Amit Kumar Nov 28, 2021

Jai shri Krishna ji 🙏🙏🙏🌹🌹🙏🙏 दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।14।। यह अलौकिक अर्थात् अति अदभुत त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है परन्तु जो पुरुष केवल मुझको ही निरंतर भजते हैं वे इस माया को उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात् संसार से तर जाते हैं । (14) न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः । माययापहृतज्ञानां आसुरं भावमाश्रिताः ।।15।। माया के द्वारा हरे हुए ज्ञानवाले और आसुरी स्वभाव को धारण किये हुए तथा मनुष्यों में नीच और दूषित कर्म करनेवाले मूढ़ लोग मुझे नहीं भजते हैं । (15) चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन । आर्तो जिज्ञासुरर्थाथीं ज्ञानी च भरतर्षभ ।।16।। हे भरतवंशियो में श्रेष्ठ अर्जुन ! उत्तम कर्मवाले अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी – ऐसे चार प्रकार के भक्तजन मुझे भजते हैं । (16) तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ।।17।। उनमें भी नित्य मुझमें एकीभाव से स्थित हुआ, अनन्य प्रेम-भक्तिवाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है क्योंकि मुझे तत्त्व से जानने वाले ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी मुझे अत्यंत प्रिय है । (17) उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वातमैव मे मतम् । आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ।।18।। ये सभी उदार हैं अर्थात् श्रद्धासहित मेरे भजन के लिए समय लगाने वाले होने से उत्तम हैं परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा स्वरूप ही हैं ऐसा मेरा मत है । क्योंकि वह मदगत मन-बुद्धिवाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम गतिस्वरूप मुझमें ही अच्छी प्रकार स्थित है । (18) बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ।।19।। बहुत जन्मों के अन्त के जन्म में तत्त्वज्ञान को प्राप्त हुआ ज्ञानी सब कुछ वासुदेव ही है- इस प्रकार मुझे भजता है, वह महात्मा अति दुर्लभ है । (19) कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः । तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ।।20।। उन-उन भोगों की कामना द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है वे लोग अपने स्वभाव से प्रेरित होकर उस-उस नियम को धारण करके अन्य देवताओं को भजते हैं अर्थात् पूजते हैं । (20) यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ।।21।। जो-जो सकाम भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस भक्त की श्रद्धा को मैं उसी देवता के प्रति स्थिर करता हूँ । (21) स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ।।22।। वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उस देवता से मेरे द्वारा ही विधान किये हुए उन इच्छित भोगों को निःसन्देह प्राप्त करता है। (22) अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् । देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ।।23।। परन्तु उन अल्प बुद्धिवालों का वह फल नाशवान है तथा वे देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त चाहे जैसे ही भजें, अंत में मुझे ही प्राप्त होते हैं । (23) अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ।।