भगवान सूर्य के 21 नाम 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ 21 नामो का महात्म्य 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ भगवान् सूर्य आरोग्य के देवता हैं। उनकी नित्य आराधना से बुद्धि तेजस्वी होती है और अनेक रोगों से हमारी रक्षा होती है। ये प्रत्यक्ष देवता हैं, जिनका आधिभौतिक रूप हम अपनी आँखों से देखते हैं। अतः इनकी आराधना का हमारे जीवन में विशेष महत्त्व है। इस लेख के माध्यम से ऐसे श्लोको की चर्चा की जा रही है जिनमें भगवान् सूर्य के 21 नाम का उल्लेख है। जिसके एक बार पढ़ने पर, भगवान् सूर्य के एक हज़ार नाम बोलने का पुण्य प्राप्त होता है। भविष्य पुराण में उल्लेख है, भगवान् श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब रानी जाम्बवती के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। साम्ब बलवान होने के साथ-साथ अत्यन्त रूपवान भी थे। अपने रूप का उन्हें बड़ा अभिमान था । अहंकार किसी भी चीज़ का हो जाये, देर-सबेर उसके कारण हमारा अनिष्ट ही होता है और यही साम्ब के जीवन में भी हुआ। एक बार वसन्त ऋतु में दुर्वासा ऋषि तीनों लोक में में विचरण करते हुए द्वारिकापुरी में आ पहुँचे। उनकी क्षीण काया देखकर साम्ब ने उनका उपहास किया। दुर्वासा ऋषि तो क्रोधी स्वभाव के थे ही, उस पर भी उनका कोई उपहास (हँसी उड़ाये) करे, यह उन्हें कैसे सहन होता। उन्होंने कमण्डल से अपनी अँजुलि में जल लिया और संकल्प करके श्राप दे दिया कि तुम शीघ्र ही कोढ़ी हो जाओ। श्राप मिलते ही साम्ब कुष्ठरोग से पीड़ित हो गये। ऐसी विकट परिस्थिति अपने पिता भगवान् श्री कृष्ण श्री के सिवाय उन्हें कोई नहीं सूझा। वे भगवान् कृष्ण के पास पहुँचे। श्री कृष्ण साम्ब को धैर्य बँधाते हुए बोले “धीरज रखो और सूर्य नारायण की आराधना करो। वे प्रत्यक्ष देवता हैं, उनकी कृपा से तुम इस रोग से मुक्ति पाकर सुख भोग सकोगे।" साम्ब चन्द्रभागा नदी के तट पर मित्रवन नामक सूर्यक्षेत्र में सूर्य नारायण की आराधना करने लगे। वे उपवास रखकर प्रतिदिन भगवान् सूर्य के एक हज़ार नाम का पाठ करते थे। भगवान सूर्य ने प्रसन्न होकर उन्हें स्वप्न में उपरोक्त इक्कीस नाम बताये और कहा "प्रिय साम्ब ! तुम्हें सहस्रनाम से हमारी स्तुति करने की आवश्यकता नहीं है। हम तुम्हें अत्यन्त पवित्र और गुह्य इक्कीस नाम बताते हैं, जिनका पाठ करने से सहस्रनाम पाठ करने का फल मिलता है। जो दोनों सन्ध्याओं (सूर्योदय सूर्यास्त) में इसका पाठ करता है, वह समस्त पापों से छूटकर धन, आरोग्य, सन्तान आदि वाञ्छित पदार्थ प्राप्त करता है और निश्चित ही समस्त रोगों से मुक्त हो जाता है।" कथा तो आगे और है, परन्तु यहाँ तक बताने का उद्देश्य है कि आप इसका माहात्म्य समझ सकें। इन श्लोकों को आप दोनों सन्ध्याओं में नित्यपाठ करने का नियम बना लें, क्योंकि इसे स्वयं भगवान् सूर्य ने कहा है। सूर्य स्तवराज स्तोत्र 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ ॐ विकर्तनो विवस्वांश्च मार्तण्डो भास्करो रविः । लोकप्रकाशकः श्रीमान् लोकचक्षुर्महेश्वरः।। लोकसाक्षी त्रिलोकेशः कर्ता हर्ता तमिस्रहा। तपनस्तापनश्चैव शुचिः सप्ताश्ववाहनः ।। गभस्तिहस्तो ब्रह्मा च सर्वदेवनमस्कृतः । सूर्य स्तोत्र नामावली 1. विकर्तन 2. विवस्वान 3.मार्तण्ड 4. भास्कर 5. रवि 6. लोकप्रकाशक 7. श्रीमान 8. लोकचक्षु 9. महेश्वर 10. लोकसाक्षी 11. त्रिलोके 12. कर्ता 13. हर्ता 14. तमिस्रहा 15. तपन 16. तापन 17. शुचि 18. सप्ताश्ववाहन 19. गभस्तिहस्त 20. ब्रह्मा 21. सर्वदेवनमस्कृत अनुष्टुप छन्द पर आधारित ये ढाई श्लोक हैं, जिनका एक बार पठन सहस्र सूर्य नाम जप के समान फलदायी है। ये ढाई श्लोक किसी स्तोत्र से कम नहीं है। इन श्लोकों को भलिभाँति कण्ठस्थ करके और दोनों सन्धायों में इसके पाठ का नियम बना लेना चाहिये। आइये जानते हैं, इसका इतना महत्त्व क्यों है? Good morning everyone 🥀💕🌹 Have a great day ☘️☘️ Jay Shree Krishna ji 🤗🤗 Jay mata di🥀🌹🌷🌷🌺 Always be happy 😊😊😊 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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Good night everyone 🥀🥀🥀 God bless you and your family ☘️🍫🍫 Always be happy 😊😊😊 Jay Shree Krishna🥀🥀🥀 Jay mata di 💐🌹💕💕💕 सत्ता का अहंकार और अत्याचार प्रजापालक अर्थ में राजा को विष्णु कहा जाता है। विश्व के विभिन्न भागों में विष्णु सहस्रनाम के नामों के अनुसार ही राजा का सम्बोधन है। जैसे खम्मा (राजस्थान) या छामु (ओड़िशा) का मूल है-क्षमः, क्षामः। न्याय, नेता आदि नाम भी हैं। मिथिला कृषि प्रधान था, जिसके अन्न से जीवों की उत्पत्ति होती है, अतः वहां के राजा की उपाधि जनक थी। इन्द्र को अजेय अर्थ में अच्युत-च्युतः कहते थे, अर्थात् जो अब तक अपराजित है, उसे भी पराजित कर सके। यो विश्वस्य प्रतिमानं बभूव यो अच्युतच्युत स जनास इन्द्रः॥ (ऋग्वेद, २/१२/९) अधिक शक्ति होने पर च्युतः (चुतिया) निन्दा का शब्द हो गया। हिब्रू में Chutzpah का भी प्रायः वही अर्थ है। राजा, पति, गुरु आदि को नाम से नहीं बुलाते थे अतः इन्द्र को ’स जना’ कहा है। इससे सजना का अर्थ पति भी प्रचलित है। सरकारी कर्मचारी को करण (उपकरण) या कायस्थ कहते थे। अधिकारी भी जनता को लूटने के लिए अत्याचार करते हैं, अतः कायस्थ का रूढ़ि अर्थ हुआ-काक, यम, स्थपति-जैसा धूर्त, क्रूर, काट-छांट करने वाला (औशनसी स्मृति, ३५)। जल प्रलय पूर्व वेन तथा उसके बाद यदुवंशी कार्तवीर्य अर्जुन दोनों पहले आदर्श तथा सम्मानित राजा थे। पर सत्ता के अहंकार में जब प्रजा पर अत्याचार तथा लूट आरम्भ किया तो वे विद्रोह में मारे गये। पद्म पुराण,भूमि खण्ड २, अध्याय (३३-३७) के अनुसार वेन बहुत ही प्रतापी और धार्मिक राजा था। उसके राजा बनते ही चोर-डाकू छिप गये थे। बाद में प्रभुत्व पाने पर वह अहंकारी हो गया और विष्णु के स्थान पर अपनी पूजा कराने लगा। अध्याय (२/३७) के अनुसार एक नग्न मुण्डित साधु आया और कहा कि मैं जिन रूप हूं तथा अर्हत् देव का उपासक हूं। वेन के सूक्त हैं-ऋग्वेद (१०/१२३), अथर्व वेद (२/१, ४/१,२)। उनके पुत्र पृथु का समय प्रायः १७,००० ई.पू. है और ये प्रह्लाद, कार्त्तिकेय (१५८०० ई.पू.) के पूर्व के तथा कश्यप (१७५०० ई.पू.) के बाद के थे। वेन को भी बहुत प्रतापी तथा योग्य कहा गया है। वेन का शाब्दिक अर्थ तेजस्वी है और शुक्र को भी वेनः (Venus) कहा है। भागवत पुराण (४/१४) के अनुसार ऋषियों के शाप से दग्ध हो गया। पर वेन के मरते ही चोर-डाकुओं का उपद्रव आरम्भ हो गया। अतः वेन के शरीर के मन्थन से राजा पृथु का जन्म हुआ जो पृथ्वी के दोहन (खनिज तथा कृषि) के लिये विख्यात हैं। किन्तु पद्म पुराण (२/३९) अध्याय के अनुसार शरीर से पाप के निष्क्रमण के बाद वेन ने तप किया और विष्णु की स्तुति की। अध्याय (२/१००, १२३, १२५) के अनुसार यज्ञ के कारण वेन को विष्णु लोक की प्राप्ति हुई। कार्तवीर्य अर्जुन यदु वंश में दत्तात्रेय का शिष्य योगी तथा प्रतापी राजा था जिसने ८५,००० वर्ष (वर्ष = दिन-रात, ११६ वर्ष) शासन किया था। उसके गुणों के अनुसार उसे अद्वितीय कहा गया है- न नूनं कार्तवीर्यस्य गतिं यास्यन्ति पार्थिवाः। यज्ञैर्दानैस्तपोभिर्वा प्रश्रयेण श्रुतेन च॥ (विष्णु पुराण, ४/११/१६) उसे सहस्रार्जुन या सहस्रबाहु भी कहते थे। राजा की सेना, गुप्तचर आदि सहस्र होते हैं, इस प्रकार की व्यवस्था होने से वह सहस्रबाहु था। बिना मूल्य दिये जमदग्नि से कामधेनु के अपहरण के समय पुलिन्द तथा शबर लोगों ने जमदग्नि के पक्ष में सहस्रार्जुन से युद्ध किया था। यहां काम धेनु का अर्थ गो रूपी पृथ्वी है जो अपने उत्पादन से पालन करती है। उसमें भारत वर्ष विशिष्ट है। ब्रह्मवैवर्त पुराण (३/२४/५९-६४), वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड (५४/१८-२३, ५५/२-३), ब्रह्माण्ड पुराण (२/३/२९/१८-२१), स्कन्द पुराण (६/६६/१९-२१) के अनुसार कामधेनु से उत्पन्न जातियां हैं- (१) पह्लव-पारस, काञ्ची के पल्लव। पल्लव का अर्थ पत्ता है। व्यायाम करने से पत्ते के रेशों की तरह मांसपेशी दीखती है। अतः पह्लव का अर्थ मल्ल (पहलवान) है। (२) कम्बुज हुंकार से उत्पन्न हुए। कम्बुज के २ अर्थ हैं। कम्बु = शंख से कम्बुज या कम्बोडिया। कामभोज = स्वेच्छाचारी से पारस के पश्चिमोत्तर भाग के निवासी। (३) शक-मध्य एशिया तथा पूर्व यूरोप की बिखरी जातियां, कामधेनु के सकृद् भाग से (सकृद् = १ बार उत्पन्न), (४) यवन-योनि भाग से -कुर्द के दक्षिण अरब के। (५) शक-यवन के मिश्रण, (६) बर्बर-असभ्य, ब्रह्माण्ड पुराण (१/२//१६/४९) इसे भारत ने पश्चिमोत्तर में कहता है। मत्स्य पुराण (१२१/४५) भी इसे उधर की चक्षु (आमू दरिया-Oxus) किनारे कहता है। (७) लोम से म्लेच्छ, हारीत, किरात (असम के पूर्व, दक्षिण चीन), (८) खुर से खुरद या खुर्द-तुर्की का दक्षिण भाग। (९) पुलिन्द (पश्चिम भारत-मार्कण्डेय पुराण, ५४/४७), मेद, दारुण-सभी मुख से।

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सोलह महादानों का वर्णन 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ शास्त्रों में दान की अपरिमित महिमा आयी है और दान में देय-द्रव्यों की भी संख्या अपरिगणित ही है, किंतु उसमें विशेष बात यह है कि देयवस्तु में दाता का स्वत्वाधिकार होना चाहिए। पुरुषों तथा स्त्रियों में दान के कुछ पदार्थों की संख्या भी नियत रूप में आयी है, जैसे सोलह महादान, दसदान, अष्ट दान, पंचधेनु दान आदि। यहाँ सोलह महादानों की संक्षेप में चर्चा प्रस्तुत है एक बार की बात है, सूत से ऋषियों ने प्रश्न किया कि हे सूतजी! सभी शास्त्रों में न्यायपूर्वक धनार्जन, सत्प्रयत्नपूर्वक उसकी वृद्धि, उसकी रक्षा और सत्पात्र को उसको दान करना-कहा गया है तो कृपया बतायें कि वह कौन-सा दान है, जिसके करने से मनुष्य कृतार्थ हो जाता है ? ऋषियों का प्रश्न सुनकर सूतजी बड़े प्रसन्न हुए और बोले-ऋषियों! वह दान सामान्य दान नहीं, अपितु महादान कहलाता है। वह सर्वश्रेष्ठ दान है, वह सभी पापों को नष्ट करने वाला तथा दुःस्वप्न का विनाशक है 'सर्वपापक्षयकरं नृणां दुःस्वप्न नाशनम् ॥ (मत्स्यपुराण २७४। ४) उस महादान को भगवान विष्णु पृथ्वी लोक में सोलह रूपों में विभक्त बताया है। वे सभी सोलह दान पुण्यप्रद, पवित्र, दीर्घ आयु प्रदान करने वाले, सभी पापों के विनाशक तथा अत्यन्त मङ्गलकारी हैं। वे दान ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश आदि देवताओं द्वारा पूजित हैं यत् तत् षोडशधा प्रोक्तं वासुदेवेन भूतले। पुण्यं पवित्रमायुष्यं सर्वपापहरं शुभम् ॥ पूजितं देवता भिश्च ब्रह्म विष्णु शिवादिभिः । (मत्स्यपु० २७४। ५-६) इन दानों की अतीव महिमा है। सकाम इनका सम्पादन करने पर जो फल है, वह तो है ही; जो निष्काम भावसे इन सोलह महादानों को करता है, उसे पुनः इस मर्त्यलोक में आना नहीं पड़ता, वह मुक्त हो जाता है। षोडशैतानि यः कुर्यान्महादानानि मानवः । न तस्य पुनरावृत्तिरिह लोकेऽभि जायते॥ (मत्स्यपु० २८९ । १६) डॉ0 विजय शंकर मिश्र: ये सोलह दान इस प्रकार हैं (१) तुलापुरुषदान, (२) हिरण्यगर्भ दान, (३) ब्रह्माण्डदान, (४) कल्पवृक्षदान, (५) सहस्रनाम, (६) हिरण्यकामधेनुदान, (७) हिरण्याश्वदान, (८) हिरण्य श्वरथदान, (९) हेमहस्तिरथदान, (१०) पञ्चलांगलकदान, (११) धरादान, (१२) विश्वचक्रदान, (१३) कल्पलतादान, (१४) सप्तसागरदान, (१५) रत्नधेनुदान तथा (१६) महाभूत घटदान। सोलह महादानों की परम्परा-प्राचीन काल में इन दानों को भगवान वासुदेव ने किया था, उसके बाद राजर्षि अम्बरीष, भृगुवंशी परशुरामजी, सहस्रबाहुवाले राजा कार्तवीर्यार्जुन, भक्तराज प्रह्लाद, आदिराज पृथु तथा भरत आदि अन्यान्य श्रेष्ठ राजाओं ने किया था। ये सभी दान सामान्य सामर्थ्यवाले के लिये कठिन प्रतीत होते हैं। अत: साधन सम्पन्न पुरुषों द्वारा अपने कल्याण के लिये इन महादानों का अनुष्ठान होता रहा है। इन दानों में से यदि एक भी दान सम्पन्न हो जाय तो उसके सत्फल की इयत्ता नहीं है। इन दानों को करने से पूर्व भगवान वासुदेव, शंकर और भगवान् विनायक की आराधना करनी चाहिये तथा ब्राह्मणों की आज्ञा प्राप्त करनी चाहिये। किसी तीर्थ, मन्दिर या गोशाला में, कूप, बगीचा या नदी के तट पर, अपने घर पर या पवित्र वन में अथवा पवित्र तालाब के किनारे इन मतदान को करना चाहिये। चूँकि यह जीवन अस्थिर है, सम्पत्ति अत्यन्त चंचल है, मृत्यु सर्वदा केश पकड़े खड़ी है; इसलिये दानादि धर्माचरण करना चाहिये अनित्यं जीवितं यस्माद् वसु चातीव चञ्चलम्। केशेष्वेव गृहीतः सन्मृत्युना धर्ममाचरेत्॥ (मत्स्य पु० २७४। २४) महादानों को कब करे- मत्स्यभगवान ने मनुजी को बताया है कि हे राजन्! संसार-भय से भयभीत मनुष्य को अयनपरिवर्तन के समय (कर्क तथा मकर की संक्रान्ति), विषुवयोग में, पुण्यदिनों, व्यतीपात, दिनक्षय तथा युगादि तिथियों में, सूर्य-चन्द्रग्रहण के समय, मन्वन्तर के प्रारम्भ में, संक्रांति के दिन, द्वादशी तथा अष्टमी (हेमन्त, शिशिर ऋतुओं के कृष्ण पक्ष की चारों अष्टमी) तिथियों तथा यज्ञ एवं विवाह के अवसर पर, दुःस्वप्न देखने पर या किसी अद्भुत उत्पात के होने पर यथेष्ट द्रव्य तथा ब्राह्मण के मिलने पर अथवा जब जहाँ श्रद्धा उत्पन्न हो जाय, इन दानों को करना चाहिये। इन सोलह महादानों में तुलादान या तुलापुरुष दान सर्वप्रथम परिगणित है, इसकी विस्तृत विधि पुराणों में बतायी गयी है। तुलापुरुषदान में तुला का निर्माणकर तुला के एक ओर तुलादान करने वाला तथा दूसरी ओर दाता के भार के बराबर की वस्तु तौलकर ब्राह्मण को दान में दी जाती है। तुलादान में इन्द्रादि आठ लोकपालों का विशेष पूजन होता है। तुला में अधिरोहण से पूर्व तुलादाता को श्वेत वस्त्र धारणकर अंजलि में पुष्प लेकर उस तुला की तीन बार परिक्रमा करनी चाहिये और इन मन्त्रों से उसे अभिमंत्रित करना चाहिये डॉ0 विजय शंकर मिश्र: नमस्ते सर्वदेवानां शक्तिस्त्वं सत्यमास्थिता ॥ साक्षिभूता जगद्धात्री निर्मिता विश्व योजना। एकतः सर्वसत्यानि तथानृतशतानि च।। धर्माधर्मकृतां मध्ये स्थापितासि जगद्धिते। त्वं तुले सर्वभूतानां प्रमाणमिह कीर्तन ॥ मां तोलयन्ती संसारादुद्धरस्व नमोऽस्तु ते। योऽसौ तत्त्वाधिपो देवः पुरुषः पञ्चविंशकः॥ स एकोऽधिष्ठितो देवि त्वयि तस्मान्नमो नमः । नमो नमस्ते गोविन्द तुलापुरुषसंज्ञक । त्वं हरे तारयस्वास्मानस्मात् संसारकर्दमात्। (मत्स्यपु० २७४ । ५९-६४) हे भोले! तुम सभी देवताओं की शक्ति स्वरूपा हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम सत्य की आश्रयभूता, साक्षिस्वरूपा, जगत् को धारण करने वाली और विश्वयोनि ब्रह्मा द्वारा निर्मित की गयी हो, जगत्की कल्याणकारिणि! तुम्हारे एक पलड़े पर सभी सत्य हैं, दूसरे पर सौ असत्य हैं। धर्मात्मा और पापियों के बीच तुम्हारी स्थापना हुई है। तुम भूतल पर सभी जीवों के लिये प्रमाणरूप बतलायी गयी हो। मुझे तोलती हुई तुम इस संसार से मेरा उद्धार कर दो, तुम्हें नमस्कार है। देवि! जो ये तत्त्वों के अधीश्वर पचीसवें पुरुष भगवान् हैं, वे एकमात्र तुम्हीं में अधिष्ठित हैं, इसलिये तुम्हें बारम्बार प्रणाम है। तुलापुरुष नामधारी गोविन्द आपको बारम्बार अभिवादन है। हरे! आप इस संसाररूपी पंक से हमारा उद्धार कीजिये। तदनन्तर दाता तुला में आरोहण कर स्थित हो जाए। ब्राह्मण गण तुला के दूसरी ओर स्वर्ण आदि (तुलनीय द्रव्य) तब तक रखते जायें, जब तक तराजू का वह पलड़ा भूमिपर स्पर्श न कर ले। तुला को नमस्कार- तदनन्तर निम्न मन्त्र से तुलाबको नमस्कार करना चाहिये नमस्ते सर्वभूतानां साक्षिभूते सनातनि । पितामहेन देवि त्वं निर्मिता परमेष्ठिनः।। त्वया धृतं जगत् सर्वं सहस्थावरजङ्गमम्। (मत्स्य पु० २७४। ६९-७०) सर्वभूतात्मभूतस्थे नमस्ते विश्व धारिणि॥ सभी जीवों की साक्षीभूता सनातनी देवि! तुम पितामह ब्रह्मा द्वारा निर्मित हुई हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम! तुम समस्त स्थावर-जंगम रूप जगत को धारण करने वाली हो, सभी जीवों को आत्मभूत करने वाली विश्वधारिणि! तुम्हें नमस्कार है। इसके अनन्तर तुला से उतरकर उस स्वर्ण का दान कर देना चाहिये। यह बताया गया है कि बुद्धिमान् पुरुष उस तौले हुए स्वर्ण को अधिक देरतक अपने घर में न रखे 'न चिरं धारयेद् गेहे सुवर्ण प्रोक्षितं बुधः ॥ (मत्स्यपुराण २७४। ७३ ) ऐसा करने से अर्थात् देर तक रखने से वह भय, व्याधि तथा शोक आदि को देने वाला होता है। अतः शीघ्र ही उसका दान कर देना चाहिये। उसे शीघ्र ही दूसरे को दे देने से मनुष्य श्रेयका भागी हो जाता है। तुलापुरुषदान की महिमा में कहा गया है कि तुलापुरुष का दान करने वाला विष्णुलोक को जाता है। इतना ही नहीं, इस दान की प्रक्रिया को जो देखता-सुनता है, पढ़ता है अथवा उसका स्मरण करता है, वह भी इन्द्र होकर दिव्य लोक प्राप्त करता है। दानमयूख में बताया गया है कि रत्न, रजत (चाँदी), लौह आदि धातु, घृत, लवण, गुड़, शर्करा, चन्दन, कुमकुम, वस्त्र, सुगन्धित द्रव्य, कर्पूर, फल तथा अन्नादि द्रव्यों से भी विविध कामनाओं की पूर्ति के लिये तुलादान किया जाता है। इसी प्रकार विविध रोगों की शांति के लिये तथा मृत्युंजय देवता की प्रसन्नता के लिये भी विविध वस्तुओं से तुलादान किया जाता है, सभी रोगों की शांति के लिये लौह से तुलादान किया जाता है-'अथ लोहे प्रदातव्यं सर्वर उपशान्तये' (दानमयूखमें गरुड़ पुराण का वचन)। महादानों में दूसरा महादान हिरण्यगर्भ दान है, इसकी विधि भी तुलापुरुषदान के समान है । इसमें सुवर्णमय कलश का विशेष विधि से दान किया जाता है, तीसरा दान है ब्रह्माण्ड दान। इसमें सुवर्ण का ब्रह्माण्ड बनाकर दान किया जाता है, चौथे कल्पपादपदान में सुवर्णमय कल्पवृक्ष का दान होता है। पाँचवें सहस्रनाम के अन्तर्गत एक नन्दिकेश्वर तथा हजार गौओं का दान होता है, उन्हें स्वर्ण से निर्मित किया जाता है। छठे कामधेनुदान में सुवर्ण की धेनु तथा सुवर्ण का ही वत्स बनाकर दान किया जाता है। इसी प्रकार सुवर्णमय अश्व तथा सुवर्णमय अश्वरथ का दान होता है। नौवाँ दान सुवर्णनिर्मित हस्तिरथ का होता है, ऐसे ही दसवाँ दान पंचलांगल दान है। लांगल हल को कहते हैं। इसमें सुवर्णनिर्मित पाँच हल और दस वृष के साथ भूमि का दान होता है। ग्यारहवाँ दान सुवर्णमयी पृथ्वी का दान है । इसका नाम हेमधरादान भी है। इसमें जम्बूद्वीप के आकार की भाँति सोने की पृथ्वी बनवाकर उसका दान किया जाता है । बारहवें विश्व चक्र दान में सोने से विश्व चक्र बनाकर उसके नाभि कमल पर चतुर्भुज विष्णु की प्रतिमा को स्थापितकर उसका दान किया जाता है। तेरहवां दान कनककल्पलता नामक महादान है। चौदहवाँ सप्तसागर नाम का दान है। इसमें सुवर्ण में सात कुण्ड बनाकर प्रथम कुण्ड को लवण से, द्वितीय कुण्ड को दुग्ध से, इसी प्रकार घृत, गुड़, दही, चीनी तथा सातवें को तीर्थोंके जलसे भरकर उसमें विविध देवताओं की सुवर्णमय प्रतिमा का स्थापन कर विशेष विधिसे दान किया जाता है। पन्द्रहवाँ महादान रत्नधेनुदान है, इसमें पृथ्वी पर कृष्ण मृगचर्म बिछाकर उसके ऊपर लवण बिछाकर उसके ऊपर रत्नमयी धेनु को स्थापित करे, विविध रत्नों द्वारा रत्नमयी धेनु का निर्माण होता है। तदनन्तर विधिपूर्वक उसका आवाहनकर दान किया जाता है। सोलहवाँ दान महाभूतघटदान कहा जाता है। इसमें रत्नों से जटित सुवर्णमय कलश की स्थापना कर दुग्ध और घृत से उसे परिपूर्ण किया जाता है। उस घट में देवताओं तथा वेदों का आवाहन करना चाहिये। तदनन्तर यथाविधि उसका दान किया जाता है। शुभ प्रभात वंदन जी 🌹💕💕 आपका दिन शुभ मंगलमय हो 💐💐 जय हो मां शेरावाली 🌹💕💕💕💕 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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रामायण काल के 10 मायावी राक्षस 〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️ प्राचीनकाल में सुर, असुर, देव, दानव, दैत्य, रक्ष, यक्ष, दक्ष, किन्नर, निषाद, वानर, गंधर्व, नाग आदि जातियां होती थीं। राक्षसों को पहले ‘रक्ष’ कहा जाता था। ‘रक्ष’ का अर्थ, जो समाज की रक्षा करें। राक्षस लोग पहले रक्षा करने के लिए नियुक्त हुए थे, लेकिन बाद में इनकी प्रवृत्तियां बदलने के कारण ये अपने कर्मों के कारण बदनाम होते गए और आज के संदर्भ में इन्हें असुरों और दानवों जैसा ही माना जाता है। देवताओं की उत्पत्ति अदिति से, असुरों की दिति से, दानवों की दनु, कद्रू से नाग की मानी गई है। पुराणों के अनुसार कश्यप की सुरसा नामक रानी से यातुधान (राक्षस) उत्पन्न हुए, लेकिन एक कथा के अनुसार प्रजापिता ब्रह्मा ने समुद्रगत जल और प्राणियों की रक्षा के लिए अनेक प्रकार के प्राणियों को उत्पन्न किया। उनमें से कुछ प्राणियों ने रक्षा की जिम्मेदारी संभाली, तो वे राक्षस कहलाए और जिन्होंने यक्षण (पूजन) करना स्वीकार किया, वे यक्ष कहलाए। जल की रक्षा करने के महत्वपूर्ण कार्य को संभालने के लिए यह जाति पवित्र मानी जाती थी। राक्षसों का प्रतिनिधित्व इन दोनों लोगों को सौंपा गया- ‘हेति’ और ‘प्रहेति’। ये दोनों भाई थे। ये दोनों भी दैत्यों के प्रतिनिधि मधु और कैटभ के समान ही बलशाली और पराक्रमी थे। प्रहेति धर्मात्मा था तो हेति को राजपाट और राजनीति में ज्यादा रुचि थी। रामायणकाल में जहां विचित्र तरह के मानव और पशु-पक्षी होते थे वहीं उस काल में राक्षसों का आतंक बहुत ज्यादा बढ़ गया था। राक्षसों में मायावी शक्तियां होती थीं। वे अपनी शक्ति से देव और मानव को आतंकित करते रहते थे। रामायणकाल में संपूर्ण दक्षिण भारत और दंडकारण्य क्षेत्र (मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़) पर राक्षसों का आतंक था। दंड नामक राक्षस के कारण ही इस क्षेत्र का नाम दंडकारण्य पड़ा था। आओ जानते हैं राम के काल के वे 10 राक्षस, जिनका डंका बजता था। पहले राक्षस ‘हेति’ 〰️🌼〰️🌼〰️ और ‘प्रहेति’ : राक्षसों का प्रतिनिधित्व दो लोगों को सौंपा गया- ‘हेति’ और ‘प्रहेति’। ये दोनों भाई थे। हेति ने अपने साम्राज्य विस्तार हेतु ‘काल’ की पुत्री ‘भया’ से विवाह किया। भया से उसके विद्युत्केश नामक एक पुत्र का जन्म हुआ। उसका विवाह संध्या की पुत्री ‘सालकटंकटा’ से हुआ। माना जाता है कि ‘सालकटंकटा’ व्यभिचारिणी थी। इस कारण जब उसका पुत्र जन्मा तो उसे लावारिस छोड़ दिया गया। विद्युत्केश ने भी उस पुत्र की यह जानकर कोई परवाह नहीं की कि यह न मालूम किसका पुत्र है। बस यहीं से राक्षस जाति में बदलाव आया…। शिव और मां पार्वती की उस अनाथ बालक पर नजर पड़ी और उन्होंने उसको सुरक्षा प्रदान ‍की। उस अबोध बालक को त्याग देने के कारण मां पार्वती ने शाप दिया कि अब से राक्षस जाति की स्त्रियां जल्द गर्भ धारण करेंगी और उनसे उत्पन्न बालक तत्काल बढ़कर माता के समान अवस्था धारण करेगा। इस शाप से राक्षसों में शारीरिक