भगवान शिवजी का प्रिय पौधा “भांग” के चमत्कारिक औषधीय गुण एवं आयुर्वेदिक उपाय!! 🍃🌿🍃 भांग को सामान्यत एक नशीला पौधा माना जाता है, जिसे लोग मस्ती के लिए उपयोग में लाते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि शिवजी को प्रिय भांग का पौधा औषधीय गुणों से भरा पड़ा है। भांग के मादा पौधों में स्थित मंजरियों से निकले राल से गांजा प्राप्त किया जाता है। भांग के पौधों में केनाबिनोल नामक रसायन पाया जाता है। भांग कफशामक एवं पित्तकोपक होता है।. शिवरात्री का दिन हो या रंगो का त्योहार होली हो भांग का रंग तो जमेगा ही। भांग पीकर रंग खेलने का मजा ही अलग है। भांग पीकर होश खोने की बात तो सब जानते हैं लेकिन क्या आप जानते हैं कि भांग पीने के कुछ फायदे भी हैं। भांग, चरस या गांजे की लत शरीर को नुकसान पहुंचाती है। लेकिन इसकी सही डोज कई बीमारियों से बचा सकती है। इसकी पुष्टि विज्ञान भी कर चुका है। पर हमारे देश में कुछ महामूर्ख एवं नशेड़ी किस्म के लोगों ने अपनी गलती करने, नाश करने या गलत आदत को छुपाने के लिए इस पौधे को भगवान् शिव शंकर से नशे के लिए जोड़ दिया। (जैसे आपने अक्सर लोगों को कहते हुए सुना होगा कि यह तो भोले शंकर का प्रसाद है लेने में कोई हर्ज़ नहीं )। पर हम बताते हैं आपको कि ये पौधा भगवान शंकर को इसलिए प्रिय था क्योंकि इस पौधे के अंदर अनगिनत चमत्कारिक औषधीय गुण उपस्थित हैं। जिससे कई बीमारियों का इलाज किया जा सकता है। इसके औषधीय गुण 1.) कान का दर्द:- भांग के 8 -10 बून्द रस को कान में डालने से कीड़े मरते हैं और कान की पीड़ा दूर हो जाती है ! 2.) चक्कर आने से बचाव:- 2013 में वर्जीनिया की कॉमनवेल्थ यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों ने यह साबित किया कि गांजे में मिलने वाले तत्व एपिलेप्सी अटैक को टाल सकते हैं। यह शोध साइंस पत्रिका में भी छपा। रिपोर्ट के मुताबिक कैनाबिनॉएड्स कंपाउंड इंसान को शांति का अहसास देने वाले मस्तिष्क के हिस्से की कोशिकाओं को जोड़ते हैं। 3.) ग्लूकोमा में राहत:- अमेरिका के नेशनल आई इंस्टीट्यूट के मुताबिक भांग ग्लूकोमा के लक्षण खत्म करती है। इस बीमारी में आंख का तारा बड़ा हो जाता है और दृष्टि से जुड़ी तंत्रिकाओं को दबाने लगता है। इससे नजर की समस्या आती है। गांजा ऑप्टिक नर्व से दबाव हटाता है। 4.) अल्जाइमर से बचाव:- अल्जाइमर से जुड़ी पत्रिका में छपे शोध के मुताबिक भांग के पौधे में मिलने वाले टेट्राहाइड्रोकैनाबिनॉल की छोटी खुराक एमिलॉयड के विकास को धीमा करती है। एमिलॉयड मस्तिष्क की कोशिकाओं को मारता है और अल्जाइमर के लिए जिम्मेदार होता है। रिसर्च के दौरान भांग का तेल इस्तेमाल किया गया। 5.) कैंसर पर असर:- 2015 में आखिरकार अमेरिकी सरकार ने माना कि भांग कैंसर से लड़ने में सक्षम है. यह ट्यूमर के विकास के लिए जरूरी रक्त कोशिकाओं को रोक देते हैं. कैनाबिनॉएड्स से कोलन कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर और लिवर कैंसर का सफल इलाज होता है. 6.) कीमोथैरेपी में कारगर:- कई शोधों में यह साफ हो चुका है कि भांग के सही इस्तेमाल से कीमथोरैपी के साइड इफेक्ट्स जैसे, नाक बहना, उल्टी और भूख न लगना दूर होते हैं. अमेरिका में दवाओं को मंजूरी देने वाली एजेंसी एफडीए ने कई साल पहले ही कीमोथैरेपी ले रहे कैंसर के मरीजों को कैनाबिनॉएड्स वाली दवाएं देने की मंजूरी दे दी है. 7.) दर्द निवारक:- शुगर से पीड़ित ज्यादातर लोगों के हाथ या पैरों की तंत्रिकाएं नुकसान झेलती हैं. इससे बदन के कुछ हिस्से में जलन का अनुभव होता है. कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी की रिसर्च में पता चला कि इससे नर्व डैमेज होने से उठने वाले दर्द में भांग आराम देती है. 8.) हैपेटाइटिस सी के साइड इफेक्ट से आराम:- थकान, नाक बहना, मांसपेशियों में दर्द, भूख न लगना और अवसाद, ये हैपेटाइटिस सी के इलाज में सामने आने वाले साइड इफेक्ट हैं. यूरोपियन जरनल ऑफ गैस्ट्रोलॉजी एंड हेपाटोलॉजी के मुताबिक भांग की मदद से 86 फीसदी मरीज हैपेटाइटिस सी का इलाज पूरा करवा सके. माना गया कि भांग ने साइड इफेक्ट्स को कम किया. 9.) खांसी और दमे में कारगर है भांग 10.) मांसपेशियों के दर्द:- डायटीशियन और स्पोर्ट्स न्यूट्रीशनिस्ट का कहना है कि अल्कोहल का कोई गुण नहीं होता है लेकिन सीमित मात्रा में भांग पीने के कुछ फायदे भी है। भांग (cannabis) में इन्फ्लैमटोरी गुण होता है जो मांसपेशियों के दर्द को कम करने में असरदार रूप से काम करता है। 🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🌿🍃🌿🌿🍃