24।। बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम, अविनाशी, परम भाव को न जानते हुए, मन-इन्द्रयों से परे मुझ सच्चिदानंदघन परमात्मा को मनुष्य की भाँति जानकर व्यक्ति के भाव को प्राप्त हुआ मानते हैं । (24) नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः | मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ।।25।। अपनी योगमाया से छिपा हुआ मैं सबके प्रत्यक्ष नहीं होता इसलिए यह अज्ञानी जन समुदाय मुझ जन्मरहित, अविनाशी परमात्मा को तत्त्व से नहीं जानता है अर्थात् मुझको जन्मने-मरनेवाला समझता है । (25) वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन | भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ||26|| हे अर्जुन! पूर्व में व्यतीत हुए और वर्तमान में स्थित तथा आगे होनेवाले सब भूतों को मैं जानता हूँ, परन्तु मुझको कोई भी श्रद्धा-भक्तिरहित पुरुष नहीं जानता | (26) इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत । सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परंतप ।।27।। हे भरतवंशी अर्जुन ! संसार में इच्छा और द्वेष से उत्पन्न हुए सुख-दुःखादि द्वन्द्वरूप मोह से संपूर्ण प्राणी अति अज्ञानता को प्राप्त हो रहे हैं । (27) येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् । ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ।।28।। (निष्काम भाव से) श्रेष्ठ कर्मों का आचरण करने वाला जिन पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है, वे राग-द्वेषादिजनित द्वन्द्वरूप मोह से मुक्त और दृढ़ निश्चयवाले पुरुष मुझको भजते हैं । (28) जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये । ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ।।29।। जो मेरे शरण होकर जरा और मरण से छूटने के लिए यत्न करते हैं, वे पुरुष उस ब्रह्म को तथा संपूर्ण अध्यात्म को और संपूर्ण कर्म को जानते हैं । (29) साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः । प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ।।30।। जो पुरुष अधिभूत और अधिदैव के सहित तथा अधियज्ञ के सहित (सबका आत्मरूप) मुझे अंतकाल में भी जानते हैं, वे युक्त चित्तवाले पुरुष मुझको ही जानते हैं अर्थात् मुझको ही प्राप्त होते हैं। (30) ॐ तत्सदिति श्रीमद् भगवदगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगे नाम सप्तमोऽध्यायः।।7।। इस प्रकार उपनिषद्, ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रस्वरूप श्रीमद् भगवदगीता में श्रीकृष्ण तथा अर्जुन के संवाद में 'ज्ञानवियोग नामक' सातवाँ अध्याय संपूर्ण।

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Amit Kumar Nov 27, 2021

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Amit Kumar Nov 26, 2021

{{{ॐ}}} कापी पेस्ट इन्टरनेट हमारे आधुनिक धर्म गुरु:---- हिन्दू धर्म के विग्रह का कारण हिन्दू धर्माचार्यों की विमुखता और स्वार्थ था और फिर से ऐक स्शक्त शंकराचार्य की जरूरत है। आज फिर से हिन्दू धर्म के विघटन की जड यही ‘घर्म-गुरु’ हैं जिन्हें सिर्फ पैसा और बडे बडे आश्रम बनाने से मतलब है जहाँ वह अपना जीवन ऐश से गुजार सकें और लोग उन्हें ही भगवान मान लेः- “गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरा । गुरुर्साक्षात् परब्रह्मं, तस्मे श्री गुरवे नमः” ।। आदि शंकराचार्य कि लिखे इस श्लोक का प्रयोग हमारे देश के आधुनिक गुरू-जन अपना प्रवचन शुरु करने से पहले करते हैं ताकि श्रोताओं को कोई गल्तफहमी ना रहै, वह इसी श्लोक को सुन कर आंखें बन्द करें, और क्षमता की परवाह किये बिना सामने बैठे गुरु को साक्षात ब्रह्मा, विष्णु या महेश की तरह