शुभरात्रि

#प्रेरणादायक_कहानियां ~~~~~~~~~~~~~~ प्रत्येक भारतीय अगर विदुला को स्मरण रखता, तो धर्म की हानि कभी नही होती ।। प्राचीनकाल मे विदुला नाम की महान स्त्री हुई है ...एक बार हुआ यूं ... की विदुला के पुत्र संजय , सिंधुराज से परास्त होकर, दीन हीन भाव से, अपने कक्ष में विश्राम करने लगे .... संजय सोचने लगा की जो कुछ उसने हारा है, वह उसे वापस कभी नही जीत सकता । संजय की हालत ठीक आज के हिंदुओं जैसी ही थी । अपना राज्य हारकर भी, आज के हिंदुओं की तरह, संजय ने भी हार पर संतोष कर लिया .... लेकिन संजय की माता विदुला से यह अकर्मण्यता सहन नही हुई, ओर उन्होंने अपने पुत्र को ऐसे वचन कहें, जो कि बाद इतिहास बन गए ।। जब भगवान श्रीकृष्ण हस्तिनापुर आते है, ओर कुंती से मिलते है,----- श्रीकृष्ण कुंती से कहते है " बुआजी, आपके पुत्रो को कोई संदेश देना हो, तो बता दीजिए... उस समय कुंती ने पांडवो के लिए वही कथा भेजी, जो वचन विदुला ने अपने पुत्र को कहे थे ... ●विदुला अपने पुत्र से कहती है :- अरे !! तू मेरे गर्भ से जन्म हुआ, लेकिन मुझे आनंदित करने वाला नही है, इसलिए में अब यह समझने लगी हूँ, की मेने तुझे पैदा ही नही किया, तू तेरे पिता का पुत्र नही है, हमारे घर मे तेरे जैसा कायर कहाँ से आ गया ... ●तू सर्वथा क्रोध शून्य है, क्षत्रियो में गणना करने योग्य नही है, तू नाममात्र का पुरुष है, तेरे मन् आदि सभी साधन नपुंसको के है ।। क्या तू जीवनभर के लिए निराश हो गया ? अरे अब तो उठ, ओर कल्याण के लिए पुनः युद्ध का भार ग्रहण कर ।। ●अपने को दुर्बल मानकर स्वयं ही अपनी अवहेलना न् कर, इस आत्मा का थोड़े से धन से भरण पोषण न् कर, मन को परमकल्याणमय बनाकर , उसे शुभ संकल्पो से सम्पन्न करके निडर हो जा , भय को सर्वथा त्याग दे ।। ●अरे ओ कायर !! उठ, खड़ा हो, इस तरह शत्रु से पराजित होकर उद्योगशून्य न् हो, ऐसा करके तो तू अपने शत्रुओं को ही आनंद दे रहा है , ओर मान प्रतिष्ठा से वंचित होकर बंधु बांधवों को शोक में डाल रहा है ।। ●जैसे छोटी नदी थोड़े से जल से भर जाती है, और चूहे की अंजली थोड़े से अन्न से ही भर जाती है, उसी प्रकार कायर को संतोष दिलवाना बहुत सुगम है । वह थोड़े से , से ही संतुष्ठ हो जाता है ।। ●पुत्र !! तू शत्रुरूपी सांप के दांत तोड़ता हुआ, आगे बढ़ अगर प्राण जाने का भय हो, तो भी शत्रु के सामने पराक्रम का प्रदर्शन ही कर ।। आकाश में निशंक होकर उड़ने वाले पक्षी की भांति रणभूमि में निर्भय विचरता हुआ तु गर्जना करके, या शांत रहकर, शत्रु के छिद्र देखते जा ।। ●तू दीनहीन होकर अस्त न् हो, अपने शौर्य से प्रसिद्धि प्राप्त कर, तू मध्यम, अधम, तथा निकृष्ट भाव का सहारा मत ले, बल्कि युद्ध भूमि में सिंहनाद करके डट जा । ●तू तिन्दूक की जलती हुई लकड़ी के समान दो घड़ी के लिए ही प्रज्वलित होकर उठ ( थोड़ी देर के लिए ही सही, शत्रु के सामने