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हिन्दू परम्परा मृत्यु बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि जब भी किसी मंदिर में दर्शन के लिए जाएं तो दर्शन करने के बाद बाहर आकर मंदिर की पेडी या ऑटले पर थोड़ी देर बैठते हैं । क्या आप जानते हैं इस परंपरा का क्या कारण है? आजकल तो लोग मंदिर की पैड़ी पर बैठकर अपने घर की व्यापार की राजनीति की चर्चा करते हैं परंतु यह प्राचीन परंपरा एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई । वास्तव में मंदिर की पैड़ी पर बैठ कर के हमें एक श्लोक बोलना चाहिए। यह श्लोक आजकल के लोग भूल गए हैं । आप इस लोक को सुनें और आने वाली पीढ़ी को भी इसे बताएं । यह श्लोक इस प्रकार है - अनायासेन मरणम् ,बिना देन्येन जीवनम्। देहान्त तव सानिध्यम्, देहि मे परमेश्वरम् ।। इस श्लोक का अर्थ है अनायासेन मरणम् अर्थात बिना तकलीफ के हमारी मृत्यु हो और हम कभी भी बीमार होकर बिस्तर पर पड़े पड़े ,कष्ट उठाकर मृत्यु को प्राप्त ना हो चलते फिरते ही हमारे प्राण निकल जाएं । बिना देन्येन जीवनम् अर्थात परवशता का जीवन ना हो मतलब हमें कभी किसी के सहारे ना पड़े रहना पड़े। जैसे कि लकवा हो जाने पर व्यक्ति दूसरे पर आश्रित हो जाता है वैसे परवश या बेबस ना हो । ठाकुर जी की कृपा से बिना भीख के ही जीवन बसर हो सके । देहांते तव सानिध्यम अर्थात जब भी मृत्यु हो तब भगवान के सम्मुख हो। जैसे भीष्म पितामह की मृत्यु के समय स्वयं ठाकुर जी उनके सम्मुख जाकर खड़े हो गए। उनके दर्शन करते हुए प्राण निकले । देहि में परमेशवरम् हे परमेश्वर ऐसा वरदान हमें देना । यह प्रार्थना करें गाड़ी ,लाडी ,लड़का ,लड़की, पति, पत्नी ,घर धन यह नहीं मांगना है यह तो भगवान आप की पात्रता के हिसाब से खुद आपको देते हैं । इसीलिए दर्शन करने के बाद बैठकर यह प्रार्थना अवश्य करनी चाहिए । यह प्रार्थना है, याचना नहीं है । याचना सांसारिक पदार्थों के लिए होती है जैसे कि घर, व्यापार, नौकरी ,पुत्र ,पुत्री ,सांसारिक सुख, धन या अन्य बातों के लिए जो मांग की जाती है वह याचना है वह भीख है। हम प्रार्थना करते हैं प्रार्थना का विशेष अर्थ होता है अर्थात विशिष्ट, श्रेष्ठ । अर्थना अर्थात निवेदन। ठाकुर जी से प्रार्थना करें और प्रार्थना क्या करना है ,यह श्लोक बोलना है। जब हम मंदिर में दर्शन करने जाते हैं तो खुली आंखों से भगवान को देखना चाहिए, निहारना चाहिए । उनके दर्शन करना चाहिए। कुछ लोग वहां आंखें बंद करके खड़े रहते हैं । आंखें बंद क्यों करना हम तो दर्शन करने आए हैं । भगवान के स्वरूप का, श्री चरणों का ,मुखारविंद का, श्रंगार का, संपूर्णानंद लें । आंखों में भर ले स्वरूप को । दर्शन करें और दर्शन के बाद जब बाहर आकर बैठे तब नेत्र बंद करके जो दर्शन किए हैं उस स्वरूप का ध्यान करें । मंदिर में नेत्र नहीं बंद करना । बाहर आने के बाद पैड़ी पर बैठकर जब ठाकुर जी का ध्यान करें तब नेत्र बंद करें और अगर ठाकुर जी का स्वरूप ध्यान में नहीं आए तो दोबारा मंदिर में जाएं और भगवान का दर्शन करें । नेत्रों को बंद करने के पश्चात उपरोक्त श्लोक का पाठ करें।