सर्वज्ञ, सर्व शक्तिमान और सर्व-व्यापक ईश्वर मान लें। इसी श्लोक को रट कर यह बाबा लोग हिन्दू समाज को गुमराह करने का काम करते हैं और अपने अपने चेलों को हिन्दू धर्म की मुख्य धारा से भटका कर उन्हें अपने बनाये हुये घटकों में बांट रहै हैं। अब तो यह महाठग धर्म गुरु अपने प्रवचनों में ‘धर्म निर्पेक्ष’ बनने लग पडे हैं ताकि इन्हें ‘ग्लोबल मार्किट’ से चेले चेलियां मिल सकें। इन की दृष्टी में सिवाये इन के अपने घटक के, बाकी सभी धार्मिक औपचारितायें ढोंग होती हैं। इन में से अधिकतर कईयों ने किसी वेद, शास्त्र, उपनिष्द आदि का कोई अध्ययन नहीं किया होता और परम्परागत धर्म को नकारने के लिये सिर्फ ऊपर से चिकनी चुपडी बातें और मनघडंत कथायें सुनाते हैं। अपने ही नाम का कीर्तन कराते हैं, भक्तों से अपने चरण स्पर्ष करवाते हैं, गुरु दक्षिणा बटोरते हैं। अकसर गर्मियों में सैर करने अमेरिका आदि चले जाते हैं और वहाँ गुरुदक्षिणा डालरों में कमाते हैं। वहां उन्हों ने पहले सी ही अपने किसी स्थानीय भक्त को अपना ‘ऐजेन्ट’ मनोनीत किया होता है जो गुरू की फोटो रख कर गुरू महाराज का ‘प्री-रिकार्डिड’ प्रवचन और गीत सुनाता रहता है। इन गुरूजनो का देश के तत्कालिक आर्थिक, राजनैतिक, और प्रकृतिक विपदाओं से कोई सरोकार नहीं होता। इन का मकसद केवल अपने भक्तों की संख्या बढा कर अपने निजि धर्म की ब्रांचे खोलना मात्र ही होता है। गुरूजनों की विदुत्ता और मानसिक्ता का प्रत्यक्ष प्रतिबिम्ब उन का मेकअप होता है। माथे पर कई रंगों के लेप, लम्बे काले (अकसर ‘डाई’ किये) बाल, भगवे रंग के बढिया डिजाईनर रेशमी कपडे, गले में मोटे मोटे रुद्राक्ष की मालायें, और हाथों में कई तरह की रत्न जडित चमत्कारी अंगूठियां इन का सार्वजनिक पहरावा है। उन का निजि रहवास और गाडी ऐयर कण्डीशन्ड होनी चाहिये। गुरू जी कंदमूल तो क्या, आम आदमियों के जैसा खाना भी नहीं खाते। उन के लिये भोजन बनाने और परोसने की जिम्मेदारी किसी खास चेला-चेली की रहती हैं। वह केवल ‘स्पेशल-प्रसाद’ से ही संतुष्ट हो कर जीवन बिताते हैं। आर्थिक तथा राजनैतिक दृष्टी से सामर्थवान चेले चेलियां ही गुरु महाराज से निजि तौर पर आशीर्वाद पा सकते हैं अन्य भक्तों को दूर से प्रणाम करने कहा जाता है। गीता ज्ञान बांटने के बावजूद साल में ऐक बार किसी आडिटोरियम में गुरू महाराज अपने चेलों से अपनी ‘नशवर देह’ का जन्मदिन भी मनवाते हैं। नैतिक जीवन का ‘गुरूमन्त्र’ वह किसी ‘पासवर्ड’ की तरह अपने चेलों के कान में ही बताते हैं ताकि उस के ‘गुरूमन्त्र’ से किसी अन्य घटक के हिन्दू को फायदा ना पहुँचे और ‘ट्रेड-सीक्रेट’ बना रहै। सच पूछो तो इन धर्म गुरुओं का योग्दान आम हिन्दू समाज को कुछ नहीं है। यह केवल अपनी अपनी धर्म दुकाने चला रहै हैं और हिन्दू समाज को विघटन को और ले जा रहै हैं। अगर आज गुरु महाराज के पदचिन्हों पर सभी चलें – सिर, दाढी, मूंछ के बाल, माथे पर चन्दन का तिलक, और भगवे वस्त्र पहन कर सभी सरकारी कर्मचारी दफ्तरों में बैठ जायें तो इक्कीसवीं सदी में भारत की छवि का अन्दाजा लगाया जा सकता है। कोई हिन्दू नहीं जानता कि ऋषि वासिष्ठ, विशवमित्र या व्यास का जन्म कब हुआ था क्योंकि हमारे पुरातन ऋषि मुनि अपनी ‘मार्किटिंग’ करना नहीं जानते थे। किसी ऋषि-मुनि ने निजि ‘ब्रांड’ का समुदाय या घटक धर्म नहीं बनाया था। लेकिन इस तरह के पाखँडियों पर अंकुश लगाने, और समाज का सही दिशा में मार्गदर्शन करने के लिये आदि शंकराचार्य ने चारों मठों में ऐक ऐक शांकराचार्य की स्थापना करी थी। क्या इस बात का आंकलन करना जरूरी नहीं कि जागरूक