आकर्षण कम, विकरालता ज्यादा रही। शिव और पार्वती ने उस बालक का नाम ‘सुकेश’ रखा। शिव के वरदान के कारण वह निर्भीक था। वह निर्भीक होकर कहीं भी विचरण कर सकता था। शिव ने उसे एक विमान भी दिया था। सुकेश के 3 पुत्र 〰️🌼〰️🌼〰️ सुकेश ने गंधर्व कन्या देववती से विवाह किया। देववती से सुकेश के 3 पुत्र हुए- 1. माल्यवान, 2. सुमाली और 3. माली। इन तीनों के कारण राक्षस जाति को विस्तार और प्रसिद्धि प्राप्त हुई। इन तीनों भाइयों ने शक्ति और ऐश्वर्य प्राप्त करने के लिए ब्रह्माजी की घोर तपस्या की। ब्रह्माजी ने इन्हें शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने और तीनों भाइयों में एकता और प्रेम बना रहने का वरदान दिया। वरदान के प्रभाव से ये तीनों भाई अहंकारी हो गए। तीनों भाइयों ने मिलकर विश्वकर्मा से त्रिकूट पर्वत के निकट समुद्र तट पर लंका का निर्माण कराया और उसे अपने शासन का केंद्र बनाया। इस तरह उन्होंने राक्षसों को एकजुट कर राक्षसों का आधिपत्य स्थापित किया और उसे राक्षस जाति का केंद्र भी बनाया। लंका को उन्होंने धन और वैभव की धरती बनाया और यहां तीनों राक्षसों ने राक्षस संस्कृति के लिए विश्व विजय की कामना की। उनका अहंकार बढ़ता गया और उन्होंने यक्षों और देवताओं पर अत्याचार करना शुरू किया जिससे संपूर्ण धरती पर आतंक का राज कायम हो गया। इन्हीं तीनों भाइयों के वंश में आगे चलकर राक्षस जाति का विकास हुआ। तीनों भाइयों के वंशज में माल्यवान के वज्र, मुष्टि, धिरूपार्श्व, दुर्मख, सप्तवहन, यज्ञकोप, मत्त, उन्मत्त नामक पुत्र और अनला नामक कन्या हुई। सुमाली के प्रहस्त, अकन्पन, विकट, कालिकामुख, धूम्राश, दण्ड, सुपार्श्व, सहादि, प्रधस, भास्कण नामक पुत्र तथा रांका, पुण्डपोत्कटा, कैकसी, कुभीनशी नामक पुत्रियां हुईं। इनमें से कैकसी रावण की मां थीं। माली रावण के नाना थे। रावण ने इन्हीं के बलबूते पर अपने साम्राज्य का विस्तार किया और शक्तियां बढ़ाईं। माली के अनल, अनिल, हर और संपात्ति नामक 4 पुत्र हुए। ये चारों पुत्र रावण की मृत्यु पश्चात विभीषण के मंत्री बने थे। रावण राक्षस जाति का नहीं था, उसकी माता राक्षस जाति की थी लेकिन उनके पिता यक्ष जाति के ब्राह्मण थे। राक्षसराज रावण 〰️🌼〰️🌼〰️ माली की पुत्री कैकसी रावण की माता थीं। रावण का अपने नाना की ओर झुकाव ज्यादा था इसलिए उसने देवों को छोड़कर राक्षसों की उन्नति के बारे में ज्यादा सोची। रावण एक कुशल राजनीतिज्ञ, सेनापति और वास्तुकला का मर्मज्ञ होने के साथ-साथ ब्रह्मज्ञानी तथा बहु-विद्याओं का जानकार था। राक्षसों के प्रति उसके लगाव के चलते उसे राक्षसों का मुखिया घोषित कर दिया गया था। रावण ने लंका को नए सिरे से बसाकर राक्षस जाति को एकजुट किया और फिर से राक्षस राज कायम किया। उसने लंका को कुबेर से छीना था। उसे मायावी इसलिए कहा जाता था कि वह इंद्रजाल, तंत्र, सम्मोहन और तरह-तरह के जादू जानता था। उसके पास एक ऐसा विमान था, जो अन्य किसी के पास नहीं था। इस सभी के कारण सभी उससे भयभीत रहते थे। पौराणिक मान्यता अनुसार एक शाप के चलते असुरराज विष्णु के पार्षद जय और विजय ने ही रावण और कुंभकर्ण के रूप में फिर से जन्म लेकर धरती पर अपना साम्राज्य स्थापित किया। द्वापर युग में यही दोनों शिशुपाल व दंतवक्त्र नाम के अनाचारी के रूप में पैदा हुए थे। इनको 3 जन्मों की सजा थी। रावण ने रक्ष संस्कृति का विस्तार किया था। रावण ने कुबेर से लंका और उनका विमान छीना। रावण ने राम की सीता का हरण किया और अभिमानी रावण ने शिव का अपमान किया था। विद्वान होने के बावजूद रावण क्रूर, अभिमानी, दंभी और अत्याचारी था। कालनेमि 〰️🌼〰️ कालनेमि राक्षस रावण का विश्वस्त अनुचर था। यह भयंकर मायावी और क्रूर था। इसकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक थी। रावण ने इसे एक बहुत ही कठिन कार्य सौंप दिया था। जब राम-रावण युद्ध में लक्ष्मण को शक्ति लगने से वे बेहोश हो गए थे, तब हनुमान को तुरंत ही संजीवनी लाने का कहा गया था। हनुमानजी जब द्रोणाचल की ओर चले तो रावण ने उनके मार्ग में विघ्न उपस्थित करने के लिए कालनेमि को भेजा। कालनेमि ने अपनी माया से तालाब, मंदिर और सुंदर बगीचा बनाया और वह वहीं एक ऋषि का वेश धारण कर मार्ग में बैठ गया। हनुमानजी उस स्थान को देखकर वहां जलपान के लिए रुकने का मन बनाकर जैसे ही तालाब में उतरे तो तालाब में प्रवेश करते ही एक मगरी ने अकुलाकर उसी समय हनुमानजी का पैर पकड़ लिया। हनुमानजी ने उसे मार डाला। फिर उन्होंने अपनी पूंछ से कालनेमि को जकड़कर उसका वध कर दिया। सुबाहु 〰️🌼〰️ ताड़का के पिता का नाम सुकेतु यक्ष और पति का नाम सुन्द था। सुन्द एक राक्षस था इसलिए यक्ष होते हुए भी ताड़का राक्षस कहलाई। अगस्त्य मुनि के शाप के चलते इसका सुंदर चेहरा कुरूप हो गया था इसलिए उसने ऋषियों से बदला लेने की ठानी थी। वह आए दिन अपने पुत्रों के साथ मुनियों को सताती रहती थी। यह अयोध्या के समीप स्थित सुंदर वन में अपने पति और दो पुत्रों सुबाहु और मारीच के साथ रहती थी। ताड़का के शरीर में हजार हाथियों का बल था। उसके कारण ही सुंदर वन को पहले ताड़का वन कहा जाता था। सुबाहु भी भयंकर था और वह प्रतिदिन ऋषियों के यज्ञ में उत्पात मचाता था। उसी वन में विश्वामित्र सहित अनेक ऋषि-मुनि तपस्या करते थे। ये सभी राक्षसगण हमेशा उनकी तपस्या में बाधाएं खड़ी करते थे। विश्वामित्र एक यज्ञ के दौरान राजा दशरथ से अनुरोध कर एक दिन राम और लक्ष्मण को अपने साथ सुंदर वन ले गए। राम ने ताड़का का और विश्वामित्र के यज्ञ की पूर्णाहूति के दिन सुबाहु का भी वध कर दिया था। राम के बाण से मारीच आहत होकर दूर दक्षिण में समुद्र तट पर जा गिरा। मारीच 〰️🌼〰️ राम के तीर से बचने के बाद ताड़का पुत्र मारीच ने रावण की शरण ली। मारीच लंका के राजा रावण का मामा था। जब शूर्पणखा ने रावण को अपने अपमान की कथा सुनाई तो रावण ने सीताहरण की योजना बनाई। सीताहरण के दौरान रावण ने मारीच की मायावी बुद्धि की सहायता ली। रावण महासागर पार करके गोकर्ण तीर्थ में पहुंचा, जहां राम के डर के कारण मारीच छिपा हुआ था। वह रावण का पूर्व मंत्री रह चुका था। रावण को देखकर मारीच ने कहा कि राक्षसराज ऐसी क्या आवश्यकता आ पड़ी, जो आपको मेरे पास आना पड़ा। रावण ने गुस्से से भरकर कहा कि राम-लक्ष्मण ने शूर्पणखा के नाक-कान काट दिए और अब हमें उनसे बदला लेना होगा। मारीच ने कहा- हे रावण, श्रीरामचंद्रजी के पास जाने में तुम्हारा कोई लाभ नहीं है। मैं उनका पराक्रम जानता हूं। भला इस जगत में ऐसा कौन है, जो उनके बाणों के वेग को सह पाए। रावण ने मारीच पर क्रोधित होकर कहा कहा- रे मामा! तू मेरी बात नहीं मानेगा तो निश्चय ही तुझे अभी मौत के घाट उतार दूंगा। मारीच ने मन ही मन सोचा- यदि मृत्यु निश्चित है तो श्रेष्ठ पुरुष के ही हाथ से मरना अच्छा होगा। फिर मारीच ने पूछा- अच्छा बताओ, मुझे क्या करना होगा? रावण ने कहा- तुम एक सुंदर हिरण का रूप बनाओ जिसके सींग रत्नमय प्रतीत हो। शरीर भी चित्र-विचित्र रत्नों वाला ही प्रतीत हो। ऐसा रूप बनाओ कि सीता मोहित हो जाए। अगर वे मोहित हो गईं तो जरूर वो राम को तुम्हें पकड़ने भेजेंगी। इस दौरान मैं उसे हरकर ले जाऊंगा। मारीच ने रावण के कहे अनुसार ही कार्य किया और रावण अपनी योजना में सफल रहा। इधर राम के बाण से मारीच मारा गया। कुंभकर्ण 〰️🌼〰️ यह रावण का भाई था, जो 6 महीने बाद 1 द‌िन जागता और भोजन करके फ‌िर सो जाता, क्‍योंक‌ि इसने ब्रह्माजी से न‌िद्रासन का वरदान मांग ल‌िया था। युद्ध के दौरान क‌िसी तरह कुंभकर्ण