक उड़ाया इससे क्रोधित नंदी ने रावण को श्राप दिया कि एक वानर तेरी मृत्यु एवं पतन करण बनेगा। 🔸14. वाल्मीकि रामायण के अनुसार जब रावण ने कैलाश पर्वत उठाया था तब माता पार्वती ने क्रोधित होकर श्राप दिया था की तेरी मृत्यु का कारण एक स्त्री बनेगी। 🔸15. विद्युतजिन, रावण की बहन शुर्पणखां का पति था तथा यह कालकेय नामक राजा का सेनापति भी था। जब रावण पूरी दुनियाँ को जीतने निकला तब उसने कालकेय से भी युद्ध किया तथा इस युद्ध में विद्युतजिन मारा गया तब क्रोधित शुर्पणखां ने रावण को श्राप दिया की वही एक दिन अपने भाई रावण की मृत्यु का कारण बनेगी। 🔸16. जब राम और रावण के मध्य अंतिम युद्ध लड़ा जा रहा था तब इंद्रदेव ने अपना चमत्कारिक रथ श्रीराम के लिए भेजा था और इस रथ पर बैठ कर ही श्री राम ने रावण का वध किया। 🔸17. एक बार रावण अपने पुष्पक विमान पर कही जा रहा था तब उसने एक सुंदर स्त्री को भगवान विष्णु की तपस्या करते हुए देखा जो श्री हरि विष्णु को पति रूप में पाना चाहती थी। रावण ने उसके बाल पकड़ कर उसे घसीटते हुए अपने साथ चलने को कहा परंतु उस स्त्री ने उसी क्षण अपने प्राण त्याग दिए और रावण को अपने कुल सहित नष्ट हो जाने का श्राप दिया। 🔸18. रावण को अपनी सोने की लंका पर बहुत अहंकार था, परंतु इस लंका पर रावण से पहले उसके भाई कुबेर का राज था। रावण ने लंका को अपने भाई कुबेर से युद्ध करके जीता था। 🔸19. रावण राक्षसों का राजा था तथा उस समय लगभग सभी बालक इससे बहुत ज्यादा डरते थे क्योंकि इसके दस सिर थे परन्तु रावण, शिव का बहुत बड़ा भक्त था तथा बहुत ही बुद्धिमान विद्यार्थी भी था, जिसने सारे वेद का अध्ययन किया। 🔸20. रावण के रथ की ध्वजा पर अंकित वीणा के चिन्ह से यह पता लगता है कि रावण को संगीत थी प्रिय था तथा कई जगह इस बात का उल्लेख है कि रावण वीणा बजाने में भी निपुण था। 🔸21. राजधर्म का निर्वाह करते हुए एक धोबी के कारण श्री राम ने माता सीता की अग्नि परीक्षा ली तथा इसके पश्चात माता सीता को वाल्मीकि आश्रम में छोड़ दिया, बाद में जब पुनः श्री राम ने माता सीता को परीक्षा के लिए कहा तो माता सीता धरती में समा गयी, तब श्री राम व इनके पुत्र कुश, माता सीता को पकड़ने के लिए दौड़े परन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इस घटना के पश्चात श्री राम को अत्यंत ही ग्लानी हुई की उन्होंने राजधर्म का निर्वाह तो किया लेकिन अपनी प्राणों से भी प्रिय पत्नी को उनके कारण कितने ही दुःख झेलने पडे, इसके कुछ समय पश्चात ही भगवान श्री राम ने सरयू नदी में जल समाधि ले ली एवं बैकुंठ धाम प्रस्थान कर गये। 🔸22. जब सीता हरण के पश्चात रावण को पता चला की श्री राम, लंका की ओर युद्ध के लिए आ रहे है तब इनके भाई विभीषण ने माता सीताजी को लौटाकर राम से संधि करने को कहाँ लेकिन तब रावण बोला की अगर वह साधारण मानव है तब वह मुझे नहीं हरा सकते लेकिन अगर वह वास्तव में ईश्वर है तब उनके हाथो मेरी मृत्यु नहीं अपितु मोक्ष प्राप्ति होगी, अतः में युद्ध अवश्य करूँगा। 🔸23. लक्ष्मण जी 14 सालो तक नहीं सोयें थे तथा इसी कारण इन्हें गुडाकेश भी कहा जाता है। रावण पुत्र मेघनाद को वरदान था की उसकी मृत्यु वही करेगा जो 14 वर्षो तक न सोया हो और इसी कारण मेघनाद, लक्ष्मण के द्वारा मारा गया। 