हिन्दू समाज की ऐसी दुर्दशा क्यों है। बहस होनी चाहिये कि आज की परिस्थिति में यह चारों शंकराचार्य हिन्दू समाज के उत्थान के लिये क्या योग्दान दे रहै है। चारों शंकराचार्य ने अपने अपने कार्य क्षेत्र में- · अन्धविशवास कुरीतियों, तथा हिन्दू विरोधी मिथ्या प्रचार के विरुध क्या किया है? · दलित समस्या, दहेज प्रथा, अन्य रीति रिवाजों या ड्रग, हिंसा, बलात्कार, तलाक, भ्रूण हत्या आदि के बारे में कभी कोई सक्षम सुझाव हिन्दू समाज को दिया है। · क्या कभी ‘वेलेन्टाईन-डे’ तरह की बाहरी कुरीतियों, ‘लिविंग-इन रिलेशनस’ आदि का सक्षम विरोध या समर्थन किया है। · मन्दिरों, प्राचीन धरोहरों और यात्रियों की सुवाधाओं की दिशा में भी क्या कोई प्रयत्न किया है। · आत्मा परमात्मा, भौतिक विज्ञान, आयुर्वेद या किसी अन्य विषय पर ने कोई ग्रंथ, ‘थियोरी ’ विश्व पटल पर रखी है ? · हिन्दू धर्म के प्रचार के लिये कितने पुस्तकालय या परिशिक्षण के लिये कोई कोर्स चलाये हैं ? · उच्च शिक्षा संस्थानों मेंभारतीय वैदिक संस्कृति के पाठन के लिये कोई ‘सिलेबस’ तैय्यार किया है जिसे प्रथम वर्ष से स्नातकस्तर तक क्रमशा ले जाया जा सके।इस का विशलेषण होना चाहिये कि क्या वह शिक्षा आधुनिक परिपेश की जरूरतों को ध्यान में रख कर दी जाये गी या सिर्फ ‘पौंगे-पण्डित’ ही तैय्यार करे गी। इस विषय पर आधुनिकता के माप दण्ड क्या और किस प्रकार निर्धारित किये जायें गे। · हिन्दू समाज को धर्मान्तरण और आतन्कवाद से सुरक्षित रखने के लिये उन्हों ने सरकार से क्या आशवासन मांगा है ? · जब दूसरे धर्मों के लोग ऐक वोट बैंक संगठित कर के इस देश में मनमाने तरीके से अपनी बात मनवा सकते हैं तो हिन्दू धर्म गुरू क्यों लाचार बने बैठे हैं? आज के हिन्दू समाज में आम तौर पर यह धारणा है कि इन घटक गुरूओं की तरह हमारे शंकराचार्य भी केवल मठों तक ही सीमित हैं और आदि शंकराचार्य के युग में ही जी रहै हैं। आदि शंकराचार्य ने तो पैदल ही समस्त भारत के दूर दराज इलाकों का भ्रमण किया था परन्तु आज के जमाने में यातायात की सुविधायें होने के बावजूद हमारे आधुनिक शंकराचार्य सांप की तरह कुण्डली मार कर अपने मठों में ही जमे रहते हैं जबकि हिन्दू समाज धर्म निर्पेक्षता के बहाने तेजी से पलायनवाद की और जा रहा है। यह जरूरी है कि शंकराचार्य के योग्दान का हिन्दू समाज की जानकारी के लिये और इस संस्थान का आदर्श स्थापित करने के लिये आंकलन कर के प्रचारित किया जाये और हिन्दू धर्म गुरू परदे सा बाहर निकल कर धर्म रक्षा के लिये मैदान में खुले आम आयें। दुख के साथ कहना पडता है कि इन ढोंगी बाबाओं ने हिन्दूओं को ठगा है, उन्हें घटकों में बान्ध कर अन्ध विशवास फैलाया है और उस की आड में व्याभिचार और भ्रष्टाचार ही किया है। हिन्दू युवा वर्ग कई कारणों से निजि भविष्य को सुरक्षित करने में ही जुटा रहता है तथा अपने पूर्वजों के धर्म का बचाव करने में लगभग असमर्थ है।

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Amit Kumar Nov 24, 2021

. "सखी सम्प्रदाय" अक्सर हम वृंदावन में स्त्रियों की तरह सोलह-श्रृंगार किये हुये पुरुषों को देखते हैं, जो कि बहुत मस्त भाव से श्रीकृष्ण को रिझाते हुये उनके आगे नृत्य करते हैं। जो लोग उनके इस भाव को नहीं जानते हैं उनके मन में उन्हें देख कई तरह के विचार आते हैं। ये कौन हैं, क्या रूप बना रखा है, स्त्रीवेश में क्यों घुमते हैं, इत्यादि। ये लोग सखी सम्प्रदाय के होते हैं, जिसे सखीभाव सम्प्रदाय भी कहा जाता है। सखी सम्प्रदाय, निम्बार्क मत की एक शाखा है जिसकी स्थापना स्वामी