को जगाया गया। कुंभकर्ण ने युद्घ में अपने व‌िशाल शरीर से वानरों पर प्रहार करना शुरू कर द‌िया इससे राम की सेना में हाहाकार मच गया। सेना का मनोबल बढ़ाने के ल‌िए राम ने कुंभकर्ण को युद्घ के ल‌िए ललकारा और भगवान राम के हाथों कुंभकर्ण वीरगत‌ि को प्राप्त हुआ। कबंध 〰️🌼〰️ सीता की खोज में लगे राम-लक्ष्मण को दंडक वन में अचानक एक विचित्र दानव दिखा जिसका मस्तक और गला नहीं थे। उसकी केवल एक ही आंख ही नजर आ रही थी। वह विशालकाय और भयानक था। उस विचित्र दैत्य का नाम कबंध था। कबंध ने राम-लक्ष्मण को एकसाथ पकड़ लिया। राम और लक्ष्मण ने कबंध की दोनों भुजाएं काट डालीं। कबंध ने भूमि पर गिरकर पूछा- आप कौन वीर हैं? परिचय जानकर कबंध बोला- यह मेरा भाग्य है कि आपने मुझे बंधन मुक्त कर दिया। कबंध ने कहा- मैं दनु का पुत्र कबंध बहुत पराक्रमी तथा सुंदर था। राक्षसों जैसी भीषण आकृति बनाकर मैं ऋषियों को डराया करता था इसीलिए मेरा यह हाल हो गया था। विराध 〰️🌼〰️ विराध दंडकवन का राक्षस था। सीता और लक्ष्मण के साथ राम ने दंडक वन में प्रवेश किया। वहां पर उन्हें ऋषि-मुनियों के अनेक आश्रम दृष्टिगत हुए। राम उन्हीं के आश्रम में रहने लगे। ऋषियों ने उन्हें एक राक्षस के उत्पात की जानकारी दी। राम ने उन्हें निर्भीक किया। वहां से उन्होंने महावन में प्रवेश किया, जहां नाना प्रकार के हिंसक पशु और नरभक्षक राक्षस निवास करते थे। ये नरभक्षक राक्षस ही तपस्वियों को कष्ट दिया करते थे। कुछ ही दूर जाने के बाद बाघम्बर धारण किए हुए एक पर्वताकार राक्षस दृष्टिगत हुआ। वह राक्षस हाथी के समान चिंघाड़ता हुआ सीता पर झपटा। उसने सीता को उठा लिया और कुछ दूर जाकर खड़ा हो गया। उसने राम और लक्ष्मण पर क्रोधित होते हुए कहा- तुम धनुष-बाण लेकर दंडक वन में घुस आए हो। तुम दोनों कौन हो? क्या तुमने मेरा नाम नहीं सुना? मैं प्रतिदिन ऋषियों का मांस खाकर अपनी क्षुधा शांत करने वाला विराध हूं। तुम्हारी मृत्यु ही तुम्हें यहां ले आई है। मैं तुम दोनों का अभी रक्तपान करके इस सुन्दर स्त्री को अपनी पत्नी बनाऊंगा। विराध ने हंसते हुए कहा- यदि तुम मेरा परिचय जानना ही चाहते हो तो सुनो! मैं जय राक्षस का पुत्र हूं। मेरी माता का नाम शतह्रदा है। मुझे ब्रह्माजी से यह वर प्राप्त है कि किसी भी प्रकार का अस्त्र-शस्त्र न तो मेरी हत्या ही कर सकती है और न ही उनसे मेरे अंग छिन्न-भिन्न हो सकते हैं। यदि तुम इस स्त्री को मेरे पास छोड़कर चले जाओगे तो मैं तुम्हें वचन देता हूं कि मैं तुम्हें नहीं मारूंगा। राम और लक्ष्मण ने उससे घोर युद्ध किया और उसे हर तरह से घायल कर दिया। फिर उसकी भुजाएं भी काट दीं। तभी राम बोले- लक्ष्मण! वरदान के कारण यह दुष्ट मर नहीं सकता इसलिए यही उचित है कि हमें भूमि में गड्ढा खोदकर इसे बहुत गहराई में गाड़ देना चाहिए। लक्ष्मण गड्ढा खोदने लगे और राम विराध की गर्दन पर पैर रखकर खड़े हो गए। तब विराध बोला- हे प्रभु! मैं तुम्बुरू नाम का गंधर्व हूं। कुबेर ने मुझे राक्षस होने का शाप दिया था। मैं शाप के कारण राक्षस हो गया था। आज आपकी कृपा से मुझे उस शाप से मुक्ति मिल रही है। राम और लक्ष्मण ने उसे उठाकर गड्ढे में डाल दिया और गड्ढे को पत्थर आदि से पाट दिया। अहिरावण 〰️🌼〰️ अहिरावण एक असुर था। अहिरावण पाताल में स्थित रावण का मित्र था जिसने युद्ध के दौरान रावण के कहने से आकाश मार्ग से राम के शिविर में उतरकर राम-लक्ष्मण का अपहरण कर लिया था। जब अहिरावण श्रीराम और लक्ष्मण को देवी के समक्ष बलि चढ़ाने के लिए विभीषण के भेष में राम के शिविर में घुसकर अपनी माया के बल पर पाताल ले आया था, तब श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराने के लिए हनुमानजी पाताल लोक पहुंचे और वहां उनकी भेंट उनके ही पुत्र मकरध्वज से हुई। उनको मकरध्वज के साथ लड़ाई लड़ना पड़ी, क्योंकि मकरध्वज अहिरावण का द्वारपाल था। मकरध्वज ने कहा- अहिरावण का अंत करना है तो इन 5 दीपकों को एकसाथ एक ही समय में बुझाना होगा। यह रहस्य ज्ञात होते ही हनुमानजी ने पंचमुखी हनुमान का रूप धारण किया। उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरूड़ मुख, आकाश की ओर हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख। इन 5 मुखों को धारण कर उन्होंने एकसाथ सारे दीपकों को बुझाकर अहिरावण का अंत किया और श्रीराम-लक्ष्मण को मुक्त किया। हनुमानजी ने अहिरावण का वध कर प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराया और मकरध्वज को पाताल लोक का राजा नियुक्त करते हुए उसे धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। खर और दूषण 〰️🌼〰️🌼〰️ ये दोनों रावण के ‘विमातृज’ (सौतेले भाई) थे। ऋषि विश्रवा की 2 और पत्नियां थीं। खर, पुष्पोत्कटा से और दूषण, वाका से उत्पन्न हुए थे जबकि कैकसी से रावण का जन्म हुआ था। खर-दूषण को भगवान राम ने मारा था। खर और दूषण के वध की घटना रामायण के अरण्यक कांड में मिलती है। शूर्पणखा की नाक काट देने के बाद वह खर और दूषण के पास गई थी। खर और दूषण ने अपनी- अपनी सेना तैयार कर वन में रह रहे राम और लक्ष्मण पर हमला कर दिया था, लेकिन दोनों भाइयों ने मिलकर अकेले ही खर और दूषण का ‍वध कर दिया। मेघनाद 〰️🌼〰️ मेघदाद को इंद्रजित भी कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने स्वर्ग पर आक्रमण करके उस पर अपना अधिकार जमा लिया था। मेघनाद बहुत ही शक्तिशाली और मायावी था। उसने हनुमानजी को बंधक बनाकर रावण के समक्ष प्रस्तुत कर दिया था।दिव्य शक्तियां : रावण के पुत्रों में मेघनाद सबसे पराक्रमी था। माना जाता है कि जब इसका जन्म हुआ तब इसने मेघ के समान गर्जना की इसलिए यह मेघनाद कहलाया। मेघनाद ने युवास्था में दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य की सहायता से ‘सप्त यज्ञ’ किए थे और शिव के आशीर्वाद से दिव्य रथ, दिव्यास्त्र और तामसी माया प्राप्त की थी।उसने राम की सेना से मायावी युद्ध किया था। कभी वह अंतर्धान हो जाता, तो कभी प्रकट हो जाता। विभीषण ने कुबेर की आज्ञा से गुह्यक जल श्वेत पर्वत से लाकर दिया था, जिससे नेत्र धोकर अदृश्य को भी देखा जा सकता था। श्रीराम की ओर के सभी प्रमुख योद्धाओं ने इस जल का प्रयोग किया था, जिससे मेघनाद से युद्ध किया जा सके।मेघनाद का वध : इसने राम लक्ष्मण पर दिव्य बाण चलाया जो नागपाश में बदल गया। इससे राम लक्ष्मण मूर्छित होकर गिर पड़े। राक्षस सेना में खुशी लहर छा गई जबकि वानर सेना का मनोबल टूटने लगा। विपरीत स्थिति देखकर हनुमान जी पवन वेग से उड़ते हुए गरूड़ जी को लेकर आए। गरूड़ जी ने नागपाश को काटकर राम-लक्ष्मण को बंधन मुक्ति किया। राम लक्ष्मण स्वस्थ होकर वानर सेनाका मनोबल बढ़ाने लगे मेघनाद को जब राम लक्ष्मण के जीवित होने की सूचना मिली तो वह अपनी सेना लेकर फिर युद्घ करने आया। इस बार लक्ष्मण और मेघनाद का प्रलंयकारी युद्घ आरंभ हुआ। दोनों एक दूसरे पर दिव्यास्त्रों का प्रयोग करने लगे। दोनों के युद्घ को देखकर आकश के देवता भी हैरान थे। तभी लक्ष्मण ने एक दिव्य वाण भगवान राम का नाम लेकर मेघनाद पर छोड़ दिया। वाण मेघनाद का सिर काटते हुए आकश में दूर तक लेकर चला गया। मेघनाद की इस स्थिति को देखकर राक्षस सेना का मनोबल पूरी तरह टूट गया और प्राण बचाकर नगर की ओर भागने लगे। रावण को जब मेघनाद की मृत्यु का समाचार मिलता तो शोक के कारण वह जड़वत अपने सिंहासन पर बैठ गया। शुभ प्रभात वंदन जी 🌹💕 आपका दिन शुभ मंगलमय हो 💐💐💐 बाबा बजरंगबली और शनि देव की कृपा दृष्टि सदेव आप और आपके परिवार