💥 24 👇👇 🔹1:~मानस में राम शब्द=1443 बार आया है। 🔸2:~मानस में सीता शब्द=147 बार आया है। 🔹3:~मानस में जानकी शब्द= 69 बार आया है। 🔸4:~मानस में बड़भागी शब्द=58 बार आया है। 🔹5:~मानस में कोटि शब्द=125 बार आया है। 🔸6:~मानस में एक बार शब्द= 18 बार आया है। 🔹7:~मानस में मन्दिर शब्द= 35 बार आया है। 🔸8:~मानस में मरम शब्द =40 आर आया है। 🔹9:~मानस में श्लोक संख्या=27 है। 🔸10:~लंका में राम जी =111 दिन रहे। 🔹11:~लंका में सीताजी =435 दिन रही। 🔸12:~मानस में चोपाई संख्या=4608 है। 🔹13:~मानस में दोहा संख्या=1074 है। 🔸14:~मानस में सोरठा=207 है। 🔹15:~मानस में छन्द=86 है। 🔸16:~सुग्रीव में बल था=10000 हाथियों का! 🔹17:~सीता रानी बनी=33वर्ष की उम्र में। 🔸18:~मानस रचना के समय तुलसीदास की उम्र=77 वर्ष 🔹19:~पुष्पक विमान की चाल=400 मील/घण्टा 🔸20:~रामादल व् रावण दल का युद्ध=87 दिन चला। 🔹21:~राम रावण युद्ध=32 दिन चला। 🔸22:~सेतु निर्माण=5 दिन में हुआ। 🔹23:~नलनील के पिता=विश्वकर्मा 🔸24:~त्रिजटा के पिता=विभीषण 🔹25:~दशरथ की उम्र थी=60000 वर्ष। 🔸26:~सुमन्त की उम्र=9999 वर्ष। 🔹27:~विश्वामित्र राम को ले गए=10 दिन के लिए। 🔸28:~मानस में बैदेही शब्द=51 बार आया है। 🔹29:~राम ने रावण को सबसे पहले मारा था=6 वर्ष की उम्र में। 🔸30:~रावण को जिन्दा किया=सुखेन बेद ने नाभि में अमृत रखकर। 🌹🌿जय श्री राम 🌿🌹

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🏵️☘️🌸शुभ शुक्रवार🌸☘️🏵️ 🚩👣😸जय माता दी😸👣🚩 🌻🌲💥सुप्रभात💥🌲🌻 😸शारदीय नवरात्रि😸 (((🌹 कलश स्थापना विधि🌹))) 🎎आश्विन घटस्थापना 26 सोमवार, सितम्बर 2022 को🎎 घटस्थापना मुहूर्त - 06;03 से 07;38 - अवधि - 01 घण्टा 34 मिनट्स घटस्थापना अभिजित मुहूर्त -11;41 से 12;29 -अवधि - 00घण्टे 48 मिनट्स घटस्थापना मुहूर्त, द्वि-स्वभाव कन्या लग्न के दौरान है। प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ - 26 सितम्बर 2022 को 03;23 बजे प्रतिपदा तिथि समाप्त - 27 सितम्बर , 2022 को 03 ;08 बजे कन्या लग्न प्रारम्भ - 26 सितम्बर , 2022 को 06;03 बजे कन्या लग्न समाप्त - 26 सितम्बर , 2022 को 07;38 बजे नवरात्रि में किस दिन किन देवी की होगी पूजा 26 सोमवार सितंबर 2022 - मां शैलपुत्री -पहला दिन- प्रतिपदा 27 मंगलवार, सितंबर 2022- मां ब्रह्मचारिणी -दूसरा दिन- द्वितीय 28 बुधवार,सितंबर 2022- मां चंद्रघंटा -तीसरा दिन- तृतीया 29 गुरुवार, सितंबर 2022- मां कुष्मांडा -चौथा दिन- चतुर्थी 30 शुक्रवार' सितंबर 2022- मां स्कंदमाता -पांचवा दिन- पंचमी 1 शनिवार 'अक्टूबर 2022- मां कात्यायनी -छठा दिन) षष्ठी 2 रविवार 'अक्टूबर 2022- मां कालरात्रि -सातवां दिन- सप्तमी 3 सोमवार' अक्टूबर 2022- मां महागौरी -आठवां दिन- दुर्गा अष्टमी 4 मंगलवार,अक्टूबर 2022- महानवमी, -नौवां दिन- शरद नवरात्र व्रत पारण 5 बुधवार ,अक्टूब 2022- मां दुर्गा प्रतिमा विसर्जन, दशमी -दशहरा- नवरात्र में अखंड ज्योत का महत्व: अखंड ज्योत को जलाने से घर में हमेशा मां दुर्गा की कृपा बनी रहती है। नवरात्र में अखंड ज्योत के कुछ नियम होते हैं जिन्हें नवरात्र में पालन करना होता है। परंम्परा है कि जिन घरों में अखंड ज्योत जलाते