हरिदास (जन्म सं० १४४१ वि०) ने की थी। इसे हरिदासी सम्प्रदाय भी कहते हैं। इसमें भक्त अपने आपको श्रीकृष्ण की सखी मानकर उसकी उपासना तथा सेवा करते हैं और प्रायः स्त्रियों के भेष में रहकर उन्हीं के आचारों, व्यवहारों आदि का पालन करते हैं। सखी सम्प्रदाय के ये साधु अधिकतर ब्रजभूमि में ही निवास करते हैं। स्वामी हरिदास जी के द्वारा निकुंजोपासना के रूप में श्यामा-कुंजबिहारी की उपासना-सेवा की पद्धति विकसित हुई, यह बड़ी विलक्षण है। निकुंजोपासना में जो सखी-भाव है, वह गोपी-भाव नहीं है। निकुंज-उपासक प्रभु से अपने लिए कुछ भी नहीं चाहता, बल्कि उसके समस्त कार्य अपने आराध्य को सुख प्रदान करने हेतु होते हैं। श्री निकुंजविहारी की प्रसन्नता और संतुष्टि उसके लिए सर्वोपरि होती है। यह सम्प्रदाय "जिन भेषा मोरे ठाकुर रीझे सो ही भेष धरूंगी" के आधार पर अपना समस्त जीवन "राधा-कृष्ण सरकार" को न्यौछावर कर देती है। सखी सम्प्रदाय के साधु अपने को "सोलह सिंगार" नख से लेकर चोटी तक अलंकृत करते हैं। सखी सम्प्रदाय के साधु अपने को सखी के रूप में मानते हैं, यहाँ तक कि रजस्वला के प्रतीक के रूप में स्वयं को तीन दिवस तक अशुद्ध मानते हैं। ऐसे ही कोई भी व्यक्ति सखी नहीं बन जाता, इसके लिए भी एक विशेष प्रक्रिया है जो की आसान नहीं। इस प्रक्रिया के अंतर्गत व्यक्ति पहले साधु ही बनता है, और साधु बनने के लिए गुरु ही माला-झोरी देकर तथा तिलक लगाकर मन्त्र देता है। तथा इस साधु जीवन में जिसके भी मन में सखी भाव उपजा उसे ही गुरु साड़ी और श्रृंगार देकर सखी की दीक्षा देते हैं। निर्मोही अखाड़े से जुड़े सखी सम्प्रदाय के साधु अथवा सखियाँ कान्हा जी के सामने नाच कर तथा गाकर मोहिनी सूरत बना उन्हें रिझाते हैं। ​ सामान्यतया सभी सम्प्रदायों की पहचान पहले उनके तिलक से होती है, उसके बाद उनके वस्त्रों से। गुरु रामानंदी सम्प्रदाय के साधु अपने माथे पर लाल तिलक लगाते हैं और कृष्णानन्दी सम्प्रदाय के साधु सफेद तिलक, जो की राधा नाम की बिंदिया होती है, लगाते हैं और साथ ही तुलसी की माला भी धारण करते हैं।​ सखी सम्प्रदाय से जुडी एक और बात बहुत दिलचस्प है की इस सम्प्रदाय में कोई स्त्री नहीं, केवल पुरुष साधु ही स्त्री का रूप धारण करके कान्हा को रिझाती हैं। सखी सम्प्रदाय की भक्ति कोई मनोरंजन नहीं बल्कि इसमें प्रेम की गंभीरता झलकती है, और पुरुषों का यह निर्मल प्रेम इस सम्प्रदाय को दर्शनीय बनाता है। "जय जय श्री राधे" ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" ********************************************

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Amit Kumar Nov 23, 2021

सुप्रभात वंदनम् जय बिहारी जी की श्री भरत जी का दल आगे चला। निषादराज, श्रंगबेरपुर के राजा, को पता लगा। भरत आ रहे हैं? सेवकों ने कहा -- चतुरंगिनी सेना भी साथ है। रथ, घोड़े, हाथी, पूरा दल बल है। बस, निषादराज भड़क गए। आज राम सेवक -- निषादराज कहते हैं -- सनमुख लोह भरत सन लेऊँ। जियत न सुरसरि उतरन देऊँ।। आज मैं भरत से युद्ध करूंगा। जीते जी गंगा जी के उस पार नहीं होने दूँगा। राम जी को असहाय जानकर, बनवासी जानकर, उनसे युद्ध करने जा रहे हैं, उन पर चढ़ाई करने जा रहे हैं। समर मरनि पुनि सुरसरि तीरा। मरूँगा तो युद्ध में वीरगति को प्राप्त होऊँगा, और वह भी गंगा जी के किनारे। राम काजु छन भंगु सरीरा। भरत भाई नृपु मैं जन नीचू। भरत उनके भाई हैं। मैं तो राम जी का छोटा सा सेवक हूँ। बड़े भाग असि पाइअ मीचू।। भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि। कार्य