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गोमती चक्र जीवन मे गोमती चक्र मानसिक शांति ,रोग और भय से मुक्ति , दरिद्रता से मुक्ति ,कोर्ट कचेरी ,भुत-प्रेत बाधा ,शत्रुपीड़ा ,संतान प्राप्ति, धन संचय, संमोहन ,वशीकरण ,स्थंभन , उच्चाटन, व्यापर वृद्धि, अचल स्थिरलक्ष्मी ,शत्रु भय –पीड़ा ,देह व्याधि ,दुस्वप्न में इसका प्रयोग अत्यंत प्रभावी देखा गया हे | 1. यदि आपके परिवार में खर्च अधिक होता है, शुक्रवार को २१ अभिमन्त्रित गोमती चक्र लेकर पीले या लाल वस्त्र पर स्थान देकर धूप-दीप से पूजा करें । अगले दिन उनमें से चार गोमती चक्र उठाकर घर के चारों कोनों में एक-एक गाड़ दें । ११ चक्रों को लाल वस्त्र में बांधकर धन रखने के स्थान पर रख दें और शेष किसी मन्दिर में अपनी समस्या निवेदन के साथ प्रभु को अर्पित कर दें । 2. सात गोमती चक्रों को चांदी डिब्बी में सिंदूर तथा चावल डालकर तिजोरी मे रखें तो तिजोरी कभी खाली नही होगी । 3. व्यापर स्थान पर ग्यारह सिद्ध गोमती चक्र और एक ९ मुखी रुद्राक्ष लाल कपड़े में बांध कर धन रखने वाले स्थान पर रख दे तो व्यापर में बढ़ोतरी होती जाएगी। 4. यदि किसी व्यक्ति को दिया हुआ धन वापस नही मिल रहा हो, तो शनिवार को उस व्यक्ति के नाम अक्षरों के बराबर गोमती चक्र लेकर मन ही मन धन की पुनः प्राप्ति की कामना करते हुए गोमतीचक्र को एक हाथ गहरी भूमि खोदकर एकांत स्थान में गाड़ दें। इस प्रयोग से धन वापस मिल जाता है 5. यदि बीमार ठीक नहीं हो पा रहा हो अथवा दवाइयाँ नही लग रही हों, तो उसके सिरहाने पाँच गोमती चक्र उपरोक्त मंत्र से अभिमंत्रित करके रखें। ऐसा करने से रोगी को शीघ्र ही स्वास्थ्य लाभ होगा। 6. अगर कोई व्यक्ति होली/शनिवार के दिन 7 गोमती चक्र को सवा मीटर लाल कपड़े में बांधकर अपने पूरे परिवार के ऊपर से ऊतारकर किसी बहते जल में प्रवाहित कर दे तो यह परिवार की तांत्रिक रक्षा कवच का कार्य करेगा। 7 . पेट संबंधी रोग होने पर 10 गोमती चक्र लेकर रात को पानी में डाल दें तथा सुबह उस पानी को पी लें। इससे पेट संबंध के विभिन्न रोग दूर हो जाते हैं। 8. अगर संतान कि प्राप्ति में किसी तरह की कोई बाधा आ रही हो तो यह प्रयोग अवश्य ही करे पाँच सिद्ध गोमती चक्र लेकर किसी नदी या तालाब में पाँच बार यह मन्त्र बोल कर विसर्जित कर दे तो संतान की बाधा समाप्त हो जाएगी मन्त्र इस प्रकार है ओम गर्भरकक्षांम्बिकाय़ै च विद्महे, मंगल देवतायै च धीमहि, तन्नौ देवी प्रचोतयात्। 9. ग्यारह गोमती चक्र लेकर लाल सिंदूर की डिब्बी में भरकर अपने घर में रखने से दाम्पत्य प्रेम बढ़ता है। और गृह क्लेश नाश होता है। 10. अगर नोकरी न मिल रही हो या नोकरी में कोई तरकी नही हो रही है तो उसे सिद्ध किया हुआ एक गोमती चक्र रोजाना शिव लिंग पर चढ़ाना चाहिए ऐसा इक्कीस दिन लगातार करने पर नोकरी में बन रही कोई भी अड़चन समाप्त हो जाएगी। 11 . अगर किसी बच्चे को नजर जल्दी लगती हो तो उसे गोमती चक्र चांदी में जड़वा कर पहना दे नजर दोष से मुक्ति मिलेगी व वो सवस्थ भी रहेगा । गोमती चक्र सिद्ध करने की विधि : किसी भी होली, दीवाली, नवरात्र तथा ग्रहण या अमावस्या के दिन चक्रेश्वरी मन्त्र के 1100 जप करके गोमती चक्र सिद्ध हो जाते है। ॐ ह्रीं श्रीं चक्रेश्वरी, चक्रवारुणी, चक्रधारिणी, चक्रवे गेन मम उपद्रवं हन-हन शांति कुरु-कुरु स्वाहा। धन लाभ के लिऐ 11 गोमती चक्र गोमती चक्र कम कीमत वाला एक ऐसा पत्थर है जो गोमती नदी मे मिलता है। विभिन्न तांत्रिक कार्यो तथा असाध्य रोगों में इसका प्रयोग होता है। असाध्य रोगों को दुर करने तथा मानसिक शान्ति प्राप्त करने के लिये लगभग 10 गोमती चक्र लेकर रात को पानी में डाल देना चाहिऐ। सुबह उस पानी को पी जाना चाहिऐ । इससे पेट संबंध के विभिन्न रोग दुर होते है। धन लाभ के लिऐ 11 गोमती चक्र अपने पुजा स्थान मे रखना चाहिऐ उनके सामने ॐ श्री नमः का जाप करना चाहिऐ। इससे आप जो भी कार्य करेंगे उसमे आपका मन लगेगा और सफलता प्राप्त होगी । किसी भी कार्य को उत्साह के साथ करने की प्रेरणा मिलेगी। गोमती चक्रों को यदि चांदी अथवा किसी अन्य धातु की डिब्बी में सिंदुर तथा अक्षत डालकर रखें तो ये शीघ्र फलदायक होते है। होली, दीवाली, तथा नवरात्रों आदि पर गोमती चक्रों की विशेष पुजा की जाति