है उन्हें जमीन पर सोना होता है। नवरात्र में मां दुर्गा के 9 रूपों की पूजा होती है। जानिए इस वर्ष नवरात्र में मां दुर्गा के 9 रूपों की पूजन तिथि: शरद नवरात्रि 2017 दिवस 1 पहला घाटास्थाना, कलश स्थापना और पूजन के लिए महत्त्वपूर्ण वस्तुएं मिट्टी का पात्र और जौ के ११ या २१ दाने शुद्ध साफ की हुई मिट्टी जिसमे पत्थर नहीं हो शुद्ध जल से भरा हुआ मिट्टी , सोना, चांदी, तांबा या पीतल का कलश मोली (लाल सूत्र) अशोक या आम के 5 पत्ते कलश को ढकने के लिए मिट्टी का ढक्कन साबुत चावल एक पानी वाला नारियल पूजा में काम आने वाली सुपारी कलश में रखने के लिए सिक्के लाल कपड़ा या चुनरी मिठाई लाल गुलाब के फूलो की माला 😸नवरात्र कलश स्थापना की विधि😸 महर्षि वेद व्यास से द्वारा भविष्य पुराण में बताया गया है की कलश स्थापना के लिए सबसे पहले पूजा स्थल को अच्छे से शुद्ध किया जाना चाहिए। उसके उपरान्त एक लकड़ी का पाटे पर लाल कपडा बिछाकर उसपर थोड़े चावल गणेश भगवान को याद करते हुए रख देने चाहिए | फिर जिस कलश को स्थापित करना है उसमे मिट्टी भर के और पानी डाल कर उसमे जौ बो देना चाहिए | इसी कलश पर रोली से स्वास्तिक और ॐ बनाकर कलश के मुख पर मोली से रक्षा सूत्र बांध दे | कलश में सुपारी, सिक्का डालकर आम या अशोक के पत्ते रख दे और फिर कलश के मुख को ढक्कन से ढक दे। ढक्कन को चावल से भर दे। पास में ही एक नारियल जिसे लाल मैया की चुनरी से लपेटकर रक्षा सूत्र से बांध देना चाहिए। इस नारियल को कलश के ढक्कन रखे और सभी देवी देवताओं का आवाहन करे । अंत में दीपक जलाकर कलश की पूजा करे । अंत में कलश पर फूल और मिठाइयां चढ़ा दे | अब हर दिन नवरात्रों में इस कलश की पूजा करे | विशेष ध्यान देने योग्य बात : जो कलश आप स्थापित कर रहे है वह मिट्टी, तांबा, पीतल , सोना ,या चांदी का होना चाहिए। भूल से भी लोहे या स्टील के कलश का प्रयोग नहीं करे नव का अर्थ नौ तथा अर्ण का अर्थ अक्षर होता है। अतः नवार्ण नवों अक्षरों वाला वह मंत्र है, नवार्ण मंत्र 'ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे' है।नौ अक्षरों वाले इस नवार्ण मंत्र के एक-एक अक्षर का संबंध दुर्गा की एक-एक शक्ति से है और उस एक-एक शक्ति का संबंध एक-एक ग्रह से है। नवार्ण मंत्र का जाप 108 दाने की माला पर कम से कम तीन बार अवश्य करना चाहिए। ब्रह्मांड के सारे ग्रह एकत्रित होकर जब सक्रिय हो जाते हैं, तब उसका दुष्प्रभाव प्राणियों पर पड़ता है। ग्रहों के इसी दुष्प्रभाव से बचने के लिए नवरात्रि में दुर्गा की पूजा की जाती है। आइए जानें मां दुर्गा के नवार्ण मंत्र और उनसे संचालित ग्रह 1 नवार्ण मंत्र के नौ अक्षरों में पहला अक्षर ऐं है, जो सूर्य ग्रह को नियंत्रित करता है। ऐं का संबंध दुर्गा की पहली शक्ति शैल पुत्री से है, जिसकी उपासना 'प्रथम नवरात्र' को की जाती है 2 दूसरा अक्षर ह्रीं है, जो चंद्रमा ग्रह को नियंत्रित करता है। इसका संबंध दुर्गा की दूसरी शक्ति ब्रह्मचारिणी से है, जिसकी पूजा दूसरे नवरात्रि को होती है। 