+2 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 10 शेयर

🍂बाँस का पेड़ 🍂🚩🚩 एक संत अपने शिष्य के साथ जंगल में जा रहे थे। ढलान पर से गुजरते अचानक शिष्य का पैर फिसला और वह तेजी से नीचे की ओर लुढ़कने लगा। वह खाई में गिरने ही वाला था कि तभी उसके हाथ में बांस का एक पौधा आ गया। उसने बांस के पौधे को मजबूती से पकड़ लिया और वह खाई में गिरने से बच गया। बांस धनुष की तरह मुड़ गया लेकिन न तो वह जमीन से उखड़ा और न ही टूटा. वह बांस को मजबूती से पकड़कर लटका रहा। थोड़ी देर बाद उसके गुरू पहुंचे।उन्होंने हाथ का सहारा देकर शिष्य को ऊपर खींच लिया। दोनों अपने रास्ते पर आगे बढ़ चले। राह में संत ने शिष्य से कहा- "जान बचाने वाले बांस ने तुमसे कुछ कहा, तुमने सुना क्या?" शिष्य ने कहा- "नहीं गुरुजी, शायद प्राण संकट में थे इसलिए मैंने ध्यान नहीं दिया और मुझे तो पेड-पौधों की भाषा भी नहीं आती. आप ही बता दीजिए उसका संदेश।" गुरु मुस्कुराए- खाई में गिरते समय तुमने जिस बांस को पकड़ लिया था, वह पूरी तरह मुड़ गया था। फिर भी उसने तुम्हें सहारा दिया और जान बची ली। संत ने बात आगे बढ़ाई- बांस ने तुम्हारे लिए जो संदेश दिया वह मैं तुम्हें दिखाता हूं। गुरू ने रास्ते में खड़े बांस के एक पौधे को खींचा औऱ फिर छोड़ दिया। बांस लचककर अपनी जगह पर वापस लौट गया। हमें बांस की इसी लचीलेपन की खूबी को अपनाना चाहिए। तेज हवाएं बांसों के झुरमुट को झकझोर कर उखाड़ने की कोशिश करती हैं लेकिन वह आगे-पीछे डोलता मजबूती से धरती में जमा रहता है। बांस ने तुम्हारे लिए यही संदेश भेजा है कि जीवन में जब भी मुश्किल दौर आए तो थोड़ा झुककर विनम्र बन जाना लेकिन टूटना नहीं क्योंकि बुरा दौर निकलते ही पुन: अपनी स्थिति में दोबारा पहुंच सकते हो। शिष्य बड़े गौर से सुनता रहा। गुरु ने आगे कहा- "बांस न केवल हर तनाव को झेल जाता है बल्कि यह उस तनाव को अपनी शक्ति बना लेता है और दुगनी गति से ऊपर उठता है। बांस ने कहा कि तुम अपने जीवन में इसी तरह लचीले बने रहना। गुरू ने शिष्य को कहा- "पुत्र पेड़-पौधों की भाषा मुझे भी नहीं आती। बेजुबान प्राणी हमें अपने आचरण से बहुत कुछ सिखाते हैं।" जरा सोचिए कितनी बड़ी बात है। हमें सीखने के सबसे ज्यादा अवसर उनसे मिलते हैं जो अपने प्रवचन से नहीं बल्कि कर्म से हमें लाख टके की बात सिखाते हैं। हम नहीं पहचान पाते, तो यह कमी हमारी है। 🌹🙏जय श्री कृष्ण 🙏🌹 जय श्री राधे राधे जय श्री राधे राधे जय श्री राधे राधे जय श्री राधे राधे जय श्री राधे राधे जय श्री राधे राधे जय श्री राधे राधे।