महान पराक्रम प्रकट कर ।। किंतु जीने की इच्छा से भूसी की ज्वालारहित आग के समान केवल धुँवा न् कर, दो घड़ी तक प्रज्वलित रहना अच्छा, परंतु दीर्घकाल तक धुँवा छोड़ते हुए सुलगना ठीक नही , किसी भी राजा के घर मे अत्यंत कठोर अथवा अत्यंत कोमल स्वभाव का पुरुष न् जन्मे .... ●विद्धवान पुरुष को अभीष्ठ फल की प्राप्ति हो, या नही हो, वह दुःखी नही होता, वह जब तक प्राण रहते है, तबतक अपने प्रयास करते रहता है, ओर वह अपने लिए धन या सुख की इच्छा भी नही करता ।। ●बेटा , या तो धर्म को आगे रखकर या तो पराक्रम प्रकट कर, अथवा मृत्यु को प्राप्त हो जा, ऐसे तो तू किसके लिए जी रहा है ?? तेरे इस्ट ओर आपूर्त कर्म नष्ठ हो गए, सारी कीर्ति धुल में मिल गयी, और भोग का मूल साधन राज्य भी छीन गया, अब तू किसके लिए जी रहा है ?? ●मनुष्य डूबते समय, अथवा ऊंचे से नीचे गिरते समय भी, शत्रु की टांग अवश्य पकड़े, ओर यदि ऐसा करते समय उसका मूलोच्छेद हो जाएं, तब भी किसी प्रकार का विषाद न् करें । अच्छी जाति के घोड़े न् तो थकते है, न् ही शिथिल होते है।। ●बेटा !! तू धैर्य और स्वाभिमान का अवलंबन कर, अपने पुरुषार्थ को जान, और तेरे कारण डूबे हुए इस वंश का , तू खुद ही उद्धार कर ।। ●जिसके महान और अद्भुत पुरुषार्थ एवं चरित्र की सब लोग चर्चा नही करते है, वह मनुष्य अपने द्वारा जनसंख्या की वृद्धि करने वाला है, मेरी नजर में वह न् तो पुरुष है, और न ही स्त्री। । ●दान तपस्या सत्यभाषण, विद्या तथा धनोपार्जन में जिसके सुयश का सर्वत्र बखान नही होता, वह मनुष्य अपनी माता का पुत्र नही, मल-मूत्रमात्र ही है ।। ●जो शास्त्रज्ञान, तपस्या, धनसम्पत्ति अथवा पराक्रम के द्वारा दूसरे लोगो को पराजित कर देता है, वह उसी श्रेष्ठकर्म के द्वारा " पुरुष " कहलाता है । ●जिस दुर्बल मनुष्य का शत्रुपक्ष के लोग अभिनंदन करते हो, जो सब लोगो के द्वारा अपमानित होता हो, जिसके आसन तथा वस्त्र निकृष्ट श्रेणी के हो, जो थोड़े से लाभ से ही संतुष्ठ होकर विस्मय प्रकट करता हो, जो सब प्रकार से हीन, क्षुद्र जीवन बिताने वाला और ओछे स्वभाव का हो, ऐसे बंधु हो पाकर उसके भाई बंधु सुखी नही होते ।। ●जो शत्रु का सामना करके उसके वेग को सह लेता है, उस पुरुषार्थ के कारण ही व्यक्ति पुरुष कहलाता है, ●यदि बढ़े हुए तेज, और उत्साहवाला शूरवीर एवं सिंह के समान पराक्रमी राजा युद्ध मे दैववश वीरगति को प्राप्त हो जाएं, तो भी उसके राज्य में प्रजा सुखी ही रहती है ।। माता के ऐसे ओजस्वी वचन सुनकर विदुला का पुत्र संजय बोला :- माँ ! यदि तू मुझे न् देखें, तो यह सारी पृथ्वी मिल जाने पर भी तुझे क्या सुख मिलेगा, मेरे न् रहने पर तुझे क्या आभूषणों की आवश्यकता भी पड़ेगी ?? भांति भांति के भोगों और जीवन से भी क्या तेरा प्रयोजन सिद्ध होगा ?? ●बेटा !! आज भोजन क्या होगा, इस प्रकार की चिंता में पड़े हुए दरिद्रो के जो लोक है, वह