पर बनी रहे 💐 शुभ शनिवार🥀🥀🥀 जय हो मां शेरावाली 🌹💕💕💕 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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माँ दुर्गा का नाम दुर्गा कैसे पड़ा????? हमारे सनातन धर्म में प्रत्येक देवी-देवता से जुड़े तथ्य हमेशा से ही रोचकता पैदा करते रहे हैं, फिर वह चाहे अपने भक्तों को वरदान देने के संदर्भ में हो या फिर किसी दुष्ट प्राणी को दंड देने की बात हो, शास्त्रों की पौराणिक कथायें हमें पल-पल अचंभित करती हैं, कथाओं के साथ ही विभिन्न देवी-देवताओं के प्राकट्य, तथा उनके नाम से जुड़ी कथायें भी बहुत रोचक हैं। माँ दुर्गा के नाम से जुड़ी एक कथा काफी प्रचलित है, माना जाता है कि मां दुर्गा जिन्हें मां काली के नाम से भी जाना जाता है, उनका नाम एक बड़ी घटना के बाद ही दुर्गा पड़ा था, श्री दुर्गा सप्तशती में वर्णित एक कथा के अनुसार एक दुष्ट प्राणी पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् ही देवी को दुर्गा नाम से बुलाया गया। यह तब की बात है जब प्रह्लाद के वंश में दुर्गम नाम का एक अति भयानक, क्रूर और पराक्रमी दैत्य पैदा हुआ, इस दैत्य के जीवन का एक ही मकसद था- सभी देवी-देवताओं को पराजित कर समस्त सृष्टि पर राज करना, लेकिन जब तक महान देवता इस दुनिया में मौजूद थे, तब तक दुर्गम के लिए यह करना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन भी था। अपनी सूझ-बोझ से दुर्गम ने यह पता लगा लिया था, कि जब तक देवताओं के पास महान वेदों का बल है, तब तक वह उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकेगा, इसलिये उसने उन देवों को हड़पने की योजना बनायीं, उसका मानना था कि यदि यह वेद देवताओं से दूर हो जायेंगे तो वे शक्तिहीन होकर पराजित हो जायेंगे। दुर्गम ने हिमालय पर्वत जा कर तपस्या करने का फैसला किया, वहां जाकर उसने सृष्टि के रचियता ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या आरम्भ कर दी, यदि उसकी तपस्या से ब्रह्माजी खुश हो गये तो वे वरदान में उनसे जो चाहे वो मांग सकता था। डॉ0 विजय शंकर मिश्र:! दुर्गम ने तपस्या शुरू की, सैकड़ों साल बीत गये लेकिन दुर्गम तपस्या में लीन रहा, उसकी कठोर तपस्या के तेज से सभी देवता अचंभित और भयभीत हो गयें, वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि आखिरकार ऐसा कौन है? जो इतने ध्यान से तप में लीन बैठा है, तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। जहां एक तरफ सभी देवता दुर्गम के तप से हैरान-परेशान हो रहे थे, वहीं दूसरी ओर ब्रह्माजी ने उसे अपना दर्शन देने का निर्णय किया, ब्रह्माजी दुर्गम के सामने प्रकट हुये उस समय भी वह अपनी तपस्या में ध्यान लगाये बैठा था, उसे यह आभास भी नहीं हुआ कि ब्रह्माजी उसके निकट खड़े हैं। उसे समाधि में लीन देखकर ब्रह्माजी बोले- वत्स! अपने नेत्र खोलो, मैं तुम्हारी तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हूंँ और तुम्हें मुंहमांगा वरदान देने आया हूंँ, मांगो तुम्हें क्या चाहियें, भगवान् ब्रह्माजी के वचन सुन दुर्गम ने अपने नेत्र खोले, ब्रह्माजी को अपने सामने देख उसकी खुशी का ठिकाना ना रहा, उसे लगा कि अब उसकी सभी मनोकामनायें अवश्य पूर्ण होगी। वह बोला- हे पितामह! यदि आप मेरे इस कठोर तप से प्रसन्न हैं तो मुझे सभी वेद देने की कृपा कीजिये, सब वेद मेरे अधिकार में हो जायें, वेदों के साथ ही मुझे ऐसा अतुल्य बल प्रदान किजिये जिससे कि देवता, मनुष्य, गंधर्व, यक्ष, नाग कोई भी मुझे पराजित न कर सके, दुर्गम की प्रार्थना सुनते ही ब्रह्माजी ने तथास्तु कहा और वहां से ब्रह्मलोक लौट गये। ब्रह्माजी द्वारा दुर्गम को वरदान देते ही देवी-देवता, ऋषि-मुनि सारे वेदों को भूल गये, इतना ही नहीं, सभी स्नान, संध्या, हवन, श्राद्ध, यज्ञ एवं जप आदि वैदिक क्रियाएं नष्ट हो गयीं, सारे भूमण्डल पर भीषण हाहाकार मच गया, वातावरण ने भी अपना प्रकोप दिखाना आरंभ कर दिया, वर्षा बंद हो गई और पृथ्वी पर चारों ओर अकाल पड़ गया। यह देख सभी देवता बहुत दुखी हुयें, केवल यही उनकी चिंता का कारण नहीं था, बल्कि शक्तिहीन हो जाने की वजह से वह दैत्यों से भी पराजित हो गये, अब हर जगह दैत्यों का राज था और देवता परेशान थे, अपनी परेशानी का हल उन्हें मिल नहीं रहा था, सभी देवताओं ने देवी भगवती से इस कठिनाई का समाधान मांगा, हिमालय पर उन्हें माँ भगवती के साक्षात दर्शन हुये। डॉ0 विजय शंकर मिश्र:! अपने हालात से परेशान देवताओं ने माता भगवती से मदद मांगी, तब देवी ने उन्हें यह भरोसा दिया कि वे किसी भी प्रकार से सभी वेदों को दुर्गम से वापस लाएंगी और देवताओं को सौंपेगी, जिसके फलस्वरूप उन्हें उनकी शक्तियां वापस मिलेंगी, यह कहकर देवी दुर्गम को पराजित करने के लिए हिमालय से निकल पड़ीं। दुर्गम को पहले ही देवी के आने की खबर मिल गई थी, जिसके बाद उसने दैत्यों की एक विशाल सेना खड़ी कर ली, देवी के साथ देवताओं की सेना भी थी, लेकिन फिर भी दैत्यों की सेना को नष्ट करना कठिन था, वहां पहुंचकर देवताओं और दैत्यों में भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया, दोनों ओर से भीषण शक्तियों का प्रयोग होने लगा। लेकिन देवों के ऊपर दैत्यों की सेना भारी पड़ रही थी जिसका कारण था दुर्गम को ब्रह्माजी द्वारा मिला हुआ वरदान, इस वरदान के अनुसार देवता उसे किसी भी प्रकार से पराजित नहीं कर सकते थे, इसलिये उस पर हो रहे वार का कोई असर ही नहीं हो रहा था, तब माँ भगवती ने अपने अंश से आठ देवियों का निर्माण किया। यह आठ देवियां थी- कालिका, तारिणी, बगला, मातंगी, छिन्नमस्ता, तुलजा, कामाक्षी, और भैरवी, इन देवियों में माता भगवती की तरह ही अपार शक्तियां थीं, जिनसे वह दैत्यों से युद्ध करने की क्षमता रखती थीं, इन सभी देवियों को आज भी कलयुग में माना जाता है, लोग इनकी पूजा करते हैं तथा इन्हें प्रसन्न करने के लिये व्रत-उपवास भी रखते हैं। इसके बाद माता भगवती के साथ देवियों और दैत्यों के बीच भीषण युद्ध हुआ, धीरे-धीरे सभी दैत्य पराजित होने लगे, माता भगवती द्वारा प्रकट की गयीं देवियों के सामने दैत्यों की शक्तियां बेअसर होने लगीं, अंत में माता जगदम्बा के वार से दुर्गम का वध हो गया, इस तरह दुष्ट एवं पापी दैत्य दुर्गम के प्राण हर लिये गये। दुर्गम को पराजित करने की खुशी में सभी देवतायें आकाश से माता पर फूलों की वर्षा करने लगे, माता भगवती द्वारा दुर्गम को मार कर देवताओं को वेद दिए गये, जिसके बाद उनकी सभी शक्तियां लौट आयीं, इस घटना के बाद ही दुर्गम का वध करने के कारण भगवती का नाम दुर्गा पड़ गया। जय हो माँ भगवती!☘️☘️☘️ शुभ रात्रि विश्राम जी 💐💐 आपकी रात्रि शुभ मंगलमय हो 💐🤗 जय श्री कृष्णा 💐💐