+4 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 50 शेयर

जय माँ नर्मदा👏👏 मैं नर्मदा हूं। जब गंगा नहीं थी , तब भी मैं थी। जब हिमालय नहीं था , तभी भी मै थी। मेरे किनारों पर नागर सभ्यता का विकास नहीं हुआ। मेरे दोनों किनारों पर तो दंडकारण्य के घने जंगलों की भरमार थी। इसी के कारण आर्य मुझ तक नहीं पहुंच सके। मैं अनेक वर्षों तक आर्यावर्त की सीमा रेखा बनी रही। उन दिनों मेरे तट पर उत्तरापथ समाप्त होता था और दक्षिणापथ शुरू होता था। मेरे तट पर मोहनजोदड़ो जैसी नागर संस्कृति नहीं रही, लेकिन एक आरण्यक संस्कृति अवश्य रही। मेरे तटवर्ती वनों मे मार्कंडेय, कपिल, भृगु , जमदग्नि आदि अनेक ऋषियों के आश्रम रहे । यहाँ की यज्ञवेदियों का धुआँ आकाश में मंडराता था । ऋषियों का कहना था कि तपस्या तो बस नर्मदा तट पर ही करनी चाहिए। इन्हीं ऋषियों में से एक ने मेरा नाम रखा, " रेवा "। रेव् यानी कूदना। उन्होंने मुझे चट्टानों में कूदते फांदते देखा तो मेरा नाम "रेवा" रखा। एक अन्य ऋषि ने मेरा नाम "नर्मदा " रखा ।"नर्म" यानी आनंद । आनंद देनेवाली नदी। मैं भारत की सात प्रमुख नदियों में से हूं । गंगा के बाद मेरा ही महत्व है । पुराणों में जितना मुझ पर लिखा गया है उतना और किसी नदी पर नहीं । स्कंदपुराण का "रेवाखंड " तो पूरा का पूरा मुझको ही अर्पित है। "पुराण कहते हैं कि जो पुण्य , गंगा में स्नान करने से मिलता है, वह मेरे दर्शन मात्र से मिल जाता है।" मेरा जन्म अमरकंटक में हुआ । मैं पश्चिम की ओर बहती हूं। मेरा प्रवाह आधार चट्टानी भूमि है। मेरे तट पर आदिमजातियां निवास करती हैं । जीवन में मैंने सदा कड़ा संघर्ष किया। मैं एक हूं ,पर मेरे रुप अनेक हैं । मूसलाधार वृष्टि पर उफन पड़ती हूं ,तो गर्मियों में बस मेरी सांस भर चलती रहती है। मैं प्रपात बाहुल्या नदी हूं । कपिलधारा , दूधधारा , धावड़ीकुंड, सहस्त्रधारा मेरे मुख्य प्रपात हैं । ओंकारेश्वर मेरे तट का प्रमुख तीर्थ है। महेश्वर ही प्राचीन माहिष्मती है। वहाँ के घाट देश के सर्वोत्तम घाटों में से है । मैं स्वयं को भरूच (भृगुकच्छ) में अरब सागर को समर्पित करती हूँ ‌। मुझे याद आया। अमरकंटक में मैंने कैसी मामूली सी शुरुआत की थी। वहां तो एक बच्चा भी मुझे लांघ जाया करता था पर यहां मेरा पाट 20 किलोमीटर चौड़ा है । यह तय करना कठिन है कि कहां मेरा अंत है और कहां समुद्र का आरंभ? पर आज मेरा स्वरुप बदल रहा है। मेरे तटवर्ती प्रदेश बदल गए हैं मुझ पर कई बांध बांधे जा रहे हैं। मेरे लिए यह कष्टप्रद तो है पर जब अकालग्रस्त , भूखे-प्यासे लोगों को पानी, चारे के लिए तड़पते पशुओं को , बंजर पड़े खेतों को देखती हूं , तो मन रो पड़ता है। आखिर में माँ हूं। मुझ पर बने बांध इनकी आवश्यकताओं को पूरा करेंगें। अब धरती की प्यास बुझेगी । मैं धरती को सुजला सुफला बनाऊंगी। यह कार्य मुझे एक आंतरिक संतोष देता है। त्वदीय पाद पंकजम, नमामि देवी नर्मदे... नर्मदे सर्वदे 🙏🙏