है। अन्य विभिन्न मुहुर्तों के अवसर पर भी इनकी पुजा लाभदायक मानी जाती है। सर्वसिद्धि योग तथा रावेपुष्य योग आदि के समय पुजा करने पर ये बहुत फलदायक है। गोमती चक्र की पूजा होली, दिवाली और नव रात्रों आदिपर गोमती चक्र की विशेष पूजा होती है। सर्वसिद्धि योग, अमृत योग और रविपुष्य योग आदि विभिन्न मुहूर्तों पर गोमती चक्र की पूजा बहुत फलदायक होती है। धन लाभ के लिए ११ गोमती चक्र अपने पूजा स्थान में रखें तथा उनके सामने ॐ श्रींनमः का जाप करें। ऊपरी बाधाओं से मुक्ति दिलाए गोमती चक्र---- गोमती चक्र कम कीमत वाला एक ऐसा पत्थर है जो गोमती नदी में मिलता है। विभिन्न तांत्रिक कार्यों तथा असाध्य रोगों में इसका प्रयोग होता है। इसका तांत्रिक उपयोग बहुत ही सरल होता है। किसी भी प्रकार की समस्या के निदान के लिए यह बहुत ही कारगर उपाय है। 1- यदि घर में भूत-प्रेतों का उपद्रव हो तो दो गोमती चक्र लेकर घर के मुखिया के ऊपर घुमाकर आग में डाल दें तो घर से भूत-प्रेत का उपद्रव समाप्त हो जाता है। 2- यदि घर में बीमारी हो या किसी का रोग शांत नहीं हो रहा हो तो एक गोमती चक्र लेकर उसे चांदी में पिरोकर रोगी के पलंग के पाये पर बांध दें। उसी दिन से रोगी को आराम मिलने लगता है। 3- प्रमोशन नहीं हो रहा हो तो एक गोमती चक्र लेकर शिव मंदिर में शिवलिंग पर चढ़ा दें और सच्चे ह्रदय से प्रार्थना करें। निश्चय ही प्रमोशन के रास्ते खुल जाएंगे। 4- व्यापार वृद्धि के लिए दो गोमती चक्र लेकर उसे बांधकर ऊपर चौखट पर लटका दें और ग्राहक उसके नीचे से निकले तो निश्चय ही व्यापार में वृद्धि होती है। 5- यदि इस गोमती चक्र को लाल सिंदूर के डिब्बी में घर में रखें तो घर में सुख-शांति बनी रहती है। शुक्ल पक्ष के बुधवार को ४ गोमती चक्र अपने सिर से घुमाकर चारों दिशाओं में फेंक दें तो व्यक्ति पर किए गए तांत्रिक अभिकर्म का प्रभाव खत्म हो जाता है।

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शरत्पूर्णिमा (कृत्यनिर्णयामृत) – इसमें प्रदोष और निशीथ दोनोंमें होनेवाली पूर्णिमा ली जाती है। यदि पहले दिन निशीथव्यापिनी हो और दूसरे दिन प्रदोषव्यापिनी न हो तो पहले दिन व्रत करना चाहिये । 💫१ - इस दिन काँसीके पात्रमें घी भरकर सुवर्णसहित ब्राह्मणको दे तो ओजस्वी होता है, 💫२ – अपराह्नमें हाथियोंका नीराजन करे तो उत्तम फल मिलता है और 💫३ - अन्य प्रकारके अनुष्ठान करे तो उनकी सफल सिद्धि होती है। इसके अतिरिक्त आश्विन शुक्ल निशीथव्यापिनी पूर्णिमाको प्रभातके समय आराध्यदेवको सुश्वेत वस्त्राभूषणादिसे सुशोभित करके षोडशोपचार पूजन करे और रात्रिके समय उत्तम गोदुग्धकी खीरमें घी और सफेद खाँड मिलाकर अर्द्धरात्रिके समय भगवान्‌के अर्पण करे। साथ पूर्ण चन्द्रमाके मध्याकाशमें स्थित होनेपर उनका पूजन करे और पूर्वोक्त प्रकारकी खीरका नैवेद्य अर्पण करके दूसरे दिन उसका भोजन करे। कोजागरव्रत (कृत्यनिर्णयादि) – आश्विन शुक्ल निशीथ व्यापिनी पूर्णिमाको ऐरावतपर आरूढ हुए इन्द्र और महालक्ष्मीका पूजन करके उपवास करे और रात्रिके समय घृतपूरित और गन्ध-पुष्पादिसे सुपूजित एक लाख, पचास हजार, दस हजार, एक हजार या केवल एक सौ दीपक प्रज्वलित करके देवमन्दिरों, बाग-बगीचों, तुलसी-अश्वत्थके वृक्षों, बस्तीके रास्ते, चौराहे, गली और वास-भवनोंकी छत आदिपर रखे और प्रातःकाल होनेपर स्नानादि करके इन्द्रका पूजनकर ब्राह्मणोंको घी-शक्कर मिली हुई खीरका भोजन कराकर वस्त्रादिकी दक्षिणा और स्वर्णादिके दीपक दे तो अनन्त फल होता है। इस दिन रात्रिके समय इन्द्र और लक्ष्मी पूछते हैं कि ‘कौन जागता है?' इसके उत्तरमें उनका पूजन और दीपज्योतिका प्रकाश देखनेमें आये तो अवश्य ही लक्ष्मी और प्रभुत्व प्राप्त होता है। 