है मुझे। धोखा मत देना, तैयार हो जाओ युद्ध के लिए। अच्छा देखो, इस प्रसंग से एक शिक्षा और मिलती है। हृदय मिले हों, तो तन दूर रहने के बाद भी मन दूर नहीं होता, और मन ही न मिले हों, तो आप इकट्ठे तो रह सकते हैं, एक कभी नहीं रह सकते। इकट्ठे होने में और एक होने में अंतर है। जहांँ हृदय मिलते हैं वहाँ व्यक्ति एक होते हैं और जहाँ नहीं मिलते वहाँ इकट्ठे होते हैं। हाथ के साथ यही कठिनाई है। कब कौन किससे हाथ मिला ले, आपको पता ही नहीं लगेगा, कब कौन किससे हाथ मिलाने वाला है? और दूसरी भी बात है, कब कौन हाथ खींच ले, पता ही नहीं लगेगा। एक से पूछा कि हाथ खींच क्यों लिया, जो मिलाया था? बोला -- हमने तो हाथ बनाने के लिए ही हाथ मिलाया था। बन गया तो खींच लिया। हाथ मिलते हैं वहाँ लोग इकट्ठे होते हैं, पर इकट्ठे हुए लोगों को एक मत समझना। पर जहाँ हृदय मिलते हैं वहाँ व्यक्ति एक होते हैं। इसीलिए हमारे यहाँ पुरानी परम्परा है ‌। जब कोई मिलते हैं तो हृदय लगकर। उसका भाव यह है कि मिलो तो ऐसे मिलो कि हृदय से मिलो। भले ही तन के मिलने के ढंग से हृदय से न मिलो, पर भाव से, हृदय से मिलो, संकेत यही है। चलो, अब हृदय से मिलना बंद हो गया। चलो हाथ ही सही, मिलते तो हैं, पर अब वह भी मिलने बंद हो गये। अब हाथ मिलते नहीं, अब हाथ हिलते हैं, और इसका अर्थ, वे साफ-साफ कहते हैं कि हम तुम्हारे नहीं हैं, हमारे भरोसे मत रहना। तो सामने वाले भी कहते हैं कि क्या तुम हमें अपना समझते हो? हम भी तुम्हारे नहीं हैं। अब देखो, लक्ष्मण जी चित्रकूट में हैं। निषादराज श्रंगबेरपुर में हैं और दोनों गुरु-शिष्य हैं। निषादराज को लक्ष्मण जी ने उपदेश दिया रात्रि में, गीता का। लक्ष्मण गीता कहलाती है, और सही बात है रात्रि में ही तो उपदेश की आवश्यकता है। मोह निसा सब सोवनिहारा। अच्छा, यह भी अद्भुत संकेत है कि उपदेश दिया किसने? कहा -- लक्ष्मण जी ने। ••••क्यों? जागनि लगे बैठि वीरासन। लक्ष्मण जी कभी सोते नहीं। इसका अर्थ क्या है? जो सदा जागृत रहता हो, जो मोह की नींद में जागा हुआ हो, वही दूसरे को जगा सकता है। तो लक्ष्मण जी हैं गुरु, और निषादराज हैं शिष्य। देखो सम्बन्धों की हार्दिकता और आत्मीयता की विशेषता क्या है? शिष्य को देखकर गुरु जी की याद आ जाय, शिष्य को देखने से ही गुरु का स्मरण हो। यह शिष्य हैं। अच्छा तो गुरु जी ऐसे ही हैं। इसलिए कई बार लोग शिष्य को देखकर ही कहते हैं-- अच्छा, उनके शिष्य हैं क्या? ••••••तो कैसे पहचाना?•••••उनके रहन--सहन ढँग से पहचाना, उठने-बैठने से पहचाना। इतनी आत्मीयता, देखो पुत्र से पिता का परिचय मिलता है। वह बिंदु परम्परा से उद्भूत है और शिष्य से गुरु का परिचय मिलता है, वह नाद परम्परा से उद्भूत है। निषादराज शिष्य हैं, लक्ष्मण जी गुरुदेव हैं। गुरुदेव चित्रकूट में हैं, शिष्य श्रृंगवेरपुर में हैं, लेकिन कितनी एकता है कि भरत जी को देखकर जो बातें निषादराज ने कही हैं, बिल्कुल वही शैली, उसी ढंग में लक्ष्मण जी ने भी कही हैं। आप पंक्तियां मिला लो गुरु और चेले की। शिष्य निषादराज क्या बोले? सनमुख लोह भरत सन लेऊँ। जियत न सुरसरि उतरन दैऊँ।।

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Amit Kumar Nov 21, 2021