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❤️❤️🔱🔱❤️❤️ 🌺ब्रह्म मुहूर्त में उठने की परंपरा क्यों ?🌺 रात्रि के अंतिम प्रहर को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। हमारे ऋषि मुनियों ने इस मुहूर्त का विशेष महत्व बताया है। उनके अनुसार यह समय निद्रा त्याग के लिए सर्वोत्तम है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने से सौंदर्य, बल, विद्या, बुद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। सूर्योदय से चार घड़ी (लगभग डेढ़ घण्टे) पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में ही जग जाना चाहिये। इस समय सोना शास्त्र निषिद्ध है। ब्रह्म का मतलब परम तत्व या परमात्मा। मुहूर्त यानी अनुकूल समय। रात्रि का अंतिम प्रहर अर्थात प्रात: 4 से 5.00 बजे का समय ब्रह्म मुहूर्त कहा गया है। “ब्रह्ममुहूर्ते या निद्रा सा पुण्यक्षयकारिणी”। (ब्रह्ममुहूर्त की निद्रा पुण्य का नाश करने वाली होती है।) सिख धर्म में इस समय के लिए बेहद सुन्दर नाम है--"अमृत वेला", जिसके द्वारा इस समय का महत्व स्वयं ही साबित हो जाता है। ईश्वर भक्ति के लिए यह महत्व स्वयं ही साबित हो जाता है। ईवर भक्ति के लिए यह सर्वश्रेष्ठ समय है। इस समय उठने से मनुष्य को सौंदर्य, लक्ष्मी, बुद्धि, स्वास्थ्य आदि की प्राप्ति होती है। उसका मन शांत और तन पवित्र होता है। ब्रह्म मुहूर्त में उठना हमारे जीवन के लिए बहुत लाभकारी है। इससे हमारा शरीर स्वस्थ होता है और दिनभर स्फूर्ति बनी रहती है। स्वस्थ रहने और सफल होने का यह ऐसा फार्मूला है जिसमें खर्च कुछ नहीं होता। केवल आलस्य छोड़ने की जरूरत है। 🌹पौराणिक महत्व 🌹 वाल्मीकि रामायण के मुताबिक माता सीता को ढूंढते हुए श्रीहनुमान ब्रह्ममुहूर्त में ही अशोक वाटिका पहुंचे। जहां उन्होंने वेद व यज्ञ के ज्ञाताओं के मंत्र उच्चारण की आवाज सुनी। 🌹शास्त्रों में भी इसका उल्लेख है 🌹 वर्णं कीर्तिं मतिं लक्ष्मीं स्वास्थ्यमायुश्च विदन्ति। ब्राह्मे मुहूर्ते संजाग्रच्छि वा पंकज यथा॥ अर्थात- ब्रह्म मुहूर्त में उठने से व्यक्ति को सुंदरता, लक्ष्मी, बुद्धि, स्वास्थ्य, आयु आदि की प्राप्ति होती है। ऐसा करने से शरीर कमल की तरह सुंदर हो जाता हे। 🌹ब्रह्म मुहूर्त और प्रकृति 🌹 ब्रह्म मुहूर्त और प्रकृति का गहरा नाता है। इस समय में पशु-पक्षी जाग जाते हैं। उनका मधुर कलरव शुरू हो जाता है। कमल का फूल भी खिल उठता है। मुर्गे बांग देने लगते हैं। एक तरह से प्रकृति भी ब्रह्म मुहूर्त में चैतन्य हो जाती है। यह प्रतीक है उठने, जागने का। प्रकृति हमें संदेश देती है ब्रह्म मुहूर्त में उठने के लिए। 🌹इसलिए मिलती है सफलता व समृद्धि आयुर्वेद के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त में उठकर टहलने से शरीर में संजीवनी शक्ति का संचार होता है। यही कारण है कि इस समय बहने वाली वायु को अमृततुल्य कहा गया है। इसके अलावा यह समय अध्ययन के लिए भी सर्वोत्तम बताया गया है क्योंकि रात को आराम करने के बाद सुबह जब हम उठते हैं तो शरीर तथा मस्तिष्क में भी स्फूर्ति व ताजगी बनी रहती है। प्रमुख मंदिरों के पट भी ब्रह्म मुहूर्त में खोल दिए जाते हैं तथा भगवान का श्रृंगार व पूजन भी ब्रह्म मुहूर्त में किए जाने का विधान है। 🌹ब्रह्ममुहूर्त के धार्मिक, पौराणिक व व्यावहारिक पहलुओं और लाभ को जानकर हर रोज इस शुभ घड़ी में जागना शुरू करें तो बेहतर नतीजे मिलेंगे। 🌹ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाला व्यक्ति सफल, सुखी और समृद्ध होता है, क्यों? क्योंकि जल्दी उठने से दिनभर के कार्यों और योजनाओं को बनाने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। इसलिए न केवल जीवन सफल होता है। शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने वाला हर व्यक्ति सुखी और समृद्ध हो सकता है। कारण वह जो काम करता है उसमें उसकी प्रगति होती है। विद्यार्थी परीक्षा में सफल रहता है। जॉब (नौकरी) करने वाले से बॉस खुश रहता है। बिजनेसमैन अच्छी कमाई कर सकता है। बीमार आदमी की आय तो प्रभावित होती ही है, उल्टे खर्च बढऩे लगता है। सफलता उसी के कदम चूमती है जो समय का सदुपयोग करे और स्वस्थ रहे। अत: स्वस्थ और सफल रहना है तो ब्रह्म मुहूर्त में उठें। 🌹वेदों में भी ब्रह्म मुहूर्त में उठने का महत्व और उससे होने वाले लाभ का उल्लेख किया गया है। 🌹प्रातारत्नं प्रातरिष्वा दधाति तं चिकित्वा प्रतिगृह्यनिधत्तो। तेन प्रजां वर्धयमान आयू रायस्पोषेण सचेत सुवीर:॥ - 🌹अर्थात- सुबह सूर्य उदय होने से पहले उठने वाले व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा रहता है। इसीलिए बुद्धिमान लोग इस समय को व्यर्थ नहीं गंवाते। सुबह जल्दी उठने वाला व्यक्ति स्वस्थ, सुखी, ताकतवाला और दीर्घायु होता है। 🌹अर्थात- व्यक्ति को सुबह सूर्योदय से पहले शौच व स्नान कर लेना चाहिए। इसके बाद भगवान की पूजा-अर्चना करना चाहिए। इस समय की शुद्ध व निर्मल हवा से स्वास्थ्य और संपत्ति की वृद्धि होती है। उद्यन्त्सूर्यं इव सुप्तानां द्विषतां वर्च आददे। अर्थात- सूरज उगने के बाद भी जो नहीं उठते या जागते उनका तेज खत्म हो जाता है। 🌹व्यावहारिक महत्व🌹 व्यावहारिक रूप से अच्छी सेहत, ताजगी और ऊर्जा पाने के लिए ब्रह्ममुहूर्त बेहतर समय है। क्योंकि रात की नींद के बाद पिछले दिन की शारीरिक और मानसिक थकान उतर जाने पर दिमाग शांत और स्थिर रहता है। वातावरण और हवा भी स्वच्छ होती है। ऐसे में देव उपासना, ध्यान, योग, पूजा तन, मन और बुद्धि को पुष्ट करते हैं। 🌹जैविक घड़ी पर आधारित शरीर की दिनचर्या 🌹 प्रातः 3 से 5 – इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से फेफड़ों में होती है। थोड़ा गुनगुना पानी पीकर खुली हवा में घूमना एवं प्राणायाम करना । इस समय दीर्घ श्वसन करने से फेफड़ों की कार्यक्षमता खूब विकसित होती है। उन्हें शुद्ध वायु (आक्सीजन) और ऋण आयन विपुल मात्रा में मिलने से शरीर स्वस्थ व स्फूर्तिमान होता है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाले लोग बुद्धिमान व उत्साही होते है, और सोते रहने वालों का जीवन निस्तेज हो जाता है । 🌹प्रातः 5 से 7 – इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से आंत में होती है। प्रातः जागरण से लेकर सुबह 7 बजे के बीच मल-त्याग एवं स्नान का लेना चाहिए । सुबह 7 के बाद जो मल-त्याग करते है उनकी आँतें मल में से त्याज्य द्रवांश का शोषण कर मल को सुखा देती हैं। इससे कब्ज तथा कई अन्य रोग उत्पन्न होते हैं। 🌹प्रातः 7 से 9 – इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से आमाशय में होती है। यह समय भोजन के लिए उपर्युक्त है । इस समय पाचक रस अधिक बनते हैं। भोजन के बीच-बीच में गुनगुना पानी (अनुकूलता अनुसार) घूँट-घूँट पिये। 🌹प्रातः 11 से 1 – इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से हृदय में होती है। 🌹दोपहर 12 बजे के आस–पास मध्याह्न – संध्या (आराम) करने की हमारी संस्कृति में विधान है। इसी लिए तोभोजन वर्जित है । इस समय तरल पदार्थ ले सकते है। जैसे मट्ठा पी सकते है। दही खा सकते है । 🌹दोपहर 1 से 3 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से छोटी आंत में होती है। इसका कार्य आहार से मिले पोषक तत्त्वों का अवशोषण व व्यर्थ पदार्थों को बड़ी आँत की ओर धकेलना है। भोजन के बाद प्यास अनुरूप पानी पीना चाहिए । इस समय भोजन करने अथवा सोने से पोषक आहार-रस के शोषण में अवरोध उत्पन्न होता है व शरीर रोगी तथा दुर्बल हो जाता है । 🌹दोपहर 3 से 5 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से मूत्राशय में होती है । 2-4 घंटे पहले पिये पानी से इस समय मूत्र-त्याग की प्रवृति होती है। 🌹शाम 5 से 7 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से गुर्दे में होती है । इस समय हल्का भोजन कर लेना चाहिए । शाम को सूर्यास्त से 40 मिनट पहले भोजन कर लेना उत्तम रहेगा। सूर्यास्त के 10 मिनट पहले से 10 मिनट बाद तक (संध्याकाल) भोजन न करे। शाम को भोजन के तीन घंटे बाद दूध पी सकते है । देर रात को किया गया भोजन सुस्ती लाता है यह अनुभवगम्य है। 🌹रात्री 7 से 9 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से मस्तिष्क में होती है । इस समय मस्तिष्क विशेष रूप से सक्रिय रहता है । अतः प्रातःकाल के अलावा इस काल में पढ़ा हुआ पाठ जल्दी याद रह जाता है । आधुनिक अन्वेषण से भी इसकी पुष्टी हुई है। 