🌕🌙शरद पूर्णिमा🌙🌕 ऋषि पाराशर के अनुसार नवग्रह से #परमात्मांश निकल कर विष्णु के अवतार हुए जिसमें "चन्द्रस्य यदुनायक:" अर्थात #चंद्र से #कृष्ण अवतार हुए। कृष्ण का अवतरण हुआ रोहिणी नक्षत्र, वृष लग्न में जो चंद्र की उच्च राशि है और रोहिणी चंद्र का सबसे प्रिय नक्षत्र है। वृष राशि कालपुरुष कुंडली में द्वितीय भाव में आती है जो धन का भाव कहलाता है। धन की देवी लक्ष्मी को माना जाता है जो शरद पूर्णिमा को संसार में विचरती हैं और मनुष्य को धन देती हैं अस्यां रात्रौ महालक्ष्मीर्वराभयकरांबुजा ।। निशीथे चरते लोके को जागर्तिं धरातले ।। तस्मै वित्तं प्रयच्छामि जाग्रते पूजकाय मे ।। यहां चंद्रमा की किरणें ही माँ लक्ष्मी का स्वरूप है जो चावल, घी, केसर और शक्कर से तैयार चंद्र-शुक्र-बृहस्पति-मंगल स्वरूप खीर में अपना वास करती हैं। शरद पूर्णिमा रेवती नक्षत्र में है जिसका सहज शाब्दिक अर्थ ही है धनी तथा वह जो समृद्धि, सफलता, सौभाग्य, धन, और बहुतायत में हो। कृष्ण का जन्म चंद्र वंश में हुआ। चंद्र की सोलह कलाएं हैं और कृष्ण भी सोलह कलाओं से पूर्ण हैं। चन्द्रमा शरद पूर्णिमा को सोलह कलाओं से पूर्ण होता है जब श्रीकृष्ण ने वंशीवट में महारास रचाया। कृष्ण जिस मोरपंख का प्रयोग करते हैं उसमें चन्दूला (जिसमें अग्रभाग में चन्द्रमा जैसी गोल आकृति होती है) सर्वप्रमुख है। कृष्ण, चंद्र और लक्ष्मी का अद्भुत संगम है शरद पूर्णिमा 🌷 शरद पूनम की रात दिलाये आत्मशांति, स्वास्थ्यलाभ 🌷 ➡ 19 अक्टूबर 2021 मंगलवार को शरद पूर्णिमा (खीर चन्द्रकिरणों में रखें) 20 अक्टूबर, बुधवार को शरद पूर्णिमा (व्रत हेतु) 🌙 आश्विन पूर्णिमा को ‘शरद पूर्णिमा’ बोलते हैं । इस दिन रास-उत्सव और कोजागर व्रत किया जाता है । गोपियों को शरद पूर्णिमा की रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण ने बंसी बजाकर अपने पास बुलाया और ईश्वरीय अमृत का पान कराया था । अतः शरद पूर्णिमा की रात्रि का विशेष महत्त्व है । इस रात को चन्द्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ पृथ्वी पर शीतलता, पोषक शक्ति एवं शांतिरूपी अमृतवर्षा करता है । 👉🏻 शरद पूनम की रात को क्या करें, क्या न करें ? 🌙 दशहरे से शरद पूनम तक चन्द्रमा की चाँदनी में विशेष हितकारी रस, हितकारी किरणें होती हैं । इन दिनों चन्द्रमा की चाँदनी का लाभ उठाना, जिससे वर्षभर आप स्वस्थ और प्रसन्न रहें । नेत्रज्योति बढ़ाने के लिए दशहरे से शरद पूर्णिमा तक प्रतिदिन रात्रि में 15 से 20 मिनट तक चन्द्रमा के ऊपर त्राटक करें । 🌙 अश्विनी कुमार देवताओं के वैद्य हैं । जो भी इन्द्रियाँ शिथिल हो गयी हों, उनको पुष्ट करने के लिए चन्द्रमा की चाँदनी में खीर रखना और भगवान को भोग लगाकर अश्विनी कुमारों से प्रार्थना करना कि ‘हमारी इन्द्रियों का बल-ओज बढ़ायें ।’ फिर वह खीर खा लेना । 🌙 इस रात सुई में धागा पिरोने का अभ्यास करने से नेत्रज्योति बढ़ती है । 🌙 शरद पूनम दमे की बीमारी वालों के लिए वरदान का दिन है । अपने आश्रमों में निःशुल्क औषधि मिलती है, वह चन्द्रमा की चाँदनी में रखी हुई खीर में मिलाकर खा लेना और रात को सोना नहीं । दमे का दम निकल जायेगा । 🌙 चन्द्रमा की चाँदनी गर्भवती महिला की नाभि पर पड़े तो गर्भ पुष्ट होता है । शरद पूनम की चाँदनी का अपना महत्त्व है लेकिन बारहों महीने चन्द्रमा की चाँदनी गर्भ को और औषधियों को पुष्ट करती है । 🌙 अमावस्या और पूर्णिमा को चन्द्रमा के विशेष प्रभाव से समुद्र में ज्वार-भाटा आता है । जब चन्द्रमा इतने बड़े दिगम्बर समुद्र में उथल-पुथल कर विशेष कम्पायमान कर देता है तो हमारे शरीर में जो जलीय अंश है, सप्तधातुएँ हैं, सप्त रंग हैं, उन पर भी चन्द्रमा का प्रभाव पड़ता है । इन दिनों में अगर काम-विकार भोगा तो विकलांग संतान अथवा जानलेवा बीमारी हो जाती है और यदि उपवास, व्रत तथा सत्संग किया तो तन तंदुरुस्त, मन प्रसन्न और बुद्धि में बुद्धिदाता का प्रकाश आता है । 🌙 खीर को बनायें अमृतमय प्रसाद खीर को रसराज कहते हैं । सीताजी को अशोक वाटिका में रखा गया था । रावण के घर का क्या खायेंगी सीताजी ! तो इन्द्रदेव उन्हें खीर भेजते थे । 