3 तीसरा अक्षर क्लीं है, चौथा अक्षर चा, पांचवां अक्षर मुं, छठा अक्षर डा, सातवां अक्षर यै, आठवां अक्षर वि तथा नौवा अक्षर चै है। जो क्रमशः मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु तथा केतु ग्रहों को नियंत्रित करता है। इन अक्षरों से संबंधित दुर्गा की शक्तियां क्रमशः चंद्रघंटा, कुष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी तथा सिद्धिदात्री हैं, जिनकी आराधना क्रमश : तीसरे, चौथे, पांचवें, छठे, सातवें, आठवें तथा नौवें नवरात्रि को की जाती है। इस नवार्ण मंत्र के तीन देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं तथा इसकी तीन देवियां महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती हैं, दुर्गा की यह नवों शक्तियां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों की प्राप्ति में भी सहायक होती हैं। नवरात्रि का पर्व नौ शक्ति रुपी देवियों के पूजा के लिए है | यह सभी देवी रूप अपने आप में शक्ति और भक्ति के भंडार है | जगत में अच्छाई के लिए माँ का कल्याणकारी रूप सिद्धिदात्री , महागौरी आदि है, और इसी के साथ जगत में पनप रही बुराई के लिए माँ कालरात्रि , चन्द्रघंटा रूप धारण कर लेती है | अब जाने वे बीज मंत्र जो इन नौ देवियों को प्रसन्न करते है | 🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾 हर एक देवी का पृथक बीज मंत्र यहाँ दिया गया है | 1. शैलपुत्री : ह्रीं शिवायै नम: 2. ब्रह्मचारिणी : ह्रीं श्री अम्बिकायै नम: 3. चन्द्रघंटा : ऐं श्रीं शक्तयै नम: 4. कूष्मांडा ऐं ह्री देव्यै नम: 5. स्कंदमाता : ह्रीं क्लीं स्वमिन्यै नम: 6. कात्यायनी : क्लीं श्री त्रिनेत्रायै नम: 7. कालरात्रि : क्लीं ऐं श्री कालिकायै नम: 8. महागौरी : श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नम: 9. सिद्धिदात्री : ह्रीं क्लीं ऐं सिद्धये नम: 🎎देवी दुर्गा के नौ रूप कौन कौन से है🎎 प्रथम् शैल-पुत्री च, द्वितियं ब्रह्मचारिणि तृतियं चंद्रघंटेति च चतुर्थ कूषमाण्डा पंचम् स्कन्दमातेती, षष्टं कात्यानी च सप्तं कालरात्रेति, अष्टं महागौरी च नवमं सिद्धिदात्री 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 🌹शैलपुत्री ( पर्वत की बेटी ) वह पर्वत हिमालय की बेटी है और नौ दुर्गा में पहली रूप है । पिछले जन्म में वह राजा दक्ष की पुत्री थी। इस जन्म में उसका नाम सती-भवानी था और भगवान शिव की पत्नी । एक बार दक्षा ने भगवान शिव को आमंत्रित किए बिना एक बड़े यज्ञ का आयोजन किया था देवी सती वहा पहुँच गयी और तर्क करने लगी। उनके पिता ने उनके पति (भगवान शिव) का अपमान जारी रखा था ,सती भगवान् का अपमान सहन नहीं कर पाती और अपने आप को यज्ञ की आग में भस्म कर दी | दूसरे जन्म वह हिमालय की बेटी पार्वती- हेमावती के रूप में जन्म लेती है और भगवान शिव से विवाह करती है। 🌸भ्रमाचारिणी (माँ दुर्गा का शांति पूर्ण रूप) दूसरी उपस्तिथि नौ दुर्गा में माँ ब्रह्माचारिणी की है। " ब्रह्मा " शब्द उनके लिए लिया जाता है जो कठोर भक्ति करते है और अपने दिमाग और दिल को संतुलन में रख कर भगवान को खुश करते है । यहाँ ब्रह्मा का अर्थ है "तप" । माँ ब्रह्मचारिणी की मूर्ति बहुत ही सुन्दर है। उनके दाहिने हाथ में गुलाब और बाएं हाथ में पवित्र पानी के बर्तन ( कमंडल ) है। वह पूर्ण उत्साह से भरी हुई है । उन्होंने तपस्या क्यों की उसपर एक कहानी है | पार्वती हिमवान की बेटी थी। एक दिन वह अपने दोस्तों