लोक हमारे शत्रुओं को प्राप्त हो, ओर सर्वत्र सम्मानित होने वाले पुण्यात्मा पुरुषों के जो लोक है ,उनमें हमारे हितेषी सुह्रद पधारे ।। ●बेटा !! भृत्यहीन , दुसरो के अन्न पर जीने वाले , दीन दुर्बल मनुष्यो की वृति का अनुसरण नही कर, जैसे सब जीव प्राणियों की जीविका मेघ के अधीन है, जैसे सब देवता इंद्र से आश्रित होकर जीवन धारण करते है, उसी प्रकार ब्राह्मण तथा हितेषी मित्र तेरे सहारे जीवन निर्वाह करें । ●जैसे इंद्र के पराक्रम से सभी सुखी रहते है, ठीक उसी प्रकार शूरवीर पुरुष के बल और पुरुषार्थ से उसके भाई बंधु सुखपूर्वक उन्नति करते है, इस संसार मे ऐसे लोगो का ही जीवन श्रेष्ठ है ।। ●जो मनुष्य बाहुबल का आश्रय लेकर उत्कृष्ट जीवन व्यतीत करता है, वह इस लोक, ओर परलोक् दोनो में उत्तम गति को प्राप्त होता है ।। ●अगर तू इस दशा में पौरुष का त्याग करता है, तो शीघ्र ही नीच पुरुषों के मार्ग पर जा गिरेगा । जो क्षत्रिय अपने जीवन के लोभ से यथाशक्ति पराक्रम प्रगट करके अपने तेज का परिचय नही देता, सब लोग उसे चोर मानते है ।। ●जैसे मरणासन्न व्यक्ति को कोई दवा नही लगती, उसी प्रकार से यह युक्तियुक्त, गुणकारी, और सार्थक वचन भी , तेरे ह्रदय तक नही पहुंच पाते है , यह कितने दुःख की बात है ।। ●देख सिंधुराज की प्रजा उससे संतुष्ठ नही है, तथापि तेरी दुर्बलता के कारण किंकर्तव्यविमूढ़ होकर उदासीन बैठी हुई है, और सिंधुराज पर विपदा आने की बाट जो रही है । ●दूसरे राजा भी तेरा पुरुषार्थ देखकर इधर उधर से विशेष चेस्टापूर्ण सहायक साधनों की वृद्धि करके सिंधुराज के शत्रु हो सकते है ।। ●तू उन सबके साथ मैत्री करके यथासमय अपने शत्रु सिंधुराज पर विपत्ति आने की प्रतीक्षा करता हुआ पर्वतों की दुर्गम गुफाओ में विचरता रह, क्यो की सिंधुराज कोई अजर अमर तो है नही ।। ●पुत्र संजय !! हम क्षत्रियः है, हमे युद्ध मे हानि लाभ से मतलब नही है, हमे तो केवल युद्ध मे मन लगाना है, यही हमारा कर्तव्य है, अतः तू युद्ध बन्द नही कर ।। ●पुत्र जिसका नाम दरिद्रता है, उसे पुत्र एवं पति के वध से भी अधिक दुखदाई बताया गया है, दरिद्रता(गरीबी) म्रत्यु का समानार्थी शब्द है ।। ऐसे वचन सुनकर संजय वापस युद्धभूमि में लौटा, ओर विजयश्री प्राप्त की ।।

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PRABHAT KUMAR Sep 21, 2021

🚩🔔✡️🕉️🚩🔔✡️🕉️🚩🔔✡️🕉️🚩🔔✡️🕉️🚩🔔✡️ 🍁🍁 *#जय_श्री_राम_जय_जय_महावीर_हनुमान* 🍁🍁 🚩🔔✡️🕉️🚩🔔✡️🕉️🚩🔔✡️🕉️🚩🔔✡️🕉️🚩🔔✡️ *सभी आदरणीय साथियों को मंगलमय शुभ रात्रि कालीन वंदन* 🙏🙏🙏 💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗 💗💖 *#सीता_माता_ने_किसे_और_क्यों_श्राप_दिया* 💗💖 💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗 *दरअसल, यह कहानी शुरू होती है राजा दसरथ की मृत्यु के बाद पिण्डदान से… भगवान राम अपने प्रिय भाई लक्ष्मण के साथ पिंडदान की सामग्री लेने गए थे और पिंडदान का समय निकलता जा रहा था। ऐसे में माता सीता ने समय के महत्व को समझा और अपने ससुर राजा दशरथ का पिंडदान सही समय पर राम-लक्ष्मण की उपस्थिति के बिना ही कर दिया। माता सीता ने अपने ससुर का पिंडदान पुरी विधि विधान के साथ किया था।