🌙 खीर बनाते समय घर में चाँदी का गिलास आदि जो बर्तन हो, आजकल जो मेटल (धातु) का बनाकर चाँदी के नाम से देते हैं वह नहीं, असली चाँदी के बर्तन अथवा असली सोना धो-धा के खीर में डाल दो तो उसमें रजतक्षार या सुवर्णक्षार आयेंगे । लोहे की कड़ाही अथवा पतीली में खीर बनाओ तो लौह तत्त्व भी उसमें आ जायेगा । इलायची, खजूर या छुहारा डाल सकते हो लेकिन बादाम, काजू, पिस्ता, चारोली ये रात को पचने में भारी पड़ेंगे । रात्रि 8 बजे महीन कपड़े से ढँककर चन्द्रमा की चाँदनी में रखी हुई खीर 11 बजे के आसपास भगवान को भोग लगा के प्रसादरूप में खा लेनी चाहिए । लेकिन देर रात को खाते हैं इसलिए थोड़ी कम खाना और खाने से पहले एकाध चम्मच मेरे हवाले भी कर देना । मुँह अपना खोलना और भाव करना : ‘लो महाराज ! आप भी लगाओ भोग ।’ और थोड़ी बच जाय तो फ्रिज में रख देना । सुबह गर्म करके खा सकते हो । ➡ (खीर दूध, चावल, मिश्री, चाँदी, चन्द्रमा की चाँदनी - इन पंचश्वेतों से युक्त होती है, अतः सुबह बासी नहीं मानी जाती । 🌞

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सूर्य मंत्र : ऊँ सूर्याय नम: ।   तंत्रोक्त मंत्र : ऊँ ह्यं हृीं हृौं स: सूर्याय नम: । ऊँ जुं स: सूर्याय नम: । सूर्य का पौराणिक मंत्र : जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम । तमोहरि सर्वपापघ्नं प्रणतोडस्मि दिवाकरम् । सूर्य का वेदोक्त मंत्र-विनियोग ऊँ आकृष्णेनेति मंत्रस्य हिरण्यस्तूपऋषि, त्रिष्टुप छनद: सविता देवता, श्री सूर्य प्रीत्यर्थ जपे विनियोग: ।   मंत्र : ऊँ आ कृष्णेन राजसा वत्र्तमानों निवेशयन्नमृतं मत्र्य च । हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ।   सूर्य गायत्री मंत्र : 1. ऊँ आदित्याय विदमहे प्रभाकराय धीमहितन्न: सूर्य प्रचोदयात् । 2. ऊँ सप्ततुरंगाय विद्महे सहस्त्रकिरणाय धीमहि तन्नो रवि: प्रचोदयात् । अर्थ मंत्र ‘ऊँ एहि सूर्य ! सहस्त्रांशो तेजोराशि जगत्पते । करूणाकर में देव गृहाणाध्र्य नमोस्तु ते ।

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राम और रावण का युद्ध अश्विन शुक्ल पक्ष की तृतीया को प्रारंभ हुआ था और दशमी को यह युद्ध समाप्त हुआ था। रावण समझ चुका था कि राक्षसों का नाश हो गया है, मैं अकेला हूँ और वानर-भालू बहुत हैं, इसलिए मैं अब अपार माया रचूँ और मायावी युद्ध करूं॥ इधर इंद्र ने भगवान श्री राम के लिए तुरंत अपना रथ भेज दिया। (उसका सारथी) मातलि हर्ष के साथ उसे ले आया॥ उस दिव्य अनुपम और तेज के पुंज (तेजोमय) रथ पर कोसलपुरी के राजा श्री रामचंद्रजी हर्षित होकर चढ़े और रावण से युद्ध के लिए तैयार हुए। रावण ने अपनी माया से भ्रम जाल फैलाने का प्रयत्न किया। श्री रामजी ने हँसकर धनुष पर बाण चढ़ाकर, पल भर में सारी माया हर ली। फिर श्री रामजी सबकी ओर देखकर गंभीर वचन बोले- हे वीरों! तुम सब बहुत ही थक गए हो, इसलिए अब (मेरा और रावण का) युद्ध देखो। ऐसा कहकर श्री रघुनाथजी ने ब्राह्मणों के चरणकमलों में सिर नवाया और फिर रथ चलाया। तब रावण के हृदय में क्रोध छा गया और वह गरजता तथा ललकारता हुआ सामने दौड़ा।रावण क्रुद्ध होकर वज्र के समान बाण छोड़ने लगा। अनेकों आकार के बाण दौड़े और दिशा, विदिशा तथा आकाश और पृथ्वी में, सब जगह छा गए। श्री रघुवीर ने अग्निबाण छोड़ा, (जिससे) रावण के सब बाण क्षणभर में भस्म हो गए। फिर उसने खिसियाकर तीक्ष्ण शक्ति छोड़ी, (किन्तु) श्री रामचंद्रजी ने उसको बाण के साथ वापस भेज दिया॥ वह करोड़ों चक्र और त्रिशूल चलाता है, परन्तु प्रभु उन्हें बिना ही परिश्रम काटकर हटा देते हैं। रावण ने दस त्रिशूल चलाए और श्री रामजी के चारों घोड़ों को मारकर पृथ्वी पर गिरा दिया। घोड़ों को उठाकर श्री रघुनाथजी ने क्रोध करके धनुष खींचकर बाण छोड़े। श्री रामचंद्रजी ने उसके दसों सिरों में दस-दस बाण मारे, जो आर-पार हो गए और सिरों से रक्त के पनाले बह चले। रुधिर बहते हुए ही बलवान्‌ रावण दौड़ा। प्रभु ने फिर धनुष पर बाण संधान किया। श्री रघुवीर ने तीस बाण मारे और बीसों भुजाओं समेत दसों सिर काटकर पृथ्वी पर गिरा दिए। सिर और हाथ काटते ही फिर नए हो गए। श्री रामजी ने फिर