के साथ खेल में व्यस्त थी नारद मुनि उनके पास आये और भविष्यवाणी की "तुम्हरी शादी एक नग्न भयानक भोलेनाथ से होगी और उन्होंने उसे सती की कहानी भी सुनाई। नारद मुनि ने उनसे यह भी कहा उन्हें भोलेनाथ के लिए कठोर तपस्या भी करनी पढ़ेगी। इसीलिए माँ पार्वती ने अपनी माँ मेनका से कहा की वह शम्भू (भोलेनाथ ) से ही शादी करेगी नहीं तोह वह अविवाहित रहेगी। यह बोलकर वह जंगल में तपस्या निरीक्षण करने के लिए चली गयी। इसीलिए उन्हें तपचारिणी ब्रह्मचारिणी कहा जाता है। 🌺चंद्रघंटा ( माँ का गुस्से का रूप ) तीसरी शक्ति का नाम है चंद्रघंटा जिनके सर पर आधा चन्द्र (चाँद ) और बजती घंटी है। वह शेर पर बैठी संगर्ष के लिए तैयार रहती है। उनके माथे में एक आधा परिपत्र चाँद ( चंद्र ) है। वह आकर्षक और चमकदार है । वह ३ आँखों और दस हाथों में दस हतियार पकडे रहती है और उनका रंग गोल्डन है। वह हिम्मत की अभूतपूर्व छवि है। उनकी घंटी की भयानक ध्वनि सभी राक्षसों और प्रतिद्वंद्वियों को डरा देती है । 🌹कुष्मांडा ( माँ का ख़ुशी भरा रूप ) माँ के चौथे रूप का नाम है कुष्मांडा। " कु" मतलब थोड़ा "शं " मतलब गरम "अंडा " मतलब अंडा। यहाँ अंडा का मतलब है ब्रह्मांडीय अंडा । वह ब्रह्मांड की निर्माता के रूप में जानी जाती है जो उनके प्रकाश के फैलने से निर्माण होता है। वह सूर्य की तरह सभी दस दिशाओं में चमकती रहती है। उनके पास आठ हाथ है ,साथ प्रकार के हतियार उनके हाथ में चमकते रहते है। उनके दाहिने हाथ में माला होती है और वह शेर की सवारी करती है। 👣स्कंदमाता ( माँ के आशीर्वाद का रूप ) देवी दुर्गा का पांचवा रूप है " स्कंद माता ", हिमालय की पुत्री , उन्होंने भगवान शिव के साथ शादी कर ली थी । उनका एक बेटा था जिसका नाम "स्कन्दा " था स्कन्दा देवताओं की सेना का प्रमुख था । स्कंदमाता आग की देवी है। स्कन्दा उनकी गोद में बैठा रहता है। उनकी तीन आँख और चार हाथ है। वह सफ़ेद रंग की है। वह कमल पैर बैठी रहती है और उनके दोनों हाथों में कमल रहता है। 😸कात्यायनी ( माँ दुर्गा की बेटी जैसी ) माँ दुर्गा का छठा रूप है कात्यायनी। एक बार एक महान संत जिनका नाम कता था , जो अपने समय में बहुत प्रसिद्ध थे ,उन्होंने देवी माँ की कृपा प्राप्त करने के लिए लंबे समय तक तपस्या करनी पढ़ी ,उन्होंने एक देवी के रूप में एक बेटी की आशा व्यक्त की थी। उनकी इच्छा के अनुसार माँ ने उनकी इच्छा को पूरा किया और माँ कात्यानी का जन्म कता के पास हुआ माँ दुर्गा के रूप में। 👣कालरात्रि ( माँ का भयंकर रूप ) माँ दुर्गा का सातवाँ रूप है कालरात्रि। वह काली रात की तरह है, उनके बाल बिखरे होते है, वह चमकीले भूषण पहनती है। उनकी तीन उज्जवल ऑंखें है ,हजारो आग की लपटे निकलती है जब वह सांस लेती है। वह शावा (मृत शरीर ) पे सावरी करती है,उनके दाहिने हाथ में उस्तरा तेज तलवार है। उनका निचला हाथ आशीर्वाद के लिए है। । जलती हुई मशाल ( मशाल ) उसके बाएं हाथ में है और उनके निचले बाएं हाथ में वह उनके भक्तों को निडर बनाती है। उन्हें "शुभकुमारी" भी कहा जाता है जिसका मतलब है जो हमेश अच्छा करती है। महागौरी ( माँ पार्वती का रूप और पवित्रता का स्वरुप ) 😸आठवीं दुर्गा " महा गौरी है।" वह एक शंख , चंद्रमा और जैस्मीन के रूप सी सफेद है, वह आठ साल की है,उनके गहने और वस्त्र सफ़ेद और साफ़ होते है। उनकी तीन आँखें है ,उनकी सवारी बैल है ,उनके चार हाथ है। उनके निचले बाय हाथ की मुद्रा निडर है ,ऊपर के बाएं हाथ में " त्रिशूल " है ,ऊपर के दाहिने हाथ डफ है और निचला दाहिना हाथ आशीर्वाद शैली में है।