* 💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗 *वहीं, जब भगवान राम लौट कर आए और पिंड दान के विषय में माता सीता से पूछा तब माता सीता ने राजा दशरथ का पिंडदान समय पर करने की बात कही और वहां पिंडदान के समय उपस्थित पंडित, गाय, कौवा, और फल्गु नदी को पूछने के लिए कहा। फिर क्या जब भगवान राम ने इन चारो से पिंडदान किए जाने की बात सच है या नहीं यह पूछा, तब चारो ने झूठ बोल दिया कि माता सीता ने कोई पिंडदान नहीं किया। बस यह सुनकर माता सीता ने इन चारो को झूठ बोलने की सजा देते हुए उन्हें आजीवन श्रापित कर दिया।* 💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗 *#पंडित* *माता सीता ने सारे पंडित समाज को यह श्राप दिया कि पंडित को कितना भी मिलेगा उसकी दरिद्रता हमेशा बनी रहेगी। आज भी देखिए ब्रम्हाण को कितना भी दान क्यों ना मिल जाए लेकिन उसके मन में दरिद्रता बनी ही रहती है।* 💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗 *#कौआ* *माता सीता ने कौआ को यह श्राप दिया कि – तुम्हे अकेले खाने से कभी पेट नहीं भरेगा और आकस्मिक मौत मारे जाओगा। देखिए आज भी कौआ अपना पेट भरने के लिए झुण्ड में ही खाना खाता है और उसकी आकस्मिक मौत ही होती है।* 💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗 *#फाल्गु_नदी* *वहीं, फाल्गु नदी के लिए यह श्राप था – कितना भी पानी गिरे लेकिन नदी ऊपर से सुखी ही रहोगी और नदी के ऊपर कभी पानी का बहाव नहीं होगा। आज भी अगर आप फाल्गु नदी को देखेंगे तो उसे सुखा ही पाएंगे।* 💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗 *#गाय* *गाय को माता सीता ने यह कहकर श्रापित किया कि – हर घर में पूजा होने के बाद भी तुमको लोगों का जूठन खाना व पीना पड़ेगा। सीता माता द्वारा दिए गए इस श्राप का प्रभाव आज भी कायम है तभी तो गाय पूजनीय होकर भी हर घर का जूठा खाना खाती है।* 💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗 *#नोट : उक्त जानकारी सोशल मीडिया से ली गई है ।* 📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰 *( इस आलेख में दी गई जानकारियाँ धार्मिक आस्था और लौकिक मान्यताओं पर आधारित है जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है। )* 💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗💖💗

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Shudha Mishra Sep 21, 2021

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Shuchi Singhal Sep 21, 2021

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