🌹रात्री 9 से 11 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से रीढ़ की हड्डी में स्थित मेरुरज्जु में होती है। इस समय पीठ के बल या बायीं करवट लेकर विश्राम करने से मेरूरज्जु को प्राप्त शक्ति को ग्रहण करने में मदद मिलती है। इस समय की नींद सर्वाधिक विश्रांति प्रदान करती है । इस समय का जागरण शरीर व बुद्धि को थका देता है । यदि इस समय भोजन किया जाय तो वह सुबह तक जठर में पड़ा रहता है, पचता नहीं और उसके सड़ने से हानिकारक द्रव्य पैदा होते हैं जो अम्ल (एसिड) के साथ आँतों में जाने से रोग उत्पन्न करते हैं। इसलिए इस समय भोजन करना खतरनाक है। 🌹रात्री 11 से 1 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से पित्ताशय में होती है । इस समय का जागरण पित्त-विकार, अनिद्रा , नेत्ररोग उत्पन्न करता है व बुढ़ापा जल्दी लाता है । इस समय नई कोशिकाएं बनती है । 🌹रात्री 1 से 3 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से लीवर में होती है । अन्न का सूक्ष्म पाचन करना यह यकृत का कार्य है। इस समय का जागरण यकृत (लीवर) व पाचन-तंत्र को बिगाड़ देता है । इस समय यदि जागते रहे तो शरीर नींद के वशीभूत होने लगता है, दृष्टि मंद होती है और शरीर की प्रतिक्रियाएं मंद होती हैं। अतः इस समय सड़क दुर्घटनाएँ अधिक होती हैं। 🌹नोट :-ऋषियों व आयुर्वेदाचार्यों ने बिना भूख लगे भोजन करना वर्जित बताया है। अतः प्रातः एवं शाम के भोजन की मात्रा ऐसी रखे, जिससे ऊपर बताए भोजन के समय में खुलकर भूख लगे। जमीन पर कुछ बिछाकर सुखासन में बैठकर ही भोजन करें। इस आसन में मूलाधार चक्र सक्रिय होने से जठराग्नि प्रदीप्त रहती है। कुर्सी पर बैठकर भोजन करने में पाचनशक्ति कमजोर तथा खड़े होकर भोजन करने से तो बिल्कुल नहींवत् हो जाती है। इसलिए ʹबुफे डिनरʹ से बचना चाहिए। 🌹पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का लाभ लेने हेतु सिर पूर्व या दक्षिण दिशा में करके ही सोयें, अन्यथा अनिद्रा जैसी तकलीफें होती हैं। 🌹शरीर की जैविक घड़ी को ठीक ढंग से चलाने हेतु रात्रि को बत्ती बंद करके सोयें। इस संदर्भ में हुए शोध चौंकाने वाले हैं। देर रात तक कार्य या अध्ययन करने से और बत्ती चालू रख के सोने से जैविक घड़ी निष्क्रिय होकर भयंकर स्वास्थ्य-संबंधी हानियाँ होती हैं। अँधेरे में सोने से यह जैविक घड़ी ठीक ढंग से चलती है। आजकल पाये जाने वाले अधिकांश रोगों का कारण अस्त-व्यस्त दिनचर्या व विपरीत आहार ही है। हम अपनी दिनचर्या शरीर की जैविक घड़ के अनुरूप बनाये रखें तो शरीर के विभिन्न अंगों की सक्रियता का हमें अनायास ही लाभ मिलेगा।! शुभ प्रभात वंदन जी 🌹💕 आपका दिन शुभ मंगलमय हो 💐 जय हो मां शेरावाली 🌹💕💕💕

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🌹 *श्री राधे राधे जी* 👏 . "गणेश लक्ष्मी" एक बार एक साधु को राजसी सुख भोगने की इच्छा हुई। अपनी इच्छा की पूर्ति हेतु उसने लक्ष्मी की कठोर तपस्या की। कठोर तपस्या के फलस्वरूप लक्ष्मी ने उस साधु को राज सुख भोगने का वरदान दे दिया। वरदान प्राप्त कर साधु राजा के दरबार में पहुँचा और राजा के पास जाकर राजा का राज मुकुट नीचे गिरा दिया। यह देख राजा क्रोध से कांपने लगा। किन्तु उसी क्षण उस राजमुकुट से एक सर्प निकल कर बाहर चला गया। यह देखकर राजा का क्रोध समाप्त हो गया और प्रसन्नता से उसने साधु को अपना मंत्री बनाने का प्रस्ताव रखा। साधु ने राजा का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और वह मंत्री बना दिया गया। कुछ दिन बाद उस साधु ने राजमहल में जाकर सबको बाहर निकल जान का आदेश दिया। चूंकि सभी लोग उस साधु के के चमत्कार को देख चुके थे, अत: उसके कहने पर सभी लोग राजमहल से बाहर आ गए तो राजमहल स्वत: गिरकर ध्वस्त हो गया। इस घटना के बाद तो सम्पूर्ण राज्य व्यवस्था का कार्य उस साधु द्वारा होने लगा। अपने बढ़ते प्रभाव को देखकर साधु को अभिमान हो गया और वह अपने को सर्वेसर्वा समझने लगा। अपने अभिमानवश एक दिन साधु ने राजमहल के सामने स्थित गणेश की मूर्ति को वहाँ से हटवा दिया, क्योंकि उसकी दृष्टि में यह मूर्ति राजमहल के सौदर्य को बिगाड़ रही थी। अभिमानवश एक दिन साधु ने राजा से कहा कि उसके कुर्ते में सांप है अत: वह कुर्ता उतार दें। राजा ने पूर्व घटनाओं के आधार पर भरे दरबार में अपना कुर्ता उतार दिया किन्तु उसमें से सांप नहीं निकला। फलस्वरूप राजा बहुत नाराज हुआ और उसने साधु को मंत्री पद से हटाकर जेल में डाल दिया। इस घटना से साधु बहुत दु:खी हुआ और उसने पुन: लक्ष्मी की तपस्या की। लक्ष्मी ने साधु को स्वप्न में बताया कि उसने गणेश की मूर्ति को हटाकर गणेश को नाराज कर दिया है। इसलिए उस पर यह विपत्ति आई है क्योंकि गणेश के नाराज होने से उसकी बुद्धि नष्ट हो गई तथा धन या लक्ष्मी के लिए बुद्धि आवश्यक है, अत: जब तुम्हारे पास बुद्धि नहीं रही तो लक्ष्मीजी भी चली गई। जब साधु ने स्वप्न में यह बात जानी तो उसे अपने किए पर बहुत पश्चाताप हुआ। साधु को अपनी गलती का अहसास हो गया और उसने पश्चाताप किया तो अगले ही दिन राजा ने भी स्वत: जेल में जाकर साधु से अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी और उसे जेल से मुक्त कर पुन: मंत्री बना दिया। मंत्री बनने पर साधु ने पुन: गणेश की मूर्ति को पूर्ववत स्थापित करवाया, साथ ही साथ लक्ष्मी की भी मूर्ति स्थापित की और सर्व साधारण को यह बताया कि सुखपूर्वक रहने के लिए ज्ञान एवं समृद्धि दोनों जरूरी हैं। इसलिए लक्ष्मी एवं गणेश दोनों का पूजन एक साथ करना चाहिए। तभी से लक्ष्मी के साथ गणेश पूजन की परम्परा आरम्भ हो गई। ० ० ० "जय जय श्री राधे" ************************* *बोलो श्री बाँके बिहारी लाल की जय👏* शुभ प्रभात वंदन जी 🌹💕 आपका दिन शुभ मंगलमय हो 💐💐💐 जय हो मां शेरावाली 🌹💕💕💕 शुभ शुक्ररवार 🥀🥀🥀 जय श्री कृष्णा 💐🌹

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*एक बार अर्जुन ने कृष्ण से पूछा-* *माधव.. ये 'सफल जीवन' क्या होता है ?* *कृष्ण अर्जुन को पतंग उड़ाने ले गए।* *अर्जुन कृष्ण को ध्यान से पतंग उड़ाते देख रहा था.* *थोड़ी देर बाद अर्जुन बोला-* *माधव.. ये धागे की वजह से पतंग अपनी आजादी से और ऊपर की ओर नहीं जा पा रही है, क्या हम इसे तोड़ दें ? ये और ऊपर चली जाएगी|* *कृष्ण ने धागा तोड़ दिया ..* *पतंग थोड़ा सा और ऊपर गई और उसके बाद लहरा कर नीचे आयी और दूर अनजान जगह पर जा कर गिर गई...* *तब कृष्ण ने अर्जुन को जीवन का दर्शन समझाया...* *पार्थ.. 'जिंदगी में हम जिस ऊंचाई पर हैं..* *हमें अक्सर लगता की कुछ चीजें, जिनसे हम बंधे हैं वे हमें और ऊपर जाने से रोक रही हैं; जैसे :* *-घर-* *-परिवार-* *-अनुशासन-* *-माता-पिता-* *-गुरू-और-* *-समाज-* *और हम उनसे आजाद होना चाहते हैं...* *वास्तव में यही वो धागे होते हैं - जो हमें उस ऊंचाई पर बना के रखते हैं..* *इन धागों के बिना हम एक बार तो ऊपर जायेंगे परन्तु बाद में हमारा वो ही हश्र होगा, जो बिन धागे की पतंग का हुआ...'* *अतः जीवन में यदि तुम ऊंचाइयों पर बने रहना चाहते हो तो, कभी भी इन धागों से रिश्ता मत तोड़ना.."* *धागे और पतंग जैसे जुड़ाव* *के सफल संतुलन से मिली हुई ऊंचाई को ही 'सफल जीवन कहते हैं..!!*" Good afternoon everyone 🥀💐 Always be happy 😊😊😊 Keep smiling🥀🥀🥀 Jay Shree Krishna 🙏🙏 Jay Mata Di 🙏☘️☘️🌿🌿🌿🏵️🌺🌺🌸

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