🙌🏼 आज श्रीमन्महाप्रभु के श्रीवृन्दावन आगमन उत्सव और कार्तिक पूर्णिमा की कोटि-कोटि बधाई !! श्री अमिय निमाई मन्दिर से नगर शोभा यात्रा !! शुभ कार्तिक पूर्णिमा के दिन श्रीमन्महाप्रभु ने श्री धाम वृन्दावन में पदार्पण किया । श्री कृष्ण की रास स्थलियों के दर्शन कर प्रभु प्रेमानन्द में मूर्छित हो गिर पड़े । मूर्छा भंग होने पर दिन भर वहाँ नृत्य कीर्तन करते रहे । उनके नर्तन ,कीर्तन से वृन्दावन मुखरित हो उठा । जिस वृन्दावन के दर्शन की साध न जाने कब से प्रभु अपने ह्रदय में संजोयें हुए थे , जिसके लिए न जाने कितने आँसू बहा चुके थे ... उसी वृन्दावन के तरू लताओं के बीच आज अपने को पाकर वे फूले नहीं समा रहे । वे प्रत्येक वृक्ष को आलिगंन कर वैसे ही सुख का उपभोग कर रहे है , जैसा अपने किसी अति प्रिय जन के आलिगंन से होता है । तरू लता भी इतने दिनों के उपरान्त अपने काले कन्हाई को गौर कन्हाई के रूप में पाकर उनके ऊपर प्रेम पूर्वक पुष्प वृष्टि कर रहे हैं । ऐसे में हमारे प्राण गौराराय को विरहणी प्रियाजी का भावावेश होता है ... और वे उन्मादित हो तृषित नेत्रों से अपने श्यामसुन्दर का प्रत्येक स्थान पर अन्वेषण करने लगते है । जय आमादेर आमादेर आमादेर प्राण गौराराय । कृष्ण विरहणि उन्मादिनी प्राण गौराराय !! श्याम पगिलनी उन्मादिनी प्राण गौराराय !! 🙌🏼 श्रीराधारमण दासी परिकर 🙌🏼

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Amit Kumar Nov 20, 2021

. "भक्त के वश में भगवान" एक गरीब बालक था जो कि अनाथ था। एक दिन वो बालक एक सन्त के आश्रम में आया और बोला के बाबा आप सबका ध्यान रखते हैंं, मेरा इस दुनिया में कोई नहीं हैं तो क्या मैं यहाँ आपके आश्रम में रह सकता हूँ ? बालक की बात सुनकर सन्त बोले बेटा तेरा नाम क्या हैं ? उस बालक ने कहा मेरा कोई नाम नहीं हैं। तब सन्त ने उस बालक का नाम रामदास रखा और बोले की अब तुम यहीं आश्रम में रहना। रामदास वहीं रहने लगा और आश्रम के सारे काम भी करने लगा। उन सन्त की आयु 80 वर्ष की हो चुकी थी। एक दिन वो अपने शिष्यों से बोले की मुझे तीर्थ यात्रा पर जाना हैं तुम में से कौन-कौन मेरे मेरे साथ चलेगा और कौन-कौन आश्रम में रुकेगा ? सन्त की बात सुनकर सारे शिष्य बोले की हम आपके साथ चलेंगे। क्योंकि उनको पता था की यहाँ आश्रम में रुकेंगे तो सारा काम करना पड़ेगा इसलिये सभी बोले की हम तो आपके साथ तीर्थ यात्रा पर चलेंगे। अब सन्त सोच में पड़ गये की किसे साथ ले जाये और किसे नहीं क्योंकि आश्रम पर किसी का रुकना भी जरुरी था। बालक रामदास सन्त के पास आया और बोला बाबा अगर आपको ठीक लगे तो मैं यहीं आश्रम पर रुक जाता हूँ। सन्त ने कहा ठीक हैं पर तुझे काम करना पड़ेगा। आश्रम की साफ सफाई में भले ही कमी रह जाये पर ठाकुर जी की सेवा में कोई कमी मत रखना। रामदास ने सन्त से कहा की बाबा मुझे तो ठाकुर जी की सेवा करनी नहीं आती आप बता दीजीये की ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी हैं ? फिर मैं कर दूँगा। सन्त रामदास को अपने साथ मन्दिर ले गये वहाँ उस मन्दिर मे राम दरबार की झाँकी थी। श्रीराम जी, सीता जी, लक्ष्मणजी और हनुमान जी थे। सन्त ने बालक रामदास को ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी हैं सब सिखा दिया। रामदास ने गुरु जी से कहा की बाबा मेरा इनसे रिश्ता क्या होगा ये भी बता दो क्योंकि अगर रिश्ता पता चल जाये तो सेवा करने में आनन्द आयेगा। उन सन्त ने बालक रामदास कहा की तू कहता था ना की मेरा कोई नहीं हैं तो आज से ये रामजी और सीताजी तेरे माता-पिता हैं। रामदास ने साथ में खड़े लक्ष्मण जी को देखकर कहा अच्छा बाबा और ये जो पास में खड़े हैं वो कौन हैंं ? सन्त ने कहा ये तेरे चाचा जी हैंं और हनुमान जी के लिये कहा की ये तेरे बड़े भैय्या हैंं। रामदास सब समझ गया और फिर उनकी सेवा करने लगा। सन्त शिष्यों के साथ यात्रा पर चले गये। आज