+3 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 8 शेयर

हिंदुओं गांठ बांध लो। """""""""""'"""""""""""""""" 🪢 _लड़कियों का विवाह 21 वें वर्ष और लड़के का विवाह 24 वें वर्ष में हर स्थिति में हो जाना चाहिए।_ =================== 🪢 _फ्लैट भूलकर मत लो जमीन खरीदो और उस पर मकान बनाओ वर्ना बच्चों का भविष्य पिंजरे के पंछी की तरह हो जाएगा।_ ==================== 🪢 _नयी युवा पीढ़ी को कम से कम तीन संतान पैदा करने के लिए प्रेरित करो।_ ==================== 🪢 _गांव से नाता जोड़ कर रखो।और गांव की पैतृक सम्पत्ति और वहां से नाता जोड़कर रखो।_ =================== 🪢 _बच्चों को धर्म की शिक्षा अवश्य दो और उनके शारीरिक विकास पर ध्यान दो।_ ================== 🪢 _हिंदी भाषा का अधिक से अधिक प्रयोग और प्रचार-प्रसार करो।_ =================== 🪢 _किसी भी जेहादी और आतंकवादी प्रवृत्ति के व्यक्ति से सामान लेने से बचो।_ ================== 🪢 _घर में बागवानी करने की आदत डालो और यदि प्रयाप्त जगह है तो देशी गाय पालो।_ ================== 🪢_हर हिंदू के घर वाल्मीकि रामायण- योग वशिष्ठ- भागवत गीता-वेद-उपनिषद होने चाहिए जब होंगे तो पढ़ोगे भी।_ =================== 🪢_होली-दीपावली-नवरात्रि आदि जितने भी हिंदू त्योहार आयें उनमें सामूहिक यज्ञ करें।_ =================== 🪢 _अपने बच्चों को प्रत्येक वर्ष एक विद्या प्रदान करें।_ _जैसे संगीत विद्या-युद्ध विद्या-योग विद्या-तैराकी-भोजन बनाने की विद्या बच्चों को व्यस्त रखें।_ ==================== 🪢 _वर्ष में कम से कम दो पैदल तीर्थ अवश्य करें।_ ==================== 🪢 _प्रात: काल 5 बजे उठ जाएं और रात्रि को 11 बजे तक सोने का नियम बनाएं।_ =================== 🪢 _यदि बच्चा पढ़ाई में असक्षम है तो उसको तकनीक ज्ञान दें।_ =================== 🪢 _आपके बच्चों को कम से कम तीन फोन नम्बर स्मरण होने चाहिए और आपको भी।_ ===================== 🪢 _जब भी बाहर समाज में जाएं तो बच्चों को भी ले जाएं इससे उनका मानसिक विकास होगा।_ ==================== 🪢 _परिवार के साथ मिल बैठकर भोजन करने का प्रयास करें और भोजन करते समय सेल फोन और टीवी बंद कर लें।_ =================== 🪢 _बच्चों को बालिवुड की फिल्मों से बचाएं और प्रेरणादायक फिल्में दिखाएं।_ =================== 🪢 _जंक फूड और फास्ट फूड से बचें।_ ==================== 🪢_चिकन-मटन खाने की बीमारी हो तो हिंदू विक्रेता से ही खरीदें।_ =================== 🪢 _सांयकाल के समय 10 मिनट भक्ति संगीत लगाएं।_ =================== 🪢 _दिखावे के चक्कर में पड़कर व्यर्थ का खर्चा ना करें।_ =================== 🪢 _दो किमी तक जाना हो तो पैदल जाएं या साइकिल का प्रयोग करें।_ =================== 🪢 _अपने बच्चों के मन में किसी भी प्रकार के नशे के विरुद्ध चेतना पैदा करें।_ ==================== _लड़कियां पैदा होने पर अधिक प्रसन्न हों क्योंकि स्कन्द पुराण में कहा गया है कि एक लड़की 10 पुत्रों के बराबर होती है।_ 🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥

+3 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 15 शेयर

+15 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 58 शेयर

💐अनोखा फैसला एक साधु वर्षा के जल में प्रेम और मस्ती से भरा चला जा रहा था... कि इस साधु ने एक मिठाई की दुकान को देखा जहां एक कढ़ाई में गरम दूध उबला जा रहा था तो मौसम के हिसाब से दूसरी कढ़ाई में गरमा गरम जलेबियां तैयार हो रही थी। साधु कुछ क्षणों के लिए वहाँ रुक गया..... शायद भूख का एहसास हो रहा था या मौसम का असर था.... साधु हलवाई की भट्ठी को बड़े गौर से देखने लगा साधु कुछ खाना चाहता था लेकिन साधु की जेब ही नहीं थी तो पैसे भला कहां से होते.... साधु कुछ पल भट्ठी से हाथ सेंकने के बाद चला ही जाना चाहता था..... कि नेक दिल हलवाई से रहा न गया और एक प्याला गरम दूध और कुछ जलेबियां साधु को दें दी... साधु ने गरम जलेबियां गरम दूध के साथ खाई और फिर हाथों को ऊपर की ओर उठाकर हलवाई के लिऐ प्रार्थना की..... फिर आगे चल दिया..... साधु बाबा का पेट भर चुका था दुनिया के दु:खों से बेपरवाह वे फिर इक नए जोश से बारिश के गंदले पानी के छींटे उड़ाता चला जा रहा था....... वह इस बात से बेखबर था कि एक युवा नव विवाहित जोड़ा भी वर्षा के जल से बचता बचाता उसके पीछे चला आ रहा है ...... एक बार इस मस्त साधु ने बारिश के गंदले पानी में जोर से लात मारी..... बारिश का पानी उड़ता हुआ सीधा पीछे आने वाली युवती के कपड़ों को भिगो गया उस औरत के कीमती कपड़े कीचड़ से लथपथ हो गये..... उसके युवा पति से यह बात बर्दाश्त नहीं हुई..... इसलिए वह आस्तीन चढ़ाकर आगे बढ़ा और साधु को कपड़ों से पकड़ कर कहने लगा अंधा है...... तुमको नज़र नहीं आता तेरी हरकत की वजह से मेरी पत्नी के कपड़े गीले हो गये हैं और कीचड़ से भर गये हैं..... साधु हक्का-बक्का सा खड़ा था.... जबकि इस युवा को साधु का चुप रहना नाखुशगवार गुजर रहा था..... महिला ने आगे बढ़कर युवा के हाथों से साधु को छुड़ाना भी चाहा.... लेकिन युवा की आंखों से निकलती नफरत की चिंगारी देख वह भी फिर पीछे खिसकने पर मजबूर हो गई..... राह चलते राहगीर भी उदासीनता से यह सब दृश्य देख रहे थे लेकिन युवा के गुस्से को देखकर किसी में इतनी हिम्मत नहीं हुई कि उसे रोक पाते और आख़िर जवानी के नशे मे चूर इस युवक ने एक जोरदार थप्पड़ साधु के चेहरे पर जड़ दिया बूढ़ा मलंग थप्पड़ की ताब ना झेलता हुआ.... लड़खड़ाता हुऐ कीचड़ में जा पड़ा..... युवक ने जब साधु को नीचे गिरता देखा तो मुस्कुराते हुए वहां से चल दिया.. बूढे साधु ने आकाश की ओर देखा और उसके होठों से निकला वाह मेरे भगवान कभी गरम दूध जलेबियां और कभी गरम थप्पड़.... लेकिन जो तू चाहे मुझे भी वही पसंद है........यह कहता हुआ वह एक बार फिर अपने रास्ते पर चल दिया.... दूसरी ओर वह युवा जोड़ा अपनी मस्ती को समर्पित अपनी मंजिल की ओर अग्रसर हो गया..... थोड़ी ही दूर चलने के बाद वे एक मकान के सामने पहुंचकर रुक गए......वह अपने घर पहुंच गए थे.... वे युवा अपनी जेब से चाबी निकाल कर अपनी पत्नी से हंसी मजाक करते हुए ऊपर घर की सीढ़ियां तय कर रहा था.... बारिश के कारण सीढ़ियों पर फिसलन हो गई थी अचानक युवा का पैर फिसल गया और वह सीढ़ियों से नीचे गिरने लगा.... महिला ने बहुत जोर से शोर मचा कर लोगों का ध्यान अपने पति की ओर आकर्षित करने लगी जिसकी वजह से काफी लोग तुरंत सहायता के लिये युवा की ओर लपके..... लेकिन देर हो चुकी थी युवक का सिर फट गया था और कुछ ही देर मे ज्यादा खून बह जाने के कारण इस नौजवान युवक की मौत हो चुकी थी कुछ लोगों ने दूर से आते साधु बाबा को देखा तो आपस में कानाफुसी होने लगीं कि निश्चित रूप से इस साधु बाबा ने थप्पड़ खाकर युवा को शाप दिया है.... अन्यथा ऐसे नौजवान युवक का केवल सीढ़ियों से गिर कर मर जाना बड़े अचम्भे की बात लगती है..... कुछ मनचले युवकों ने यह बात सुनकर साधु बाबा को घेर लिया एक युवा कहने लगा कि आप कैसे भगवान के भक्त हैं जो केवल एक थप्पड़ के कारण युवा को शाप दे बैठे...... भगवान के भक्त में रोष व गुस्सा हरगिज़ नहीं होता ....आप तो जरा सी असुविधा पर भी धैर्य न कर सके..... साधु बाबा कहने लगा भगवान की क़सम मैंने इस युवा को शाप नहीं दिया.... अगर आप ने शाप नहीं दिया तो ऐसा नौजवान युवा सीढ़ियों से गिरकर कैसे मर गया ? तब साधु बाबा ने दर्शकों से एक अनोखा सवाल किया कि आप में से कोई इस सब घटना का चश्मदीद गवाह मौजूद है ? एक युवक ने आगे बढ़कर कहा..... हाँ मैं इस सब घटना का चश्मदीद गवाह हूँ। साधु ने अगला सवाल किया.....मेरे क़दमों से जो कीचड़ उछला था क्या उसने युवा के कपड़े को दागी किया था ? युवा बोला..... नहीं.... लेकिन महिला के कपड़े जरूर खराब हुए थे। मलंग ने युवक की बाँहों को थामते हुए पूछा.. फिर युवक ने मुझे क्यों मारा ? युवा कहने लगा...... क्योंकि वह युवा इस महिला का प्रेमी था और यह बर्दाश्त नहीं कर सका कि कोई उसके प्रेमी के कपड़ों को गंदा करे..... इसलिए उस युवक ने आपको मारा.... युवा की बात सुनकर साधु बाबा ने एक जोरदार ठहाका बुलंद किया और यह कहता हुआ वहाँ से विदा हो गया..... तो भगवान की क़सम मैंने शाप कभी किसी को नहीं दिया लेकिन कोई है जो मुझ से प्रेम रखता है.... अगर उसका यार सहन नहीं कर सका तो मेरे यार को कैसे बर्दाश्त होगा कि कोई मुझे मारे और... वह इतना शक्तिशाली है कि दुनिया का बड़े से बड़ा राजा भी उसकी लाठी से डरता है .... उस परमात्मा की लाठी दिखती नहीं और आवाज भी नही करती लेकिन पडती हैं तो बहुत दर्द देती है। *हमारें कर्म ही हमें उसकी लाठ़ी से बचातें हैं बस कर्म अच्छे होने चाहिये.....* *सदैव प्रसन्न रहिये।* *जो प्राप्त है, पर्याप्त है। कॉपी