भुजाओं और सिरों को काट गिराया। इस तरह प्रभु ने बहुत बार भुजाएँ और सिर काटे, परन्तु काटते ही वे तुरंत फिर नए हो गए। प्रभु बार-बार उसकी भुजा और सिरों को काट रहे हैं, क्योंकि कोसलपति श्री रामजी बड़े कौतुकी हैं। आकाश में सिर और बाहु ऐसे छा गए हैं, मानो असंख्य केतु और राहु हों। देवलोक में सभी देवता यह स्थिति देखकर व्याकुल हो उठे और देवराज इंद्र ने ब्रह्मा के पास जाकर प्रभु श्री राम के वाणों के निष्फल होने का कारण पूछा। ब्रम्हा जी ने कहा- हे देवेंद्र ! सुनो, रावण हृदय में बाण लगते ही मर जाएगा। देवराज इंद्र पूछते हैं कि फिर रामजी उसके हृदय में बाण क्यों नही मारते हैं। इंद्र- प्रभु उसके हृदय में बाण इसलिए नहीं मारते कि रावण के हृदय में जानकीजी बसती हैं, और जानकी के ह्रदय में श्री राम बसते हैं। यही सोचकर इसके हृदय में जानकी का निवास है, जानकी के हृदय में मेरा निवास है और अगर बाण मार दिया तो ब्रह्माण्ड ही नष्ट हो जायेगा। यह वचन सुनकर इंद्र ने इसका उपाय पूछा । ब्रम्हा जी ने इंद्र को समझाते हुए कहा हे देवेंद्र संदेह का त्याग कर दो। सिरों के बार-बार काटे जाने से जब वह व्याकुल हो जाएगा और उसके हृदय से जानकी जी का ध्यान छूट जाएगा, तब सुजान (अंतर्यामी) श्री रामजी रावण के हृदय में बाण मारेंगे॥ श्री रामजी और रावण के युद्ध का चरित्र यदि सैकड़ों शेष, सरस्वती, वेद और कवि अनेक कल्पों तक गाते रहें, तो भी उसका पार नहीं पा सकते। काटते ही सिरों का समूह बढ़ जाता है। शत्रु मरता नहीं और परिश्रम बहुत हुआ। तब श्री रामचंद्रजी ने विभीषण की ओर देखा। विभीषण ने कहा प्रभु! इसके नाभिकुंड में अमृत का निवास है। हे नाथ! रावण उसी के बल पर जीता है। विभीषण की बात सुनते ही श्री रघुनाथजी ने हर्षित होकर हाथ में विकराल बाण लिए॥ कानों तक धनुष को खींचकर श्री रघुनाथजी ने इकतीस बाण छोड़े। खैंचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस। रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस॥ भावार्थ:- कानों तक धनुष को खींचकर श्री रघुनाथजी ने इकतीस बाण छोड़े। वे श्री रामचंद्रजी के बाण ऐसे चले मानो कालसर्प हों॥ सायक एक नाभि सर सोषा। अपर लगे भुज सिर करि रोषा॥ लै सिर बाहु चले नाराचा। सिर भुज हीन रुंड महि नाचा॥ भावार्थ:- एक बाण ने नाभि के अमृत कुंड को सोख लिया। दूसरे तीस बाण कोप करके उसके सिरों और भुजाओं में लगे। बाण सिरों और भुजाओं को लेकर चले। सिरों और भुजाओं से रहित रुण्ड (धड़) पृथ्वी पर नाचने लगा॥ धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब सर हति प्रभु कृत दुइ खंडा॥ गर्जेउ मरत घोर रव भारी। कहाँ रामु रन हतौं पचारी॥ भावार्थ:- धड़ प्रचण्ड वेग से दौड़ता है, जिससे धरती धँसने लगी। तब प्रभु ने बाण मारकर उसके दो टुकड़े कर दिए। मरते समय रावण बड़े घोर शब्द से गरजकर बोला- राम कहाँ हैं? मैं ललकारकर उनको युद्ध में मारूँ!॥ डोली भूमि गिरत दसकंधर। छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर॥ धरनि परेउ द्वौ खंड बढ़ाई। चापि भालु मर्कट समुदाई॥ भावार्थ:- रावण के गिरते ही पृथ्वी हिल गई। समुद्र, नदियाँ, दिशाओं के हाथी और पर्वत क्षुब्ध हो उठे। रावण धड़ के दोनों टुकड़ों को फैलाकर भालू और वानरों के समुदाय को दबाता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा॥ मंदोदरि आगें भुज सीसा। धरि सर चले जहाँ जगदीसा॥ प्रबिसे सब निषंग महुँ जाई। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई॥ भावार्थ:- रावण की भुजाओं और सिरों को मंदोदरी के सामने रखकर रामबाण वहाँ चले, जहाँ जगदीश्वर श्री रामजी थे। सब बाण जाकर तरकस में प्रवेश कर गए। यह देखकर देवताओं ने नगाड़े बजाए॥ तासु तेज समान प्रभु आनन। हरषे देखि संभु चतुरानन॥ जय जय धुनि पूरी ब्रह्मंडा। जय रघुबीर प्रबल भुजदंडा॥ भावार्थ:-रावण का तेज प्रभु के मुख में समा गया। यह देखकर शिवजी और ब्रह्माजी हर्षित हुए। ब्रह्माण्डभर में जय-जय की ध्वनि भर गई। प्रबल भुजदण्डों वाले श्री रघुवीर की जय हो॥ बरषहिं सुमन देव मुनि बृंदा। जय कृपाल जय जयति मुकुंदा॥ भावार्थ:- देवता और मुनियों के समूह फूल बरसाते हैं और कहते हैं- कृपालु की जय हो, मुकुन्द की जय हो, जय हो!॥ जय कृपा कंद मुकुंद द्वंद हरन सरन सुखप्रद प्रभो। खल दल बिदारन परम कारन कारुनीक सदा बिभो॥ सुर सुमन बरषहिं हरष संकुल बाज दुंदुभि गहगही। संग्राम अंगन राम अंग अनंग बहु सोभा लही॥ भावार्थ:- हे कृपा के कंद! हे मोक्षदाता मुकुन्द! हे (राग-द्वेष, हर्ष-शोक, जन्म-मृत्यु आदि) द्वंद्वों के हरने वाले! हे शरणागत को सुख देने वाले प्रभो! हे दुष्ट दल को विदीर्ण करने वाले! हे कारणों के भी परम कारण! हे सदा करुणा करने वाले! हे सर्वव्यापक विभो! आपकी जय हो। देवता हर्ष में भरे हुए पुष्प बरसाते हैं, घमाघम नगाड़े बज रहे हैं। रणभूमि में श्री रामचंद्रजी के अंगों ने बहुत से कामदेवों की शोभा प्राप्त की॥ सिर जटा मुकुट प्रसून बिच बिच अति मनोहर राजहीं। जनु नीलगिरि पर तड़ित पटल समेत उडुगन भ्राजहीं॥ भुजदंड सर कोदंड फेरत रुधिर कन तन अति बने। जनु रायमुनीं तमाल पर बैठीं बिपुल सुख आपने॥ भावार्थ:- सिर पर जटाओं का मुकुट है, जिसके बीच में अत्यंत मनोहर पुष्प शोभा दे रहे हैं। मानो नीले पर्वत पर बिजली के समूह सहित नक्षत्र सुशो‍भित हो रहे हैं। श्री रामजी अपने भुजदण्डों से बाण और धनुष फिरा रहे हैं। शरीर पर रुधिर के कण अत्यंत सुंदर लगते हैं। मानो तमाल के वृक्ष पर बहुत सी ललमुनियाँ चिड़ियाँ अपने महान्‌ सुख में मग्न हुई निश्चल बैठी हों॥ कृपादृष्टि करि बृष्टि प्रभु अभय किए सुर बृंद। भालु कीस सब हरषे जय सुख धाम मुकुंद॥ भावार्थ:- प्रभु श्री रामचंद्रजी ने कृपा दृष्टि की वर्षा करके देव समूह को निर्भय कर दिया। वानर-भालू सब हर्षित हुए और सुखधाम मुकुन्द की जय हो, ऐसा पुकारने लगे॥ भगवान श्री राम ने रावण का वध कर दिया। असत्य पर आज सत्य की जीत हुई है। बुराई पर अच्छे की जीत हुई है। अधर्म पर धर्म की जीत हुई है। विजय दशमी के इस मंगल पर्व पर आप सभी को दसों-दिशाओं से शान्ति, सुख, समृद्धि और सफलता प्राप्त हो ऐसी हमारी प्रार्थना एवं शुभकामनाएं।। परमपिता परमात्मा का शुभाशीष हमेशा आप सभी पर सदैव बना रहे एवं आपके सर्वमंगल की आकांक्षाओं के साथ....

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नवरात्रसमाप्ति/ नवरात्र व्रत पारण/देवी विर्सजन (देवीभागवत) के अनुसार श्री दुर्गा विसर्जन-15/10/2021 शुक्रवार समय -12/41 मध्याह्न से पहले आश्विन शुक्ल दशमीके प्रातःकालमें भगवतीका यथाविधि पूजन करके नीराजन करे। 'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः०' से पुष्पांजलि अर्पण करे। 'मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं यदर्चितम् । पूर्णं भवतु तत् सर्वं त्वत्प्रसादान्महेश्वरि॥' से क्षमा प्रार्थना करके। 'ॐ दुर्गायै नमः' कहकर एक पुष्प ईशानमें छोड़ दे और 'गच्छ गच्छ परं स्थानं स्वस्थानं देवि चण्डिके। व्रतस्रोतोजलं वृद्ध्यै तिष्ठ गेहे च भूतये ॥' से कलशस्थ देवमूर्ति आदिको उठाकर यथास्थान स्थापित करे। यदि मूर्ति मृत्तिका आदिकी हो और यव गोधूमके जुआरा हों तो उनको गायन-वादनके साथ समीपके जलाशयपर ले जाकर 'दुर्गे देवि जगन्मातः स्वस्थानं गच्छ पूजिते । षण्मासेषु व्यतीतेषु पुनरागमनाय वै ॥ इमां पूजां मया देवि यथाशक्त्योपपादिताम् । रक्षार्थं त्वं समादाय व्रजस्वस्थानमुत्तमम् ॥' इन मन्त्रोंसे मूर्तिका विसर्जन करके जलमें प्रवेश कराये और जुआरा आदि जलमें डाल दे। इस विषयमें 'मत्स्यसूक्त' का यह आदेश है कि 'देवे दत्त्वा तु दानानि देवे दद्याच्च दक्षिणाम्। तत् सर्वं ब्राह्मणे दद्यादन्यथा विफलं भवेत् ॥' नवरात्रादिके अवसरमें स्थापित देवताके जो कुछ फल-पुष्प-नैवेद्यअथवा उपहारादि अर्पण किया हो वह ब्राह्मणको देना चाहिये, अन्यथा विफल होता है। नोट-दुर्गा विसर्जन के विस्तृत जानकारी के पुजा पद्धति का उपयोग करें। संदर्भ-गीता प्रेस व्रत परिचय

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