वह शांत और शांतिपूर्ण है और शांतिपूर्ण शैली में मौजूद है. यह कहा जाता है जब माँ गौरी का शरीर गन्दा हो गया था धुल के वजह से और पृत्वी भी गन्दी हो गयी थी जब भगवान शिव ने गंगा के जल से उसे साफ़ किया था। तब उनका शरीर बिजली की तरह उज्ज्वल बन गया.इसीलिए उन्हें महागौरी कहा जाता है । यह भी कहा जाता है जो भी महा गौरी की पूजा करता है उसके वर्तमान ,अतीत और भविष्य के पाप धुल जाते है। 😸सिद्धिदात्री (माँ का ज्ञानी रूप ) माँ का नौवा रूप है " सिद्धिदात्री " ,आठ सिद्धिः है ,जो है अनिमा ,महिमा ,गरिमा ,लघिमा ,प्राप्ति ,प्राकाम्य ,लिषित्वा और वशित्व। माँ शक्ति यह सभी सिद्धिः देती है। उनके पास कई अदबुध शक्तिया है ,यह कहा जाता है "देवीपुराण" में भगवान शिव को यह सब सिद्धिः मिली है महाशक्ति की पूजा करने से। उनकी कृतज्ञता के साथ शिव का आधा शरीर देवी का बन गया था और वह " अर्धनारीश्वर " के नाम से प्रसिद्ध हो गए। माँ सिद्धिदात्री की सवारी शेर है ,उनके चार हाथ है और वह प्रसन्न लगती है। दुर्गा का यह रूप सबसे अच्छा धार्मिक संपत्ति प्राप्त करने के लिए सभी देवताओं , ऋषियों मुनीस , सिद्ध , योगियों , संतों और श्रद्धालुओं के द्वारा पूजा जाता है। 🎋🎋🎋🎋🎋🎋🎋🎋🎋🎋🎋🎋🎋 🎎दुर्गा सप्तशती के चमत्कारी मंत्र🎎 1 आपत्त्ति से निकलने के लिए शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे । सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमो स्तु ते ॥ 2 भय का नाश करने के लिए सर्वस्वरुपे सर्वेशे सर्वशक्तिमन्विते । भये भ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमो स्तु ते ॥ 3 जीवन के पापो को नाश करने के लिए हिनस्ति दैत्येजंसि स्वनेनापूर्य या जगत् । सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्यो नः सुतानिव ॥ 4 बीमारी महामारी से बचाव के लिए रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभिष्टान् । त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्माश्रयतां प्रयान्ति ॥ 5 पुत्र रत्न प्राप्त करने के लिए देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते । देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ 5 इच्छित फल प्राप्ति एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः 7 महामारी के नाश के लिए जयन्ती मड्गला काली भद्रकाली कपालिनी । दुर्गा क्षमा शिवाधात्री स्वाहा स्वधा नमो स्तु ते ॥ 8 शक्ति और बल प्राप्ति के लिये सृष्टि स्तिथि विनाशानां शक्तिभूते सनातनि । गुणाश्रेय गुणमये नारायणि नमो स्तु ते ॥ 9 इच्छित पति प्राप्ति के लिये ॐ कात्यायनि महामाये महायेगिन्यधीश्वरि । नन्दगोपसुते देवि पतिं मे कुरु ते नमः ॥ 10 इच्छित पत्नी प्राप्ति के लिये पत्नीं मनोरामां देहि मनोववृत्तानुसारिणीम् । तारिणीं दुर्गसंसार-सागरस्य कुलोभ्दवाम् ॥ 🚩👣😸 जय माता दी 😸👣🚩

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