+4 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 19 शेयर

+5 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 10 शेयर

एक बुजुर्ग आदमी ने अफवाह फैलाई कि उसके पड़ोस में रहने वाला नौजवान चोर है। यह बात दूर-दूर तक फैल गई आस-पास के लोग उस नौजवान से बचने लगे। नौजवान परेशान हो गया,कोई उस पर विश्वास ही नहीं करता था। तभी गाँव में एक चोरी की एक वारदात हुई और शक उस नौजवान पर गया,और उसे गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन कुछ दिनों के बाद सबूत के अभाव में वह निर्दोष साबित हो गया..... निर्दोष साबित होने के बाद वह नौजवान चुप नहीं बैठा उसने उस बुजुर्ग आदमी पर गलत आरोप लगाने के लिए मुकदमा दायर कर दिया। पंचायत में बुजुर्ग आदमी ने अपने बचाव में सरपंच से कहा:- मैंने जो कुछ कहा था,वह एक टिप्पणी से अधिक कुछ नहीं था,किसी को नुकसान पहुंचाना मेरा मकसद नहीं था..... सरपंच ने बुजुर्ग से कहा:- आप एक कागज के टुकड़े पर वो सब बातें लिखें, जो आपने उस नौजवान के बारे में कहीं थीं और जाते समय उस कागज के टुकड़े-टुकड़े करके घर के रस्ते पर फ़ेंक दें, कल फैसला सुनने के लिए आ जाएं.... बुजुर्ग ने वैसा ही किया.. अगले दिन सरपंच ने बुजुर्ग से कहा:- फैसला सुनने से पहले आप बाहर जाएं और उन कागज के टुकड़ों को जो आपने कल बाहर फ़ेंक दिए थे,इकठ्ठा कर ले आएं... बुजुर्ग ने कहा:- मैं ऐसा नहीं कर सकता,उन टुकड़ों को तो हवा कहीं से कहीं उड़ा कर ले गई होगी,अब वे नहीं मिल सकेंगें,मैं कहाँ-कहाँ उन्हें खोजने के लिए जाऊंगा❓ सरपंच ने कहा:- ठीक इसी तरह,एक सरल-सी टिप्पणी भी किसी का मान-सम्मान उस सीमा तक नष्ट कर सकती है,जिसे वह व्यक्ति किसी भी दशा में दोबारा प्राप्त करने में सक्षम नहीं हो सकता.... इसलिए यदि किसी के बारे में कुछ अच्छा नहीं कह सकते,तो चुप रहें। वाणी पर हमारा नियंत्रण होना चाहिए,ताकि हम शब्दों के दास न बनें..!! कॉपी

+10 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 31 शेयर