सेवा का पहला दिन था रामदास ने सुबह उठकर स्नान किया और भिक्षा माँगकर लाया और फिर भोजन तैयार किया फिर भगवान को भोग लगाने के लिये मन्दिर आया। रामदास ने श्रीराम सीता लक्ष्मण और हनुमान जी आगे एक-एक थाली रख दी और बोला अब पहले आप खाओ फिर मैं भी खाऊँगा। रामदास को लगा की सच में भगवान बैठकर खायेंगे, पर बहुत देर हो गई रोटी तो वैसी की वैसी थी। तब बालक रामदास ने सोचा नया नया रिश्ता बना हैं तो शरमा रहे होंगे। रामदास ने पर्दा लगा दिया बाद में खोलकर देखा तब भी खाना वैसे का वैसा पडा था। अब तो रामदास रोने लगा की मुझसे सेवा मे कोई गलती हो गई इसलिये खाना नहीं खा रहे हैंं। ये नहीं खायेंगे तो मैं भी नहीं खाऊँगा और मैं भूख से मर जाऊँगा। इसलिये मैं तो अब पहाड़ से कूदकर ही मर जाऊँगा। रामदास मरने के लिये निकल जाता हैं तब भगवान रामजी हनुमान जी को कहते हैंं, हनुमान जाओ उस बालक को लेकर आओ और बालक से कहो की हम खाना खाने के लिये तैयार हैंं। हनुमान जी जाते हैं और रामदास कूदने ही वाला होता है की हनुमान जी पीछे से पकड़ लेते हैं और बोलते हैं क्या कर रहे हो ? रामदास कहता है आप कौन ? हनुमान जी कहते हैं मैं तेरा भैय्या हूँ इतनी जल्दी भूल गये ? रामदास कहता है अब आये हो इतनी देर से वहाँ बोल रहा था की खाना खा लो तब आये नहीं अब क्यों आ गये ? तब हनुमान जी बोले पिता श्री का आदेश है अब हम सब साथ बैठकर खाना खायेंगे। रामजी, सीताजी, लक्ष्मणजी, हनुमान जी साक्षात बैठकर भोजन करते हैं। इसी तरह रामदास रोज उनकी सेवा करता और भोजन करता। सेवा करते 15 दिन हो गये एक दिन रामदास ने सोचा की कोई भी माँ बाप हो वो घर में काम तो करते ही हैं, पर मेरे माँ बाप तो कोई काम नहीं करते सारे दिन खाते रहते हैं। मैं ऐसा नहीं चलने दूँगा। रामदास मन्दिर जाता है और कहता है पिता जी कुछ बात करनी है आपसे। रामजी कहते हैं बोल बेटा क्या बात है ? रामदास कहता है की अब से मैं अकेले काम नहीं करुंगा आप सबको भी काम करना पड़ेगा, आप तो बस सारा दिन खाते रहते हो और मैं काम करता रहता हूँ अब से ऐसा नहीं होगा। राम जी कहते हैं तो फिर बताओ बेटा हमें क्या काम करना है ? रामदास ने कहा माताजी (सीताजी) अब से रसोई आपके हवाले, और चाचाजी (लक्ष्मणजी) आप सब्जी तोड़कर लाओगे। भैय्याजी (हनुमान जी) आप लकड़ियाँ लायेंगे और पिताजी (रामजी) आप पत्तल बनाओगे। सबने कहा ठीक है। अब सभी साथ मिलकर काम करते हुए एक परिवार की तरह सब साथ रहने लगे। एक दिन वो सन्त तीर्थ यात्रा से लौटे तो सीधा मन्दिर में गये और देखा की मन्दिर से प्रतिमाऐंगायब हैं। सन्त ने सोचा कहीं रामदास ने प्रतिमा बेच तो नहीं दीं ? सन्त ने रामदास को बुलाया और पूछा भगवान कहाँ गये ? रामदास भी अकड़कर बोला की मुझे क्या पता रसोई में कही काम कर रहे होंगे। सन्त बोले ये क्या बोल रहा है ? रामदास ने कहा बाबा मैं सच बोल रहा हूँ जबसे आप गये हैं ये चारोँ काम में लगे हुए हैं। वो सन्त भागकर रसोई में गये और सिर्फ एक झलक देखी की सीता जी भोजन बना रही हैं रामजी पत्तल बना रहे हैं और फिर वो गायब हो गये और मन्दिर में विराजमान हो गये। सन्त रामदास के पास गये और बोले आज तुमने मुझे मेरे ठाकुर का दर्शन कराया तू धन्य हैं। और सन्त ने रो-रो कर रामदास के पैर पकड़ लिये। कथा का तात्पर्य यही है की ठाकुर जी तो आज भी तैयार हैं दर्शन देने के लिये पर कोई रामदास जैसा भक्त भी तो होना चाहिये। ----------:::×:::---------- "जय श्री राम" ******************************************** (

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